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Thursday, January 31, 2008

श्री गोपाल शर्माजी, फिल्म तानसेन और सुरत

१८ जानवरी, २००८ के दिन अमर गायक स्व. श्री के. एल. सायगल साहब की पूण्य तिथी थी । उस दिन सुरत शहरमें पूरानी क्लासीक फिल्मों के शौकी़न क्लब विन्टेज वेटरन्स ने श्री सायगल साहब को श्रद्धांजली देने के लिये उनके और स्व. खुरशीदजी के मूख्य अभिनय वाली फिल्म तानसेन का वी. सी. डी. शॊ एक अच्जे हॊल में टी. वी. प्रोजेक्टरर की सहाय से बडे परदे पर रखा था । इस क्लबमें मेरे (सिर्फ़ मेरे ही नहीं, पर भारत और विदेशमें बसे कई भारतीय फिल्मों के शौकी़नो के भी) मित्र और मूकेश गीत कोष के तथा गुजराती फिल्मी गीत कोष (१९३२-१९९४) के सम्पादक और सायगल गीत कोष (जब दिल ही टूट गया) के श्री हरमंदिर सिन्ह -हमराझ- के साथ रहे सह-सम्पादक श्री हरीश रघुवंशी जी तथा हाल सुरत स्थित अभिनेता-निर्देषक श्री क्रिष्नकांतजी को इस क्लब के मान्द सबस्यता प्रदान की हुई है । इस दिन संयोग से ऐसा हुआ की उस दिन रेडियो श्री लंका पर १९५६ से १९६७ तक कार्यरत उद्दधोषक श्री गोपाल शर्माजी सुरत आये हुए थे, जिनके आजे की खबर उनके सम्बंधी को छोड़ कर सिर्फ़ मूझे थी, जो उन्होंने आने से पहेले मैंने दी थी । तब जब मैंने श्री हरीशजी को यह बताया तब यह बात उन्होंने क्लब के संचालकश्री रोहित भाई मारफतियाजी को कही ।

रेडियो श्री लंका से हर रोज़ पूरानी फिल्मो के गीतो के कार्यक्रममें अन्तिम गीत प्रस्तूत करने की प्रणाली श्री विजय किशोर दूबेजी ने बनाई थी, जो श्री गोपाल शर्माजी के रेडियो श्री लंका में जाने के सिर्फ़ एक महिना बाद भारत लोट कर एच एम. वी.में जूड़ गये थे । तब श्री शर्माजी के साथी उद्दघोषकने यह प्रणाली बंध करनी शुरू की थी, तब श्री गोपाल शर्माजीने वहा~ के निर्देषकको मिल कर इस स्थापित प्रणाली को हर हमेंश जारि रख़ने के लिये परिपत्र जारि करवाया था । और एक योजानुयोग यह भी था, कि श्री गोपाल शर्माजीने रेडियो श्री लंका के अपने पहेले ही दिन फिल्म तानसेन का गाना प्रस्तूत किया था, जो श्री दूबेजीने शिड्यूल किया था । पर वे श्री लंका में होने के कारण अभी तक यह फिल्म देख़ नहीं पाये थे ।
जब श्री हरीशजीने रोहितहजी से कहा तब श्री रोहितजीने तय किया की श्री गोपाल शर्माजी को इस शॊमें आमंत्रित किया जाय । जब मूज़से उनका मोबाईल नं मांगा गया और श्री शर्माजी का सम्पर्क करके ज्नको न्योता दिया गया तब उनके स्वीकार करने पर ज्नसे मेरे परिचय के कारण मूझे भी न्योता दिया गया । इस तरह शुरूआती श्री रोहितजी, श्री क्रिष्नकांतजी (जिन्होंने सायगल साहबको अपने साथ तो नहीं पर अपनी फिल्म की शूटिंग के दौरान उसी समय उसी स्टूडियोमें अगल फ्लोर पर कोई और फिल्म की शूटिंग के समय देखा था ।), श्री हरीशजी और श्री शर्माजी के स्मयानूरूप बोलो के बाद श्री शर्माजी और श्री क्रिष्नकांतजी के बाजू वाली बेठक पर साथ साथ बेठ कर यह फिल्म देखने का अवसर प्राप्त हुआ । हालाकि इस सम्पर्क के लिये मेरे नाम का रोहितजी द्वारा कोई जिक्र नहीं किया गया था ।

श्री गोपाल शर्माजी के हिन्दीमें दिये गये छोटे से प्रासंगीक व्यक्त्व्य का मिल सका इतना अंश तथा श्री हरीश रधुवंशीजी का गुजराती व्यक्तव्य तथा श्री रोहितजी के गुजरातीमें कार्यक्रम संचालन का अंश आप नीचे सुन सकते है ।

MIC-015 - Copy.mp3


पियुष महेता । (सुरत)

Wednesday, January 30, 2008

प्रोग्राम बढ़िया तो था......लेकिन पता नहीं क्यों......

दो-तीन दिन से यही सोच रहा था कि इस तरह की टिप्पणी दूं कि नहीं, कभी दिमाग कहता था...छोड़ो, ऐसा लिखना ठीक न लगेगा, लेकिन अपना मन भी है न कि जब तक खुल कर सब कुछ ब्यां नहीं कर लेता उसे भी चैन कहां पड़ती है। सब से पहले तो युसूफ भाई का शुक्रिया की तीन चार दिन पहले सुबह ही उन की एक पोस्ट से यह पता लग गया कि आज शाम को विविध भारती के पिटारे में आईआईटी के छात्रों से बातचीत पर आधारित कार्यक्रम पेश किया जायेगा। लेकिन फिर भी पता नहीं ठीक वक्त पर कैसे मन से निकल गया...और इस का ध्यान प्रोग्राम के बीस-पच्चीस मिनट बीत जाने पर ही आया , वो भी तब जब बेटे ने इस तरफ मेरा ध्यान दिलाया। उस समय वह सवाल आईआईटिएन से पूछा जा रहा था, कि जब हम गांव शब्द कहते हैं तो उन के मन में कौन सी तस्वीर उभऱती है। संयोग की बात देखिए कि अगले दिन सुबह जब इसी प्रोग्राम को सुनना चाहा तो भी बीस-पच्चीस मिनट का कार्यक्रम बीत चुका था।

हां, हां, प्रोग्राम बढ़िया है, इस में कोई शक नहीं है, ....बात यह भी है न इस प्रोग्राम के माध्यम से हमें आज के समाज की क्रीम कही जाने वाले इन आईआईटिएऩ्स के मन में झांकने का मौका मिला। यह एक बहुत ही मुबारक पहल की है...ताकि दूर-दराज़ के गांव में बैठा ग्रामीण भी तो यह सुने कि उस जैसे करोड़ों लोगों से इक्ट्ठे किए गये टैक्स की बदौलत चल रहे इन आईआईटी संस्थानों में पढ़ रहे बिद्यार्थियों के मन में आखिर क्या चल रहा हैं....उन के हालात सुधारने की क्या रूपरेखा ये बना रहे हैं। निःसंदेह बहुत बहुत ही प्रशंसनीय पहल।

एक सुझाव तो यह है कि इस तरह के प्रोग्राम मैडीकल कालेजों, आईआईएम्स, लॉ-विश्वविद्यालयों इत्यादि के छात्रों को भी लेकर आगे मिलने चाहिए। हमें ऐसे प्रोग्रामों की बहुत बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।

हां, यह प्रोग्राम भी बढ़िया था...लेकिन फिर भी मुझे मज़ा नहीं आया। अपने आप से पूछ रहा हूं कि कहीं इस का कारण यह तो नहीं था कि बरामदे में लेटा हुया जब मैं यह सुन रहा था तो बेहद ज्यादा ठंडी की वजह से ठिठुर भी तो रहा था। लेकिन फिर असली कारण जो मुझे लगा उस का ध्यान आ ही जाता है कि .....प्रोग्राम की फार्मैट मज़ेदार नहीं था....टोटल दस सवाल....एक सवाल के बाद सभी छात्रों के बोलने की बारी......और हर बार छात्र का जवाब सुनाने से पहले ......श्री प्रवीण चोपडा.,,यमुनानगर हरियाणा से, आईआईटी रूड़की.....और साथ में हर बार --बार बार बजती वह सुरीले से गीत की ट्यून ...तेरी आँखें भूल भूलैंया....लेकिन बार बार यह सब कुछ सुनना परेशानी का बायस ही सिद्ध हो रहा था। अभी मैं यह सोच ही रहा था कि मेरे बेटे ने भी यह कमैंट मार ही दिया की पापा, यह आईआईआई वगैरह कुछ ज्यादा ही नहीं बोल रहे।

मैं भी उस की बात से पूरी तरह सहमत था ....इस प्रोग्राम के फार्मैट में यही गड़बड़ी लगी...और ऊपर से उस बढि़या से गाने की ट्यून की भी कुछ इतनी ज्यादा ओवरडोज़ हो गयी कि हर बार ऐसा लगने लग गया कि जैसे सिर पर हथौड़ा सा ही मारा जा रहा था।

वैसे इस बार बार नाम बताए जाने की बात प्रोग्राम पेश करने वालों को भी कुछ अजीब सी लग रही होगी। तभी तो रेडिया जाकी ने जाते जाते कह भी दिया...अब इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले छात्रों के नाम श्रोताओं को क्या बताएं....वो तो उन्हें वैसे ही याद हो गये होंगे।

बिलकुल सही , युसूफ भाई , सभी नाम लगभग याद ही हो गये थे। आशा है कि आप इस प्रोग्राम के प्रोड्यूसर तक यह बात पहुंचाने का कष्ट करेंगे। हो सके तो ....आगे से कुछ इस तरह का हो कि सब छात्रों को एक ही जगह इक्ट्ठा कर के ऐसे प्रोग्राम की रिकार्डिंग की जाये.....ताकि उस में इन छात्रों की स्पोनटेयटिटि की सही तसवीर उभरे....और इस तरह के प्रोग्राम का इतना तरतीब से पेश किया जाना भी थोडा़ रास नहीं आया। अब एक प्रश्न किया है और अगर प्रोग्राम में भाग लेने वाले छात्र एक ही जगह पर एकत्रित हैं , तो जिस का मन करे पहले बोले.....जब तक दूसरा कुछ सोच ले। बस , यही बात रेडियोनामा तक पहुंचा कर मन हल्का सा हो गया है।

बापू को समर्पित …

यह मेरा सौभाग्य है कि आज के दिन मुझे रेडियोनामा पर अपना पचासवां चिट्ठा लिखने का अवसर मिला है।

आज विविध भारती पर प्रसारण की शुरूवात मंगल ध्वनि के स्थान पर बापू के प्रिय भजन वैष्णव वचन से हुई। फिर समाचार के बाद वन्दनवार की शुरूवात में फिर से सुनने को मिला वैष्णव वचन क्योंकि मंगल ध्वनि के स्थान पर प्रस्तुति तो क्षेत्रीय थी। फिर हुई प्रार्थना की बातें।

बापू ने सदैव ही प्रार्थना पर बल दिया। उनका मानना था कि प्रार्थना से ही हम मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो सकते है। वन्दनवार की प्रस्तुति ने आज एक बार फिर से जैसे बापू की बातों को दोहरा दिया।

बहुत ही सौम्य प्रस्तुति रही रेणु (बंसल) जी की, सधा हुआ स्वर, सटीक वाक्य, चुने हुए शब्द जैसे प्रार्थना के बोल।

कार्यक्रम की समाप्ति पर गोपाल सिंह नेहपाली का लिखा सुरेश वाडेकर के स्वर में देशगान -

तुम कल्पना करो नवीन

इसके बाद शुरू हुआ क्षेत्रीय प्रसारण जिसमें अर्चना कार्यक्रम में स्वामी कंठानन्द के हिन्दी भक्ति पदों के तेलुगु में अनुवादित पद पी सुशीला और रामाकृष्णा के स्वरों में प्रस्तुत हुए।

फिर बारी आई भूले-बिसरे गीतों की जिसकी शुरूवात आज बलिदान दिवस के अवसर पर देशभक्ति गीत से हुई। विराम (ब्रेक) के बाद बजा उपदेशात्मक गीत और समापन कुन्दनलाल (के एल) सहगल की आवाज़ में सूरदास फ़िल्म के गीत से।

इस तरह आज के विशेष दिन के लिए प्रार्थना, भक्ति, देशभक्ति, समाज के प्रति जागरूकता का संदेश लिए बहुत ही संतुलित रही सवेरे के प्रसारण की शुरूवात।

Monday, January 28, 2008

आकाशवाणी पटना और ये ग़ज़ल....

बात तब की है जब मैं आठवीं या नवीं में रहा होउंगा और रेडियो हमारा हमराह हुआ करता था, कमसे कम सुबह के पाँच बजे से 9:30 तक और शाम 5:30 से रात के 11 बजे तक। ये बात अलग थी कि रेडियो को कुछ समय के लिए हमें दूर से ही सुनना पड़ता था यूँ कहें कि रेडियो पापा के पास होता दूसरे कमरे में और हम तीनों भाई-बहन पढ़ते दूसरे कमरे में।

सवेरे 8:30 में प्रादेशिक समाचार आकाशवाणी रांची से उसके बाद आकाशवाणी भागलपुर से शास्त्रीय गायन। उसी समय एक दिन मैंने रेडियो का कान उमेठा और पहुँच गए आकाशवाणी पटना के उर्दू प्रोग्राम में। सोचा उफ़! यहाँ भी चैन नहीं।
तभी अनाउंसर ने कहा - आइये सुनते हैं ग़ज़ल , आवाजें हैं अहमद हुसैन और मोह्हमद हुसैन की। मैंने फिर सोचा ये कौन नए साहब हो गए. उस समय मैं तो उन्ही तीनों का नाम जानता था,उसके अलावा कौन.

खैर, ग़ज़ल शुरू हुई। और जनाब! क्या खूब शुरू हुई। क्या खूब शायरी उस पर क्या नफासत भरी उम्दा आवाज़, दिल का गोशा-गोशा मानो रौशन हो उठा।

सच जैसा उन्होंने कहा था.... "चल मेरे साथ ही चल..." दिल उन्हीं दो आवाजों के पीछे चल ही तो पड़ा.जनाब अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन साहब की दिलकश आवाजें उस दिन पहली बार उस शानदार ग़ज़ल के रूप में सुनी और उनका बस मुरीद होकर रह गया।

"पीछे मत देख, ना शामिल हो गुनाहगारों में,
सामने देख कि मंजिल है तेरी तारों में॥
बात बनती है अगर दिल में इरादे हों अटल..
चल मेरे साथ ही चल........"


आकाशवाणी पटना का वो उर्दू प्रोग्राम फिर तो मेरा पसंदीदा कार्यक्रम ही बन गया जिसके जरिये मैंने अनेक शायरों के कलामों को सुना। पर उन सबकी चर्चा बाद में।

आज तो आप सुनें मेरी वही पसंदीदा ग़ज़ल जिसे अपनी आवाज़ से संवारा है जनाब अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन साहब ने.....

( आप इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ सकते है और अपनी टिप्पणियाँ रख सकते है।)




Ahmed & Mohd. Hus...

अक्स और आवाज़

आज मैं क्षेत्रीय केन्द्र के एक कार्यक्रम के बारे में जानकारी देना चाहती हूं। आकाशवाणी हैदराबाद से पहले प्रसारित होता था एक कार्यक्रम - अक्स और आवाज़

जैसा कि नाम से ही समझा जा सकता है कि इस कार्यक्रम में अक्स और आवाज़ दोनों की चर्चा होती थी। 15 मिनट के इस कार्यक्रम में एक ही अक्स और एक ही आवाज़ के गीत सुनवाए जाते थे।

एक प्रसारण के बारे में बताऊं -

उदघोषणा हुई - आज के अक्स और आवाज़ कार्यक्रम में अक्स है रेखा का और आवाज़ है लता की। फिर तीन ऐसे गीत सुनवाए गए जो लता के गाए और रेखा पर फ़िल्माए गए थे जैसे घर फ़िल्म का गीत -

आजकल पांव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे
बोलो देखा कभी तुमने मुझे उड़ते हुए

कार्यक्रम की ख़ास बात ये थी कि एकल (सोलो) गीत बजा करते थे ताकि एक ही अक्स और आवाज़ का आनन्द लिया जा सकें।

कुछ कार्यक्रम बहुत अच्छे लगे जिनमें अक्स और आवाज़ की ये जोड़ियां थी -

शम्मी कपूर और रफ़ी, राज कपूर और मुकेश, राजेश खन्ना और किशोर कुमार।

लता के नई पुरानी अलग-अलग नायिकाओं के साथ ऐसे कई कार्यक्रम हुए जैसे - मुमताज़, माला सिन्हा, वैजयन्ती माला, मीना कुमारी, मधुबाला, हेमामालिनी…

गीतों के साथ दोनों ही कलाकारों के बारे में थोड़ी सी जानकारी भी दी जाती थी। लेकिन ये कार्यक्रम लम्बे समय तक नहीं चल पाया।

Sunday, January 27, 2008

आज शाम चार बजे विविध भारती पर यूथ एक्‍सप्रेस में सुनिए IIT के छात्रों के साथ विशेष कार्यक्रम

अचानक याद आया कि रेडियोनामा के पाठकों को एक ज़रूरी सूचना देनी तो रह ही गयी ।

दरअसल पिछले महीने यानी दिसंबर में विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती का विशेष आयोजन जुबली झंकार प्रसारित किया गया था । जिसमें IIT mumbai के छात्रों ने हिस्‍सा लिया था । इन छात्रों में मुंबई के युवा ब्‍लॉगर विकास भी शामिल थे । बहरहाल आज शाम चार बजे यूथ एक्‍सप्रेस में इसी कार्यक्रम का एक घंटे वाला संस्‍करण सुनवाया जा रहा है । ज़रूर सुनिए और बताईये कि कैसा लगा ये कार्यक्रम । आपको बता दें कि मूल रूप से ये कार्यक्रम डेढ़ घंटे का था ।

Friday, January 25, 2008

कभी किसी फ़ौजी भाई की आवाज़ नहीं सुनी

विविध भारती के सबसे पुराने कार्यक्रमों में से है जयमाला। हमेशा से ही इस कार्यक्रम का स्वरूप लगभग एक जैसा रहा है। बहुत ही हल्का सा परिवर्तन इसमें नज़र आया।

सालों से सुन रहे है शाम का समय और फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर बज उठते है गीत। वही एक तरीका - फ़िल्म का नाम, गीतकार संगीतकार गायक का नाम, फ़ौजी भाइयों के नामों की सूची उनके पदनामों के साथ जैसे हवालदार, ग्रेनेडियर (शायद लिखने में ग़लती हो), मेजर, पहले ये पदनाम बहुत सुनाई देते थे - लांसनायक और रेडियो आपरेटर

शनिवार आया तो प्रसारित हो गई विशेष जयमाला जिसमें किसी फ़िल्मी हस्ती की आवाज़ सुनाई देती है और साथ में बजते है उस हस्ती की मर्ज़ी से कुछ गीत।

कुछ समय से रविवार को जयमाला संदेश कार्यक्रम प्रसारित होता है। इसमें भी पत्र ही पढे जाते है। कभी किसी फ़ौजी का पत्र परिवार वालों के लिए तो कभी परिवार के लोग अपने फ़ौजी भाई के नाम संदेश भेजते है।

मुद्दा ये कि जयमाला में फ़ौजी भाइयों की आवाज़ सुनाई नहीं देती है। अन्य कार्यक्रमों में हम श्रोताओं की आवाज़ सुनते है।

हैलो फ़रमाइश में श्रोता फोन पर बात करते है और अपनी पसन्द के गीत बताते है। हैलो डाक्टर में डाक्टर साहेब बीमारियों की बात करते है। मंथन में श्रोता फोन पर किसी मुद्दे पर चर्चा करते है।


और तो और विविध भारती परिवार की नई-नवेली सदस्या सखि-सहेली को देखिए। विविध भारती परिवार में सखि-सहेली का जन्म हुआ तीन साल पहले और इतनी कम आयु में हर शुक्रवार फोन पर कहती है - हैलो सहेली और देश के कोने-कोने की सहेलियों से बतियाती है। फिर जयमाला में फ़ौजी भाइयों की आवाज़ क्यों नहीं ?

रोज़ सवेरे-शाम मैं जहां से गुज़रती हूं वहां रास्ते में एक मिलिट्री स्टेशन है। बहुत बड़ा परिसर है। यह वही जगह है जहां पिछले साल विश्व स्तर पर खेलों का आयोजन हुआ था। ऐसी और भी सैनिक छावनियां है शहर में। अन्य शहरों में भी सैनिक छावनियां है।

अच्छा लगेगा अगर विविध भारती की टीम इन छावनियों में ड्यूटी पर तैनात सैनिकों से बात करें और इस रिकार्डिंग को जयमाला में उन्हीं की फ़रमाइश के गीतों के साथ प्रस्तुत करें।

हम सुनना चाहते है फ़ौजी भाइयों की आवाज़। बंदूक थामे लोहे के हाथ वाले इन फ़ौजी भाइयों की आवाज़ क्या गरजदार रौबदार है या शहद सी मीठी है।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर विविध भारती से यही मेरा अनुरोध है। आप सबको

गणतंत्र दिवस की बधाई !

Wednesday, January 23, 2008

सारा एफएम अब हाथों में

अपने मोबाइल फोन के विज्ञापन में रिलायंस कंपनी ने कहा - सारा जहां अब हाथों में

यह कुछ हद तक सच है। आज कई सुविधाएं मोबाइल फोन में है और कई सुविधाएं देने के प्रयास किए जा रहे है। विविध भारती ने भी अपने मंथन कार्यक्रम में इस पहलू को छुआ है।

पिछली बार मंथन में चर्चा का विषय था मोबाइल फोन की कैमरा और वीडियो रिकार्डिंग जैसी सुविधाओं के बुरे प्रभाव। ख़ैर यह अलग मुद्दा है। आज हम चर्चा कर रहे है मोबाइल फोन की एक ही सुविधा की, और वो है - रेडियो

कुछ समय पहले स्थिति ये थी कि क्रिकेट मैच होने पर लोग जब घर से बाहर निकलते थे तो कान से ट्रांज़िस्टर लगाए रहते थे। क्रिकेट की बात न भी करें तो घर से बाहर रहने का मतलब होता था रेडियो से दूर रहना।

घर से बाहर अगर रेडियो सुनना होता तो छोटा सा ट्रांज़िस्टर साथ में रखना पड़ता था जिसके लिए नियमित सेल खरीदने होते। जब सेल नए होते तो खोलते ही तेज़ आवाज़ आती जिसे कम नहीं किया जा सकता और सेल जब पुराने होने लगते तो कान से लगा कर सुनना पड़ता यानि अच्छा ख़ासा व्यायाम होता तिस पर औसत आवाज़ में सुनना कभी- कभी मुश्किल होता और जो पास होते उन्हें भी तकलीफ़ होती।

ये मेरा अपना अनुभव है कि जब भी सेल नए हुए कि आवाज़ कमरे से निकल कर गलियारे तक गूंजी और कार्यालय का शिष्टाचार भंग हुआ। जब से मोबाइल फोन पर रेडियो सुनने की सुविधा मिली तब से ऐसी कोई दिक्कत नहीं।

मोबाइल फोन पर अन्य सुविधाएं तो फोन की कीमत के साथ-साथ बढ रही है लेकिन रेडियो की सुविधा तो सस्ते फोन में भी है।

सिर्फ़ विविध भारती की केन्द्रीय सेवा ही नहीं क्षेत्रीय एफएम चैनल भी सुने जा सकते है। रेडियो की तरह बार-बार फ्रिक्वेन्सी सेट करने की भी ज़रूरत नहीं, एक बार फ्रिक्वेन्सी के नंबर फीड कर दीजिए फिर बटन दबाते जाइए और एक के बाद एक चैनल सुनते जाइए।

अपने सामने मेज़ पर फोन रख कर आवाज़ जितनी चाहो उतनी रख सकते हो। यात्रा पर हो तो बैग में फोन रख लो और हेड फोन का प्लग कान में लगा लो। केवल एक कान में प्लग लगा कर भी रेडियो का आनन्द ले सकते है। अब कभी कोई कार्यक्रम सुनने से नहीं चूक सकते।

मंथन में तो बात चली बुरे प्रभाव की मगर हम तो कहेगें कि फोन ने तो विविध भारती से श्रोताओं को अधिक जोड़ दिया। मंथन में कहा गया कि हर जेब में मोबाइल, तो जनाब ! हर जेब में विविध भारती भी तो है।

Tuesday, January 22, 2008

निर्बल से लड़ाई बलवान की .....

निर्बल से लड़ाई बलवान की ये कहानी है दिए कीऔर तूफ़ान की नौ बजे उजाले उनकी जिंदगी के नाम का कार्यक्रम रहा थाजिसमे फिल्म अभिनेत्री नंदा से कमल शर्मा जी बात कर रहे थेवैसे पहले तो शायद ये कार्यक्रम नही आता था क्यूंकि अस्सी और नब्बे के दशक मे तो हम रेडियो सुनते ही थे पर जहाँ तक हमे याद पड़ता है दिल्ली या इलाहाबाद मे हमने कभी भी ये कार्यक्रम नही सुना था

नंदा की बातचीत तो अच्छी लगी साथ ही बहुत ही पुराना गाना भी सुनने को मिलापहले तो खैर रेडियो पर ये गाना सुनते ही थे पर आज यू टियुब की बदौलत इसे इतने सालों बाद देख भी रहे है



और रेडियो पर इस गाने को सुनकर कहीं से भी नही लगा की ये कोई पुराना गाना हैएक-एक शब्द बहुत ही अर्थपूर्णआज के संगीतकार और गीतकार ना तो ऐसा गाना लिखते है और ना ही बनाते हैफिल्म मे तो ये गाना एक बच्चे पर फिल्माया गया है पर आज की भागती दौड़ती जिंदगी मे भी ये गाना बिल्कुल फिट बैठता है कि किस तरह मनुष्य जीवन मे संघर्ष करता रहता है

Monday, January 21, 2008

एफ.एम.रेडियो और ये गीत

बात उन दिनों की है जब दिल्ली मे रेडियो एफ.एम.शुरू हुआ था और जिसने रेडियो को एक अलग ही तरह का बना दिया था. हर उदघोषक श्रोताओं से बात करता सा लगता थातब के एफ.एम.और आज के एफ.एम मे बहुत कुछ बदल सा गया है. पहले एफ.एम मे लोग बातें तो करते थे पर गीत भी सुनवाते थे पर आजकल तो बातें ही बातें होती हैगीत तो आधे-अधूरे ही सुनवाते है

ये गीत जब कोई बात बिगड़ जाये ,जब कोई मुश्किल पड़ जाये एफ.एम पर नियमित रुप से बजने वाला गीत था
वैसे ये गीत बहुत पुराना नही है नब्बे के दशक की फिल्म जुर्म का हैजुर्म फिल्म तो कोई खास नही चली थी पर ये गीत बहुत चला थाये गाना हमे भी बहुत पसंद हैपहले तो हम इसेरेडियो पर सुनते थे पर आज हम इसका विडियो यहां लगा रहे हैउम्मीद है आपको भी पसंद आएगा







शुरू-शुरू मे एफ.एम.मे दिन भर मे कम से कम तीन से चार बार ये गीत जरुर बजता था पर अब ये गीत कम ही सुनाई देता हैहर उद्घोषक वो चाहे हेलो एफ.एम.का हो या हेलो फरमाइश का हो या आपके ख़त का हो इस गाने को जरुर बजवाता थाऔर ये गाना भी ऐसा है की हर situation पर बिल्कुल फिट बैठता थाकैसे तो वो ऐसे


आपके ख़त कार्यक्रम मे अक्सर लोग (लड़के-लड़कियां)पूछते थे की उनके दोस्त नाराज हो गए है या किसी की गर्ल फ्रेंड रूठ गयी है और उससे बात नही कर रही हैऔर वो उसे कैसे मनाएंतो उदघोषिका उन्हें गर्ल फ्रेंड को मनाने के उपाय बताती थी और ये गाना भी सुनवाती थीऔर साथ ही ये कहती की इस गाने को सुनकर नाराज लोग जरुर मान जायेंगेबॉस नाराज है तो भी ये गीत चल जाता थाकई बार लोग आपनी परेशानियाँ भी बताते थे तो भी उदघोषक ये गीत बजवाते थे


अब पता नही उन लोगों की समस्या हल होती थी या नही पर ये गाना लोगों को खूब सुनने को मिलता था

पृथ्वीराज चौहान का कभी ख़ुशी कभी ग़म

पृथ्वीराज चौहान के बारे में हम सिर्फ़ इतना ही जानते है कि स्वयंवर के दौरान संयोगिता का हरण किया और शब्द बेधी बाण चलाने में माहिर और जयचंद के साथ बैर। इसके अलावा आजकल स्टार प्लस के धारावाहिक में जो कुछ भी बताया जा रहा है उसमें से बहुत ही कम हमारी जानकारी में हैं।

आप सोच रहे होगें रेडियोनामा में स्टार प्लस के धारावाहिक की चर्चा क्यों ? हम चर्चा करना चाहते है उन दृश्यों की जो कई एपिसोडों में दिखाए जा चुके हैं। ये भावुक दृश्य है संयोगिता और पृथ्वी के।

जब भी इनका मिलना, बिछड़ना और तकरार नज़र आया पार्शव में उभरा आज के दौर का लोकप्रिय कभी ख़ुशी कभी ग़म का शीर्ष संगीत। जैसे ही संगीत उभरता है दृश्य तो और भी भावुक लगने लगता है पर धारावाहिक इतिहास की सारी सीमाएं तोड़ कर बाहर निकल आता है।

सच में पार्शव संगीत हो या शीर्ष संगीत, पूरे कार्यक्रम के माहौल को बनाए रखते है। टेलीविजन में तो दिखाई देता है इसीलिए संगीत का महत्व थोड़ा सा कम हो सकता है पर रेडियो में तो सिर्फ़ आवाज़ से ही माहौल बनता है इसीलिए संगीत का चयन यहां बहुत कठिन होता है।

आज जितने भी कार्यक्रमों के शीर्ष संगीत विविध भारती पर सुनाई देते है उन सभी का चयन उम्दा हैं। संगीत सुन कर ही समझ में आ जाता है कि कार्यक्रम का विषय क्या है।

वन्दनवार का शीर्ष संगीत बजता है तो लगता है कि भोर हो आई है और अब हमें नए दिन की शुरूवात करनी है, अच्छे विचारों से, अच्छे भावों से। संगीत सरिता का शीर्ष संगीत बजता है तो लगता है कि अब पारम्परिक संगीत सुनने को मिलेगा।

मंथन का संगीत तो ऐसे है जैसे कोई गहराई तक मथ रहा है। बीच में बजने वाला संगीत भी विषय के अनुसार होता है। इतना ही नहीं रेडियो के नाटकों में भी प्रयोग किया जाने वाला संगीत नाटक के विषय, समय और संस्कृति को पूरी तरह उभारता है।

Friday, January 18, 2008

कोयलिया बोले अमवा की डाल पर

आज सुबह संगीत सरिता में श्रृंखला कार्यक्रम ध्रुपद धमाल का सुरीला संसार की अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। आठ कड़ियों की इस श्रृंखला में ध्रुपद गायकी से परिचित करवाया उदय भवालकर जी ने।

संगीत के क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत वैसे ही एक कठिन विधा है इस पर ध्रुपद गायकी तो और भी कठिन है लेकिन इसे समझने में इस श्रृंखला से बहुत सहायता मिली।

बहुत ही सरल शैली में सहजता से इसकी बारीकियों को बताया गया। साथ ही विभिन्न रागों में इसके सुर-ताल की बंदिशे भी प्रस्तुत की गई। मुझे सबसे अच्छी लगी राग सोनी पर आधारित प्रस्तुति।


आज अंतिम कड़ी में राग मालकौंस प्रस्तुत हुआ। जब मैनें इसकी बंदिश सुनी तो मुझे याद आ गई बचपन की संगीत कक्षा जहां हमारी शिक्षिका श्रीमती कमला पोद्दार ने हमें इस राग में एक बंदिश सिखाई थी जिसके बोल थे -

कोयलिया बोले अमवा की डाल पर
ॠतु बसन्त की देत सन्देशवा

विविध भारती के इस कार्यक्रम से तो रसिक श्रोताओं को आनन्द आता ही है और मेरे जैसे श्रोता भी इसकी हर कड़ी से अपने आपको कुछ अधिक जानकर महसूस करने लगते है। विशेषकर रूपाली (रूपक - कुलकर्णी) जी की हर प्रस्तुति पारम्परिक संगीत के ज्ञान को बढाती ही रही।

Wednesday, January 16, 2008

रेडियो पर हमारा पहला कार्यक्रम

सत्तर के दशक मे जब पहली बार हमने रेडियो पर गिटार बजाया था वो दिन आज तक नही भूला हैउस समय युववाणी कार्यक्रम जो की आज भी आता है उसमे शास्त्रीय संगीत बजाने के लिए गिटार क्लास की हम - लड़कियां अपने मास्साब के साथ तय समय पर यानी ठीक ग्यारह बजे रेडियो स्टेशन पहुंच गयी थीऔर हम सभी लड़कियां जितनी उत्साहित थी उतनी ही डरी हुई भी थीउत्साह इस बात का की हमें बहुत सारे लोग सुनेंगे और डर इस बात का था की कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जायेआख़िर पहला-पहला मौका जो था रेडियो पर बजाने का


अपने गिटार बजाने से ज्यादा डर इस बात का था की कहीं तबले पर संगत करने वाले ने ठीक से नही संगत की तो मुश्किल हो जायेगीक्यूंकि वहाँ बाहर के कलाकार नही बल्कि रेडियो स्टेशन के तबला वादक ही सबके साथ संगत करते थेइस बात का भी डर था की अगर कहीं सम गड़बड़ हुआ तो रेडियो वाले तबला वादक पता नही सम मिलाएँगे भी या नही क्यूंकि क्लास मे तो हम लोगों के तबला मास्टर अगर हम लोग इधर-उधर हो जाते थे तो सम मिला लेते थे

खैर जब रेकॉर्डिंग के लिए हम रेकॉर्डिंग रूम मे गए और हमने यमन कल्याण बजाना शुरू किया तो उसके बाद हमे याद नही कि कहीं सम छूटा भी था क्यूंकि उन तबला वादक ने बहुत ही अच्छी संगत की थीऔर तब समझ मे आया की हम नाहक ही डर रहे थे

रेस की घोड़ी

रेडियोनामा के ब्लोग पर ऐसा शीर्षक पढ कर ही समझ में आ जाता है कि बात चल रही है हवामहल की। आपमें से बहुतों को याद भी आ गई होगी दिलीप सिंह की लिखी झलकी - रेस की घोड़ी

वैसे तो दिलीप सिंह ने हवामहल के लिए और भी झलकियां लिखी लेकिन मेरे लिए तराज़ू के एक पलड़े में सारी झलकियां है और दूसरे पलड़े में है रेस की घोड़ी

विषय की अगर बात करें तो इसका विषय सभी के लिए नहीं है। ऐसे विषय आमतौर पर वयस्कों के लिए होते है लेकिन लेखक का कमाल है कि यह परिवार के साथ बैठ कर सुनने का विषय बन गया है।

यह वयस्कों का विषय है - पति, पत्नी और वो

पति है रामलाल, पत्नी है कमला और वो है रीटा। क्या चयन है नामों का, लगता है साधारण जनता के नाम है। पूरी झलकी में ये तीनों ही है जिसमें से बड़ा हिस्सा पति-पत्नी की नोक-झोंक है जो हवामहल की ख़ास पहचान है।

रविवार की शाम है पति घर से बाहर जाना चाहता है प्रेमिका से मिलने पर अकेले बाहर निकलने का बहाना नहीं सूझ रहा और इसी उलझन में वह पता नहीं क्या-क्या बोल रहा है जो बातें तो बेवकूफ़ी की है पर अच्छा हास्य का माहौल बनाती है -

पत्नी - आजकल अख़बार में ऐसी ख़बरें (परलोक सिधारने की ख़बरें) कम आती है
पति - आजकल गर्मिया है न लोग शहर में है नहीं पहाड़ों पर गए है इसीलिए

पूरी झलकी में हास्य बना रहा पर शालीनता रही। जैसे -

पत्नी को शक होने लगता है तो पति उसे समझाता है कि शक करना बुरी आदत है तब पत्नी कहती है कि वह शक करने पर मजबूर हो जाती है -

पत्नी - तुम मुझे अपने साथ पार्टियों में क्यों नहीं ले जाते
पति - (मन में कह रहा है) तुम को साथ ले कर जाना तो ऐसे है जैसे पुलिस को साथ लेकर चोरी करने जाना।

फिर पत्नी को विश्वास तो हो जाता है कि पति के कोट पर लगा निशान लिपिस्टिक का नहीं रेस के टिकट देने वाली के सिंदूर का है जो उसने शगुन के तौर पर रेस जीतने के लिए लगाया, कोट पर पड़ा लम्बा बाल घोड़ी की दुम का है और जेब से निकला नंबर फोन नंबर नहीं बल्कि उस मैदान की लंबाई है जहां रेस होती है तभी आ धमकती है रीटा।

दरवाज़े पर ठेठ भारतीयपन देखिए -

रीटा - वो तुम्हारा पति है, वो तो मेरा ब्वाय फ़्रेंड है
पत्नी - ब्वाय फ़्रेंड की बच्ची, (और रीटा के बाल हाथ में आ जाते है)

और पत्नी का कहना - वो आई थी तुम्हारी रेस की घोड़ी रीटा और पति का कहना - अब कभी नहीं खेलूंगा ऐसी रेस।

इस विषय पर कई कहानियां लिखी गई, फ़िल्में बनी लेकिन कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा रहा जो परिवार के साथ बैठ कर आनन्द लेने से रोकता रहा पर इस झलकी में वो बात नहीं रही। तभी तो हवामहल कार्यक्रम ख़ास है और ख़ास है विविध भारती।

Tuesday, January 15, 2008

साझ और आवाझ

आज जब त्रिवेणी कार्यक्रम के बारेमें श्री अफलातूनजी की पोर्ट पढ़ रहा था तब रात्री ११ बज कर ५ मिनिट होने वाले थे और इस पोस्ट का अन्तिम भाग जो साझ और आवाझ से सम्बंधित था उसमें उन्होंने जो साझ और कलाकारों का जिक्र किया है उनमें से एक जिन्होंने मूझे धून बजानेवालों में से सबसे पहेले आकर्षित किया था वैसे कलाकार श्री एनोक डेनिएल्स साहब की पियानो एकोर्डिय्न पर बजाई हुई धून जो ज्नकी इ. स. १९६६ की लोन्ग प्ले रेकोर्ड्में से है , फिल्म आयी मिलन की बेला के गीत मैं प्यार का दिवाना श्री राजेन्द्र त्रिपाठी साहब कार्यक्रम विवरण के बाद बजा रहे थे । हा~ यह बात जरूर थी की इस धून के बारेमें कुछ भी बताया नहीं गया और स्वाभाविक है कि सिर्फ़ धूनों के शुरू के आधे हिस्से ही हर हमेश बजते है । और एक कभी कभी ही श्री कमल शर्माजीने अपनी बारीमें सिर्फ़ पियानो बादक ब्रियान सिलास का नाम ही बताया है । यह बात और है कि मैं इस बारेमें अपने बचपनसे ही शोखीन रहा हू~ इस लिये ध्होन सुनते ही साझ और कलाकार मेरे दिमागमें याद आ ही जाते है, और इसी तरह आज भी आ गये । श्री युनूसजी, उनकी घरकी और दफ़तर की साथी श्रीमती ममताजी, श्री कमल शर्माजी, श्री अशोक सोनावणेजी, श्री रेणू बन्सलजी, श्रीमती निम्मी मिश्राजी, श्री महेन्द्र मोदी साहब तथा विविध भारती के अभी बंध हो गये फोन इन कार्यक्रम के नियमीत श्रोतावर्ग तथा रेडियो श्रीलंकाकी श्रीमती पद्दमिनी परेराजी तथा श्रीमती ज्योति परमारजी सब मेरे इस फिल्मी धूनो के शौक़ से पूरे वाकिफ़ है । इस लिये श्री अफलातूनजी से मेरा विनम्र निवेदन है और साथमें इस ब्लोग के युनूसजी को छोड़ और पाठक-गणसे निवेदन है की इस तरह की छुट-मूट की धूनों की प्रस्तूती के अलावा एक फिल्मी धूनोका नियमित कार्यक्रम जो इन माहितीयो~ के साथ प्रस्तूत करने के लिये विविध भारतीको बार बार पत्र्रवलिमें पत्र लिखें । मैं कई बार लिखं चूका हू~ और श्री महेन्द्र मोदी सागब को दो तीन बार रूबरू भी कह चूका हू~ । रेडियो श्रीलंकासे हर शनिवार रात्री करीब ८.३० पर साझ और आवाझ होता है, जो भी एक समय वे लोग बंध करने वाले थे , तभी संयोगसे उस समयकी इस कार्यक्रमकी प्रस्तूतकर्ता श्रीमती पद्दमिनीजी से मेरी इस कार्यक्रमके मेरे शोक़से सुनने के बारेमें मेरी बात हुई, और वहा~ यह कार्यक्रम भूत्पूर्व होते होते बग गया ।
पियुष महेता ।

दिल नाउम्मीद तो नहीं , नाकाम ही तो है: त्रिवेणी


दिल नाउम्मीद तो नहीं , नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम , मगर शाम ही तो है ।

तीन चार दशक पहले के गीतों में जैसे कभी कभी एक शेर के बाद गीत शुरु होता था ! लेकिन यह गीत उतना पुराना नहीं । 1942 - A Love Story का है । इस शेर की पहली पंक्ति से समतावादी विचारक ओमप्रकाश दीपक की बात याद आ जाती है : 'हार सकता हूँ , बार - बार हार सकता हूँ लेकिन हार मान कर बैठ नहीं सकता हूँ ।'


रेडियोनामा की इस प्रविष्टि के पीछे प्रेरणा है विविध भारती के कार्यक्रम त्रिवेणी की । जिससे जुड़ कर कोई कम्पनी अपने इश्तेहार में पूछती है : "सुबह सुबह पौने आठ बजे त्रिवेणी सुनते हैं या नहीं ? दिन खुश हो जाता है" त्रिवेणी में एक थीम पर तीन गाने होते हैं जिनके बीच में युनुस भाई या उनके बन्धु - बान्धव तीनों गीतों को पिरोने वाले सूत्र के रूप में तत्त्व-चर्चा करते हैं । सिर्फ़ तीन गीतों का छोटा सा कार्यक्रम , पन्द्रह मिनट का । तत्व - चर्चा के काबिल मैं खुद को नहीं मानता ।
दूसरा गीत दूर का राही फिल्म का है , किशोर कुमार की आवाज में- 'पंथी हूँ मैं उस पथ का , अंत नहीं जिसका' । धुन और बोल रवीन्द्रनाथ ठाकुर के एक गीत से प्रेरित हैं। आपात काल के दौरान मेरे भाई के मित्र राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रचारक और बाद में पांचजन्य , माया और अमर उजाला से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रबाल मैत्र वह एल पी रेकॉर्ड मेरे घर लाये थे । इस गीत को बार बार सुनते थे । मेरी माँ ने सुनते ही उसका मूल गीत बता दिया था । हिन्दी फिल्मों में कई ऐसे गीत लोकप्रिय होते थे जिनकी धुन पर बने बाँग्ला गीत दुर्गा पूजा के समय जारी हो चुके होते थे । यह गीत ऐसे गीतों से कुछ अलग है । उन गीतों की धुन आम तौर पर बंगाली संगीतकारों की होती थी। यह गीत तो गुरुदेव के गीत से सीधे प्रेरित है। तलत महमूद का गाया 'राही मतवाले' ( ओ रे, गृहवासी ,खोल द्वार खोल ,लागलो जे दोल) ,किशोर कुमार का ही - 'छू कर मेरे मन को' (तोमार हलो शुरु ,आमार हलो शारा) आदि गीत रवीन्द्र संगीत से प्रेरित हैं ।



त्रिवेणी के इस संविधानेतर अंक का अन्तिम गीत भी किशोर कुमार की आवाज में है । १९६४ में जारी फिल्म 'दूर गगन की छाँव में ' फिल्म का शैलेन्द्र का लिखा गीत 'आ चल के तुझे , मैं ले के चलूँ इक ऐसे गगन के तले '। इस गीत की शुरुआत में हो बाँसुरी बज रही है वह फिल्म में ७-८ वर्ष का एक गूँगा बालक बजा रहा है। रिलीज होने के दो तीन साल बाद जब मेरे विद्यालय में यह दिखाई गई थी तब मेरी उम्र भी उतनी ही थी इसलिए मेरे बाल मन को यह गीत और पूरी फिल्म छूती थी । गीत में माउथ ऑर्गन के प्रयोग ने भी उसे आकर्षक बनाया होगा क्योंकि मेरे भाई काफ़ी अच्छा माउथ ऑर्गन बजाते हैं । साज की बात चली है तो साज और आवाज जैसे कार्यक्रमों की चर्चा जरूरी है। रेडियो सिलोन और विविध भारती दोनों पर वाद्य यन्त्रों (माउथ ऑर्गन,गिटार,पियानो एकॉर्डियन,सैक्सोफोन आदि पर फिल्मी गीतों की धुन बजाई जाती थी। एनॉक डैनियल ,मदन कुमार,और सलिल गाँगुली जैसे कलाकारों के बस अब नाम याद हैं,उनके बजाए गीत अब नहीं सुनाए जाते।
अन्तिम गीत की यह पंक्तियाँ -
कहीं बैर न हो ,कोई गैर न हो
सब मिल के यूँ चलते चलें

ऐसी बातों को छद्म सेक्युलरवाद कहने वाली जमात तब काफ़ी कमजोर रही होगी। वह जुमला(छद्म सेक्युलरवाद) भी बाद में पैदा हुआ ।

Monday, January 14, 2008

आवाज दे कहां है

शीर्षक पढ़ते ही आपमें से कुछ लोगों के मुंह से निकला होगा - मल्लिका - ए - तरन्नुम - नूरजहां और साथ ही कानों में गूंजने लगा होगा फिल्म अनमोल घडी का गीत -

आवाज दे कहां है
दुनिया मेरी जवां है

फिर एक अंतरे के बाद उभरती सुरेन्द्र की आवाज।

इसी फिल्म का एक और गीत जिसमें तीन आवाजे है - नूरजहां , सुरैया और सुरेन्द्र की। गीत के बोल मुझे याद नहीं आ रहे।

साथ ही एक और गीत याद आ रहा है -

जवां है मोहब्बत
हसीं है समा

ये गीत बहुत पहले फरमाइशी गीतों की तरह बजा करते थे। फौजी भाई तो आवाज दे कहां है की फरमाइश बहुत किया करते थे।

बाद में ये गीत भूले-बिसरे-गीत कार्यक्रम में बहुत बजने लगे थे। अब तो ज़माना बीत गया नूरजहां की आवाज सुने।

वैसे नूरजहां के हिन्दी फिल्मों में गाए गीत कम ही है और वो भी सुनने को नहीं मिल रहे है। आशा है अब सुनने को मिलेगे।

Sunday, January 13, 2008

जनसता दिल्ही का रेडियोनामा के बारेमें लेख

अविनासजीने दिल्ही के जनसत्तामें रेडियोनामा के बारेमें यादों का सिलसिला शिर्षक से लेख युनूसजी के सौजन्यसे पढा इस लिये इस ब्लोग के मुख्य और शुरूआती लेखक श्री युनूसजी को बधाई । पर नीचे दी गयी अनापूर्णाजीकी मूल पोस्ट की प्रत और अविनासजीने जनसत्तामें उस पोस्ट को दिखनेमें तो जैसे का तैसा प्रसिद्ध किया, पर हकिकतमें बोल्ड और अन्डर-लाईन किये हुए शब्दो को परिवर्तीत किया है जो मूझसे सम्बन्धित है । यह घटना गुजरात और खास सुरत के लोगो के प्रति उनकी मानसिकता और संकुचित सोच का परिचय करवाती है ।

कृपया इस ब्लोग के सहपाठी मेरी इस बात को अपने उपर न ले ।

अन्नपूर्णाजी की मूल पोस्ट :

अपने पिछले चिट्ठे में मैनें लोकप्रिय कार्यक्रम एक और अनेक की चर्चा की थी। इस पर पीयूष जी की टिप्पणी आई और मुझे लगा कि शायद एक बार फिर मैं सीलोन के कार्यक्रम सुन सकती हूँ।

पिछले कुछ समय से या कहे कुछ अरसे से मैं सीलोन नही सुन पा रही थी। पहले तो तकनीकी वजह से रेडियो में सेट नहीं हो रहा था फिर आदत ही छूट गई थी।

जब से रेडियोनामा की शुरूवात हुई सीलोन फिर से याद आने लगा। वैसे यादों में तो हमेशा से ही रहा पर अब सुनने की ललक बढ़ने लगी। इसीलिए मैंने पीयूष जी से फ्रीक्वेंसी पूछी और इसी मीटर पर जैसे ही मैंने सेट किया रफी की आवाज़ गूंजी तो लगा मंजिल मिल गई।

गाना समाप्त हुआ तो उदघोषिका की आवाज सुनाई दी पर एक भी शब्द समझ में नहीं आया। इसी तरह से बिना उद्घोषणा सुने एक के बाद एक रफी के गीत हम सुनते रहे। गाइड , यकीन और एक से बढ़ कर एक गीतकार शायर - राजेन्द्र क्रष्ण , हसरत जयपुरी...

खरखराहट तो थी फिर भी आवाज थोडी साफ होने लगी और अंत में सुना - आप सुन रहे थे फिल्मी गीत जिसे रफी की याद में हमने प्रस्तुत किए। फिर कुछ आवाज साफ सुनाई नहीं शायद उदघोषिका ने अपना नाम बताया जो हम सुन नहीं पाए।

अब भी संदेह था कि सीलोन है या नहीं तभी साफ सुना - ये श्री लंका ब्राड कास्टिंग कार्पोरेशन की विदेश सेवा है। अब ये सभा समाप्त होती है।

बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी , हमने अपने घर में ये बहुत लंबे समय बाद सुना।

यह जनसत्ता का रिपोर्ट :

मैनें रेडियो को वैसे ही बंद कर दिया है और उसे केवल सीलोन सुनने के लिए रख दिया है। विविध भारती दूसरे रेडियो से सुनेगे। सीलोन रोज सुनने की कोशिश करेगे और हो सके तो रेडियोनामा पर इस बारे में लिखेगे भी।
पिछले कुछ समय से या कहें कुछ अरसे से मैं सीलोन नहीं सुन पा रही थी । पहले तो तकनीक की वजह से रेडियो में सेट नहीं हो रहा था । फिर आदत छूट गयी थी । जब से रेडियोनामा की शुरूआत हुई, सीलोन फिर से याद आने लगा । वैसे यादों में तो हमेशा रहा है, पर अब सुनने की ललक बढ़ने लगी । इसलिए मैंने फ्रीक्‍वेन्‍सी पता की और इसी मीटर पर जैसे ही मैंने सेट किया । रफी साहब की आवाज़ गूंजी तो लगा कि मंजिल मिल गयी । गाना समाप्‍त हुआ तो उदघोषिका की आवाज़ सुनाई दी पर एक भी शब्‍द समझ में नहीं आया । इसी तरह से बिना उदघोषणा सुने एक के बाद एक रफी के गीत हम सुनने रहे । गाईड, यकीन, और एक से बढ़कर एक गीतकार । शायर राजेंद्र कृष्‍न, गीतकार हसरत जयपुरी.....
खरखराहट तो थी फिर बाद में आवाज़ थोड़ी साफ होने लगी और अंत में सुना: आप सुन रहे थे फिल्‍मी गीत, जिसे रफी की याद में हमने प्रस्‍तुत किये ।


पियुष महेता ।
सुरत-३९५००१.

Saturday, January 12, 2008

रेडियोनामा की चर्चा जनसत्‍ता में ।

Jansatta_2

 

पिछले रविवार को जनसत्‍ता के रविवारी में अविनाश ने अपने कॉलम ब्‍लॉग लिखी में रेडियोनामा पर लिखा है । चूंकि दिल्‍ला का जनसत्‍ता देश भर में कई इलाक़ों में नहीं पहुंचता, ज़ाहिर है कि मुझे भी इसकी ख़बर ज़रा देर से ही मिली । और जब मेरे भाई ने कटिंग स्‍कैन करके भेजी तो लगा कि क्‍यों ना इसे रेडियोनामा के साथियों और ब्‍लॉगजगत के हमसफरों के साथ बांटा जाए । इस लेख का शीर्षक है यादों का सिलसिला ।

 

ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस बरसों से नहीं सुनी । वरना पूरी दोपहर कई पीढि़यों ने इस सर्विस को सुनने में वक्‍त ज़ाया किया होगा । हर उस काम को हमारे समाज में वक्‍त ज़ाया करना कहते हैं जिससे आमदनी नहीं होती । जैसे तलत महमूद की आवाज़ से मकबूल हुई मजाज़ की नज्‍़म है--जगमगाती सड़कों पे आवारा फिरूं, ऐ ग़मे दिन क्‍या करूं, वहशते दिल क्‍या करूं....तो कईयों ने इस आवारगी से वक्‍त ज़ाया किया होगा । लेकिन जिसने इस तरह से ज़ाया हुए वक्‍त को जिंदगी की लय दे दी वो मजाज़ हो गया । 

एक ज़माने में पुरानी दिल्‍ली के चावड़ी बाज़ार की गलियों से गुज़रते हुए कानों में ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस की आवाज़ जा घुसती थी--अंखिया मिला के जिया भरमा के चले नहीं जाना । अब पता नहीं उन गलियों में भी पुराना जादू चल रहा है या हिमेश रेशमिया की तान का राज है । लेकिन नाजायज़ यह भी है कि नई पीढ़ी और नए ज़माने के बीच हम पुरानी आवाज़ों के किस्‍से बताते रहें । डी टी सी की बसों में कान से लगे एफ एम से जैसे गाने सुने जा रहे हों, स्‍मृतियों का एक बस्‍ता हर उस आदमी के कंधे पर सवार है जो पुरानी आवाज़ों की कदर में अब भी है । इसलिए हम नई आवाज़ों के मुरीदों से माफी चाहते हुए एक ऐसे ब्‍लॉग की कहानी कह रहे हैं जो पुरानी आवाज़ों के साए में संचालित किया जा रहा है ।

रेडियोनामा यानी रेडियोनामा डॉट ब्‍लॉगस्‍पॉट डॉट कॉम । इस ब्‍लॉग पर इतनी पुरानी यादों को समेटा जा रहा है जिसकी याद पुराने लोगों के ज़ेहन से ग़ायब हो रही है । अन्‍नपूर्णा ने एक पोस्‍ट लिखी--फिज़ाओं में खोते गीत । लिखा, आजकल भूले बिसरे गीत में पचास के दशक के गीत बहुत बज रहे हैं । इससे पहले के गीत बहुत कम सुनाई दे रहे हैं । 2002 तक पचास के दशक से पहले के गीत सुनाए जाते थे । लगभग सभी गीत अच्‍छे होते थे । लेकिन कुछ गीत बहुत अच्‍छे लगते थे । ऐसा ही एक गीत है सुधा मल्‍होत्रा की आवाज़ में, जो हास्‍य गीत है । मुखड़ा है--आई भाभी आई । इसमें कुछ संवाद भी हैं: भाभी रेलवे स्‍टेशन से बाहर निकलीं और उन्‍होंने रिक्‍शा बुलाया, पर रिक्‍शा वाले ने उन्‍हें बैठाने से इंकार किया । शायद भाभी बहुत मोटी हैं । अंतिम पंक्तियां हैं । ठुमक ठुमक ठुमक पैदल आई भाभी । एक युगल गीत है, जिसमें आवाज़ शायद पहाड़ी सान्‍याल की है । इसमें भी कुछ संवाद हैं--अनुराधा तुम बीच रास्‍ते में क्‍यों खड़ी हो....गीत के बोल याद नहीं आ रहे हैं । एक और गीत सुने बहुत समय बीत गया--मैं बन की चिडि़या बन बन डोलूं रे....चल चल रे नौजवान । इनके अलावा कानन देवी की फिल्‍म जवाब के गीत और दूसरी फिल्‍मों के भी कुछ गीत । सरस्‍वती देवी और बुलो सी रानी के स्‍वरबद्ध किये गये गीत । अमीर बाई कर्नाटकी, के0सी0 डे, पंकज मलिक के गाए गीत । एक लंबी सूची है ऐसे गीतों की, जिन्‍हें सुने अर्सा हो
गया ।

इस ब्‍लॉग के लगभग तमाम मेंबरान ऐसी ही बातें करते हैं । ऐसी बातों के बीच से वे सूचनाएं भी हम तक पहुंचती हैं जो आज का अखबार या टी वी मीडिया नहीं पहुंचाता । ज़ाहिर है, ये सूचनाएं ग्‍लैमरस नहीं हैं और नए समाज से इन सूचनाओं का कोई ताल्‍लुक नहीं है । पिछले हफ्ते रेडियोनामा से पता चला कि शिव कुमार त्रिपाठी नहीं रहे । तफसील कुछ इस तरह थी: महात्‍मा गांधी की शवयात्रा के समय बिड़ला हाउस से राजघाट तक हिंदी में आंखों देखा हाल सुनाने वाले शिवकुमार त्रिपाठी का कैलाश अस्‍पताल में निधन हो गया । त्रिपाठी इक्‍यानवे वर्ष के थे ।

रेडियोनामा पर ही विविध भारती मुंबई के उदघोषक और ब्‍लॉगर यूनुस खान ने बताया कि चौबीस दिसंबर को जयपुर में गोपाल दास जी का निधन हो गया । यूनुस खान ने सूचना शेयर करने से पहले बताया कि जयपुर से राजेंद्र प्रसाद बोहरा जी का अंग्रेज़ी मेल आया । उन्‍होंने लिखा था: भला कोई भी प्रसिद्ध ब्रॉडकास्‍टर गोपालदास जी के निधन पर आंसू बहाए, भले उनके निधन की खबर आज के रेडियो चैनलों पर जगह ना बना सके, पर रेडियोनामा पर गोपालदास जी के निधन की खबर जरूर जारी की जानी चाहिए ।

रेडियोनामा एक और काम कर रहा है, पुरानी यादों के सिलसिले को तरतीब दे रहा है । अन्‍नपूर्णा लिखती हैं: पिछले कुछ समय से या कहें कुछ अरसे से मैं सीलोन नहीं सुन पा रही थी । पहले तो तकनीक की वजह से रेडियो में सेट नहीं हो रहा था । फिर आदत छूट गयी थी । जब से रेडियोनामा की शुरूआत हुई, सीलोन फिर से याद आने लगा । वैसे यादों में तो हमेशा रहा है, पर अब सुनने की ललक बढ़ने लगी । इसलिए मैंने फ्रीक्‍वेन्‍सी पता की और इसी मीटर पर जैसे ही मैंने सेट किया । रफी साहब की आवाज़ गूंजी तो लगा कि मंजिल मिल गयी । गाना समाप्‍त हुआ तो उदघोषिका की आवाज़ सुनाई दी पर एक भी शब्‍द समझ में नहीं आया । इसी तरह से बिना उदघोषणा सुने एक के बाद एक रफी के गीत हम सुनने रहे । गाईड, यकीन, और एक से बढ़कर एक गीतकार । शायर राजेंद्र कृष्‍न, गीतकार हसरत जयपुरी.....

खरखराहट तो थी फिर बाद में आवाज़ थोड़ी साफ होने लगी और अंत में सुना: आप सुन रहे थे फिल्‍मी गीत, जिसे रफी की याद में हमने प्रस्‍तुत किये । रेडियोनामा एक कम्‍यूनिटी ब्‍लॉग है । फिल्‍हाल इसके 21 मेंबर हैं जो देश विदेश के अलग अलग कोनों में बसे हैं । पर जो जहां भी है वहीं से रेडियो से जुड़ी अपनी यादों को समेट रहे हैं ।

 

रेडियोनामा की ओर से हम सभी अविनाश को धन्‍यवाद देते हैं ।

हम रेडियोनामा पर न सिर्फ यादों का कारवां चलाना चाहते हैं बल्कि रेडियो पर एक सिलसिलेवार विमर्श भी शुरू करना चाहते हैं ।

रेडियोनामा का मंच खूब फैले और असरदार बने, सभी को शुभकामनाएं ।

Friday, January 11, 2008

रोज़ सवेरे के प्रसारण में एक बात खटकती है

विविध भारती पर रोज़ सवेरे प्रसारण शुरू होता है संकेत धुन (signature tune) से, फिर मंगल ध्वनि, फिर समाचार और समाचार के बाद वन्दनवार की संकेत धुन जिसे सुन कर लगता है कि भोर हो आई है और नए दिन की शुरूवात हुई है।

साढे छ्ह बजे देशगान के बाद इसी धुन से कार्यक्रम समाप्त होता है। इसके बाद यहां हैद्राबाद में क्षेत्रीय प्रसारण का कार्यक्रम है - अर्चना जिसमें तेलुगु भाषा के भक्ति गीत प्रसारित होते है। फिर सात बजे से हम जुड़ते है केन्द्रीय सेवा से भूले बिसरे गीत कार्यक्रम से।

साढे सात बजे के एल सहगल के गाए गीत से यह कार्यक्रम समाप्त होता है और बज उठती है संगीत सरिता की संकेत धुन जो हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाती है।

जो संगीत के क्षेत्र में है शायद उनका यह रियाज़ का समय है और हम जैसे लोगों के लिए ये समय है ख़ास संगीत का आनन्द लेने का। पन्द्रह मिनट बाद इसी मधुर संकेत धुन से कार्यक्रम की समाप्ति की सूचना मिलती है। जिसके तुरन्त बाद बज उठती है त्रिवेणी की संकेत धुन।

हालांकि त्रिवेणी में तीन ही फ़िल्मी गीत बजते है जो अक्सर पूरे नहीं बजते मगर एक ही विषय पर बजते है। कहा भी जाता है उदघोषक द्वारा कि आज त्रिवेणी की तीनों धाराएं मिल रही है - (विषय) पर। कहने का मतलब ये कि तीन गीतों के कार्यक्रम के लिए भी संकेत धुन बजती है।

खटकने वाली बात ये है कि भूले बिसरे गीत कार्यक्रम के लिए संकेत धुन नहीं है। वैसे आम तौर पर फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम के लिए संकेत धुन बजाने का चलन नहीं है लेकिन इस कार्यक्रम में एक ख़ास दौर के गीत बजते है। ये गीत फ़िल्मी गीतों के इतिहास की जानकारी देते है, तो ऐसे कार्यक्रम के लिए एक संकेत धुन तो बनाई जा सकती है।

एक ऐसी धुन जिसे सुन कर ही लगे कि हम फ़िल्मी दुनिया के आरंभिक दौर में पहुँच गए है और फिर यही धुन के एल सहगल के गीत के बाद बजे जिसके बाद संगीत सरिता की धुन बज उठे तो सवेरे के प्रसारण में चार चाँद लग जाएगें।

Thursday, January 10, 2008

चुन-चुन करती आई चिडिया ....




कुछ याद आया इस गाने को सुनकर ,जी हाँ हम उस पुराने जमाने की बात कर रहे है जब रविवार की सुबह का हम सबको बेसब्री से इंतजार रहता थाअरे हम रविवार की सुबह आने वाले बच्चों के कार्यक्रम की ही बात कर रहे हैउस कार्यक्रम मे आने वाले भईया और दीदी अक्सर ही इसी गाने से कार्यक्रम की शुरुआत किया करते थेउस समय तो हम लोग इस गाने को सुनकर ही मस्त हो जाते थेरविवार को हम लोग सुबह से ही रेडियो सुनने बैठ जाते थेभईया और दीदी की नोंक -झोंक सुनने मेखूब म़जा आता था


पहले रसगुल्ले वाले भईया आया करते थे और जब भी दीदी उन्हें कुछ करने या बताने को कहती तो वो हमेशा ही रसगुल्ले की फरमाईश किया करते थे और कहते थे कि अगर आप रसगुल्ले खिलाएँगी तभी हम काम करेंगेऔर दीदी को उन्हें रसगुल्ला खिलाने के लिए हामी भरनी पड़ती थीये रसगुल्ले खाने का सिलसिला काफी दिनों तक चला था

बाद मे रसगुल्ले वाले भईया चले गए थे और उनकी जगह करेले वाले भईया गए थे जो हर काम के लिए दीदी से करेले की फरमाईश किया करते थेइन करेले वाले भईया को रसगुल्ले बिल्कुल पसंद नही थेऔर रसगुल्ले का नाम लेते ही वो गुस्सा हो जाते थेऔर दीदी हंसकर कहती की अच्छा अब वो रसगुल्ले का नाम नही लेंगी

उस समय चाहे करेले वाले भईया थे या रसगुल्ले वाले भईया थे पर वो दोनों भईया बच्चों को रविवार की सुबह अच्छी-अच्छी बातें बताते थे और अच्छे-अच्छे प्यारे-प्यारे गीत सुनवाते थेऔर हम बच्चों के सन्डे की अच्छी शुरुआत होती थी

Monday, January 7, 2008

क्या बिना विज्ञापन आप कार्यक्रम पसन्द करेंगें ?

अगर आज मैं आपसे ये सवाल पूछूं - क्या बिना विज्ञापन आप कार्यक्रम पसन्द करेंगें ? तो आपमें से अधिकांश का जवाब होगा - नहीं

आज कार्यक्रम में बीच-बीच में विज्ञापन आते है तो लगता है थोड़ा सा आराम मिल गया। अगर कुछ साल पहले यही सवाल आपसे पूछा गया होता तो जवाब होता - हां

कुछ समय पहले विज्ञापन आते तो ऐसा लगता कार्यक्रम का मज़ा किरकिरा हो गया यानि जैसे अंगूर खाते समय बीच-बीच में बीज आ जाते है उसी तरह से लगते थे ये विज्ञापन।

विज्ञापनों से श्रोताओं को परिचित कराया रेडियो सिलोन ने। यह बात मैं अपने पिछले एक चिट्ठे में भी लिख चुकी हूं। यह विज्ञापनों का शुरूवाती दौर था इसीलिए श्रोताओं को अच्छा लगता था। विज्ञापन भी बहुत मज़ेदार हुआ करते थे।

रेडियो सिलोन तो फ़िल्मों और फ़िल्मों गीतों पर ही आधारित था, मगर सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम थे बिनाका गीत माला और उसके बाद आप ही के गीत। दोनों ही कार्यक्रमों में उन फ़िल्मों के गीत बजते थे जो रिलीज़ हुई है या होने ही वाली है इसीलिए लगभग वही गीत बार-बार सुनने को मिलते थे।

बिनाका गीत माला तो सप्ताह में एक बार होती लेकिन आप ही के गीत में रोज़ लगभग वही गीत सुनने होते। बिनाका गीत माला में सिर्फ़ बिनाका टूथ पेस्ट और टूथ ब्रश का ही विज्ञापन बजता और वो भी एक घण्टे में दो-चार बार ही, लेकिन आप ही के गीत में हर गीत के बाद विज्ञापन प्रसारित होते।

रोज़ वही गीत वही विज्ञापन फिर भी अच्छा लगता। अन्य कार्यक्रमों की तुलना में सवेरे 8 से 9 इसी एक घण्टे के कार्यक्रम आप ही के गीत में अधिक विज्ञापन होते। 5 मिनट में एक गीत बजता, गीत के गायक और फ़िल्म का नाम बताया जाता और फ़रमाइश करने वालों की लंबी सूची पढी जाती फिर गीत के बाद 20-30 सेकेण्डस के 4-5 विज्ञापन।

इस एक घण्टे में रोज़ वही गीत तो एक ही बार बजता पर वही विज्ञापन बार-बार बजते थे। लगभग 6 महीनों में गीतों में बदलाव आता क्योंकि फ़िल्मों की रिलीज़ के आधार पर एक-एक कर गीत बदलते जाते पर विज्ञापनों में बदलाव बहुत ही कम आता।

इन विज्ञापनों की ही बदौलत कई उत्पाद घर-घर में नज़र आने लगे, चाहे खांसी की दवा ग्लाइकोडिन हो, मराठा दरबार अगरबत्ती हो, एस कुमार्स के कपड़े हो, सोनी आडियो कैसेट हो और साथ में ढेर सारे फ़िल्मी विज्ञापन।

कभी-कभी यूं भी होता कि एक फ़िल्म का विज्ञापन आता और उसके बाद उद्घोषक कहते अब आप इसी फ़िल्म का गीत सुनिए।

धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा। पहले दूरदर्शन फिर निजि टेलिविजन चैनलों ने पैर पसारने शुरू किए। इन पर भी विज्ञापनों का जादू है या यूं कहे कि विज्ञापनों से होने वाली आमदनी से ये दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर रहे है और इन्हीं विज्ञापनों के सहारे उत्पाद दुनिया के कोने-कोने में अपनी जगह बना रहे हैं और ये उत्पाद बनाने वाली कंपनिया ढेरों मुनाफा बटोर रही हैं।

ऐसे वातावरण में विज्ञापन संस्कृति की शुरूवात करने वाला रेडियो सिलोन आज विज्ञापनों से सूना क्यों है ?

जैसा कि मैनें अपने पिछले एक चिट्ठे में बताया कि कुछ सालों से मैं सिलोन तकनीकी कारणों से फिर आदत छूट जाने से नहीं सुन पा रही थी और अब पीयूष जी की सहायता से सुन पा रही हूं और कल मैनें बरसों बाद पहली बार आप ही के गीत सुने।

त्रिवेणी सुनने के बाद मैनें सिलोन ट्यून किया तो के एल सहगल के गीत के बाद उद्घोषणा हुई और आप ही के गीत की संकेत धुन बजी। फिर शुरू हुए नए फ़िल्मी गीत - झूम बराबर झूम, सांवरिया एक के बाद एक उद्घोषणा और गीत। सब कुछ बरसों पहले जैसा लगा सिर्फ़ ग़ायब थे तो विज्ञापन।

आप ही के गीत के बाद सुना फ़िल्म संगीत जिसमें वही चिरपरिचित अंदाज़ में लोकप्रिय गीत सुनवाए गए। बिना विज्ञापनों के कार्यक्रम सुनना बहुत अच्छा लगा पर मन में सवाल उठा कि जब सिलोन ने अपनी संस्कृति नहीं बदली तो विज्ञापनों ने मुंह क्यों मोड़ लिया ?

इतनी बड़ी-बड़ी कंपनिया क्या कुछ विज्ञापन रेडियो सिलोन को नहीं दे सकती। सबसे ज्यादा अखरने वाली बात लगी कि फ़िल्मों की सफलता में और खासकर फ़िल्मी गीतों को लोकप्रिय बनाने में जिस रेडियो सिलोन का महत्वपूर्ण योगदान रहा आज वहीं फ़िल्म इंडस्ट्री अपनी एक भी फ़िल्म का विज्ञापन नहीं दे रही।

आखिर सबने क्यों इस तरह से नाता तोड़ लिया है ? क्या आप बता सकेंगे…

Friday, January 4, 2008

कभी-कभी अपने आप पर भी हँसना चाहिए

कल विविध भारती पर जुबली झंकार में विशेष मन चाहे गीत सुने जिसमें श्रोताओं ने ऐसे गीतों की फ़रमाइश की जो उनके जीवन में ख़ास महत्व रखते है।

मेरे लिए तो पूरा मन चाहे गीत कार्यक्रम ख़ास महत्व रखता है और मेरे कार्यालय के लोगों के अनुसार ये कार्यक्रम मेरे जीवन में बहुत ही ख़ास है। कैसे ? बता रही हूं -

कार्यालय मे चाय का समय 2:30 है। मुझे हमेशा से ही कार्यालय में रेडियो सुनने की आदत है। पहले मेरे पास ट्रांज़िस्टर था। मन चाहे गीत सुनने के बाद मैं चाय पीने जाती थी। आजकल सेल फोन पर ही एफ़ एम आ जाने से फोन से ही विविध भारती सुनती हूं मगर आदत के अनुसार गाने सुन कर ही चाय पीने जाती हूं।

चाय के समय गपशप होती है। चुटकियां ली जाती है। मज़ाक के दौर चलते है। जब मुझे निशाना बनाया जाता है तो बात कुछ यूं चलती है -

कहते है पुराने ज़माने में जब किसी का आख़िरी समय आ जाता था और सांसे अटक जाती थी तब बच्चों के बारे मे कुछ सच या झूठ बता दिया जाता था जैसे बेटी की शादी तय हो गई है, लड़के सब साथ मिलकर रहेंगें वग़ैरह वग़ैरह या नाती-पोतों को दिखाया जाता या संदूक, पेटी सिरहाने रख कर बताया जाता कि तुम्हारी ज़िन्दगी भर की कमाई सुरक्षित है। इससे आराम से दम निकलता था।

जब अन्नपूर्णा का अंतिम समय आएगा तब न बच्चों के बारे में झूठ बोलने की ज़रूरत न नाती-पोतों को दिखाने की ज़रूरत और न ही जायदाद की पोटली सिरहाने रखने की ज़रूरत, बस रेडियो सिरहाने रख दो, उसमें से जैसे ही मन चाहे गीत बजने लगेंगे अन्नपूर्णा की आखें धीरे-धीरे बंद हो जाएगी और आत्मा शरीर से निकल कर सीधे स्वर्ग में पहुंच जाएगी।

Thursday, January 3, 2008

आज सुनिए विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती का कार्यक्रम जुबली झंकार IIT मुंबई के साथ

आज तीन जनवरी है ।

तीन अक्‍तूबर 2007 को विविध भारती सेवा के स्‍वर्ण जयंती महोत्‍सव की शुरूआत हुई थी । और तब से हर महीने की तीन तारीख को‍ विविध भारती अपना विशेष आयोजन करती आ रही है । ये सिलसिला साल भर जारी रहने वाला है ।

तो आज के स्‍वर्ण जयंती कार्यक्रम 'जुबली झंकार' के बारे में आपको बता दिया जाये ।

दिन में बारह बजे अमरकांत पिछले महीनों के कार्यक्रमों की झलकियां पेश करेंगे और बतायेंगे कि आज आप क्‍या क्‍या सुनने वाले हैं ।

दिन में साढ़े बारह बजे एक बड़ा ही दिलचस्‍प कार्यक्रम होगा । जिसका नाम है 'कैसे कैसे हवामहल'

इस कार्यक्रम में लोकेंद्र शर्मा आपको बतायेंगे कि पिछले पचास सालों में कैसे कैसे हास्‍य हवामहल बने और लो‍कप्रिय हुए । हवामहल ही हास्‍य नाटिकाओं के इतिहास से गुजरना अपने आप में काफी रोमांचक सफर होगा ।

इसके बाद दिन में डेढ़ बजे रेडियोसखी ममता सिंह और अशोक सोनावणे पेश करेंगे 'गोल्‍डन जुबली मनचाहे गीत' ।

फिर दिन में ढाई बजे पुराने और दुर्लभ फिल्‍मी गीतों का संग्रह करने वाले मुंबई के डॉक्‍टर प्रकाश जोशी और उनके साथियों के साथ कमल शर्मा और निम्‍मी मिश्रा पेश करेंगे एक विशेष कार्यक्रम । इस कार्यक्रम में डॉक्‍टर प्रकाश जोशी कई ऐसे दुर्लभ गीत सुनवायेंगे जो आपने विविध भारती तो क्‍या बाकी किसी भी स्‍टेशन से नहीं सुने होंगे ।

फिर आयेगा एक और दिलचस्‍प कार्यक्रम । दो स्‍वर्ण जयंतियों का फ्यूजन । इस साल आई आई टी मुंबई भी अपनी स्‍वर्ण जयंती मना रहा है । और विविध भारती भी । इसलिए विविध भारती की ओर से मैं गया आई आई टी मुंबई और वहां के छात्रों से बातें कीं । हमने दस महत्‍त्‍वपूर्ण सवाल तैयार किये और इनके ज़रिये इन युवाओं के देश और दुनिया के बारे में विचार जानने की कोशिश की । ये एक अत्‍यंत प्रयोगात्‍मक कार्यक्रम है । जरूर सुनिएगा । इस कार्यक्रम का प्रसारण होगा दिन में साढ़े तीन बजे से शाम साढ़े पांच बजे तक । इसके आखिरी आधे घंटे में आई आई टी के छात्रों का पेश किया गया रंगारंग कार्यक्रम भी शामिल है ।

और हां आपको बता दूं कि ये वही कार्यक्रम है जिसके लिए मैं बीस दिसंबर को आई आई टी गया था । ब्‍लॉग बुद्धि और this is my world वाले युवा ब्‍लॉगर विकास कुमार ने इस कार्यक्रम में काफी सहयोग दिया है । आप इस कार्यक्रम में उनकी आवाज़ भी सुन सकेंगे और उनकी कविता भी ।

तो सुनिए सुनाईये सबको बताईये विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती मनाईये ।

 



IIT_mumbai

Wednesday, January 2, 2008

सांप की पोस्ट से याद आया विविध भारती का एक कार्यक्रम

पिछले सप्ताह ममता (टी वी) जी ने सांप के बारे में एक पोस्ट लिखी जिस पर चर्चा चली। मैंने भी टिप्पणी लिखी।

मुख्य बात ये रही कि सांप को मारने पर क्या सांप की आंखो में मारने वाले की तस्वीर रह जाती है। इससे मुझे याद आया लगभग दो वर्ष पहले विविध भारती से प्रसारित एक फोन-इन कार्यक्रम - हैलो बाँलीवुड

शुक्रवार को प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम में फ़िल्मों के किसी मुद्दे पर बात होती थी। इस फोन-इन कार्यक्रम में श्रोताओं से बात करते थे अमरकान्त दुबे।

इसमें विषय था नागिन के संबंध में, जैसा कि फ़िल्मों में दिखाया जाता है कि नाग को मारने वाले की तस्वीर उसकी आंखों में देख कर नागिन बदला लेती है।

यही तो मुद्दा है जो ममता जी ने अपने चिट्ठे में उठाया। मैनें अपनी टिप्पणी में जो भी लिखा वही सब मैनें अमरकान्त (दुबे) जी से भी फोन पर कहा। मेरे अलावा बहुत से लोगों ने इस कार्यक्रम में अपने अनुभव बताए।

जो बात फ़िल्मों के माध्यम से चर्चा का विषय बनी उसे ममता जी ने वास्तविक रूप से उठाया।

मैं अनुरोध कर रही हूं अमरकान्त (दुबे) जी से कि अगर विविध भारती में इस कार्यक्रम की रिकार्डिंग उपलब्ध हो तो कृपया यहां प्रस्तुत कीजिए जिससे सभी इसे सुन सकें।

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