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Friday, September 26, 2008

साप्ताहिकी 25-09-08

साप्ताहिकी शुरू करने से पहले एक ख़ास बात ! आज से स्वर्ण जयन्ति के मासिक पर्व पर सुनवाए गए कार्यक्रमों के संपादित अंशों का दुबारा प्रसारण किया जा रहा है। 2 अक्तूबर तक सुनते रहिए दोपहर 12 बजे से शाम 5:30 बजे तक।

अब करते है चर्चा सप्ताह भर के कार्यक्रमों की। सुबह के प्रसारण में समाचारों के बाद चिंतन में शेख़ काज़ी, भगवद गीता, शेक्सपीयर, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे व्यक्तितत्वों के विचार बताए गए। वन्दनवार में लोकप्रिय भजन सुनवाए गए जिनमें से एक भजन -

प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी

अनूप जलोटा की आवाज़ में भी सुनवाया गया और इसी भजन का एक पुराना रिकार्ड भी सुनवाया गया जो शायद साठ-सत्तर के दशक का है, गायिका का नाम मुझे पता नहीं। यह भजन दोनों रूपों में सुनना अच्छा लगा।

समापन में देश भक्ति गीतों में केवल सुमित्रानन्दन पन्त का गीत भारतमाता ग्रामवासिनी विवरण के साथ सुनवाया गया।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में अच्छे भूले-बिसरे गीत सुनने को मिले जैसे क़िस्मत फ़िल्म में मिसेज घोष का गाया गीत। क़िस्मत के गाने तो बहुतों ने सुने होगें पर गायिका मिसेज घोष का नाम शायद बहुत कम लोगों ने ही सुना होगा। एक और गीत सुन कर बहुत मज़ा आया अरूण कुमार का गाया, सरस्वती देवी का संगीतबद्ध किया बंधन फ़िल्म का गीत - चना जोरगरम और समाप्ति के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में नई श्रृंखला शुरू हुई जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो विधाओं - हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में समान प्रकृति के रागों की चर्चा की जा रही है जैसे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के राग यमन और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के राग कल्याणी, राग मालकौंस और हिन्डोलम, राग चारूकेशी जो मूल रूप से दक्षिण भारतीय संगीत का है। इन समानताओं को बताते हुए दोनों विधाओं के कलाकारों से गायन और वादन सुनवाए गए। प्रस्तुत कर रही है शकुन्तला नरसिंहन। यह श्रृंखला भी छाया (गांगुली) जी ने तैयार की है और 1993 में पहली बार प्रसारित की गई थी।

जहाँ तक मेरी जानकारी है भारतीय शास्त्रीय संगीत की तीन विधाएँ है - हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और रविन्द्र संगीत जिसमें से रविन्द्र संगीत बंगला भाषी क्षेत्र तक सिमटा है, कर्नाटक शास्त्रीय संगीत दक्षिण की चार भाषाओं और दक्षिणी क्षेत्र तक सिमटा होने से इसे दक्षिण भारतीय संगीत भी कहा जाता है। इस तरह इन दोनों विधाओं को भौगौलिकता के आधार पर भी नाम दिया जाता है पर जहाँ तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बात है इसका क्षेत्र तो बहुत बड़ा है फिर हम समझ नहीं पाते है कि अक्सर इस कार्यक्रम में उदघोषणा में उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय संगीत क्यों कहा जाता है जबकि प्रस्तुत करने वाले संगीतज्ञ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को उत्तर भारतीय संगीत नहीं कहते। इस बार शकुन्तला नरसिंहन जी ने भी नहीं कहा जिससे प्रमाणित भी हो जाता है कि उत्तर भारतीय संगीत कहना ठीक नहीं। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ग्वालियर घराने का महत्वपूर्ण योगदान है, इंदौर के संगीत घराने है, महाराष्ट्र के कलाकारों का कम योगदान नहीं है। देश के उत्तरी क्षेत्र के अलावा कई क्षेत्रों के कलाकार है चाहे आप पंडित भीमसेन जोशी का नाम लीजिए या किशोरी अमोलकर का।

त्रिवेणी में लोभ-लालच की बातों के साथ किशोर कुमार का लोकप्रिय गीत बहुत समय बाद सुन कर मज़ा आया -

गुणी जनों भक्त जनों, नक़द नारायण की जय-जय बोलों

तूफ़ान की, सुख-दुःख की भी बातें हुई, नज़रिए की भी चर्चा हुई।

दोपहर 12 बजे से 1 बजे प्रसारित होने वाले सुहाना सफ़र कार्यक्रम में हल्का सा परिवर्तन हुआ, बुधवार को शिवहरि के स्थान पर दिलीप सेन और समीर सेन (दिलीप-समीर) के स्वरबद्ध किए गीत सुनवाए गए। शुक्रवार को ए आर रहमान जिनके गानों में मधुश्री का गाना फिर से सुना - कभी नीम-नीम कभी शहद-शहद - बहुत ज्यादा सुनने को मिल रहा है यह गाना। शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, रविवार को स्माइल दरबार, सोमवार को नए दौर के संगीतकारों के नए-नवेले संगीतकारों के संगीतबद्ध किए गीत, मंगलवार को जतिन-ललित के गानों में फ़ना का गाना अच्छा लगा -

चन्दा चमके… चटोरी चीनी ख़ोर

गुरूवार को शंकर-एहसान-लाँय के संगीतबद्ध किए गाने बजे।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में वो कौन थी एलबम से जोजो का गाना - वो कौन थी जो नज़र मिला के चाँद ले गई, एलबम कौन हो सकता है के लिए सुनिधि चौहान का गीत - दिल मेरा डोले प्यार मेरा बोले इन सब गीतों में बोल बहुत ही साधारण थे जो पाश्चात्य संगीत में ढले थे।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में मिले-जुले गाने सुनवाए गए जैसे दहक, मैं हूँ ना जैसी नई फ़िल्म के गाने - तुम से मिल के दिल का जो हाल क्या कहे जिसके तुरन्त बाद सत्तर के दशक की फ़िल्म दुश्मन का किशोर कुमार का गाया लोकप्रिय गीत - वादा तेरा वादा, दि ट्रेन फ़िल्म का गाना - मुझ सा भला ये आँचल तेरा सुनवाया। इसी तरह अस्सी के दशक की फ़िल्म देशप्रेमी के बाद साठ के दशक का गाना सुनवाया - नाना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम प्रस्तुत किया कल्पना (शेट्टी) जी ने और फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। इस बार कार्यक्रम बहुत संतुलित रहा। पहला फोन उत्तराखंड से था। उत्तराखंड के आस-पास के क्षेत्रों मसूरी, गढवाल आदि की जानकारी भी दी और वहाँ तक पहुँचने की जानकारी भी दी। क्षेत्र की भी अच्छी जानकारी दी, श्रोता सखि ने जो कालेज की छात्रा थी। तहसील मंझोर से आशा जी ने बात की जो गृहणी है और जिनकी पसन्द पर पुरानी फ़िल्म ख़ानदान का गीत सुनवाया गया। इस क्षेत्र के धार्मिक महत्व और प्राकृतिक सौन्दर्य के बारे में भी बताया। झारखंड से जिस सखि से बात हुई उन्होनें अपने बारे में अधिक नहीं बताया। नागपुर के पास बैतुल शहर से भी गृहिणी ने ही बात की जिन्होनें संयुक्त परिवार की बातें की। सिलीगुड़ी से फोन आया और अपने क्षेत्र के बारे में उन्होनें बताया कि देश भर में सिलबट्टे के लिए सिल्लियाँ यही से भेजी जाती है। पहाड़ी क्षेत्र होने से सिल्लियाँ अच्छी होती है जो पहाड़ो के बड़े पत्थरों के टुकड़ों की होती है इसी से शहर का नाम पड़ा सिल्लीगुड़ी। इस तरह इस कार्यक्रम से जानकारी बढी।

सोमवार को सखि-सहेली में रसोई की बातें हुई। बंबई की भेलपूरी बनाना बताया गया। मंगलवार को करिअर के लिए मार्ग दर्शन किया जाता है जिसके अंतर्गत इंटरव्यू कैसे दे ? क्या सावधानियाँ बरते, यह बताया गया। बुधवार को व्यक्तित्व निखारने की बातें हुई। यह सच भी है कि व्यक्तित्व अच्छा होने से सुन्दर न भी हो तब भी समाज में आकर्षक लगते है। गुरूवार को सफ़ल महिलाओं के बारे में बताया जाता है, इस सप्ताह पंजाबी और हिन्दी साहित्यकार अमृता प्रीतम के बारे में बताया गया। उनके जीवन और काम की जानकारी दी गई। उनकी रोशनी शीर्षक से कविता भी पढकर सुनाई गई।

इसके अलावा सामान्य काम की बातें भी होती रही जैसे रसोई की सफ़ाई, ओवन टोस्टर की सफ़ाई, बिजली की बचत आदि।

शनिवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में पहला गीत सुना फ़िल्म नौशेरवानेआदिल का, इस फ़िल्म के रफ़ी के गाने तो लोकप्रिय है पर यह जो सुनवाया गया - माशाअल्लाह माशाअल्लाहा भूला-बिसरा गीत लगा। बाकी सभी सदाबहार गाने थे जैसे प्रोफ़ेसर, मधुमति, राजकुमार फ़िल्म का यह गाना - आजा आई बहार दिल है

इसके बाद नाट्य तरंग में शनिवार और रविवार को दो किस्तों में मुमताज़ शकील के निर्देशन में सुरेन्द्रकान्त का लिखा नाटक सुना - गुलाब की पंखुड़ियाँ जो एक ऐतिहासिक समय का नाटक है जब मुग़ल और ब्रिटिश दोनों के बीच संघर्ष चल रहा था।

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारे में पिटारा में सुना सरगम के सितारे कार्यक्रम जो गीतकार शकील बदायूनीं पर आधारित था। शोध, आलेख और स्वर युनूस जी का था। सुन कर लगा युनूस जी ने बहुत मेहनत की। वैसे भी शकील बदायूनीं की शायरी को मोहम्मद रफ़ी का स्वर मिल जाय तो समाँ बँध जाता है। इसमें ख़ास तौर पर यह बताया गया कि अपनी शायरी में उन्होनें रात का ज़िक्र कैसे किया है और सुनवाए गए उनके लिखे रफ़ी के गाए एक से बढ कर एक गाने -

सुहानी रात ढल चुकी न जाने तुम कब आओगे

गीतों की तरह क़व्वालियाँ भी कर्णप्रिय रही -

जब रात है ऐसी मतवाली फिर सुबह का आलम क्या होगा

ख़ासतौर पर रोशन के संगीत में। अन्य संगीतकारों के गीत भी सुनवाए गए जैसे हेमन्त कुमार। लता की आवाज़ में भी गीत सुना - कहीं दीप जले कहीं दिल

प्रस्तुति कांचन (प्रकाश संगीत) जी की थी। बहुत बढिया रहा कार्यक्रम जिसके लिए युनूस जी और काँचन जी को बधाई ! अब प्रतीक्षा है अगली कड़ी की…


रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस में माइक्रोचिप्स के पचास साल पूरे होने पर माइक्रोचिप्स पर अच्छी जानकारी दी युनूस जी ने, उनकी विज्ञान की शिक्षा का असर नज़र आया। दुनिया देखो खण्ड में पीज़ा की झुकी मीनर पर एक श्रोता ने जानकारी भेजी जिसे युनूस जी ने पढ कर सुनाया। किताबों की दुनिया में हिन्दी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला पर आलेख पढा गया। निराला जी के जन्मशती वर्ष में यह सुनना अच्छा लगा। विभिन्न कोर्स में प्रवेश की सूचना दी गई। हमेशा की तरह नए गाने तो बजे पर अस्सी के दशक के संगीत के माहौल को ध्यान में रखकर पंकज उदहास की ग़ज़ल भी सुनवाई गई। कुल मिलाकर अच्छा अंक रहा, युनूस जी को बधाई !

सोमवार को सेहतनामा में डा उमेश ओझा से राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने बातचीत की। डाक्टर साहब ने नपुंसकता, शुक्राणुओं की कमी, इससे पुरूषों में होने वाली कमज़ोरी आदि बातों पर विस्तार से जानकारी दी। बुधवार को आज के मेहमान में मेहमान रहे बालकवि बैरागी जिनसे बातचीत की कमल (शर्मा) जी ने। बहुत ही संवेदनशील वार्तालाप रहा। बैरागी जी को एक अच्छे कवि के रूप में हम सभी जानते है। एक अच्छे सांसद और राजभाषा हिन्दी के लिए की गई उनकी सेवाओं से भी हम परिचित है। लेकिन उनके जीवन का संघर्ष पहली बार खुल कर सामने आया। उनके लिखे गानों में रेशमा और शेरा का गीत - तू चंदा मैं चांदनी तो हमेशा से ही लोकप्रिय रहा।

हैलो फ़रमाइश में शनिवार को श्रोताओं से फोन पर बातचीत की राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने। पहला ही गीत कुली फ़िल्म का सुनवाया गया जो रमज़ान के माह का उत्साह दुगुना कर गया। ज्यादातर फोनकाल छात्रों के थे पर गाने नए के साथ बीच के समय के भी रहे। एक छात्रा ने जानी दुश्मन फ़िल्म का यह गीत सुनवाने का अनुरोध किया और बताया कि उसे नए के साथ पुराने गाने भी अच्छे लगते है -

चलो रे डोली उठाओ कहार पियामिलन की ॠत आई

मंगलवार और गुरूवार को भी श्रोताओं के फोनकाल और उनके पसंदीदा गाने सुने।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में शुक्रवार को बताया गया कि मुंबई में बारिश हो रही है और एक गीत सुनवाया गया फ़िल्म रेन से जिसके बोलों में कोई नयापन नहीं है - ए चाँद छुप जा बादलों के पीछे। शेष सभी दिन गाने सामन्य ही रहे।

शनिवार को अभिनेत्री माला सिन्हा ने विशेष जयमाला प्रस्तुत किया। हालांकि वही गीत सुनवाए जिसमें खुद माला सिन्हा ने काम किया था पर सभी लोकप्रिय गीत सुनने को मिले - गुमराह, आँखे, धूल का फूल और शुरूवात अनपढ फ़िल्म के गीत से जो मेरे बहुत ज्यादा पसंदीदा गानों में से एक है -

आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे
दिल की ऐ धड़कन ठहर जा मिल गई मंज़िल मुझे

बातें बहुत कम बताई पर अच्छा लगा। धन्यवाद शकुन्तला (पंडित) जी, यह कार्यक्रम भी बढिया रहा।

रविवार को फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए गए। शेष दिन नए और कभी-कभार बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुनवाए गए उड़िया लोकगीत जिसमें बैद्यनाथ का गाया एक गीत सुनकर बहुत पहले दूरदर्शन पर देखे गए उड़िया लोकनृत्य याद आ गए जिसमें कलाकारों के पैरों के पास बाँस चलाए जाते थे जिनमें से पैर बचाकर कलाकारों के पैर थिरकते थे, बाँस की आवाज़ का रिदम गीत में स्पष्ट था। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में पढे गए पत्रों से पता चला कि संगीत-सरिता और जयमाला कार्यक्रम अधिकतर श्रोताओं को पसन्द आते है। पर कोई विशेष सुझाव श्रोताओं से नहीं मिला। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में क़व्वालियाँ सुनी अगर रमज़ान को ध्यान में रखकर ग़ैर फ़िल्मी सूफ़ियाना क़व्वालियाँ सुनवाई जाती तो ज्यादा अच्छा होता। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में दिनेश बिसरिया से रेणु (बंसल) जी की बातचीत सुनवाई गई जो स्वयंसेवी संघटन चलाते है इन संघटनों द्वारा पशु कल्याण के लिए किए जा रहे कामों की जानकारी दी। अक्सर ऐसे संघटन महिलाओं या बच्चों के लिए बनाए जाते है, बहुत कम संघटन है जो पशुओं के लिए काम करते है। इस विषय को चुनने के लिए हम धन्यवाद देना चाहेगें महेन्द्र मोदी जी को। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने। कल का कार्यक्रम सार्थक लगा इन गीतों को सुन कर - झनक-झनक पायल बाजे, भँवरा बड़ा नादान रे। लगा वाकई रागों पर आधारित गीत है वरना कुछ गाने ऐसे बजते है जिन्हें सुनकर लगता कि इन गानों में तो रागों की झलक शायद ही मिले और हम सोचते रह जाते है कि हिमेश रेशमिया का झलक दिखला जा किस राग पर आधारित होगा।

8 बजे हवामहल में सुनी गुरमित की लिखी हास्य झलकी अपने लगे बेगाने, मधुर श्रीवास्तव की लिखी और निर्देशित झलकी दस का भूत, के एल यादव की लिखी और चन्द्रप्रभा भटनागर द्वारा निर्दिशित झलकी शिकायत पर चुपके-चुपके झलकी भावुक कर गई। एक जगह भाई-बहन की नोंक-झोंक हुई, बहन ने माँ से कहा भय्या के लिए जल्दी से लड़की देखिए, भय्या पहले तस्वीर देखेंगे फिर सपने देखेगें इस तरह व्यस्त हो जाएगें… पहले घर-घर में ऐसी बातें होती थी। आजकल शायद ही सुनने को मिले, लगता है हवामहल जैसे कार्यक्रमों तक ही सिमट कर रह जाएगी यह संस्कृति।

रात 9 बजे गुलदस्ता में मेहदी हसन की गाई ग़ज़ल अच्छी लगी जिसे उन्होनें ही संगीत से सजाया था। इससे भी अच्छा लगा ग़ालिब का कलाम बेगम अख़्तर की आवाज़ में सुनना और बहुत अच्छा लगा जब मलिका पुखराज को सुना जिसे सुनते हुए याद आ गए यह बोल -

अभी तो मैं जवान हूँ

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में कभी ख़ुशी कभी ग़म, आशिक़ी, नागिन, नम्स्ते लंदन जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अहमद वसी से बातचीत में संगीतकार नौशाद ने म्यूज़िक थेरेपी की बात की। संगीत से इलाज बताने या कहे कि संगीत का असर दिखाने बैजूबावरा से बढकर और कौन सी फ़िल्म हो सकती थी नौशाद साहब के लिए। बड़े ग़ुलाम अलि खाँ साहब का जिक्र किया गया और सुनवाई गई उनकी बंदिशे बैजू बावरा फ़िल्म से। बहुत कम ऐसा होता है जब किसी संगीतकार से बातचीत शास्त्रीय संगीत के सागर में डुबोती है। अभी आगे कड़िया बाकी है। धन्यवाद कमल (शर्मा) जी इस शानदार प्रस्तुति के लिए।

10 बजे छाया गीत में कमल (शर्मा) जी ने यादों की रात की बातें की, युनूस जी ले आए अनमोल बहुत ही कम सुने गए गीत पर थोड़ी सी चूक हो गई। पहला गीत सुनवाया सावन फ़िल्म का रफ़ी और शमशाद बेगम का - भीगा-भीगा प्यार का समाँ जो भूले-बिसरे गीत में बहुत बार सुनते रहे। पिछले शायद 5-6 साल से नहीं सुना और यह अंतराल लंबा नहीं होता है। इसीलिए यह गीत अन्य गीतों से विशेषकर राजधानी फ़िल्म के गीत से मैच नहीं कर रहा था। राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी पहले की नए गीत लेकर आए, अमरकान्त जी इस बार थोड़ा ज्यादा बोलते लगे तो अच्छा नहीं लगा…

Tuesday, September 23, 2008

श्री क्रिष्णकांतजी का जन्म दिन
दि 15 सितम्बर, 2008 के दिन एक लम्बी सफ़ल फ़िल्मी सफर पूरी करके इन दिनों सुरतमें निवास कर रहे चरित्र अभिनेता और निर्देषक श्री क्रिष्णकांतजी का जन्म दिन था । रेडियो श्री लंका पर यह सूचना एक दिन देरी से प्राप्त होने के कारण उन लोगोने दि. 16 के दिन 15 तारीख़ के जन्म दिन का जिक्र करते हुए उद्दघोषीका श्रीमती ज्योती परमाराजीने उनके स्वस्थ आयु की कामना करते हुए, फिल्म पोस्ट बोक्ष नं 999 का उन पर फिल्माया हुआ गाना जोगी आया ले के संदेसा भगवानका प्रस्तूत किया ।
विविध भारती पर यह सुचना पिछले कई सालो से देने का मेरा सिलसिला हर वक्त उनके द्वारा गिनतीमें नहीं लिये जाने के कारण इस बार मैंनें इस बारेमें लिख़ना ठीक नहीं समज़ा ।
20 सितम्बर मरहूम क्लेरीनेट वादक मास्टर इब्राहीम (मास्टर अजमेरी) की पूण्य तिथी
इस दिन को भी रेडियो श्री लंकाने याद किया । इस मोके पर उनके द्वारा प्रस्तूत फिल्म बड़ी बहन की धून चले जाना नहीं ( जो मेरी एक मास्टर इब्राहीम पर एक पोस्टमें प्रस्तूत करने की कोशिश की थी पर सिर्फ़ गंगा जमूना की धून ही आप सुन पाये थे वह यहाँ नीचे पहेली धून पैश है । ( इस धूनमें बीच के और शुरूआती संगीतमेँ स्व केरशी मिस्त्री का पियानो है ।)

अब इसी धून को आप स्व. श्रीधर केंकरे से बाँसूरी पर सुनिये जो उनके साथी ही थे । :

मेरी एक पोस्टमेँ मैनें साझ पहेली के रूपमेँ स्व कल्याणजी की पूण्य तिथी पर उनके संगीत वाले गीत नींद न मूज़को आये ( फ़िल्म पोस्ट बोक्स नं 999-नहीं कि मेरी गलती अनुसार फ़िल्म सट्टा बाझार- ताजूब है कि किसीने मेरी इस गलती पर मूझे बताया नहीं-क्यों की किसीने पोस्ट में ऋची ही नही ली इस लिये मेरे ध्यान पर इस बात को आते हुए भी अब तक मैं शांत रहा और इंतेज़ार करता रहा ।) की तीन धून में पहेली धून स्वयं स्व कल्याणजी वीरजी शाह की क्ले वायोलीन पर दूसरी बाबला वाधवृंद पर (शायद सिंथेसाईझर पर विजय कल्याणजी शाह थे ), और तीसरी सुरेश यादव की सेक्सोफ़ोन पर (मेहमान वाध्यवृंद संचालक और एकोर्डियन वादक श्री एनोक डेनियेल्स) थी ।
एक दिन कई सालो पहेले रेडियो सिलोन की सुबह की सभा के कार्यक्रम सुन रहा था तब आज की लोकप्यिय उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमार के पिताजी स्व. दलवीरसिंह परमार ने 10.30 से शुरू हो कर करीब रात्री एक बजे तक चलने वाले कई हिन्दी फ़िल्म संगीत पर आधारित कार्यक्रम के अलावा अरबी भाषामें समाचार की कुछ: बात आयी । उन दिनों रेडियो श्रीलंका की हिन्दी सेवा का रात्री प्रसारण 10 बजे के बाद 25 मीटर पर बन्ध हो कर 31 मीटर पर तबदील होता था पर क्यूं यह पता नहीं था । पर हम लोग 31 मीटर पर ट्यून कर लेते थे । पर उस दिन परमार साहब के बताये समय पर समय से पहेले ही फ़िर से 25 मीटर ट्यून किया, तब एक उस समय मेरे लिये अनजान उद्दघोषक श्री अब्दूल अजीझ मेमण उद्दघोषणा करते सुनाई पड़े । पर भाषामें सभा की जगह नसरियात और मुख़ातीब जैसे शब्द आने लगे । बादमें एक के बाद एक कार्यक्रम प्रस्तूत होते गये जो ज्यादा तर हिन्दी सभा के कार्यक्रम की प्रतिकृति थी, पर एक बात ख़ाश थी, कि आज के कलाकार (फनकार), और एक ही फिल्म से जैसे कार्यक्रम भी सिर्फ़ एक श्रोता के सुचन के अनुसार उस श्रोता का नाम बता कर प्रस्तूत किये जाते थे । पर श्रोता के नामो में भारत के नाम नहीं होते थे पर पूर्व और मध्य अफ़्रीका, गल्फ़ देशो तथा ओस्ट्रेलिया के भारतिय मूल के श्रोता होते थे ( एक नाम विषेष आता था-सिड़नी ओस्ट्रेलिया के विजय नागपाल) । बादमें अरबीमें समाचार भी होते थे जो समय बितने पर इंग्रेजीमें हो गये । जैसे हिन्दी सेवा के हमेशा जवाँ गीतो के फरमाईशी कार्यक्रम आप के अनुरोध पर में शिर्षक गीत लताजी का गाया हुआ अभी तो मैं जवान हूँ होता था, उर्दू सेवाके इसी तरह के कार्यक्रम में इसी शब्दो वाला शायद मल्लीका पोख़राज का गाया हूआ पाकिस्तानी गीत शिर्षक गीत के रूपमें एक अंश तक़ बजता था । और पूरानी फिल्मों के गीतो के यह दोनों फरमाईशी कार्यक्रम रात्री 10.30 से 11 बजे तक़ समांतर आते थे । शनिवार और रविवार अब्दूलजी की छूट्टी पर हिन्दी सेवा के सिंहाली मूल के उद्दघोषक श्री विजय शेखर हिन्दी की जगह उर्दू बोल कर प्रस्तूत होते थे और एक दो बार हिन्दी सेवा के अन्य सिंहाली मूल के उद्दघोषक श्री धरम दास भी उर्दू शब्दों के साथ प्रस्तूत हूए थे । बादमें हिन्दी सेवा का समय भी रात्री पहेले 10.30 तक़ और बाद में 10, 9.30 और 9 तक सीमीत होता गया । उसी तरह उर्दू सभा भी सीमीत होते होते बंध हो गयी ।
अभी रात्री 12.00 बजे यह पोस्ट लिख़ी है इस लिये मात्रा पर ज्यादा घ्यान दे नहीं पाया तो सागरजी से बिनती है कि जरूरी सुधार करें ।
पियुष महेता ।
सुरत-295001.

1.श्री क्रिष्णकांतजी का जन्म दिन 2.20 सितम्बर मरहूम क्लेरीनेट वादक मास्टर इब्राहीम (मास्टर अजमेरी) की पूण्य तिथी

श्री क्रिष्णकांतजी का जन्म दिन
दि 15 सितम्बर, 2008 के दिन एक लम्बी सफ़ल फ़िल्मी सफर पूरी करके इन दिनों सुरतमें निवास कर रहे चरित्र अभिनेता और निर्देषक श्री क्रिष्णकांतजी का जन्म दिन था । रेडियो श्री लंका पर यह सूचना एक दिन देरी से प्राप्त होने के कारण उन लोगोने दि. 16 के दिन 15 तारीख़ के जन्म दिन का जिक्र करते हुए उद्दघोषीका श्रीमती ज्योती परमाराजीने उनके स्वस्थ आयु की कामना करते हुए, फिल्म पोस्ट बोक्ष नं 999 का उन पर फिल्माया हुआ गाना जोगी आया ले के संदेसा भगवानका प्रस्तूत किया ।
विविध भारती पर यह सुचना पिछले कई सालो से देने का मेरा सिलसिला हर वक्त उनके द्वारा गिनतीमें नहीं लिये जाने के कारण इस बार मैंनें इस बारेमें लिख़ना ठीक नहीं समज़ा ।
2.20 सितम्बर मरहूम क्लेरीनेट वादक मास्टर इब्राहीम (मास्टर अजमेरी) की पूण्य तिथी
इस दिन को भी रेडियो श्री लंकाने याद किया । इस मोके पर उनके द्वारा प्रस्तूत फिल्म बड़ी बहन की धून चले जाना नहीं ( जो मेरी एक मास्टर इब्राहीम पर एक पोस्टमें प्रस्तूत करने की कोशिश की थी पर सिर्फ़ गंगा जमूना की धून ही आप सुन पाये थे वह यहाँ नीचे पहेली धून पैश है । ( इस धूनमें बीच के और शुरूआती संगीतमेँ स्व केरशी मिस्त्री का पियानो है ।)

अब इसी धून को आप स्व. श्रीधर केंकरे से बाँसूरी पर सुनिये जो उनके साथी ही थे । :


3. साझ पहेली नींद ना मूझको आये का खुलासा और भूल सुधार
मेरी एक पोस्टमेँ मैनें साझ पहेली के रूपमेँ स्व कल्याणजी की पूण्य तिथी पर उनके संगीत वाले गीत नींद न मूज़को आये ( फ़िल्म पोस्ट बोक्स नं 999-नहीं कि मेरी गलती अनुसार फ़िल्म सट्टा बाझार- ताजूब है कि किसीने मेरी इस गलती पर मूझे बताया नहीं-क्यों की किसीने पोस्ट में ऋची ही नही ली इस लिये मेरे ध्यान पर इस बात को आते हुए भी अब तक मैं शांत रहा और इंतेज़ार करता रहा ।) की तीन धून में पहेली धून स्वयं स्व कल्याणजी वीरजी शाह की क्ले वायोलीन पर दूसरी बाबला वाधवृंद पर (शायद सिंथेसाईझर पर विजय कल्याणजी शाह थे ), और तीसरी सुरेश यादव की सेक्सोफ़ोन पर (मेहमान वाध्यवृंद संचालक और एकोर्डियन वादक श्री एनोक डेनियेल्स) थी ।
4.रेडियो सिलिन (श्रीलंका) की उर्दू सेवा-एक समय की बात
एक दिन कई सालो पहेले रेडियो सिलोन की सुबह की सभा के कार्यक्रम सुन रहा था तब आज की लोकप्यिय उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमार के पिताजी स्व. दलवीरसिंह परमार ने 10.30 से शुरू हो कर करीब रात्री एक बजे तक चलने वाले कई हिन्दी फ़िल्म संगीत पर आधारित कार्यक्रम के अलावा अरबी भाषामें समाचार की कुछ: बात आयी । उन दिनों रेडियो श्रीलंका की हिन्दी सेवा का रात्री प्रसारण 10 बजे के बाद 25 मीटर पर बन्ध हो कर 31 मीटर पर तबदील होता था पर क्यूं यह पता नहीं था । पर हम लोग 31 मीटर पर ट्यून कर लेते थे । पर उस दिन परमार साहब के बताये समय पर समय से पहेले ही फ़िर से 25 मीटर ट्यून किया, तब एक उस समय मेरे लिये अनजान उद्दघोषक श्री अब्दूल अजीझ मेमण उद्दघोषणा करते सुनाई पड़े । पर भाषामें सभा की जगह नसरियात और मुख़ातीब जैसे शब्द आने लगे । बादमें एक के बाद एक कार्यक्रम प्रस्तूत होते गये जो ज्यादा तर हिन्दी सभा के कार्यक्रम की प्रतिकृति थी, पर एक बात ख़ाश थी, कि आज के कलाकार (फनकार), और एक ही फिल्म से जैसे कार्यक्रम भी सिर्फ़ एक श्रोता के सुचन के अनुसार उस श्रोता का नाम बता कर प्रस्तूत किये जाते थे । पर श्रोता के नामो में भारत के नाम नहीं होते थे पर पूर्व और मध्य अफ़्रीका, गल्फ़ देशो तथा ओस्ट्रेलिया के भारतिय मूल के श्रोता होते थे ( एक नाम विषेष आता था-सिड़नी ओस्ट्रेलिया के विजय नागपाल) । बादमें अरबीमें समाचार भी होते थे जो समय बितने पर इंग्रेजीमें हो गये । जैसे हिन्दी सेवा के हमेशा जवाँ गीतो के फरमाईशी कार्यक्रम आप के अनुरोध पर में शिर्षक गीत लताजी का गाया हुआ अभी तो मैं जवान हूँ होता था, उर्दू सेवाके इसी तरह के कार्यक्रम में इसी शब्दो वाला शायद मल्लीका पोख़राज का गाया हूआ पाकिस्तानी गीत शिर्षक गीत के रूपमें एक अंश तक़ बजता था । और पूरानी फिल्मों के गीतो के यह दोनों फरमाईशी कार्यक्रम रात्री 10.30 से 11 बजे तक़ समांतर आते थे । शनिवार और रविवार अब्दूलजी की छूट्टी पर हिन्दी सेवा के सिंहाली मूल के उद्दघोषक श्री विजय शेखर हिन्दी की जगह उर्दू बोल कर प्रस्तूत होते थे और एक दो बार हिन्दी सेवा के अन्य सिंहाली मूल के उद्दघोषक श्री धरम दास भी उर्दू शब्दों के साथ प्रस्तूत हूए थे । बादमें हिन्दी सेवा का समय भी रात्री पहेले 10.30 तक़ और बाद में 10, 9.30 और 9 तक सीमीत होता गया । उसी तरह उर्दू सभा भी सीमीत होते होते बंध हो गयी ।
अभी रात्री 12.00 बजे यह पोस्ट लिख़ी है इस लिये मात्रा पर ज्यादा घ्यान दे नहीं पाया तो सागरजी से बिनती है कि जरूरी सुधार करें ।
पियुष महेता ।
सुरत-295001.

Friday, September 19, 2008

रेडियो श्रीलंका की उर्दू सेवा- इतिहास का एक पन्ना

एक दिन कई सालो पहेले रेडियो सिलोन की सुबह की सभा के कार्यक्रम सुन रहा था तब आज की लोकप्यिय उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमार के पिताजी स्व. दलवीरसिंह परमार ने 10.30 से शुरू हो कर करीब रात्री एक बजे तक चलने वाले कई हिन्दी फ़िल्म संगीत पर आधारित कार्यक्रम के अलावा अरबी भाषामें समाचार की कुछ: बात आयी । उन दिनों रेडियो श्रीलंका की हिन्दी सेवा का रात्री प्रसारण 10 बजे के बाद 25 मीटर पर बन्ध हो कर 31 मीटर पर तबदील होता था पर क्यूं यह पता नहीं था । पर हम लोग 31 मीटर पर ट्यून कर लेते थे । पर उस दिन परमार साहब के बताये समय पर समय से पहेले ही फ़िर से 25 मीटर ट्यून किया, तब एक उस समय मेरे लिये अनजान उद्दघोषक श्री अब्दूल अजीझ मेमण उद्दघोषणा करते सुनाई पड़े । पर भाषामें सभा की जगह नसरियात और मुख़ातीब जैसे शब्द आने लगे । बादमें एक के बाद एक कार्यक्रम प्रस्तूत होते गये जो ज्यादा तर हिन्दी सभा के कार्यक्रम की प्रतिकृति थी, पर एक बात ख़ाश थी, कि आज के कलाकार (फनकार), और एक ही फिल्म से जैसे कार्यक्रम भी सिर्फ़ एक श्रोता के सुचन के अनुसार उस श्रोता का नाम बता कर प्रस्तूत किये जाते थे । पर श्रोता के नामो में भारत के नाम नहीं होते थे पर पूर्व और मध्य अफ़्रीका, गल्फ़ देशो तथा ओस्ट्रेलिया के भारतिय मूल के श्रोता होते थे ( एक नाम विषेष आता था-सिड़नी ओस्ट्रेलिया के विजय नागपाल) । बादमें अरबीमें समाचार भी होते थे जो समय बितने पर इंग्रेजीमें हो गये । जैसे हिन्दी सेवा के हमेशा जवाँ गीतो के फरमाईशी कार्यक्रम आप के अनुरोध पर में शिर्षक गीत लताजी का गाया हुआ अभी तो मैं जवान हूँ होता था, उर्दू सेवाके इसी तरह के कार्यक्रम में इसी शब्दो वाला शायद मल्लीका पोख़राज का गाया हूआ पाकिस्तानी गीत शिर्षक गीत के रूपमें एक अंश तक़ बजता था । और पूरानी फिल्मों के गीतो के यह दोनों फरमाईशी कार्यक्रम रात्री 10.30 से 11 बजे तक़ समांतर आते थे । शनिवार और रविवार अब्दूलजी की छूट्टी पर हिन्दी सेवा के सिंहाली मूल के उद्दघोषक श्री विजय शेखर हिन्दी की जगह उर्दू बोल कर प्रस्तूत होते थे और एक दो बार हिन्दी सेवा के अन्य सिंहाली मूल के उद्दघोषक श्री धरम दास भी उर्दू शब्दों के साथ प्रस्तूत हूए थे । बादमें हिन्दी सेवा का समय भी रात्री पहेले 10.30 तक़ और बाद में 10, 9.30 और 9 तक सीमीत होता गया । उसी तरह उर्दू सभा भी सीमीत होते होते बंध हो गयी ।

साप्ताहिकी 18-09-08

इस सप्ताह दो दिन विशेष रहे - ओणम और हिन्दी दिवस। विविध भारती ने हिन्दी दिवस तो याद रखा पर ओणम को पूरी तरह भुला दिया।

केरल राज्य का सबसे बड़ा पर्व है ओणम। विविध भारती तो देश के कोने-कोने में पहुँचता है इस तरह केरल में भी विविध भारती पहुँचता है पर सुबह से रात तक विविध भारती के केन्द्रीय प्रसारण में ओणम का नाम तक नहीं लिया गया।

सुबह के प्रसारण में समाचारों के बाद चिंतन में विद्वानों के विचारों से वन्दनवार का शुभारंभ होता रहा। समापन में देश भक्ति गीत का विवरण केवल एक ही बार बताया गया।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में सप्ताह भर कुछ लोकप्रिय गीत जैसे पड़ गय झूले सावन ॠत आई रे और कुछ भूले-बिसरे सुनवाए गए और समाप्ति के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में प्रसिद्ध गायिका रीता गांगुली द्वारा प्रस्तुत श्रृंखला ठुमरी समाप्त हुई। नायिका के विभिन्न रूपों को बताते हुए ठुमरी गायन पर चर्चा हुई और इस सप्ताह भी बड़े कलाकारों को सुन कर आनन्द आया जैसे बरकत अलि ख़ाँ। मुझे लगता है जिस दिन विविध भारती से संगीत-सरिता कार्यक्रम बन्द हो जाएगा उस दिन से संगीत मे रूचि रखने वालों को क्या इतनी सहजता से पूरे स्पष्टीकरण के साथ यह बन्दिशें सुनने को मिलेगी ?

त्रिवेणी में हुई समझदारी की, जीवन के अंदाज़ की बातें हुई पर हिन्दी दिवस और ओंणम पर भाषा संस्कृति की बात नहीं हुई।

फ़रमाइशी फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम में हिन्दी और तेलुगु दोनों ही भाषाओं के क्षेत्रीय और केन्द्रीय सेवा के कार्यक्रमों में सामान्य रूप से फ़रमाइशी गीत बजते रहे। शुक्रवार को मन चाहे गीत में कार्यक्रम के लगभग बीच में दो फूल फ़िल्म का युगल गीत बजा लता मंगेशकर और महमूद की आवाज़ों में -

मुट्टी कोड़ी कवाड़ी हवा

यह गीत केरल की पृष्ठ्भूमि पर है। अगर इस गीत को सबसे पहले सुनवाते और बजाने से पहले ओणम की शुभकामनाएँ दे देते तो भी पर्याप्त था।

10:5 पर समाचारों के बाद से 10:30 बजे तक और रात में 8:45 से 9 बजे तक क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु कार्यक्रम एक चित्र गानम में सुबह भले दोन्गलु जैसी लोकप्रिय फ़िल्म के गीत सुनवाए गए जिसमें उदित नारायण का गाया गीत भी था, दोन्गलु का अर्थ है चोर। रात में मा इद्दरू कथा (हम दोनों की कहानी), श्रावण मेघालु जैसी बीच के समय की फ़िल्मों गाने सुनवाए गए।

10:30 से 11 बजे तक जनरंजनि में फ़रमाइशी तेलुगु गानों के बाद 11 से 12 बजे तक प्रसारित होता है तेलुगु कार्यक्रम - हरि विल्लु जैसा कि आप जानते है हरि का अर्थ है ईश्वर। विल्लु का अर्थ है बाण इस तरह इस शीर्षक का अर्थ हुआ ईश्वर का बाण। क्या है ईश्वर का बाण ? हिन्दी में भी तो यही कहा जाता है - इन्द्रधनुष

जैसा नाम है वैसा ही है यह कार्यक्रम विविध रंगों से सजा यानि विविध कार्यक्रम होते है। आमतौर पर कार्यक्रमों की संकेत धुन होती है पर इस कार्यक्रम का शीर्षक गीत है -

आ आ आ आ आ आ ओ ओ
आकाशम लो हरि विल्लु
आनन्दनले पूर्ति ना कोदरिल्लु
अन्दमइना इ लोकम

कोदरिल्लु का अर्थ है थोड़ा सा, अन्दमइना का अर्थ है सुन्दर। गायिका का नाम मुझे पता नहीं। पर छोटा सा मधुर मुखड़ा है जिसे दो बार गाया जाता है।

शुक्रवार को इस कार्यक्रम में संगीतकार के वी महादेवन के संगीत से सजे गीत प्रस्तुत किए गए। इस संगीतकार को इस दिन के लिए चुनने का कारण है कि यह केरल के है। पहले मलयाली फ़िल्मों में संगीत दिया करते थे फ़िर कुछ तमिल फ़िल्मों में संगीत देने के बाद तेलुगु फ़िल्मों में संगीत देने लगे और यहीं बहुत लोकप्रियता मिली। एक घण्टे के इस कार्यक्रम में के वी महादेवन के जीवन और काम के बारे में जानकारी देते हुए उनके लोकप्रिय गीत सुनवाए गए। कुछ फ़िल्में ऐसी थी जो पहले तेलुगु में बनी और बाद में हिन्दी और दोनों ही भाषाओं में हिट रही। मूल रूप से तैयार गीतों में इन्ही का संगीत रहा और अधिकतर गानों की धुनें हिन्दी में लगभग वैसी ही रही। कुछ फ़िल्में है - तेलुगु और हिन्दी में एक ही नाम से बनी - प्रेमनगर (राजेश खन्ना, हेमामिलिनी), तेने मनसु (हिन्दी फ़िल्म - डोली - राजेश खन्ना, बबिता), दसरा बुल्लड़ु (रास्ते प्यार के - शबाना आज़मी, जितेन्द्र, रेखा), श्री श्री मुव्वा (सरगम - ॠषि कपूर, जयाप्रदा)

बुधवार को संगीतकार एल्लयाराजा के स्वरबद्ध किए गीत सुनवाए गए। संगीतकार के जीवन और काम के बारे में जानकारी दी गई। आपके संगीत में सजे कई लोकप्रिय फ़िल्मों के लोकप्रिय गीत है जिनमें से मुख्य है सागर संगमम। दोनों ही दिन कार्यक्रम को प्रस्तुत किया राजगोपाल जी ने।

सोमवार मंगलवार को यह कार्यक्रम छायागीत की तरह प्रस्तुत हुआ। सोमवार को जीवन में आशा और छोटी सी मुस्कान को विषय बना कर फ़िल्मी गीत प्रस्तुत किए गए। ऐसे गीत भी थे जिसमें बालकृष्ण की मोहक मुस्कान भी थी। रोज़ा फ़िल्म का यह गीत भी शामिल था -

चिन्नी चिन्नी आशा मुद्दू मुदू आशा
(चिन्नी का अर्थ है छोटी और मुद्दू का अर्थ है प्यारी)

इसका हिन्दी संस्करण है - दिल है छोटा सा छोटी सी आशा

मंगलवार को विभिन्न समय-बेला के गीत सुनवाए गए जैसे प्राःतकाल की बेला, संध्या बेला, रात्रि बेला आदि। आलेख अच्छा था कहा गया सुबह की बेला सोचने की होती है दोपहर की काम करने की शाम की अनुभव करने की और रात्रि की विश्राम की इसीलिए हर बेला एक जैसी नही होती और भी कई बातें कही गई काव्यात्मक अंदाज़ में - बहुत अच्छा आलेख, प्रस्तुति और गीतों का चुनाव। गुरूवार को विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनवाए गए।

सुहाना सफ़र में दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक सुनवाए जाने वाले विभिन्न संगीतकारों के गीतों में क्रम वही रहा - शुक्रवार को ए आर रहमान, शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, रविवार को स्माइल दरबार, सोमवार को नए दौर के संगीतकारों के नए-नवेले गीतों में नुसरत फ़तह अलि ख़ाँ और बिरजू महाराज के संगीतबद्ध किए गीत सुनना अच्छा लगा, मंगलवार को जतिन-ललित, बुधवार को शिवहरि, गुरूवार को शंकर-एहसान-लाँय के संगीतबद्ध किए गाने बजे।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में गाने सामान्य रहे।

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने और शुक्रवार को ही था ओणम। यह पर्व भी ऐसा है कि इसमें माना जाता है कि भगवान महाबलि धरती पर आकर घर-घर जाकर अपने श्रद्धालुओं से मिलते है इसीलिए इस दिन घर सजाए जाते है। बाहर रंगोली सजाई जाती है, भीतर फूलों, पत्तों से कलात्मक सजावट की जाती है। महिलाएँ सफ़ेद साड़ी छोटी लाल बार्डर की पारम्परिक तरीके से बाँध कर, कलश सजाकर समूह में नृत्य करती है। इसीलिए कम से कम सखि-सहेली में तो शुभकामनाएँ दी ही जा सकती थी।

सोमवार को सखि-सहेली में हिन्दी दिवस की चर्चा हुई। यह बताया गया कि विदेशों में पाठ्यक्रम में हिन्दी शामिल है। सखियों ने कहा कि रविवार को यह कार्यक्रम नहीं होता इसीलिए आज हिन्दी दिवस पर बात हो रही है पर इसी तरह ओणम पर भी बात की जा सकती थी। सोमवार होने के नाते रसोई की बातें हुई। केरल का कोई व्यंजन बता देते पर भुट्टे के राजस्थानी व्यंजन बताए गए। मंगलवार को करिअर मार्ग दर्शन में फिंगरप्रिंट विज्ञान के अध्ययन और इस क्षेत्र में काम की जानकारी दी गई।

शेष दिनों के कार्यक्रम में सामान्य काम की बातें भी होती रही जैसे रक्तदान का महत्व, बिजली की बचत आदि।

शनिवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में लोकप्रिय गीत सुनने को मिले।

इसके बाद नाट्य तरंग में शनिवार और रविवार को दो किस्तों में नाटक सुना - अकेला गुलमोहर।

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारा में पिटारा में सुना रेणु (बंसल) जी द्वार प्रस्तुत कार्यक्रम चूल्हा-चौका जिसमें बेकडिशस यानि सेक कर बनाए जाने व्यंजन बताए गए। इस कार्यक्रम में बड़े रेस्तराओं के पाक विशेषज्ञों को भी बुलाया जाता है। क्या ही अच्छा होता अगर केरल के कुछ व्यंजन बनाना बताया जाता।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस में हिन्दी दिवस का ध्यान रखा गया। वार्ता के अलावा किताबों की दुनिया में व्यंग्यकार प्रकाश जी से कमल जी की बातचीत सुनवाई गई। इसके अलावा खेल जगत से पुरस्कारों की जानकारी दी गई। और जैसा कि उम्मीद की जा रही थी शुरूवात हुई विज्ञान जगत के उस महाप्रयोग से जिससे धरती की शुरूवात का रहस्य खुलने की बात की जा रही है। अच्छी जानकारी दी युनूस जी ने। यही विषय आकाशवाणी के समाचार प्रभाग द्वारा शुरू किए गए नए फोन-इन-कार्यक्रम पब्लिक स्पीक का भी था।

सोमवार को सेहतनामा में डा उर्वशी अरोड़ा से कमल (शर्मा) जी ने रक्तचाप विषय को लेकर बातचीत की। यह बताया गया कि पहले 40 साल के बाद नियमित डाक्टरी जाँच की सलाह दी जाती थी पर अब बेहतर होगा 20-25 साल के बाद से ही नियमित जाँच करवाते रहे क्योंकि युवा वर्ग में भी रक्तचाप की समस्या देखी जा रही है। यह समस्या है भी ऐसी कि इसके लक्षण पहले से दिखाई नहीं देते और पता चलते-चलते देर हो सकती है। अच्छी जानकारी मिली।

हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं के फोनकाल सुने, हल्की-फुल्की बातचीत के साथ उनके पसंदीदा गीत बजते रहे।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में सामन्य गाने रहे।

5:30 से 7 बजे तक क्षेत्रीय कार्यक्रम होता है जिसमें 6 से 7 तक जनरंजनि में तेलुगु फ़िल्मों से फ़रमाइशी गीत सुनवाए जाते है। 5:30 से 6 बजे तक सोमवार से शुक्रवार तक संध्या रागम कार्यक्रम में विभिन्न कार्यक्रम सुनवाए जाते है। पिछले चिट्ठे में मैनें इसकी पहली बार जानकारी दी थी और थोड़ी सी जानकारी ग़लत दे दी गई थी जिनमें से कुछ बातें मैनें बाद में संपादित कर दी थी पर बाद में मुझे लगा की दुबारा संपादन करने के बजाय अगले चिट्ठे में ठीक जानकारी दे देनी चाहिए। पिछले चिट्ठे की इस ग़लती के लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। शुक्रवार को सारेगाम कार्यक्रम प्रसारित होता है जिसमें एक ही संगीतकार के स्वरबद्ध किए गीत सुनवाए जाते है। इस सप्ताह संगीतकार घण्टसाला (जो मुख्यतः गायक है) के संगीतबद्ध किए गाने सुनवाए गए जो पचास और साठ के दशक के लोकप्रिय गीत थे। सोमवार को गलम युगलम कार्यक्रम होता है जिसका अर्थ है एक और अनेक जिसमें इस सप्ताह वाणी जयराम के अन्य कलाकारों के साथ गाए गीत सुनवाए गए। मंगलवार को पद (शब्द) लहरी कार्यक्रम में पद (शब्द) था जाबिली (चन्द्रमा) और ऐसे गीत सुनवाए जाते है जिसके मुखड़े में जाबिली शब्द था। बुधवार को आ पाटा मधुरै (वो गीत मधुर है) शीर्षक से कार्यक्रम होता है जिसमें मधुर गीत सुनवाए गए। गुरूवार को कलम परिमलम में किसी एक गीतकार के गीत सुनवाए जाते है। इस सप्ताह गीतकार श्री श्री गारू के गीत सुनवाए गए। शनिवार और रविवार को हुए प्रायोजित कर्यक्रम।

शनिवार को संगीतकार हिमेश रेशमिया ने विशेष जयमाला प्रस्तुत किया। मुझे तो लगा था कि यह कार्यक्रम नई पीढी के नाम रहेगा पर मैं हैरान हो गई जब उन्होनें स्वस्थ मनोरंजन की बात की और संगीतकार रोशन की चर्चा करते हुए ताजमहल जैसी पुरानी लोकप्रिय फ़िल्म का गीत सुनवाया -

जो वादा किया वो निभाना पढेगा

बात यहीं पर नहीं रूकी, राजकपूर का गीत भी सुना - रामय्या वस्तावय्या (यह तेलुगु भाषा के बोल है जिसका अर्थ है रामय्या आता है क्या ?) साथ में सुना अभिमान का गीत तेरी बिंदिया रे और उनके अपने स्टाइल के गीत भी सुनवाए जैसे मुझसे शादी करोगी। कुल मिलाकर बढिया रहा कार्यक्रम।

रविवार को फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए गए। इस कार्यक्रम के बारे में क्या कहे, अंग्रेज़ी में कहावत है - व्हेन हार्ट स्पीकस इट इज़ इन्डिसेन्ट टू कमेन्ट। शेष दिन नए और बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुनवाए गए भोजपुरी लोकगीत, आवाज़े थी संतराम रागेशी (शायद लिखने में ग़लती हो) और अन्य कलाकारों की। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में विभिन्न कार्यक्रमों पर श्रोताओं ने अपनी पसंद और नापसंद बताई। एक महत्वपूर्ण सूचना दी गई कि स्वर्ण जयन्ति के अवसर पर अब तक हर महीने की 3 तारीख़ को मनाए जाने वाले मासिक पर्व के कार्यक्रम थोड़े से संपादित कर 26 सितम्बर से 2 अक्तूबर तक दोपहर 12 बजे से शाम 5:30 बजे तक दुबारा सुनवाए जाएगे। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में बहुआयामी व्यक्तितत्व गीता बलसारा से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की अगली कड़ी सुनवाई गई जिसमें उनके मीडिया के व्यक्तित्व के अलावा शास्त्रीय संगीत से जुड़ने की बातें हुई। गुरूवार और रविवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में इस सप्ताह भी पुरानी झलकियाँ ही सुनवाई गई। रात 9 बजे गुलदस्ता में मेहदी हसन की गाई ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी जिसे उन्होनें ही संगीत से सजाया था। एकदम पारम्परिक बन्दिश। अन्य ग़ज़लों में आधुनिकपन झलकता रहा।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में अजनबी, मैने प्यार किया जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में संगीतकार नौशाद से अहमद वसी की बातचीत की अगली कड़ी प्रसारित हुई। इसमें कार्यक्रम की परम्परा के अनुसार साथी संगीतकारों की चर्चा हुई।

10 बजे छाया गीत में फूलों की, प्यार की बातें हुई। यहाँ हम एक छोटा सा अनुरोध करना चाहेंगे कि स्वर्ण जयन्ति के इस अवसर पर एक सप्ताह विशेष छायागीत सुनवाइए जिसे वो उदघोषक प्रस्तुत करें जिनकी आवाज़े सुने अर्सा हो गया - बृजभूषण साहनी, राम सिंह पवार, मोना ठाकुर, अनुराधा शर्मा, भारती व्यास, अचला नागर…

Friday, September 12, 2008

साप्ताहिकी 11-09-08

इस सप्ताह में पहला ही दिन विशेष रहा - शिक्षक दिवस

सुबह के प्रसारण में मंगल ध्वनि के बाद क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु में शिक्षक के सम्मान में श्लोक प्रस्तुत किया गया। समाचारों के बाद वन्दनवार की प्रस्तुति गुरू को समर्पित रही जिसमें गुरू रैदास की शिष्या मीरा के भजन के साथ सभी भक्ति अच्छे रहे। इसी भावना को कमल (शर्मा) जी ने त्रिवेणी में भी जारी रखा तथा गुरू और शिक्षा को केन्द्र में रख कर गीत प्रस्तुत किए। गीतों का चुनाव, आलेख, प्रस्तुति सभी सर्वोत्तम विशेषकर रफ़ी के गाए गुरू ब्रह्मा, गुरू विष्णु श्लोक से शुरूवात जो वास्तव में सिकन्दर-ए-आज़म फ़िल्म के देश भक्ति गीत का मुखड़ा है।


सखि-सहेली में भी विशेष आयोजन हुआ। शुक्रवार होने से फोन-इन-कार्यक्रम हैलो सहेली चला पर शुरू में लगभग 10 मिनट और अंत में लगभग 20 मिनट, बीच में लगभग 25 मिनट एक विचार-विमर्श प्रसारित किया गया। विषय था - बच्चों के चरित्र निर्माण में कौन उत्तरदायी, शिक्षक या माता-पिता जिसमें दो प्रधान अध्यापिकाओं ने भाग लिया अनिता साहू और विजयलक्ष्मी सांवेदी। विजयलक्ष्मी जी का संबंध आवासीय विद्यालय (रेसीडेन्शियल स्कूल) से होने से उनकी उपस्थिति अधिक उचित रही। बातचीत का संचालन किया निम्मी (मिश्रा) जी ने। अच्छी बातचीत रही जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि बच्चों के चरित्र निर्माण में माता-पिता का उत्तरदायित्व तो है ही लेकिन शिक्षक की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका है।

रात 9:30 बजे भी एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में शिक्षक दिवस को ध्यान में रख कर तारें ज़मीं पे फ़िल्म के गीत सुनवाए गए।

इस तरह आयोजित विभिन्न विशेष कार्यक्रमों के लिए महेन्द्र मोदी जी को बधाई !

इस सप्ताह वन्दनवार में रमज़ान का भी ध्यान रखा गया। नए भक्ति गीत भी सुनवाए गए। नए दौर के संगीत में भजन ठीक ही रहे और शेष दिन सामान्य रहे भजन। शुरूवात होती रही चिंतन से। समापन में देश भक्ति गीत का विवरण नहीं बताया गया।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में शनिवार को सलिल चौधरी के स्वरबद्ध किए गीत सुनवाए गए जिसमें काबुलीवाला फ़िल्म का बच्चों का गाना सुन कर मज़ा आ गया। यह बहुत ही कम बजता है। सप्ताह भर अच्छे गीत सुनने को मिले कुछ लोकप्रिय और कुछ भूले-बिसरे और समाप्ति पर के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीत जो इस सप्ताह आर सी (रायचन्द) बोराल के सगीत में सजे अधिक थे।

7:30 बजे संगीत सरिता में बातें ग़ज़लों की श्रृंखला समाप्त हुई और नई श्रृंखला शुरू हुई ठुमरी जिसे प्रसिद्ध गायिका रीता गांगुली प्रस्तुत कर रही है। बहुत बड़े कलाकारों को सुन कर आनन्द आया जैसे बड़े ग़ुलाम अलि ख़ाँ साहब, फ़ैय्याज़ अहमद ख़ाँ साहब, सिद्धेश्वरी देवी। दोनों ही श्रृंखलाएँ छाया (गांगुली) जी द्वारा तैयार की गई और पहली बार 1993 में प्रसारित की गई थी। वैसे इन श्रृंखलाओं को फिर से सुनना अच्छा लग रहा है।

इसी संदर्भ में एक दुःखद समाचार यह है कि सोमवार को प्रसिद्ध वायलिन वादक के आर वैद्यराजम का चेन्नई में निधन हो गया। वर्ष 2005 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था पर संगीत-सरिता में श्रृद्धांजलि तो दूर की बात रही निधन की सूचना तक श्रोताओं को नहीं दी गई जबकि अन्य कार्यक्रमों में पार्श्व गायिका आशा भोंसलें का जन्म दिन धूमधाम से मनाया गया। आकाशवाणी के क्षेत्रीय केन्द्र में तो निधन की सूचना तुरन्त मिल जाती होगी, शायद विविध भारती का क्षेत्रीय केन्द्रों से निरन्तर सम्पर्क नहीं हो पाता है।

त्रिवेणी में हुई बातें भोर की, जागरण की, सुख-दुःख की, पंच तत्वों की, गीत और आलेख दोनों अच्छे रहे।

फ़रमाइशी फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम हिन्दी और तेलुगु दोनों ही भाषाओं में सामन्य रहे चाहे मन चाहे गीत हो, आपकी फ़रमाइश हो, जनरंजनि हो या जयमाला। यहाँ तक कि शुक्रवार (शिक्षक दिवस) को भी, न कहीं बच्चे नज़र आए न कहीं टीचर बस प्यार-मुहब्बत के गीत बजते रहे।

10 बजे पांच मिनट के समाचार बुलेटिन के बाद से 10:30 बजे तक और रात में 8:45 से 9 बजे तक क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु कार्यक्रम एक चित्र गानम में शुक्रवार को सुबह नई फ़िल्म के गीत सुनवाए गए और रात में बीच के समय की फ़िल्म पेन्डली कानुका (शादी का उपहार) के गाने सुनवाए गए इस तरह शिक्षक दिवस का ध्यान नहीं रखा गया। सप्ताह भर दिन और रात में अलग-अलग फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए जिसमें अर्थम चेसको (अर्थ समझो) जैसी नई फ़िल्में और भले दंपतिलु जैसी बीच के समय की फ़िल्में शामिल रही।

सुहाना सफ़र में दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक संगीतकारों का क्रम वही रहा - शुक्रवार को ए आर रहमान, शनिवार को आदेश श्रीवास्तव, रविवार को स्माइल दरबार, सोमवार को नए दौर के संगीतकारों के नए-नवेले गीत, मंगलवार को जतिन-ललित, बुधवार को शिवहरि, गुरूवार को शंकर-एहसान-लाँय के संगीतबद्ध किए गाने। नए गाने सुन कर ज्यादा मज़ा नहीं आ रहा। एक ही गाना अच्छा लगा जो आदेश श्रीवास्तव का स्वरबद्ध किया है -

चाँद से परदा कीजिए चुरा न ले चेहरे का नूर

1 बजे म्यूज़िक मसाला में एक गीत सुना -

क्या सूरत है क्या सूरत है क्या सूरत है

जिसे सुन कर किशोर कुमार का पुराना गाना याद आ गया -


ज़रूरत है ज़रूरत है ज़रूरत है
एक श्रीमती की कलावती की

सेवा करे जो पति की

शेष दिन गाने सामान्य रहे।

3 बजे सोमवार को सखि-सहेली में भी आशा भोंसले पर चर्चा हुई और साक्षरता दिवस पर निम्मी (मिश्रा) जी और ममता (सिंह) जी की भाषणबाजी हुई कि महिला साक्षर हो तो परिवार को अच्छा देखती है, अगर पढी-लिखी न हो तो बच्चों के साथ पढ सकती है वग़ैरह वग़ैरह… बुधवार को रेणु (बंसल) जी ने अच्छी जानकारी दी कि जौ और बारली में फ़र्क होता है। अक्सर लोग दोनों को एक ही समझते है। जौ के दानों में छिलका होता है और बारली का छिलका नहीं होता। अंजू ने ठीक बताया, वास्तव में जौ के आटे का लेप त्वचा के लिए वरदान है। शेष दिन कार्यक्रम सामान्य रहे।

शनिवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में शीर्षक की तरह ही गाने रहे।

इसके बाद नाट्य तरंग में यादवेन्द्र शर्मा का लिखा नाटक सुना - अश्वत्थामा हारा जिसका विषय गंभीर रहा पर रविवार को हल्का-फुल्का माहौल रखा गया और जयदेव शर्मा कमल के निर्देशन में हास्य के हल्के छीटें बिखेरता नाटक प्रस्तुत हुआ जो लखनऊ केन्द्र की भेंट थी।

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारा में पिटारा में बाईस्कोप की बातों में बी आर चोपड़ा की साठ के दशक की फ़िल्म गुमराह फ़िल्म की चर्चा सुनी। बहुत सी नई बातें पता चली जैसे साहिर लुधियानवी की लोकप्रिय नज्म -

चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों

साहिर साहब के फ़िल्मों में आने के पहले की लिखी हुई है पर फ़िल्म में देखकर ऐसा लगता है जैसे सिचुएशन के अनुसार लिखी गई है। कमाल है चोपड़ा साहब का ! इतनी अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद लोकेन्द्र (शर्मा) जी।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस में किताबों की दुनिया में व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी से युनूस जी की बातचीत मज़ेदार रही।। आशा भोंसलें के जन्मदिन पर बधाई दी गई और उनकी आर डी बर्मन और गुलज़ार के साथ बातचीत की रिकार्डिंग सुनवाई गई जो शायद संगीत-सरिता की थी। आशा भोंसलें के बारे में अच्छी जानकारी दी गई। बाक़ी खबरें विभिन्न शैक्षणिक कोर्सों में प्रवेश की रही।

सोमवार को सेहतनामा में चिकित्सा की होमियोपेथी पद्धति पर डाँ अनिल गोसाई से बातचीत में अच्छी जानकारी मिली। बुधवार को आज के मेहमान में मेहमान रहे डा कुँवर बैचेन। उनसे कविताएँ सुनना और उनकी पसन्द के फ़िल्मी गाने सुनना अच्छा लगा। बातचीत भी बहुत अच्छी रही। हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं के फोनकाल सुने, हल्की-फुल्की बातचीत के साथ उनके पसंदीदा गीत बजते रहे।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में हिमेश रेशमिया का गाया गीत सुना -

तू मेरे दिल में रहे हमेशा
तू आ ऊ आ ऊ

तू बेख़ुदी तू आशिकी

तू तू आ ऊ आ ऊ

18-20 साल के छोरे-छोरियाँ मस्त नाच सकते है इस गाने पर।

5:30 से 7 बजे तक क्षेत्रीय कार्यक्रम होता है जिसमें 6 से 7 तक जनरंजनि में तेलुगु फ़िल्मों से फ़रमाइशी गीत सुनवाए जाते है। 5:30 से 6 बजे तक सोमवार से शुक्रवार तक संध्या रागम कार्यक्रम होता है - इस शीर्षक के हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। पाँचों दिन अलग-अलग शीर्षक से कार्यक्रम होता है। अधिकांश शीर्षकों के हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता नहीं है। शुक्रवार को प्रसारित होता है कार्यक्रम सारेगम जिसमें एक ही संगीतकार के गाने सुनवाए जाते है, सोमवार को कलम युगम में एक दौर के गीतकारों के लोकप्रिय गीत सुनवाए जाते है। मंगलवार को पद (शब्द) लहरी कार्यक्रम में एक शब्द (पद) लिया जाता है और ऐसे गीत सुनवाए जाते है जिसके मुखड़े में वो शब्द हो। बुधवार को आ पाटा मधुरै शीर्षक से कार्यक्रम होता है जिसका हिन्दी अनुवाद इस तरह है -

आ (वो) पाटा (गीत) मधुरै (मधुर है)

इसमें लोकप्रिय गीत सुनवाए जाते है। गुरूवार को कलम परिमलम में एक गीतकार के गीत सुनवाए जाते है। इस तरह संध्या रागम कार्यक्रम यहाँ बहुत लोकप्रिय है। शनिवार और रविवार को प्रायोजित कर्यक्रम होते है।

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया गायिका जसविन्दर नरूला ने। बहुत स्वाभाविक बात की। गाने भी अच्छे सुनवाए। धन्यवाद शकुन्तला (पंडित) जी इस बढिया कार्यक्रम के लिए।

रविवार को फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए गए। शेष दिन नए और बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुनवाए गए तीनों लोकगीत अलग-अलग थे - राजस्थानी, गढवाली और बुन्देलखण्डी जबकि अब तक तीनों एक ही प्रदेश संस्कृति के लोक गीत सुनवाए जाते थे। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में विभिम्म कार्यक्रमों पर श्रोताओं ने अपनी पसंद और नापसंद बताई। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में बहुआयामी व्यक्तितत्व गीता बलसारा से कमल (शर्मा) जी ने बात की। हमारा अनुरोध है कि इस कार्यक्रम को दुबारा सखि-सहेली में सुनवाया जाए। इस कार्यक्रम के बारे में दोपहर में सुहाना-सफ़र की समाप्ति पर क्षेत्रीय केन्द्र से झरोखा में मज़ेदार जानकारी दी गई। पता नहीं कैसे हुई यह ग़लती या ग़लतफ़हमी, तेलुगु में बताया गया -

इनसे मिलिए कार्यक्रमलो बहुआयामी व्यक्तितत्व कमल शर्मा गारि तो संभाषणा

इसका हिन्दी अनुवाद है - इनसे मिलिए कार्यक्रम में बहुआयामी व्यक्तितत्व कमल शर्मा जी से बातचीत

मज़ा
आया सुन कर। गुरूवार और रविवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में शुक्रवार को सुनी झलकी - आज की ताज़ा ख़बर, शनिवार को रब झूठ न बुलाए पर माहौल बदला बुधवार को राममूर्ति चतुर्वेदी की झलकी आम्र मंजरी सुनकर।

रात 9 बजे गुलदस्ता में सोमवार को जिगर मुरादाबादी की पुण्य तिथि पर उनके लिखे कलाम सुनवाए गए। सभी एक से बढ कर एक रहे, ख़ासकर मखमली आवाज़ में तलत महमूद को सुनना बहुत बढिया लगा। शेष दिन गुलदस्ता सामन्य लगा।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में आनन्द जैसी सत्तर के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में और जोधा अकबर जैसी नई लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे पर कल तीसरी मंज़िल के रफ़ी के गाने सुनकर बहुत मज़ा आया।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में संगीतकार नौशाद से अहमद वसी की बातचीत की अगली कड़ी प्रसारित हुई।

10 बजे छाया गीत में शनिवार को अशोक जी ने अच्छी ग़ज़लें सुनवाई। कल युनूस जी ने ऐसे गीत सुनवाए जो बहुत ही कम सुने जाते है जैसे मन्नाडे का यह गीत -

एक समय पर दो बरसातें

पहले कभी-कभार यह गीत विविध भारती से बजता था पर अब बहुत समय बाद यह गीत सुनने को मिला। अन्य ऐसे गीत सुनवाए गए जो पहले शायद ही सुने गए। बाकी सबका अंदाज़ जाना पहचाना रहा, निम्मी जी भूले बिसरे गानों में ही ख़ुश नज़र आई।

Sunday, September 7, 2008

www.vividhbharti.co.cc, वायू-सेना की शान

आदरणिय श्री महेन्द्र मोदी साहब और श्री युनूसजी,
नीचे मेरे लेपटोप पर मैंनें जो कोशिश की थी विविध भारती की वेब-साईट देख़ने की, उसका प्रिन्ट-स्क्रीन दिया है, जिस से मेरे www.vividhbharti.co.cc टाईप करने पर मिला था । तो आप में से जिनको भी मेरी यह पोस्ट पढ़ने में आये उनसे नम्र बिनती है कि, मेरा अज्ञान दूर करे, अगर समय सुविधा पा सके तो ।



एक और बात की तारीफ़ करना काहता हूँ, कि दूसरे माहवार स्वर्ण जयंति विषेष आयोजनमेँ इस बार भी अल्हाबाद और वाराणसी भले फ़िरसे छाये रहे पर वायू-सेना की शान में भारतीय वायू सेना के अल्हाबाद बेन्ड की श्रीमती कांचन प्रकाश संगीतजी द्वारा कराई गयी पहचानात्मक प्रस्तूती और साथ उस बेन्ड द्वारा प्रस्तूत की गयी धूनों से मैंनें बड़ा लूफ़्त उठाया । इस लिये आप को और विविध भारती के निर्माण दल को ढेर सारी बधाई । मैंनें यह दोनों प्रस्तूतियाँ रेकोर्ड कर ली है ।

उत्तर प्रदेश के लोक संगीत और उस लोक गीतों पर आधारीत फ़िल्मी गीतों की वाराणसी केन्द्र के सहयोग से हुई प्रस्तूती भी बहोत जची ।
आपको बिनती है कि विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती की आने वाली 3 अक्तूबर पर होने वाली अंतीम प्रस्तूती के बाद भी अस्थायी रूपसे ही सही पर इस तराह के आयोजन अन्य भारतीय क्षेत्रों को ले कर भी जारी रख़ेंगे ।
सागरजी से बिनती है कि इस पोस्टमें आप जो भी मात्रा की गलतीयाँ पाये उनसे सुधार दे । और आप उस पर विवेचन भी करें पर सिर्फ़ गलतीयों पर नहीं पर आसानी से समज़ी जाने वाली मेरे द्वारा कही गयी बातों पर भी ।
पियुष महेता ।
सुरत-395001.

www.vividhbharti.co.cc और वायू-सेना की शान

आदरणिय श्री महेन्द्र मोदी साहब और श्री युनूसजी,
नीचे मेरे लेपटोप पर मैंनें जो कोशिश की थी विविध भारती की वेब-साईट देख़ने की, उसका प्रिन्ट-स्क्रीन दिया है, जिस से मेरे www.vividhbharti.co.cc टाईप करने पर मिला था । तो आप में से जिनको भी मेरी यह पोस्ट पढ़ने में आये उनसे नम्र बिनती है कि, मेरा अज्ञान दूर करे, अगर समय सुविधा पा सके तो ।




एक और बात की तारीफ़ करना काहता हूँ, कि दूसरे माहवार स्वर्ण जयंति विषेष आयोजनमेँ इस बार भी अल्हाबाद और वाराणसी भले फ़िरसे छाये रहे पर वायू-सेना की शान में भारतीय वायू सेना के अल्हाबाद बेन्ड की श्रीमती कांचन प्रकाश संगीतजी द्वारा कराई गयी पहचानात्मक प्रस्तूती और साथ उस बेन्ड द्वारा प्रस्तूत की गयी धूनों से मैंनें बड़ा लूफ़्त उठाया । इस लिये आप को और विविध भारती के निर्माण दल को ढेर सारी बधाई ।

उत्तर प्रदेश के लोक संगीत और उस लोक गीतों पर आधारीत फ़िल्मी गीतों की वाराणसी केन्द्र के सहयोग से हुई प्रस्तूती भी बहोत जची ।
आपको बिनती है कि विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती की

Friday, September 5, 2008

साप्ताहिकी 04-09-08

इस सप्ताह दो दिन विशेष रहे, मंगलवार को रमजान के पाक महीने का आगाज़ हुआ और बुधवार, इस दिन गणेश चतुर्थी का त्यौहार था और 3 तारीख़ होने से विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती का मासिक पर्व दिवस।

मंगलवार को रात 7:45 पर बज्म-ए-क़व्वाली में कलंदर आजाद के साथ दूसरे कलाकारों की गैर फिल्मी क़व्वालियाँ सुनवा कर रमजान महीने की शुरूवात और पहले रोजे का माहौल बनाए रखा गया।

बुधवार की सुबह वन्दनवार में गणपति की वन्दना होती रही। त्रिवेणी में भी बुद्धिमत्ता की बातें हुई। 6:30 बजे तेलुगु भक्ति गीतों के कार्यक्रम अर्चना में विनायक स्तुति सुनवाई गई।

गुरूवार की सुबह भी गणेश जी की वन्दना हुई और शेष दिन सामान्य रहे भजन।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में सप्ताह भर लोकप्रिय गीत कुछ अधिक ही सुनाई दिए जिनके साथ भूले-बिसरे गीत बजते रहे और समापन होता रहा के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से।

7:30 बजे संगीत सरिता में प्रसिद्ध पार्श्व और ग़ज़ल गायक भूपेन्द्र सिंह ने ग़ज़ल गायकी को विस्तार से बताया कि ग़ज़ल तैयार करते समय गायक की आवाज़ की उठान का ख़्याल रखा जाता है, उच्चारण पर ध्यान दिया जाता है। यह भी बताया कि कि किसी राग में पूरी तरह ग़ज़ल को बाँधना भी ज़रूरी नहीं है। साथ ही खय्याम, जयदेव, मदन मोहन के सुरों में ग़ज़ल पिरोने के अंदाज़ को समझाया।

त्रिवेणी में अन्य विषयों के साथ जीवन जीने की कला पर भी बातें हुई, इस विषय पर गीत बजे आलेख भी इस अच्छे रहे, विशेषकर गुरूवार को रेणु (बंसल) जी द्वारा प्रस्तुत त्रिवेणी भा गई।

फ़रमाइशी हिन्दी तेलुगु फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम मन चाहे गीत, आपकी फ़रमाइश, जनरंजनि और जयमाला में श्रोता फ़रमाइश भेजते समय गणेश जी को बिल्कुल भी नहीं भूले। बुधवार को जयमाला में फ़ौजी भाइयों ने फ़रमाइश की हम से बढ कर कौन फ़िल्म के इस गीत की -

देवा हो देवा गणपति देवा तुम से बढ कर कौन
और तुम्हारे भक्तजनों में हम से बढ कर कौन

इस गीत के शुरूवात में गणेश वन्दना का श्लोक अच्छा है, गीत भी ठीक ही है सुनने में पर देखने में तो यह गीत सारे चोरों पर फ़िल्माया गया है, ख़ैर… गुरूवार को भी इसी गीत की फ़रमाइश मन चाहे गीत में हुई फिर सखि-सहेली में भी बजा। मन चाहे गीत तो लगभग आधा ग़णपति को समर्पित रहा, वाह ! हमारे श्रोताओं का भी जवाब नहीं। शेष दिन फरमाइशी गीत सामान्य रूप से बजते रहे।

10 से 10:30 बजे तक और रात में 8:45 से 9 बजे तक क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु कार्यक्रम एक चित्र गानम में शुक्रवार को रात में अम्मा माटा और सुबह संबंधी जैसे लोकप्रिय नए पुराने सभी तरह की फ़िल्मों के गीत बजे।

सुहाना सफ़र में दोपहर 12 बजे से बुधवार को स्वर्ण जयन्ती मासिक पर्व के कार्यक्रम में वायु सेना के जवानो से बातचीत उनके गीत और धुनें सुनना अच्छा लगा। हमारा सुझाव है की इन्ही गीतों और धुनों को रोज़ जयमाला के अंत में सलाम इंडिया में सुनवाए जाने वाले फिल्मी गीत के स्थान पर सुनवाया जाए तो ज़्यादा ठीक रहेगा। इसके बाद सुना फिल्मी गीतों में गंगा जिसमे बजने वाले गीत, आलेख और प्रस्तुति सभी अच्छा था। फिर फिल्मो में शुरूवाती दौर के गानों के बारे में जानना मजेदार रहा, खासकर उन पुराने गानों को साथ सुनते हुए। फिर दौर शुरू हुआ लोकगीतों का जिसमे उत्तर प्रदेश की कजरी बरसे बदरिया सावन की सुनी, अच्छा होता अगर किसी और गीत का चुनाव किया जाता क्योंकि इसे बहुत बार सुनते रहे है।

गुरूवार को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का स्थान अब संगीतकार शंकर-एहसान-लाँय ने ले लिया है। इस तरह पूरा सुहाना सफ़र नए गानो से भरपूर हो गया है।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में कभी तो नज़र मिलाओ अलबम से अदनान सामी का संगीतबद्ध किया और आशा भोंसले के साथ गाया गीत नए पुराने गीतों का संगम सा लगा -

प्यार मे न जीना नहीं जीना
मुझसे बिझड़ना कभी ना
तू है सुर मै हूँ तेरी वीणा
मुझसे बिझड़ना कभी ना

शेष गाने सामन्य रहे।

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। उत्तर प्रदेश से अधिक फोनकाल आए और वो भी अधिकतर कम पढी-लिखी महिलाओं के पर गाने नए पसन्द किए गए। यहाँ एक बात मैं कहना चाहूँगी कि जब भी किसी ज़िले या गाँव से फोन आया सभी ने यही कहा कि वहाँ खेती होती है जबकि आजकल कई गाँवों में खेती करना कठिन हो गया है और दूसरे काम जैसे हथकरघा आदि किए जा रहे है। लगता है गाँवों की खेती करने वाली औरतों को ही सखि-सहेली कार्यक्रम बहुत पसन्द है।

सोमवार को कुल्फी की रेसिपी सुनना अजीब लगा। कमलेश (पाठक) जी किसी भी चीज़ की कुल्फी बना ले, बनाने का मुख्य तरीका तो वही होता है, कुछ खास प्रादेशिक पकवान बताइए तो मज़ा आ जाए. शेष दिन कार्यक्रम सामान्य रहे।

शनिवार को सदाबहार नग़मों में गाने हमेशा की तरह अच्छे रहे।

इसके बाद नाट्य तरंग में मूल मराठी नाटक मैं हूँ अपनी देह का स्वामी का भगवानदास वर्मा द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद सुनवाया गया जिसके निर्देशक थे सुशील बैनर्जी। रविवार को इसका समापन भाग प्रसारित हुआ। बहुत संवेदनशील नाटक था।

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारा में पिटारा बहुत-बहुत अच्छा था जिसमें बाईस्कोप की बातों में दक्षिण की प्रतिष्ठिल कंपनी एवीएम प्रोडक्शन्स की जेमिनी के बैनर तले बनी फ़िल्म तीन बहुरानियाँ फ़िल्म की चर्चा सुनी। बहुत पहले इसके गीत रेडियो से बहुत बजा करते थे, गीत भी एक से बढ कर एक थे -

आमदनी अठनी ख़र्चा रूपया
भय्या न पूछो न पूछो हाल
नतीजा ठन-ठन गोपाल

हमरे आँगन बगिया, बगिया में दो पंछी
पंछी उड़ न जाए देखना पंछी उड़ न जाए

मेरी तरफ़ ज़रा देखो तो कन्हैय्या
राधा से बन गई रीता ओ कन्हैय्या
कन्हैय्या ओ कन्हैय्या

बहुत सालों बात यह गाने और फ़िल्म की चर्चा, पृथ्वीराजकपूर की चर्चा सुनना बहुत अच्छा लगा। दिल को सुकून मिला।

रविवार को यूथ एक्सप्रेस में इस सप्ताह हिन्दी फिल्मी गानों की दुनिया भर में लोकप्रियता की बात हुई और ओलंपिक समापन समारोह में ओम शान्ति ओम के संगीत बजाए जाने की जानकारी दी। युनूस जी अगर फरहा खान से आपकी फोन पर बातचीत भी हो जाती तो उसे कार्यक्रम में सुन कर मज़ा आ जाता। बाक़ी खबर अखबारों की रही क्रिकेट जगत से और शायर साहेब के गुज़रने की बातें बताई गई।

सोमवार को सेहतनामा में पोषण सप्ताह पर आहार विशेषज्ञ एकता जागीरदार से रेणु (बंसल) जी की बातचीत सामान्य आहार और पोषण मूल्यों पर अच्छी जानकारी दे गई। हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं से फोन पर बातचीत होती रही और उनके पसंदीदा गीत बजते रहे।

5 बजे नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में आने वाली फिल्मो के गीतों के साथ बीडी जलाए ले भी सुनना अच्छा लगा।

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया संगीतकार शांतनु मोइत्रा ने और सचिन देव बर्मन के गाए गीतों से लेकर नई फ़िल्म परिणीता तक के गाने सुनवाए और बातें भी अच्छी बताई जिसके लिए हम धन्यवाद देगे महेंद्र मोदी जी को जिनकी सहमति के बिना इतना बढिया कार्यक्रम श्रोताओं तक नही पहुँच पाता। रविवार को फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए गए। शेष दिन नए और बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुने बंगला गीत। कलाकार थे अरूँधती चौधरी, ब्रह्मचारी। सभी गीत बहुत मीठे लगे एकदम रोशुगुल्ला (रसगुल्ला) की तरह। इस बार दोनों ही दिन शनिवार और सोमवार को पत्रावली में बहुत संतुलन था वरना कभी-कभी बहुत ज्यादा तारीफ़ सुन कर ऊब होने लगती थी। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में कोटा राजस्थान के किसी गायक से रेणु जी ने बात की, इतना जाना-पहचाना कलाकार तो यह नहीं लगा। गुरूवार और रविवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने। पहली बार जाना कि बाबूजी-बाबूजी गम-गम किशीकि-किशीकि कम-कम जैसा गाना भी किसी राग पर आधारित होता है, देशराग पर आधारित है यह गीत, यह जानकारी इसी कार्यक्रम से मिली।

8 बजे हवामहल में शनिवार को राजेन्द्र तिवारी की लिखी और विनोद रस्तोगी द्वारा प्रस्तुत झलकी सुनी - इलाज हर मर्ज का। के पी सक्सेना की झलकी सुनी - देशी चने विलायती दांत जिसे सुन कर हवामहल पेंट के विज्ञापन की तर्ज पर सदाबहार प्रमाणित हो जाता है जहाँ यह कहा जाता है -

लगता है (बालो में) रंग लगाने का वक्त आ गया है
रंग लगाने का ? पर बंगला तो अभी भी चमकरिया है
हौ अभी भी चमक रहा है

रात 9 बजे गुलदस्ता में एक गीत बहुत बढिया लगा -

मेरी सतरंगी ओढनी का

एक-एक रंग निराला

वैसे गीत कुछ कम ही सुनने को मिलते है। ग़ज़ले ज्यादा सुनवाई जाती है।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में ओम शान्ति ओम, विरोध जैसी नई लोकप्रिय फ़िल्मों के गीतों का इस सप्ताह बोलबाला रहा।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में संगीतकार नौशाद से अहमद वसी की बातचीत एक और चरण आगे बढी।

10 बजे छाया गीत में कभी रात को शीर्षक बनाया गया तो कभी पंछी को। नए गानों से भी पूरे कार्यक्रम को सजाया गया पर हमें तो पूरे सप्ताह में सबसे अच्छा यह गीत लगा -

पंछी रे ओ पंछी उड़ जा रे ओ पंछी

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