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Friday, February 29, 2008

आज पहली बार सुना ग़ुलाम मोहम्मद का गाया गीत

आज सुबह भूले-बिसरे गीत में जब उदघोषक ने कहा कि अब सुनिए ग़ुलाम मोहम्मद और साथियों का गाया गीत फ़िल्म हीरा-मोती से तो मैं हैरान हो गई। गीत सुनने पर लगा कि इस आवाज़ मे गीत पहली बार सुन रही हूं।

ग़ुलाम मोहम्मद का नाम मैनें पहली बार सुना पाकीज़ा फ़िल्म के गीतों में। क्या यह वही ग़ुलाम मोहम्मद है जिनका गीत आज सुनवाया गया ? ऐसी कोई जानकारी नहीं दी गई। ख़ैर… इस तरह की जानकारियां देना जरूरी नहीं होता है।

यह दूसरी चौकाने वाली बात थी मेरे लिए। पहली बार यूनुस जी ने भरत व्यास का गाया गीत सुनवाया था नवरंग फ़िल्म से।

आज की बात करे… ग़ुलाम मोहम्मद के गीत के बाद आशा भोसलें का गीत बजा तो अच्छा नहीं लगा। कुछ समय पहले ही तो आशा भोंसले की आवाज़ पर फ़िल्म रंगीला में उर्मिला ने ठुमका लगाया था -

जोर लगा के नाचे रे

जिसके बाद सभी युवाओं को पछाड़ कर आशा भोंसले ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एवार्ड लिया था।

आशा भोंसले के गीत के बाद शमशाद बेगम फिर लता मंगेशकर और तलत महमूद का युगल गीत सुनवाया गया। मतलब कि भूले-बिसरे गीत में ज़िक-ज़ैक चलता रहा। ऐसा पिछले कुछ दिनों से हो रहा है। तो आइए आज चर्चा करते है भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम के बदलते (बिगड़ते) माहौल की।

कुछ दिनों से पचास के दशक के गीत इसमें सुनवाए जा रहे है। इसीलिए लता रफ़ी की आवाज़े गूँज रही है। साथ ही नूरजहाँ और शमशाद बेगम जैसी आवाज़े भी सुनाई दे रही है। अंत में अनिवार्य रूप से कुन्दनलाल सहगल का गीत बजता है। इस तरह कुल मिलाकर कार्यक्रम पुराने फ़िल्मी गीतों का तो लगता है पर भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम नहीं लग रहा।

भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में आवाज़े भी भूली-बिसरी होनी चाहिए। इन आवाज़ों में गीत पचास के दशक के पहले के है और पचास के दशक के शुरूवाती दौर के है। आवाज़े इनकी होनी चाहिए -

नूरजहाँ सुरैया राजकुमारी उमा देवी शमशाद बेगम मुबारक बेगम सुधा मल्होत्रा अमीरी बाई सरस्वती रानी सुमन कल्याणपुर कमल बारोट गीता दत्त

पंकज मलिक सी रामचन्द्र केसी डे मन्ना दे तलत महमूद पहाड़ी सान्याल

यानि वो आवाज़े जो बरसों से फ़िल्मी गीतों से दूर हो गई है।

यह सच है कि अच्छा लगता है लता को तलत महमूद के साथ सुनना फिर नए गानों के कार्यक्रम में उदित नारायण के साथ सुनना। लेकिन जिस लता ने बैजू बावरा में मीना कुमारी को अपनी आवाज़ दी वही लता लगातार गाते हुए मैनें प्यार किया फ़िल्म में भाग्यश्री को भी अपनी आवाज़ देती है। अब सलमान खान की यह फ़िल्म तो युवाओं की पसन्दीदा फ़िल्म है फिर उसी लता की आवाज़ भूले-बिसरे गीत जैसे कार्यक्रम में क्यों ?

Thursday, February 28, 2008

बिनाका गीत माला ....

अब तो ना जाने कितने साल हो गए है बिनाका गीत माला सुने हुए पर जिस ज़माने मे यानी साठ और सत्तर के दशक मे जब बिनाका गीत माला आती थी तब इसे सुनने का एक अजीब ही नशा होता थाहर बुधवार की रात आठ बजे हम लोग रेडियो से चिपक जाते थे और उस खड़-खड़ करते हुए रेडियो मे गाने सुनते रहतेकभी आवाज बिल्कुल क्लियर हो जाती तो गाना पूरा सुनाई देता तो कभी आवाज आगे-पीछे होती सुनाई देतीपर इससे हम लोगों के बिनाका गीत माला सुनने के जूनून मे कोई कमी नही आती थीक्यूंकि इस कार्यक्रम मे नए-नए गीत शामिल होते रहते थे और पुराने गीत सरताज गीत बनते जाते थे

कुछ हफ्तों तक (अब ठीक से याद नही पर शायद दस हफ्ते तक )जब एक ही गीत पहली पायदान पर बजता था तो उसे सरताज गीत की श्रेणी मे डाल दिया जाता थासरताज गीत के लिए जो धुन बजती थी वो भी बहुत ही जोरदार होती थी और लगता था की हाँ वाकई ये गीत गीतों का सरताज बन गया है

अमीन सयानी जो हमेशा बिनाका गीत माला प्रस्तुत करते थे उनके बोलने का अंदाज आप को याद तो होगा ही मसलन बहनों और भाइयों कहने का स्टाइल या आज ये गाना अपनी तीसरी पायदान से लुढ़क कर छठी पायदान पर गया है या आज इस किशोर कुमार का गाया हुआ गीत सातवी पायदान से तीन पायदान ऊपर यानी चौथी पायदान पर गया है वगैरा-वगैरा , बहुत ही अच्छा लगता था

हर हफ्ते आखिरी तीन पायदानों के लिए हम बहने कई बार शर्त भी लगाती कि इस बार फलां गाना पहली पायदान पर आएगाऔर अगर किसी का बताया हुआ गाना पहली पायदान पर जाता तो वो शर्त जीत जाता


अन्नपूर्णा जी और पियुष जी बता सकते है कि क्या अब भी बिनाका गीत माला आती है

mamta tv

Wednesday, February 27, 2008

और मैं बन गया एफएम रेडियो का ब्रांड-अम्बैसेडर.....

ज़िंदगी एक टू-इन-वन के सहारे विविध भारती के प्रोग्राम सुन कर बढ़िया चल रही थी कि लगभग डेढ़ दशक पहले , जहां तक मुझे याद ही कहीं जून 1993 के आसपास मुझे पता चला कि बाज़ार में एक एफएम रेडियो सैट आ गया है ---कुछ ज़्यादा तो इस के बारे में पता था नहीं सिवाए इस बात के कि इस पर सब बहुत ही क्लियर सुनता है यानि कि साऊंड क्वालिटि बेहतरीन होती है। रिसेप्शन बेहद उत्तम किस्म का होता है।

बस फिर क्या था, रेडियो दीवाने इस को खरीदने में कहां पीछे रहने वाले थे। सो, किसी तरह एक अदद एफएम रेडियो को ढूंढता हुया मैं बम्बई की ग्रांट रोड (लेमिंगटन रोड) पर पहुंच गया। दो-तीन दुकानों से पूछने के बाद आखिर एक दुकान में यह मिल गया--- उसी दिन शायद तेरह-सौ रूपये का फिलिप्स का एक वर्ल्ड-रिसीवर खरीद लाया। वैसे वर्ल्ड-रिसीवर से मुझे कुछ खास लेना देना तो था नहीं--- मुझे तो बस दुकानदार का इतना कहना ही काफी था कि इस में एफएम रेडियो भी कैच होगा और अच्छी क्वालिटि की आवाज़ सुनने को मिलेगी।

दुकानदार ने तीन बड़े सैल डाल कर एफएम की क्वालिटि चैक भी करवा दी थी....क्योंकि उस समय शाम थी, और एफएम प्रसारण दिन में सुबह, दोपहर एवं शाम केवल निर्धारित समय सारणी के अनुसार ही होता था। यकीन मानिए, मैंने भी उस वर्ल्ड-रिसीवर पर विविध भारती एवं एफएम के इलावा कुछ नहीं सुना।

मुझे अभी भी अच्छी तरह से याद है कि उस इलैक्ट्रोनिक्स की दुकान वाले को मुझे एफएम की अच्छी क्वालिटि का नमूना दिखाने के लिए दुकान से बाहर फुटपाथ पर आना पड़ा था और साथ में वह यह भी कह रहा था कि यहां पर ट्रैफिक की वजह से थोड़ी सी अभी डिस्टर्बैंस है, आप की बिल्डिंग से तो सब कुछ एकदम क्रिस्टिल क्लीयर ही सुनेगा। एक बात इस की और भी तो बहुत विशेष थी कि यह बिजली के साथ सैलों से भी चलने वाला सैट था। वैसे, इसे बिजली से चलाने के लिए एक अलग से अडैप्टर भी लगभग 150रूपये में खरीदना पड़ा था।

इस वर्ल्ड रिसीवर पर अब मुझे एफएम के कार्यक्रमों के समेत सभी प्रोग्राम सुनने बहुत रास आ रहे थे। इसे मैंने अपनी ड्यूटी पर रख छोड़ा था और अकसर मेरे वेटिंग-रूम में यह बजता रहता था। जहां तक मुझे याद है इस पर शुरू शुरू में times..fm के कार्यक्रम जो दोपहर एक बजे शुरू हो जाते थे( वो बहुत ही बढ़िया सी सिग्नेचर ट्यून के साथ) और फिर शायद दो-अढ़ाई घंटे तक चलते थे, मुझे बेहद पसंद थे। इस में एक प्रोग्राम होता था ..नॉको के सौजन्य से, जिस में एड्स कंट्रोल के बारे में जनता को जानकारी उपलब्ध करवाई जाती थी और उस प्रोग्राम में बहुत बढिया किस्म के फिल्मी गीत भी सुनाए जाते थे। कुछ दिन पहले ही मैं राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल संगठन की अध्यक्षा को एक पत्र लिख रहा था तो मैंने इस देश में इस रेडियो प्रोग्राम की भूमिका का बहुत अच्छे से उल्लेख किया था।

मुझे तो बस इस एफएम सुनने का चस्का कुछ इस कदर लगा कि कुछ दिनों बाद ही हमें लोनावला जाना था, मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैं एफएम सुनने की खातिर उस शाम को ए.सी कंपार्टमैंट से बाहर ही खड़ा रहा था जिस की वजह से मैं अपने उस वर्ल्ड-रिसीवर पर एफएम के सुरीले प्रोग्राम का मज़ा ले रहा था। लेकिन यह क्या, जैसे ही गाड़ी कल्याण से थोड़ा आगे चली, उस की रिसैप्शन में गड़बड़ी शुरू और देखते ही देखते चंद मिनटों में मेरे कईं बार उसे उल्टा-सीधा करने के बावजूद कुछ भी सुनाई देना बंद हो गया। हां, हां, तब याद आया कि अभी एफएम कार्यक्रमों की रेंज बम्बई से 50-60 किलोमीटर तक ही है। सो, मन ममोस कर एसी कंपार्टमैंट के अंदर आना ही पड़ा। मैं भी कितना अनाड़ी था कि एक वर्ल्ड-रिसीवर खरीद कर यही समझ बैठा कि शायद कोई सैटेलाइट ही खरीद लिया है....!!

इस वर्ल्ड-रिसीवर पर तो मैं इस कद्र फिदा था कि जब कभी दिल्ली की तरफ जाने का प्रोग्राम बनता तो भी मैं इसे अपने साथ ही रखता...क्योंकि इस की रेंज दिल्ली से 60-70 किलोमीटर तक सुन रखी थी, इसलिए घर बैठ कर भी इस के प्रोग्राम सुनने का आनंद आता था। मुझे याद है कि कईं बार बिजली का साथ भी नहीं होता था, लेकिन इस ने कभी धोखा नहीं दिया......अब इतनी अच्छी सी क्लियर आवाज़ में जब दोपहर को 2-3 घंटे बढ़िया गाने बज रहे होते थे तो कज़िन वगैरह जरूर इस के बारे में पूछते थे.......आप को यह नहीं लगता कि एक तरह से मैं एफएम का एक सैल्फ-स्टाइल्ड ब्रांड-अम्बैसेडर ही बन चुका था। और हां, एक बात यह तो बतानी भूल ही गया कि उस वर्ल्ड-रिसीवर के साथ एक बड़ा सा एंटीना भी था, जिसे अकसर मुझे किसी लोहे की वस्तु से टच करवा कर रखना होता था, ताकि रिसैप्शन एकदम परफैक्ट हो।

इस के बाद की एफएम की यादों की बारात में फिर कभी शामिल होते हैं।

बरसों से सुनी जाती एक धुन और कलाकार अज्ञात

यह धुन दुनिया के एक बडे रेडियो पर आप बरसो‍ से सुनते आये है‍। बताइये ये कहां सुनी और किसकी बजाई या तैयार की हुई है?


और अब सुनिये फ़ायर नाइट नाम की यह रचना जिसे प‍डित रविशंकर ने लॉस एंजेल्स में लगी उस आग के बाद 1961 में तैयार किया था जिसमें भारी तबाही हुई थी. राग धानी के इर्द-गिर्द इस कम्पोज़ीशन में बाँसुरी,तबला-ढोलक और डमरू की मदद से एक शिव-तांडव और तबाही की थीम को जैज़ की ज़मीन पर इंम्प्रोवाइज़ किया गया है.

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ऐंजिल रिकॉर्ड्स - 7243567023-2

कार्यक्रमों के कलात्मक नाम

विविध भारती की चर्चा में हमेशा दो बातें सामने रही - इसके आरंभ से ही पंडित नरेन्द्र शर्मा जैसे साहित्यकार इससे जुड़े रहे और जयमाला, हवामहल कार्यक्रम शुरू से लेकर अब तक जारी है।

जयमाला फ़ौजी भाइयों का कार्यक्रम है जिसके लिए जयमाला बहुत ही उचित और कलात्मक नाम रहा है। हवामहल में जिस तरह से रोचकता बनी रहती है और मनोरंजन के लिए कभी-कभार ऐसे विषयों को भी चुना जाता है जो सामान्य नहीं होते। इन्हीं सब बातों से हवामहल नाम भी सार्थक होने के साथ-साथ कलात्मक भी है।

अब देखते है उन कार्यक्रमों के नामों को जो इसके बाद शुरू हुए और जिनमें से कुछ अब भी जारी है और कुछ बन्द हो चुके है। इनमें से बहुत से नाम ऐसे है जो प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं के नाम है जैसे -

रसवन्ती - रामधारी सिंह दिनकर, गुंजन - सुमित्रानन्दन पंत, सांध्य गीत - महादेवी वर्मा, मिलन यामिनी - हरिवंश राय बच्चन

सच कहें तो ये नाम कभी-कभी कार्यक्रम की प्रकृति से मेल नहीं खाते थे जैसे मिलन यामिनी, इस कर्यक्रम में एक कहानी को संवाद के साथ प्रस्तुत किया जाता था और साथ ही मेल खाते फ़िल्मी गीत बजते थे।

कुछ नाम बहुत ही सही रखे गए जैसे फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम मनोरंजन और मन चाहे गीत लेकिन ये नाम कलात्मक नहीं है।

कुछ नाम सार्थक भी है और कलात्मक भी जैसे - संगीत सरिता, स्वर सुधा, अपना घर, वन्दनवार, उदय गान, छाया गीत, अनुरंजिनी, गुलदस्ता, मंजूषा

अब उन नामों पर नज़र डालते है जो आजकल चल रहे है। आजकल मुझे दो ही नाम सही और कलात्मक लगते है - मंथन और सखि-सहेली।

सेहतनामा नाम से ऐसे लगता है जैसे कोई सेहत की डायरी बता रहा हो कि सुबह हल्का सरदर्द था, दिन चढते बुख़ार हो गया, शाम में खांसी हो गई रात में जाड़ा चढ गया।

कुछ नाम है - हैलो फ़रमाइश, क्या इस नाम को जयमाला संदेश की तरह आकर्षक नहीं रखा जा सकता। और इस नाम में तो हद ही हो गई - यूथ एक्सप्रेस।

ऐसा लगता है कि आजकल की पीढी के लिए ऐसे नाम रखे जा रहे है। लेकिन विविध भारती क्या यह नहीं देख पा रही है कि आजकल लड़के लड़कियों के नाम ऐसे जो हिन्दी तो क्या सीधे संस्कृत से लिए गए है - करण कुणाल नेहा श्वेता रूद्र

क्या पहले की तरह नामों की कलात्मकता को बनाए नहीं रखा जा सकता। हां नाम कार्यक्रम के अनुरूप जरूर होने चाहिए।

Tuesday, February 26, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो- डॉ पंकज अवधिया की अतिथी पोस्ट

जब पिछले वर्ष मई मे मैने मधुमेह पर पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर आधारित रपट लिखना शुरु किया तो मुझे 14-16 घंटे कम्प्यूटर पर बैठना पडा। तब से आज तक यह कार्य जारी है और लगता है कि 2010 तक चलता रहेगा। अकेले काम करना होता है इसलिये कभी-कभी बडी बोरियत होती है। इस समय मेरा वर्ल्ड स्पेस रेडियो सुनना बहुत काम आ रहा है। इतने सारे चैनल है पर मै अंग्रेजी गानो का शौकीन हूँ विशेषकर कंट्री गानो का। ये गाने मुझे और कही सुनने नही मिलते। आजकल पैसे देकर कौन रेडियो सुनता है? पिताजी के कमरे मे लगातार विविध भारती बजता रहता है और माताजी भी जब भी समय मिलता है यही सुनती है। शहर मे निजी एफ एम चैनलो की बाढ आ गयी है पर वे इतना जल्दी बोलते है कि सुनने के लिये सब काम छोडना पडता है। शाम को जब मै पास के हेल्थ क्लब मे जाता हूँ तो वहाँ जिम मे निजी चैनल विशेषकर रेडियो मिर्ची बजता है। युवा बडे मजे से गाते हुये व्यायाम करते रहते है।

तरह-तरह के चैनलो ने तो मानो क्रांति ही ला दी है। रायपुर मे पहचान के कई युवा इन निजी चैनलो मे काम करते है। उनपर काम का बडा दबाव रहता है पर फिर भी रेडियो पर उन्हे सुनने से ऐसा नही लगता। पिताजी मेरे वर्ल्ड स्पेस प्रेम पर अचरज करते है। एक साल रेडियो सुनने के लिये 1800 को वे फिजूलखर्ची मानते है। मै कहता हूँ कि इसमे विज्ञापन नही आते तो वे कहते है विविध भारती मे भी तो कम विज्ञापन आते है। जब मै हिंन्दी गाने सुनता हूँ तो वे अपने रेडियो की आवाज बढा देते है ताकि मै जान सकूँ कि मुफ्त मे भी ऐसे गाने सुने जा सकते है।

दोपहर को जब मै खाने की मेज पर पहुँचता हूँ तो माताजी का सखी सहेली कार्यक्रम चलता रहता है। लोग फोन करते रहते है और उन्हे गाने सुनाये जाते है। बीच मे खाने से पहले चाय के लिये किचन चला गया तो माँ कहती है देखो ये तुम्हारे व्लाग वाले युनुस खान बोल रहे है। युनुस जी को माताजी बडे दिनो से सुन रही है। एक बार तो उन्होने शनिवार के कार्यक्रम मे प्लास्टिक खाने वाले क़ीडे की खोज के बारे मे बताया बडे ही रोचक ढंग से। माताजी ने सब को रेडियो के पास बुला लिया। माता-पिता की खुशी का ठिकाना नही रहा। आखिर युनुस खान उनके अपने बच्चे की वैज्ञानिक उपलब्धियो के विषय मे बता रहे थे। मै तब युनुस जी के ब्लाग को नही जानता था। मुझे भी अचरज हुआ कि मेरी इस खोज को कैसे इन्होने इतने रोचक ढंग से प्रस्तुत किया।

बतौर बाल कलाकार मैने आकाशवाणी रायपुर मे काम किया। बच्चो के साप्ताहिक कार्यक्रम किसलय मे कम्पीयर रहा। मिर्जा मसूद और कमल शर्मा जी के साथ काम किया। कल्पना य़ादव और लाल राम कुमार सिंग जी के सानिध्य मे सीखा। पता नही अब कमल शर्मा जी को ये याद भी है या नही। ये सभी नाटक पिताजी ने टेप करके रखे है।

लीजिये अभी वर्ल्ड स्पेस के उर्दू चैनल मे मिर्जा गालिब के खत पढे जा रहे है। मै यह कार्यक्रम इसलिये सुनता हूँ क्योकि उस समय के हालात पता चल जाते है और गजले भी सुनने को मिल जाती है। पर उदघोषक कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिये मिर्जा गालिब की आवाज मे ही खत पढते है। इस ढंग से हमारे परिवार को इतनी एलर्जी हो गयी है कि अब यह कार्यक्रम मुश्किल से सुन पाते है। मैने उन्हे लिखा है पर अभी तक तो उस बेरुखी आवाज का कहर जारी है।

पंकज अवधिया
http://www.pankajoudhia.com

Monday, February 25, 2008

श्रोताओं से सीधे जुड़ती संगीत सरीता

फ़्यूज़न म्यूज़िक और भारतीय शास्त्रीय संगीत के मेल की जानकारी देती श्रृंखला सुर मंथन सुनी जिसे संगीत सरिता के लिए रूपाली रूपक ने वीणा राय सिंघानी के सहयोग से प्रस्तुत किया।

इस श्रृंखला में सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया ने विभिन्न रागों जैसे चारूकेशी आदि के लिए आरोह अवरोह के साथ दोनों तरह के संगीत की जानकारी दी। यह राग आधुनिक वाद्य यंत्रों पर फ़्यूज़न म्यूज़िक में भी सुनवाए गए।

जब बारी आई इन रागों पर फ़िल्मी गीत सुनवाने की तब उन्होंने कहा कि यह गीत सुनिए और इसका विवरण चिट्ठी लिख कर भेजिए या फोन पर बताइए। इस विवरण में श्रोताओं को बताना है कि गीत किसने गाया है और संगीतकार कौन है। गीत भी ऐसे लोकप्रिय सुनवाए गए जैसे -

देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए
दूर तक निगाह में है गुल खिले हुए

मैं सोच रही थी कि श्रृंखला के अंत में श्रोताओं की चिट्ठियां पढी जाएगी और उनके फोन काल सुनवाए जाएगें या कम से कम उनके नाम बताए जाएगें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कल इसकी आठवीं और अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। इस कड़ी में भी गीत सुनवाया गया और श्रोताओं से विवरण बताने को कहा गया।

यहां तक कि न फोन नम्बर बताया गया न पता बताया गया। इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई। वैसे संगीत सरिता में यह अच्छी शुरूवात है।

Saturday, February 23, 2008

रेडियोनामा के सदस्य कमल शर्मा से मुलाक़ात

मित्रो,

आज श्री कमल शर्माजी अपने कामसे समय निकाल कर मुझे मिलने आए और कई विषयों पर बातें की, जिसमें हमारे इस ब्लॉग के सभी मित्रो को भी हम दोनों ने याद किया।
मुम्बई जैसे शहर में इतने लंबे अन्तर से मिलने आना अपने काम से समय निकाल कर आना, अपने आपमें ही बहुत बड़ी बात है। समय कहाँ बीत गया वह पता ही नहीं चला। इस प्रथम मुलाक़ात की याद में मुझे प्रतीक रूप भेंट भी दी, जो हमेशा उनकी याद दिलाती रहेगी।
कमलजी ने मुझे पासवर्ड हईजेकिंग के बारे में मुझे जानकारी दी,और बताया कि इसको कैसे रोका जा सके। यह भी समझाया कि समय थोडा सा निकाल कर थोडा लिखा है। उस पर रेडियो श्रीलंका की अन्नापूर्नाजी की पोस्ट पर सूरत जाने के बाद लिखूंगा।
आवजो!!

edit by admin: Sagar Nahar

Friday, February 22, 2008

साफ़ आवाज़ की महंगी तकनीक

अभी-अभी पीयूष जी का चिट्ठा पढा कि वो मुंबई जा रहे है और अमीन सयानी साहब से भी मिलेंगे। तो मैनें भी सोचा कि क्यों न आज सिलोन पर ही कुछ लिखा जाए।

पिछले दिनों मैनें एक चिट्ठा लिखा था सिलोन की खरखराहट के बारे में जिसको लेकर पीयूष जी ने सिलोन के फोन-इन-कार्यक्रम में बात की और इस बारे में विस्तार से लिखा।

पीयूष जी का मानना है कि डी आर एम तकनीक से सिलोन की खरखराहट दूर हो जाएगी और प्रसारण साफ़ आएगा। जब इस बारे में सिलोन की उदघोषिका पद्मिनी परेरा जी से बात हुई तो पद्मिनी जी ने बताया कि जब विज्ञापनों से एक पैसे की भी आमदनी नहीं है तब इतनी महंगी तकनीक कैसे ख़रीदी जा सकती है ?

मैं समझ नहीं पा रही हूं कि यह तकनीक ऐसी कितनी महंगी है कि ख़रीदी ही नहीं जा सक रही। क्या इसका ख़र्च करोड़ों में है ?

क्या विज्ञापन देने वाली कोई भी कंपनी रेडियो सिलोन को यह तकनीक नहीं दे सकती ?

आज टेलीविजन के ढेर सारे चैनलों पर ढेर सारे विज्ञापन आते है। कहीं-कहीं तो एक ही विज्ञापन एक से अधिक चैनलों पर देखाई देता है। क्या ऐसे ही विज्ञापनों का आडियो भाग सिलोन के लिए नहीं भेजा जा सकता ?

पद्मिनी जी ने एक और मुद्दा उठाया, रिज़र्व बैंक के कड़े नियमों का। इन नियमों से पैसा सरकार को मिलता है। वैसे भी कंपनिया आयकर देती ही है। मुझे नहीं लगता कि सिलोन को विज्ञापन देने से कंपनियों को बहुत भारी ख़र्च हो सकता है।

दूसरा मुद्दा उठा विविध भारती से प्रतिस्पर्धा का। प्रतिस्पर्धा तो साठ और सत्तर के दशक में थी लेकिन आज तो सवाल ही नहीं उठता क्योंकि इतने टेलीविजन चैनल और निजि एफ़एम चैनलों कि होते हुए भी विविध भारती लोकप्रिय है।

विविध भारती के अपने श्रोता है जो विविध भारती के कार्यक्रमों के साथ-साथ अन्य चैनलों के कार्यक्रम भी देखते-सुनते है।

मुझे लगता है कि कंपनियां सिलोन को भूल सी गई है। अगर सिलोन द्वारा ही कंपनियों से विज्ञापन मांगे जाए तो शायद कंपनियां मना नहीं करेगी। मुझे नहीं लगता कि यह इतना ख़र्चीला है कि कंपनिया मना ही कर दें।

कम से कम तकनीक तो उपलब्ध करा ही सकती है जिससे प्रसारण साफ़ सुनाई दें। जब सिलोन साफ़ सुन सकेंगे तभी धीरे-धीरे विज्ञापन भी यहां बढने लगेंगे और सिलोन की स्थिति पहले जैसी हो जाएगी।

Thursday, February 21, 2008

थोड़े दिनका विराम

पाठक मित्रो नमस्कार,
कल मैं १० दिन के लिए मुम्बई जा रहा हू~म और विविध भारती के मित्रो से भी मिलू~मगा श्री अमीन सयानी साहबसे भी मुलाक़ात का समय तय हो गया है इस वक्त मेरे कम्प्यूटर में kuC प्रॉब्लम होने के कारण मैं अन्य कम्प्यूटर से लिख रहा हू~म हमारे इस ब्लॉग के साथी पाठक श्री कमल शर्माजी ने मुझे मिलाने आने का तय किया है , इस लिए उनका धन्यवाद करता हू~म वहा~म के अनुभव आने के बाद लिखू~मगा
आवजों
पियुष महेता

Wednesday, February 20, 2008

क्या आप अपने करियर की योजना बना रहे है ?

अगर आप युवा है और अपने करियर की योजना बना रहे है तो आपके साथ हम चर्चा करना चाहेगें मंगलरूपा सखि-सहेली की।

अरे नहीं ! हम किसी देवी या अवतार की बात नहीं कर रहे। हम तो चर्चा कर रहे है मंगलवार को विविध भारती से प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सखि-सहेली की।

यह केवल मंगलवार को ही प्रसारित नहीं होता है। यह सोमवार से शुक्रवार तक सप्ताह में पाँच दिन दोपहर 3 बजे से 4 बजे तक प्रसारित होता है।

जहाँ तक हमारी जानकारी है विविध भारती से लगभग तीन साल पहले शुरू हुआ यह अब तक का नया कार्यक्रम है। हमें याद नहीं कि इसके बाद कोई और कार्यक्रम विविध भारती से शुरू किया गया है, ख़ैर…

सखि-सहेली, महिलाओं के लिए, महिलाओं का, महिलाओं द्वारा तैयार एक बेहतरीन कार्यक्रम है। पहले, सप्ताह में एक बार बुधवार को प्रसारित होता था फिर पाँच दिन प्रसारित होने लगा फिर कुछ समय के लिए सातों दिन और आजकल पाँच दिन प्रसारित होता है।

हर दिन अलग-अलग रूप में प्रसारित होता है। आज हम चर्चा कर रहे है इसके मंगलवार को प्रसारित होने वाले रूप की जो वाकई मंगलकारी है। युवाओं के लिए यह मंगलमय है क्योंकि इस दिन युवा इस कार्यक्रम से दिशा-निर्देश ले कर अपना भविष्य तय कर सकते है।

हर मंगलवार को बताया जाता है किसी एक करियर के बारे में। पिछले सप्ताहों में बताया गया कि आप कैसे कंपनी सेक्रेटरी बन सकते है, कैसे बन सकते है सेना अधिकारी और कैसे अपना करियर बना सकते है प्रबन्धन में।

हर पेशे की पूरी जानकारी दी जाती है कि इस पेशे में जाने के लिए आपको कम से कम कितना पढा-लिखा होना है। इस पेशे में जाने के लिए आपको क्या पढाई करनी है। कितने साल तक पढना है। पाठ्यक्रम क्या होगा ? पत्राचार पाठ्यक्रम की सुविधा होगी क्या ?

इतना ही नहीं परीक्षाएं कब, कहां और कैसे होगी ? संपर्क करने के लिए कहां केन्द्र है और मुख्य केन्द्र का पता तक बताया जाता है। यह सारी जानकारी केवल लड़कियां ही नहीं लड़कों के लिए भी उपयोगी होती है।

घर बैठे और वो भी गाने सुनते हुए इतनी जानकारी मिल जाए तो फिर क्या बात है ! इसीलिए तो मंगलवार को गाने भी नई फ़िल्मों के सुनवाए जाते है जैसे कल पहला गाना सुनवाया गया शान की आवाज़ में साँवरिया फ़िल्म का। वैसे तो गाने हर दिन सुनवाए जाते है पर इस दिन नए गानों की फ़रमाइश पूरी होती है।

तो हर मंगलवार सुनिए सखि-सहेली और बनाइए अपना करियर और धन्यवाद दीजिए कमलेश (पाठक) जी और उनकी टीम को।

Monday, February 18, 2008

स्वयंवर

इतिहास हमेशा से ही फ़िल्मकारों, साहित्यकारों का प्रिय विषय रहा है। मुग़ले आज़म से लेकर जोधा अकबर तक हर दौर में फ़िल्मकारों ने इतिहास से विषय लिए है। कितने ही उपन्यासों, कहानियों, नाटकों और कविताओं का विषय ऐतिहासिक घटनाएं और पात्र रहे है।

इसी तरह टेलिविजन और रेडियो में भी इतिहास से विषय लिए गए है। और क्यों न लिए जाए ? इतिहास में सब कुछ होता है - युद्ध की विभीषिका, प्रेम प्रसंग, गीत-संगीत का पूरा अवसर, राजनीति-कूटनीति और समाज के लिए किए जाने वाले कल्याणकारी कार्य।

इन दिनों टेलिविजन पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में एक ही ऐतिहासिक धारावाहिक है - स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला पृथ्वीराज चौहान। आजकल ये संयोगिता के स्वयंवर की ओर बढ रहा है।

ऐसे में मुझे याद आ रही है हवामहल में बहुत समय पहले सुनी गई झलकी - स्वयंवर। इस झलकी में जयचन्द के दिल्ली से रिश्तों के साथ स्वयंवर की झलक थी। किस तरह पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति को द्वारपाल की जगह रखा देखकर सभी आमंत्रित राजा उपहास करते है और फिर एक-एक कर राजाओं के पास से गुज़रती हुई संयोगिता उस मूर्ति के गले में वरमाला डालती है फिर पृथ्वीराज चौहान सामने आ कर उसे हर ले जाते है।

छोटी सी झलकी में पूरे विषय को अच्छी तरह संपादित किया गया था। शायद संयोगिता की सखि का नाम चन्द्रिका बताया गया था जबकि धारावाहिक में वैशाली बताया जा रहा है, खैर… इतिहास की इतनी जानकारी तो हमें नहीं है।

और हां, हवामहल कार्यक्रम के स्वभाव के अनुरूप एक ऐसी ही हास्य झलकी भी प्रसारित हुई थी जिसमें आधुनिक लड़की स्वयंवर रचाती है।

बात इतिहास की करें तो हमारी जानकारी में हवामहल में प्रसारित होने वाली यह एक ही झलकी है जो ऐतिहासिक विषय पर है। इसके लेखक, प्रस्तुतकर्ता और कलाकारों के नाम हमें याद नहीं आ रहे है।

Saturday, February 16, 2008

कभी कभी विविध भारती पर बहुत गु़स्सा आता है !

वाक़ई...सच लिख रहा हूँ.
आज यानी १६ फ़रवरी की बात है. भूले-बिसरे गीत सुन रहा था. कोई नये उदघोषक थे. साहब न कार्यक्रम के मूड को समझते थे न विविध भारती की उजली विरासत को. ऐसे नाटकीय अंदाज़ में बोल रहे थे जैसे किसी आर्केस्ट्रा कार्यक्रम का संचालन कर रहे हों ( वह भी बहुत अलग होता है) गुले बकावली फ़िल्म से एक गीत रफ़ी साहब द्वारा गाया जाना था...उदघोषकजी ने संगीतकार का नाम कहा हँसराज हँस. जी हँसराज हँस , पंजाबी लोक-गीत गाय. होना चाहिये था..हँसराज बहल ! बोल चुकने के बाद क्षमा करिये हँसराज...और बस चुप्पी. अब मेरे जैसे पुराने फ़िल्म संगीत के छोटे-मोटे दर्दी के लिये तो ये कुफ़्र ही समझिये. ये नये अनाउंसर्स समझते ही नहीं कि विविध भारती सिर्फ़ एक रेडियो स्टेशन नहीं एक जीता-जागता दस्तावेज़ है. इन उदघोषकजी की मेहरबानी के साथ शहद जैसे मीठे गानों के बीच कौवे की कौं कौं के जैसे बजते स्कूल चलें हम के इश्तेहार भी कान के स्वाद को बेमज़ा करते हैं. माना विविध भारती की अपनी वित्त्तीय मजबूरियाँ हैं लेकिन कम से कम सुबह ६ बजे से ८ बजे तक का सुरीला ट्रांसमिशन तो बख्श दीजिये हुज़ूर ! और हाँ याद आया...सुबह अर्पण कार्यक्रम समाप्त होते ही स्थानीय केन्द्र का उदघोषक दिन भर के विविध भारती आकर्षणों की जानकारी देता है. लेकिन क्या इसे जानकारी इसे कहेंगे.... सरगम से सितारे......बजे....हवा महल......बजे...अरे भाई आज इन कार्यक्रमों में क्या होने वाला है ये भी तो बताइये...कौन है सरगम के सितारे कार्यक्रम का मेहमान...यदि वह स्वानंद किरकिरे है तो इस इन्दौरी बाशिंदे को कई इन्दौरी श्रोता सुनना चाहेंगे...हवा महल में यदि म्युज़िक मास्टर भोलाशंकर आ रहे हैं तो गणपतलाल डांगी जी के कई क़द्रदान जयपुर में हैं....मुंशी इतवारीलाल आ रहे हैं तो लख़नऊ में विनोद रस्तोगी के चाहने वाले आज भी कम नहीं हुए....यह स्थानीयता ही तो रेडियो की ताक़त है जनाब....अल्लाह के लिये उसे ख़त्म न कीजिये ....वरना विविध भारती अपना वजूद ही खो बैठेगी.

उच्चारण के मामले में भी इन दिनों विविध भारती में बेफ़िक्री है. अभी पिछले दिनो नग़मा-निगार(यानी गीतकार) को एक अनाउंसर नग़मा-निसार कह रहे थे. अब बताइये जिस विविध भारती को सुन सुन कर हज़ारों लोग बोलना सीखते हैं उन्हे इन अनाउंसमेंटस से क्या मिलेगा.
एफ़.एम स्टेशनों की बाढ़ ने जिस तरह का कानफ़ोडू संगीत परोसा है लगता विविध भारती के हुक़्मरान उससे बेख़बर हैं.जनाब हमें शहद चाहिये......मधुमख्खियों की भन भन नहीं...तरस खाइये हम पर...हम विविध भारती के श्रोता मात्र नहीं उसकी संगीत यात्रा के शेयर होल्डर्स हैं.

Friday, February 15, 2008

समाचार सुनने की शुरूवात

समाचार सुनने की वास्तविक शुरूवात कब से हुई यह कहना कठिन है क्योंकि जब मुझे ठीक से समझ में भी नहीं आता था केवल सुना करती थी तब से ही सुनती रही -

ये आकाशवाणी है, अब आप देवकीनन्दन पाण्डेय से समाचार सुनिए

धीरे-धीरे समझ में आने लगा तब समाचारों का समय अच्छा नहीं लगता था क्योंकि इस समय गाने सुनने को नहीं मिलते थे, पर सुनते-सुनते समाचार सुनने की भी आदत सी हो गई।

बचपन से ही सवेरे आठ बजे और रात में पौने नौ बजे के दो मुख्य समाचार बुलेटिन रोज़ सुने। इसके अलावा शाम में 5:50 से क्षेत्रीय समाचार - उर्दू ख़बरें और फिर पाँच-पाँच मिनट के अँग्रेज़ी और हिन्दी में दिल्ली से प्रसारित होने वाले समाचार बुलेटिन सुने जाते थे। कभी कभार शाम के समाचार नहीं भी सुने जाते पर सुबह और रात के समाचार कभी नाग़ा नहीं हुए थे।

दूरदर्शन से राष्ट्रीय प्रसारण की शुरूवात फिर उसके बाद केबल नेटवर्क आने के बाद रात के समाचार सुनना तो बन्द हो गया पर सुबह के समाचार आज भी निरन्तर सुने जा रहे है।

पिछले लगभग पाँच सालों से सुबह 6 बजे के समाचार भी नियमित सुने जाते है। रात के समाचारों के बदले शाम 7 बजे का बुलेटिन रोज़ सुना जाता है।

बचपन से ही रोज़ सुनने से कई आवाज़ों से परिचय हुआ - देवकीनन्दन पाण्डेय, राजेन्द्र चुग, विनोद कश्यप, पँचदेव पाण्डेय, इन्दु वाही, अखिल मित्तल, आशुतोष जैन, चन्द्रिका जोशी, लोचनीय अस्थाना, कनकलता, आशा द्विवेदी और भी कुछ नाम। ये आवाज़े घर के सदस्य की आवाज़े लगती है।

बहुत ही साफ उच्चारण के साथ समाचार पढे जाते है। कई विदेशियों के नाम चाहे यूरोपीय देशों के हो या एशियाई देशों के, पाश्चात्य नामों के अलावा खाड़ी देशों के व्यक्तियों के नाम जो उच्चारण में बहुत ही कठिन होते है, इतनी स्वाभाविकता से पढे जाते है जैसे कोई अपने भारतीय नाम हो।

समाचारों की भाषा भी आकाशवाणी में इतनी सरल रखी जाती है कि कम पढे लिखे लोग भी आसानी से समझ सकते है। आजकल टेलीविजन के समाचार चैनलों में ऐसी मुहावरेदार भाषा का प्रयोग होता है कि समझना कठिन हो जाता है।

मेरा मानना है कि जो अख़बार नहीं पढ सकते और जो शिक्षित भी नहीं है वे अगर रेडियो के समाचार बुलेटिन रोज़ सुन लें तो देश-दुनिया में क्या हो रहा है, इसकी अच्छी जानकारी मिल जाएगी।

Wednesday, February 13, 2008

नावेलों की दुनिया

नावेल यानि उपन्यास जिसे पढना बहुत अच्छा लगता है। एक कोने में बैठ कर आप उपन्यास पढिये और आनन्द लीजिए, लेकिन एक व्यक्ति उपन्यास पढे और लाखों लोग इसे सुने तो सभी एक साथ आनन्द ले सकते है।

आज एक ऐसे ही कार्यक्रम की मैं चर्चा कर रही हूं जो आकाशवाणी हैदराबाद केन्द्र का बहुत ही लोकप्रिय कार्यक्रम रहा है - नावेलों की दुनिया

इस कार्यक्रम की शुरूवात हुई अस्सी के दशक में। वर्ष 1981 में प्रेमचन्द के जन्मदिन पर कई कार्यक्रमों का आयोजन हिन्दी से जुड़े संस्थान कर रहे थे। तभी आकाशवाणी हैदराबाद केन्द्र से गोदान पढना शुरू किया गया। यह उर्दू विभाग द्वारा दैनिक उर्दू कार्यक्रम नयरंग में रात 9:30 बजे 10 मिनट के लिए पढा जाने लगा।

प्रेमचन्द शुरू में उर्दू में लिखा करते थे और गोदान उपन्यास उर्दू और हिन्दी दोनों में है। गोदान पढने के बाद तो जैसे ताँता लग गया। सप्ताह मे 5-6 दिन नियमित एक के बाद एक उपन्यास पढे जाने लगे।

कार्यक्रम उर्दू का होने से सभी उर्दू उपन्यास पढे गए। इनमें एक ओर तो जिलानी बानो का उपन्यास एवाने ग़ज़ल शामिल रहा तो दूसरी ओर इब्नोद वक़्त जैसे नावेल भी शामिल किए गए यहां तक कि मशहूर नावेल उमराव जान अदा भी पढा गया।

उर्दू और हिन्दी में सिर्फ़ लिपि का ही फ़र्क है इसीलिए उर्दू नहीं जानने वाले हिन्दी के श्रोता भी इन उपन्यासों का आनन्द लेने लगे।

हिन्दी कार्यक्रमों में केवल एक ही पुस्तक पढी गई - डिस्कवरी आँफ इंडिया का हिन्दी संस्करण।

उर्दू में युववाणी कार्यक्रम में भी नावेल पढे जाने लगे। इन नावेलों को पढने वाले थे उर्दू के उदघोषक और कार्यक्रम अधिकारी - मोहन सिन्हा, महजबीं रानी, शुजात अलि राशिद और ज़ाफर अलि खाँ

पहले इन नावेलों को सिर्फ़ पढा जाता था। बाद में हल्का सा नाट्य रूपान्तर किया जाने लगा यानि पढते-पढते जब संवाद आ जाते तब ये संवाद महिला और पुरूष की आवाज़ों में बोले जाने लगे। बाद में नाटकों की तरह डबिंग भी की जाने लगी। कुछ ख़ास दृश्यों में संगीत संयोजन भी किया जाने लगा। अब समय भी १० से १५ मिनट हो गया।

लगभग बीस साल तक चला ये सफ़र अब कुछ थम सा गया है। पिछले लगभग चार सालों से ये कार्यक्रम प्रसारित नहीं हो रहा है।

Monday, February 11, 2008

केतगी गुलाब जूही चंपक बन फूले

आज सवेरे ७ बजे जब भूले बिसरे गीत की शुरूवात हुई तब लग रहा था कि विविध भारती शायद मौसम के अनुसार बसन्त मनाती है इसीलिए देश भर में फैले सर्द मौसम और बूँदा-बाँदी से बसन्त का स्वागत नहीं करना चाहती।

तभी गूँजी भीमसेन जोशी की आवाज़ -

केतगी गुलाब जूही चंपक बन फूले

और लगा भई वसन्त तो तिथि के अनुसार आता है। यह एक ही गीत था वसन्त का जो इस कार्यक्रम में सुनवाया गया।

मुझे स्त्री फ़िल्म का महेन्द्र कपूर और साथियों का यह गीत भी याद आ रहा है जिसे सुने बहुत समय बीत गया -

वसन्त है आया रंगीला

एक और गीत - अशोक कुमार और देविका रानी पर फ़िल्माए गए लोकप्रिय गीतों में से एक -

अमवा की डाली-डाली झूम रही है बाली
मतवाले मतवाले मतवाले
मैं चाल चलूं मतवाली

इस गीत के अलावा और भी कुछ गीत ऐसे है जिसे बहुत समय से नहीं सुना।

फ़िल्म दिल्लगी के दूसरे गीत तो बजते है पर सुरैया और श्याम का ये गीत नहीं सुना -

तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी
तू मेरा राग मैं तेरी रागिनी
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ
नहीं दिल का लगाना कोई दिल्लगी कोई दिल्लगी

इसी तरह बाबुल फ़िल्म का ये युगल गीत जो तलत महमूद और शमशाद बेगम की आवाज़ों में है -

मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना किसी का
अफ़साना मेरा बन गया अफ़साना किसी का

वैसे तो भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में वो गीत सुनवाए जाते है जो कम लोकप्रिय है यानि जो भूले बिसरे है लेकिन ये लोकप्रिय गीत भी बहुत समय से सुने नहीं गए तो ये गीत भी तो भूले बिसरे ही हो रहे है।

Friday, February 8, 2008

भारतीय ताल वाद्य और फिल्म संगीत

संगीत सरिता कार्यक्रम में इन दिनों एक बहुत अच्छी श्रंखला चल रही है - भारतीय ताल वाद्य और फिल्म संगीत जिसे प्रस्तुत कर रहे है कांचन (प्रकाश संगीत ) जी और उनके सहयोगी दिलीप ( कुलकर्णी ) जी और वीना ( राय सिंघानिया ) जी।

प्रसिद्ध तबला वादक श्री बाल कृष्ण अय्यर जी से निम्मी ( मिश्रा ) जी की बातचीत पर आधारित इस कार्यक्रम में ताल वाद्यों की जानकारी दी जा रही है।

शुरूवात में पखावाज की जानकारी दी गई जिसके बाद मृदंगम की। कई नई बातें सामने आई जैसे कि संस्कृत शब्द मृदा यानी मिट्टी से बने इस वाद्य का नाम इसीलिए मृदंगम है। वाद्यों की पूरी जानकारी के साथ-साथ जब वादक पार्थ सारथी जी और शेखर जी बजा कर सुनाते है तो सारी बातें बहुत अच्छी तरह से समझ में आ जाती है।

पिछली कडियों में तबले की जानकारी दी गई जिसमें कई बातें ऎसी थी जो शास्त्रीय सन्गीत की जानकारी नहीं पर रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी रही जैसे तबले को कैसे बांधा जाता है और आटा लगाया जाता है।

इसी तरह उप ताल वाद्यों - खंजीरा और मोर सिंग (शायद लिखने में गलती हो ) के बारे में भी बताया गया कि इनका प्रयोग कर्णाटक संगीत में अधिक होता है। यहाँ यह नहीं बताया गया कि हिन्दुस्तानी भक्ति संगीत में जैसे मीरा और कबीर के भजनों में जिस मंजीरा का प्रयोग किया जाता है क्या यह और खंजीरा अलग है। मीरा के तो एक हाथ में तम्बूरा होता है और एक हाथ में मंजीरा.

इसी तरह सूफी फकीर भी चिमटा बजाते है। क्या यह भी ताल वाद्य है ?

आज तेरहवीं कडी में ढोल की बात हुई। महाराष्ट्र , गुजरात और पंजाब के ढोल और लोक संगीत की बात चली। पंजाब के गले में लटकाने वाले जिस छोटे ढोल की बात चली यही ढोल दखिनी लोक संगीत में भी है। हैदराबादी उर्दू यानी दखिनी जबान में लोक गीतों को तो ढोलक के गीत ही कहते है। इनमें से एक गीत फिल्म बाजार में पैमिला चोपडा और साथियो की आवाजों में है -

चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारी रे

आशा है आगे की कडियों में इस पर भी चर्चा होगी।

Thursday, February 7, 2008

रेडियो सिलोन

आदरणिय श्रीमती अन्नपूर्णाजी,
आज आपने रेडियो सिलोन की चर्चा फिर एक बार छेडी है तो उस बारेमें आपसे कहना चाहता हूँ, कि आज मैनें एक बार फिर रेडियो श्रीलंका के फोन इन कार्यक्रममें भाग लिया और उस कार्यक्रममें रेडियो श्रीलंकाके मेरे कुछ पूराने पर मेरे परिचयमें अभी अभी ही आने वाले श्रोताओं के नामों के साथ आप का जिक्र एक बार फिर किया, एक पूरानी पर नयी श्रोता और इस ब्लोग लेखिका के रूपमें रेडियो सिलोन के चाहक के रूपमें । वैसे मेरी पूरानी रेकोर्डिंग को कोनसा नाम दिया है वह याद नहीं आ पाने की वजहसे ही आज आपकेर नाम का जिक्र किया है और उसे रेकोर्ड करके इधर सुनाने कि कोशिश कर रहा हूँ । अगर पूरानी रेकोर्डिंग मिल पायेगी तो कभी वह भी रखूँगा । वैसे एक बात खास कहूँगा कि एक बार वहाँ कि उद्दघोषिका श्रीमती पद्दमिनी परेराजी से मैनें शोर्ट वेव और मिडीयम वेव के लिये उपयोगमें भविष्यमें ली जाने वाली डी आर एम तक़निक के बारेंमें बात कि तब उन्होंने सीधी सी बात कही कि, उनके पास आज विज्ञापनो से होने वाली आमदानी एक पैसे की भी नहीं है तो वे लोग नयी तक़निक कहाँ से खरीद सकेंगे । आज भारतिय रिझर्व बेन्कने करीब १९६७ से ही विदेशी मूद्रा निती सख्त बना रखी है, विविध भारती को फायदा कराने की भी इसमें चाह होगी ही होगी । मुम्बई के एक मेरे मित्र श्री प्रभाकर व्यास तो करीब ७५ साल से भी ज्यादा उम्र के है वे श्री मनोहर महाजनजी के साथ मिल कर रेडियो सिलोन की हिन्दी सेवा को कैसे बचाया जाय और मजबूत किया जाय उसका अभियान चला रहे है । मैं मुम्बई उनके धर जा के आया हूँ और एक बार वे भी मेरे धर आ चूके है । कल म्रेरे घर राजकोट के श्री मधूसूदन भट्टजी भी आये थे । श्री प्रभाकर व्यास का सम्पर्क ०९२२३४८७५७९ पर हो सकता है । अब नीचे सुनिये मेरी श्रीमती ज्योति परमारजी के साथ हुई और आज सजीव प्रसारित हुई बातचीत |
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यहाँ मेरी आव।झ आपको मेरी और रेडियो से आने वाली थोडी दबल सुनाई पडेगी इस लिये थोडी चला ले ऐसी आशा रखता हूँ ।

Wednesday, February 6, 2008

सीलोन की खरखराहट

हमारे देश में रेडियो सीलोन एक लोकप्रिय चैनल रहा है। आज भी ऐसे लोग मिल जाएगें जो सीलोन सुनना पसंद करते है।

६० और ७० के दशक में जब रेडियो सीलोन का बहुत बोलबाला था तब भी बहुत से रेडियो सेट में साफ सुनाई नहीं देता था। खरखराहट रहती थी। तब लगता था कि पास के देश से प्रसारित हो रहा है इसीलिए तकनीकी समस्या है।

आज तकनीकी रुप से बहुत उन्नति हो गई है। टेलीविजन के प्रसारण तो बहुत साफ आते है। साफ तस्वीर और साफ आवाज के साथ सिर्फ अपने देश में ही नहीं बल्कि साथ-साथ आस-पास के देशों में भी देखे जा सकते है। फिर भी सीलोन के प्रसारण में तकनीकी समस्या है।

आज भी सीलोन साफ सुनाई नहीं देता। खरखराहट पहले की तरह ही है। क्यो साफ सुनाई नही देता ? किस तरह की तकनीकी समस्याएं है ? इसे कौन , कैसे और कहां से दूर किया जा सकता है ? लगता है इन सवालो पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा।

लगता है सभी टेलीविजन चैनलो और रेडियो के एफएम चैनलो से इतने जुड़ गए है कि इस बारे में कोई सोच ही नहीं रहा। वरना मुझे लगता है कि संचार क्रांति के इस दौर में सीलोन की खरखराहट दूर करना मामूली सी बात है।

Monday, February 4, 2008

अथः प्रेम पुराण आख्यानम !

कल जुबली झंकार में सबसे पहले सुने हवामहल की झलकियों के अंश। सभी झलकियां हमारी पसन्द की थी। बड़ी बात ये है कि एक भी झलकी हम भूले नहीं थे। सबसे मज़ेदार थी करौंदे की चटनी।

फिर सुना प्यार हुआ इकरार हुआ। जैसे कि विज्ञापन में बताया गया था - हेवी डोज़, मुझे तो यह लार्ज डोज़ लगा। लम्बा लेकिन गहराई नहीं। क्षमा कीजिए इस कार्यक्रम के बारे में पोस्ट भी पढी, टिप्पणियां भी पढी पर… मुझे कार्यक्रम अच्छा तो लगा पर परफैक्ट नहीं लगा।

हमारे लिए प्यार गुलज़ार के शब्दों में आँखों की महकती ख़ुशबू है जिसका अनुभव हमें इस कार्यक्रम में नहीं हुआ। यूनुस जी ने अनिता जी का परिचय दिया कि वो मनोविज्ञान पढती-पढाती है। जब बात चली जब वी मेट की तो यहां मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ज़रूरी था।

जैसे कि कमलेश (पाठक) जी ने बताया कि जब उन्होनें हरीश जी को देखा तो लगा कि यही है… इस स्थिति की मनोवैज्ञानिक व्याख्या अगर अनिता जी से ली जाती कि क्यों और कैसे किसी विशेष व्यक्ति को देखकर मन के तार झनझनाते है।

जब पहली बार देखते है तब ही क्या विवाह का निर्णय ले लेते है, मुझे नहीं लगता ऐसा, मेरी समझ में पहले मुलाक़ात होती है फिर दोस्ती और ये दोस्ती कब प्यार में बदलती है पता ही नहीं चलता तब होता है विवाह का निर्णय।

सभी इस प्रक्रिया के दौर से गुज़रते है जिसकी कोई चर्चा नहीं हुई। ऐसा तो नहीं होता कि आपने देखा और आपको लगा कि यही हो सकता है मेरा जीवन साथी और तुरंत हो गया गंधर्व विवाह।

प्रक्रिया मन ही मन चलती है जिसे बताना आसान नहीं होता क्योंकि इतनी इमानदारी से बात नहीं की जा सकती।

ऐसा ही एक और मुद्दा है बाह्य सौन्दर्य का। जब हम पहली बार देखते है तो क्या देखते है बाहरी व्यक्तित्व ही। उसके गुण व्यवहार आदि तो बाद में पता चलते है यदि हां किसी घटना के दौरान अगर आपने किसी को देखा हो जैसे कोई किसी से बात कर रहा हो, सहायता कर रहा हो तब बात और है।

लेकिन यहां तो बताया गया कि विभाग में वो बाहर से भीगी हुई आई और पूछा कक्षा चल रही है इन्होंने कहा नहीं जबकि कक्षा चल रही थी। जो हुआ वो बाहरी सौन्दर्य का ही असर था क्योंकि उस समय और तो कुछ पता नहीं था।

बाहरी सौन्दर्य की स्वीकारोक्ति भी हुई फिर जब लगा कि माध्यम रेडियो है तो लीपा-पोती हो गई।

सच्चे प्यार की बात तो मुझे नागवार गुज़री। एक से सच्चा प्यार हुआ, फिर कुछ हुआ तो टूट गया फिर दूसरे से सच्चा प्यार हो सकता है, प्यार न हुआ आलू की बोरी हो गई जिधर टिका दो टिक गई।

सच्चे प्यार में ममता जी सिर्फ़ जोड़ियां होती है, लैला मजनू, किसी तीसरे नाम की गुंजाइश ही नहीं होती। जब दूसरे से भी सच्चा प्यार हो सकता है तो कर लेते अरेन्जड मैरेज, पत्नी से भी प्यार हो ही जाता।

हमारे लिए तो प्यार वो है जो फ़िल्म बाँबी में देखा था। कच्ची उमर, चले जा रहे है दोनों बाइक पर, नहीं जानते कहां जाना है, ये भी ध्यान नहीं है कि कुछ दूर जाने के बाद जब बाइक में पेट्रोल ख़त्म होगा तो आगे कैसे जाएगें।

जब ये सोचा जाने लगता है कि ढाई सौ रूपए का स्टाइफन तो है गुज़ारा हो जाएगा, कर लेते है शादी तो ये भी अरेन्जड मैरेज ही होती है फ़र्क इतना है कि अरेन्जड मैरेज घर के बड़े तय करते है यहां आप ही तय कर रहे है।

Sunday, February 3, 2008

२ फरवरी श्री केरशी मिस्त्री साहब का जन्म दिन



भारत के एक जमाने के मशहूर पियानो वादक श्री केरशी मिस्त्री साहब का जन्म २ फरवारी, २०१९ के दिन भारत की पहली हिन्दी फिल्म (बोलती) आलम आरा के संगीतकार श्री पिरोज़ मिस्त्री साहब के यहाँ हुआ था । इस तरह संगीत के संस्कार उनहें पैदायसी प्रप्त हुए । पढाई के बाद वे एच. एम. वी. में पियानो वादक और वाद्यवृन्द संचालक बने । और उनके साथ ज्न्होंने कई वादक कलाकारों को अपने संचालनमें कई ७८ अर. पी. एम. तथा ई.पी.स और एल. पी.स में स्थान दिया ।
रेडियो श्री लंका से कल उनके जन्म दिन पर मेरे नाम के साथ उनको बधाई देते हुए उद्दधोषिका श्रीमती पद्दमिनी परेराजी ने पूरानी फिल्मों के गीतो की समाप्ति के बाद उनकी बजाई हुई वाद्ययंत्र सोलोवोक्स पर बजाई धून जो फिम्ल मेरा साया से है, और गीत शिर्षक गीत ’तू जहाँ जहाँ चलेगा’ की प्रस्तूत की थी जिसमें मेलोडी भाग को छोड़ कर असली गाने के वाद्यवृन्द वाला भाग स्व. श्री गुडी शिरवाईने एकोर्डियन पर बजाया है । वैसे श्री केरशी मिस्त्री साहबने कई मंच कार्यक्रममें एकोर्डियन खुद भी बजाया है । इस धून को इधर उस बधाई संदेश के साथ ही मैंनें प्रस्तूत किया है । उस समय मेरे धर के रेडियो श्री लंका पकडा नहीं गया था । तो मैनें मेरे परम मित्र और स्व. महमद रफी साहब के नामवर दिवाने और रफीं साहब के कौटूम्बीक मित्र रहे श्री जिमी बी. वाडियाजी को फोन लगाया और उनसें बिनती की की कि, वे अपना रेडियो फोन के पास रखे और मैनें स्पीकर फोन चालू किया और माईक्रोफोन से अपने यहाँ रेकोर्ड किया । इस की जो भी गुणवत्ता है आप चला लेगे ऐसी आशा है । साथमें मेरी उनके साथ उनके धर पे खिंची गयी तसवीर भी है ।

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प्यार हुआ इकरार हुआ... पहले सुनिए, फिर कुछ कहिए!

विविध भारती पर 3 फरवरी 2008 को दोपहर ढाई बजे से शाम साढ़े पांच बजे तक एक विशेष स्वर्ण जयंती कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया जिसका थीम था - प्यार हुआ इकरार हुआ.

कुछ विवरण यहाँ पढ़ें


विविध भारती की जुबली झंकार की झनझनाहट सुनी क्या?

प्यार हुआ इकरार हुआ

मात्र झलक

यकीनन. इसके सुनने के बाद प्यार का जो बुखार चढ़ेगा, वो
शर्तिया हफ़्तों, महीनों नहीं उतरेगा.
तो फिर देर किस बात की, दिए गए लिंक क्लिक करिए व सुनिये

और हाँ, धन्यवाद यूनुस जी व संपूर्ण विविध भारती की टीम को इस शानदार प्रस्तुति के लिए.
यूनुस जी ने इसे खासतौर पर कोई सप्ताह भर में इसे संपादित किया था. और क्या खूब संपादित किया था. इसीलिए संपूर्ण रेकॉर्डिंग प्रस्तुत है - शाम पांच बजे का समाचार भी - ताकि सनद रहे...

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विविध भारती की जुबली-झंकार की झनझनाहट सुनी क्या ?


अभी अभी विविध भारती की जुबली -झंकार के अंतर्गत पेश किया गया प्रोग्राम प्यार-हुया इकरार हुया सुन कर हटा हूं। कुछ दिन पहले अनिता जी ने इस के बारे में अपनी एक ब्लोग पोस्ट में लिखा था। लिखा क्या था…एक बढ़िया सा ट्रेलर पेश किया था। सो, इसे सुनने की काफी उत्सुकता थी। लेकिन शायद , फिर इस को सुनना भूल जाता अगर अनिता जी ने कल ही की अपनी पोस्ट में एक बार फिर इस का टाईम हम सब को याद न दिलाया होता ।

प्रोग्राम बहुत अच्छा लगा। इसे प्रस्तुत करने का ढंग भी बहुत बढिया था। ऑडियो-विज़ुयल मीडियम की कितनी ही ऐसी लिमिटेशन्स होंगी जिन को बखूबी ओवरकम किया गया…और वह भी बहुत ही प्रभावपूर्ण एवं क्रियेटिव ढंग से। प्रोग्राम बढ़िया था….इस का सब से बड़ा सबूत तो यही है कि इस ने हमें अपने रेडियो के साथ तीन घंटे तक जोड़े रखा….और वह भी उस दौर में जब एक मिनट के बाद अगर टीवी के चैनल को अगर न बदला जाए तो बोरियत महसूस होने लगती हैऔर हाथों में खुजली होनी शुरू हो जाती है। लेकिन अफसोस यही कि पांच बजे के समाचारों के बाद अगले लगभग बीस -पच्चीस मिनट तक तो यह मेरे रेडियो सैट से गायब हो गया …..पता नहीं क्या कारण था…..बस, जब फिर से लगा तो इस प्रोग्राम के विजेताओं के नाम घोषित किए जा रहे थे। वह पार्ट भी अच्छा लगा। बहरहाल हम तो इस को लगभग अढ़ाई घंटे ही सुन पाये।

इस प्रोग्राम के बारे में मैं यह टिप्पणी एक ऐसे इंसान की हैसियत से दे रहा हूं जिस ने रेडियो के गीत सुनते ही होश संभाला, रेडियो की दुनिया के साथ ही विचरते हुए कुछ सपने बुन डाले,. कुछ पूरे हो गयें, कुछ अभी बाकी हैं…..कहने का भाव यह कि सारी लाइफ ही हो गई इस रेडियो को सुनते हुये। एंटरटेनमेंट के सब साधन उपलब्ध हैं,लेकिन पता नहीं इस कमबख्त डिब्बे में ऐसी क्या बात है कि गाने इस पर सुनकर जितना आनंद आता है , उतना कहीं भी नहीं आता।

§ सब से पहले तो प्रोग्राम के परिचय से ही करते हैं…शायद यह परिचय महेंन्द्र जी ने दिया है। बेहद उम्दा ढंग था , आवाज़ का जादू भी उतना ही बढिया…….कितने सशक्त ढंग से उन्होंने विविध भारती की इस प्रस्तुति को वसंत-पर्व एवं वेलेंन्टाइन -डे के साथ जोड़ दिया । बेहतरीन…..नहीं तो मेरे जैसा एक औसत दर्शक तो यही समझ रहा होता कि यार , अब इस जुबली झंकार से चार-जोड़ों का क्या संबंध…लेकिन प्रोग्राम की इंट्रो से सब कुछ स्पष्ट हो गया। इतना ही नहीं, ऊपर से यूनुस जी( डा अजित कुमार जी, देखिए अब मैं यूनुसजी एवं यूसुफ जी के नाम को कंफ्यूज़ करने की गुस्ताखी नहीं कर रहा हूं…वैसे एक बात सचसच बताऊं कि यह आप की उस दिन आईआईटी वाली पोस्ट पर दी गईटिप्पणी रूपी फटकार का ही असर है….आप का बहुत बहुत आभार) ने वह तूफानी गाना भी बजा दिया……..मोहब्बत है क्या चीज़ , हम को बताओ………बस सारे श्रोताओं को खींच कर रेडियो के सैट के पास लाने के लिय़े यह काफी था।

§ इस के बाद इस प्रोग्राम में भाग लेने वाले जोड़ों एवं संचालकों एवं निर्णायक मेहमानों को भी बेहद बेहतरीन ढंग से श्रोताओं के सामने पेश किया गया। हिमानी शिवपुरी एवं सुधीर दलवी जी को उन की फिल्मों के आडियो क्लिप्स के ज़रिये इंट्रोड्यूस करवाना बहुत इन्नोवेटिव एवं इफैक्टिव था। अब आदमी मुसाफिर है, आता है जाता है…वाला गीत चल रहा हो और सारे देशवासियों के मन में उस फिल्म में वो गीत गाने वाले बाबा और उस के साथ उस प्यारी सी बच्ची की तसवीर न आए….ऐसा कभी हो सकता है।

§ सारे जोड़ों का भी तारूफ इतने अच्छे से करवाना अच्छा लगा-- डा.अनपढ़ जी ( क्योंकि वह एमए पीएचडी किए हुये थे) ने यह खूब कहा कि ढाई आखर प्रेम के पढ़ने के लिए किसी एमए पीएचडी की डिग्री नहीं चाहिए। वैसे सभी जोड़ों ने अपनी इंट्रो के दौरान भी श्रोताओं का खूब मन लगाए रखा।

§ 15-20 मिनट की अच्छी -खासी इंट्रो के बाद वह शपथ ग्रहण समारोह भी अच्छा लगा।

§ मुझे तो प्रोग्राम में सुनाए गये सारे गाने बेहद पसंद आये। वैसे यह बात तो माननी पड़ेगी कि इस में भी विविध भारती ने लगभग सभी आयुवर्गों की पसंद का पूरा ध्यान रखा।

§ प्रोग्राम को इतने बेहतरीन इंफार्मल स्टाइल में पेश किया गया कि हर श्रोता को शायद मेरी तरह यह ही लगा होगा कि वह किसी प्रोग्राम को नहीं सुन रहा….ये सब लोग उस के आंगन में ही इक्ट्ठे हो कर बस कुछ हल्की फुल्की बातें कर रहे हैं। ऐसे में भला किसे अपने रेडियो सैट से तीन घंटे जुड़े रहना अखरा होगा।

§ प्रोग्राम के अंत में जब धन्यवाद का समय आया तो पता चला कि जोड़ों के इलावा स्टूडियो में कुल छःमेहमान ही थे , लेकिन फिर भी बीच बीच में यूनुस जी का कहना कि ज़रा मुझे रास्ता दो, मुझे मेहमानों तक पहुंचने दो…..इस बात ने भी कार्यक्रम को रोचकता प्रदान की क्योंकि इस से श्रोताओं के मन में एक खूब बड़े हाल की तस्वीर उभर कर आती है। शायद मैं ही ऐसा सोच रहा हूं…पता नहीं। और हां, सभी मेहमानों को अपने मोबाइल बंद रखने को कहना भी बहुत नैचुरल लगा..इससे श्रोताओं के सामने प्रोग्राम की एक तस्वीर बनाने में मदद मिलती है।

§ दूसरे सैग्मेंट में सभी जोड़ों को एक फार्म भरने के लिए कहा गया……तब तक श्रोताओं को गाने सुनने के लिए कहा गया। इन छोटे छोटे प्रयासों से प्रोग्राम इंटरैस्टिंग बनता है। मैं तो उस समय यही सोच रहा था कि एक-सवा घंटे के बाद यह भी कहा गया होता तो अच्छा होता कि ….अच्छा , अब आप सब लोग गर्मागर्म चाय का लुत्फ उठाएं, तब तक श्रोता भी चाहें तो चाय की चुस्कियां ले लें। उस दौरान ऐसे ही कुछ बातें या गीत वीत चलते रहते….एक इंटरवल का माहौल सा बन जाता। पता नहीं मैं ठीक कह रहा हूं कि नहीं, लेकिन यह भी प्रयोग आगे किसी प्रोग्राम में करने का एक तुच्छ सा सुझाव दे रहा हूं…..।

§ प्रोग्राम के विभिन्न सेग्मेंट्स के शीर्षक भी बहुत उपर्युक्त लगे। जब-वी-मेट एवं प्यार का बैरोमीटर वाले आइडिया भी अच्छे थे।

§ वह प्यार का बैरोमीटर तो विविध भारती ने आज सारे देश के श्रोताओं के हाथ ही में थमा दिया…जब हम यह सुन रहे थे कि किसी को अपनी स्पोउज़ का चश्मे का नंबर नहीं पता, किसी की अपने जीवन साथी की वेट ठीक नहीं पता और यहां तक किसी को अपने लाइफ-पार्टनर की हाइट ठीक पता नहीं थी……यह शायद किसी श्रोता को अजीब नहीं लगा होगा..क्योंकि इस बैरोमीटर ने श्रोताओं के रूप में बैठे विविध भारती के लाखों अन्य जोड़ों को भी काफी कुछ सोचने पर मजबूर किया होगा….एक तरह से हम सब के लिए एक इंट्रोस्पेक्शन का भी यही टाइम था।

§ वैसे डा.अनपढ़ जी ने बातें बहुत बढिया कीं…..प्यार के चश्मे का कोई नंबर नहीं होता।

§ जाते जाते एक दो बातें और करना चाहूंगा कि मन में यह जानने की उत्सुकता है कि जिस जोड़े में एक अम्माजी जो कि 69साल की बताई गईं थीं…क्या उन की आवाज़ में थोड़ी कंपन उम्र की वजह से ही थी….अगर ऐसा था तो मैं ऐसा प्रश्न करने के लिए भी उन से दंडवत हो कर क्षमा का याचक हूं। लेकिन अगर उन्होंने इस प्रोग्राम में अपनी उम्र के अनुसार इस तरह की आवाज़ जानबूझ कर निकाली है तो भी हम उन के इस टेलेंट को बार-बार सेल्यूट करते हैं। जुग-जुग जियो अम्मा जी।

§ हां, एक बात और यह है कि यूनुसजी , आप ने प्रोग्राम में तो बिल्कुल सही फरमा दिया कि आदरणीय विनोद कुमार जी को हिंदी बोलने में थोड़ी मुश्किल है, इसलिए वे मिश्रित भाषा ही बोलेंगे….और आगे यह भी कहा कि इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन यूनुस जी, शायद किसी दूर गांव में बैठे किसी श्रोता को इस से थोड़ी आपत्ति हो……( ऐसे ही मज़ाक कर रहा हूं….सीरियस्ली न लें) , लेकिन चूंकि आप भी बंबई में ही रहते हैं और विनोदजी इतनी पापुलर हिंदी बलोगर के पति हैं ,इसलिए हम उन को हिंदी में और भी सहज महसूस करवाने की जिम्मेदारी आप को सौंपते हैं, वैसे हमें तो उन की हिंदी में किसी तरह की कमी नज़र आई नहीं। तो, शुरूआत आज ही करें …उन्हें रोज़ाना विविध भारती प्रोग्राम सुनने के लिए कहें…..हिंदी पर पकड़ सरिये से भी मजबूत हो जायेगी और दूसरा सुझाव है कि वे भी हिंदी बलोगिंग जगत में प्रवेश करें.।

§ अब मलाल इस का ही है कि पांच बजे से आधे घंटे तक प्रोग्राम में क्या हुया …चलिए ,कल अनिता जीअपनी पोस्ट में किसी पोड-कासट की बात कर रही थीं, देखेंगे अगर उधरसुन गया तो।

प्रोग्राम की रेटिंग***** ( 5-Star)

PS…..चूंकि आज भी यमुनानगर में इतनी ज्यादा ठंड है, इसलिए आज तो इस प्रोग्राम को मैंने अपने स्टडी-रूम में ही सुना ताकि तबीयत भी न बिगडे और न ही टिप्पणी गड़बड़ा जाए। पहले ही से सचेत करने के लिए धन्यवाद।।

Saturday, February 2, 2008

प्यार हुआ इकरार हुआ

प्यार हुआ इकरार हुआ
-:अनिता कुमार:-

आखिर वो दिन आ ही गया जब दो ब्लोगर जोड़े गाने वाले हैं

आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर,

सब को मालूम है और सबको खबर हो गयी…।:)

नहीं नहीं अभी नहीं अभी करो थोड़ा इंतजार

कुछ दिन पहले मैंने अपनी पोस्ट पर बताया था कि एक ब्लोगर जोड़े (युनुस जी और ममता जी) ने दो ब्लोगर जोड़ों को (अनिता और विनोद जी, बोधिसत्व और आभा जी ) को घेर घार कर उन्हें बीते दिनों को याद करने पर मजबूर किया( वैसे भूले ही कब थे?) और पूछा क्या तेरा भी था ऐसा हाल जैसा आज है अपना हाल( तीनों जोड़ों की खासियत ये है कि तीनों प्रेम विवाह के बंधन में बधें हैं)।Love StruckBlushing

हमने पूछा कैसा है तुम्हारा हाल तो मुस्कुराहट भरी अनसुनी कर, सवाल पे सवाल दागे गये, जिसके जवाब बनावटी प्रतिरोध के साथ हमने खुशी खुशी दिए। इस गुदगुदाते खेल में हमें तो बड़ा मजा आया

अब आप भी सुनिए और बताइए आप को कैसा लगा ये प्रोग्राम जो विशेषत विविध भारती की 50वीं साल गिरह के अवसर पर तैयार किया गया है।

प्रोग्राम है "प्यार हुआ इकरार हुआ"

प्रसारण का दिन- इतवार- 3 फ़रवरी

प्रसारण समय- दोपहर 2.30 बजे से शाम 5 बजे तक फ़िर 5 मिनिट की खबरें फ़िर वापस प्रोग्राम और आधे घंटे तक

बम्बई निवासी इसे AM 1188 पर और बम्बई के बाहर रहने वाले इसे FM 100.7 पर सुन सकते हैं

रवि रतलामी जी आप को अपना वादा तो याद है न आप का बनाया पोडकास्ट हम भी सुनेगें

युनुस जी जैसलमेर गये हैं हमारे फ़ौजी भाइयों का मनोरंजन करने और उनके साथ एक प्रोग्राम रिकॉर्ड करने, इस लिए अपनी तरफ़ से और उनकी तरफ़ से मैं सभी रेडियो प्रेमियों को आग्रह कर रही हूँ कि प्रोग्राम सुन कर अपनी राय जरुर बताएं , आखिर युनुस जी और ममता जी ने बहुत मेहनत की है इस प्रोग्राम को बनाने की।

मनीष जी बरामदे में लेट कर मत सुनिएगा ठंड लग जायेगी और टिप्पणी गड़बड़ा जाएगी।

http://anitakumar-kutchhumkahein.blogspot.com/

Friday, February 1, 2008

उफ़ ! ये समाचार !!

रेडियो सिर्फ़ फ़िल्मी गानों के लिए ही नहीं हैं, यह बात हमें बताई थी हमारे पूज्य पिताश्री ने जिनको हम हैदराबादी तहज़ीब के अनुसार अब्बा कहते हैं।

पहले रेडियो में हमें विविध भारती, सिलोन और आकाशवाणी हैदराबाद केन्द्र से प्रसारित होने वाले फ़िल्मी गीत ही अच्छे लगते थे। साथ ही अन्य कार्यक्रमों के नाम पर हवामहल और क्षेत्रीय केन्द्र से ढोलक के गीत पसन्द थे।

जब समाचारों का समय होता तब हमें बहुत बुरा लगता था। सवेरे 8 बजे और रात में 8:45 पर दिल्ली से प्रसारित होने वाले समाचार बुलेटिन अब्बा पाबन्दी से सुनते थे। जब इन समयों पर हमें रेडियो ट्यून करना होता तब बहुत ख़राब लगता था।

जब देश-विदेश की कोई विशेष बात होती तो अब्बा हमें बताते और कहते - तुम लोग भी समाचार सुना करो न। और हम बुरा सा मुंह बना लेते।

हमारे लिए समाचार का मतलब सवेरे आप ही के गीत और बुधवार की रात बिनाका में हफ़्ते के शीर्ष तीन-चार गीत मिस करना होता। जैसे-तैसे कर बुधवार का समझौता हो ही गया था।
बात तो तब और भी बिगड़ जाती जब छुट्टियों के दौरान क्रिकेट मैच होता। उन दिनों टेलीविजन पर मैच का सीधा प्रसारण नहीं होता था। केवल रेडियो से आँखों देखा हाल प्रस्तुत होता था। तब घर में दो टीमें बन जाती थी - एक भाइयों की जिन्हें कमेन्ट्री सुननी है और दूसरी टीम बहनों की जिन्हें गाने सुनने है।

कभी-कभी शरारत इतनी बढ जाती कि मेन स्विच भी बन्द हो जाता फिर झड़प हो जाती। इन सबके बावजूद भी अब्बा ने कभी दूसरा ट्रांज़िस्टर ख़रीदने की सहमति नहीं दी क्योंकि वो जानते थे कि जिस दिन दूसरा ट्रांज़िस्टर घर में आएगा वह समाचार के लिए उन्हीं के पास रह जाएगा और मैच के दौरान भाइयों के पास रहेगा और बहनें अपने गानों मे ही मगन रहेगी।

नतीजा ये होगा कि हम कभी क्रिकेट के बारे में नहीं जान पाएगें और समाचारों की दुनिया अकेले अब्बा की रह जाएगी। आज लगता है कितना सही था उनका ये सोचना।

घर में एक ही रेडियो होने की वजह से कानों में पड़ते-पड़ते हम क्रिकेट की भी जानकारी रखने लग गए हालांकि आज भी हमें क्रिकेट मे कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है मगर क्रिकेट से हम अनजान नहीं हैं।

रही बात समाचारों की, तो समाचारों से हम सभी धीरे-धीरे जुड़ने लगे। फिर विविध भारती पर शुरूवात हुई शाम में सात बजे पांच मिनट के समाचार बुलेटिन की। कुछ समय के लिए यह सिर्फ़ खेल समाचार ही थे। अब तो नियमित सामान्य समाचार बुलेटिन प्रसारित होते है।

पिछले लगभग पांच वर्षों से सवेरे भी 6 बजे पांच मिनट का समाचार बुलेटिन होता है। यह 5-5 मिनट के दोनों समाचार बुलेटिन हमारे दैनिक जीवन का एक भाग हो गए है। केवल ये दो बुलेटिन ही हमें पर्याप्त है रोज़ की देश-दुनिया की गतिविधियों को जानने के लिए।

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