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Friday, August 29, 2008

साप्ताहिकी 28-8-08

इस सप्ताह एक दिन विशेष रहा - जन्माष्टमी

शनिवार को 6:05 पर वन्दनवार में कुछ कृष्ण भक्ति भजन सुनवाए गए पर रविवार को पूरा कार्यक्रम समर्पित रहा। शेष दिन सामान्य रहे भजन। कार्यक्रम के आरंभ में चिंतन में देशी-विदेशी विद्वानों के विचार बताए जाते रहे और समापन पर बजने वाले देशगान का विवरण सप्ताह भर में एकाध बार ही बताया गया।

6:30 बजे तेलुगु भक्ति गीतों के कार्यक्रम अर्चना में नए ज़माने के संगीत में बँधा भजन सुना गिटार पर - कृष्ण वीरूणु - धुन बहुत अच्छी लगी। शेष दिन सामन्य भक्ति गीत रहे।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में शनिवार का कार्यक्रम कृष्णमय था। सप्ताह भर लोकप्रिय गीत के साथ भूले-बिसरे गीत बजते रहे और अंत में सहगल साहेब के गीत।

7:30 बजे संगीत सरिता में भारतीय ताल वाद्य और फ़िल्म संगीत श्रृंखला समाप्त हुई। चर्चा में रहे विभिन्न तालवाद्य। कुछ ऐसे तालवाद्यों की जानकारी दी गई जिनके नाम पहले शायद ही सुने थे - डफ, डबाल (शायद लिखने में ग़लती हो) हालांकि जिन फ़िल्मी गीतों में इनका प्रयोग हुआ वो बहुत ही लोकप्रिय गीत है जैसे अजनबी का -

हम दोनों दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले

अंत में विभिन्न ताल वाद्यों की संगीत कचहरी अच्छी लगी जिसमे विभिन्न ताल वाद्यों को एक साथ सुनने में मज़ा आया।

त्रिवेणी में सोमवार को घर विषय पर गीत बजे आलेख भी अच्छा था, शेष दिन भी ठीक ही रहा।

फ़रमाइशी तेलुगु फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम जनरंजनि, हिन्दी फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम मन चाहे गीत, आपकी फ़रमाइश और जयमाला अपने ही अंदाज़ में सप्ताह भर प्रसारित होता रहा, कोई विशेष बात नहीं रही।

10 से 10:30 बजे तक क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु कार्यक्रम प्रसारित होता है - एक चित्र गानम - इस नाम के हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। इसमें एक ही फ़िल्म के गीत सुनवाए जाते है। विवरण में सिर्फ़ गायक कलाकारों के नाम, गीतकार तथा संगीतकार के नाम ही बताए जाते है फिर एक के बाद एक गीत सुनवाए जाते है। शुक्रवार को नई फ़िल्म मन्दारम के गाने बजे जिसमें हरिहरण, सुखविन्दर सिंह के गाए गीत भी थे। रात में 8:45 से 9 बजे तक भी यही कार्यक्रम प्रसारित होता है पर सुबह और रात में अलग-अलग फिल्मो के गीत सुनवाए जाते है। शनिवार को सुबह भले कृष्नणु और रात में श्री कृष्ण तुलाभारम फिल्मो के गीत बजे। इस कार्यक्रम में नए पुराने सभी तरह की फ़िल्मों के गीत बजते है।

सुहाना सफ़र में दोपहर 12 से 1 बजे तक संगीतकारों का क्रम वही रहा - शुक्रवार को ए आर रहमान, शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, रविवार को स्माइल दरबार, सोमवार को नए दौर के संगीतकारों के नए-नवेले गीत, मंगलवार को जतिन-ललित, बुधवार को शिवहरि, गुरूवार को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के संगीतबद्ध किए गाने। जब भी शिवहरि का नाम आया, सिलसिला, चाँदनी, लम्हें के गाने सुनने को मिले। इस नाम से जुड़े यही गाने सुन कर थक गए थे पर इस बुधवार को ताज़े हवा के झोकें की तरह एक आवाज़ गूँजी अफ़रोज़ बानो की, फ़िल्म शायद साहिबां है, गीत सीधा लोक संगीत की दुनिया में ले गया -

पीहरवाँ ओ प्रेम है दीपक राग

1 बजे म्यूज़िक मसाला में शुक्रवार को एलबम मितवा से गीतकार मदन पाल का लिखा रूपकुमार राठौर और सोनाली राठौर का स्वरबद्ध किया और गाया गीत अच्छा लगा -

मुझको मालूम नही अगला जन्म है कि नहीं
यह जनम प्यार में गुज़रे दुआ मांगी है

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को फोन पर सखियों से बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। विभिन्न स्थानों जैसे असम, हैदराबाद, काश्मीर, उत्तर प्रदेश से फोन काल आए - शहरों से भी और गाँवों से भी। अलग-अलग स्तर की सखियों ने बात की जैसे छात्राएँ, शिक्षित नौकरीपेशा महिलाएँ, गृहणियाँ। इसी तरह नए-पुराने गाने बजे।

मंगलवार को मुक्त विश्वविद्यालय से संबंधित जानकारी दी गई कि कैसे घर बैठे भी पढा जा सकता है। सोमवार को अंत में पुरानी फ़िल्म क़िस्मत का युगल गीत अच्छा लगा ख़ासकर अमीर बाई कर्नाटकी की आवाज़ सुनना। शेष दिन कार्यक्रम सामान्य रहे।

शनिवार को सदाबहार नग़मों में अभिनेत्री सायरा बानो के जन्मदिन पर उन पर फ़िल्माए गए गीत सुनवाए गए।

इसके बाद नाट्य तरंग में आधुनिक नाटक सुनवाए गए। शनिवार को रोमी शिराज का लिखा नाटक दरिन्दे और रविवार को नाटक सुनवाया गया - एक आवाज़ जो एक पात्र अभिनीत था।

4 बजे पिटारा में सोमवार को सेहतनामा में अंधत्व निवारण सप्ताह पर नेत्र रोग विशेषज्ञ डा श्याम सुन्दर अग्रवाल से रेणु (बंसल) जी की बातचीत बहुत जानकारी दे गई। इसी तरह बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में दूरदर्शन धारावाहिक रजनी फ़ेम करण राज़दान से निम्मी जी की बातचीत रही। रविवार को यूथ एक्सप्रेस एकदम टैम्पो की तरह लगी। गाने-गाने-गाने उफ़फ़्फ़ ! ऐसे लगा जैसे मन चाहे गीत सुन रहे है। केवल एक जानकारी अच्छी थी - सांझी कला जो रंगोली की तरह है जिससे कृष्ण के ज़माने में गोपियाँ अपने आँगन को सजाया करती थी कृष्ण के स्वागत में। शेष जानकारियों में मुझे समझ में नही आया प्रयोगशाला में रक्त बनाने और आँनलाइन परीक्षा की सुविधा देने के इन दो समाचारों को शामिल करना जबकि यह दोनों समाचार अभी-अभी अख़बारों में प्रमुख रहे, यहाँ तक कि अख़बारों की बेबसाइटों पर भी सामने नज़र आए। जो युवा अपना कैरियर बनाने के लिए इस कार्यक्रम को सुनता है उसके पास कुछ देर से ही सही अख़बार तो आता ही होगा। इतने ताज़ा समाचारों को तुरन्त कार्यक्रम में शामिल करने का औचित्य…

इस सप्ताह एक और अजीब बात हुई - शुक्रवार को प्रसारित हुआ पिटारे में पिटारा जिसमें आज के मेहमान कार्यक्रम में वादक कलाकार रामनारायण मिश्र से काँचन (प्रकाश संगीत) जी ने बात की। बुधवार को नियमित आज के मेहमान कार्यक्रम होता है फिर शुक्रवार को भी ऐसा ही कार्यक्रम सुनना ठीक नहीं लगा। शुक्रवार को अलग तरह का कार्यक्रम संजोया जा सकता है। इसी तरह बुधवार को संगीत-सरिता में नई श्रंखला शुरू हुई - बातें गज़लों की जिसमे भूपेन्द्र जी से बात कर रहे है गीतकार राजेश जौहरी और रात में 7:45 को इनसे मिलिए कार्यक्रम में भूपेन्द्र जी से बातचीत की रेणु जी ने। विविध भारती में विविधता बनी न रहे तो अच्छा नहीं लगता।

शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं से फोन पर हल्की-फुल्की बातचीत हुई और उनके पसंदीदा गीत सुनवाए गए हैलो फ़रमाइश में।

5 बजे नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में सप्ताह भर गाने ठीक ही रहे।

शनिवार को विशेष जयमाला अभिनेता मुकेश तिवारी ने प्रस्तुत किया। रविवार को फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए गए। शेष दिन नए और बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुने सिन्धी गीत जिसमें कमला झंगियानी का गीत अच्छा लगा पर यहाँ बोल लिखना कठिन है। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में एकाध शिकायती पत्र और कुछ कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। एक पत्र के जवाब में महेन्द्र मोदी जी ने कहा कि विविध भारती से संबंधित विज्ञापन जिंजल स्वर्ण जयन्ती तक अनिवार्य रूप से सुनवाए जाएगें पर उसके बात बजेगें या नहीं यह निश्चित रूप से उन्होनें नहीं कहा। हमें लगता है बाद में भी कभी-कभार बजते रहेगें तो अच्छा लगेगा। मंगलवार को फ़िल्मी क़व्वालियाँ ठीक ही थी। गुरूवार और रविवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग चारूकेशी पर आधारित संजोग फ़िल्म का गीत - वो भूली दासतां लो फिर याद आ गई

8 बजे हवामहल में शुक्रवार को इब्राहम अश्क की लिखी और गंगाप्रसाद माथुर द्वारा प्रस्तुत झलकी सुनी - ड्रामें का ड्रामा, शनिवार को विजय दीपक द्वारा निर्देशित परोपकार झलकी सुनी। बहरहाल हवामहल सुनना कभी बुरा नहीं लगा।

रात 9 बजे गुलदस्ता में शुक्रवार को राजेन्द्र मेहता नीना मेहता से सुना -

मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना

कई बार सुनने के बावजूद अच्छा लगा। एक और गीत अलका याज्ञिक की आवाज़ मे सुनने में अच्छा लगा पर गुलज़ार के लिखे बोल कुछ पकड़ में नहीं आए।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में गंगा की लहरें, पूरब और पश्चिम, अनाड़ी, सोलहवाँ साल जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में संगीतकार नौशाद से अहमद वसी की बातचीत आगे बढी।

10 बजे छाया गीत में कभी मौसम के तो कभी प्यार के गीत बजते रहे पर कल युनूस जी ने अलग ही समाँ बाँधा ऐसे गीत लेकर आए जो पहले शायद ही सुने गए जैसे फ़िल्म रेल का डिब्बा का आसमानी चूड़ियों वाला गीत। ऐसे नए प्रयोग कार्यक्रम में ताज़गी बनाए रखते है।

Monday, August 25, 2008

दि. 24-08-08 स्व. कल्याणजी की पूण्यतिथी पर एक अलग सी श्रद्धांजली पर साझ पहेली नं 2

मित्रो,
कल जानीमानी संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आणंदजी के बड़े भाई तथा लोगो को हसाने में माहीर स्व काल्याणजी की पूण्य-तिथी थी पर लाईफ़लोगर एंट्री सूचीमेँ अपलोड की गई धूने दिख़ने पर देरी हुई जो इनके स्वरदद्ध किये हुए फिल्म सट्टा बाझार के गीत नींद नां मूझको आये की है, वह कल की बजाय आज प्रस्तूत की जा रही है । पर इस गाने की यह एक नहीं पर तीन अलग अलग कलाकारों की बजाई अलग साझों पर है । तो आप को कोशिश करनी है की यह कोनसे साझ और कौन से वादक कलाकार है वह अंदाझा लगाना है ।

तो सुनिये पहेली धून :



और अब इसी गाने की यह है दूसरी धून जो आप विविध भारती से आधी आधी अंतराल मेँ समय समय पर बजती रहती है ।


और अब सुनीये इसी गाने की तीसरी धून :


नज़दीकी दिनोमेँ यह बात मैं इसी रेडियोनामा पर बताऊँगा ।

Sunday, August 24, 2008

रेडिओ और खेलों से जुड़े वो कभी ना भूलने वाले प्रसारण !

एक समय था जब हम खेल प्रतिस्पर्धाओं के नतीजों को जानने के लिए पूर्णतः रेडिओ पर निर्भर थे। अगर देशी रेडिओ की बात करें तो पूरे दिन भर में एक सात बजे का खेल समाचार ही था, जो कि बाद में सात पाँच पर आने लगा, हम बच्चों की खेल के नतीजों से जुड़ी जिज्ञासा को शांत करता था। इसलिए शाम को पौने सात से ही हम रेडिओ को ट्यून कर के बैठ जाते थे।

इसके आलावा विशेष खेल आयोजनों पर आकाशवाणी से सीधे प्रसारण की व्यवस्था की जाती थी। इस बार जब अभिनव बिंदरा ने भारत के लिए व्यक्तिगत स्पर्धा में पहला स्वर्ण पदक जीता तो मुझे १९८० के मास्को ओलंपिक की याद आ गई जब भारत ने हॉकी का अपना आखिरी स्वर्ण पदक जीता था। उस ओलंपिक का अमेरिका सहित कई यूरोपीय देशों ने बहिष्कार किया था। फाइनल में भारत का मुकाबला स्पेन से था। भारत ने वो मैच 3-0 से आगे रहने के बाद भी मात्र 4-3 के अंतर से जीता था। क्या माहौल बाँधा था जसदेव सिंह ने उस शाम को। भास्करन, शाहिद, मरविन और डुंगडुंग जैसे खिलाड़ी अपने प्रभावशाली प्रदर्शन की वज़ह से हमारी यादों में हमेशा के लिए रच बस गए थे।

इसी तरह जब हर साल विबंलडन आता तो हम आकाशवाणी पर अतुल प्रेम नारायण की हर सुबह साढ़े सात बजे की रिपोर्ट में रमेश कृष्णन और विजय अमृतराज के विजय अभियान की गाथा सुन रहे होते।

पर कई बार शाम के खेल समाचार तक का इंतजार कर पाना मेरे लिए असह्य हो जाता। छुटपन में खेल की खबरों की खोज ने मुझे शार्ट वेव के सारे मीटरों के स्टेशन ज्ञान के बारे में पारंगत कर दिया। और उसी वक़्त से मैं बीबीसी की अंग्रेजी वर्ल्ड सर्विस का नियमित श्रोता बन गया। रोज शाम सवा छः बजे पन्द्रह मिनट का स्पोर्ट्स राउंड अप और शनिवार शाम का सैटरडे स्पेशल सुने बिना मेरा कोई दिन नहीं बीतता था। ऐसे ही एक सैटरडे स्पेशल में विंबलडन के दौरान मैं विजय अमृतराज की फ्रांस के खिलाड़ी यानिक नोवा पर ऐतिहासिक जीत को सीधे सुन पाने वाला अपनी क्लॉस में अकेला बच्चा बन गया था :)।

बीबीसी के खेल कार्यक्रमों की गुणवत्ता हमारे यहाँ के कार्यक्रमों से कहीं ज्यादा जानदार थी। रिपोर्टिंग ऍसी होती थी कि लगता था कि हम ही मैदान में पहुँच गए हों। परसों मन हुआ कि बहुत दिनों से अपना प्रिय कार्यक्रम सुना नहीं। बेजिंग ओलंपिक चल ही रहे हैं ज़रा बीबीसी के स्पोर्टस राउंड अप और हमारे आकाशवाणी की FM सर्विस से प्रसारित कार्यक्रमों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए ।

तो पहले सुनिए मेरे चहेते कार्यक्रम की एक झलक.. अंतर सिर्फ starting tune का था बाकी वही पेशेवर अंदाज


और अब सुनें आकाशवाणी की FM सर्विस का ये प्रसारण..संयोग की बात है कि कार्यक्रम में जिस खेल संवाददाता को बुलाया गया है उसका नाम भी मनीष कुमार है :)।




आपको कौन सा बेहतर लगा ?

Friday, August 22, 2008

साप्ताहिकी 21-8-08

इस सप्ताह लगातार दो दिन विशेष रहे - 15 अगस्त शुक्रवार को और शनिवार को राखी।

शुक्रवार को विविध भारती के प्रसारण की शुरूवात अच्छी हुई। एक तो 15 अगस्त और फिर दिन शुक्रवार, इन दोनों बातों का अच्छा ध्यान रखा कमल (शर्मा) जी ने और 6:05 पर वन्दनवार में सुनवाए ऐसे भजन जिसमें देवी माँ की स्तुति रही। आख़िर भारत माता की स्तुति भी देवी माँ की स्तुति है। फिर सात बजे से शुरू हुआ लाल क़िले से सीधा प्रसारण।

कार्यक्रम के समापन पर बजने वाले देशगान का विवरण सप्ताह भर में एकाध बार ही बताया गया।

6:30 बजे तेलुगु भक्ति गीतों के कार्यक्रम अर्चना में शुक्रवार को देश भक्ति गीत सुनवाए गए और सोमवार को श्रावण मास को ध्यान में रख कर मल्लिकार्जुन स्वामी शिवलिंग के अभिषेक के समय पर गाया जाने वाला सुप्रभात सुनवाया गया। शेष दिन सामन्य भक्ति गीत रहे।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में शनिवार का कार्यक्रम राखी के रंग में रंगा था। लागी नाही छूटे राम फ़िल्म के राखी के गीत से शुरूवात हुई जो वास्तव में एक भूला-बिसरा गीत था। सप्ताह भर एकाध लोकप्रिय गीत के साथ भूले-बिसरे गीत बजते रहे और अंत में सहगल साहेब के गीत।

7:30 बजे संगीत सरिता में पिछले सप्ताह से चल रही श्रृंखला इस सप्ताह भी जारी रही - भारतीय ताल वाद्य और फ़िल्म संगीत जिसमें चर्चा में रहे तबला, ढोलक, पखावज। प्रार्थना गीतों में तालवाद्य अच्छा लगा। मंगलवार को ढोलक-ढोलकी पर जानकारी दी गई यह भी बताया गया कि इनका उपयोग शादी ब्याह के गानों में होता है पर ऐसा गीत नहीं सुनवाया गया जबकि बाज़ार फ़िल्म में पैमिला चोपड़ा और साथियों का गाया ऐसा एक गीत है -

चले आओ सैंय्या रंगीले मैं वारि रे
सजन मोहे तुम बिन भाए न गजरान
न मोतिया चमेली न जूही न मोगरा

यह दक्खिनी यानि हैदराबादी उर्दू का लोक गीत है जिसे सिर्फ़ ढोलकी पर ही गाया जाता है साथ में सिर्फ़ हारमोनियम होता है और कोई साज़ नहीं होते। इन गीतों को कहा ही जाता है ढोलक के गीत। बहुत कमी खली इस उपयुक्त गीत के न बजने की।

त्रिवेणी में जानकारी बढाने की बातें और ज्ञान की बातें सप्ताह भर होती रही और बजते रहे संबंधित गीत।

त्रिवेणी के बाद सवेरे 8 बजे से क्षेत्रीय भाषा के कार्यक्रम होते है। इस समय होता है फ़रमाइशी तेलुगु फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम जनरंजनि - इस नाम के हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। मन चाहे गीत और आपकी फ़रमाइश की तरह ही है यह कार्यक्रम।

मन चाहे गीत दोपहर 1:30 से 2:30 बजे तक प्रसारित होता है और आपकी फ़रमाइश रात 10:30 से 11 तक, दोनों कार्यक्रम एक जैसे है फिर भी कार्यक्रम का नाम अलग-अलग है पर जनरंजनि का प्रसारण में 4 बार होता है पर नाम एक ही है - जनरंजनि। एक और ख़ास बात - जनरंजनि की संकेत धुन भी है जो कार्यक्रम के शुरू और अंत में बजती है जिसमें बीच में महिला स्वर में गाकर कहा जाता है - जनरंजनि मी जनरंजनि - यहाँ मी का अर्थ है -आपकी। कार्यक्रम की अवधि लम्बी हो तो पूरी धुन बजती है कम अवधि होने पर थोड़ी सी धुन बजती है। फ़रमाइश करने वालों के औसतन पाँच पत्र मन चाहे गीत में शामिल किए जाते है जिनमें नाम 2 से लेकर 8-10 तक होते है, जनरंजनि में भी उतने ही नाम होते है पर औसतन पत्र 2-3 होते है। गाने तो दोनों ही जगह नए, पुराने और बीच के समय के होते है साथ ही दोनों ही भाषाओं में माहौल भी एक जैसा रहता है जैसे इस सप्ताह दो विशेष दिन रहे 15 अगस्त और राखी पर शुरूवाती 1-2 विशेष गीतों के बात फिर शुरू हो गया वही सिलसिला प्यार-मुहब्बत के गानों का।

जनरंजनि के 4 प्रसारण का समय है - सवेरे 8 से 10 तक, यहाँ शनिवार को दो प्रायोजित कार्यक्रम भी शामिल हो जाते है, दोपहर 2:30 से 3 तक, शाम में 6 से 7 तक और रात में 8:15 से 8:45 तक

सुहाना सफ़र में दोपहर 12 से 1 बजे तक आजकल गुरूवार को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के गीतों को छोड़ कर शेष सभी दिन एकदम नए गाने बजते है। शुक्रवार को ए आर रहमान, शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, रविवार को स्माइल दरबार, सोमवार को नए दौर के संगीतकारों के नए-नवेले गीत, मंगलवार को जतिन-ललित, बुधवार को शिवहरि के संगीतबद्ध किए गाने सुनवाए जाते है यानि सप्ताह भर में कुछ पुराने सुरीले गानों से लेकर (लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ), शास्त्रीय संगीत का हल्का रंग लिए गानों (शिवहरि) के साथ रंग दे बसन्ती जैसे नए गाने भी सुनने को मिले।

1 बजे का समय होता है प्राइवेट एलबमों के गानों का जिनमें कभी-कभी कुछ ऐसे गीत सुनने में आते है जो साठ के दशक के गीतों जैसे लगते है जैसे सोमवार को सुना -

ओ सनम ओ सनम ओ सनम ओ सनम

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को फोन पर सखियों से बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने, हल्का सा माहौल राखी का रहा। एक फ़ोन काल आया सारनाथ, बिहार से जहाँ विश्व प्रसिद्ध बौद्ध मन्दिर है, दूसरा काल आया अजन्ता से, प्रसिद्ध स्थल अजन्ता-एलोरा से। बड़ी बात यह थी कि सीधे इन विश्व प्रसिद्ध स्थलों से फ़ोन आए, किसी शहर, मुहल्ले का नाम नहीं बताया इन सखियों ने, न ही यह बताया कि यह स्थल इनके घर के कितने पास या दूर है और न ही इन प्रसिद्ध स्थलों की जानकारी दी। प्रतीक्षा है अगली कड़ियों में ताजमहल और लालक़िले में रहने वाली सखियों के फ़ोन कालों की…

क्ल यह कार्यक्रम अच्छा लगा। इस में ओलंपिक खेलों के आयोजन के आरंभिक स्वरूप की जानकारी दी गई जब केवल दौड़ प्रतियोगिताएँ होती थीं वो भी एक ही दिन का आयोजन होता था। और एक जानकारी जो शायद बहुत कम लोग जानते है कि खिलाड़ी वस्त्रों के स्थान पर पत्तों का उपयोग करते थे इसीलिए ओलंपिक से संबंधित मूर्तियाँ भी नग्न है। शेष दिन कार्यक्रम सामान्य रहे।

शनिवार और रविवार सदाबहार नग़मों में वाकई हमेशा लोकप्रिय रहने वाले सदाबहार गाने सुनने को मिले। यही एक कार्यक्रम ऐसा है जहाँ अच्छे गाने सुनने की गारंटी होती है। इसके तुरन्त बाद होता है नाट्य तरंग कार्यक्रम जो इस सप्ताह भी ज़ोरदार रहा। गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के बंगला उपन्यास चोखेर बाली का हिन्दी रेडियो नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत किया गया, रूपान्तरकार और निर्देशक है नन्दलाल शर्मा।

4 बजे पिटारा में रविवार को यूथ एक्सप्रेस चली जिसके किताबों की दुनिया के डिब्बे में कमल (शर्मा) जी ने संपादक, लेखक व्यंग्यकार यशवन्त व्यास से बातचीत की। बातें हुई उनकी विज्ञान के क्षेत्र की शिक्षा की, हरिशंकर परसाई जैसे व्यंग्यकारों की उनकी पसंदीदा फ़िल्मों की जहाँ उन्होनें शालीमार फ़िल्म की चर्चा की जो उन्होनें परीक्षा की परवाह न कर देखी शायद यही संकेत रहा लेखक बनने का ख़ैर यहाँ चा चा चा गीत बड़े दिनों बाद सुनना अच्छा लगा। कुल मिलाकर एक व्यक्तित्त्व का अच्छा परिचय मिला। फिर आगे के डिब्बे में खुद युनूस जी ने बात की वादक कलाकार मनोहारी सिंह जी से और चर्चा हुई माया फ़िल्म के गीत की तथा धुन भी सुनी। यह बातचीत की दूसरी कड़ी थी।

सोमवार को सेहतनामा में पेयजल और स्वास्थ्य पर डा जैकब जोसेफ़ से कांचन (प्रकाश संगीत) जी की बातचीत सुनी। जानकारी अच्छी थी पर एक बात रह गई। पेयजल का दूसरा स्त्रोत है बोरवेल का पानी। आजकल कई राज्यों में पेयजल संकट है, यहाँ हैदराबाद में भी है जिससे कहीं-कहीं पीने का पानी भी बोरवेल से लेने की मजबूरी है। बोरवेल का पानी कहीं 25 फीट खोदने पर मिलता है तो कहीं 60 से भी अधिक गहराई में। हालांकि पानी छन कर मिलता है फिर भी यह पानी पीने से अक्सर त्वचा पर ख़ासकर गर्दन पर छोटे काले मस्से या ब्लैक हेड्स निकल रहे है। इस बारे में भी बात हो सकती थी।

बुधवार को आज के मेहमान थे शायर, कवि राहत इंदौरी जिनसे बातचीत की राजेन्द्र त्रिपाठी जी ने। काफ़ी अच्छी लगी बातचीत। शायर बनने के लिए सीखे गुर, फिर गुलशन कुमार से मुलाक़ात, फ़िल्मों के अलावा अन्य कामों में रही व्यस्तता जैसे पढना-पढाना लिखना और इसी से फ़िल्मी दुनिया में कम समय देना और शायर से गीतकार बनने की भी चर्चा हुई। साथ ही उनकी पसन्द के गाने भी अच्छे बजे।

शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं के फोन आते रहे, हल्की-फुल्की बातचीत होती रही और उनके पसंदीदा गीत सुनवाए गए।

5 बजे नए फ़िल्मी गानों का कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा सुनकर लगा इस कार्यक्रम के नाम की तरह सभी नए गाने हंगामेदार नहीं होते। अक्सर यही लगता है कि सभी गाने शोर-शराबे वाले होते है पर यह कार्यक्रम सुन कर यह भ्रम टूट जाता है। कभी इतने शान्त गीत सुने लगा जैसे ग़ज़ल सुन रहे है। मंगलवार को विशाल शेखर के संगीत निर्देशन में एक गीत सुना, फ़िल्म का नाम शायद गोलमाल था, इस गीत को सुन कर लगा जैसे पूर्वी प्रदेश का लोकगीत सुन रहे है।

शनिवार को विशेष जयमाला फ़िल्म कलाकार और टेलीविजन धारावाहिक सीआईडी फ़ेम शिवाजी सावंत ने प्रस्तुत किया। रविवार को चिरपरिचित शैली में फ़ौजी भाइयों के जाने-पहचाने संदेशों को लेकर आए कमल जी। शेष दिन नए गाने अधिक बजे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुने कच्छी गीत। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में कुछ शिकायती पत्र और कुछ पत्रों में विविध कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में क़व्वालियाँ ठीक ही थी। बुधवार को उप शास्त्रीय संगीत की गायिका श्रावणी चौधरी से अशोक सोनावणे जी की बातचीत की अंतिम किस्त प्रसारित हुई। प्रसिद्ध गायिका शुभा जोशी की इस शिष्या ने कुछ पंक्तियाँ गा कर भी सुनाई। फ़िल्मी संगीत की भी चर्चा हुई, विशाल शेखर के संगीत में शास्त्रीयता के पुट की बात कही गई। कुल मिलाकर अच्छा लगा इस उभरती गायिका से मिलना। गुरूवार और रविवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे शुक्रवार को हवामहल में बहुत दिन बाद रूपक सुना। मेरी समझ में स्वाधीनता संघर्ष रूपक में ही अच्छा संजोया जा सकता है। 15 मिनट के रूपक में काफ़ी बातें समा गई। सोमवार को गंगाप्रसाद माथुर की प्रस्तुति में उन्हीं के द्वारा साहित्य से चुनी गई बहुत ही भावुक कहानी की रेडियो रूपान्तर की गई झलकी सुनी - व्यथा। बुधवार को मूल कन्नड़ कहानी का नाट्य रूपान्तर था। इस तरह हवामहल में इस सप्ताह साहित्य उभर कर आया।

रात 9 बजे गुलदस्ता में शुक्रवार को न आज़ादी नज़र आई और न ही राखी। ग़ैर फ़िल्मी संगीत में वीनू पुरूषोत्तम, पंकज उदहास के साथ अन्य कलाकारों की आवाज़े सुनी और अलग-अलग शायरों और गीतकारों की रचनाएँ सुनी पर कल यह गीत सुन कर अजीब लगा -

क्रिकेट खेलेंगें, झंडा फ़हराएगें, वन्देमातरम

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में काजल, लेकिन, गोलमाल, जब वी मेट फ़िल्मों के गीतों से नए, पुराने, बीच के समय के सभी तरह के गीतों का आनन्द मिला। रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में संगीतकार नौशाद से अहमद वसी की बातचीत आगे बढी और जानने को मिला पुराने हिन्दी फ़िल्मी संगीत में मराठी संगीत और कलाकारों का योगदान जिनमें विशेष नाम है मास्टर विट्ठल का। जेबउन्नीसा की भी चर्चा हुई।

10 बजे छाया गीत में शुक्रवार को स्वतंत्रता की बड़ी काव्यात्मक प्रस्तुति हुई और गाने बजे लाजवाब। रविवार को भी ममता (सिंह) जी और मंगलवार को शहनाज़ (अख़्तरी) जी की प्रस्तुति बहुत काव्यात्मक रही पर सोमवार को अमरकान्त जी ने बड़े सीधे-सादे अन्दाज़ में कम बोलकर अच्छे गीत सुनवा दिए, यह अंदाज़ भी अच्छा रहा।

Saturday, August 16, 2008

साझ और आवाझ तथा साझ पहेली सबसे पहेले

आदरणिय पाठक गण,

इस ब्लोग पर अन्नपूर्णाजी ने कई बार साझ और आवाझ कार्यक्रम का जिक्र किया जिस पर मैंनें तथा कई पाठक लोगने अपने प्रतिभव दिये । पर आज एक बात कार्यक्रम के इस नाम को सबसे पहेले किस रेडियो चेनलने अपने कार्यक्रम के लिये चूना यह बात आज इस पोस्टमें बताऊँगा ।
आपको याद होगा कि 1966 में स्व. सुबोध मुकर्जी के निर्देषनमें स्व. नौशादजी के संगीत के साथ फिल्म साझ और आवाझ आयी थी । उस समय विविध भारती पर रात्री 10.30 पर सिर्फ़ 5 मिनीट का सिर्फ़ एक धून का कार्यक्रम नूपूर चलता था । करीब इस फिल्म की रिलीझ के बाद इसी नाम से (शायद) दो पहर दो बज कर 15 मिनीट पर 15 मिनीट का कार्यक्रम ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस (उस जमाने में बोला जाता था-ऑल इंडिया रेडियो का उर्दू प्रोग्राम) ने फिल्मी धून और सम्बंधीत गानों का कार्यक्रम शुरू किया । बादमें यही नाम से कार्यक्रम विविध भारती सेवाने शुरू किया जो शुरूमें शास्त्रीय वाद्य संगीत और उसी राग वाले शास्त्रीय कंठ्य संगीत पर आधारित हुआ करता था, जो बादमें संगीत सरिता की शुरूआत के बाद फिल्मी धूनों और फिल्मी गानों का हो गया, जो पहेले दो पहर को 11.45 पर था जो बादमें बंध किया गया था । फ़िर कोई एक समय रात्री 9 से 9.15 पर होता था । इसी दौरान रेडियो श्रीलंका से भी 1969 या 1970में वहाँ की आज की उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमार के पिता स्व. दलवीर सिंह परमार साहब (जो श्री मनोहर महाजन साहब के साथ ही वहाँ सेवा नियूक्त हुए थे)ने शुरू किया था । उर्दू सर्विस पर यह कार्यक्रम आज पाक्षिक रूपमें शायद दूसरे और चौथे सोमवार को जारी है और मेरे सुनने में विविध भारती के सिने पहेली कार्यक्रम की शुरूआत के कुछ: साल पहेले से माह के पहेले और तीसरे रविवार दोपहर तीन से साढे तीन बजे तक साझ पहेली कार्यक्रम आता है जिसमें सिने पहेली की शुरूआत तक मैं नियमीत रूपसे हिस्सा लेता था । बादमें उनके ट्रांसमिसन की तक़लीफ के कारण और सिने पहेली के समय टकराव के कारण मेरा वह सुनना छूट गया था जो उस समय एस एम सफ़ी प्रस्तूत करते थे पर आज उनके प्रसारण के सुधार और डी टी एच से उपलब्धी के कारण मैं साझ पहेली का श्रोता फ़िरसे बना हूँ । हाँ, एक बात जरूर है कि श्री एस एम सफ़ी साहब एल्पीझ, ईपीझ और 78 आरपीएम से भी पूराने गानों की और कभी कभी पूरानी धूने भी बजाते थे । उनकी अवेजीमें कभी यह कार्यक्रम अनवार अंजूम प्रस्तूत करते थे । उनका एक अलग अन्दाझ था । वे लोग साझ और कालाकार के नाम बताते थे और गाने की और फिल्म की पहचान पूछी जाती थी । आज के दिनों यह कार्यक्रम फूला पंडिता प्रस्तूत करती है पर ज्यादा तर वे साझ और वादक कालाकार के नाम बताती नहीं है पर मेरे जैसे धून सुनने के अनुभवी श्रोता पहचान जाते है । ब्रियान सिलाझ की पियानो पर बजायी पूराने गानो की नयी धूनों का बोलबाला है और पूराने गानों की पूरानी धूनों में सिर्फ़ और सिर्फ़ मास्टर इब्राहीम की क्लेरीनेट पर बजाई धूनों का बोलबाला है, जो मोनो रेकोर्डिंगमें है, जिसकी वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ यही है कि मास्टर इब्राहीम की इन 78 आर पी एम वाली रेकोर्ड्झ को प्रकाशन कम्पनीने सीडी पर पुन: प्रकाशित किया है । मैंनें इस ब्लोग पर जब मास्टर इब्राहीम की गंगा जमूना की धून नैन लड गई है प्रस्तूत कि थी, वह साझ पहेली के इसी उर्दू चेनल के प्रसारण से ली थी और उसमें शुरूमें जो उद्दघोषणा सुनाई पड़ी थी, वह आवाझ फूला पंडिता की ही है पर ताज्जूब यह है कि किसी पाठक ने इस बारेंमें कोई जिज्ञासा प्रगट नहीं की ।
पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Friday, August 15, 2008

साप्ताहिकी 14-8-08

रेडियोनामा के सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

आज से हम शुरू कर रहे है रेडियो कार्यक्रमों की साप्ताहिक समीक्षा का सिलसिला। तो आइए चर्चा करते है पिछले सप्ताह भर प्रसारित हुए कार्यक्रमों की…

विविध भारती पर पहली सभा का पहला-पहला कार्यक्रम होता है 6:05 पर हिन्दी समाचारों के बाद - वन्दनवार। भक्ति संगीत के इस कार्यक्रम की शुक्रवार को शुरूवात हुई संतोषी माता के भजन से जिसके बाद साढे छह बजे स्थानीय केन्द्र से तेलुगु भक्ति संगीत के कार्यक्रम अर्चना की शुरूवात हुई वाणी जयराम की आवाज़ में देवी स्तुति माला से -

जय-जय-जय महिशासुर मर्दिनीरम्यक शैल

इसके हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। इस तरह सप्ताह में एकाध बार पारम्परिक भक्ति रचना ज़रूर सुनवाई जाती है। मुझे लगता है कि वाणी जयराम और अनुराधा पौड़वाल की गाई तेलुगु में पारम्परिक रचनाएँ है तो हिन्दी में भी ज़रूर होगी। लेकिन वन्दनवार में हनुमान चालिसा और कभी-कभार मुकेश की आवाज़ में रामचरित मानस के अंश के अलावा और कोई पारम्परिक रचना मैनें नहीं सुनी। यहाँ सिर्फ़ भक्त कवियों की रचनाएँ ही प्रस्तुत होती है। सोमवार को शुरूवात हुई शिव भक्ति गीत से -

गौरापति शम्भु है कैलाश के वासी

इसके साथ कबीर, सूरदास के पुराने भजनों के साथ नए भजन भी सप्ताह भर बजते रहे। कार्यक्रम का समापन होता है देशगान से। एक बार भी सुनवाए गए गीत का विवरण नहीं बताया गया। यहाँ तक कि नौ अगस्त भारत छोड़ो आन्दोलन की वर्षगांठ का दिन होने के बावजूद भी बिना विवरण के देशगान सुनवाया गया।

इसके बाद प्रसारित होने वाला भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम आजकल बहुत अच्छा और सच्चा हो गया है। सच्चा इसीलिए कि इसमें वाकई भूले-बिसरे गीत प्रसारित हो रहे है। कुन्दनलाल (के एल) सहगल के गीत के अलावा एकाध गीत ही लोकप्रिय होता है। गीतकार, संगीतकार, गायक और यहाँ तक कि फ़िल्मों के भी कुछ ऐसे नाम सुने जो बहुत ही कम या पहली बार सुने गए। ऐसे गीतों को सुनना अच्छा लगा। रविवार को संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश की स्मृति में यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया पर उनके गीतों के साथ अन्य संगीतकारों के गीत भी सुनवाए गए।

भूले-बिसरे गीत के बाद साढे सात बजे का समय होता है संगीत-सरिता का। इन दिनों श्रृंखला चल रही है - भारतीय ताल वाद्य और फ़िल्म संगीत। इसमें जाने-माने तबला वादक श्री बालकृष्ण अय्यर से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत चल रही है। शुरूवात में वही रटी-रटाई शैली में निम्मी जी ने कह दिया उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय संगीत में ताल वाद्य। क्या पूर्व और पश्चिम भारत में संगीत नहीं है ? या संगीत बग़ैर ताल का है।

त्रिवेणी के तट पर शिक्षा के छीटों से भीगते रहे कभी ज़िन्दादिली की बातें और कभी व्यक्तितत्व से फूलों की महक की बातें सुनते हुए।

स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर दोपहर 12 से 1 बजे तक प्रसारित होने वाले सुहाना सफ़र कार्यक्रम में फिर से परिवर्तन हुआ है। लेकिन इस बार भी संगीतकारों की ही रचनाएँ सुनवाई जा रही है गीतकारों की नहीं। शुक्रवार के संगीतकार है ए आर रहमान, शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, सोमवार को पहले सभी दौर के कम चर्चित संगीतकार थे पर अब नए दौर के कम चर्चित संगीतकारों के गीत बज रहे है। मंगलवार को पहले की तरह ही अन्नू मलिक है। बुधवार का दिन शानदार है शिव-हरि के गीत बज रहे है। गुरूवार को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जिनके गीत 15 अगस्त को ध्यान में रख कर चुने गए। कुल मिलाकर पाश्चात्य और भारतीय संगीत में रचे-बसे, नए-पुराने लोकप्रिय और कम चर्चित गीतों का अनूठा आनन्द मिल रहा है।

एक बजे प्राइवेट गीतों के कार्यक्रम म्यूज़िक मसाला में कभी-कभार बहुत अच्छे गीत सुनने को मिलते है। जैसे बुधवार को सुना वसुंधरा की आवाज़ में मेरी जान एलबम का गीत -

फिर भी मुझे जुनून क्यों है मेरी जांमेरी जां, मेरी जां, मेरी

नए गाने जिस तरह से कंपोज़ हो रहे है उनमें से इसकी कंपोज़िशन बहुत अच्छी है।

फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम में 1:30 बजे मन चाहे गीत, 7 बजे जयमाला और 10:30 बजे आपकी फ़रमाइश में नए पुराने अच्छे गीत सुनवाए जा रहे है। इसी तरह के गीत फ़ोन-इन-कार्यक्रमों - हैलो फ़रमाइश, हैलो सहेली में भी सुनवाए जाते है साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के श्रोताओं जैसे ब्यापार करने वाले, पढने वाले छात्र, घरेलु महिलाएँ आदि से हल्की-फुल्की बातचीत भी अच्छी लगती है। सबसे बड़ी बात पत्रों और फ़ोन कालों से यह पता लगता है कि देश के कोने-कोने के श्रोता आज भी विविध भारती से सक्रिय रूप से जुड़े है।

इस सप्ताह सखि-सहेली में निम्मी जी और सुधा जी की जोड़ी ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए और शुक्रवार को हैलो सहेली में रेणु जी ने फोन पर सखियों से बात की। सोमवार को बातें होती है रसोई की जिसमें किसी श्रोता सखि की भेजी गई यह जानकारी अच्छी थी कि दाल और अंकुरित अनाज के दाने एक साथ न खाए क्योंकि दोनों में प्रोटीन अधिक होने से पाचन कठिन होता है। शेष कार्यक्रम के लिए हम तो कहेंगे कि शुक्रवार को पिटारा में पिटारा के अन्तर्गत रेणु जी द्वारा प्रस्तुत चूल्हा-चौका के अंश यहाँ प्रसारित किए जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा। मंगलवार को कैरियर बनाने की बातें बताई जाती जिसे ध्यान में रख कर युनूस जी द्वारा शूटर उपासना परसुरामपुरिया से की बातचीत का अंश सुनवाया गया। बुधवार को ख़ूबसूरती बनाए रखने के घरेलु नुस्ख़े बताए गए। गुरूवार को निम्मी जी के साथ थी चंचल जी और माहौल रहा आज़ादी का और राखी का। हम कमलेश (पाठक) जी को धन्यवाद देना चाहेंगे कि पिछले कुछ समय से सखि-सहेली के अवतार में हल्का सा परिवर्तन कर इसे निखारा गया है, पहले कोई भी बात हो उदघोषिकाएँ ही बताती थी पर अब विभिन्न क्षेत्रों की सफल महिलाओं से बातचीत कर जानकारी दी जाती है।

शनिवार और रविवार को तीन बजे आनन्द लिया सदाबहार नग़मों का और साढे तीन बजे तो और भी आनन्द आया। नाट्य तरंग में निर्मला अग्रवाल के निर्देशन में अमीर ख़ुसरो के जीवन पर आधारित नाटक सुना - डगर पनघट की। इस नाटक से जानकारी भी बढी, पहले ख़ुसरो के बारे में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तक ही जानकारी थी पर अब बलबन के बारे में भी जाना। बहुत ख़ास रही अमीर ख़ुसरो की इस ख़ास रचना की प्रस्तुति -

छाप-तिलक तज दीन्हीं रे तोसे नैना मिला के।

4 बजे पिटारा के अंतर्गत सोमवार को रेणु (बंसल) जी की मनोरोग चिकित्सक डा देवेन्द्र सावे से बातचीत प्रसारित हुई। डाक्टर साहब ने पागलपन और मनोरोग में फ़र्क बताया। अब तक अधिकतर यही समझा जाता था कि मानसिक तनाव से नाड़ियों के खिंचाव से रोग होते है पर अब यह भी जाना कि शरीर में रासायनिक क्रियाएँ भी इसका कारण है। इलेक्ट्रिक शाँक के बारे में भ्रम दूर हुआ कि सिर्फ़ एक सेकेण्ड के झटके से तकलीफ़ नहीं होती। बुधवार को जैसलमेर में बीसएफ़ के बटालियन कमांडेट रामनारायण राम से कमल (शर्मा) जी की बातचीत सुनी। अपने जीवन और काम के बारे में उन्होनें बताया साथ ही गाने भी सुनवाए। मुझे लगता है अगर इसमें से कमल जी की आवाज़ हटा दी जाए तो यह कार्यक्रम विशेष जयमाला के रूप में बहुत अच्छा लगेगा। रविवार को यूथ एक्सप्रेस में शुरूवात क़दम क़दम बढाए जा गीत से हुई। कार्यक्रम में माहौल आज़ादी का रखा गया पर अवसर का भी ध्यान रखा गया और बारिश के मौसम में आजकल प्रचलित रेन वाटर हार्वेस्टिंग टेकनीक यानि वर्षा के पानी के संग्रह पर प्रो रामचन्द्र मिश्र की वार्ता सुनवाई गई।

5 बजे प्रसारित होने वाले फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में बिल्कुल नई फ़िल्मों के गीत सुनने को मिलते है। सुदेश भोंसले की आवाज़ में एक गीत सुना तो याद आ गया सत्तर के दशक की महमूद की लोकप्रिय फ़िल्म कुँवारा बाप का लोकप्रिय गीत - हाँ जी

शुक्रवार को जयमाला संदेश में कमल जी ने पढ कर सुनाए फ़ौजी भाइयों के संदेश उनके परिजनों के नाम और उनके परिजनों के संदेश फ़ौजी भाइयों के नाम उनके पसन्दीदा फ़िल्मी गीतों के साथ। इसके बाद 7:45 पर सुना लोक संगीत जिसमें बुन्देलखण्डी गीत सुनवाए गए। एक पारम्परिक गीत सुनवाया गया पर आवाज़ किसकी है यह नहीं बताया गया। गीत सुन कर मैं हैरान रह गई, आप भी हैरान हो जाएगें गीत के बोल पढकर -

जो मैं होती राजा जल की मछरिया उठाए जाल काए दय्या रे
जो मैं होती राजा बन की कोयलिया तुम बहेलिया लगाए घात रे

याद आ गया आशा भोंसले का फ़िल्मी गीत जो शायद देवाआनन्द की फ़िल्म काला पानी का है -
नज़र लागी राजा तोरे बँगले पे जो मैं होती राजा बेला चमेलिया लिपट रहती राजा तोरे बँगले पे
शनिवार और सोमवार को पत्रावली में थे निम्मी जी और युनूस जी। एक पत्र शिकायती तो चार पत्रों में विभिन्न कार्यक्रमों की तारीफ़। दोनों दिन यही अनुपात रहा पर पत्र प्राप्त हुए देश के विभिन्न राज्यों से।
8 बजे का समय होता है हवामहल का। सभी झलकियाँ अच्छी थी पर सभी पुरानी। एक संवाद था - लाओ पाँच का नोट दो सामान लाना है। हमने सोचा आजकल तो पाँच का नोट ढूँढना पड़ता है फिर पाँच के सिक्के से सामान खरीदना - उफ़्फ़फ़्फ़ ! खैर हवामहल के लिए हम तो यही कहेंगे ओल्ड इज़
गोल्ड

9 बजे गुल्दस्ता अच्छा लगा। वाणी जयराम को आजकल बहुत कम ही सुनने को मिलता है। बशीर बद्र का कलाम भी अच्छा लगा। इसके बाद 9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में क्रान्ति, पत्थर के सनम, मधुमति इस तरह नई पुरानी सभी फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए। उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में वर्ष 2000 में रिकार्ड की गई संगीतकार नौशाद से अहमद वसी जी की बातचीत सुनी जो शुरूवाती दौर की थी। कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता थे कमल जी।

10 बजे छाया गीत में भी कुछ नए और पुराने गीत सुनवाए जाते है। यहाँ गीतों से ज्यादा प्रस्तुति अच्छी लगती है और इन प्रस्तुतियों में रात के समय पुराने गीत सुनना और भी अच्छा लगता है पर लोकप्रिय गीत लेकिन निम्मी जी की प्रस्तुति में पता ही नहीं चला कि छाया गीत सुन रहे है या भूले-बिसरे गीत। वैसे यह उदघोषकों का कार्यक्रम है इसीलिए कुछ कहना ठीक नहीं लगता फिर भी हम कहेगें पसन्द अपनी अपनी ख़्याल अपना अपना।

Tuesday, August 12, 2008

घन्यवाद श्री मोदी साहब

आदरणीय श्री महेन्द्र मोदी साहब,
नमस्कार
यह जान कर खुशी हुई कि आप रेडियोनामा के नियमीत वाचक है और आपने इस पर जवाब दिया वह भी सराहनिय कार्य है कि आप इतनी व्यस्तता से समय निकालते है । हाँ, मूझे याद है कि एक बार पत्रावली कार्यक्रममें मेरे ही पत्र को ले कर मेरे नाम को बोले विना एक निवेदन किया था कि व्यक्तिगत सम्बोधन वाले पत्रके उत्तर आप कहीं और देगे पर आप इस ब्लोग पर भी देगे वह विचार नहीं आया था पर एक बात मैनें मेरे विविध भारती पर लिखे पत्र या इस टिपणी या पोस्ट में भी स्पष्ट लिख़ी ही है कि मेरा कोई य? व्यक्तीगत दोषारोपण का इरादा नहीं है और जो कर्यक्रम बने इसकी गुणवत्ता तो बेहतरीन थी ही। पर मैनें सिर्फ़ इतना अफ़सोस ही जटाया है कि यह स्वर्ण जयन्ती महोत्सव के समापन के बाद यह सिलसिला और क्षेत्रों तक विस्तृत होने की सम्भवना नहीं रहेगी और यह बात तो अगर छुट जाने वाले क्षेत्रों के श्रोता लोग या इस प्रकार के व्यक्ति विषेष के नज़रिये से तो आप को भी सही लगेगी । इस मतलब की एक पोस्ट इस ब्लोग की नियमीत लेख़ीका हैद्राबाद की श्रीमती अन्नपूर्णाजी ने कई हप्ते पहेले लिख़ी है । यहाँ इन बेहतरीन प्रस्तूतीयोँ के लिये तो मैं आपका और आपकी टीम का कद्रदान हूँ ही और कभी कभी तो आप की मेहनत और परिस्थिती को सोच कर विविध भारती की टीम का समर्थन करते हुए इस ब्लोग के अन्य सदस्यों की नाराझगी भी पाई है, यहाँ यह बात मैं जरूर बताता हूँ कि क्या होना चाहीए पर साथ यह भी स्वीकार करता हूँ, कि कोई बात पर अगर आप श्रोतामत से सम्मत भी होते है तो भी परिस्थितीयाँ या उपर से तय की गई निती के अनुसार ही अफ़सर लोग या अन्य कर्मशीलो को चलना होता है और इस बारेमें कोई स्पष्टता भी नहीं हो सकती है । मेरे मनमें आप और आपके करीब सभी साथियोँ के लिये आदर कायम है । हाँ, मेरी एक ही कमज़ोरी है कि मैं मेरे मनकी बात को ज़बान से या लिख़ाई द्वारा मन से निकाल देता हूँ । आप जल्दी ही आम स्वास्थ पाये ऐसी शुभ: कामना ।
आपका शुभ: चिन्तक,
पियुष महेता ।

Monday, August 11, 2008

विविध भारती सेवा- पुन:प्रसारणो का अतिरेक्

जाने माने सेक्षोफोन और मेटल फ्ल्यूट वादक श्री मनोहरी सिंहजी की हमारे महेमान कार्यक्रममें दो बार दो हप्तेमें प्रस्तूत की गई मुलाक़ात को कई किस्तोंमें बांट कर यूथ एक्स्प्रेस में प्रस्तूत करने की, तो एक बात इस तरह हो गई, कि फिल्मी दूनिया से यानि सिर्फ़ फिल्मी दूनिया से जूड़े वादक कलाकारमें आप के लिये सिर्फ़ मनोहरी दा ही है और अन्य कोई वादक कलाकार की या अरेंजर की उनकी नज़रमें कोई अहेमियत नहीं लगती है । अगर कोई मुलाकात का पुन: प्रसारण करना है तो एक 4 या 5 साल की लम्बी अवधी के बाद थोड़ा सा वाज़िब लगता है । संगीत सरीतामें श्री बाल कृष्ण ऐय्यर की मुलाकात को करीब 7 मास भी नहीं हुए है । मनोहरी दा को तो संगीत सरीता और इनसे मिलीये में भी बुलाया गया था । इसी तरह नौशाद नामा को उजाले उनकी यादोंके श्रंखलामें भी दूसरी यानि कुल मिलाके तीसरी बार शामिल किया गया है । जब की कई निवृत्त कलाकारों को याद भी नहीं किया जाता है जैसे अभिनेत्री आशा पारेखजी और शक़िलाजी, जब की कई नये कलाकार और गायको को स्थान मिला है । श्रीमती जयश्री टी की श्रंखला बहोत मझेदार रही और इस लिये भेटकर्ता और सम्पादक श्री अशोक सोनावणेजी और निर्मात्री को बधाई । पर इनसे सिनियर अभिनेत्री तो मूझे याद आयी ही ।

Friday, August 8, 2008

प्रकाश किरण

विविध भारती का सुबह प्रसारण शुरू होता है चिंतन से जिसमें उदघोषक द्वारा कोई उपदेशात्मक बात, विदुषकों की कही गई कोई सूक्ति बताई जाती है यानि सुबह-सुबह कोई सीख दी जाती है। यह शायद एक मिनट का भी नहीं होता। कभी-कभी केवल एक वाक्य ही कहा जाता है पर इस तरह के कार्यक्रम आकाशवाणी के अन्य केन्द्रों से बहुत अच्छे होते है।

आकाशवाणी हैदराबाद से प्रसारित होने वाले ऐसे ही कर्यक्रम का नाम है - प्रकाश किरण। इस कार्यक्रम की अवधि पाँच मिनट होती है। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ नागरिकों की वार्ताएँ प्रसारित होती है जिससे विषय के साथ-साथ उनके जीवन के अनुभव के आधार पर कार्यक्रम का स्तर बढ जाता है।

विषय बहुत व्यापक होते है पर जीवन की गहराई से जुड़े होते है जैसे मित्रता, शत्रुता, अहिंसा, कर्म, परोपकार आदि। पाँच मिनट के लिए इस एक विषय पर जब कोई उम्रदराज नागरिक लिखेगें तो स्वाभाविक है कि उनका अध्ययन उनका अनुभव सभी सिमट आएगा।

मित्रता विषय पर कृष्ण सुदामा की मित्रता से लेकर राम सुग्रीव विभीषण की मित्रता भी आ जाएगी। इन उदाहरणों द्वारा जीवन में मैत्री भावना का महत्व बताने के लिए कवियों की रचनाएँ भी उद्धृत की जाएगी जिससे पाँच मिनट में बहुत कुछ समझा और समझाया जाता है। इस तरह दिन की शुरूवात सकारात्मक होती है।

Wednesday, August 6, 2008

भाव गीत

छाया गीत और त्रिवेणी के बारे में तो सभी जानते है पर शायद भाव गीत कार्यक्रम के बारे में बहुत लोग नहीं जानते। यह तीनों ही कार्यक्रम फ़िल्मी गीतों पर आधारित होते हुए भी साहित्य के ज्यादा करीब है।

रेडियो सिलोन से शनिवार सुबह नौ बजे आप ही के गीत कार्यक्रम के बाद प्रसारित होने वाला कार्यक्रम है भाव गीत। पहले जब भी स्कूल और कालेज की छुट्टियाँ होती थी मैं नियमित यह कार्यक्रम सुना करती थी।

जहाँ छाया गीत और त्रिवेणी कार्यक्रम उदघोषक के होते है वहीं भाव गीत कार्यक्रम श्रोताओं का है। श्रोता पत्र में लिखते है उनकी पसन्द का गीत और उस गीत के भाव। इस कार्यक्रम में अधिकतर साठ और सत्तर के दशक के गीत सुनने को मिलते। वैसे हिन्दी सिनेमा में देखा जाए तो इन बीस सालों में ही ऐसे गीत लिखे गए जो बहुत अर्थपूर्ण रहे और साहित्यिक रहे।

हिन्दी सिनेमा के लगभग सभी उम्दा शायर और गीतकार इसी दौर के है - साहिर लुधियानवी, कैफ़ी आज़मी, राजा मेहदी अलि खाँ, शेवन रिज़वी, योगेश, अनजान, नक्शलायल पुरी, इन्दिवर कहाँ-कहाँ तक नाम गिनाए लेकिन इतना मैं जरूर कहूँगी कि इन गीतों में आनन्द बक्षी के गीत तोता-मैना की कहानी वाले रोमांटिक गीत माने जाते इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भाव गीत में कितने अच्छे गीत सुनने को मिलते थे।

इस कार्यक्रम का आकर्षण यह था कि इसके श्रोता किसी भी स्तर के हो पर इसमें भाग लेने वाले या पत्र लिखने वाले साहित्यिक रूचि के और पढे-लिखे होते थे। उदघोषक बताते कि पत्र किस श्रोता का है और कहाँ से लिखा है फिर श्रोता की पसन्द के गीत की फ़िल्म का नाम और गायक तथा गीतकार का नाम बताते फिर बताते कि श्रोता ने लिखा है कि इस गीत के भाव है … इस गीत में गीतकार या शायर ने जीवन के बारे में ऐसा कहा है … सुनने पर ऐसा लगता जैसे हिन्दी साहित्य की कक्षा में बैठे है।

हिन्दी फ़िल्मी गीतों का इतना सुरूचिपूर्ण कार्यक्रम जिसमें श्रोताओं की भी भागीदारी हो, इसके अलावा कोई दूसरा नहीं हुआ और अब आज के दौर में ऐसे किसी कार्यक्रम की शुरूवात की शायद संभावना भी नहीं है।

Monday, August 4, 2008

वरिष्ठ प्रसारणकर्ता राजीव सक्सैना का असामयिक निधन

बड़े दु:ख के साथ सूचित करने में आता है कि दो दिन पूर्व जाने-माने प्रसारणकर्ता श्री राजीव सक्सैना का नई दिल्ली में निधन हो गया. निधन के कारणों की तफ़सील की प्रतीक्षा है. आज हमारे रेडियोनामा बिरादर यूनुस भाई इस ख़बर से ख़ासे व्यथित नज़र आए और आग्रह किया कि प्रसारण परिदृष्य से जुड़े हमारे लोकप्रिय ब्लॉग पर ये ख़बर जारी होनी चाहिये. सबसे पहले तो राजीव सक्सैना को पूरे रेडियोनामा परिवार की भावभीनी श्रध्दांजली.


राजीव सक्सैना पिछले तीन दशकों से रेडियो प्रसारण से जुड़े थे. दिल्ली के आकाशवाणी केन्द्र के युववाणी कार्यक्रम से शुरूआत करने वाले राजीव भाई
क्रिकेट कमेंट्रेटर के रूप में ख़ासी पहचान रखते थे. गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के आखों देखा हाल सुनाने वाले कमेंट्रेटर पैनल में राजीव भाई का नाम शुमार था . हाँ एक ख़ास बात यह कि जब हिन्दी कमेंट्री के इंतज़ामात के लिये आकाशवाणी के अर्थाभाव होना शुरू हुआ तो राजीव सक्सैना ने अपने कौशल का इस्तेमाल करते हुए बाक़ायदा स्पाँसरशिप्स लाना शुरू की और नई आवाज़ों को मौक़ा देना प्रारंभ किया.उन्होने मैचों के अंतराल में उन्होंने लोकप्रिय फ़ोन इन कार्यक्रमों भी शुरू किये और उसकी रोचकता में इज़ाफ़ा करने के लिये राजीव भाई ने कई पूर्व क्रिकेटर्स को जोड़ा.

संयोग देखिये हमारे रेडियोनामा बिरादर इरफ़ान ने हाल ही में राजीव सक्सैना पर एक पोस्ट अपने ब्लाग टूटी हुई बिखरी हुई पर लिखी थी . यदि इरफ़ान भाई इजाज़त देंगे तो बतौर ख़िराजे अक़ीदत उसी पोस्ट को शीघ्र ही रेडियोनामा पर लिया जाएगा.

फ़िलहाल बस इतना ही.हम सब राजीव सक्सैना जैसे क़ाबिल ब्रॉडकास्टर के आकस्मिक निधन पर स्तब्ध हैं . फ़िर एक बार दिवंगत के प्रति हमारी श्रध्दाजंलि .

समाचार जगत से महत्वपूर्ण शुरूवात का ऐलान

कल सुबह विविध भारती पर छह बजे के समाचार बुलेटिन में सूचना दी गई आकाशवाणी के समाचार जगत के कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की शुरूवात की।

एक कार्यक्रम का नाम है परिक्रमा एक अन्य मिलाजुला कार्यक्रम होगा। इन कार्यक्रमों में ज्वलन्त विषयों को ऊठाया जाएगा लेकिन यह नहीं बताया गया कि क्या आकाशवाणी ने अपने कार्यक्रम - चर्चा का विषय है, के अलावा इन कार्यक्रमों को रखा है या उसके बदले।

एक फोन-इन-कार्यक्रम की शुरूवात की भी सूचना दी गई जिसमें श्रोता फोन कर सकेगें। लेकिन अभी यह नहीं बताया गया है कि इन कार्यक्रमों की अवधि और प्रसारण समय क्या होगा। श्रोताओं को फोन करने के लिए भी पूरी जानकारी अभी नहीं दी गई है।

इन कार्यक्रमों की शुरूवात से समाचारों के अलावा आकाशवाणी से विभिन्न मुद्दों पर विशेषज्ञों की राय भी ली जा सकेगी और आम जनता भी इससे जुड़ेगी।

Sunday, August 3, 2008

1. साझ पहेली 2. सितारों से आगे जहाँ और भी है

आज मैं आपको एक फिल्मी धून सुनाना चाहता हूँ, जो मैंनें रेडियो श्री लंका के कार्यक्रम साझ और आवाझ की 18 अप्रिल, 2008 की किस्त से उठाई थी, जो मैं करीब 1968 से अपने संग्रहमें रख़ना चाहता था । पर आज मूझे इनके साझ और कलाकार के बारेमें इस वक्त नहीं बताता हूँ । पर चाहता हूँ, कि आप सिर्फ़ गाने को ही नहीं, पर इस साझ के बारेमें और कलाकार के बारेमें भी अपना अपना अंदाज़ा लगाये और बताएं । एक क्ल्यू देता हूँ, कि इन कलाकार के जनम दिन पर मैंनें बधाई कि पोस्ट प्रस्तूत की थी, जिसमें मेरा उनके साथ फोटो भी प्रस्तूत किया था । अगर मेलोडी वाला साझ आप पहचानेगे तो अपनी याददास्त से या मेरी पूरानी पोस्टसे सही हल ढ़ूढना मुस्कील नहीं रहेगा । थोड़ी सी ध्वनी मूद्री की गुणवत्ता कम तो मिलेगी ही क्यों कि, यह लधू तरंग का प्रसारण है ।
तो सुनिये यह मधूर धून


साथ में श्री अजितजी की आकाशवाणी पटना के विज्ञापन प्रसारण सेवा के सावन के 1931 से आज तक के गानो के कार्यक्रम के गानो की पोस्ट, श्रीमती अन्नपूर्णाजी की त्रिवेणी, भेटवार्ता, साप्ताहिकी, आराधना, नाट्यतरंग, पिटारेमें खीचडी, पटियाला घराने की संगीत सरीता, सेहतनामा, यूथ एक्स्प्रेश तथा संजय पटॆल जी की देवकीनंदन पांडेजी के बारेमें पोस्ट, युनूसजी की जरूरी एलान, आलम पनाह (फरमान पर अन्नपूर्णाजी की टिपणी के साथ ), तथा विविध भारती की प्रायोगीक वेबसाईट, वगैरह पोस्ट की सराहना करता हूँ । पर अभी भी विविध भारती पर जोधपूर और राजस्थान छाया हूआ है और अब शायद आजके बाद आने वाले दिनों में अलाहाबाद छाने वाला है । यह दोनों आकाशवाणी केन्द्र श्री महेन्द्र मोदी साहब के कार्यक्षेत्र रहे है । इस लिये उनके पास वहाँ के सही कलाकारों और वक्ता लोगों की ढेर सारी जानकारीयाँ होना स्वाभाविक है । और जिन लोगों को प्रस्तूत किया गया उनसे मेरे सहीत सभी को ख़ुशी तो हुई है ही, पर एक बात कहना चाहता हूँ, सितारों से आगे जहाँ और भी है । कि हमारे सुरत शहरमें भी कई गिरधारीलाल विश्वकर्माजी जैसे या थोडे से उपर या नीचे रहे कुछ: रेर सोंग्स कलेक्टर्स को मैं जानता हूँ तथा बड़ौदा के श्री जयंतिभाई पटेल, और राजकोट के मधूसूदन भट्ट भी इसी प्रकार के संग्राहक है । और डोम्बीवली के जयरामन साहब को तो मैं भूल नहीं सकता । पर अफ़सोस रहेगा, कि यह स्वर्ण जयंति मनाने का यह सिलसिला तो दि. 03-10-2008 पर समाप्त होने पर इनके लिये विविध भारती रूपी यह टेलीस्पोप हमें काम देना बंद कर देगा । “आमने सामने” भी सिर्फ़ जोधपूर के लिये ही रहा । क्या युनूसजी इस बात को श्री मोदी साहब तक़ पहोंचायेंगे ?

पियुष महेता

Saturday, August 2, 2008

त्रिवेणी

त्रिवेणी विविध भारती का बहुत पुराना कार्यक्रम नहीं है और न ही नया-नवेला है। छोटे से इस कार्यक्रम की जिस ने भी कल्पना की वो वाकई तारीफ़ के काबिल है।

यथा नाम तथा गुण है इस कार्यक्रम के। शायद पूरे पन्द्रह मिनट का भी नहीं है यह कार्यक्रम पर है गागर में सागर। वैसे भी विविध भारती की सुबह की सभा में विशुद्ध भारतीय संस्कृति झलकती है। वन्देमातरम के बाद मंगल ध्वनि फिर भक्ति गीत जिसके बाद देश भक्ति गीत फिर पुराने गीत जो जिसके बाद शास्त्रीय संगीत और उसके बाद त्रिवेणी।

इसका स्वरूप छाया गीत की तरह होते हुए भी आधारिक रूप से अलग है। यहाँ भी छाया गीत की तरह ही गीतों के साथ उदघोषक भाव-विचार प्रस्तुत करते है पर यहाँ विषय हमेशा ख़ास रहते है। कोई न कोई उपदेश ज़रूर होता है। इस तरह हर दिन मिलती है एक सीख।

विषय ज़रूरी नहीं कि भारी भरकम हो। टेलीफ़ोन भी विषय हो सकता है तो डाक भी। बड़े विषयों की तो बात ही क्या है ज़िन्दगी का हर फ़लहफ़ा समेट लेते है। थोड़े से अर्थ पूर्ण शब्दों में बात कही और तीन गीत सुनवा दिए।

गीत पूरे तो नहीं सुनवाए जाते पर बहुत ही अर्थपूर्ण संकेत धुन शुरू में ज़रूर बजती है जिसे सुन कर ऐसा लगता है जैसे नदी की धाराएँ कलकल कर रही हो और अक्सर इस धुन के बाद ही उदघोषक कह देते है आज त्रिवेणी की धाराएँ मिल रही है … विषय पर।

पहले यह कार्यक्रम दुबारा दोपहर में मन चाहे गीत से पहले भी प्रसारित होता था पर अब दुबारा प्रसारण बन्द कर दिया गया है। अब केवल एक ही बार सवेरे पौने आठ बजे संगीत सरिता के बाद प्रसारित होता है। रोज़ सुनने से कोई एक ख़ास बात जीवन में ज़रूर सीख लेते है। अच्छा लगता है इस शिक्षाप्रद कार्यक्रम को सुनना हालांकि इसमें विषय के अनुसार नए गाने भी शामिल रहते है पर वो भी विषय के अनुसार होने से अच्छे लगते है।

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