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Monday, March 31, 2008

श्री केरशी मिस्त्री का देहांत



अभी फिछले महिने जिनके जन्म दिन के लिये ०२-०२-२००८ के लिये चिठ्ठा लिखा था और रेडियो श्री लंका से उनके लिये बधाई प्रसारित करवाई थी, वैसे एच एम वी के लम्बे समय स्टाफ कलाकार रहे पियानो और सोलोवोक्स वादक तथा वाद्यवृन्द संयोजक श्री केरशी मिस्त्री साहब दि. ०५-०३-२००८ के दिन मुम्बई के पारसी जनरल अस्पलात की अपनी हड्डी की मरम्मत की प्रक्रिया दौरान ही इस दुनिया छोड़ गये । इस बात की खबर अभी एक हप्ते पहेले यानि वान सिप्ले साहब के निधन के मूझे मिले समाचार के बाद मिले ।
मैं उनको २९ फरबरी २००८ के दिन अस्पताल में मिला था । वे कई बार अमरिका अपने ट्रूप के साथ जा कर स्टेज कार्यक्रम प्रस्तूत कर आये थे ।
उन्होंने वीर बालक फिल्म के कुछ गीत संयोजित किये थे । एच एम वी द्वारा जारी किये गये कुछ वर्झन फिल्मी गानो के वे वाद्यवृन्द संयोजक भी रहे । फिल्म दिवाली की रात का स्व. तलत महेमूद जी द्वारा गाया हुआ गीत संगीतकार स्व. स्नेहल (वासुदेव) भाटकर के सहायक के रूप में उन्होंने स्वतंत्र रूप में कम्पोज किया था, जो स्नेहल भाटकर के संगीत के रूपमें ही जाना गया है , जैसे की फिल्म त्रिदेव का गाना तिरछी टोपी वाले विजय शाह की बजाय कल्याणजी आनंदजी के संगीत के रूपमें ही जाना गया है । रेडियो श्रीलंका ने उनको श्रद्धांजलि के रूपमें उनके वाद्यवृन्द संयोजनमें श्री बहेराम दारूवाला की माऊथ ओरगन पर फिल्म जागते रहो की धून जिन्दगी ख्वाब है प्रस्तूत की थी ।
इधर उनको श्रांजलि के रूपमें उनकी पियानो पर बजाई धून फिल्म प्रेम पर्बत से ये दिल और उनकी निगाहॊ के साये प्रस्तूत है ।

विविध भारती...इतना तो रहम कीजिये सहगल मुरीदों पर...

भूले बिसरे गीत कार्यक्रम पुराने संगीत का द्स्तावेज़ है.सारे संगीतप्रेमी जानते ही हैं कि इस कार्यक्रम का समापन महान कुंदनलाल सहगल के गाए गीत से होता है।जैसे ही गीत एनाउंस होता है (जैसा कि आज ३१ मार्च को हुआ) अपने ज़हन में सहगल साहब की आवाज़ और की तस्वीर बनाने लगता है.......लेकिन ये क्या.....कानों पर सुनाई दे रहा है एक इश्तेहार.....स्कूल चलें हम ! ये बिलकुल जायज़ है कि इश्तेहार के बिना रेडियो की गति नहीं...लेकिनक्या ऐसा नहीं हो सकता कि स्पॉट या जिंगल बज जाएँ उसके बाद गीत एनाउंस हो। या यूँ हो कि जब सहगल साहब गा चुकें तब इश्तेहार बजे....जो हो रहा है वह सुनने वाले के कान में एक दर्द देता है। सहगल मुरीद रेडियोनामा के मंच से इस बात पर ज़रूर ग़ौर करें....विविध भारती के इस रचनात्मक प्रयास से सहगल साहब हर सुबह घर - घर पहुँचते हैं...विविध-भारती की ये भावपूर्ण ख़िराजे-अक़ीदत सामईन पर ज़्यादती सी लगती है.

मीनाकुमारी की याद में…

फ़िल्म बैजूबावरा ने दो कलाकारों को लोकप्रिय बनाया - मीनाकुमारी और लता मंगेशकर

यह कहना मेरा नहीं है, इस बात को ख़ुद मीनाकुमारी ने विशेष जयमाला में बताया था। आज मीनाकुमारी की पुण्यतिथि है। सुबह-सवेरे ही विविध भारती ने मीनाकुमारी को याद किया और अर्पित किए श्रृद्धा सुमन भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में जिसे प्रस्तुत किया कमल (शर्मा) जी ने।

फ़िल्म उद्योग में बैजूबावरा का कुछ ऐसा असर रहा कि मीनाकुमारी के अधिकतर गीत लता ने ही गाए। तभी तो आज भूले-बिसरे गीत में भी लता की ही आवाज़ गूंजती रही। केवल एक ही युगल गीत था लता रफ़ी का -

बार-बार तोहे क्या समझाए पायल की झंकार
तेरे बिन साजन लागे न जिया हमार

मीनाकुमारी की यूं तो सभी फ़िल्में यादगार रही पर कुछ फ़िल्मों को ख़ासतौर पर रेखांकित किया जा सकता है जिनमें से एक है शरदचन्द्र के उपन्यास पर आधारित फ़िल्म परिणीता जिसमें नायक अशोक कुमार थे।

इस फ़िल्म में एक समूह गीत है जो ब्याह के अवसर पर फ़िल्माया गया है। गीत के बोल मैं भूल रही हूँ। अगर इस समूह गीत को शामिल किया जाता तो कार्यक्रम में विविधता आ जाती थी।

एक और विशेष फ़िल्म है जो… अगर व्यक्तिगत पसन्द की बात करें तो मीनाकुमारी की सभी फ़िल्मों में से मेरी सबसे ज्यादा पसंदीदा फ़िल्म यही है। फ़िल्म का नाम है आज़ाद

इस फ़िल्म में मीनाकुमारी के लगभग छ्ह-सात नृत्य है जो हल्का सा शास्त्रीयपन लिए है। ऐसा एक गीत भी नहीं चुना गया। जिससे कार्यक्रम में एकरसता बनी रही और भूले-बिसरे गीत में विविधता नहीं आ पाई।

एक और छोटी सी (या बड़ी सी) शिकायत है आपसे कमल (शर्मा) जी कि आपने सिर्फ़ यह एक बात ही कही की आज मीनाकुमारी की पुण्यतिथि है मगर गाने प्रस्तुत करते हुए एक बार भी यह नहीं बताया कि मीनाकुमारी की यह फ़िल्म किस साल प्रदर्शित हुई थी, निर्देशक कौन थे, किस बैनर तले फ़िल्म बनी, साथी कलाकार वग़ैरह वग़ैरह…

क्या विविध भारती अपना एक कार्यक्रम पूरी तरह से एक महान कलाकार को समर्पित नहीं कर सकता ?

Friday, March 28, 2008

साफ़ आवाज़ की महंगी तकनीक

रेडियोनामा: साफ़ आवाज़ की महंगी तकनीक

जैसे अपनी मुम्बई यात्रा दौरान इस विषय पर लिखने की बात लिखी थी, उसको पूरी कर रहा हूँ । पहेले तो कोई भी इस तरह की तक़निक महेंगी ही होती है, क्यों कि इस प्रकार की तक़निक विकसीत करने वालों का उदेश्य सेवा का नहीं पर कमाई का ही प्रथम होता है । तो आज रेडियो श्रीलंका हिन्दी सेवा के लिये यह बात पहेले मूर्गी या पहेले अंडा जैसा बन पडा है । हम श्रोता ऐसा सोचते है, कि वे लोग पहेले इन्वेर्स्ट करके यह तकनिक़ स्थापित करें और बादमें आमदानी तो होगी ही होगी, वहाँ दूसरी और रेडियो श्री लंका वाले का सोचना इस प्रकार का है, कि अगर वह खर्च जो नयी तक़निक पर होगा, वह विग्य़ापन की आमदानी से नहीं लौटा तो वे क्या करेंगे । हकीकतमें आज उनको विजली भी परवडती नहीं है, और इसी लिये रात्री प्रसारण कुछ: महिनो बंद किया गया था, पर लोगो के प्यार के आगे वे झूके, और फिरसे शुरू किया ।
दूसरी बात रिझर्व बेन्क के कडे नियम की बात पद्दमिनीजीने मूझे नहीं कही है, पर एक बार श्री मनोहर महाजनजी सुरत आये थे, तब इस विषय की चर्चा के दौरान उन्होंने कही थी और श्री गोपाल शर्माजी की आत्मकथामें भी उन्होंने लिखी है । एक समय तो श्री लंका निवासी हाअल सेवा निवृत्त उद्दघोषक श्री विजय शेख़र की आवाझमें एक स्पोट भी आता था, कि वे भारतिय रूपये के रूपमें भी रेवन्यू स्वीकार करेंगे । तब मैनें ही उनको लिखा था, कि यह घोडे भाग जाने के बाद घोडार के दरवाजे बंद करने वाली बात हुई ।
पर एक बात मैने जानी और मानी है, कि विविध भारती के फोन इन कार्यक्रममें हिस्सा लेने के बाद मुझे जो प्रतिक्रिया प्रप्त हुई, उनसे ज्यादा रेडियो के सजीव फोन इन कार्यक्रमोमें हिस्सा लेने पर और वादक कलाकारों के जन्म दिन या मृत्यू दिन पर जानकारी भेजने पर प्राप्त हुई है । जब श्री एनोक डेनियेल्स साहब के जन्म दिन पर पहेला कार्यक्रम वहाँ से करवाया तब उनके यहाँ अनगिनत शुभेच्छा संदेश प्रप्त हुए तो उनके अचरज की सीमा नहीं रही थी । और पूना के एक श्रोताने उनसे मेरा पता ले कर उस कार्यक्रमकी सीडी उनके साथ मूझे भी भेट की थी ।
विविध भारती नेटवर्क कुछ: दो पहर २.३० से ५ तक ही देशमें ज्यादातर हिस्सोंमें स्थानिय (क्षेत्रीय भाषी) केन्दों के कारण ही सुनाई पड़ता है । और शहरके हिसाबसे गाँवोंमें विजली के कारण आने वाला दिस्ट्रबंस कम रहने वाला है ।

समाचार प्रस्तुति का बदलता रूप

आकाशवाणी समाचारों का मतलब है सीधी सपाट शैली में समाचार सुनाना। चाहे १५ मिनट के मुख्य समाचार बुलेटिन हो या 5मिनट के छोटे बुलेटिन या 10मिनट के क्षेत्रीय बुलेटिन हो सभी समाचारों की शैली पहले एक जैसी थी।

पहले कहा जाता - ये आकाशवाणी है - फिर वाचक अपना नाम बताते हुए कहते - अब आप पंच देव पांडे से समाचार सुनिए। पहले मुख्य समाचार - जिसमें 4-5समाचारों की शीर्ष पंक्तियां होती थी फिर कहा जाता - अब आप विस्तार से समाचार सुनिए।

समाचारों का निश्चित क्रम होता था जैसे सबसे पहले राजनीतिक घटनाक्रम के समाचार दिए जाते थे फिर राज्य स्तर के समाचार जिसके बाद खेल जगत के समाचार बताए जाते। इसके बाद कला, संस्कृति, साहित्य से कोई समाचार हो तो बताए जाते फिर विदेशों से यदि कोई समाचार हो तो पढे जाते।

अंत में मुख्य समाचार एक बार फिर कह कर शुरू में बताई गई मुख्य समाचारों की शीर्ष पंक्तियां दोहराई जाती फिर इतना ही कहा जाता - समाचार समाप्त हुए।

जब समाचार प्रस्तुति में परिवर्तन का दौर शुरू हुआ तो सबसे पहले क्रम में बदलाव आया। अब प्रमुख समाचार पहले बताए जाते चाहे वो किसी भी क्षेत्र के हो जैसे भारत क्रिकेट में विश्व कप जीतता है तो वह पहला समाचार होता है।

दूसरा परिवर्तन यह हुआ कि विशिष्ट मौकों पर विशिष्ट रिकार्डिंग के अंश सुनाए जाने लगे जैसे लाल क़िले पर झण्डा फ़हराने के बाद दिए जाने वाले संदेश के अंश।

अगले चरण में विशेष मौकों पर उपस्थित आकाशवाणी के संवाददाता से समाचारों के दौरान फोन पर बातचीत कर ताज़ा जानकारी ली जाने लगी।

फिर हुआ बड़ा परिवर्तन जहाँ मुख्य समाचार बुलेटिन की जगह समाचार पत्रिका ने ले ली जिसे शीर्षक भी दिया गया और शैली तो पूरी बदल गई साथ ही शुरूवात भी अभिवादन से होने लगी जैसे -

नमस्कार ! समाचार प्रभात में आपका स्वागत है। मैं लोचनीय अस्थाना… अब तक के मुख्य समाचार … अब विस्तृत समाचारों के साथ अखिल मित्तल… बीच में आवश्यकता के अनुसार फोन पर संवाददाता से ताज़ा घटनाक्रम की जानकारी भी ली जाती है…

अब समाचार पत्रों की सुर्खियों के साथ आशा द्विवेदी… जिसमें सभी प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों के मुख्य समाचार बताए जाते है जैसे दैनिक भास्कर लिखता है… अमर उजाला ने … समाचार को प्रमुखता से छापा है… नई दुनिया अपने संपादकीय में लिखता है… अंत में समाचारों की सुर्खियों पर एक नज़र …

आजकल संचालन अलग से नहीं किया जा रहा जैसे शुरू में जिस वाचक की आवाज़ आती है वही विस्तार से समाचार भी पढ रहे है।

परिवर्तन चाहे जितने आए पर सरल भाषा में स्पष्ट समाचार आकाशवाणी से ही सुने और समझे जा सकते है।

Thursday, March 27, 2008

युव वाणी का क्विज शो और हमारी पहली कमाई

बात उस समय कि है जब रेडियो के युव वाणी कार्यक्रम से एक लिफाफा जिस पार हमारा नाम लिखा था घर पर आया । बड़ी खुशी और उत्सुकता हुई कि हमारे नाम रेडियो स्टेशन से कोई चिट्ठी आईउस समय तक सिर्फ़ एक बार गिटार ही रेडियो पर बजाया था खैर चिट्ठी खोली तो पता चला कि युव वाणी मे क्विज शो (जो की आधे घंटे का होता था ) के संचालक के रूप मे रेडियो वालों ने हमे चुना था और ये भी लिखा था कि हम कुछ आम सामान्य ज्ञान (general knowledge) के प्रश्न और उत्तर लिख कर अपने साथ लाये और फलां तारीख और फलां समय पर रेडियो स्टेशन पहुँच जाए कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग के लिए

अब हम तो ऐसे किसी कार्यक्रम के लिए ना तो तैयार थे और ना ही हमारे बस का था कि हम अकेले इतने सारे प्रश्न बनाते सो हमारी दीदी लोग और हम जुट गए प्रश्न और उत्तर बनाने मे और करीब ८०-९० प्रश्न लिखे और तय समय पर पहुँच गए रेडियो स्टेशन ये हमारा पहला मौका था जब हम अकेले ही रेडियो स्टेशन गए थेजब वहां पहुंचे तो कुछ - लड़के लड़कियां वहां बैठे थे और हम सबका आपस मे परिचय कराया गया तो पता चला कि -- तो हमसे बड़े यानी एम.. मे पढने वाले थे (उस समय हम बी..कर रहे थे) एक-दो पहले क्विज करा चुके थे

खैर एक बार हम सभी ने थोडी बहुत रिहर्सल करी साथ ही वहां के संचालक ने कहा कि बहुत जल्दी -जल्दी प्रश्न मत पूछना , आराम से बीच-बीच मे नाम लेकर प्रश्न पूछना अब भाई हमारा तो ये पहला कार्यक्रम था और कोई गड़बड़ ना हो इसका ध्यान भी तो रखना था खैर रिकार्डिंग शुरू कि गई और बहुत ही हलके-फुल्के अंदाज मे रेडियो पर पहले हमने अपना परिचय दिया और फ़िर बाकी छः लोगों का परिचय श्रोताओं से कराया और फ़िर बातचीत के अंदाज मे प्रश्न और उत्तर का सिलसिला शुरू हुआ और आधे घंटे का कार्यक्रम रेकॉर्ड हुआऔर जब हम लोगों को इशारा किया गया कि टाइम अप तो उस समय तो हमने बड़ी राहत की साँस ली थी

रेकॉर्डिंग रूम से बाहर निकल कर हम सब जैसे ही चलने को हुए कि हम लोगों से कहा गया कि आप लोग वहां फलां आदमी से मिल लेउनके पास पहुँचने पर उन्होंने हमे शायद १०० या १२५ रूपये ठीक से याद नही है दिए और रजिस्टर मे साईन करने को कहावो रूपये लेकर तो ऐसा लगा माने हम सातवें आसमान मे होउस समय खामोशी वाला गाना नही बना था आज मैं ऊपर आस्मान नीचे :)
और उन रुपयों को लेकर खुशी-खुशी घर आए और घर मे सभी को घूम-घूम कर अपनी पहली कमाई दिखाई और फ़िर प्लान बनाने लगे कि इन रुपयों से हम क्या-क्या खरीदेंगे अब भाई उस ज़माने मे १०० रूपये की बड़ी कीमत होती थी

Wednesday, March 26, 2008

अलग फ्रीक्वेंसी

सबसे पहले तो मैं रेडियोनामा के सभी ब्लागर मित्रों को शुभकामनाएं देना चाहती हूँ कि सबने मिलकर रेडियोनामा के चिट्ठों के दो शतक पूरे किए। इस समय मैं 201 वाँ चिट्ठा लिख रही हूँ।

इस चिट्ठे में मैं विविध भारती की फ्रीक्वेंसी पर चर्चा करना चाहती हूँ। मैं यहाँ हैदराबाद में एफएम पर विविध भारती सुनती हूं। सवेरे संकेत धुन, वन्देमातरम और मंगल ध्वनि के बाद 6 बजे समाचारों के साथ हम केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है।

फिर वन्दनवार के बाद 6:30 से 7 बजे तक स्थानीय सेवा में तेलुगु भाषा में प्रसारण होता है जिसके बाद 7 बजे भूले-बिसरे गीत से त्रिवेणी तक 8 बजे तक केन्द्रीय सेवा रहती है। इसके बाद सवेरे के प्रसारण में क्षेत्रीय कार्यक्रम ही सुनने को मिलते है।

दोपहर बारह बजे से सुहाना सफ़र के साथ हम केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है जो 2:30 बजे मन चाहे गीत की समाप्ति तक चलता है फिर 2:30 से 3 तक तेलुगु प्रसारण फिर 3 से 5:15 तक केन्द्रीय सेवा रहती है।

शाम में 7 बजे समाचारों के साथ केन्द्रीय सेवा से जोड़ा जाता है जो हवामहल तक जारी रहता है। 8:15 से 9 तक स्थानीय सेवा फिर गुलदस्ता के साथ 9 बजे से 11 बजे तक केन्द्रीय सेवा सुनते है।

बीच-बीच में जहाँ हम स्थानीय कार्यक्रम सुनते है वहाँ विविध भारती की केन्द्रीय सेवा के हिन्दी कार्यक्रम नहीं सुन पाते है। यहाँ तक कि हर महीने की 3 तारीख़ को आजकल प्रसारित हो रहे जुबली झंकार कार्यक्रम भी 2:30 से 3 नहीं सुन पाते है।

केन्द्रीय सेवा के दौरान भी विशेषकर जयमाला और कभी-कभार भूले-बिसरे गीत के दौरान स्थानीय विज्ञापनों की वजह से केन्द्रीय सेवा बाधित होती है। अक्सर ऐसा होता है कि उदघोषक गीत का विवरण बताते है और कहते है सुनिए गीत और सुनने को मिलता है तेलुगु भाषा में विज्ञापन फिर विज्ञापन समाप्त होने पर बीच में से गीत सुनने को मिलता है।

अगर ऐसा हो कि केन्द्रीय सेवा और स्थानीय सेवा दोनों की फ्रीक्वेंसी अलग-अलग हो तब हम केन्द्रीय सेवा के विविध भारती के सभी कार्यक्रम सुन पाएगें कोई भी कार्यक्रम नहीं छूटेगा और जब मन चाहा स्थानीय केन्द्र से तेलुगु कार्यक्रम सुन लेंगें।

रेडियो के साथ मेरे पचास साल- 1

रेडियो के साथ मेरे पचास साल- 1


- सुषमा अवधिया


ये 1958 की बात है। हम लोग जब छोटे-छोटे हुआ करते थे उस वक्त घर मे रेडियो ऐसे स्थान पर नही हुआ करता था जहाँ सब सुन सके। हम बारह भाई-बहनो मे सबसे बडे भैया के कमरे मे रेडियो था। उनका कमरा पहली मंजिल पर था। उस जमाने मे हम लोग उनके कमरे मे जाकर रेडियो सुनने की बात सोच भी नही सकते थे। तकदीर से वो सर्विस करने बाहर चले गये। बस फिर क्या था मै और मेरे से छोटे दोनो भाई आनन्द और प्रसन्न रात आठ बजते ही बिनाका गीतमाला सुनने उनके कमरे मे पहुँच जाते थे। हम लोग बडे दुखी थे कि ये प्रोग्राम हफ्ते मे एक दिन बुधवार को ही क्यो आता है, रोज क्यो नही आता। काले रंग का अर्ध गोलाकार रेडियो था इको कम्पनी का। उसका पाइंटर 180 डिग्री घूम जाता था। इस रेडियो की आवाज बहुत मीठी हुआ करती थी।


हम तीनो की खुशी की सीमा नही होती थी। एक से एक गाने सुनते। जैसे जरा सामने तो आओ छलिये, छुप-छुप छ्लने मे क्या राज है, है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पर आयेगा, जिन्दगी भर नही भूलेगी वो बरसात की रात, जो वादा किया, वो निभाना पडेगा। कैसा मधुर संगीत, मीठी आवाजे- सब कुछ दिल को छू लेता। मन झूम उठता। हम लोग सुनते-सुनते कयास लगाते कि इस बार कौन से गाने के लिये बिनाका गीतमाला का बिगुल बजेगा। आज भी वो दिन याद कर दिल खुश हो जाता है। हम तीनो ने खूब आनन्द लिया रेडियो का।


इसी बीच जहाँ तक मुझे याद है दोपहर सवा तीन बजे से पौने चार बजे तक पाकिस्तान रेडियो से हिन्दी फिल्मो के एक से एक बेहतरीन गाने सुनवाये जाते थे। मै जब भी घर पर होती यह प्रोग्राम जरुर सुनती थी। ये सिलसिला बमुश्किल साल भर चल पाया होगा। हमारे बडे भैया वापिस जबलपुर आ गये। एक बार फिर हम लोग अपने रेडियो से बिछुड गये।


मै जब दसवी कक्षा मे थी तब हमारी एक टीचर मिस पिल्ले ने हम सब नाटक मे भाग लेने वाली लडकियो को लेकर गणतंत्र दिवस पर एक नाटक तैयार करवाया। हम लोगो को बताया गया कि ये नाटक जबलपुर रेडियो स्टेशन से प्रसारित होगा। हम लोगो ने खूब मेहनत की। बडा उत्साह था, रेडियो स्टेशन जायेंगे, कैसा होता होगा?, कैसे रिकार्डिंग होगी?, मन मे ढेर सारे प्रश्न थे। यूँ तो हम लोग इस अहसास से ही प्रसन्न थे कि नाटक जबलपुर रेडियो स्टेशन से प्रसारित होगा। मालूम नही किस कारणवश इस नाटक की रिकार्डिंग नही हो पायी। लम्बे अंतराल के बाद जब मै रायपुर आकाशवाणी की ड्रामा आर्टिस्ट बनी तब यह स्वप्न साकार हुआ। (क्रमश:)


लेखिका का संक्षिप्त परिचय और चित्र

Tuesday, March 25, 2008

हमार बियाह तो रेडियो से हुआ है ना

पंकज जी और युनुस जी जैसा कि आपने कहा था की ये पोस्ट रेडियोनामा पर आनी चाहिए तो आज हम इसे रेडियोनामा पर एक बार फ़िर से पोस्ट कर रहे है।और हाँ आज हमारे पापा का जन्मदिन है इसलिए ये आज की पोस्ट उनके नाम

ओह हो शीर्षक देख कर चौंकिए मत। यहां हम अपनी बात नही कर रहे है बल्कि अपने पापा-मम्मी के बारे मे बात कर रहे है। दरअसल मे कल हमारी पापा से फ़ोन पर बात हो रही थी और बातों ही बातों मे हमने उनसे पूछा कि आप ने किताब के लिए कुछ लिखना शुरू किया या नही

तो इस पर पापा बोले कि उन्होंने मम्मी के साथ हुए एक वाक़ये को कुछ लिखा तो है पर फ़िर आगे लिखने का मन नही हुआ
हमारे कहने पर कि आप थोड़ा -थोड़ा ही लिखिए पर लिखिए जरुर इसपर पापा ने हमे बताया कि उन्होंने क्या लिखा था

ये किस्सा उस समय का है जब पापा-मम्मी की नई-नई शादी हुई थी उस समय पापा यूनिवर्सिटी मे पढ़ते थे और होस्टल मे रहते थेऔर चूँकि उस ज़माने मे पढ़ते हुए शादी हो जाती थी इसलिए मम्मी अपनी ससुराल मे रहती थीससुराल मे बाबूजी,दादा(जेठ )बड़ी अम्मा (जेठानी) रहते थे

उस ज़माने मे ससुर जी और जेठ से बहुत ज्यादा बात करने का रिवाज नही था हालांकि बाबूजी हमेशा मम्मी से बात करते थे क्यूंकि हमारी दादी नही थीपापा हॉस्टल चले जाते और शनिवार और रविवार की छुट्टी मे घर आते थे और सोमवार को वापिस अपने हॉस्टल चले जाते थेबाबूजी और दादा अपने-अपने office चले जाते थे और बड़ी अम्मा का अपना मिलने-जुलने का कार्यक्रम रहता था और चूँकि मम्मी नई-नई थी इसलिए वो हर जगह नही जाती थी और घर मे रहती थी और घर मे उनका साथी रेडियो होता थामम्मी को संगीत का बहुत शौक था और वैसे भी अकेले मे रेडियो से अच्छा साथी तो कोई हो ही नही सकता था।(बड़ा सा भूरा और पीले रंग का )

ऐसे ही एक शनिवार जब पापा हॉस्टल से घर आए तो मम्मी ने उन्हें बताया की रेडियो ख़राब हो गया है इसे बनवा दीजिये
पापा के पास रविवार का दिन था और रविवार को दूकान बंद रहती थी इसलिए पापा ने मम्मी से कहा की बाबूजी या दादा से वो कह देंगे रेडियो बनवाने के लिए
और पापा सोमवार को अपने हॉस्टल चले गए पर ना तो बाबूजी और ना ही दादा के पास इतना समय था की वो रेडियो बनवाते और ना ही बीच मे मम्मी ने बाबूजी या दादा से रेडियो बनवाने के लिए कहालिहाजा रेडियो जस का तस ख़राब ही पड़ा रहा और पूरा हफ्ता बीत गया अगले हफ्ते जब पापा फ़िर घर आए तो मम्मी ने उन्हें रेडियो बनवाने के लिए कहा

तो पापा ने कहा की अगले हफ्ते बनवा देंगे पापा का इतना कहना था कि मम्मी ने नाराज होकर कहा की हमार बियाह तो रेडियो से ही हुआ है ना और इस रेडियो बिना हमारा गुजारा नही है

मम्मी के ऐसा कहने पर पापा पहले तो खूब हँसे और फ़िर बाद मे उसी दिन रेडियो भी बनवाया

Monday, March 24, 2008

मेरी पसंद

आज मैं अपने जीवन के पहले कार्यक्रम के बारे में लिख रही हूँ।

रेडियो तो मैं बचपन से सुनती रही पर बचपन में कभी रेडियो प्रोग्राम नहीं किया। मैंनें शुरूवात युववाणी से की।

आकाशवाणी हैदराबाद से मैनें जो पहला कार्यक्रम किया वो था - मेरी पसन्द। यह युववाणी का कार्यक्रम था जो आधे घण्टे का होता था। यह कार्यक्रम छाया गीत की तरह था।

इस कार्यक्रम के लिए पाँच-छ्ह फ़िल्मी गीत अपनी पसन्द के चुनने होते थे। इन गीतों की प्रस्तुति के लिए आलेख लिखना होता था। इसी आलेख को पढते हुए या यूँ कहिए कि श्रोताओं से कुछ कहते हुए एक के बाद एक अपनी पसन्द के गाने सुनवाने होते थे।

मेरी पसन्द के तो साठ-सत्तर के दशक के गीत है सो मैनें वही चुने। बहुत डूब कर अच्छा सा आलेख लिखा और कार्यक्रम की रिकार्डिंग भी हो गई फिर प्रसारण भी हो गया। इतना ही नहीं कार्यक्रम पसन्द भी किया गया लेकिन…

मेरी समझ में नहीं आया कि गीत बहुत लोकप्रिय थे, आलेख में भाव-विचार बहुत अच्छे थे, सबने कहा कि मैनें बोला भी अच्छा, आवाज़ भी अच्छी फिर कहाँ गड़बड़ हो गई ?

तभी कार्यक्रम अधिकारी अहमद जलीस साहब ने कहा - अए बीबी - हैदराबादी तहज़ीब में अए कह कर संबोधन किया जाता है और लड़की को बीबी कहते है। उन्होनें कहा -

अए बीबी ! अपनी पसन्द के गाने सुनवाए या अपनी अम्मी (माँ) की पसन्द के और अनुभाग में सभी खिलखिलाने लगे।

हुआ ये था कि पहला गीत मैनें लिया था फ़िल्म गाईड से -

काँटों से खींच के ये आँचल
तोड़ के बंधन बाँधी पायल

हद तो तब हो गई जब मैनें पचास के दशक की फ़िल्म गोदान का रफ़ी का गाया गीत भी शामिल कर लिया। अब मुझे क्या पता ? मैनें सोचा मेरी पसन्द कार्यक्रम है तो मेरी ही पसन्द के गीत सुनवाए जाने चाहिए।

बाद में समझ में आया कि अपनी पसन्द के साथ-साथ गीतों का चयन कार्यक्रम के अनुसार होना चाहिए। जबकि उसी समय रिकार्ड लाइब्रेरी में नई फ़िल्मों की गीतों के रिकार्ड ख़रीद कर रखे गए थे मुझे उन्हीं में से मेरी पसन्द के गाने चुनने चाहिए थे।

नए गानों को बजाने की शुरूवात आमतौर पर युववाणी से ही होती है बाद में सामान्य प्रसारण में फ़रमाइशी और ग़ैर फ़रमाइशी कार्यक्रमों में ये गीत बजने लगते है।

तो देखिए… कितना बड़ा फ़र्क है इस पार और उस पार में। बचपन से श्रोता की तरह रेडियो सुना पर ये समझ में नहीं आया था कि कार्यक्रम तैयार करने में किन-किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है। सुनना आसान है लेकिन प्रस्तुत करना बहुत कठिन।

Sunday, March 23, 2008

०८-०३-२००८ : अपने लहेजे के जानेमाने इलेक्ट्रीक हवाईन गिटार और वायोलिन वादक वान सिप्ले का निधन :


· इस तसवीरमें लेफ्ट पर गिटार के साथ स्व. वान शिप्ले, बीचमें गायक श्री तलत स्व. मेहमूद श्री राइट पर अपने एकोर्डियन के साथ उनके हर हमेंश के साथी रहे मीठी धूनो के प्रस्तूत कर्ता श्री एनोक डेनियेल्स है ।
कल सुबह प्रसिद्ध पियनो और पियानो एकोर्डियन वादक श्री एनोक डेनियेल्स साहबसे फोन सम्पक हुआ तो उनसे पता चला कि जिन्होंने उनको इस क्षेत्रमें बढावा दिया, वैसे श्री वान सिप्लेजीने दि. ०८-०३-०८ के दिन अपनी अन्तिम सांस ली और इस दूनिया से चल पडे । वे ८१ साल के थे और २० साल पहेले आये लकवा के हमले से उनकी वाचा तभी चली गयी थी ।
वे लख़नौ से मुम्बई आये थे । उन्होंने गिटार भारतीय शास्त्रीय पद्धतीसे और वायोलिन पाश्च्यात्य नोटेसन पद्धती से शीखा था । एच.एम.वी.ने उनके कई ७८ आरपीएम, ४५ आरपीएम (ईपीझ) तथा ३३ आरपीएम (एलपीझ और सुपर -७ ) रेकोर्ड्झ जारि किये थे । जो आज भी रेडियो श्री लंका और विविध भारती से बजते है (हालाकि विविध भारती श्री मनोहरी सिंह और ब्रियान सिलाझ के दे दो बार किये गये अपवाद को छोड़ किसी की भी धूनो को अन्तराल में बजाते समय उन धून के प्रस्तूत कर्ता को क्रेडिट नहीं देता है ।
निर्माता अभिनेता श्री चंद्रशिखर की फिल्म चा चा चा में उन्होंने अभिनय भी किया था जो शायद एक मात्र फिल्म उनकी अभिनेता के रूपमें थी । एक समय फिल्मी धूने सिर्फ़ रेडियो सिलोन पर सुबह ७ से ७.१५तक सभा की शुरूआतमें आती थी ९आज भी सुबह सिर्फ़ ६ से ६.०५ तक आती है ) । इस लिये इन वादक कलाकारों को मोर्निंग स्टार यानि सुबह का तारा कहा जाता था । एक अंग्रेजी अख़बारने उनके लिये फिल्म चा चा चा की रिलीझ के पहेले लिखा था, कि मोर्निंग स्टार इवनिंग स्टार बनने जा रहा है । एक और बात कि, रूपेरी परदे पर वे गिटार वादक वान सिप्ले के रूपमें शायद १९६० की फिल्म घर की लाज में प्रस्तूत हुए थे । फिल्म जो भी हो पर यह फिल्म दिल्ही दूर दर्शन और लघू शक्ति सह प्रसारण केन्द्रों से प्रस्तूत हुई थी, जिसमें स्पेशियल एपियरन्स देने वाले कलाकार के रूपमें शिर्षकमें उनके नाम को देख (पढ) कर इस गिटार वादन को मैंनें अपने निजी संग्रहमें रखा है ।
इस फिल्म के एक गीत इस चमेली के मन्डवे तले को उन्होंने हवाईन गिटार पर प्रस्तूत किया था , जो आज भी कभी कभी विविध भारती की केन्द्रीय सेवा अन्तरालमें बजाती है । मैनें करीब १९७२में सुरतमें उनको श्री एनोक डेनियेल्स साहब केर साथ एक स्टेज शोमें देखा और सुना था । (हालाकि उस समय भी मेरा मूख्य आकर्षण श्री एनोक डेनियेल्स का एकोर्डियन था ।)
वे अपनी स्टाईल के अनोखे वादक थे, वहाँ दूसरी और उनका स्टाईल कोन्ट्रावर्शियल भी था । उनका एक मक्स़द था अपनी अलग पहचान बनानेका और कायम रख़नेका । इस लिये एक और कई गानोंकी धूने उनकी स्टाईल के कारण गानो के हिसाबसे ज्यादा निखरती थी, वहाँ कई सुन्दर गानोंकी धूने थोडी थोडी इधर उधर भी होती कई लोगोको मेहसूस होती थी, यानिकी वे जान बूजकर करते थे । कोई भी धून उनकी सबसे पहेली बार सुनने पर भी इनकी स्टाईल से परिचीत श्रोता को पता चल ही जाता था, कि ये तो वान सिप्ले ही है ।
इधर इसमें से प्रथम प्रकारकी यानि गाने से भी ज्यादा निख़रने वाली एक धून फिल्म दिल दे के देखो के शिर्षक गीत की प्रस्तूत है इलेक्ट्रीक हवाईन गिटार पर उनको श्रद्धांजलि के रूपमें प्रस्तूत है, जो एक समय आजके हिसाबसे अलग रूपमें उस समय दो पहर तीन से साढे तीन के बीचमें श्री युनूस खान द्वारा प्रस्तूत किये गये विविध भारती की केन्द्रीय सेवा के इन्द्र धनुष कार्यक्रम से मैंनें प्राप्त कि थी । इस धूनमें मूल गानेमें जहाँ गिटार है, वहाँ, इस धूनमें श्री एनोक डेनियेल्स साहब का एकोर्डियन बजा है ।

Thursday, March 20, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6


- पंकज अवधिया


बचपन मे जब अंग्रेजी गाने सुनने का शौक जागा तो कैसेटो का सहारा लेना पडा। सीडी तो उस समय मिलती नही थी। कैसेट बहुत महंगे होते थे और एक अच्छे गाने के लिये पूरा कैसेट लेना पडता था। शांत गाने वाले कैसेट नही मिलते थे। अंग्रेजी गाने मतलब तेज शोर वाले गाने। उस समय बोनी एम का हल्ला था। इस ग्रुप के सारे कैसेट मेरे पास थे। उस समय रेडियो पर अंग्रेजी गाने सुन पाना सम्भव नही जान पडता था। रेडियो को आजमाया पर ऐसा कोई चैनल नही मिलता था जो मन पसन्द गाने सुनाता। बरसो बाद वर्ल्ड स्पेस से यह मुराद पूरी हुयी। इसमे एक चैंनल है अमूरे जिसमे चौबीसो घंटे अंग्रेजी प्रेम गीत सुनाये जाते है। मन प्रसन्न हो जाता है। मेरी तो काम करने की क्षमता बढ गयी है। कई बार अच्छे गानो के चक्कर मे नीन्द की कुर्बानी देनी पडती है। अभी भी इस लेख को लिखते समय अमूरे चैनल ही बज रहा है। सम्भवत: यह चैनल विदेश से आता है। अब सब कुछ मन पसन्द मिलने के बाद लगता है कि कोई भारतीय इसके कार्यक्रमो को प्रस्तुत करे तो इन गानो मे चार चाँद लग जाये।


लगातार रेडियो सुनने के कारण कई तरह के सुझाव भी मन मे आते है। पर यह मजबूरी है कि इन सुझावो और शिकायतो को कैसे सही हाथो तक पहुँचाया जाये? यह कटु सत्य है कि रेडियो चैनल अपनी तारीफ सुनना चाहते है और यही कारण है कि तारीफ वाले पत्र ही उनके कार्यक्रम मे प्रस्तुत किये जाते है। कई बार निन्दा वाले पत्र भी प्रस्तुत किये जाते है पर चतुराई से। सुनने वाले सब समझते है। मै जब रेडियो से जुडा था तो पत्र को छाँटते समय हमे प्रशंसा वाले पत्र को ही चुनने के लिये कहा जाता था। इसी बीच मौका पाकर हम अपने रिश्तेदारो और पडोसियो को खुश करने उनके नाम भी डाल देते थे पर निन्दा वाल्रे पत्रो को अलग कर दिया जाता था। निन्दा बुरी लगती है पर सकारात्मक नजरीये से देखे तो निन्दा और निन्दक से काफी कुछ सीखा जा सकता है। कृषि की शिक्षा के दौरान हमारे एक प्रोफेसर ने हमे सीखाया कि निन्दक की बात सुनो और अपनी गल्ती सुधारो। साथ ही किसी न किसी बहाने से उसे अपने से जोडे रखो क्योकि वही सही राह दिखायेगा। मुझे नही लगता कि कोई ऐसा भारतीय रेडियो चैंनल है जो सीधे ही सुनने वालो की बात प्रसारित करता है। निन्दक फोरम के वजूद की अपेक्षा करना दूर की बात है। पर वर्तमान व्यवस्था मे निन्दको के लिये भी जगह होनी चाहिये।


मेरी लेखमाला को पढकर अब हमारे परिवार को रेडियो परिवार का दर्जा मिल गया है। अब आपको दो और सदस्यो के विषय मे बताना चाहूंगा। मेरे बडे भाई उमेश अवधिया आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले युववाणी मे प्रस्तोता रहे। वही उनकी मुलाकात अपनी जीवन संगिनी से हुयी जो कि साथी कम्पीयर थी। आज इंजीनियर भाई साहब भिलाई इस्पात संयंत्र मे ऊँचे पद पर है और कर्ण और ब्रम्हराक्षस का शिष्य़ जैसे नाटको की एकल प्रस्तुति देते है। देश भर मे उनके शो होते रह्ते है और सम्मानो से नवाजा जाता है। भाभी जी जिनका नाम अंजली अवधिया है, भौतिकी की प्राध्यापिका है और अभी पी.एच,डी. कर रही है। पास्तापुर मे कम्युनिटी रेडियो की बात मैने अभी आई.आई.टी. खडगपुर मे एक साल की शिक्षा ले रहे उमेश भाई को बतायी तो वे खुश हुये कि अब स्वप्न साकार हो रहा है। वे बचपन ही से अपना खुद का रेडियो चैनल आरम्भ करना चाहते थे। उस समय यह सम्भव नही लगता था पर अब तो यह सब कुछ आसान लगने लगा है। यदि यह चैनल शुरु हुआ तो मै कृषि और जडी-बूटियो का विभाग सम्भाल लूंगा। गुलमोहर के औषधीय उपयोग बताऊँगा और फिर गाना बजाऊँगा


गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता---

ये हर्बल गाने पूरे देश मे पसन्द किये जायेंगे- ऐसा मुझे लगता है।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Wednesday, March 19, 2008

मेरी मुंबई यात्रा भाग -- अमीन सायानी के साथ दोपहर का भोजन और उनका वीडियो बनाने का सौभाग्‍य

सूरत निवासी पियूष मेहता रेडियोनामा के प्रेमी हैं । वे अकसर मुंबई आकर प्रसारण की दुनिया की जानी-मानी हस्तियों से मिलते हैं और उनसे बातें करते हैं । पियूष मेहता ने हाल ही में चोटी के ब्रॉडकास्‍टर अमीन सायानी से मुलाक़ात की है । आईये पियूष मेहता से उस मुलाक़ात का ब्‍यौरा जानें । पियूष भाई के आलेख को हमने संशोधित एवं परिवर्तित करके प्रकाशित किया है----यूनुस ।।



इस बार भी हमेशा की तरह मुंबई आने से पहले ही मैंने अमीन सायानी साहब से फोन पर सम्पर्क करके उनसे मिलने का समय तय करवाया लिया था । पर इस बार उन्‍होंने छब्‍बीस फरवरी को दोपहर साढ़े बारह बजे बुलवा लिया । और ये इसरार किया कि मैं दोपहर का भोजन उनके साथ करूं । और ये तस्‍दीक भी कर दी कि खाना शाकाहारी ही रहेगा । यानी मेरे मन का संशय भी अमीन साहब भी जान गये थे ।



अमीन साहब समय के पाबंद हैं । इसलिए मैंने इस बात का ख़ास ख्‍याल रखा था कि कहीं मुझे देरी ना हो जाए । मुझे इस बात की ज्‍यादा चिंता थी कि कहीं मेरे देर से पहुंचने के कारण अमीन साहब को अपने कामकाम में परेशानी ना हो । अमीन साहब के सहायक दिनेश भाई मुझे पहले से जानते हैं । कई बार अमीन साहब से मिलने जो आ चुका हूं मैं । बहरहाल....आधे घंटे पहले पहुंचने के बावजूद दिनेश जी को कोई दिक्‍कत नहीं हुई और उन्‍होंने बड़े आदर और खुशी से मेरा स्‍वागत किया ।



अब मैं अमीन साहब के कमरे में था । जाने माने ब्रॉडकास्‍टर अमीन सायानी को अपना काम करते हुए देख रहा था । बीच बीच में वो बातें भी कर रहे थे मुझसे । उनके बेटे राजिल को भी हमारे साथ ही भोजन करना था । लेकिन उनका फोन आ गया कि उन्‍हें देर हो सकती है । इसलिए तकरीबन एक बजे मैं और अमीन साहब रीगल टॉकीज़ के पास स्थित अपोलो होटेल में आ पहुंचे । अमीन साहब की सिन्‍सीयेरिटी देखिए कि कुक को बुलाकर उन्‍होंने कम मिर्च और कम तेल में अलग से भोजन तैयार करने के निर्देश भी दिये ।



मैंने झिझकते हुए कहा कि मैं उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग करना चाहता हूं, जिसके लिये अमीन साहब सहर्ष तैयार हो गये । लेकिन उन्‍होंने कहा कि उनके स्‍टूडियोज़ या कार्यालय में ही वीडियो बनाना ज्‍यादा ठीक होगा । बातों बातों में मैंने अपने पुराने क़रीबी दोसत सुरेन्द्र रामसिंघानी का जिक्र किया जो किसी ज़माने में मुंबई के एम टी एन एल के कर्मचारी थे । मैंने अमीन साहब से बताया कि सुरेंद्र के साथ ही इत्‍तेफाक से मैं सबसे पहले उनसे मिला था । दरअसल अमीन साहब का हफ्ते भर से ख़राब था और वो काफी़ परेशान थे । सुरेंद्र ने अमीन साहब के कहने पर फटाफट एक घंटे में फोन  दुरूस्‍त करवा दिया था । जिसके बाद अमीन साहब ने सुरेंद्र को अपने दफ्तर में मिलने के लिए बुलवा लिया था । मैं भी सुरेंद्र के साथ था और पहली बार तब ही अमीन साहब से मिला था ।



इसी दौरान मैंने अमीन साहब की इजाज़त से सुरेंद्र को भी बुलवा लिया । और मेरे इसी मित्र की मदद से बातचीत का दृश्यांकन आप तक पहुंच रहा है ।  मैं आपको बताना चाहता हूं कि इस बातचीत को ASF फॉर्मेट से MPEG फॉर्मेट में बदलकर मैंने इसे चार् हिस्‍सों में बांटा है । फिर ई स्निप पर चढ़ाया है । हम पेशेवर फोटोग्राफर या सिनेमेटोग्राफर नहीं हैं । लेकिन इसे संपादित करते हुए मैंने ये ख्‍याल रखा है कि बीच बीच मं हो रही गुजराती बातचीत वैसी ही रहे । ताकि आपको सहज बातचीत का आनंद भी मिल सके । पूरा लोड होने तक आपको इंतज़ार करना होगा । तभी इसे बिना किसी बाधा के देख सकेंगे । उम्‍मीद है कि इस बातचीत को देखकर आपको आनंद आयेगा ।






भाग १


भाग २


भाग ३


भाग 4



इस बात के पूरी होने पर श्री सायानीजी ने प्यार से हम दोनों को विदा किया और अपनी केबिन में अपने कुछ दफ्तरी काम में जुट गये। परन्तु अमीन सायानी जी के सुपुत्र श्री राजिलजी ने बाहर के कमरे में अपना काम निपटाते हुए कुछ और समय हमारे साथ बहुत ही निजी़ मूड में बातें जारी रखी।
जैसा मैं आपको पहले बता चूका हूँ, उनसे भी मेरी पहचान रही है और अमीन साहब की तरह राजिल भी बहुत ही मिलनसार हैं। इस तरह करीब ४ बजे हम दोनों दोस्त अपने जीवन के बेहतरीन समय की यादों की बात करते हुए एक ही बस में बैठ कर बीचमें से अलग हो गये ।
रात्री को मैं अपने चचेरे भाई जतिन महेता, उसकी पत्नी श्रीमती रक्षा महेता और उसके बेटे मिलन महेता के यहाँ दो दिन के लिये रुकना हुआ। जतिन भाई मेरे सगे भाई नहीं है परन्तु हम दोनों में सम्बंध सगे से भी बढ़ कर है।
मेरे बहनोई श्री भगवान दास कापडिया (जो हकीकतमें मेरी फूफी की लडकी स्व. शारदा बहन के पति है), मेरे भांजे विनय कापडिया और उनकी पत्नी तृप्ती और उनके बेटे जैमीन के घर से चला। पाठको को इन सब नाम से कोई सीधा लेना देना तो नहीं है। पर जो पियुष महेता आप के सामने पेश हो रहा है, उनमें मुम्बई जैसे शहर में मिले इन सबके सहकार का मेरे मन महत्व होना चाहिए, वह तो आप भी मानेंगे । एक और कुटुम्ब भी है, जिनके नाम अगली पोस्ट में!
.....अगली पोस्ट विविध भारती की मुलाकात के बारे में।

सफल महिलाओं की गाथाएं

आप सबको होली मुबारक !

होलिका एक पौराणिक महिला चरित्र है। यह नकारात्मक चरित्र है परन्तु अंत में होलिका का जलना और उसी आग से प्रह्लाद का सुरक्षित निकलना बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। इस तरह होलिका के जलने से हमें संदेश मिला।

यह तो बात हुई पुराण की। अब एक नज़र इतिहास पर डालते है। हमारे देश के इतिहास में महिलाओं के ऐसे कई चरित्र है जो हमें प्रेरणा देते है। ऐसे चरित्रों को हम स्कूल कालेज की पाठ्य पुस्तकों में पढते है।

पाठ्य पुस्तकों के अलावा ऐसी जानकारी हमें सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में और पत्र-पत्रिकाओं में मिलती है। मगर भागदौड़ के इस जीवन में इन बातों को ढूँढ कर पढना कुछ कठिन है।

विविध भारती का महिलाओं का कार्यक्रम है - सखि-सहेली जो सोमवार से शुक्रवार तक हर दिन अलग-अलग रूप में प्रसारित होता है। गुरूवार को सफल महिलाओं की गाथाएँ सुनाई जाती है।

इसका एक लाभ यह भी है कि जो छोटे कस्बों गाँवों में रहने वाले है जहाँ तक विविध भारती तो पहुँचती है पर पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाओं का पहुँचना कठिन है और साथ ही ऐसे लोग भी जिन्हें पढने लिखने में कठिनाई होती है, इस कार्यक्रम से यह जानकारी प्राप्त कर लेते है।

इस कार्यक्रम में इतिहास की उन महिलाओं के बारे में भी बताया गया जो देश की आज़ादी के संघर्ष से जुड़ी थी जैसे हज़रत महल, ज़ीनत महल। इन महिलाओं द्वारा किए गए कामों की भी जानकारी दी गई जैसे पत्रिकाएं निकालना, हाथ से संदेश लिख कर जारी करना जो हज़ारों की संख्या में होते थे।

मुग़ल साम्राज्य से लेकर गाँधी जी के साथ काम करने वाली महिलाओं तक की जानकारी दी गई जैसे मीरा बाई जी रूस्तम जी कासा जिसने क्रान्ति का झण्डा तैयार करवाया।

कलकत्ता की सरला देवी चौधरानी जो विवेकानन्द की शिष्या रही और मैसूर की महारानी की सचिव रही जिसने परदा प्रथा उन्मूलन के लिए बहुत काम किया।

ये सब जानकारियां तो किसी किताब में मिल जाती है पर सखि-सहेली कार्यक्रम ने एक क़दम बढ कर काम किया है। हमारे समाज में ही हमारे आस-पास कुछ महिलाएं ऐसी भी है जिन्होनें समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत किया।

एक ऐसी ही महिला की जानकारी इस कार्यक्रम में दी गई - निर्झरा देवी जिसने चपरासी से प्राचार्य तक का सफर तय किया। आर्थिक तंगी से कम उम्र में ही उन्हें पढाई छोड़ चपरासी की नौकरी करनी पढी। लेकिन पढने की लगन इतनी रही कि जिस कालेज में चपरासी रही वही से प्राइवेट पढाई करने के बाद पहले लेक्चरार फिर प्रिंसिपल बनी।

ऐसी सफल महिलाओं की गाथाओं से जो न सिर्फ़ इतिहास की है बल्कि हमारे आज के ही समाज की है, न सिर्फ़ महिलाओं को बल्कि पुरूषों को भी जीवन में प्रेरणा मिलती है।

तो… हमारी तो भई यही राय है कि हर गुरूवार विविध भारती पर दिन में तीन बजे से चार बजे तक सुनिए सखि-सहेली कार्यक्रम और प्रेरणा लीजिए और जीवन में आगे बढिए।

Monday, March 17, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-5

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-5


- पंकज अवधिया


यूँ तो बचपन ही से आकाशवाणी, रायपुर से प्रसारित किसलय कार्यक्रम को मै ध्यान से सुनता था पर यह नही जानता था कि कभी बतौर बाल कलाकार इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करने का अवसर भी मिलेगा। मेरे एक मित्र विनोद के कहने पर मैने फार्म भरा और पहुँच गया आडिशन देने। कोई अनुभव नही था। कोई हालिया संस्मरण सुनाने को कहा गया। कुछ दिनो पहले दीवाली मनायी थी अपने गाँव मे सो पारम्परिक दीवाली के विषय मे बताया। परीक्षक खुश दिखे। अचानक जबान फिसली और मै को कह गया। तुरंत परीक्षक ने उसे दोहराने की जिद की। मैने उस शब्द को नही दोहराया। दूसरा शब्द कहा। फिर तो परीक्षक ने ठान लिया कि वे वही शब्द सुनकर ही रहेंगे। आधे घंटे बात होती रही पर मैने उस शब्द का प्रयोग ही नही किया सारे यत्नो के बावजूद। हँसते हुये मेरा चयन कर लिया गया। बाद मे परीक्षक माननीय लाल राम कुमार सिंग जो कि छत्तीसगढ के जाने-माने उदघोषक और कलाकार है, ने चतुराई की तारीफ की और सीखाया कि कैसे उच्चारण सुधारा जाये। यह सबक बहुत काम आया।


आज जब मै विज्ञान सम्मेलनो मे दुनिया भर के वैज्ञानिको के सामने व्याख्यान देता हूँ तो बडे गौर से सुना जाता है और उच्चारण की तारीफ की जाती है। यदि आप साफ बोलते है तो एक अलग तरह का आत्म-विश्वास आपमे आ जाता है। आज भी मूल भारतीय रेडियो अपने इसी गुण के कारण पहचाना जाता है। आज का जमाना निजी चैनलो का है जहाँ शायद ही इस पर कोई ध्यान दिया जाता है। मुझे लगता है कि प्रतिस्पर्धा की भावना को छोडकर युवाओ को आकाशवाणी मे कार्य कर रहे वरिष्ठो से सीखना चाहिये। मुझे मालूम है वरिष्ठ आगे आकर उन्हे नया रास्ता दिखायेंगे। उच्चारण के मामले मे बीबीसी हिन्दी और नये रेडियो मे वर्ल्ड स्पेस का कोई जवाब नही है। मै यहाँ हिन्दी और उर्दू चैनल की बात कर रहा हूँ।


किसलय मे शामिल होने के बाद मेरी आवाज की कीमत बढ गयी थी। ज्यादा नही पर फिर भी पन्द्रह रुपये का चेक मिलता था हर कार्यक्रम के बाद। मुझसे कहा गया कि किसी अनजाने से कुछ नही खाना। कोई दुश्मन आवाज खराब करने के लिये कुछ भी खिला सकता है। बचपन मे मै सर्दी से परेशान रहता था। ज्यादा कुछ पता नही था इसलिये गरम पानी से गरारे कर लेता था और पैदल जाते समय विक्स ले लेता था। यह सब लम्बे समय तक चला फिर जब हिम्मत करके इनके बिना कार्यक्रम प्रस्तुत किया तो वो ज्यादा प्रभावकारी रहा। सारा मामला आत्मविश्वास मे कमी का था। बाद मे जब मैने ड्रम बजाना आरम्भ किया तो शो से पहले थोडा से पीने और इसी तरह नाटक के शो से पहले दर्द नाशक के साथ पुदीन हरा खाने कहा गया। बचपन का सबक इन दोनो से बचाता रहा। आज जब जडी-बूटी पर लिखता हूँ तो बहुत सारे रेडियो जाकी के सन्देश आते है कि आवाज सुधारने वाली वनस्पति बताये। आज बडे खजाने की जानकारी है मेरे पास। मुलैठी से लेकर बच तक। काश यह जानकारी पहले भी होती।


मेरी इस लेखमाला से सबसे अधिक लाभ यह हुआ कि इसे पढकर माताजी ने इच्छा जतायी है कि वे भी अपने अनुभव लिखना चाहती है। वे आकाशवाणी मे नाट्य कलाकार है और एक सफल लेखक है। पर इंटरनेट और कम्प्यूटर से कोसो दूर है। पहले सोचा कि मै ही उनका अनुभव पोस्ट कर दूंगा पर युनुस जी के उत्साहवर्धन के बाद मैने उनका ब्लाग बनाया है स्नेह बिखेरती जिन्दगी और वे जल्दी ही रेडियोनामा मे रेडियो से जुडे अपने अनुभव लिखेंगी। उम्मीद है कि पिताजी को भी इससे जोड पाऊंगा क्योकि उनको रेडियो के असली जमाने के बारे मे जानकारी है। उनके पास आज भी तरह-तरह के नये-पुराने रेडियो है। उन्हे पढना सचमुच सभी के लिये रोचक रहेगा।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

युनुस खान का लेख अभिव्यक्ति पर..

रेडियो की बात से हट कर कुछ लिखने के लिये मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ परन्तु एक बढ़िया जानकारी मिली तो आपसे बाँटने का मन हुआ... और वह जानकारी यह है कि रेडियोनामा के वरिष्ठ सदस्य और हमारे मित्र यूनुस खान का लेख फ़िल्मी गानों में होली अभिव्यक्ति में प्रकाशित हुआ है।

इस लेख में यूनुस भाई ने हिन्दी फिल्मों में होली गीतों पर बहुत बढ़िया जानकारी दी है। आप सब एक बार जरूर पढ़ें।

मधुर धुनें

आजकल विविध भारती पर जब भी हम कोई कार्यक्रम सुनते है विशेषकर फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम जैसे जयमाला, मन चाहे गीत, भूले बिसरे गीत इन कार्यक्रमों के शुरू होने से पहले ही किसी फ़िल्मी गीत की मधुर धुन बजती है।

कार्यक्रम आधा समाप्त होने पर और व्यावसायिक अंतराल में भी धुन बजती है। कभी-कभी एक ही धुन बजती है पर कभी अलग-अलग गीतों की धुनें भी बजती है। लेकिन सभी धुनें लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों की ही होती है। जैसे एक दो सप्ताह पहले जयमाला में दि ट्रेन फ़िल्म के रफ़ी के गाए इस गीत की धुन बज रही थी -

गुलाबी आँखे जो तेरी देखी
शराबी ये दिल हो गया

जितना अच्छा रफ़ी ने इस गीत को गाया है उतनी ही मधुर रही ये धुन। कभी-कभी धुनें बहुत ही थोड़ी सी बजा करती है जिसमें शुरूवाती संगीत बजता है और गीत का मुखड़ा पर कभी एक अंतरा पूरा और दूसरा अंतरा शुरू होने तक धुन बजती है।

कुछ समय पहले बीच के अंतराल में ही धुनें बजती थी और अंत में कुछ समय बचने पर लेकिन शुरूवात में नहीं बजती थी। अब तो शुरूवात में ही धुन बज उठती है।

कुछ और पीछे हम चले, अरे ! कुछ क्या बहुत पीछे चलते है तब फ़िल्मी धुनें नहीं बजती थी। धुनें भी तभी बजती थी जब एक कार्यक्रम समाप्त हो जाता था पर अगला कार्यक्रम शुरू होने के लिए कुछ समय रहता था।

ये धुनें फ़िल्मी तो नहीं होती थी पर मधुर होती थी। कभी बाँसुरी की तान छिड़ती कभी सितार के तार बज उठते तो कभी सरोद के। अक्सर जलतरंग बजता। इन सारी धुनों में जलतरंग बहुत अच्छा लगता था। अब तो बहुत समय हो गया जलतरंग नहीं सुना।

इस तरह धुनों का पहले केवल फ़िलर की तरह प्रयोग किया जाता था। आजकल तो धुनें कार्यक्रम का एक हिस्सा बन गई है। विभिन्न साज़ों की धुनों की जगह फ़िल्मी धुनों की शुरूवात क्यों हुई इसकी कोई जानकारी विविध भारती से कभी मिल नहीं पाई। लगता है धुन बजाने के इस मुद्दे को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं गया।

पिछले मेरे सिलोन से संबंधित चिट्ठे में मीनाक्षी जी ने टिप्पणी की थी कि कैसे मुझे इतना याद रहता है… तो बता दूं कि रेडियो सुनना न सिर्फ़ शौक़ है न सिर्फ़ आदत है बल्कि जीवन की दैनिक दिनचर्या का एक हिस्सा है।

पर रेडियो हमेशा अपनी पसन्द से सुना इसीलिए तीन केन्द्र सुने - विविध भारती, सिलोन और आकाशवाणी हैदराबाद। इसीलिए पीयूष जी सिलोन के सभी कार्यक्रमों के नाम बता नहीं सकती। तकनीकी दिक्कतों से चार दिन के बाद आज कंप्यूटर पर काम कर रही हूँ इसीलिए पिछले चिट्ठे की टिप्पणियाँ भी आज ही देखी।

Saturday, March 15, 2008

मेरी मुम्बई यात्रा - २

इस श्रंखला की दूसरी की में मैं मुम्बई के पुराने अलभ्य गानों के संग्राहको में जाने माने नामवर डॉ.प्रकाश जोषी से मुलाकात हुई।

वह इस तरह, कि विविध भारती के दि. ०३-०१-२००८ के दिन जब उनके घर जा कर श्री कमल शर्माजी और श्रीमती निम्मी मिश्रा जीने जो उनकी और उनके बेटे श्री राहुल जोषी से जो भेट वार्ता रेकोर्ड की थी, प्रसारित हुई थी। उस मुलाकात को सुन कर दूसरे दिन सुबह मैंने उनसे फोन पर बात की।

मेरे सुरत निवासी मित्र श्री हरीश रघुवंशी के कारण मैं उनके नाम से थोडा परिचित था । तो उन्ही से उनका फोन नं पाया था। मुझे यह भी पता था, कि वे मराठी भाषी है, इस लिये मैंने उनसे हिन्दी में बात करनी शुरू कि थी, तो उन्होंने शुद्ध गुजराती में उत्तर देने शुरू किये। जब मैं मुम्बई गया तब उनसे उनकी डिस्पेन्सरी का समय जान कर कहा, कि उनके नजदीकी विस्तार में मैं जब भी मेरे एक सम्बंधी के घर आऊँगा, उनसे कम से कम मिलूँगा तो सही चाहे मरीजों की संख्या ज्यादा हो और ज्यादा बात नहीं हो सके तो कोई बात नहीं।

इस तरह एक दिन मैं पहुँच गया तब दवाखाना खुलने में थोडी देर थी। थोडी़ देर के बाद वे आये तब उन्होंने मुझे खड़ा देखकर तुरंत ही पहचान लिया कि मैं वही उनसे मिलने आने वाला व्यक्ति हूँ।

बाद में जब भी मरीजों से बीच बीच में अवकाश मिला तब तब उन्होंने बडी सहृदयता से बातें कि। एक बार मेरी इस मुम्बई यात्रा के पहेले सुरत से टेलिफोनिक बात चीत के दौरान श्री अमीन सायानी साहब ने भी उनको याद किया था। करीब ४० मिनीट बातें (जिसमें रेडियो सिलोन की बात भी शामिल थी।) करके संतोष से मैं लौटा ।

Friday, March 14, 2008

आप अपनी पसंद का ही सुनादें...

आप अपनी पसंद का ही सुनादें...  (आशेन्द्र सिंह)

रेडियो से जुडाव 1994 में आकाशवाणी ग्वालियर से शुरू हुआ।   इस यात्रा ने लगभग 6 साल का पड़ाव आकाशवाणी भोपाल में लिया। मैं मेन चैनल में था इस लिए नई फिल्मों की सी डी हमारी लायब्रेरी में फ़िल्म रिलीज़ होने के बहुत दिनों बाद आतीं थी, लेकिन विविध भारती (सी बी एस ) में जल्दी आ जाती थी।  इधर श्रोताओं के ज़्यादातर फरमाइशी ख़त नई फ़िल्मों के गीतों के लिये आते थे।  कभी - कभी सीबीएस से नई फ़िल्म की सीडी मांगने पर मिल जाती तो उसके गाने बजाते हुए बड़ी ख़ुशी होती।  एक बार फरमाइशी फिल्मी गीतों का साप्ताहिक प्रोग्राम जो कि लाइव फोन- इन था, कर रह था। एक श्रोता ने नई फ़िल्म के एक गाने की फरमाइश कर दी। हमारी लायब्रेरी में उस फ़िल्म की सीडी थी नहीं। मैंने श्रोता से क्षमा मांगते हुए कहा कि इस फ़िल्म की सीडी हमारी लायब्रेरी में नहीं है आप किसी और फ़िल्म का गाना बताइए , श्रोता ने दूसरी फ़िल्म भी नई बता दी। मैंने एक बार फिर क्षमा मांगते हुए कहा कृपया आप अन्य किसी फ़िल्म का गाना बताइए।  इस बार श्रोता बंधु ने 'शोले' फ़िल्म के गाने की फरमाइश की।  दुर्भाग्य से हमारे यहाँ 'शोले' की जो एलपी थी वह टूटी हुई थी। मैंने शायराना अंदाज़ में श्रोता से कहा किसी ऐसे गाने की फरमाइश कीजिए जो आप के साथ- साथ और सुनने वालों के दिल में उतर जाए ।  इस बार श्रोता खीज़ गया और बोला तब आप अपनी पसंद का गाना ही सुना दीजिएगा। श्रोता के तेवर से उसकी खीज़ ज़ाहिर हो रही थी। आख़िर मैंने फ़िल्म 'आशिकी' का  "तू मेरी जिन्दगी है ..." गीत सुनवाया

उसके बाद जब भी लाइव फ़ोन - इन करता तो श्रोताओं से शुरू में ही अनुरोध कर लेता कृपया बहुत नई फिल्मों के गानों की फरमाइश न करें ।

लेखक का परिचय उन्हीं के शब्दों में

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मैं आशेन्द्र सिंह मूलतः एक पत्रकार हूँ. शिक्षा में एम. ए. (हिंदी साहित्य) से करने के बाद पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिग्री ली. आकाशवाणी ग्वालियर से रेडियो से जुडाव हुआ यह यात्रा भोपाल आकाशवाणी तक अनवरत चली. भोपाल में युववाणी में लगभग 6 नए प्रोग्राम शुरू करवाए. इसी दौरान दो साल तक ई टीवी (मध्यप्रदेश) में दो धारावाहिक चलाये. लगभग 7 अख़बारों में कम किया कुछ रेडियो नाटक भी लिखे और कुछ खास संग्रहों में रचनाएँ भी प्रकाशित हुई. इसी बीच ज्ञानवानी में भी कम किया. कुछ फीचर बहुत उल्लेखनीय रहे है. फ़िलहाल दिल्ली के एक मीडिया संस्थान को बतौर संपादक सेवाएं दे रहा हूँ. साथ ही 5 राज्यों में एक विश्व स्तरीय संस्था के सहयोग से बच्चों को रेडियो का तकनीकी व व्यवहारिक प्रशिक्षण दे रहा हूँ. अपनीबात के नाम से एक ब्लोग भी चला रहा हूँ.

Thursday, March 13, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-4

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-4


- पंकज अवधिया


कुछ वर्षो पहले जब मै रायगढ के मुडागाँव पहुँचा तो देवनाथ को अकेले पाया। बडा ही उदास सा कोने मे बैठा था। घर के लोग काम पर गये थे। देवनाथ की उम्र 18 से ऊपर है पर देखने से लगता है कि बच्चा है। उसके गाँव का पानी उसके लिये अभिशाप बन गया। पानी मे फ्लोराइड की बहुत अधिक मात्रा है। यही कारण है कि गाँव का एक बडा हिस्सा शारीरिक और मानसिक विकृति से जूझ रहा है। देवनाथ के शरीर मे चौबीसो घंटे तेज दर्द होता रहता है। जब घर वाले कुछ कमाते है तो दर्द मिटाने वाले इंजेक्शन का जुगाड होता है। मै अपनी रपट के लिये देवनाथ की तस्वीरे उतारने लगा। मन था कि कुछ मदद करुँ उसकी पर समझ मे नही आया। उससे पूछा कि पूरा दिन कैसे कटता है तो उसने बताया पहले रेडियो था पर वह खराब हो गया है। आनन-फानन मे उसके लिये रेडियो की व्यवस्था की गयी। उसके चेहरे मे खुशी छा गयी। मानो सारा दर्द काफूर हो गया। ऐसा जादू चलता है रेडियो का भारत मे।


बचपन मे पार्टी देकर जन्म दिवस मनाने के बाद ऐसा लगा कि जन्मदिन के दिन कुछ भलाई वाला काम करना चाहिये। चूँकि जुलाई के जन्मदिन पडता है इसलिये मई-जून मे छुट्टियो मे नगर के ब्लाइंड स्कूल मे चला जाया करता था। दो महिने बच्चो के साथ गुजारने के बाद फिर जन्मदिन के दिन बच्चो के साथ खुशियाँ मना लेता था। जब भी मै बच्चो जोकि उम्र मे मुझसे थोडे ही छोटे होते थे, के पास जाया करता तो उन्हे रेडियो से चिपका हुआ पाता था। वे बडे गौर से रेडियो सुनते थे और उदघोषको की कमाल की नकल उतारते थे। स्कूल मे टी.वी. भी था पर रेडियो की ओर झुकाव ज्यादा था। वे देख नही पाते थे इसलिये मै पूरे समय देखना शब्द न निकले मुँह से इस प्रयास मे रहता था पर वे बेझिझक कहते थे कि अभी रेडियो सुन रहे है और अब टी.वी. देखना है। उनसे बात करने पर वे अक्सर कहते थे कि उनके जैसा जीवन जी रहे लोग क्यो नही उनके दर्द की बाते रेडियो मे करते है? वे मुझसे पूछते थे कि क्या कभी मैने ब्लाइंड उदघोषक को व्लाइंड बच्चो की बाते करते सुना है? मै निरुत्तर हो जाता था। यदि मै गलत नही हूँ तो ऐसा कार्यक्रम अभी भी नही आता है।


पिछले कुछ दशको से मेरी नजर ग्रामीण हाटो पर है और इनके बदलते स्वरूप पर मै लगातार लिखता रहा हूँ। जब से छत्तीसग़ढ मे एफ.एम. चैनलो की बाढ आयी है तब से हाटो मे रेडियो की दुकान विशेष आकर्षण का केन्द्र बन गयी है। सभी के लिये रेडियो है। सी.डी. का क्रेज कुछ घट सा गया है। सुबह-सुबह काम की तलाश मे जब ग्रामीण साइकिल मे सैकडो की संख्या मे शहर आते है तो रेडियो सुनते (या कहे सुनाते) आते है। यह सब बडा ही रोचक दृश्य उपस्थित करता है।



तो बच्चो रेडियो कितने प्रकार के होते है? आधुनिक गुरुजी अब यह प्रश्न कर सकते है। दो प्रकार के। एक घर मे सुनने वाला और दूसरा सब जगह सुना जाने वाला। आप भी चौक गये ना। जी, मेरा वर्ल्ड स्पेस रेडियो केवल घर मे चलता है। उसे लटकाकर मै जडी-बूटी खोजने जंगल जाने की सोचूँ तो यह सम्भव नही है। कम से कम अभी तो सम्भव नही है। वैसे यह उम्मीद की जा सकती है जल्दी ही कार रेडियो मे भी वर्ल्ड स्पेस के चैनलो को सुना जा सकेगा।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Wednesday, March 12, 2008

रेडियो वाणी पर मरहूम श्री मास्टर इब्राहिम

आदरणिय श्री युनूसजी,
रेडियो वाणी पर मरहूम श्री मास्टर इब्राहिम साहब के बारे में पोस्ट मैंने कल पढी थी, तब से ही मेरे दिमाग में थोडा सा शंशय संशय पेदा पैदा हुआ था । पर उस वक्त मेरे नेट पर थोडा प्रोब्लेम होने के कारण सुन नहीं पाया था । पर आज अभी दि.१२ मार्च २००८ के दिन दोपहर, के बाद ०४.३० पर यह सुन कर लिख रहा हूँ ।
आपने जो भी वेब पन्ने से यह जानकारी के साथ इस धून धुन को पाया वह वेब वालो ने श्री एनोक डेनियेल्स साहब की एल.पी. डान्स टाईम से यह धून धुन गलती से उठाई है । इसमें कहीं भी क्लेरीनेट है ही नहीं ।
यह एल. पी. की कूलकुल ११ में से करीब ९ धूनेंधुनें श्री एनोक डेनियेल्स साहब इस के पहेले अलग अलग ७८ आरपीएम तथा ईपी और एलपी में पियानो-एकोर्डियन पर प्रस्तूत प्रस्तुत कर चूके थे । इसमें यह धून धुन भी शामिल थी। और विविध भारती के पास यह दोनों धूनेंधुन है, और यह डान्स टाईम की तो आप लोगो के पास सीडी भी आ गयी है । आपको याद होगा कि जब अभी तो नहीं पर दो साल पहेले मैं आया था तब यह नीले गगन के तले बाली पियानो एकोर्डियन वाली धून इन दिनों विविध भारती से व्यापारी अंतराल के दौरान बजती थी, वह मैं ने आपसे, कमल शर्मा जी से और श्री महेन्द्र मोदी साहब से अलग अलग किया था, जिसमें तीन अंतरे पूरे था थे।

इस डान्स टाईम वाली इस गीत की धून धुन में सिर्फ़ दूसरा और तीसरा ही प्रस्तूत प्रस्तुत किया गया है । इस धुन में मेलडी पार्ट कुछ: ब्रास वाद्यो पर बजाया गया है । और तीसरे अंतरे में पियानो का भाग जो मेलडी भाग से पहेले बजता है, वह श्री एनोक डेनियेल्स साहबने शायद खुद ही बजाया है ।
मास्टर इब्राहिम साहबने यह धून धुन जहाँ तक मेरा खयाल है, बजाई ही नहीं है। आज उनको सभी जगह से श्रद्धांजलियाँ मिल रही है, पर उनके बनाये खजाने पर व्यापार करने वालोने उनको आर्थिक परेशानीयाँ परेशानियाँ कैसे दी थी, वह मैंने एक ख्यात्नाम ख्यातनाम वादक कलाकारसे जबानी सुनी है । आप उनके तीन वायब्रोफोन बादक बेटों (एक का नाम शायद इक़बाल है) से इस बारे में शायद सही बात जान सकते है । जब फिर हमारा आप से मिलना होगा, मैं आपको बताऊँगा।

इनकी कोई भी धून स्टिरीयोमें नहीं ध्वनि आंकित अंकित नहीं हुई थी । असल धुने सब शायद ७८ आरपीएम पर ही थी, जो उनके इन्तकाल के बाद श्रद्धांजलि श्रद्धान्जली के रूप में सहबे पहेलेसबसे पहले एक एल पी और बाद कई सीडी के रूपमें बझार बाजार में आयी ।
आशा है आप और अन्य वाचक इस पर टिपणी प्रस्तूत प्रस्तुत करेंगे । (विविध भारती के पास इस धून धुन कन्हैयालालजी की शहनाई पर भी है।)

पियुष महेता ।
सुरत-३९५००१.

सिलोन में जौहर के जौहर

शीर्षक पढ कर ही आपमें से बहुतों ने समझ लिया होगा कि आज मैं किसकी चर्चा कर रही हूँ। जी हाँ आज मैं चर्चा कर रही हूँ लोकप्रिय कलाकार आई एस जौहर की।

आई एस जौहर की जोड़ी महमूद के साथ ख़ूब सराही गई गोवा मुक्ति आन्दोलन की फ़िल्म जौहर महमूद इन गोवा में जिसके गाने सिलोन और विविध भारती पर ख़ूब धूम मचाते रहे। अब भी कभी-कभार भूले-बिसरे गीत में ये गाने बजते है।

इस फ़िल्म की सफ़लता के बाद इसी तर्ज पर हास्य फ़िल्म आई जौहर महमूद इन हाँगकाँग फिर जौहर साहब फ़िल्मों में हास्य भूमिकाओं में नज़र आए। सबसे अच्छी भूमिका रही फ़िल्म आज की ताज़ा ख़बर में।

इसी छवि के साथ जौहर अमीन सयानी के साथ सिलोन पर तशरीफ़ लाए। कार्यक्रम था जौहर के जवाब जो बिनाका गीत माला के पहले यानि हर बुधवार को पौने आठ से आठ बजे तक प्रसारित होता।

इस कार्यक्रम में अमीन सयानी जौहर साहब को आलीम फ़ाज़िल कहते जो उर्दू का शब्द है जिसका मतलब होता है विद्वान। एक विद्वान की तरह जौहर श्रोताओं के किसी भी सवाल का जवाब दिया करते थे।

यह एक प्रायोजित कार्यक्रम था। प्रायोजक कौन थे यह मुझे याद नहीं आ रहा। इस कार्यक्रम में श्रोताओं से कहा जाता कि उनके मन में उठने वाला कोई भी सवाल लिख कर भेजें जिसका जवाब जौहर देंगें। बीच-बीच में तीन गीत भी बजा करते। गीत तो पूरे नहीं बजते थे पर सवाल-जवाब से मेल खाते होते थे।

सवाल किसी भी तरह का होता था जैसे एक बार किसी ने पूछा कि दो बेटों की माँ किसे ज्यादा चाहती है बड़े बेटे को या छोटे बेटे को तो जौहर साहब ने जवाब के बदले सवाल किया कि आप अपनी दो आँखों में से किसे ज्यादा पसन्द करते है। बस इस सवाल में ही जवाब था।

कभी-कभार कुछ शरारती श्रोता कुछ अजीब सवाल पूछते जैसे गाय हरी घास खाती है पर सफ़ेद दूध क्यों देती है तो जौहर साहब जवाब देते यह सवाल आप गाय से कीजिए। मतलब जवाब गोल कर दिया गया पर हास्य की स्थिति बनी रही और कुछ विद्वतापूर्ण बातें भी होती।

कर्यक्रम के अंत में पढे जाने वाले तीन प्रश्नों के लिए पहला दूसरा और तीसरा ईनाम भी दिया जाता जो श्रोताओं को डाक से भेजा जाता था। इसके अलावा भी कुछ सवालों को चुना जाता पर समय कम होने से पढा नहीं जाता था पर कुछ ईनाम उन्हें भी भेजे जाते थे।

कुछ समय बाद ये कार्यक्रम बन्द हो गया। इसके बाद जौहर नज़र आए रविवार की सुबह एस कुमार्स का फ़िल्मी मुकदमा कार्यक्रम में जिसमें वो जज होते और वकील होते अमीन सयानी।

यह कार्यक्रम बाद में विविध भारती से भी प्रसारित होने लगा। इसकी कई कड़ियाँ पसन्द की गई। मुझे टुनटुन वाली कड़ी बहुत पसन्द आई जहाँ उन पर वकील ने आरोप लगाया था कि एक पार्टी में उन्होनें सारा ख़ाना खा लिया तो जज के सफ़ाई मांगने पर टुनटुन ने सफ़ाई दी कि वो तो सिर्फ़ चख़ा था।

एक अर्सा हो गया इस तरह के मनोरंजक कार्यक्रम सुने। आजकल तो किसी से बातचीत होती है तो नया कलाकार होने पर उसे प्रमोट करने की कोशिश होती है और पुराने कलाकार होने पर उनके अनुभव ही सुनने को मिलते है।

Monday, March 10, 2008

विख्यात मेन्डोलिन वादक श्री महेन्द्र भावसार का ७६वां जन्मदिन

श्री महेन्द्र भावसार फिल्मी संगीत की दूनिया के जानेमाने मेन्डोलिन वादक रहे । हालाकी मैं रेडियो के अलावा फिल्म संगीत के अन्य कोई सोर्स से जूडा नहीं था । साझोमें हार्मोनियम, माऊथ ओर्गन, बांसूरी, और बेन्जो ( जिसको ट्रायसेकोटो या बूलबूल तरंग नाम से मैं ज्न दिनो जानता था ) , या शादीमें बजनेवाला एक अपने आपमें खाश़ किसमका क्लेरीनेट (जिसको शायद ग्राम्य गुजरातीमें पिपूडी बोलते थे ) त्क ही करीब सिमीत था । इन दिनों करीब १९६२ से रेडियो से बजने वाली फिल्मी धूनों पर मेरे कान ठहरने लगे और प्रथम घ्यान आकर्शित हुआ पियानो-एकोर्डियन पर जो श्री एनोक डेनियेल्स बजाते थे । तो वह स्वाभाविक है कि मूझे अच्छी खिसम के हार्मोनियम जैसा लगा । इसी तरह मेन्डोलिन सबसे पहेले श्री महेन्द्र भावसार का सुना , जो सुपर क्वोलिटी का बेन्जो लगा । पर श्री एनोक डेनियेल्स की धूने तो काफी मात्रामें आती थी । जब की करीब तीन या चार साल बाद फिल्में प्यार मोहोबत, तीसरी मंझील, तीसरी कसम, आयी । उन के एक एक गाने को तथा अन्य एक गाने को ले कर एक ई. पी. श्री महेन्द्र भावसार साहब की आयी । इसके कई एक साल बाद करीब १९६७में श्री मनोहर महाजन साहब रेडियो सिलोन गये तो उन्होंने श्री महेन्द्र भावसार साहब की आवारा (दो धूनें) फिल्म जिन्दगी (पहेले मिले थे सपनोमें – जो आज मेरी श्रीमती पद्दमिनी परेरा को फोन पर दी हुई इस सालगिराह की माहिती के आधार पर पद्दमिनी जीने आज सुबह ८ बजे प्रस्तूत की थी) तथा ससुराल ( तेरी प्यारी प्यारी सुरत को) पूराने सुस्त पडे खजाने से ढूंढ निकाली थी और प्रस्तूत करने लगे थे, जिसमें वाद्यवृन्दमें अन्य कोई वाद्य नहीं था, सिवाय की स्व. सुदर्शन अधिकारी के तबले ) ।
उन्होंनें श्री अनिल विश्वासजी से आनंद मिलींद तक फिल्मोंमें बजाया है ।
ज्नसे मेरा परिचय श्री एनोक डेनियेल्स साहबने करवाया था और बताया (दूसरी एक और मुलाकात के समय )था कि, एच. एम. वी. के सितारें कार्यक्रम के शिर्षक संगीत का शुरूआती हिस्सा भी श्री महेन्द्र भावसार साहब का बजाया हुआ है (एल. पी. सितार गोझ लेटिन-मूख्य साझ सितार पर श्री जयराम आचार्य-वाद्यवृन्द निर्देशन-श्री एनोक डेनियेल्स) ।
श्री महेन्द्र भावसार साहब को आज के दिन के लिये बहोत बधाईयाँ , और स्वस्थ तथा लम्बी आयु के लिये शुभ: कामना । इस बार मेरे समय अभाव की कमी के कारण उनसे मिलना नहीं हुआ । पर आज उन्हें फोन पर बधाई तो दी थी ।
मेरी मुम्बई यात्रा का अन्तिम पेरा रेडियो श्री लंका के १९७७ से १९८० तक उद्दघोषक रहे रिपूसुदन कुमार एइलाबादी के लिये है । जो मैंने लिखा तो था , पर निंद के समय कोई गलती से डिलीट हो गया था । इस लिये क्षमा प्रार्थी हूँ ।

आकाशवाणी समाचार - हर पल हमारे साथ

अभी देश के कुछ राज्यों में चुनाव हुए। इससे पहले देश में बजट की धूम थी। ऐसा अक्सर होता है कि कुछ न कुछ मुद्दा देश में छाया रहता है और हम चाहते है कि हमें पल-पल की ख़बर मिलती रहे।

टेलीविजन चैनलों ने इसकी पूरी व्यवस्था की। हर पल के समाचार हमें मिलते है। यहाँ तक कि अगर दूसरे समाचार चल रहे हो तब भी सभी समाचारों की शीर्ष पंक्तियाँ पटल पर पढी जा सकती है।

यही हाल इंटरनेट का भी है। वेबसाइटों को रिफ्रेश करते जाइए और समाचार जानते जाइए। पर आकाशवाणी तो आकाशवाणी है…

अख़बारों के बाद रेडियो समाचारों का ही तो स्थान रहा है समाचार जगत में। फिर अख़बार ठहरा प्रिंट मीडिया और आकाशवाणी इलेक्ट्रानिक तो आकाशवाणी को तो अख़बार से भी आगे निकलना है न…

सो आकाशवाणी ने कर दिखाया। हाँ कुछ समय अवश्य लगा। पर आज आकाशवाणी के समाचार ही हर पल हमारे साथ होते है। फोन पर जो समाचार मिल जाते है और आज के दौर में फोन तो हर पल हर जगह हमारे हाथ में होता है। चाहे अपने काम में व्यस्त हो चाहे यात्रा पर हो।

पहले तो आकाशवाणी ने राष्ट्रीय समाचारों के लिए यह सुविधा दी। बस नंबर डायल कीजिए और हिन्दी या अंग्रेज़ी में सुनिए समाचारों की सुर्ख़िया। पर अब तो क्षेत्रीय समाचार भी फोन पर सुने जा सकते है। रेडियो के हर बड़े बुलेटिन में फोन नंबर बताया जाता है।

तो बस देर किस बात कि आप जहाँ कहीं भी हो हिन्दी या अंग्रेज़ी में राष्ट्रीय समाचार या क्षेत्रीय समाचारों की सुर्ख़ियां क्षेत्रीय भाषा में सुनना चाहते हो नंबर डायल करें और सुन लें।

ऐसी सुविधा और कहीं नहीं क्योंकि फोन ही आपके हाथ में हो सकता है छोटे से छोटा टेलीविजन या कंप्यूटर नहीं।

Sunday, March 9, 2008

मेरी हालकी मुम्बई यात्रा -१

वैसे लोगो के लिये यह बडी बात नहीं होती है । मुम्बई तो क्या आज तो कई लोगो के लिये विदेष यात्रा भी अचरज की बात नहीं होती है । पर मेरा घूमना कम रहा है, और कुछ: सालों से मेरा यह सिलसिला बन गया है, कि गरमी का मौसम शुरू होने से पहेले साल या दो साल के बाद मुम्बई करीब एक हप्ते के या दस दिन के लिये घूम आऊँ, और मेरे भी बुझूर्ग सम्बंधीयों तथा अन्य सम्बंधीयोँ , मेरे अफसर रह चूके देना बेन्क के कुछ: मित्रो, जो मुम्बई से सुरत कभी तबादले के तौर पर आये थे , उनको, विविध भारती के साथियों, तथा कुछ: फिल्म-संगीत से जूडे वादक कलाकारों तथा आवाझ की दूनिया से जूडे स्वायत प्रसारको से जो मूझे कुछ: जानते और पहचानते है उनको दोनो और के समय संयोग अनुसार मिलकर सुरत लौटूँ ।
इस सिलसिले के अनुसार सुरत से पहेला सम्पर्क मैंने श्री अमीन सायानी साहब का सुरत से ही किया तो वे तो बहोत खुश: हुए और उन्होंने मूझे मंगलवार दि. २६- ०२-०८ के दिन दोपहर १२.३० पर अपने साथ शुद्ध वेजिटेरियन लंच लेने के लिये आमंत्रीत किया और अपनी डायरीमें मेरा नाम उस समय के लिये पक्का कर लिया ।
बादमें मुम्बई जाने के दूसरे दिन हमारे इस ब्लोग के साथी और वित्त पत्रकारिता में विषेष रूची रख ने वाले श्री कमल शर्मा जी मूझे मिलने आये और बहोत सारी जानकारी से भरी बात से मूझे आनंदित कर गये और प्रतिकात्मक पर सुंदर भेट से नवाज कर गये, जिसका थोडा बयान मैनें उसी दिन मुम्वई से ही दिया था ।
दि. २३ के रविवार के दिन मैं अपने ठहराव से सुबह का लंच ले कर (शायद सुबह और लंच शब्दो का मेल दुनिया की नझरमें ठीक नहीं है , पर सुरत में मेरी आदत सुबह के नास्ते की नहीं पर पूरे खाने की रही है, जैसे स्कूल के दिनों लोगो की होती है । और दो पहर हलके नास्ते की रही है । इस के लिये थोडे स्वास्थ्य के कारण भी है ।) निकला और महालक्ष्मी स्टेशन जा कर श्री गोपाल शर्माजी के घर जाने के लिये बोरिवली ट्रेईन पकडी जो प्लेटफोर्म के गलत इन्डिकेटर के हिसाब से थी और अंध्रेरी तक की ही थी । और उस दिन मेगा ब्लोक (यूनुसजी, अनिताजी और कमलजी इस बात से भली भांती परिचीत ही होंगे ।) और इन्डिकेटर्स की लिखावट कई और आने वाली ट्रेईन्स का कोई मेल न होने के कारण अन्धेरी स्टेशन से चल कर वेस्टन एक्स्प्रेस हाई- वे गया जहाँ से उसी हाई वे पर बोरिबली में श्री गोपाल शर्माजी रहते है , मैं बस पकड कर गया । शारीरीक और मानसिक रूपसे जो थकान महेसूस हुई थी, वह श्री गोपाल शर्माजी से मिल कर उतरने लगी । उन्होंने भी मेरे फोन से बताने के आधार पर श्री अमीन सायानी साहब से मेरे आने के पहेले मेरे बारेमें बात की थी, तो मेरे पास फिर से फोन करवा के बात करवाई । बाद में पूरानी रेडियो और विग्यापन के बारेमें बात की तव मेरे मूह से एक बात श्रीमती तबस्सूमजी के माताजी और पिताजी के आन्तर धर्मीय प्रेम विवाह के बारेमें, वह कैसे हुआ था उस घटना की बात निकल पडी, जो शर्माजी को तबस्सूमजी के साथ ११ साल विविध भारती से पारले प्रोडक्ट द्वारा प्रयोजित कार्यक्रम तूम जियो हजारो साल करने पर और म्यूझिक इन्डिया लि. द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के कुछ: किस्तों के करने पर भी पता नहीं थी । तब उन्होंने तबस्सूमजी से फोन करके मेरा परि चय करवाया । और तबस्सूमजीने भी बहोत अच्छी तरह बात की ।
च्चबात मैनें उनको कही, जो उनको १९८५में दूर दर्शन पर अस्थायी समाचार पाठक के रूपमें देख़ कर मेहसूस की थी, वह बताई की वे भाषा और उच्चार शुद्धि तो रखते हुए भी बहोत लो प्रोफाईल अपने आपको रखते लगते है । तो शर्माजीने ज्नसे भी दूरभाषी परिचय करवाया । अब अगला विवरण अगली पोस्टमें जो बहोत जल्ग आयेगी ।

क्रिकेट की कमेन्‍ट्री और बाज़ार का भांगड़ा--अतुल चौरसिया का विश्‍लेषण

रेडियोनामा में आज हम प्रस्‍तुत कर रहे हैं अतुल चौरसिया का दिलचस्‍प आलेख जिसका ताल्‍लुक क्रिकेट की कमेन्‍ट्री और बाजार की घुसपैठ से है । अतुल चौरसिया 'तहलका' से जुड़े हुए पत्रकार हैं । और उनका अपना ब्‍लॉग चौराहा भी काफी दिलचस्‍प है । रेडियोनामा के लिए ये आलेख हमने ख़ासतौर पर उनसे प्राप्‍त किया है । इसे वे अपने ब्‍लॉग पर पहले ही प्रस्‍तुत कर चुके हैं । अतुल की इस सुंदर लेखनी पर आपकी प्रतिक्रियाओं का स्‍वागत है । अगर आपको भी लगता है कि रेडियोनामा पर आपका कोई आलेख उपयोगी साबित होगा तो आपका भी स्‍वागत है ।

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वो भी दिन थे जब हर गली, हर मुहल्ले, हर नुक्कड़ पर रेडियो कान में सटाए लोग भारत की हार जीत का कानों देखा हाल जानने को बेताब रहते थे। बात तब की है जब अपन लोग बस क्रिकेट का 'क ख ग' सीख रहे थे। टीवी का हल्लाबोल घर के ड्राइंग रूम में नहीं हुआ था। कहीं कहीं था भी तो क्रिकेट के मैचों के सीधे प्रसारण की आशा वो भी दूरदर्शन से बेमतलब थी।


बात 90 के शुरुआती दशक की है। बाज़ारवाद की बस शुरुआत ही हुई थी। लेकिन क्रिकेट का धर्म रूपी स्वरूप काफी हद तक स्थापित हो चुका था। बात शुरू हुई थी रेडियो में क्रिकेट मैचों के कानों देखे हाल से। क्रिकेट के मैदान से हजारो मील दूर हम जैसे लोगों को जोड़ने का यही एक मात्र जरिया था। गजब लच्छेदार भाषा में लगातार चल रही कमेंट्री बस मज़े कर देती थी। उत्साह तीन चरणों में पूरा होता था पता नहीं टीवी की भाषा में बीच में कोई जेनरेशन लॉस होता था या नहीं। खिलाड़ी शॉट मारता था या विकेट गिरता था रेडियो में नेपथ्य से दर्शकों का हल्ला होता था, दूसरे चरण में कमेंटेटर की जुबान का पारा चढ़ जाता था अपनी भी समझ में आ जाता था कि कुछ स्पेशल हुआ है, तीसरे चरण में बात अपनी समझ में आती थी तो उत्साह या निराशा की दो निर्धारित ध्वनियां श्रीमुख से निकलती थी- वो मारा साले को या फिर धत तेरी…. की।


बाद के सालों में धीरे-धीरे उस गली से नाता टूटता गया। इस बीच क्रिकेट ऐसा पुष्पित-पल्लवित हुआ कि एक एक मैच का टीवी पर आंखो देखा हाल मिलने लगा। विकेट गिरने की बारीकी से लेकर चौके छक्के का संशय मिटाने में भी टीवी की भूमिका ग़ैर नज़रअंदाज हो गई। खिलाड़ियों द्वारा की जाने वाली नज़रफरेबियां भी लोगों की नज़रो में आ गई। रेडियो से नाता लगभग टूट रहा था लेकिन टीवी इस ख़ामोशी से ज़िंदगी में शामिल हुआ था कि किसी को रेडियो की कमी का अहसास नहीं हुआ।


कुछ चीज़े टीवी अपने साथ एकदम ट्रेडमार्का ले आई थी। जैसे हर ओवर के बाद तेल साबुन के विज्ञापनों की बहार, खिलाड़ी ने गेंद मारी, कैमरा गेंद के पीछे जाते जाते अचानक बाउंड्री पर लगे ‘दिलजले’ अंडर गारमेंट (अपने देश में ये भी निराला चलन है कि अंडरगारमेंट कंपनियों के नाम- रूपा, तनु, मनोरमा- स्त्रियोचित ही होते हैं) के “सब कुछ अंदर है” वाले विज्ञापन बोर्ड से चिपक जाता है। कोई समझे चौका या छक्का इससे पहले कहानी आगे बढ़ जाती है। अंदाजा स्क्रीन पर फाइनल स्कोर देख कर लगा लो। मुफ्त में इससे ज्यादा नहीं मिलता।


कमेंट्री भी निहायत ही शरीफाना आंदाज़ में होती है। पूरे ओवर के दौरान टीवी का कमेंटेटर एक दो बार अपनी चुप्पी तोड़ता है वो भी ज्ञान बांटने के लिए क्योंकि सारा स्कोर तो स्क्रीन पर दिख रहा है। वो रेडियो कमेट्री का मज़ा टीवी कमेंट्री में कहां। बाजुबानी एक मित्र के पिता जी की- वो क्रिकेट देखते तो टीवी पर हैं लेकिन कमेंट्री सुनने के लिए रेडियो पास में रखते हैं। तो कुछ इस तरह का नशा रेडियो पर मैच का हाल जानने का था।

पिछले दिनों फिर उसी गांव जाना हुआ जहां से सालों पहले अपन खुद ही अघोषित निर्वासन ले चुके हैं। भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच बॉक्सिंग डे का बहुचर्चित देवासुर संग्राम होना था। सोचा ठीक ही है खाली बैठे टीवी पर मैच का लुत्फ उठाएंगे। पर मैच के दिन सुबह ही सुबह अजब नज़ारा दिखा। हर जगह उसी अंदाज में रेडियो कान में सटाए लोगों का हुजूम चौराहे पर नज़र आया जैसा अपने छुटपन में हुआ करता था। पता किया तो कारण समझ आया- भैया यहां टीवी और मैच भूल जाइए 24 घंटे में चार घंटे बिजली बड़ी मुश्किल से दर्शन देती है। लिहाजा रेडियो ही एकमात्र सहारा है। सोचा ठीक ही है टीवी में हर पांच मिनट बाद तेल साबुन की पचर-पचर से तो अच्छा है रेडियो की धाराप्रवाह कमेंट्री का लुत्फ उठाया जा। कम से कम रेडियो में तो बाज़ार नहीं घुसा है। अपन भी चिपक गए रेडियो से। अपनी टीम बैटिंग कर रही थी। भावनाएं पूरे उफान पर थी। ऑस्ट्रेलिया को धूल चटाना था। थोड़ी ही देर में पता चल गया कि बाज़ार कितना शातिर है। गुपचुप ही इसने रेडियो में भी घुसपैठ कर ही ली ।

cricket events

यहां हर चौके या छक्के के बाद च्यवनप्राश वाले, टेलीफोन वाले चौका-छक्का लगवाते हैं। फिर भी अपनी टीम बल्लेबाजी कर रही थी तो सोचा ठीक ही है देसी कंपनी है अपने देश के चौके छक्के पर हल्ला कर भी रही है तो क्या हुआ। इससे तो देशप्रेम की भावना ही मजबूत होगा। ये अलग बात है कि बाज़ार की बड़ी कंपनियों के लिए रेडियो का स्रोता कोई मायने नहीं रखता उनके लिए तो मोटी पॉकेट वाला टीवी का दर्शक मायने रखता है। इसलिए रेडियो पर देशी कंपनियां ही सिरफुटौव्वल कर रही हैं। पर ये क्या! ऑस्ट्रेलिया की पारी शुरू हुई तो उनके भी हर चौके पर पीछे से आवाज़ आई दर्दे डिस्को दाद-ख़ाज मल्हम चौका, रामा रामा अंडर गारमेंट छक्का।

अपन ने सोचा ये क्या है कंपनियां तो देसी हैं फिर विदेशी के शॉट पर क्यों कूद रही हैं। बेगानी शादी में दाद ख़ाज खुजली वाला दीवाना। अजब उलटबांसी है। अपनी टीम पिट रही है और घर के लोग जश्न मना रहे हैं। इस बाज़ार में क्या सब कुछ उल्टा ही चलता है? उधर ऑफिस के बगलवाला बनाता सिर्फ पराठा है और नाम “नॉट जस्ट पाराठाज़”। बाज़ार महाठगिन हम जानी- क्या रेडियो, क्या गली, क्या मोहल्ला सबको अपने खरीददार का पता मालुम है।

टीवी वालों से सीख कर देसी वालों ने रेडियो पर आजमाया है। बेटा भूल जाओ देशभक्ती-सक्ती। चौका ऑस्ट्रेलिया मारे या भारत सुनोगे तो दाद वाले मल्हम या फिर अंदर बाहर वाले बनियान का ही नाम तो बस हो गया उनका काम। ये कथा है उस मादक कॉकटेल के निर्माण की जिसे रेडियो ने क्रिकेट और बाज़ार के साथ मिलकर तैयार किया है। लोगों पर भी इसका नशा सर चढ़कर बोल रहा है क्योंकि गांव में बिजली नहीं हैं जाओगे कहां? हम चिल्ला के कौन सा धौलागिरि उखाड़ लेंगे।

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