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Sunday, September 30, 2007

पंडित नरेंद्र शर्मा की अनमोल रचना थी 'युग की संध्‍या'

पंडित नरेंद्र शर्मा की सुपुत्री लावण्‍या जी का रेडियोनामा पर बड़ा स्‍नेह रहा है । पच्‍चीस सितंबर 2007 को लावण्‍या जी ने रेडियोनामा पर रेडियो के प्रसार गीत --नाच मयूरा नाच पर बड़े स्‍नेहसिक्‍त पोस्‍ट लिखी थी । प्रसार गीत के बारे में थोड़ी बातें और कहनी हैं । विविध भारती पर पहला गीत यही बजाया गया था । 'नाच मयूरा' नामक इस गीत को मन्‍ना डे ने गाया था और संगीतबद्ध किया था अनिल विश्‍वास ने । इसी पोस्‍ट में लावण्‍या जी ने जिक्र किया था पंडित जी के गीत 'युग की संध्‍या' का । जिसे लता मंगेशकर ने रिकॉर्ड तो किया लेकिन उस गीत की रिकॉर्डिंग कहीं खो गयी या कुछ तकनीकी खराबी की वजह से हमेशा के लिए मिट गयी । इस पोस्‍ट को आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं । आज लावण्‍या जी अपने संग्रह से खोजकर पंडित नरेंद्र शर्मा के उसी गीत की इबारत प्रस्‍तुत कर रही हैं ।
एक उत्‍कृष्‍ट रचना, अनमोल धरोहर । हम आभारी हैं कि उन्‍होंने रेडियोनामा के मंच से इसे आप तक पहुंचाने का सौभाग्‍य हमें दिया । लावण्‍या जी का स्‍नेह रेडियोनामा पर बना रहे । यही कामना है ।






युग की सँध्या
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युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही ...
युग की सँध्या कृषक वधू सी ....

धूलि धूसरित, अस्त ~ व्यस्त वस्त्रोँ की,
शोभा मन मोहे, माथे पर रक्ताभ चँद्रमा की सुहाग बिँदिया सोहे,

उचक उचक, ऊँची कोटी का नया सिँगार उतार रही
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही
युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?

रँभा रहा है बछडा, बाहर के आँगन मेँ,
गूँज रही अनुगूँज, दुख की, युग की सँध्या के मन मेँ,
जँगल से आती, सुमँगला धेनू, सुर पुकार रही ..
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही
युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?

जाने कब आयेगा मालिक, मनोभूमि का हलवाहा ?
कब आयेगा युग प्रभात ? जिसको सँध्या ने चाहा ?
सूनी छाया, पथ पर सँध्या, लोचन तारक बाल रही ...
उलझी हुई समस्याओँ की बिखरी लटेँ सँवार रही
युग की सँध्या कृषक वधू सी किस का पँथ निहार रही ?

[ Geet Rachna :: Late Pandit Narendra Sharma :
Compiled By : Lavanya ]

जाने कहॉ गए वो रात दिन ( २)

पिछली कडी
टी.वी के आने के बाद धीरे धीरे रेडियो का समय सिकुड्ने लगा, फ़िर भी छाया गीत रोज सुना जाता रहा, अमीन सायानी को बिनाका गीत माला मे बोलते सुन सुन कर रेडियो उद्गोषक बनने की इच्छा दिल मे घर करने लगी, एक दो बार युवावाणी से महफ़िल प्रस्तुत करने का मौका भी मिला, फ़िर केबल आया तो रेडियो बिल्कुल छुट गया.
आज नये एफ़.एम. चैनलो और रेडियो मोबएल ने आकर एक बार फ़िर से रेडियो को पुनर्जीवित तो कर दिया है पर फ़िर भी वो विविध भरती के दिन -रात कुछ और ही होते थे..... लता जी, किशोर, रफ़ी, मुकेश, मन्न डे, हेमन्त दा, कितने कितने उम्र भर के मीत दिये हमे इसने.
आज भी रोज सुबह उटकर और रविवार पूरा दिन रेडियो सुना करता हू, अभी बीते सप्ताह युनुस भाई को हिन्द युग्म पर बोलते हुए सुनने के लिये, बहुत मशक्कत की विविध भारती tune करने की, पर कमबख्त फ्रिकुवेंसी पकड ही नही पाया, जिस तरह चैनलो की भीड मे भी याद आते है, दूरदर्शन के पुराने धरावाहिक, उसी तरह एफ़ एम चैनलो की इस बाड़ मे भी कमी मह्सूस होती है विविध भारती की, वो धुन (signature tune ) जो विविध भारती पर कार्यक्रम शुरू होने से पहले बजती थी क्या आज भी बजती है? छाया गीत क्या आज भी प्रसारित होता है ? पता नही ....
अपने इस सबसे पुराने दोस्त को आज देने के लिये कुछ भी नही है मेरे पास - बधाइयो के सिवा.

Saturday, September 29, 2007

क्षेत्रीय भाषाओं के राज्यव्यापी एफ. एम. रेडियो चेनल्स

श्री कमलजी, आपने जो भी चित्र खडा किया वह पूरा सही और यथायोग्य है और युनूसजीने जो निजी एफ़.एम. रेडियो चेनल्स को जो समाचार और साम्प्रत विषयो पर कार्यक्रम की छुट देने पर खडे होने वाले भयस्थानों का जिक्र किया है वह टी.वी. समाचार चेनल्स की हाल की गतिविधीयाँ देख कर और पढ़ कर बहोत ही सही दिखती है।

आपको याद होगा कि मैनें आपको एक मेईल करके क्षेत्रीय भाषाओं के लिये हाल जो मध्यम तरंग रेडियो प्रसारण पर आकाशवाणी ज्यादा निर्भर रहेती है और बहोत ही कम एफ. एम. खण्ड समयावधि वाले स्थानिय रेडियो केन्द्र आकाशवाणी के रहे है । तो जैसे राष्ट्रीय मनोरंजन सेवा विविध भारती के लिये चार मेट्रोज को छोड कर रा्ष्ट्रीय एफ़. एम. नेटवर्क मिला है, हर राज्यो के मुख्य प्राइमरी केन्द्रों के भी सम्बंधित राज्यव्यापी एफ़. एम. नेटवर्क स्थापित होने चाहिए, जिससे देश के हर कोनेमें लोग अपनी भाषाके क्षेत्रीय समाचार बुलेटीन, क्षेत्रीय भाषाओमें राष्ट्रीय समाचार बुलेटीन और क्षेत्रीय नाट्य, सुगम और फ़िल्मी संगीत (जिसका काफ़ी अमूल्य संग्रह हर राज्यो के मुख्य आकाशवाणी केन्दो के पास है), केबल या डी. टी. एच. के बिना बेटरी से चलने वाले रेडियो या एफ़. एम.रेडियो वाले मोबाईल फोन पर भी सुन सके । हाँ एक बात है, कि निजी चेनल्स को हम अनुसासन सिखाते है, तब यह भी जरूरी है, कि आकाशवाणी के हर बुलेटिन भी प्रधान मंत्री या सत्ता में रही राजकीय पार्टी के अध्यक्ष को ले कर शुरू नहीं होने चाहिए । नहीं तो लोगो के ऊब जाने की भी सम्भावना रहेगी, जैसे शहरोमें निजी समाचार केबल टी. वी. चेनल्स के साथ होना शुरू हो गया है ।
पियुष महेता।
सुरत-३९५००१.

बताइये कौन सा गाना है

क्विज़ रेडियो- एक
यारों ने इतनी बार ये गाने सुने हैं कि गाने की opening music सुनते ही उसके साथ गुनगुना उठते हैं. अस्सी फ़ीसदी बार ये सटीक निकलता है. आप का कहना है कि सौ फ़ीसदी सही होता है, तो आपकी ही बदगुमानियों से टकराएगा ये शुरुआती टुकड़ा.
बूझिये कि कौन सा गाना है?
क्ल्यू: फ़िल्म में अशोक कुमार और मधुबाला मुख्य भूमिकाओं में.






जाने कहॉ गए वो रात दिन

चार साल का था जब दिल्ली आया, माँ के साथ, पिताजी दिल्ली posted थे और अब उन्हें सरकारी मकान भी मिल गया था। पहली चीज़ जो पिताजी ने मुझे तोहफे के रुप में दिया वो था एक जर्मन मेड रेडियो, जो बना मेरे जीवन का पहला पहला दोस्त, मैं बात कर रहा हूँ १९७८ की, अगले लगभग ८ सालों तक उसी रेडियो के आस पास घूमती थी मेरी दुनिया।
सुबह सात बजे से १० बजे तक , सभी कार्यक्रम जो विविद भारती से उन दिनों प्रसारित होते थे बिना नागा सुनता था। " संगीत सरिता " से सुबह की शुरवात होती थी, संगीत के विषय पर इतना ज्ञानवर्धक कार्यक्रम मैंने आज तक दूसरा नही सुना, चित्रगीत पर नयी फिल्मों के गाने आते थे, जो सुबह ८.३० से १० बजे तक प्रसारित होता था, करीब सवा नौ बजे मैं स्कूल के लिए निकल जाता था अपने रेडियो से विदा कह कर और उसे बहुत संभाल कर अपनी छोटी सी अलमारी मे छिपा कर। हमारी स्कूल बस होती थी जो करीब १ घंटे में स्कूल पहुंचती थी, रास्ते में हम अन्ताक्षरी खेलते थे और जितने गाने मुझे याद होते थे, शायाद ही किसी को होते थे, कारण मेरा रेडियो ही तो था, स्वाभाविक है कि जिस टीम में मैं होता था वही जीतती थी।
उन दिनों हम जिस घर में रहते थे वहाँ खुला आंगन होता था और गर्मियों के दिनों में शाम होते ही फर्श को पानी से धोकर हम सब बाहर आंगन में सोते थे, सिराने रखे रेडियो पर छायागीत सुनते सुनते अक्सर नींद लग जाती थी और रेडियो खुला रह जाता था.... अभी भी याद आती है पापा की वो ड़ान्टें...

(शेष अगली पोस्ट में )

Friday, September 28, 2007

मेहनाज़ अनवर से बातचीत

मेहनाज़ अनवर का नाम न सिर्फ़ पुरानी स्टाइल के रेडियो से जुड़ा हुआ है बल्कि वो FM सुननेवालों के लिये भी बेहद जाना-पहचाना नाम हैं. एफ़एम ब्रॊडकास्टिंग की जब शुरुआत हुई तो ग़ज़लों के प्रोग्राम आदाब और आदाब अर्ज़ है से उन्होंने नये सुनने वालों से एक बेहद अपनापे का रिश्ता बनाया, लोगों में ज़बान का शऊर पैदा किया और एक नये अन्दाज़-ए-बयां को मक़बूल बनाया. सुननेवालों से जज़्बाती रिश्ता बनाना कोई उनसे सीखे.वो जितनी दिलकश आवाज़ की धनी हैं उतनी ही खूबसूरत शख्सियत भी हैं.
आइये सुनतें हैं उन्ही की आवाज़ मे कुछ गुज़री बातें.पहला हिस्सा.






मेरे महबूब न जा....आधी रात न जा..

मेरे महबूब न जा...आधी रात न जा...होने वाली है सहर...थोड़ी देर और ठहर....आज भी जब इस गीत को सुनता हूं तो बरसों पुरानी यादों में खो जाता हूं। विविध भारती का एक कार्यक्रम बेला के फूल...रात 11 से 11.30 बजे आने वाला यह कार्यक्रम शायद ही कोई दिन था, जब मैं नहीं सुनता था। जिसका अब साथ नहीं है। राजस्‍थान जहां मैं पला और बढ़ा हर मौसम में रात में घर की छत पर रेडियो लेकर जाता और छायागीत एवं बेला के फूल जरुर सुनता। बेला के फूल कार्यक्रम का आखिरी गीत बरसों पहले लगभग यही होता था....मेरे महबूब न जा...आधी रात न जा...। वाकई उस समय मन करता की यह महूबब कहीं ना जाए...इतना बढि़या कार्यक्रम और अब यह तो जाने की बात करने लगे। इस गाने की धुन के साथ ही समझ में आ जाता था कि विविध भारती की आखिर सभा समाप्‍त होने को है और अपने सोने की सभा शुरू होने वाली है।


गाना समाप्‍त और आवाज आती विविध भारती की यह अंतिम सभा अब समाप्‍त होती है। सुबह फिर आप से मुलाकात होगी। स्‍कूल, कॉलेज और यून‍िविर्सिटी के दिनों में बेला के फूल कार्यक्रम के बाद सोने का वक्‍त हो जाता लेकिन अब महानगरों में मची भागमभाग कोई वक्‍त तय नहीं करती। बेला के फूल कार्यक्रम में सुने गए कई गाने आज भी मुझे याद आते हैं। लेकिन मैंने जिक्र केवल एक गाने का किया है यह बताने के लिए कि यह महबूब अब ना जाने कहां चला गया।


रेडियो के बेहद पुराने श्रोता पीयूष मेहता के साथ इंटरनेट पर चैट करते समय मैंने उन्‍हें भी कार्यक्रम के बारे में पूछा तो उन्‍होंने बताया कि बेला के फूल विविध भारती की केंद्रीय सेवा में अब नहीं है , पर यह सिर्फ़ मुंबई, पुणे और नागपुर के स्‍थानीय विज्ञापन सेवा वाले विविध भारती केंद्रों से 11 से 11.30 रात्रि में आ रहा है और ये भी तीनों केंद्र अलग अलग है पर अब सूरत में मुंबई सीबीएस हर समय पकड़ में नहीं आता इसलिए अगर हाल ही में कुछ परिवर्तन उन केंद्रों पर हुआ होगा तो पता नहीं है। लेकिन आज रात इस कार्यक्रम के बारे में रेडियो सुनकर जरुर बताऊंगा। आप भी जोडि़ए जानकारी बेला के फूल कार्यक्रम पर.........।

संगीत सरिता में बचपन से किया सद्यः स्नान

हम जिस स्कूल में पढते थे वहां संगीत अनिवार्य विषय था। सप्ताह में एक दिन संगीत की कक्षा लगती थी। यह कक्षा संगीत कक्ष में ही लगती थी।

संगीत कक्ष एक बड़ा सा कमरा था जिसमें दरी बिछी होती थी। हम सब छात्र दरी पर बैठते, सामने कुर्सी पर हमारी अध्यापिका श्रीमती कमला पोद्दार बैठती और साथ लगी मेज़ पर होता हारमोनियम। दीवार से लगी शीशे की अलमारियों में सजे होते तबला, ढोलक, घुंघरू, सितार, वीणा। लेकिन हमारे पाठ्यक्रम में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में केवल गायन शामिल था वादन नहीं इसलिए इन साज़ों का प्रयोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता था।

हमारी अध्यापिका श्रीमती कमला पोद्दार बहुत अच्छी कलाकार थी। आकाशवाणी के हैदराबाद केन्द्र से उनके कार्यक्रम नियमित प्रसारित होते थे। कक्षा में हमें विभिन्न राग सिखाए जाते। उनका सिखाने का तरीका भी बहुत अच्छा था।

पहले वो राग का नाम बतातीं, फिर बतातीं कि यह राग किस थाट से उत्पन्न हुआ है। उसके बाद बताया जाता आरोह - अवरोह, वादी - संवादी, शुद्ध स्वर, धईवत स्वर और गायन का समय। फिर इन्ही बातों को वो दुबारा बतातीं और हम अपनी कापियों में नोट करते जो ज़रूरी था क्योंकि संगीत की तिमाही, छमाही और वार्षिक परीक्षा भी होती थी।

राग के बारे में लिखने के बाद हारमोनियम पर आरोह अवरोह अध्यापिका गा कर सुनातीं। फिर राग पर आधारित हमें एक गीत सिखाया जाता। इस तरह स्कूली जीवन में विभिन्न रागों पर गीत , भजन सीखें। लेकिन आज अफ़सोस है एक बात का कि हमने उन कापियों को संभाल कर नहीं रखा।

उन्हीं दिनों परिचय हुआ संगीत सरिता कार्यक्रम से। रेडियो तो बचपन से ही रोज़ ही घर में बजते देखा। लेकिन जब स्कूल में संगीत सीखते थे तब यह कार्यक्रम अधिक अच्छा लगता था।

उन दिनों इस कार्यक्रम में भी प्रतिदिन एक राग के बारे में वही सब बताया जाता । फिर उस राग पर आधारित एक फ़िल्मी गीत बजता और फिर साज़ पर यही राग बजाया जाता। हम सभी ये कार्यक्रम रोज़ सुबह साढे सात बजे सुनते।

कभी - कभी जो राग रेडियो में सुनते वही स्कूल में सिखाया जाता तब हम सब गीत सीखते समय उस फ़िल्मी गीत की बात कहने लगते तब अध्यापिका कहती - नहीं, तुम्हारे वो फ़िल्मी गाने बिल्कुल नहीं। स्कूल तो छूटा पर सुबह साढे सात बजे संगीत सरिता सुनने का क्रम आज तक नहीं टूटा।

इस कार्यक्रम में कई परिवर्तन हुए। पहले रोज़ केवल रागों के बारे में बताया जाता था। फिर हर रविवार को विशेष कार्यक्रम होने लगा जिसमें संगीत के क्षेत्र के किसी महान व्यक्ति से बातचीत की जाती। फिर आया श्रंखलाओं का दौर।

जब मैनें श्रंखला सुनी पार्शव गायन के रंगीन ताने बाने तो मुझे याद आया - नहीं, तुम्हारे वो फ़िल्मी गाने बिल्कुल नहीं।

सभी श्रंखलाएं अच्छी लगी - रसि केशु, तबला और उसका बाज़, मेरी संगीत यात्रा, सरोद का सुर संसार । बेगम अख़तर पर कार्यक्रम, परवीन सुलताना, सूफ़ी गायक बुल्ले शाह, एक और गायिका जिसका नाम मैं भूल रही हूं जिसका प्रसारण 96 या 97 के आस पास हुआ था, इन सब से बहुत कुछ जाना। अच्छा लगा गुलज़ार, आर डी और आशा को एक साथ सुनना।

अब भी अच्छा चल रहा है। ज़रीन शर्मा की श्रंखला समाप्त हुई और अब चल रही है मदन मोहन की।

वाकई बधाई के पात्र है - रूपाली रूपक (कुलकर्णी) , छाया गांगुली, कांचन प्रकाश संगीत, कमला कुंदर, अशोक सोनावरे।

Thursday, September 27, 2007

सपने और होमियो्पthी




इसी
महिने की २४ तारीखके दिन विविध भारती के राष्ट्रीय प्रसारण अन्तर्गत सेवा निवृत कार्यक्रम अधिकारी श्री रमेश सेठी द्वारा निर्मीत और शायद पुन: प्रसारित तथा श्री रेणू बन्सलजी द्वारा प्रस्तूत कार्यक्रममें उनकी डो. मिलीन्द भट्ट से की गयी भेट वार्ता बहोत ही जानकारी देने वाली रही, जिसमें सपनो से बिमारीयों का सम्बन्ध और इनके होमियोपेथीक इलाज के बारेमें बहोत ही उपयोगी बातें थी ।

Wednesday, September 26, 2007

रेडियो मेरी सांस में बसा है -२ : पियूष मेहता

इस रेडियो श्रवण यात्रा के दोरान मूझे सुरत से जो दो व्यक्तियो से स्थानिक कक्षासे बढावा मिला उसमें एक सुरत के ही जानेमाने फ़िल्म-इतिहास संशोधक, जिन्होंने मुकेश गीतकोष और गुजराती फ़िल्मी गीत कोष का संकलन किया तथा जब दिल ही टूट गया नामक के. एल. सायगल गीत कोष के श्री हरमंदिर सिंह ’हमराझ’ (कानपूर निवासी) के साथ सह सम्पादक रहे और सुरतमें और मुम्बईमें भी कई लोगोसे मेरे हुए परिचय के निमीत्त बने उनको कैसे भूल सकता हूँ ?
एक नाम हाल आकाशवाणी अहमदाबाद पर केन्द्र निर्देषक के रूपमें कार्यरत वैसे श्री भगीरथ पंड्या साहब को अगर याद नहीं किया जाय तो वह गुस्ताखी ही होगी । वे पहेले आकाशवाणी सुरत (जब आकाशवाणी सुरत सिर्फ स्थानिक स्वरूप का खंड समय वाला केन्द्र था )पर कार्यक्रम अधिकारी के तौर से आये थे और उसी रूपमें केन्द्र इन चार्ज बने और थोडे समय के बाद यहाँ ही सहायक केन्द्र निर्देषक बने और फ़िर थोडे साल अन्य केन्द्रो पर हो कर फिर सुरत केन्द्र निर्देषक बन कर आये । उनका आम श्रोता प्रति एक सकारत्मक अभिगम ऐसा था कि श्रोताओमें से भी वे आकाशवाणी कार्यक्रमोमें बारी बारी से कार्यक्रमके लिये उपयूक्त लोगो को कार्यक्रममें मेहमान के तौर पर आमंत्रित करते थे ।
इस तरह रेडियो पर बोलने की हिचकिचाहट मेरी दूर हुई ।और नामोमें रेडियो श्री लंका के आज मुम्बईमें सक्रिय श्री मनोहर महाजन साहब, जिनके साथ मेरा फोटो आल्बम पर है, स्व.श्री दलवीर सिन्ह परमार,उनकी बेटी श्रीमती ज्योति परमार श्रीमती पद्दमिनी परेरा, विविध भारती के श्री ब्रिज भूषण साहनी, उनकी श्रीमती आशा साहनी श्री लल्लूलाल मीना, श्री मौजीरामजी (असली नाम याद नहीं है ), भारती व्यास, अर्विन्दा दवे, मेरी यादमें है । पियानो वादक श्री केरशी मिस्त्री, मेन्डलिन वादक श्री महेन्द्र भावसार भी मेरे चहिते रहे और उनसे पहचान भी रही । यह सब असल लेखमें इस लिये नहीं है क्यों कि, मुद्रीत माध्यम का एक जरूरी अंग सेन्टीमीटर में नापना अलग विषयो को न्याय देने के लिये रहा है ।
यह लेख के असल प्रेरणा स्त्रोत रहे विविध भारती के तूर्त शायरी करने वाले श्रोता श्री यश कूमार वर्माजी जिन्होंने मूझ पर दबाव डल डल कर अपनी बिन व्यवसायिक पत्रिका यशबाबू रेडियो क्लब जो वे सिर्फ ओर सिर्फ श्रोताओ को जोडने के लिये ही शुरू किया है, के लिये लिखवाया था । उस समय क्या पता था यह इस तरह नेट पर स्थान पायेगा ? नसीब की गत को कौन जान सकता है ? यह तो लेख से भी लम्बा हो गया ।
धन्यवाद ।

पियुष महेता
सुरत-३९५००१.
फोन : (०२६१)२४६२७८९मोबाईल : ०९८९८०७६६०६.

ढोलक के गीतों की दुनिया में लोगा खो गए मा

अपने पिछले लेख ढोलक के गीत में टिप्पणियां पढी तो मन ये गाने को कर रहा है -

लोगा खो गए मा इंटरनेट की दुनिया में
लोगा खो गए मा

इधर देखी उधर देखी रेडियोनामा की गलियां
हाय लोगा मिल गए मा ढोलक के गीत के चिट्ठे पे
लोगा मिल गए मा

बहुत अच्छा लगा आप सब की टिप्पणियां पढ कर, अफ़लातून जी, सागर जी, ममता जी, ऊड़न तश्तरी जी और यूनूस जी। जवाब छोटा नहीं है इसलिए टिप्पणी न लिख कर अगला चिट्ठा लिख रही हूं।

बाज़ार फ़िल्म की शूटिंग अस्सी के दशक में हैदराबाद में हुई थी। फ़िल्म की पृष्ठभूमि हैदराबाद की है। विषय है शादी-ब्याह्। इस मौके के लिए एक ढोलक का गीत चुना गया। उस समय ये चर्चा थी कि ये गीत अर्जुमन नज़ीर या कनीज़ फातिमा ही गाएगें लेकिन बात बनी नहीं।

ये गीत गाया पैमिला चोपड़ा और साथियों ने। आर्केस्ट्रा का भी प्रयोग हुआ जबकि ये गीत ढोलक पर गाए जाते है और हारमोनियम का हल्का प्रयोग होता है। नतीजा ये हुआ कि गीत पारम्परिक नहीं बना। लाख कोशिशों के बावजूद भी बंबइया रंग साफ़ नज़र आया। फिर भी जिन लोगों ने ढोलक के गीत पहले नहीं सुने वे ये गीत सुन सकते है जिससे ये अंदाज़ा हो जाएगा कि ढोलक के गीत होते कैसे है। तो यूनूस जी विविध भारती में बाज़ार फ़िल्म के गीत तो है ही। पैमिला चोपड़ा और साथियों का ये गीत आप तुरन्त यहां सुना सकते है।

दूसरी बात कि विविध भारती के ही एक कार्यक्रम सखी-सहेली में एक दिन कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने एक झलकी प्रस्तुत की थी जिससे एक ढोलक का गीत जुड़ा था। पूरा गीत तो मुझे याद नहीं है सिर्फ़ मुखड़े की एक पंक्ति और कुछ अंतरा याद है -

सुनो मुहल्ले वालों मेरी काली मुर्गी खो गई मा

मिर्ची का सालन घी के पराठे
काली मुर्गी खो गई मा

हो सकता है कि कांचन जी के पास कुछ गीत हो।

तीसरी बात, आप विविध भारती से सीधे आकाशवाणी हैद्राबाद संपर्क कर सकते है जिससे गीतों की मूल रिकार्डिंग आपको मिल जाएगी। हां एक बात और वहां इस समय एक कलाकार (तबला वादक) काम करते है - जावेद साहब जो कनीज़ फ़ातिमा के सुपुत्र है। उनके पास ज़रूर अपनी मां के गाए गीतों का संग्रह होगा और जिन्हें वे शायद सीधे देने के बजाए कार्यालय से देना पसंद करेंगें।

इन सब में यूनूस जी आपको तक्नीकी सुविधा बहुत रहेगी। तो बस इंतज़ार कर रहे है हम…

Tuesday, September 25, 2007

रेडियो का प्रसार गीत--नाच मयूरा नाच--लावण्‍या शाह का लेख


प्रसार ~ गीत "नाच रे मयूरा " "आकाशवाणी " का सर्व प्रथम गीत जिसे
प्रसारित किया गया वह था "नाच रे मयूरा , खोल कर सहस्त्र नयन देख सरस
स्वप्न जो कि आज हुआ पूरा, नाच रे मयूरा " शब्द लिखे थे कवि पँडित
नरेन्द्र शर्मा जी ने, सँगीत से सजाने वाले श्री अनिल बिस्वास जी थे और
स्वर था गायक श्री मन्नाडे जी का !
सँगीतकार श्री अनिल बिस्वास जी की जीवनी के लेखक श्री शरद दत्त जी ने इस
गीत से जुडे कई रोचक तथ्य लिखे हैँ. जैसे इस गीत की पहली दो पँक्तियाँ
फिल्म "सुजाता " मेँ मशहूर सिने कलाकार सुनील दत्त जी गुनगुनाते हैँ
सुजाता १९५९ मेँ बनी नूतन और सुनील दत्त द्वारा अभिनीत, निर्माता ,
निर्देशक बिमल रोय की मर्मस्पर्शी पेशकश रही थी.

जिसका जिक्र आप अनिल दा की इस वेब साइट पर भी पढ सकते हैँ

The Innaugeral Song for Vividh -Bharti
http://anilbiswas.com/ RE : NAACH RE MAYURA

डा. केसकर जी मँत्री थे सूचना व प्रसारण के ( Information and
Broadcasting ) डा. केसकर जी मँत्री थे सूचना व प्रसारण के !उन्हेँ उस
समय के हिन्दी सिने सँगीत के गीतोँ से नये माध्यम "रेडियो" का आरँभ हो ये
बात नापसन्द थी ! अब क्या हो ? आकाशवाणी पर तब कैसे गीत बजाये जायेँ ये
एक बडा गँभीर और सँजीदा मसला बन गया !
उसका हल ये निकाला गया कि "शुध्ध ~ साहित्यिक " किस्म के गीतोँ का ही
प्रसारण किया जायेगा. और साहित्योक हिन्दी गीतोँ के लिखनेवाले होँगे
देहली से श्री भगवती चरण वर्मा जी ( जिनका उपन्यास "चित्रलेखा " हिन्दी
साहित्य जगत मेँ धूम मचा कर अपना गौरवमय स्थान हासिल किये हुए था और बँबई
से कवि पँडित नरेब्द्र शर्मा जी को चुना गया. इन गीतोँ को सँगीत बध्ध
करेँगे मशहूर बँगाली सँगीत निर्देशक श्री अनिल बिस्वास जी !

उस ऐतिहासिक प्रथम सँगीत प्रसारण के शुभ अवसर पर नरेन्द्र शर्मा जी ने
अनिल बिस्वास को ये गीत दीये और उन्के लिये सुमधुर धुन बनाने का अनुरोध
किया.
ये गीत थे ~~
१) चौमुख दीवला बार धरुँगी, चौबारे पे आज,
जाने कौन दिसा से आयेँ, मेरे राजकुमार
( गायिका थीँ श्री मीना कपूर जी )

२ ) 'रख दिया नभ शून्य मेँ किसने तुम्हेँ मेरे ह्र्दय ?
इन्दु कहलाते, सुधा से विश्व नहलाते,
फिर भी न जग ने न जाना तुम्हेँ, मेरे ह्रदय "
( गायिका थीँ श्री मीना कपूर जी )

३ ) "नाच रे मयूरा, खोल कर सहस्त्र नयन,
देख सघन, गगन मगन,
देख सरस स्वप्न जो कि आज हुआ पूरा,
नाच रे मयूरा ...."
( गायक थे श्री मन्ना डे जी )
( At the inauguration of Vividh Bharati service
the very first song to be played was none other than "naach re
mayuuraa".)

४ ) "युग की सँध्या कृषक वधु सी,
किसका पँथ निहार रही ?
उलझी हुई, सम्स्याओँ की,
बिखरी लटेँ, सँवार रही "
( गायिका थीँ सुश्री लता मँगेशकर जी )

सभी गीतोँ का स्वर सँयोजन अनिल दा ने किया जिसका प्रसारण देढ घँटे के
प्रथम ऐतिहासिक कार्यक्र्म मेँ भारत सरकार ने भारत की जनता को नये माध्यम
"रेडिय़ो " के, श्री गणेश के स्वरुप मेँ , इस अनोखे उपहार से किया.
यही !"प्रसार ~ गीत " कार्यक्रम से हुआ आकाशवाणी का जन्म !!


एक दुखद घटना इस कथा से जुडी हुई है ~ "युग की सँध्या " गीत , इस प्रथम
प्रसारण के बाद, न जाने कैसे, मिट गया ! इस्लिये, उस गीत की रेकोर्डीँग
आज तक उपलब्ध नहीँ है ! भारत कोकिला, स्वर साम्राज्ञी श्री लता मँगेशकर
उसे अगर गा देँ , पूरा गीत नहीँ तो कुछ पँक्तियाँ ही तो सारे भारत के लोग
दोबारा उस गीत का आनँद ले पायेगेँ . आज सँगीत से उस गीत को सजानेवाले
अनिल दा जीवित नहीँ हैँ और ना ही गीत के शब्द लिखने वाले कवि पँडित
नरेन्द्र शर्मा ( मेरे पापा )
भी हमारे बीच उपस्थित नहीँ हैँ ! हाँ, मेरी आदरणीया लता दीदी हैँ और
उनकी साल गिरह पर २८ सितम्बर को मैँ उनके दीर्घायु होने की कामना करती
हूँ !
" शतम्` जीवेन्` शरद: " की परम कृपालु ईश्वर से , विनम्र प्रार्थना करती
हूँ और ३ अक्तूबर को "विविध भारती " के जन्म दीवस पर अपार खुशी और सँतोष
का अनुभव करते हुए, निरँतर यशस्वी, भविष्य के स स्नेह आशिष भेज रही
हूँ ...आशा करती हूँ कि " रेडियो" से निकली आवाज़ , हर भारतीय श्रोता के
मन की आवाज़ हो, सुनहरे और उज्वल भविष्य के सपने सच मेँ बदल देनेवाली ताकत
हो जो रेडियो की स्वर ~ लहरी ही नहीँ किँतु, "विश्व व्यापी आनँद की लहर "
बन कर
मनुष्य को मनुष्य से जोडे रखे और भाएचारे और अमन का पैगाम फैला दे. जिस
से हरेक रुह को सुकुन मिले.
मेरी विनम्र अँजलि स्वीकारेँ ........
.शुभँ भवति ...
सादर ~ स ` स्नेह,
लावण्या

ऊपर की तस्‍वीर में लता मंगेशकर और पंडित नरेंद्र शर्मा

Monday, September 24, 2007

बाबूजी का टोटका

आज जब इंडिया और पकिस्तान का twenty-२० का मैच रहा था तो कुछ बहुत पुरानी बातें जो रेडियो से जुडी है याद गयीआज के मैच मे जब पहली बॉल पर ही भारतीय बल्लेबाज आउट होने से बचे तो हमने टी.वी.पर चैनल बदल दिया क्यूंकि हमे लगा की कहीँ ये यंग टीम इंडिया कुछ गड़बड़ ना कर देपर फिर दो मिनट बाद वापिस चैनल लगाया तो देखा कुछ १५ रन बन गए थेअभी हम सोच ही रहे थे की पांच मिनट मे फिर एक विकेट गिर गयाऔर ऐसे ही हमने चैनल बदल-बदल कर पूरा मैच देखा और आख़िरी १३ रन तो देखने की हिम्मत ही नही हुई क्यूंकि उस समय तो ये लग रहा था की अब तो मैच गया ही पर पांच मिनट बाद जबटी.वी. चलाया तो देखा की सारी टीम ख़ुशी से उछल रही हैतो हम भी फिर से टी.वी.के सामने चैन से बैठ गए और उनका सेलिब्रेशन देखते रहे और खुश होते रहे

जब पहले टी.वी.नही था और क्रिकेट मैच होता था तो हमारे बाबा जिन्हे हम लोग बाबूजी थे पूरे समय ट्रांजिस्टर सुना करते थेमजाल है की कोई उस समय कुछ और सुन ले कई बार तो वो जिस पोजीशन मे बैटे होते थे उसी मे बैठे रहते की अगर वो अपनी जगह से हिलेंगे तो विकेट गिर जाएगाना खुद हिलते और ना ही ट्रांजिस्टर को हिलाने देतेमानो भारतीय बल्लेबाओं का तो खेलना कोई माने ही नही रखता होपर वो क्रिकेट के लिए दीवानगी ही थीपर जहाँ भारतीय बल्लेबाज आउट होने लगते थे बाबूजी फटाक से ट्रांजिस्टर या तो बंद कर देते थे या फिर कोई और कार्यक्रम लगा देते थेभले ही कुछ भी रहा हो

और तब पापा और भैया नाराज होते थे की क्या बाबूजी आप ट्रांजिस्टर क्यों बंद कर रहे है

तो बाबूजी कहते कि बंद करो वरना भारत मैच हार जाएगादेखते नही कितना पिट रहे हैउस समय देखने का मतलब कमेंट्री सुनना होता था
तब कई बार भैया और पापा या तो घर के अन्दर वाले रेडियो पर या दूसरे ट्रांजिस्टर पर कमेंट्री सुनते थे

और खुदा ना खास्ता अगर कोई विकेट गिर जाता था तो बाबूजी सारा दोष भैया और पापा पर ही लगाते और कहते कि इसीलिये तो हम कह रहे थे कि ट्रांजिस्टर बंद करोपर तुम लोग मानते ही नही होदेखना अब तो मैच हार ही जायेंगे

इतना ही नही अगर भारत मैच जीत जाता था तो भी बाबूजी उसका श्रेय अपने द्वारा ट्रांजिस्टर बंद किये जाने को देते थेये कहकर कि देखा हमने ट्रांजिस्टर बंद करा था ना इसीलिये जीत गएऔर साथ ही ये भी कहते कि ये तो हमारा टोटका था

आज हमने भी बाबूजी वाला ही टोटका इस्तेमाल किया थाक्यूंकि हमे भी लग रहा था कि आज जब हम मैच देख रहे है तो कहीँ इंडिया हार ना जाये

और हाँ एक बात और जब इंडिया आज मैच जीती तो हमने अपने पापा को इलाहाबाद फ़ोन किया और जब हमने पापा से कहा कि हमने आख़िरी ओवर नही देखा क्यूंकि हमे डर था कि कहीँ इंडिया हार ना जाये तो पापा ने कहा कि वो भी बाहर उठकर चले गए थे क्यूंकि आख़िरी ओवर की पहली बॉल पर जब चक्का पड़ा था और फिर जब सिर्फ रन बचे थे तो उन्हें भी यही लगा की अब तो मैच गयापर जब पटाखों की आवाज आयी तो टी.वी.पर देखा कि इंडिया जीत गयी हैतब बात ही बात मे पापा ने कहा कि आज लग रहा है कि बाबूजी उस समय कमेंट्री सुनते-सुनते विकेट गिरने पर या इंडियन टीम के हार के करीब होने पर क्यों ट्रांजिस्टर बंद करने को कहते थे

ढ़ोलक के गीत

ढोलक के गीत यानि वो गीत जो ढोलक पर गाए जाते है। आप शायद समझ गए होंगें मैं बात कर रही हूं लोक गीतों की।

जिस तरह राजस्थान के लोक गीत है, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि क्षेत्रों के लोक गीत है उसी तरह हैदराबाद के लोक गीत है। दूसरे प्रदेशों के लोक गीतों के भी कुछ नाम है ऐसे ही हैदराबाद के इन लोक गीतों को ढोलक के गीत कहा जाता है।

कौन सी ढोलक ? आमतौर पर प्रयोग में आने वाली दो साज़ों की ढोलक नहीं है ये। अण्डाकार ढोलक का ये एक ही साज़ है जिसके दोनों गोलाकार किनारों पर दोनों हाथों से इसे बजाया जाता है और डोरी से गले में भी लटकाया जाता है।

सिर्फ़ इसी साज़ पर ये गीत गाए जाते है। इन गीतों की ख़ास बात ये है कि केवल महिलाएं ही इन गीतों को गाती है। जी हां ! पुरूष ये गीत नहीं गाते। महिलाओं के इस समूह में छोटी लड़की से लेकर उम्रदराज महिलाएं भी शामिल है।

दूसरी ख़ास बात इन गीतों की ये है कि यह सिर्फ़ शादी-ब्याह के गीत ही है जबकि आमतौर पर लोक गीतों में सभी तरह के गीत शामिल होते है जैसे त्यौहारों, मुंडन, बेटे का जन्म आदि मौको पर गाए जाने वाले गीत।

और भी ख़ास बात ये है कि यह सिर्फ़ छेड़-छाड़ वाले गीत ही है। वर पक्ष (दूल्हें वाले) और वधू पक्ष (दुल्हन वाले) एक दूसरे को छेड़ते है।

गीत की शुरूवात होती है ढोलक की थाप से फिर सभी की तालियों के सुर शुरू होते है धीमे-धीमे शुरू हो कर तेज़ होने लगते है। फिर शुरू होता है गीत एक आवाज़ में, दो आवाज़ों में, कोरस में।

साठ और सत्तर के दशक में जिसे हम पचास के दशक के अंत से भी शुरू कर सकते है और लगभग अस्सी के दशक तक आकाशवाणी के हैदराबाद केन्द्र से सप्ताह में कम से कम एक बार इन गीतों ने धूम मचाई। बहुत ही ख़ास बात ये है कि कलाकार केवल दो ही रहे - एक श्रीमती अर्जुमन नज़ीर और दूसरी श्रीमती कनीज़ फ़ातिमा। दोनों का अपना-अपना समूह था।

एक गीत यूं है जो बहुत ही लोकप्रिय रहा -

चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा की चोटी काट लिया रे
उनकी अम्मा बोले ये क्या हुआ
उनकी सास बोले अच्छा हुआ

चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा का कान काट लिया रे
उनकी भैना बोले ये क्या हुआ
उनकी नन्दा बोले अच्छा हुआ


भैना - बहनें
नन्दा - ननदें
दुल्हन आपा - नई ब्याह्ता


यहां एक बात हम बता दें कि हैदराबाद में सब्जियों में बैंगन और फलों में केले का बहुत उपयोग होता है। उसी का यहां प्रयोग हुआ है। हरे बैंगन जो कच्चे होते है चूहे की तरह लगते है।

अन्य लोक गीतों की तरह ढोलक के गीतों के बारे में भी कहा जाता है कि ये गीत किसने लिखे, कब लिखे कोई नही जानता। सालों से हैदराबाद की तहज़ीब का एक हिस्सा है। शहर में होने वाली शादियों में ये गीत ज़रूर गूंजा करते। तभी तो रेडियो का भी ये एक महत्व्पूर्ण हिस्सा रहे।

उर्दू कार्यक्रमों में रात साढे नौ बजे से होने वाले नयरंग कार्यक्रम में हर मंगलवार को ये गीत बजते। उसके अलावा एकाध दिन और बजते। आलम ये था कि जिन घरों में उम्रदराज महिलाएं होती जैसे दादी, ताई वहां विविध भारती से हवा महल सुनने के बाद तुरन्त ट्यून बदली जाती और नयरंग कार्यक्रमों का ब्यौरा सुना जाता। अगर ढोलक के गीत शामिल न हो तो रेडियो तुरंत बंद हो जाता।

हालात ये कि रात में लगभग 10 बजे लगभग सुनसान सड़कों और गलियों में घरों की खिड़कियों से छन कर गूंजा करते ये गीत। एक और गीत प्रस्तुत है -

अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

दूल्हा आता बोलको मै मोटर मंगाई
अय्यो मा बन्डियों पर चढने के लोगा
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

दूल्हा आता बोलको मैं चादर मंगाई
अय्यो मा बोरियो पर लोटने के लोगा

अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा

बन्डियां - बैलगाड़ियां

माना जाता है कि कुछ गीत ऐसे भी है जिन्हें बाद में लिखा गाया या कुछ बोलों में फेर-बदल भी किया गया। एक ऐसा ही गीत है जिसमें ये कहा गया है कि बारात शहर में आई है। दूल्हें की मां चारमीनार के आस-पास की रौनक में खो गई है -

समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इधर देखी उधर देखी लाड़ बज़ार की गलियां
हाय समधन मिल गई मा चूड़ी वाले की दुकान पे

समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा

इधर देखी उधर देखी चारकमान की गलियां
हाय समधन मिल गई मा फूल वाले की दुकान पे

अस्सी के दशक से इन गीतों का बजना रेडियो से कम होता गया और अब तो शायद ही कभी बजते है। इसके पीछे बड़ी बात ये है कि नई पीढी की लड़कियों ने इन गीतों को सीखा ही नहीं। सिखाने की कोशिश ज़रूर की गई।

क्या ही अच्छा हो अगर इन गीतों को आकाशवाणी हैदराबाद के संग्रहालय से निकाल कर इंटरनेट पर रखा जाएं ताकि गुम होती कला को रेडियोनामा आवाज़ दे सकें ।


तीन अक्‍तूबर को विविध भारती पूरे कर रही है अपने पचास वर्ष, आईये विविध भारती से जुड़ी अपनी यादें बांटें ।


तीन अक्‍तूबर क़रीब आ रहा है । आप सोच रहे होंगे कि दो अक्‍तूबर तो पता है, गांधी जी का जन्‍मदिन । लेकिन ये तीन अक्‍तूबर को क्‍या हुआ था । तीन अक्‍तूबर सन 1957 को विविध भारती की स्‍थापना हुई थी । इस साल विविध भारती सेवा अपने पचास साल पूरे कर रही है । भारतीय मीडिया के इतिहास में
विविध भारती ऐसा पहला मनोरंजन रेडियो चैनल है जो अपनी स्‍थापना के पचास साल पूरे कर रहा है । और ये एक अहम घटना है ।

विविध-भारती ने एक सुनहरा दौर देखा है रेडियो का । वो दौर जब सन 1967 से रेडियो पर विज्ञापन प्रसारण सेवा की शुरूआत हुई और फिर अमीन सायानी, ब्रज जी, मनोहर महाजन जैसे अनेक रेडियो प्रस्‍तुतकर्ताओं ने अपने प्रायोजित कार्यक्रम तैयार किये । बिनाका गीत माला, एस कुमार्स का फिल्‍मी मुक़दमा, सेरीडॉन के साथी, बॉर्नवीटा क्विज़ कॉन्‍टेस्‍ट, इंसपेक्‍टर ईगल जैसे अनगिनत प्रायोजित कार्यक्रम ऐसे रहे हैं जिन्‍होंने जनता के दिलों पर राज किया । आज जैसी उत्‍सुकता धारावाहिकों को लेकर होती है वैसी ही उत्‍सुकता एक ज़माने में रेडियो कार्यक्रमों को लेकर होती थी । और रेडियो के एनाउंसर किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं थे । मुझे याद है हमारे घर में भी रेडियो पूरे दिन चलता था और जैसे अवचेतन मन में वहीं से रेडियो के संस्‍कार बन गये ।

आज मैं यहां रेडियो की अपनी यादें नहीं बांट रहा हूं । बल्कि आप सबका आह्वान कर रहा हूं ।

आईये विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती पर बांटें अपनी यादें । विविध भारती की आपकी जिंदगी में क्‍या जगह थी, या क्‍या जगह है । जिंदगी के वो कौन से सुनहरे लम्‍हे थे जो आपने अपने इस प्रिय रेडियो चैनल के साथ गुज़ारे । हवामहल, छायागीत, मनचाहे गीत, जयमाला, लोक संगीत जैसे पुराने या फिर हैलो फरमाईश, मंथन, सखी सहेली, सुहाना सफर या उजाले उनकी यादों के जैसे नये कार्यक्रमों से जुड़ी आपकी कोई तो यादें होंगी । कोई ऐसा गीत जो तब बजा तो यूं लगा जैसे आपके लिए बज रहा है । कोई ऐसी बात जो रेडियो से कही गयी तो सीधे आपके दिल में उतर गयी । जिंदगी के बेहद व्‍यस्‍त दिनों में भी विविध भारती की आवाज़ ने आपको सुकून का अहसास दिया होगा । आईये इन सभी यादों का एक गुलदस्‍ता सजाएं । और विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती मनाएं ।

तो देर किस बात की है । अगर आप रेडियोनामा के सदस्‍य हैं तो तुंरत अपनी बात लिख दीजिए । अगर रेडियोनामा के सदस्‍य नहीं हैं तो कोई बात नहीं ।
आप इस ईमेल पते पर अपना आलेख भेज सकते हैं ।
radionama@gmail.com
ध्‍यान रहे, जहां तक मुमकिन हो आपको हिंदी में लिखना है ।
अगर हिंदी में लिखने में असुविधा है तो आप अंग्रेजी में लिख भेजिए । हम उसे रूपांतरित कर लेंगे ।

आईये विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती मनाएं । सबको बताएं 3 अक्‍तूबर 2007 को विविध भारती अपने पचास साल पूरे कर रही है ।

ऊपर है विविध भारती के संस्‍थापक सदस्‍य पंडित नरेंद्र शर्मा की तस्‍वीर ।
दूसरी तस्‍वीर में अभिनेत्री नरगिस फौजी भाईयों के लिए जयमाला प्रस्‍तुत करते हुए । अखबार 'हिंदू' से साभार ।


चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: vividh-bharati, golden-jubilee-of-vividh-bharati, विविध-भारती-की-स्‍वर्ण-जयंती,


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Saturday, September 22, 2007

छायागीत और हम लोग

चूंकि उन दिनों रेडियो ही मनोरंजन का एकमात्र सहारा होता था तो हर कोई वो चाहे छोटा हो या बड़ा रेडियो अपने घर मे जरुर रखता थावो चाहे रिक्शावाला या फिर नौकरी करने वालाऔर अक्सर लोगों को कान मे रेडियो लगाए देखा जा सकता थाघरों मे एक नही कई रेडियो हुआ करते थे बिल्कुल उसी तरह जैसे आजकल घरों मे दो टी.वी.होना आम बात हैएक तो बड़ा सा रेडियो जो ड्राइंग रूम मे रखा जाता थातब तो बड़ा रेडियो होना ही शान की बात मानी जाती थीउस समय तो मर्फी रेडियो बड़ा मशहूर हुआ करता थाऔर घर मे एक-दो छोटे ट्रांजिस्टर होना भी निहायत जरुरी होता था क्यूंकि रेडियो को तो हर जगह उठा कर घूमा जो नही जा सकता थाऔर शादी ब्याह मे भी रेडियो और ट्रांजिस्टर देना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी

हम लोगों के घर मे तो एक हलब्बी अरे मतलब बड़ा रेडियो था और हमारे बाबा अपना एक अलग ट्रांजिस्टर रखते थे और एक ट्रांजिस्टर हम सब बच्चे रखते थे क्यूंकि तब भी कई बार बाबा और हम लोगों की कार्यक्रम सुनने की पसंद अलग होती थीअब अगर हम लोग गाने सुनना चाहते तो बाबा को समाचार सुनने होतेऔर शायद यही कारण था की लोग घरों मे छोटे ट्रांजिस्टर रखते थेपर तब भी कई बार ऐसी स्थिति जाती थी कि घर मे एक कोलाहाल सा माहौल हो जाता थासिर्फ हवा महल ही एक ऐसा कार्यक्रम था जिसे हम सब एक साथ सुनते थेबाबा का क्या हम सब हवा महल के समय पर सब कुछ छोड़-छाड़ कर बैठ जाते थेऔर उस बीच मे कोई बोल भी नही सकता था


छायागीत सुननाहम बहनों को बहुत अच्छा लगता था और गर्मियों की वो रातें जब छत पर हम लोग सोया करते थे और हम चारों बहने इस कोशिश मे रहती कि कौन अपने पास ट्रांजिस्टर रखेगा क्यूंकि छायागीत तो रात दस बजे आता था वैसे तो आज भी इस कार्यक्रम का समय नही बदला हैऔर रात मे चूंकि सारा परिवार छत पर ही सोता था और पापा-मम्मी की नींद भी ना खराब हो इसका भी ध्यान रखना होता थापर फिर भी हम लोग छायागीत सुने बिना बाज नही आते थेऐसे मे हमारी दुसरे नंबर की बहन ही हमेशा ट्रांजिस्टर अपने पास रखती थी और हम सब अपनी-अपनी खाट पर लेटे हुए कान लगाए ये कार्यक्रम सुना करते थेक्यूंकि दीदी का कहना था की तुम लोग गाना सुनते-सुनते सो जाती हो और ट्रांजिस्टर उन्हें बाद मे हम लोगों की खाट पर आकर बंद करना पड़ता थाऔर अगर किसी का पसंदीदा गाना आता था तो ट्रांजिस्टर की खींचा खांची शुरू हो जाती थीक्यूंकि आवाज तो ज्यादा तेज जो नही कर सकते थे

ऊपर तारों से भरा आसमान और रेडियो पर उद्घोषक की शांत और मधुर आवाज और उस पर सुरीले गाने सुनने का जो मजा था वो तो अब दुर्लभ सा हो गया है

Friday, September 21, 2007

रेडियो मेरी सांस में बसा है : पियूष मेहता

रेडियो के बेहद पुराने श्रोता पियूष मेहता से रेडियो को लेकर उनके अनुभवों पर चर्चा की कमल शर्मा ने। इस बातचीत को पूरी तरह परोसा पियूष जी ने अपने एक पुराने लेख रेडियो की दुनिया के माध्यम से। आप भी लीजिए आनंद कि क्या कहते हैं पियूष जी। जो इस समय गुजरात के खूबसूरत शहर सूरत में रहते हैं।

पंडित स्व. नरेंद्र शर्मा के निर्देशन में आकाशवाणी की विविध भारती सेवा शुरू हुई थी, जो आज के हिसाब से बहुत कम समयावधि के लिए ही प्रसारण कर रही थी। ज्‍यादा रेडियो मनोरंजन रेडियो सिलोन ही परोसता था। जहां से गोपाल शर्मा (जिनसे मैंने अब तक दो बार मुलाकात की), उन्हीं जैसी समान आवाज वाले कुमार कांत, चेतन खेरा कार्यक्रम प्रस्‍तुत करते थे और रेडियो सिलोन के व्यापारी प्रतिनिधि के रूप में भारत के मुंबई और चेन्‍नई में रेडियो एडवरटाइजिंग सर्विसेस के बाल गोविंद श्रीवास्‍तव (जिनसे मैंने तीन साल पहले अमीन सायानी के सौजन्य से मुंबई में पहली और आखिरी मुलाकात की थी) आवाज की दुनिया के सरताज अमीन सायानी (जिनसे पांच बार मिला हूं), ब्रज भूषण (संगीतकार व गायक भी) जिन्‍हें अमीन सायानी ने इस क्षेत्र में प्रवेश करवाया, अमीन सायानी के बड़े भाई और गुरु स्व. हमीद सायानी (अंग्रेजी कार्यक्रमों और विज्ञापन के लिए), नकवी रिजवी श्रीमती कमल बारोट (जो हिंदी व गुजराती फिल्‍मों की पार्श्व गायिका भी रही), शिव कुमार, मुरली मनोहर स्‍वरुप संगीतकार वगैरह कार्यरत थे।

रेडियो पाकिस्तान भी हर रोज आधे घंटे का हिंदी फिल्‍मों गीतों का कार्यक्रम पेश करता था, जो 1965 में बंद हो गया। साथ में आकाशवाणी अहमदाबाद के गुजराती भाषी प्रवक्ता लेम्‍यूल हैरी की आवाज का भी मैं दिवाना था, जो कुछ समय के लिए दिल्‍ली से अखिल भारतीय गुजराती समाचार भी पढ़ते थे। उसके अतिरिक्त रजनी शास्त्री की आवाज भी सुंदर थी, जो गीतों भरी कहानी गीत गाथा के नाम से पेश करते थे। साथ में आकाशवाणी राजकोट के उदघोषक भरत याज्ञिक भी रविवारीय जय भारती कार्यक्रम से लोगों के चहेते हुए।

रेडियो पर क्रिकेट कामैंट्री में सभी अंग्रेजी भाषा के कामेंट्रटरों में विजय मर्चेंट, डिकी रत्‍नाकार, देवराज पुरी डॉ. नरोत्‍तम पुरी के पिता, कोलकाता से सरदेंदू सन्‍याल, चेन्‍नई से पी. आनंद राव और वीएम चक्रपाणि जो आकाशवाणी के समाचार प्रभाग के अंग्रेजी भाषा के समाचार वाचक भी थे और बाद में रेडियो आस्‍ट्रेलिया मेल्‍बार्न चले गए थे और वहां से हिंदी गानों के 15 मिनट के साप्‍ताहिक कार्यक्रम अंग्रेजी उदघोषणा के साथ गाने पेश करते थे, जो मैंने सुने थे एवं बेरी सबसे अधिक उल्लेखनीय है। हिंदी कामेंट्री की शुरूआत काफी सालों के बाद जसदेव सिंह ने की। बाद में सुशील दोशी और रवि चतुर्वेदी भी मुख्य थे। आकाशवाणी इंदौर से नरेन्‍द्र पंडित की हर गुरुवार के दिन दोपहर साढ़े बारह बजे पर फिल्म संगीत के विशेष साप्ताहिक कार्यक्रम की प्रस्तुति आज तक मुझे याद है, जो भोपाल से शॉर्ट वेव 41 मीटर बैंड पर सूरत में सुनाई पड़ता था। आकाशवाणी दिल्ली-ए पर गुलशन मधुर की आवाज भी याद रही, जो सालों बाद वायस ऑफ अमरीका हिंदी सेवा से सुनने को मिली।

विविध भारती सेवा मुंबई से शॉर्ट वेव के अलावा मीडियम वेव पर भी प्रसारित होती थी, जिसमें 1965 से देश के हर भाग में जो स्थानीय मीडियम वेव विविध भारती केंद्रों की जो शुरूआत हुई, इस नीति के अंतर्गत 1967 से मुंबई से प्रसारित विविध भारती सेवा के प्रसारण से अलग मीडियम वेव के प्रसारण को विज्ञापन प्रसारण सेवा के अंतर्गत अलग स्टूडियो से कार्यरत किया गया, जो पुणे और नागपुर से भी जारी हुआ। केंद्रीय विविध भारती सेवा हर राज्‍य के मुख्‍य विविध भारती केंद्र को करीब दो महीने पहले अपने सभी कार्यक्रमों को स्पूल टेप पर ध्वनि मु्द्रित करके भेज देता थी। विज्ञापन की बुकिंग हर राज्य के मुख्य विविध भारती केंद्र पर ही अपने लिए और उस राज्य के बाकी सभी विविध भारती केंद्रों के लिए करीब एक साथ प्रसारण सेवा के सभी राज्यों के मुख्य केंद्रों केंद्रीय विविध भारती सेवा द्धारा भेजे गए कार्यक्रमों को अपने विज्ञापन की बुकिंग के अनुसार संपादित करके हर कार्यक्रमों की सम्पादित करके हर कार्यक्रमों की सम्पादित टेप्‍स राज्य के बाकी विविध भारती के विज्ञापन प्रसारण सेवा के केंद्रों को भेजती थी। यह व्‍यवस्‍था एक लंबे समय के बाद हर सीबीएस केंद्र की स्थानीय बुकिंग पर परिवर्तित हुई।

आकाशवाणी की एफएम सेवा भी करीब 26 साल के पहले आरंभ हुई और करीब 16 साल पहले बहुस्तरीय हुई, जिसका पहला स्तर मेट्रो एम एम स्‍टीरियो था, जिसमें निजी प्रसारकों को समय स्लोट बेचे गए। बाद में जिला स्तरीय शहरों में स्थानीय खडं समयावधि वाले एफ एम मोनो प्रसारण वाले केंद्रों की शुरूआत हुई। जिसके अंतर्गत सूरत में 30 मार्च 1993 के दिन तीन घंटे के स्‍थानीय प्रसारण वाला केंद्र शुरू हुआ, जो मेरी अपनी व्याख्‍या अनुसार पूर्व प्राथमिक केंद्र था। बाद में विविध भारती के स्थानीय मध्‍यम तरंग केंद्रों को एफएम स्टीरियो में परिवर्तित करने की शुरूआत हुई। कुछ बड़े शहरों के स्थानीय खंड समय वाले एफएम केंद्रों को विविध भारती के विज्ञापन सेवा केंद्र के रुप में तबदील किया गया, जिसमें सूरत भी अगस्त 2002 से पूरे समय वाले विविध भारती के विज्ञापन प्रसारण सेवा के केंद्र में परिवर्तित हुआ, जो बाद में स्टीरियो भी हुआ।

इस तरह आज आकाशवाणी के सूरत, कानपुर और चंडीगढ़ तीन केंद्र शायद ऐसे हैं, जहां प्राथमिक चैनल न होते हुए, सिर्फ विविध भारती सेवा ही है। बड़ौदा में विज्ञापन प्रसारण सेवा के अलावा प्राइमरी चैनल के कार्यक्रमों का कुछ निर्माण तो होता है और कुछ कुछ प्रसारण भी होता है। लेकिन अहमदाबाद के जोडि़या केंद्र के रुप में अहमदाबाद के ट्रांसमीटर से ही है। आज सभी श्रोताओं को जानकारी है कि कुछ सालों से विविध भारती सेवा के कार्यक्रम उपग्रह के द्धारा स्‍थानीय विज्ञापन प्रसारण केंद्रों से एफएम बैंड पर और मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई में मध्यम तरंग पर एवं रात्रि 11.10 से सुबह 5.55 तक राष्ट्रीय प्रसारण सेवा से मध्यम तरंग और डीटीएच पर 24 घंटे सुने जा सकते हैं।

कुछ साल से कुछ विशेष कार्यक्रमों एवं फोन-इन कार्यक्रमों को छोड़कर ज्‍यादातर कार्यक्रमों का जीवंत प्रसारण होता है और किसी व्यक्ति विशेष की आकस्मिक मृत्यु होने पर जीवंत फोन-इन श्रद्धांजलि कार्यक्रम भी होते हैं। जबकि सम्‍पूर्ण प्री रेकोर्डेड कार्यक्रमों की व्यवस्था अंतर्गत ऐसे जीवंत फोन इन श्रद्धांजलि कार्यक्रमों की गुंजाइश ही नहीं थे और सिर्फ पहली पुण्‍य तिथि पर ही कोई पूर्व प्रसारित जयमाला या एक फनकार कार्यक्रम हो सकते थे। मैं विविध भारती के फोन इन कार्यक्रमों में शामिल होने का करीब शुरु से ही भाग्‍यशाली रहा हूं और साल दो साल के अंतराल बाद जब भी मुंबई आना होता रहा तो विविध भारती सेवा के उदघोषकों और अन्य साथियों जैसे पूर्व निदेशक जयंत एरंडिकर, सहायक केंद्र निदेशक महेंद्र मोदी, कमल शर्मा, यूनुस जी, श्रीमती ममता, श्रीमती रेणु बंसल, श्रीमती मोना ठाकुर, अहमदवसी साहब, लोकेन्द्र शर्मा, राजेन्‍द्र त्रिपाठी, अशोक सोनावणे, राष्‍ट्रीय प्रसारण सेवा में सक्रिय कमल किशोर, अमरकांत दुबे, नागपुर में कार्यरत अशोक जाम्बूलकर सहित अनेक साथियों से मिलना होता है। 1962 से फिल्मी धुनों को सुनने का और उनके वादक कलाकार एवं साज को पहचानने का शौक लगा, जिसमें सबसे पहला आकर्षण प्रसिद्ध पियानो एकोर्डियन वादक एनोक डेनियल्‍स के प्रति हुआ, जिनकी धुनों को मैंने हैलो आपके अनुरोध पर कार्यक्रम में किस्तों में फरमाइश की थी।

वायस ऑफ अमरीका के दो सजीव कॊल-इन कार्यक्रम हैलो अमरीका और हैला इंडिया में तीन बार मुझे लाइव परिचर्चाओं में श्रोता के तौर पर इन विशेषज्ञों के पैनल से सवाल पूछने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया था। २८ अप्रैल 2007 को विविध भारती के स्वर्ण स्मृति कार्यक्रम में कार्यक्रम की निर्मात्री और प्रस्तुतकर्ता श्रीमती कांचन प्रकाश संगीत ने मेरा टेलिफो़निक इंटरव्‍यू प्रस्‍तुत किया था और उसमें मेरे संस्मरणों के साथ मेरी उसी बातचीत के दौरान बजाई माऊथ ओर्गन पर फ़िल्मी धुन का हिस्सा भी प्रस्तुत किया था।
श्री पीयूष भाई मेहता के रेडियो और फिल्म जगत की जानी मानी हस्तियों के साथ फोटो यहाँ देखे जा सकते हैं।

रात के राही - एक अनूठा प्रयोग

हवा महल - नाम सुनते ही चेहरे पर एक मुस्कान फैल जाती है। हास्य झलकियों का एक ऐसा कार्यक्रम जिसे सुन कर मुस्कुराने, हंसने और कहकहे लगाने पर आप मजबूर हो जाते है।
मैं बात कर रही हूं उस समय की जब हवा महल रात में सवा नौ से साढे नौ तक प्रसारित होता था। यानि रोज़ 15 मिनट का समय हंसने के लिए आरक्षित था।

ऐसी ही एक रात उदघोषणा हुई - प्रस्तुत है झलकी रात के राही और शुरू हो गई झलकी - प्लेटफार्म की आवाज़े, रेल की आवाज़ । चलती गाड़ी में एक पुरूष ने प्रवेश किया । लड़की डिब्बे में अकेली थी ।

सहयात्री की तरह बातों का सिलसिला चल निकला । पुरूष ने बताया कि वह कर्नल था । लड़की ने कहा की उसे बहादूर लोग अच्छे लगते है ।


कुछ समय बात लड़की ब्लैकमेल करने लगी । कहा कि जो कुछ उसके पास है सभी दे दें । वर्ना वह चेन खींचेगीं और उस पर छेड़ने और ज्यादती का आरोप लगाएगी। पुरूष न माना और उसने चेन खींच दी ।


पुलिस आई । मामला बना । सभी कहने लगे कर्नल हो कर उसने ग़लत काम किया । पुरूष ने कहा कि उसका ओवरकोट उतारो । तभी लड़की बोली की रेल में भी वह उसे कभी पानी पिलाने और कभी खिड़की बन्द करने के लिए कहता रहा ।


जब ओवरकोट उतारा गया तो सभी आवाक । उसकी तो दोनों बाहें कटी हुई थी । लड़की भागने लगी तो उसे पकड़ लिया गया ।

रहस्य और रोमांच से भरपूर इस झलकी ने पूरे 15 मिनट श्रोताओं को बांधे रखा । श्रोता भूल गए कि यह झलकी हवा महल के स्वाद के अनुसार नहीं है क्योंकि हवा महल का तो काम है हवा में महल बनाना, न कि अपराधियों का पर्दाफ़ाश करना ।


यह शायद अपने तरह की अकेली झलकी थी जो हवामहल में प्रसारित हुई थी । दो-तीन बार इसका प्रसारण मैनें सुना । जब भी सुना बहुत अच्छा लगा । एक विशेष समय में कुछ अलग, कुछ अच्छा, कुछ अनूठा लगा ।

आज ये याद नहीं कि इसके लेखक, प्रस्तुतकर्ता और कलाकार कौन थे । लेकिन झलकी आज भी दिमाग़ में ताज़ा है ।

Thursday, September 20, 2007

रेडियो समाचार: अखबार व आम आदमी के प्राण

मेरे एक दोस्‍त सृजन शिल्‍पी जी का कहना है कि ‘बिजली और केबल कनेक्शन के अभाव में टेलीविज़न भी ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा सशक्त माध्यम बचता है जो सुगमता से सुदूर गाँवों-देहातों में रहने वाले जन-जन तक बिना किसी बाधा के पहुँचता है। रेडियो आम जनता का माध्यम है और इसकी पहुँच हर जगह है, इसलिए ग्रामीण पत्रकारिता के ध्वजवाहक की भूमिका रेडियो को ही निभानी पड़ेगी। रेडियो के माध्यम से ग्रामीण पत्रकारिता को नई बुलंदियों तक पहुँचाया जा सकता है और पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए आयाम खोले जा सकते हैं। इसके लिए रेडियो को अपना मिशन महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज्य के स्वप्न को साकार करने को बनाना पड़ेगा और उसको ध्यान में रखते हुए अपने कार्यक्रमों के स्वरूप और सामग्री में अनुकूल परिवर्तन करने होंगे। निश्चित रूप से इस अभियान में रेडियो की भूमिका केवल एक उत्प्रेरक की ही होगी।‘ शिल्‍पी जी की इन लाइनों में वाकई दम है।

असल में देखा जाए तो गांवों में ही नहीं, महानगरों, शहरों और कस्‍बों में भी रेडियो बड़ी भूमिका निभाई है और निभा भी रहा है। आकाशवाणी और बीबीसी आज भी खबरों के लिए गांवों और कस्‍बों में रह रहे लाखों लोगों के लिए समाचार, विचार और मनोरंजन का सशक्‍त माध्‍यम बना हुआ है। देहातों से निकलने वाले छोटे अखबारों के लिए आज भी रेडियो प्राण है।

आकाशवाणी से आने वाले धीमी गति के समाचार इन अखबारों में सुने नहीं लिखे जाते थे ताकि ये अखबार अपनी समाचार जरुरत को पूरा कर सके। शाम को आने वाले खेल समाचार और प्रादेशिक समाचार के बुलेटिन भी यहां ध्‍यान दो-चार पत्रकार बैठकर सुनते थे। वर्ष 1988 में मुझे हरियाणा के कस्‍बे, लेकिन अब शहर करनाल में एक अखबार विश्‍व मानव में काम करने का मौका मिला, जहां दिन भर रेडियो की खबरों को सुना और लिखा जाता था। समाचार एजेंसियों से ज्‍यादा वहां रेडियों को महत्‍व दिया जाता था। हमारे यहां भाषा की सेवा थी लेकिन महीने में यह कई बार चलती ही नहीं थी, ऐसे में रेडियो हमें बचा ले जाता था, अन्‍यथा हो सकता था कि हमें बगैर समाचार के अखबार छापना पड़ता। आज भी गांवों और सीमांत क्षेत्रों में रेडियो का महत्‍व कम नहीं हुआ है। लोग खूब सुनते हैं समाचार, विश्‍लेषण और खास रपटें। यह खबर बीबीसी और आकाशवाणी पर सुनी है, यानी कन्‍फर्म हो गया। ऐसा कहते हैं गांवों में आज भी। हालांकि, यह भी सच है कि रेडियो पर आनी वाली खबरों, खबर कार्यक्रमों में बेहद बदलाव की जरुरत है। नई पीढ़ी की जरुरत के कार्यक्रम शामिल करने होंगे। जहां तक मेरा ज्ञान है सरकार ने एफएम रेडियो को न्‍यूज में आने की अनुमति अभी नहीं दी है। यदि सरकार यह अनुमति दे दें तो गांव भी बेहतर प्रगति कर सकते हैं लेकिन फिर रेडियो सेवा चलाने वालों को यह ध्‍यान में रखना होगा कि वे ग्रामीण पत्रकारिता का विशेष ख्‍याल रखें।

रेडियो पर 24x7 समाचार सेवा दूसरे किसी भी माध्‍यम से बेहतर चल सकती है। इस पर भी टीवी माध्‍यम की तरह समाचार की लाइव सेवा चलाई जा सकती है। अंतरराष्‍ट्रीय, राष्‍ट्रीय, राज्‍यस्‍तरीय समाचारों के अलावा देश के विभिन्‍न जिलों के मुख्‍य समाचार सुनाए जा सकते हैं। खेल, कारोबार, संस्‍कृति, मनोरंजन, इंटरव्‍यू, अपराध, महिला, बच्‍चों से जुड़े समाचार यानी वह सब कुछ जो एक अखबार या टीवी माध्‍यम में बताया जा सकता है। मनोरंजन के अलावा लाइफ स्‍टाइल, कैरियर, शॉपिंग, सिनेमा, शिक्षा आदि सभी के बारे में प्रोग्राम सुनाए जा सकते हैं। यहां मैं जिक्र करुंगा मुंबई विश्‍वविद्यालय का जिसने 107.8 एफएम पर चार घंटे कैम्‍पस समाचार, सेमिनार और विविध विषयों पर चर्चा करने की योजना बनाई है। मेरा ऐसा मानना है कि कम्‍युनिटी रेडियो से हटकर हरेक भाषाओं और हिंदी में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर समाचारों के लिए कार्य किया जा सकता है। प्रिंट माध्‍यम में कई बार छोटे-छोटे गांवों में हर रोज अखबार ही नहीं पहुंच पाते या जो पहुंचते हैं वे वहां पहुंचते-पहुंचते बासी हो जाते हैं। साथ ही किसी अखबार घराने को दो चार प्रतियां भेजने में रुचि भी नहीं रहती। इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम को देखें तो गांवों को बिजली ही नहीं मिल पाती, अब तो यह हालत छोटे और मध्‍यम शहरों की भी है।

मुंबई जहां मैं रहता हूं, के आखिरी उपनगर दहिसर से केवल 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित वसई से लेकर आगे तक के उपनगरों में रोज दस से बारह घंटे बिजली नहीं रहती, समूचे देश की भी स्थिति बिजली के मामले में यही है। देश के दो चार राज्‍य ऐसे होंगे जिन्‍हें छोड़कर हर जगह बिजली की बेहद कमी है। साथ ही गांवों में लोगों को केबल के 200-300 रुपए महीना देना भारी लगता है। लाखों लोग आज भी इस स्थिति में है रंगीन तो छोडि़ए श्‍याम श्‍वेत टीवी भी नहीं खरीद सकते। दूसरों के यहां टीवी होता है, उसे टुकर टुकर देखते रहते हैं। बच्‍चे सपने बुनते रहते हैं कि बड़ा होऊंगा तब टीवी जरुर खरीदूंगा। इसलिए टीवी समाचारों से एक बड़ा वर्ग इन तीन वजहों से वंचित हो जाता है। अब बात करते हैं वेब समाचारों का। जब बिजली ही नहीं तो कंप्‍यूटर कैसे चलेगा। एक कंप्‍यूटर और स्‍टेबलाइजर के लिए कम से कम 30-35 हजार रुपए खर्च करने होते हैं जो हरेक के बस की बात नहीं है।

लेकिन अब तो रेडियो एफएम के साथ 30 रुपए से लेकर 500 रुपए तक की हर रेंज में ईयर फोन के साथ मिलते हैं। दो पैंसिल सेल डाल लिए, और जुड़ गए देश, दुनिया से। यह आकाशवाणी है...या...बीबीसी की इस पहली सभा में आपका स्‍वागत है...। आया न मजा.... क्‍या खेत, क्‍या खलिहान, पशुओं का दूध निकालते हुए, उन्‍हें चराते हुए, शहर में दूध व सब्‍जी बेचने जाते हुए, साइकिल, मोटर साइकिल, बस, रेल, दुकान, नौकरी, कार ड्राइव करते हुए सब जगह समाचार, मनोरंजन वह भी 30 रुपए के रेडियो में..रेडियो खराब भी हो गया तो ज्‍यादा गम नहीं....नया ले लेंगे फिर मजदूरी कर। लेकिन मौजूदा आकाशवाणी, रेडियो सेवा चलाने वाले लोगों की जरुरत के अनुरुप खबरें और कार्यक्रम नहीं दे पा रहे हैं जिससे इनका प्रचलन कम हुआ है। मेरे मित्र सेठ होशंगाबादी बता रहे थे कि मध्‍य प्रदेश और महाराष्‍ट्र के अनेक ऐसे इलाकों में मैं घूमा हूं जहां ढोर चराते लोग और ग्‍वाले, साइकिल पर जाते लोग रेडियो कान से सटाकर रखते थे लेकिन अब यह प्रचलन घटा है। रेडियो श्रोता संघ तो पूरी तरह खत्‍म से हो गए हैं। रेडियो सेवा देने वाले यदि लोगों की आवश्‍यकता पर शोध करें तो रेडियो प्रिंट, टीवी और वेब माध्‍यम को काफी पीछे छोड़कर सबसे शक्तिशाली माध्‍यम है।

Wednesday, September 19, 2007

खो गया झुमरी तिलैया का सरगम

अगर आप रेडियो के श्रोता रहे हैं तो फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों में ‘झुमरी तिलैया’ का नाम अवश्‍य सुना होगा। 1950 से 1980 तक रेडियो से प्रसारित होने वाले फिल्‍मी गीतों के फरमाइशी कार्यक्रमों में शायद ही किसी गीत को सुनने के लिए झुमरी तिलैया के श्रोताओं ने फरमाइश न भेजी हो। हाल यह था कि हर किसी गीत के सुनने वाले श्रोताओं में झुमरी तिलैया का नाम कम से कम एक बार तो जरुर प्रसारित किया जाता था। इस तरह झुमरी तिलैया का नाम दिन में बार बार सुनने में आता था जिसके कारण रेडियो श्रोताओं में झुमरी तिलैया का नाम प्रसिद्ध हो गया था।

सही अर्थों में कहा जाए तो झुमरी तिलैया को विश्‍वविख्‍यात बनाने का श्रेय वहां के स्‍थानीय रेडियो श्रोताओं को जाता है जिनमें रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल, गंगालाल मगधिया, कुलदीप सिंह आकाश, राजेंद्र प्रसाद, जगन्‍नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, पवन कुमार अग्रवाल, लखन साहू और हरेकृष्‍ण सिंह प्रेमी के नाम मुख्‍य हैं। मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग में वर्षों पहले छपे एक लेख में विष्‍णु खरे ने लिखा था कि उदघोषक अमीन सयानी को प्रसिद्ध बनाने में झुमरी तिलैया के रेडियो श्रोताओं में खासतौर पर रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल का हाथ है।

बिहार में गया रेलवे स्‍टेशन के अगले स्‍टेशन कोडरमा के बाहरी क्षेत्र को झुमरी तिलैया के नाम से जाना जाता है। यह बिहार की राजधानी पटना से 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसकी आबादी एक लाख के करीब होगी। यहां विश्‍वविख्‍यात अभ्रक की खानें हैं और यहां का कलाकंद भी प्रसिद्ध है। वर्णवाल के बारे में लोगों का कहना है कि उनकी पहली फरमाइश रेडियो सिलोन से पढ़ी गई थी। फिल्‍म ‘मुगले आजम’ का गीत ‘जब प्‍यार किया तो डरना क्‍या’ के लिए उन्‍होंने टेलीग्राम से फरमाइश भेजी थी। रेडियो सिलोन से अक्‍सर यह प्रसारण होता था कि आप ही के गीत कार्यक्रम में झुमरी तिलैया से रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल ने ‘दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गयो रे, गजब भयो रामा जुलुम भयो रे’ फरमाइश की है। झुमरी तिलैया से गंगालाल मगधिया, कुलदीप सिंह ‘आकाश’, राजेंद्र प्रसाद, जगन्‍नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, पवन कुमार अग्रवाल, लखन साहू ने भी इसी गीत की फरमाइश की है।

रेडियो पर फरमाइश को लेकर कई अजूबे जुड़े हुए हैं। एक बार ऐसा हुआ कि आल इंडिया रेडियो पर गंगा जमुना फिल्‍म का गीत दो हंसो का जोड़ा बिछुड़ गयो रे बज रहा था। गीत समाप्‍त होने पर उदघोषक ने घोषणा की कि अभी अभी झुमरी तिलैया से रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल का भेजा हुआ टेलीग्राम हमें प्राप्‍त हुआ है, जिसमें उन्‍होंने दो हंसों का जोड़ा सुनाने का अनुरोध किया है। अत: यह गीत हम आपको पुन: सुना रहे हैं। टीवी के व्‍यापक आगमन से पहले रेडियो के अलावा मनोरंजन का दूसरा साधन नहीं था। ग्रामोफोन प्‍लेयर बहुत कम लोगों के पास था।

फरमाइश भेजने वालों में हरेकृष्‍ण सिंह ‘प्रेमी’ कभी पीछे नहीं रहे। यह अलग बात है कि वे अपनी हरकतों व कथित प्रेमी होने के कारण हमेशा चर्चा में रहे। फरमाइशों में अपने नाम के बाद अपनी कथित प्रेमिका प्रिया जैन का नाम भी जोड़ा करते थे जिसके कारण वे प्रसिद्ध हुए। यह बात अलग है कि उनकी प्रिया जैन से शादी नहीं हुई।

एक और दिलचस्‍प बात यह है कि रेडियो पर फरमाइश भेजने वालों में आपसी होड़ इस हद तक बढ़ गई थी कि लोग एक दूसरे की डाक को गायब करवाने और रुकवाने के लिए डाक छांटने वाले कर्मचारियों को रुपए देते थे। तब कई गंभीर श्रोता फरमाइशी पत्रों को भेजने के लिए गया और पटना तक जाने लगे जिससे डाक खर्च भी बढ़ गया। उन दिनों इस तरह के पत्र पर कम से कम 25 से 35 रुपए खर्च होने लगे।

एक और दिलचस्‍प प्रकरण के तहत एक सज्‍जन फरमाइश भेजने वाली लड़की से उसका मनपसंद गीत सुनने के बाद उससे प्रेम करने लगे। वे उसके प्रेम में इस हद तक पागल हो गए कि जिस दिन उस लड़की की शादी हो रही थी वहां जा पहुंचे और हंगामा खड़ा कर दिया कि मैं इस लड़की से शादी करूंगा। खैर लोगों के बहुत समझाने बुझाने और माथापच्‍ची करने के बाद मामला शांत हुआ।

झुमरी तिलैया के संबंध में सबसे ज्‍यादा रोचक बात यह थी कि जिस किसी फिल्‍म के किसी गीत को सुनने के लिए झुमरी तिलैया के श्रोता अपनी फरमाइश भेजते थे उस फिल्‍म को और उस गीत को मुंबई फिल्‍म उद्योग के बॉक्‍स ऑफिस पर हिट माना जाता था। यह सिलसिला कई साल से खत्‍म हो गया है। निजी टीवी चैनलों और दूरदर्शन की मार से रेडियो श्रोता बहुत कम रह गए हैं, साथ ही झुमरी तिलैया का सरगम भी खो गया है। इस सरगम को पढ़ने के बाद विंडो बंद मत किजिए बल्कि दिल से अपनी टिप्‍पणी ब्‍लॉग को भेजिए।

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हय्या ओ हय्या

जब देश भक्ति गीत माझी गीत बना और विविध भारती ने भूल सुधार किया !

बात उन दिनों की है जब स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए हम एक सामूहिक गान की तैयारी कर रहे थे । एक गीत हमारे हाथ लगा । पढ कर यूं लगा जैसे ये माझी गीत है । प्रस्तुति बहुत ज़ोरदार हो इसलिए हम अपनी ओर से कुछ जोड़ने भी लगे ताकि गीत बिल्कुल मल्लाहों का लगे ।

हमने जोड़ा - हय्या ओ हय्या

गीत का मुखड़ा कुछ यूं बना -

वह सावधान आया तूफ़ान
अब दूर नहीं किनारा
हय्या ओ हय्याSSSSSS हय्या ओ हय्या

इतना ही नहीं भय शब्द का प्रयोग दो बार होने पर एक बार भय और एक बार डर कर दिया । इस तरह अंतरा बना -

वीर बढ चलो धीर धर चलो
चीर चपल जल धारा
आ आ आ आ आ
वीर बढ चलो धीर धर चलो
चीर चपल जल धारा

है भय कोई
के कोई भय नहीं
है डर कोई
के कोई डर नहीं
अब दूर नहीं किनारा

हय्या ओ हय्याSSSSSS हय्या ओ हय्या

सामूहिक गान में शामिल हम सब सहेलियां विविध भारती सुना करती थी । एक दिन सुबह वन्दन्वार में भजनों के बाद उदघोषणा हुई अब आप शैलेन्द्र का लिखा देश भक्ति गीत सुनिए महेन्द्र कपूर और साथियों की आवाज़ों में । ये गीत सुना और हम आवाक्…

तब से आज तक कई बार यह गीत सुना । अभी एक-डेढ महीने पहले ही सुना था । जब भी सुनती हूं बीच-बीच में बरबस मुहं से निकल ही जाता है -

हय्या ओ हय्या

मेरे द्वारा रचित
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Monday, September 17, 2007

ओवल का टेस्ट मैच,सुशील दोशी और और वो रोमांचक आँखों देखा हाल..

जिंदगी में बहुत सारे लमहे ऐसे होते हैं जो आप वर्षों सहेज कर रखना चाहते हैं। उन लमहों का रोमांच दिल में झुरझुरी सी पैदा कर देता है। आज जिस वाक़ये को आपके सामने रख रहा हूँ वो संबंधित है क्रिकेट से जुड़ी उस हस्ती से, जिसके रेडियो पर बोलने के कौशल ने, उस छोटे वच्चे के मन में, खेल के प्रति ना केवल उसके अनुराग में वृद्धि कि बल्कि उन क्षणों को हमेशा-हमेशा के लिए उसके हृदय में रचा बसा दिया । जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ प्रसिद्ध क्रिकेट कमेन्टेटर सुशील दोशी की जिन्होंने ने बाल जीवन में अपनी जीवंत कमेंट्री से मुझे इस हद तक प्रभावित किया कि बचपन में जब भी मुझसे पूछा जाता कि बेटा, तुम बड़े हो कर क्या बनोगे तो मैं तत्काल उत्तर देता कि मुझे क्रिकेट कमेन्टेटर ही बनना है।

बात आज से करीब २८ वर्ष पूर्व १९७९ की है। सितंबर का महिना चल रहा था। भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट श्रृंखला का आखिरी टेस्ट ओवल में खेला जा रहा था। मुझे रेडियो पर टेस्ट मैच के आँखों देखा हाल सुनने का चस्का लग चुका था। यूँ तो जब भी टेस्ट मैच भारत में हुआ करते थे, रेडियो की कमेंट्री रविवार को ही ठीक तरह से सुनने को मिल पाती थी। पर जब-जब टेस्ट मैच इंग्लैंड में होते, हमारी तो चाँदी ही हो जाती। साढ़े पाँच घंटे के समय अंतराल की वज़ह से होमवर्क बना चुकने के बाद, भोजन के बाद के खेल का हाल हम मज़े से सुन सकते थे। ऊपर से शाम के वक़्त आंखों देखा हाल सुनने का रोमांच ही अलग होता था। और फिर चार सितंबर की वो शाम तो कुछ ऍसा लेकर आई थी, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

टेस्ट मैच में भारत की स्थिति को पाँचवे दिन की सुबह चिंताजनक ही आंका जा सकता था। इंग्लैंड ने मैच के चौथे दिन आठ विकेट पर ३३४ रन पर पारी घोषित कर भारत के सामने जीत के लिए ४३८ रन का विशालकाय स्कोर रखा था। यूँ तो चौथे दिन की समाप्ति तक गावसकर और चेतन चौहान की सलामी जोड़ी ७६ रन की साझेदारी कर डटी हुई थी पर बाकी की भारतीय टीम पूरे दिन भर में बाथम और विलिस सरीखे गेंदबाजों को झेल पाएगी इसमें सबको संदेह था। पर हमें क्या पता था कि 'स' नाम से शुरु होने वाले दो शख्स, मैदान के अंदर और बाहर से मैच की एक अलग ही स्क्रिप्ट लिखने पर तुले हुए हैं।

सुशील दोशी की आवाज़ कमाल की थी। आँखों देखा हाल वो कुछ यूं सुनाते थे जैसे सारा कुछ आप के सामने घटित हो रहा हो। यही नहीं भारत का विकेट गिरने से हुई मायूसी, या फिर चौका पड़ने से उनकी उत्तेजना को सुनने वाले के दिलो दिमाग तक पहुँचाने की उनकी कला अद्भुत थी। अंतरजाल पर तो मुझे उनकी रेडियो कमेंट्री की कोई रिकार्डिंग तो नहीं मिली। पर मुझे जितना कुछ याद है, उसके हिसाब से उनका अंदाजे बयाँ कुछ कुछ यूँ हुआ करता था।
sushil2.mp3

"....बॉथम पैवेलियन एंड से गेंदबाजी का जिम्मा सँभालेगे । सामना करेंगे गावसकर। फील्डिंग की जमावट.. तीन स्लिप्स, एक गली, कवर, मेड ओफ ओफ साइड में और वाइडिश मेड आन, मिड विकेट और फारवर्ड शार्ट लेग आन साइड में।

बॉथम ने दौड़ना शुरु किया...अंपायर को पार किया दायें हाथ से ओवर दि विकेट ये गेंद आफ स्टम्प के थोड़ी सी बाहर। गेंद के साथ छेड़खानी करने का प्रयास किया गावसकर ने....। भाग्यशाली रहे कि गेंद ने उनके बल्ले का बाहिरी किनारा नहीं लिया अन्यथा परिणाम गंभीर हो सकता था।तारीफ करनी होगी बॉथम की कि जिन्होंने गेंद की लंबाई और दिशा पर अच्छा नियंत्रण रखा है और काफी परेशानी में डाल रखा हे भारतीय बल्लेबाजों को।

अगली गेंद गुड लेन्थ, आफ मिडिल स्टंप पर ,बायाँ पैर बाहर निकाला गावसकर ने , गेंद के ठीक पीछे आकर सम्मानजनक तरीके से वापस पुश कर दिया गेंदबाज की ओर, बाँथम ने फोलोथ्रू में गेंद उठाई और चल पड़े हैं अपने बालिंग रन अप पर।

पहली स्लिप पे गॉवर, दुसरी पर बॉयकॉट तीसरी पर बुचर, गली पर गूच और इसी बीच बॉथम की अगली गेंद आफ स्टम्प के बाहर, थोड़ी सी शॉट। स्कवायर कट कर दिया है गावसकर ने गली के पास से। गेंद के बीच भाग रहे हैं गूच..पहला रन भागकर पूरा किया गावसकर ने, दूसरे के लिए मुडे बैट्समैन..और गूच नहीं रोक पाए हैं गेंद को. गेंद सीमारेखा से बाहर ..चार रन......"


चौके वाली कमेंट्री में दोशी की बोलने की रफ़्तार वाक्य के साथ साथ बढ़ती चली जाती थी। और मज़े की बात कि उस शाम को गावस्कर ने अपनी २२१ रनों की यादगारी पारी में २१ चौके लगाए। गावसकर की उस जबरदस्त पारी की कुछ झलकें आप यहाँ देख सकते हैं।


जब अस्सी रन बनाकर चेतन चौहान आउट हुए तो भारत का स्कोर था २१३ रन। गावसकर का साथ देने आए वेंगसरकर और इस जोड़ी ने स्कोर ३६६ तक पहुँचा दिया। यानि जीतने के लिए ७२ रन और हाथ में आठ विकेट। पर थोड़े थोड़े रनों के अंतर पर विकेट गिरते रहे और हम सबके दिल का तनाव बढ़ता गया और उस वक़्त सुशील दोशी ने कहा..

"...इस मैच का रोमांच कुछ इस तरह बढ़ गया है कि अब ये मैच दिल के मरीजों के लिए रह नहीं गया है। दिल की बीमारियों से त्रस्त व्यक्तियों के डॉक्टर उनको ये सलाह दे रहे होंगे कि इस मैच का आँखों देखा हाल ना सुनें, क्यूंकि ये रोमांच जान लेवा साबित हो सकता है।...."

दोशी की ये पंक्तियाँ बिलकुल सटीक थीं क्यूँकि गुंडप्पा विश्वनाथ के रूप में ४१० रन पर पाँचवां विकेट खोने के बाद ही १५ रन के अंतराल में तीन विकेट और खोकर भारत जीत से हार की कगार पर पहुँच गया था। अंत में भरत रेड्डी और करसन घावरी के क्रीज पर रहते हुए ही शायद खराब रोशनी की वज़ह एक ओवर पहले से दोनों कप्तानों की सहमति से मैच ड्रा के रूप में समाप्त हो गया।

रेडियो कमेंट्री का एक और नायाब अनुभव 'राथमन्स कप' का रहा है जब मैंने रेडियो पाकिस्तान ट्यून कर के भारत की पाकिस्तान पर जीत का हाल मोहल्ले के सारे लड़कों को सुनाया था। और फिर कौन भूल सकता है जसदेव सिंह की जादुई आवाज़ में की गई मास्को ओलंपिक में हॉकी के फाइनल में भारत और स्पेन के बीच के मुकाबले की कमेंट्री, जिसका नतीज़ा भारत के पक्ष में रहा था।

जब से टीवी चैनल ने मैच लाइव दिखाने शुरु किए रेडियो कमेन्ट्री का वो महत्त्व नहीं रहा। पर सुशील दोशी और जसदेव सिंह जैसे दिग्गजों की बदौलत अस्सी के दशक में शायद ही शहर का कोई कोना होता हो जहाँ क्रिकेट और हॉकी के मैच के समय ट्रांजिस्टर ना दिखाई पड़ता हो। वो एक अलग युग था, जिसका आनंद हमारी पीढ़ी के लोगों ने उठाया है।

आज मैं अपनी इस पोस्ट के माध्यम से रेडियो कमेंट्री की इन महान विभूतियों के प्रति आभार प्रकट करना चाहता हूँ जिनकी वज़ह से खेल के मैदान से इतनी दूरी पर रहने के बावज़ूद हम इन रोमांचक क्षणों के सहभागी बन सके।
मेरे द्वारा रचित
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Friday, September 14, 2007

रेडियो के दीवाने एक बच्चे की कहानी

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

लगभग आज से चौबीस- पच्चीस साल पहले की बात होगी तब एक छोटा बच्चा अपने घर से स्कूल जाने के लिये निकलता है। स्कूल का समय है सुबह सात बजे से बारह बजे तक का सो सात वजे से पहले नहा धो कर स्कूल जाने के लिये घर से चल पड़ा है।

स्कूल भी बहुत दूर है घर से स्कूल के पास पहुँचले पहुँचते रेडियो पर बजते भजनों की आवाज कानों में पड़ती है, हे राम नाम रस भीनी रे चदरिया झीनी रे झीनी......... गायक शायद अनूप जलोटा या उनके पिताजी पुरुषोत्तम दास जलोटा रहे होंगे। भजन की मधुरता में खो कर स्कूल जाने की बजाय वह बच्चा वापस घर की और भागता है।

घर में घुसते ही बच्चे के माता पिता पूछते हैं क्या हुआ स्कूल क्यों नहीं गए अब तक? तो वह बच्चा अपने पिताजी को हाँफते हुए कहता है पापाजी आप जल्दी से रेडियो चालू कीजिये आकाशवाणी जयपुर जोधपुर पर बहुत अच्छा भजन आ रहा है, पिताजी रेडियो चालू करने की बजाय बच्चे को एक तमाचा लगा देते हैं, इतनी बात कहने के लिये तुम स्कूल से भाग कर आये हो। बच्चा रुआंसा हो जाता है और वापस स्कूल जाता है, स्कूल देर पहुँचने पर एक बार और पिटाई होती है।

पिताजी रेडियो चालू करने की बजाय बच्चे को एक तमाचा लगा देते हैं, इतनी बात कहने के लिये तुम स्कूल से भाग कर आये हो। बच्चा रुआंसा हो जाता है और वापस स्कूल जाता है, स्कूल देर पहुँचने पर एक बार और पिटाई होती है।

खैर बच्चा कौन था ....आप समझ ही गये हैं, जी हाँ वह रेडियो और संगीत का दीवाना बच्चा मैं ही था।

स्कूल से बारह बजे छुट्टी होती । स्कूल से वापस आने पर एक बजे फिर से रेडियो शुरु होता जो तब तक चलता तब तक पापाजी घर नहीं आ जाते। फिर पापाजी आ कर समाचार सुनते। फिर देर रात तक पुराने गाने। बरसों तक यह सिलसिला चलता रहा।

फिर अचानक एक दिन दूरदर्शन आ गया कुछ सालों तक तो रेडियो से दूर होते गये, पर दिन में तो रेडियो फिर भी चलता ही था, क्यों कि उन दिनों टीवी शाम को चालू होता था, और कृषि दर्शन जैसे ना समझ में आने वाले कार्यक्रम भी हम मजे से देखते थे;पर उसमें एक बहुत बड़ी कमी थी कि जब टीवी देखते तब दूसरा कोई काम नहीं कर सकते थे, जब कि रेडियो कभी भी कहीं भी और कुछ भी करते समय सुन सकते थे... यहाँ तक कि होमवर्क करते समय भी। कई बार तो भूले बिसरे गीत ( भू. बि. गीत- कार्यक्रम नहीं सचमुच के भूले बिसरे गीत) सुनते सुनते ही नींद आ जाती और बाद में मम्मीजी रेडियो को बन्द करती।

यूनूस भाई ने एक दिन बात बात में कही और कुछ शुरुआती तकलीफों के बाद आखिरकार रेडियो नामा शुरु हुआ और अफलातूनजी, संजय पटेल जी, लावण्या जी, और यूनूस भाई ने अपने अपने संस्मरण हमें बता तो बचपन की वे सारी बातें मुझे भी याद आ गई।

रेडियो मेरी जिन्दगी से आज भी जुड़ा हुआ है, आल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस तो अब साफ सुनाई नहीं देती परन्तु विविध भारती से आनन्द तो आज भी उठा ही रहा हूं मैं। सुबह उठते ही सबसे पहले रेडियो चालू होता है।

बाकी बातें और कभी ..

मिर्ची सुनने वाले ऑलवेज खुश....

आआऊऊईई एफ़एम रेनबोओओओओ....

सुबह सुबह ट्रांजिस्ट ऑन किया. बढ़िया भजन आ रहा था. भक्ति रस में मन तल्लीन था. भजन समाप्त होते ही ट्रांजिस्टर चीख़ा –

आआऊऊईई एआईआर एफ़एम रेनबोओओओओ....

मैंने ट्रांजिस्टर को जांचा. उसके बैंड दिखाने वाले सूचक को जांचा. हां, मैंने एफएम रेनबो ही लगाया था, रेडियो मिर्ची नहीं. मगर फिर भी यह मुझे बता रहा था कि आप सुन रहे हैं –

आआऊऊईई एआईआर एफ़एम रेनबोओओओओ....

बुड़बक समझ रखा है क्या? हमने रेनबो ही लगाया है भाई. चलो इस संदेश को इग्नोर कर दिया. दूसरा भजन आया. तीसरा आया. चौथा आते ही फिर से ट्रांजिस्टर ने बताया –

आआऊऊईई एआईआर एफ़एम रेनबोओओओओ....

यार, मेरा ट्रांजिस्टर उन्नत किस्म का है. इसमें फ्रिक्वेंसी ड्रिफ़्ट नहीं होती. जो स्टेशन, जो बैण्ड मैं लगाता हूँ, ये वो ही बजाता है. फिर फिजूल क्यों बताते हो? पर जब एक घंटे के अंतराल में इसने मुझे पांचवी बार बताया कि मैंने -

आआऊऊईई एआईआर एफ़एम रेनबोओओओओ....

लगाया हुआ है, तो मेरा पारा चढ़ गया. मैंने रेडियो के बैण्ड परिवर्तक (रिमोट) को उमेठा, और रेडियो मिर्ची लगाया.

कोई फंकी रीमिक्स चल रहा था. उसके खत्म होते ही ट्रांजिस्टर चिल्लाया –

मिर्ची सुनने वाले आलवेज खुश!

मुझे आश्चर्य हुआ कि कैसे मेरे ट्रांजिस्टर को पता चला कि मैंने मिर्ची लगाया है और मैं आलवेज खुश होने की नाकाम कोशिश कर रहा हूँ.

दूसरा रीमिक्स आया, तीसरा आया. उसके बाद फिर मेरे ट्रांजिस्टर ने बताया –

मिर्ची सुनने वाले आलवेज खुश!

मैंने कन्फर्म किया कि मैंने रेडियो मिर्ची ही लगाया हुआ है. हाँ, रेडियो मिर्ची ही लगा हुआ था. फिर वो क्यूं इसे बता रहा था पता नहीं.

घंटा भर सुनने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मैं जितना खुश नहीं था, उससे ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर बोल रहा था –

मिर्ची सुनने वाले आलवेज खुश!

मैंने बड़े दुःखी मन से रेडियो का बैण्ड बदला. इस दफा लगा विविध भारती.

सुबह-सुबह पुराने – भूले बिसरे गीत चल रहे थे.

गाना बज रहा था – अफसाना लिख रही हूँ दिले बेकरार का...

गाना खत्म होते ही ट्रांजिस्टर चिल्लाया –

आप सुन रहे हैं – विविध भारती.

ये यूनुस मियाँ की आवाज़ लग रही थी. मुझे आश्चर्य हुआ कि मैंने विविध भारती ही रेडियो पर ट्यून किया हुआ है, तो उसमें उर्दू सर्विस तो बजेगी नहीं. फिर यूनुस मियाँ मुझे क्यों ये बता रहे हैं कि आप सुन रहे हैं विविध भारती?

विविध भारती बैण्ड पर भी कोई हर पंद्रह मिनट, आधा घंटा में मुझे याद दिलाता रहा कि मैं विविध भारती सुन रहा हूँ. यदि मुझे बारंबार, नियमित अंतराल से याद नहीं दिलाया जाता तो शायद मैं समझता कि किशोर कुमार का वो गाना जो अभी मैंने सुना वो शायद किसी और चैनल में सुना होऊंगा, और क्रेडिट उसे दे दूंगा.

कोई आधा-दर्जन बार जब मैंने सुना –

आप सुन रहे हैं विविध भारती

तो फिर मेरा दिमाग झन्ना गया. मैंने ट्रांजिस्टर का कान उमेठा और उसे उर्दू सर्विस पर लगा दिया.

पहली ही आवाज़ मेरे कान में पड़ी –

ये आल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस है.

हाँ, भई, है. है. ऊर्दू सर्विस ही है. मैंने वो ही बैण्ड ट्यून किया है. मत बताओ. मेरा हाथ चला. अब मैंने लगाया 93.4 माई एफ़एम.

कोई जानी पहचानी धुन आ रही थी. थोड़ा सा रुका तो धुन के बाद अनाउंसर चिल्लाया –

माई दुनिया, 93.4 माई एफ़एम...

हुँह. सभी मुझे बेवकूफ समझते हैं. क्या मुझे नहीं पता कि मैंने क्या स्टेशन, कौन सा बैण्ड लगाया है? और हर पंद्रह मिनट में बताते हैं कि क्या स्टेशन सुन रहा हूँ. क्या मुझे डिमेंशिया का मरीज समझते हैं? जो मैं हर दस मिनट में भूल जाता हूं कि मैं कौन सा स्टेशन सुन रहा हूँ, कौन सा स्टेशन मैंने ट्यून किया है?

मैंने ट्रांजिस्टर का स्विच बन्द कर दिया. पर दिमाग में शान्ति नहीं थी. बेतरतीब आवाजें मन में बेतरतीब गूंज रही थीं –

आआऊऊईई एआईआर एफ़एम रेनबोओओओओ....

माई दुनिया, 93.4 माई एफ़एम..

ये आल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस है.

आप सुन रहे हैं – विविध भारती.

मिर्ची सुनने वाले आलवेज खुश!

मुझे किसी मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए. क्या खयाल है आपका?

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Thursday, September 13, 2007

जब मैं छोटा बच्‍चा था, रेडियो पर आता था


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



जिंदगी में जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि शायद कोई ऐसा पल नहीं था जब रेडियो मौजूद ना रहा हो ।

मां के पेट में रहा होऊंगा तो भी घर में रेडियो की स्‍वरलहरी गूंजती होगी । पिता रेडियो के शौकीन हैं । खासकर एक अरसे से वे रेडियो समाचारों को बिला-नाग़ा सुनते आए हैं । अंग्रेज़ी और हिंदी के बुलेटिन दोनों । और प्रादेशिक समाचार भी । जब मैं छोटा था तो पापा बी एस एन एल की सरकारी नौकरी में थे । शिफ्ट वाली । मुझे याद है दोपहर दो बजे वाली शिफ्ट के लिए निकलने से पहले समाचार सुनते हुए चाय की चुस्कियां लेते । और मां से बातें करते । देश और दुनिया की गतिविधियों को जानने का जुनून पापा में तब भी था और आज भी है । तो उन्‍हीं दिनों हमने देवकी नंदन पांडे, रामानुज प्रसाद सिंह, इंदू वाही, बोरून हालदार जैसे समाचार वाचकों की आवाजें पहचानीं । नहीं पहचानते तो कोई क्रांति नहीं होती । लेकिन शायद घर के इस माहौल ने हमारे भीतर रेडियो के संस्‍कार भरे । हम सभी भाई बहनों को ये अहसास दिलाया कि दुनिया में निर्लिप्‍त होकर नहीं जिया जा सकता । हर मुद्दे पर अपने ठोस विचार हों । तटस्‍थता ना हो ।

रेडियो से थोड़ा हटकर जिक्र हो रहा है लेकिन ये भी कहना चाहूंगा कि ये वही दिन थे जब इंदौर से प्रकाशित होने वाला नई-दुनिया घर पर आता था । और हम सभी में होड़ लगती थी कि पहले कौन पढ़ेगा । कभी घर के न्‍यायाधीश यानी हमारे माता-पिता मेरी बहन के पक्ष में फैसला सुनाते, कभी छोटे भाई के पक्ष में तो कभी बहन के । लेकिन पेपर कौन पहले पढ़ेगा इस बात को लेकर हम झगड़ते बहुत थे । और इस झगड़े का अपना मज़ा था । कई शब्‍द और जुमले समझ नहीं आते । जैसे टे.टे. में कर्नाटक की जीत । तो पिता बताते टे.टे. का मतलब है टे‍बल टेनिस । जिमी कार्टर ने क्‍या कहा और यासिर अराफात ने क्‍या । ये नाम जीवन में शायद तभी पहली बार सुनते और लगता कि कितने जीभ-थकाऊ नाम हैं । यही नाम रेडियो से भी सुनने मिलते समाचारों में । इसी तरह व्‍यापारिक खबरों की भाषा बड़ी मजेदार लगती ।
मिर्ची चढ़ी और कपड़े का बाज़ार मंदा रहा । नईदुनिया ने हमारे भीतर पढ़ने के संस्‍कार बनाए ।

बहरहाल रेडियो की बात चल रही थी । मुझे याद है मेरी उम्र महज़ पांच या छह साल की रही होगी । भोपाल में हमारे पड़ोसी थे अहद प्रकाश । जो बच्‍चों के लिए लिखा करते थे । पत्र पत्रिकाओं में छपते । शायद किसी दिन चाय की चुस्कियों के बीच उन्‍होंने पापा को सलाह दी होगी रेडियो में बच्‍चों के कार्यक्रम में भेजने की । बस अगले ही रवि‍वार पापा मुझे लेकर चले गये आकाशवाणी । शायद कोई कविता सुनाई थी मैंने तब बच्‍चों के कार्यक्रम में । और तब मकबूल हसन और पुष्‍पा तिवारी बच्‍चों का कार्यक्रम करते थे । आजकल आकाशवाणी पर बच्‍चों का कार्यक्रम लाईव नहीं होता । और इसके कई कारण हैं जिनके बारे में फिर कभी बताया जायेगा । पर तब बिल्‍कुल लाईव प्रोग्राम होता था । यानी सबेरे-सबेरे श्‍यामला हिल्‍स पर आकाशवाणी के परिसर में पहुंचना । दूसरे बच्‍चों के साथ धमाचौकड़ी करना । फिर मकबूल हसन की जबर्दस्‍त कड़ी आवाज़ सुनकर रिहर्सल के लिए जमा होना । सबकी बारी तय हो जाती । कौन बच्‍चा किस नंबर पर बोलेगा । फिर जब तक दूसरे बच्‍चे अपने प्रस्‍तुति दें, मैं मन ही मन अपनी याद की कविता दोहराता रहता । जबर्दस्‍त दबाव होता परफॉरमेन्‍स को लेकर । अगर भूल गया तो कितनी बेइज्‍जती हो जायेगी । दोस्‍तों के बीच धाक कैसे जमेगी । दूसरे बच्‍चे क्‍या सोचेंगे । इस चक्‍कर में कई बार भूल जाता कि दूसरे बच्‍चों ने क्‍या सुनाया । जहां सब हंसते वहां हम भी ।
जब सब ताली बजाते तो हम भी । बच्‍चों के प्रोग्राम में सबसे बड़ी दिक्‍कत प्रस्‍तुतकर्ताओं को ये होती थी कि कभी कोई खांस देता । कभी बीच प्रोग्राम में किसी सनकी-सुल्‍तान का मूड टहलने को करने लगता । कभी कोई रोने लगता । एक तो लाईव प्रोग्राम । ऊपर से ये वानर सेना । मेंढकों को तौलने से भी कठिन होता रहा होगा ये सब


इसका अहसास बाद में मुझे तब हुआ जब कॉलेज के दिनों में मैं आकाशवाणी छिंदवाड़ा में यूथ कॉम्‍पीयर बना ।
और एक दिन वो महिला कॉम्‍पीयर नहीं आई, जिसे बच्‍चों का प्रोग्राम रिकॉर्ड करना था । मैं ज्‍यादातर वक्‍त आकाशवाणी में ही बिताता था । बस मुझे पकड़ लिया गया और बच्‍चों के बीच उस दिन मेरी जो फजीहत हुई । रिकॉर्डेड होने के बावजूद बच्‍चों ने मुझे बहुत सताया । जैसे ही कोई बच्‍चा कुछ सुनाता, दूसरा कहता, भैया देखो ना ये पिंकी मेरी शर्ट खींच रही है । फिर किसी तरह सबको शांत किया जाता और दोबारा रिकॉर्डिंग शुरू की जाती तो किसी बच्‍चे को रेलगाड़ी चलाने की धुन सवार हो जाती । बीच में ही वो 'कूक छुक छुक' करने लगता । यानी रिकॉर्डिंग का सत्‍यानाश । इसी से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वो सारे कार्यक्रम या फिल्‍में जिनमें बच्‍चों की शिरकत होती है, कितने चुनौतीपूर्ण होते होंगे । वो मेरी जिंदगी का याद‍गार दिन इसलिए भी था कि जिंदगी फुल-सर्कल पर आ गयी थी । कभी एक बच्‍चे की हैसियत से इस कार्यक्रम में हिस्‍सा लिया था, और उस दिन दूसरे शहर में उसी कार्यक्रम को कॉम्‍पीयर करके मशक्‍कत कर रहा था । देखिए ना बातों बातों में यादों का कारवां बचपन से लेकर कॉलेज के दिनों की तरफ चला गया । बीच की बातें छूट ही गयीं ।

इन बातों का जिक्र काफी लंबा हो जायेगा । इसलिये बचपन और कॉलेज के दिनों के बीच की यादें फिर किसी दिन आपके साथ बांटी जायेंगी । और वो भी जल्‍दी ही ।

जाने से पहले रेडियोनामा के बारे में कुछ जरूरी बातें आपको बतानी हैं ।
जब रेडियोनामा की तैयारियां चल रही थीं,तो इंदौर के भाई संजय पटेल ने स्‍वयं ही इसके लोगो और हैडर की डिज़ाइनिंग का काम अपने हाथ ले लिया । उन्‍होंने कई लोगो तैयार किये और उनमें से इसे हैडर के रूप में चुना हैदराबाद के भाई सागर चंद नाहर ने । बाद में रेडियोनामा के टेम्‍पलेट-डिज़ाइन का काम गिरीराज जोशी ने किया है । रेडियोनामा को संभालने में सागर चंद नाहर बड़ी मेहनत कर रहे हैं । रेडियोनामा से जुड़े हम सभी लोग चाहते हैं कि रेडियो से जुडी बातों और यादों का कारवां और आगे बढ़ें । अभी हो सकता है कि शुरूआत में नॉस्‍टेलजिया का एलीमेन्‍ट ज्‍यादा रहे । लेकिन विमर्श भी किसी ना किसी मोड़ पर शुरू होगा और जमकर होगा ।
अगर आपके मन में रेडियोनामा से जुड़ने की तमन्‍ना है तो आपका हार्दिक स्‍वागत है ।


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