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Friday, October 31, 2008

साप्ताहिकी 30-10-08

यह सप्ताह दीपावली का सप्ताह था।

रोज़ सवेरे 6 बजे समाचार के बाद चिंतन से प्रसारण की शुरूवात हुई जिसमें गुणों के बारे में चाणक्य नीति, विभिन्न विद्वानों के विचार बताए गए। दीपावली के दिन विदेशी चिंतक के विचार बताए गए जो अवसर के अनुरूप भी नहीं थे जबकि अवसर के अनुसार कोई नीतिगत बात बताई जानी चाहिए थी क्योंकि यह प्रसारण की शुरूवात होती है। वैसे क्षेत्रीय केन्द्र ने इसका पूरा ध्यान रखा और वन्देमातरम के बाद तमसो मा ज्योतिर्गमय, यह पूरा श्लोक कहने के बाद मंगलध्वनि सुनवाई।

वन्दनवार में भी सामान्य भजन बजते रहे जबकि इस दिन तेलुगु भक्ति गीतों के कार्यक्रम अर्चना में लक्ष्मी स्तुति सुनवाई गई। अंत में बजने वाले देशगान में शुक्रवार को सुनवाया गया देशगान मैनें पहली बार सुना शायद यह गीत नया है -

कदम कदम बढाते चलो
भारत के गीत गाते चलो

शायद बोल लिखने में ग़लती हो। इस गीत का विवरण नहीं बताया गया।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में इस सप्ताह भी कुछ ऐसे गायकों के गीत सुनवाए गए जिनसे श्रोताओं का अधिक परिचय नहीं है। बहुत दिन बाद पहाड़ी सान्याल का गीत सुनना अच्छा लगा। इसके अलावा कुछ लोकप्रिय गीत भी सुनवाए गए। सबसे अच्छा लगा दीपावली के दिन कार्यक्रम की समाप्ति खेमचन्द प्रकाश के स्वरबद्ध किए, तानसेन फ़िल्म के कुन्दनलाल सहगल के इस गीत से करना -

दिया जलाओ जगमग जगमग

7:30 बजे संगीत सरिता में गायिकी अंग का गिटार श्रृंखला समाप्त हुई। यह श्रृंखला कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने प्रस्तुत की जिसमें गायक और गिटार वादक दीपक क्षीरसागर ने अच्छी जानकारी दी जैसे - गीत और तार से बना है गिटार, इसमें मुख्य तीन तार होते है शेष तार गायक अपने अंदाज से बढाते है, इसी तरह गिटार की लम्बाई भी सवा दो से ढाई फुट होती है पर कलाकार अपने अनुसार कुछ बढा लेते है, इसमें प्रयुक्त होने वाली लकड़ी, विभिन्न तारों के सुरों को बजा कर भी बताया गया। विभिन्न रागों पर गतें, बन्दिशें प्रस्तुत की गई, सह कलाकार थे सूर्याक्ष देशपाण्डे। फ़िल्मी धुनें भी बजी और यह फ़िल्मी गीत भी सुनवाए गए जैसे महबूबा फ़िल्म का यह गीत -

मेरे नैना सावन भादों फिर भी मेरा मन प्यासा

यह भी बताया कि बाबरनामा में भी गिटार की चर्चा है इस तरह शोध के आधार पर यह पता चलता है कि भारत से गिटार वाद्य विदेशों में गया और वहाँ से परिवर्तित होकर फिर से हमारे देश में एक नए रूप में आया। गिटार के जिस नए रूप की यानि स्पैनिश गिटार की चर्चा की गई है तो इससे संबंधित एक फ़िल्मी गीत मुझे याद आ रहा है, वैसे तो गिटार के कई गीत है पर यह गीत ख़ास है जो फ़िल्म जोशीला का है जिसे किशोर कुमार ने गाया है और जिसे देवआनन्द पर फ़िल्माया गया है -

मैं आया हूँ लेके साज़ हाथों


इसकी ख़ास बात यह है कि आरंभ में गिटार पर संगीत सामान्य से कुछ लम्बा है पर सुनने में बहुत अच्छा है। इसकी चर्चा युनूस जी ने अपने ब्लोग रेडियोवाणी या इसी ब्लोग में कुछ महीने पहले ही की थी और यह धुन भी विविध भारती पर सुनवाई थी पर किस कार्यक्रम में, यह मुझे याद नहीं आ रहा है। अगर यह पूरा गीत, गिटार की लम्बी आरंभिक धुन के साथ आधुनिक गिटार की चर्चा करते हुए सुनवा दिया जाता तो कार्यक्रम और भी अच्छा हो जाता।

7:45 पर त्रिवेणी में शुक्रवार को कमल (शर्मा) जी ने लीक से कुछ हट कर विषय उठाया। आमतौर पर बातें होती है आदर्शवाद की पर इस दिन ठोस व्यावहारिक धरातल पर मिलावट का मुद्दा उठाया जिसमें सुनवाया गया एक गीत बहुत ही क्म सुनवाया जाता है, मिर्च में पिसी ईंट, मिठाई में ब्लाटिंग पेपर, चावल में कंकर मिलाए जाने का गीत मैनें तो पहली ही बार सुना। त्रिवेणी में नारी पर भी चर्चा हुई और दीपावली के दिन भी इधर-उधर की बातें ही होती रही।

दोपहर 12 बजे का समय है एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम का। हर दिन कार्यक्रम के अंत में अगले दिन के लिए फ़िल्मों के नाम बता दिए गए और हर दिन शुरूवात में ही उस दिन की फ़िल्मों के नाम बता दिए गए। 12 से 1 बजे के दौरान श्रोता एस एम एस करते रहे और बताई गई फ़िल्मों में से किसी गाने की फ़रमाइश करते रहे। पहला संदेश आने तक पहला गीत उदघोषक की पसन्द का बजता रहा बाद में इस पहले गीत के लिए संदेश भी आते रहे।

शुक्रवार को ओंकारा, टशन, बंटी और बबली, विवाह, आशिक बनाया आपने, अक्सर जैसी नई लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आईं निम्मी (मिश्रा) जी। शनिवार को झूम बराबर झूम, धूम, आपका सुरूर, ग़दर एक प्रेम कथा, लगान जैसी आजकल की और नब्बे के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आए राजेन्द्र (जोशी) जी। रविवार को जानी मेरा नाम, यादों की बारात जैसी सत्तर के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आए कमल (शर्मा) जी पर यह कार्यक्रम हम 12:30 बजे से सुन पाए क्योंकि 12 बजे से क्षेत्रीय केन्द्र से तेलुगु में स्वास्थ्य संबंधी प्रायोजित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जिसमें बच्चों के स्वास्थ्य की चर्चा की गई।


सोमवार को आए युनूस जी और लाए अस्सी के दशक से अब तक की फ़िल्मों में से चुनी हुई फ़िल्में जैसे बातों बातों में, विवाह, हीरो, सिंह इज़ किंग, जब वी मेट। मंगलवार को आए राजेन्द्र (जोशी) जी, फ़िल्में रही सागर, धर्मात्मा, करण अर्जुन, सड़क जैसी सत्तर अस्सी के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में। बुधवार को आए राजेन्द्र (जोशी) जी और फ़िल्में रही दोस्ती, सोलहवाँ साल, ब्लफ़ मास्टर जैसी साठ के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को पधारीं शहनाज़ (अख़्तरी) जी और फ़िल्में रही साठ के दशक से अब तक की जैसे लव इन टोकियो, संघर्ष, हमसाया, हमराज़, निकाह, ज़हर, ओंकारा जैसी लोकप्रिय फ़िल्में।
इस तरह हर दिन ऐसी लोकप्रिय फ़िल्में चुनी गई जिसके लगभग सभी गीत लोकप्रिय रहे जिनमें से बहुत ही लोकप्रिय गीतों की फ़रमाइश आई -

ओ मेरे राजा ख़फ़ा न होना देर से आई दूर से आई
मजबूरी थी लेकिन मैनें वादा तो निभाया (जानी मेरा नाम)

है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आएगा (सोलहवाँ साल)

और कुछ ऐसी फ़िल्में भी चुनी गई जिनके गीत बहुत लम्बे समय से नहीं बजे जैसे -

वो हसीं दर्द दे दो जिसे मैं गले लगा लूँ (हमसाया)

हर गाने के लिए संदेश भेजने वालों के नाम और शहर का नाम बताया जाता रहा। इस कार्यक्रम को विजय दीपक (छिब्बर) जी प्रस्तुत कर रहे है।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में ज़ोहेब हसन, अदनान सामी, अल्ताफ़ राजा, की आवाज़ में बुमबुम, जूनून, दिल के टुकड़े हज़ार हुए एलबम से गीत सुनवाए गए। कैट वाक एलबम से अनामिका का गाया यह गीत अच्छा लगा -

चोरी-चोरी
किया ये दिल मेरा चोरी-चोरी
जहाँ वाले कहे ये क्या हुआ गोरी

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में इस सप्ताह भी हर दिन मिले-जुले लोकप्रिय गाने सुनवाए गए जैसे साठ के दशक की फ़िल्म से यह गीत -

मस्त बहारों का मैं आशिक (फ़र्ज़)

नई फ़िल्म पार्टनर से यह गीत -

दुपट्टा तेरा नौ रंग दा

इस तरह हर दिन सभी श्रोताओं को पूरे कार्यक्रम का आनन्द मिल सका।


3 बजे शुक्रवार को क्षेत्रीय केन्द्र द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम सुनवाया गया - कोशिश सुनहरे कल की, यह कार्यक्रम पर्यावरण के प्रति जागरूकता के लिए तैयार किया गया। इस कार्यक्रम में पर्यावरण के लिए किए जा रहे कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। एक रोचक घटना को नाटक के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसमें स्कूल का एक लड़का पर्यावरण रक्षा के लिए जामुन के पेड़ को अपना बड़ा भाई मानता है। पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्यक बात भी बताई गई जैसे पेड़ों की झड़ने वाली पत्तियों को जलाने के बजाय मिट्टी में दबा दिया जाए जिससे खाद बनेगी। फोन पर एक लड़के से बात कर यह निष्कर्ष बताया गया कि सड़क पर वाहन सीएनजी से चलने चाहिए। चंबल नदी जहाँ यमुना से मिलती है वहाँ घड़ियाल प्रदुषण से मृत पाए गए, इस समाचार को सुनाकर संदेश दिया गया। बीच-बीच में संबंधित नए फ़िल्मी गीत भी सुनवाए गए।

शनिवार को यही कार्यक्रम तेलुगु में सुनवाया गया।

3:30 से शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम रिले किया गया। फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। पश्चिम बंगाल से जिस सखि ने फोन किया उसने वहाँ के पर्यटन स्थलों की हल्की जानकारी दी, शिक्षित सखियों के भी फोन आए, गाने नए पुराने बजते रहे।

सखि-सहेली में अन्य दिनों में दीपावली की भय्या दूज की बातें हुई। इन त्यौहारों को मनाए जाने की जानकारी भी दी गई और संबंधित गाने सुनवाए गए।


शनिवार और रविवार को नाट्य तरंग में सुना जगदीश चन्द्र के उपन्यास कभी न छोड़े खेत का रेडियो नाट्य रूपान्तर जिसका जगदम्बा प्रसाद ने अनुवाद किया है। यह नीलोवाली और नम्बरदारों के गुट संघर्ष की कहानी है जिसके माध्यम से दो गुटों को आपस में लड़ा कर उनकी शक्ति कम करने की बात कही गई है।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस में किताबों की दुनिया में साहिर लुधियानवी को श्रृद्धांजलि दी गई। लाइट हाउज़ स्तम्भ में सफल युवा की श्रेणी में सचिन तेंदुलकर के करिअर के संबंध में जानकारी दी गई। समझ में नहीं आया कि क्या इसको शामिल करना ठीक था क्योंकि यह तो सभी अख़बारों में मिलने वाला समाचार है जिसे युवा आवश्यक होने पर अख़बार की कतरन निकाल कर रख सकते है उसी जानकारी को रेडियो से बताने के बजाय कोई और जानकारी दी जा सकती है। हमेशा की तरह इस बार भी विज्ञान, प्रबन्धन, सूचना प्रौद्यौगिकी के विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना दी गई।
4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारे में पिटारा में प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम बाईस्कोप की बातें जिसमें बी आर चोपड़ा की फ़िल्म गुमराह की चर्चा हुई। यह कार्यक्रम पिछले महीने ही प्रसारित हुआ था, इस तरह बहुत जल्द दुबारा प्रसारण किया गया।


सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में डा पवार से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत प्रसारित हुई। बुधवार को आज के मेहमान में अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी से अजय शेखर जी की बातचीत सुनवाई गई। उनके करिअर तथा जीवन के बारे में जानकारी मिली। हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं से फोन पर हल्की-फुल्की बातचीत होती रही और उनके पसंदीदा नए पुराने गीत बजते रहे।


5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में अधिकतर ऐसे गीत सुनने को मिले जिसकी धुन गिटार पर थी, इस तरह अधिकांश गाने एक जैसे लगे।

7 बजे जयमाला में रोज़ फ़ौजी भाइयों के फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए जिसमें नए गाने ज्यादा थे जैसे - क्रेज़ी किया रे और कुछ पुराने लोकप्रिय गीत भी सुनवाए गए जैसे कारवाँ फ़िल्म का गीत -

पिया तू अब तू आजा

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया अभिनेता गुलशन ग्रोवर ने। अपने सथियों के बारे में एक-एक कर बताया जैसे गोविन्दा, अनिल कपूर, जैकी श्रोफ़ आदि और इसी से संबंधित लोकप्रिय गीत सुनवाए, इस तरह बिना कहे भी खुद उनके बारे में जानकारी मिल गई।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में उड़िया, पंजाबी गीत सुनवाए गए, इस तरह अलग-अलग क्षेत्रों से एक-एक गीत आजकल सुनवाए जाते है। पत्रावली में शनिवार और सोमवार को पढे गए पत्रों में विभिन्न कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। एक पत्र तो पाकिस्तान से आया था, एक महिला श्रोता ने भेजा जिन्हें विभिन्न देशों के रेडियो कार्यक्रम सुनने का शौक है। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनी, पहली क़व्वाली सुनी युसूफ आज़ाद और साथियों की गाई -

सीने में रहने दो होठों पे न लाओ
होठों पे आ गया तो राज़ खुल जाएगा

बोल और धुन दोनों ही लेकर साठ के दशक की फ़िल्म शिकार में आशा भोंसले और सथियों का यह गीत रखा गया जो बहुत ही लोकप्रिय हुआ और तारीफ़ हुई गीतकार और संगीतकार की -

परदे में रहने दो परदा न उठाओं
परदा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा

वाकई ऐसे भेद विविध भारती से ही खुलते है।

बुधवार के इनसे मिलिए कार्यक्रम में महाराष्ट्र परिवहन सेवा से महिला बस कंडक्टर छाया रविन्द्र से राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने बातचीत की। लगता है यह कार्यक्रम पहले भी प्रसारित हुआ था, लेकिन ऐसे कार्यक्रम दुबारा सुनना भी अच्छा लगता है। अब तो हैदराबाद में भी महिला कंडक्टर बहुत हो गए है और भीड़ भरी बस में भी अच्छा नियंत्रण रखते है। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में दीपावली को सोमनाथ नागर की लिखी और सत्येन्द्र शरत की निर्देशित झलकी प्रस्तुत की गई दीवाली की रात। इसके अलावा शेष दिनों में सुनी झलकी हवालात में एक रात जिसके निर्देशक है अज़िमुद्दीन, कल के दुश्मन, रचना विनोद वर्मा की और निर्देशक विजय दीपक छिब्बर, सोमवार को अनिता निगम की लिखी निर्देशिका चन्द्रप्रभा भटनागर की झलकी सुनी फोकट चन्द जिसे क्षेत्रीय केन्द्र से झरोका में फोकस चाँद कहा गया। हवामहल की झलकियों से तो मनोरंजन हुआ ही साथ ही उसकी उदघोषणा से भी मनोरंजन हुआ।

रात 9 बजे गुलदस्ता में एक बार फिर सुना गीत - हाय मेरे अल्ला, चाँदी का छल्ला, इसके अलावा ग़ज़लें सुनी छाया गांगुली, जगजीत सिंह, भूपेन्द्र-मिताली, चित्रा सिंह से, कतिल शिफ़ाई के साथ नए पुराने शायरों के कलाम सुने।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में झुमरू, लीडर, आरती, लव इन टोकियो, अनुराग, दिल है कि मानता नहीं, इस तरह पचास के दशक से अस्सी के दशक तक हर दशक की लोकप्रिय फ़िल्म के गीत सुने।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में संगीतकार नौशाद से अहमद वसी की बातचीत की अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। इस समापन कड़ी में कोहिनूर और गंगा जमुना के इन सदाबहार गीतों की चर्चा अच्छी लगी -

मधुबन मे राधिका नाचे रे
नैन लड़ गई रे

समापन किया अपनी पत्नी के निधन के समाचार से। इस तरह व्यक्तिगत जीवन के साथ गीत और संगीत की और ख़ासकर के एल सहगल जैसे कलाकारों की चर्चा चली। धन्यवाद कमल (शर्मा) जी इस शानदार प्रस्तुति के लिए।

10 बजे छाया गीत में दीपावली की रात, अमावस की रात निम्मी (मिश्रा) जी ने की चाँद की बातें और सुनवाने शुरू कर दिए भूले-बिसरे गीत।

Friday, October 24, 2008

साप्ताहिकी 23-10-08

आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ !

रोज़ सवेरे 6 बजे समाचार के बाद चिंतन से प्रसारण की शुरूवात हुई जिसमें विभिन्न विद्वान जैसे शेख़ काज़ी का कथन क्षमा करने और उदार बनने, प्रेमचन्द के विचार परोपकारी बनने के, एकता संबंधी लोकमान्य तिलक के विचार, विदेशी चिंतक स्मिथ के विचार बताए गए। वन्दनवार में लोकप्रिय भजन सुनवाए गए जैसे -

नाथ मोहे अबकी बेर उबारो

अंत में बजने वाले देशगान में सोमवार को सुनवाया गया देशगान नया था या फिर बहुत कम सुनवाया जाता है, लेकिन इसका विवरण भी नहीं बताया गया।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में मंगलवार को एक गीत सुना जो न्यू थियेटर की फ़िल्म माई सिस्टर से था जिसके संगीतकार पंकज मलिक और गीतकार पंडित भूषण है। यह सभी नाम जाने पहचाने है और इस फ़िल्म का के एल सहगल का गीत तो हम सुनते ही रहते है पर इस दिन जो गीत सुनवाया गया उसकी गायिका है रेखा। मैनें भी पहली बार सुना और शायद आपमें से भी बहुतों को इसकी जानकारी नहीं होगी कि रेखा नाम की कोई गायिका भी है और वो भी के एल सहगल के समय की, गीत है -

आग लगे संसार में जिसमें सच्चा प्यार नहीं

यह गीत सुनने में बिल्कुल वैसा ही लगा जैसा पुराने दौर की गायिकाओं के गीत होते है। ऐसे ही गीतों से इस कार्यक्रम की सार्थकता है। हम नहीं जानते इस कार्यक्रम के अधिकारी का नाम, हम उन्हें धन्यवाद देते है।

हर दिन कार्यक्रम की समाप्ति परम्परा के अनुसार के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में हिन्दुस्तानी और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक जैसे रागों की श्रृंखला रविवार को राग हंस ध्वनि की चर्चा से समाप्त हुई और सोमवार से शुरू हुई नई श्रृंखला - गायिकी अंग का गिटार जिसमें बातचीत की जा रही है गायक और गिटार वादक दीपक क्षीरसागर से। यह श्रृंखला कांचन (प्रकाश संगीत) जी द्वारा प्रस्तुत की जा रही है। चर्चा में अधिकतर पुराने गीत रहे -

पूछो न कैसे मैनें रैन बिताई (मेरी सूरत तेरी आँखें)
ओ बसन्ती (जिस देश में गंगा बहती है)

यह भी बताया गया कि नए रूप का गले में लटकाया जाने वाला गिटार शास्त्रीय संगीत के इस वाद्य से कुछ अलग है जिसे स्पैनिश गिटार कहते है।

7:45 पर शनिवार को प्रसारित त्रिवेणी में पर्यावरण की बातें विशेषकर जीव-जन्तुओं के संरक्षण की बात कही गई। मंगलवार को जीवन की भाग-दौड़ से हट कर कभी-कभी प्रकृति का आनन्द लेने की बात कही गई। एक अनुरोध है कि कृपया इन दोनों अंकों को दुबारा प्रसारित न करें क्योंकि इतने छोटे से कार्यक्रम का जैसा का तैसा दुबारा प्रसारण सुनने से कार्यक्रम का आकर्षण कम हो जाता है जैसा कि रविवार और सोमवार को प्रसारित त्रिवेणी अच्छी होते हुए भी पहली बार के प्रसारण की तरह आकर्षक नहीं रही। हाँ इसी विषय को लेकर अलग-अलग तरह से त्रिवेणी के कई अंक बनाए जा सकते है जो आकर्षक रहेगें।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने, कार्यक्रम की शुरूवात में ही उस दिन की लोकप्रिय 12 फ़िल्मों के नाम बता दिए जाते है। श्रोताओं को 12 से 1 बजे के दौरान ही एस एम एस करना होता है और इन्हीं फ़िल्मों में से किसी गाने की फ़रमाइश करनी होती है। पहला संदेश आने तक एकाध मिनट का समय तो लगता ही है इसीलिए पहला गीत उदघोषक की पसन्द का बजता रहा, यह बात और है कि पहले गीत के लिए संदेश भी आते रहे।

शुक्रवार को उदघोषक थे राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी, सभी नई फ़िल्में थी जैसे परिणीता, दिल का रिश्ता, बरसात, यस बाँस जैसी लोकप्रिय 12 फ़िल्में।

शनिवार को मंजू (द्विवेदी) जी, फ़िल्में रही संबंध, कोरा काग़ज़, अपराध, एक बार मुस्कुरा दो जैसी साठ सत्तर के दशक की लोकप्रिय 12 फ़िल्में।

रविवार को कमल (शर्मा) जी, फ़िल्में रही यह रात फिर न आएगी, पत्थर के सनम, माया, दिल तेरा दीवाना जैसी पचास साठ के दशक की लोकप्रिय 12 फ़िल्में।

सोमवार को आए युनूस जी और लाए अस्सी के दशक से अब तक की लोकप्रिय फ़िल्मों में से चुनी हुई 12 फ़िल्में जैसे लव स्टोरी, कुर्बानी, हम आपके है कौन, कभी अलविदा न कहना, राज़, ओम शान्ति ओम।

मंगलवार को आए राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी, फ़िल्में रही चलते-चलते, ताल, ज़हर, बाज़ीगर, वास्तव, जैसी नई 12 लोकप्रिय फ़िल्में।

बुधवार को आए अशोक (सोनावणे) जी और फ़िल्में रही वारिस, दिल, साजन, तेज़ाब, मि इंडिया, चांदनी जैसी सत्तर अस्सी के दशक की लोकप्रिय 12 फ़िल्में।

गुरूवार को पधारीं रेणु (बंसल) जी और फ़िल्में किसी समय सीमा में बँधी नहीं थी जैसे पचास के दशक की ये रास्ते है प्यार के, फिर वही दिल लाया हूँ, साठ के दशक की जब प्यार किसी से होता है, सत्तर के दशक की हीरा पन्ना, शंकर हुसैन, कभी-कभी और नई फ़िल्में जब वी मेट, वीर ज़ारा जैसी लोकप्रिय 12 फ़िल्में।

इस तरह हर दिन ऐसी लोकप्रिय फ़िल्में चुनी गई जिसके लगभग सभी गीत लोकप्रिय रहे जिनमें से कुछ ऐसे गीतों की फ़रमाइश आई जिन्हें अक्सर सुनवाया जाता है जैसे -

दीदी तेरा देवर दीवाना (हम आपके है कौन)

और कुछ ऐसी फ़िल्में भी चुनी गई जिनके गीत बहुत लम्बे समय से नहीं बजे जैसे -

रूप तेरा ऐसा दर्पण मे न समाए (एक बार मुस्कुरा दो)

हर गाने के लिए संदेश भेजने वालों के नाम और शहर का नाम बताया जाता रहा। युनूस जी जब नाम बताते है तब पार्श्व में संगीत बजता है - नाम… नाम… नाम… नाम… नाम… हर दिन कार्यक्रम के अंत में अगले दिन की 12 फ़िल्मों के नाम बता दिए जाते है। इस कार्यक्रम को विजय दीपक (छिब्बर) जी प्रस्तुत कर रहे है।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में सलमा आग़ा की आवाज़ में हुस्न एलबम से यह गाना सुन कर -

याद कोई आ रहा है क्या करूँ

निकाह फ़िल्म का गीत याद गया - समाँ भी है जवाँ जवाँ

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में सप्ताह भर मिले-जुले गाने सुनवाए गए जैसे साठ के दशक की फ़िल्म हसीना मान जाएगी, अस्सी के दशक की फ़िल्म अँखियों के झरोखों से फ़िल्म का शीर्षक गीत, नई फ़िल्म बार्डर का गीत पर डोली फ़िल्म के इस गीत को लम्बे अर्से बाद सुनना अच्छा लगा -

आज मैं देखूँ जिधर जिधर
न जाने क्यों उधर उधर
मुझे दो दो चाँद नज़र आए
मेहताब दर मेहताब

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। इस दिन करवा चौथ थी और उत्तर प्रदेश के गाँव से एक सखि ने फोन किया और इस अवसर के लिए गीत की फ़रमाइश की। बैंग्लौर के गाँव से भी फोन आए। एम बी ए पढने वाली और एक अच्छी नौकरी की तमन्ना रखने वाली सखि ने भी फोन किया। इस तरह यह कार्यक्रम अलग-अलग स्तर की महिलाओं का एक मंच लगा। अच्छे लगते है ऐसे कार्यक्रम।

सोमवार को रसोई में त्यौहार व्रत का मौसम होने से सिंघाड़े के आटे में मूँगफली के दानों से नमकीन और मखाने की चटनी बनाना बताया गया। मंगलवार को किसी क्षेत्र में करिअर बनाने संबंधी दी जाने वाली जानकारी में जल सेना में तट रक्षक बनने के लिए जानकारी दी गई। बुधवार को बालों की देखभाल के घरेलू उपाय बताए गए जैसे नारियल, नीम, मीठा नीम (करी पत्ता) के मिश्रण को बालों में लगा कर कुछ देर बाद धोना आदि। गुरूवार को मदर टेरेसा के व्यक्तित्व और उनके काम तथा उनकी संस्थानों के बारे में बताया गया।

इसके अलावा सामान्य जानकारी में मिट्टी के बर्तन बनाने, धान की बालियों के गहनें जैसी लोक कलाओं की जानकारी दी गई। वैसे तो हर दिन अच्छे ही गीतों की फ़रमाइश आती है पर बुधवार को फ़रमाइशी गीतों में से बहुत अच्छे गीत चुने गए जिनमें से कुछ तो बहुत दिन बाद सुनने को मिले, इसके लिए धन्यवाद कमलेश (पाठक) जी।

शनिवार रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में हमेशा की तरह लोकप्रिय फ़िल्मों के लोकप्रिय गीत सुनवाए गए जैसे नया दौर, आई मिलन की बेला

इसके बाद नाट्य तरंग में शनिवार और रविवार को सुना नाटक ढाई आख़र जिसकी निर्देशिका थी लता गुप्ता। कबीर साहब और उनके वर्ग संघर्ष का यह नाटक अच्छा लगा।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस में युनूस जी युवा श्रोताओं को खेल-कूद में अपना करिअर बना सकने की सलाह देते रहे।

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारे में पिटारा में प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम सोलह श्रृंगार जिसमें नाख़ुनों की देखभाल पर चर्चा हुई। आमंत्रित थे त्वचा रोग विशेषज्ञ डा रेखा सेठ और नाख़ूनों से कलाकारी दिखाने वाले पुनीत सेन। बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। नाख़ूनों की देखभाल और पोषक तत्वों की कमी की नाख़ूनों से पहचान पर विस्तार से बात हुई और संरक्षण के उपाय भी बताए गए। ख़ास तरह के आर्ट पेपर पर नाख़ूनों से लिखने की कलाकारी से हम परिचित है। कालेज के दिनों में एक वरिष्ठ छात्र की इस कलाकारी को हमने बहुत देखा है। अच्छी लगी यह बातचीत भी। यह कार्यक्रम पुराना था जिसका दुबारा प्रसारण किया गया।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में विटामिन पर विस्तार से चर्चा हुई। आमंत्रित थे डा एस जी मूर्ति और आपसे रेणु (बंसल) जी ने बातचीत की। बहुत अच्छी जानकारी मिली कि विटामिन शरीर में बहुत ही कम बनते है और इसे बाहर से यानि भोजन से ही लेना पड़ता है। विभिन्न विटामिनों के बारे में अच्छी जानकारी मिली जिससे हम अपने खान-पान का स्तर तय कर सकेंगें।

बुधवार को आज के मेहमान में वायु सेना में स्टेशन कमांडेंट अनिल तिवारी से बातचीत की कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने। विंग कमाडिंग किस तरह से अलग है, प्रशिक्षण आदि के बारे में और उनके करिअर तथा जीवन के बारे में जानकारी मिली।

हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को अधिकतर ऐसे श्रोताओं के फोनकाल आए जो या तो पढ रहे है या खेती और किसी लघु उद्योग में लगे है। हालांकि आजकल मोबाइल पर विविध भारती आसानी से सुना जाता है और फोन-इन-कार्यक्रम के लिए बातचीत भी की जा सकती है फिर भी कभी किसी नौकरीपेशा श्रोता का फोनकाल नहीं सुना। वैसे गाने नए हो या पुराने सभी अच्छे होते है।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में पारम्परिक आरती सुनना अच्छा लगा -

ॐ जय जगदीश हरे

स्वर, संगीत संयोजन सभी अच्छा रहा।

7 बजे जयमाला में रोज़ फ़ौजी भाइयों के फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए जिसमें नए गाने भी बजे जैसे वेलकम फ़िल्म से और सत्तर के दशक की फ़िल्म जैसे अपराध के गीत भी शामिल रहे पर सबसे अच्छा लगा इससे भी पुरानी फ़िल्म का यह गीत सुनना -

फूल बन जाऊँगा शर्त ये है मगर
अपनी ज़िल्फ़ों में मुझको सजा लीजिए

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया अभिनेता विश्वजीत ने। अपने बारे में बहुत कम बताया। अन्य कलाकारों के बारे में भी कुछ बातें हुई और गीत सभी अच्छे सुनवाए।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में मैथिली, भोजपुरी गीत बजे। पत्रावली में शनिवार और सोमवार को पढे गए पत्रों में विभिन्न कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। श्रोता सुझाव बहुत कम भेजते है, लगता है विविध भारती जैसी है उन्हें वैसी ही पसन्द है। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनी। रविवार को राग-अनुराग में राग बिलावल पर पाकीज़ा का यह गीत बहुत दिन बाद सुनना अच्छा लगा -

आज हम अपनी दुवाओं का असर देखेगें

इसके अलावा गुरूवार को भी विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने। बुधवार के इनसे मिलिए कार्यक्रम के लिए दोपहर 1 बजे क्षेत्रीय केन्द्र से झरोका में बताया गया - लेखक, निर्माता, अभिनेता, करण राजाराम से युनूस जी की बातचीत। हम सोचते रहे यह कौन सी हस्ती है ? शाम में 7 बजे समाचार से पहले भी क्षेत्रीय केन्द्र से झरोका में यही बताया गया। जयमाला के बाद केन्द्रीय सेवा से कार्यक्रम की शुरूवात के पहले उदघोषणा में स्पष्ट हुआ नाम - करण राजदान। ऐसा पहली बार नहीं हुआ, कुछ दिन पहले हवामहल के लिए महेन्द्र मोदी जी द्वारा निर्देशित झलकी के लिए बताया गया नरेन्द्र मोदी। बात यहीं समाप्त नहीं होती है, एक बार रेणु बंसल जी के लिए कहा गया रेणुका बंसल। हम समझ सकते है कि महेन्द्र और नरेन्द्र नामों में ग़लती हो सकती है पर रेणु नाम रेणुका कैसे हो गया ? हद तो तब हो गई जब एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम के लिए फ़िल्म लहू के दो रंग के लिए कहा गया लाहौर के दो रंग। इसे क्या कहें - अति विश्वास (ओवर कांफ़िडेंस) या मनमाना रवैया।

8 बजे हवामहल में गंगाप्रसाद माथुर, लोकेन्द्र शर्मा, विनोद रस्तोगी जैसे जाने-माने निर्देशकों की झलकियाँ सुनी - नींद का ग़ुलाम, मशीन का चक्कर, सड़क का मजनूं, कमबख़्त इश्क। इसके अलावा हैदराबाद के लेखक अज़हर अफ़सर का लिखा और प्रस्तुत करता प्रहसन भी सुना - मरने के बाद

रात 9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें दोनों का चुनाव अच्छा रहा - साहित्य और गायकी दोनों अच्छे रहे।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में राजा, पूनम, कभी हाँ कभी ना, तीसरी मंज़िल, काला बाज़ार, झुक गया आसमान जैसी नई पुरानी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजते रहे।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अहमद वसी से बातचीत में संगीतकार नौशाद से के एल सहगल के इस गीत की चर्चा सुनना सुखद रहा -

मेरे सपनों की रानी रूही रूही रूही

कुछ ऐसे गीतों के बनने की बातें बताई जो गीत बहुत ही कम सुने गए जैसे नर्तकी फ़िल्म के कुछ गीत।

10 बजे छाया गीत में अमरकान्त जी इस बार भी देवआनन्दमय रहे पर अशोक जी ने सुनवाए भूले-बिसरे गीत, राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने नए गीत नहीं सुनवाए, शेष सभी का अंदाज़ वही रहा जिसके अंतर्गत युनूस जी लेकर आए पुराने ज़माने के अनमोल नग़में जिसमें सुनहरे वर्क़ फ़िल्म का गीत तो ठीक था पर एक के बाद एक फ़िल्म का गीत देवआनन्द द्वारा अभिनीत और निर्देशित अन्य फ़िल्मों की तरह उतना अच्छा नहीं लगा, वैसे भी कल सुनवाए गए सभी गीत उतने लोकप्रिय तो नहीं थे पर यह पता चला कि कुछ ऐसे सुनने लायक गीत भी है।

Friday, October 17, 2008

साप्ताहिकी 16-10-08

सप्ताह भर सवेरे 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में लोकप्रिय नेताओं, साहित्यकारों जैसे सुभाष चन्द्र बोस, भगवती प्रसाद वाजपेयी, प्रेमचन्द आदि के विचार बताए गए। वन्दनवार में लोकप्रिय भजन सुनवाए गए और अंत में बजते रहे लोकप्रिय देशगान।

7 बजे भूले-बिसरे गीत सोमवार को समर्पित रहा अशोक कुमार और किशोर कुमार को। इस दिन अभिनेता अशोक कुमार का जन्म दिन था और इसी दिन पुण्य तिथि थी गायक, संगीतकार, अभिनेता, निर्माता, निर्देशक किशोर कुमार की। अशोक कुमार ने पुरानी फ़िल्मों में गीत भी गाए है क्योंकि उन दिनों अभिनेता अपने गीत ख़ुद गाते थे, उनका गाया सरस्वती राणी का स्वर बद्ध किया यह लोकप्रिय गीत बहुत दिन बाद सुना - चल चल रे नौजवान। गुरूवार को कुछ अधिक लोकप्रिय गीत बजे। समाप्ति के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में इस सप्ताह भी प्रसिद्ध गायिका शकुन्तला नरसिंहन की प्रस्तुति में हिन्दुस्तानी और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक जैसे रागों की चर्चा चली और दोनों विधाओं के कलाकारों से गायन और वादन सुनवाए गए।

त्रिवेणी में भी लगता है प्रसारण दुबारा तिबारा होने लगे है, रविवार को सुनी सकारात्मक सोच की बातें जिसे पाज़िटिव थिंकिंग कहा गया, यह कार्यक्रम लगा शायद पहले दो बार प्रसारित हुआ। कार्यक्रम का समय कम है और विषय तो बहुत सारे मिल सकते है ऐसे में दुबारा प्रसारण ठीक नहीं लगता, चाहे तो यही विषय किसी और तरह से कहा जा सकता है।

दोपहर 12 बजे से प्रसारित होने वाले सुहाना सफ़र कार्यक्रम के अंतिम पथिक संगीतकार थे हिमेश रेशमिया जिनके स्वरबद्ध किए गीत रविवार को सुना कर इस कार्यक्रम को समाप्त किया गया और सोमवार से शुरू हुआ नया नवेला कार्यक्रम - एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने। चलो, पचास के पार विविध भारती भी वी बी एस हो गई जैसे आकाशवाणी ए आई आर और दूरदर्शन डीडी।

पहली कड़ी प्रस्तुत की युनूस जी ने। आपने बताया कि इस कार्यक्रम की टैगलाइन है - 12 बजे 12 गीत, सुनकर लगा कि यह किसी … जी का आयडिया होगा। ख़ैर… आयडिया जिस किसी का भी हो हम उन्हें बधाई देते है विविध भारती पर इस कार्यक्रम की शुरूवात के लिए। वैसे यहाँ निजि एफ़ एम चैनल पर तेलुगु में इस तरह का कार्यक्रम पहले से ही प्रसारित हो रहा है।

शुरूवात में 12 फ़िल्मों के नाम बताए गए। सोमवार को किशोर कुमार की पुण्य तिथि थी इसीलिए उन्हीं के लोकप्रिय गीतों वाली फ़िल्मों को चुना गया जैसे आराधना, शर्मिली, तीन देवियाँ, ज्वैल थीफ़, झुमरू आदि और श्रोताओं से कहा गया इन फ़िल्मों से अपने पसंदीदा गीतों की फ़रमाइश के लिए। एस एम एस करने के लिए नम्बर और तरीका बताया गया और पहला गीत शुरू हुआ आराधना फ़िल्म का और शुरू हुआ सिलसिला श्रोताओं के एस एम एस भेजने का जिसे तुरन्त युनूस जी बताते जा रहे थे - शहर का नाम और भेजने वाले का नाम। प्राप्त संदेशों के आधार पर इन फ़िल्मों के गीत चुन कर सुनवाए जा रहे थे और संदेश भेजने वालों के नाम बताए जा रहे थे, गानों के बीच के संगीत में भी नाम बताए जा रहे थे।

साथ में एस एम एस के बारे में भी बताया गया कि यह सेवा 1985 में शुरू हुई और आज मोबाइल धारकों में से 74% इसका प्रयोग करते है। अंत में अगले दिन के लिए फ़िल्मों के नाम बताए गए। इस अनोखे कार्यक्रम के लिए महेन्द्र मोदी जी को धन्यवाद।

मंगलवार को प्रस्तुत किया अमरकान्त जी ने, फ़िल्में रही - जब जब फूल खिले, अनुरोध, कन्यादान, तीसरी मंज़िल जैसी 12 लोकप्रिय फ़िल्में।

बुधवार को प्रस्तुत किया युनूस जी ने और फ़िल्में रही द ट्रेन, मर्यादा, फ़र्ज़, ज्वैल थीफ़ जैसी 12 फ़िल्में। जब कार्यक्रम में युनूस जी हो तो वो कोई पाठ पढाए बिना नहीं छोड़ते श्रोताओं को, इस दिन सफ़ाई का पाठ पढाया।

गुरूवार की 12 फ़िल्में कटी पतंग, संगम, अभिलाषा, तुम से अच्छा कौन है, अनीता आदि। प्रस्तुति रेणु (बंसल) जी की रही।

इस तरह हर दिन ऐसी लोकप्रिय फ़िल्में चुनी गई जिसके लगभग सभी गीत लोकप्रिय रहे जिनमें से कुछ ऐसे गीतों की फ़रमाइश आई जिन्हें अक्सर सुनवाया जाता है जैसे -

कोरा काग़ज़ था यह मन मेरा (आराधना)
वहाँ कौन है तेरा (गाइड)
अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो (एन ईवनिंग इन पेरिस)
होठों में ऐसी बात (ज्वैल थीफ़)

और कुछ ऐसे गीतों की फ़रमाइश भी आई जो बहुत समय बात सुनाई दिए जैसे -

कैसे करूँ प्रेम की मैं बात (अनिता)
यह दिल न होता बेचारा (ज्वैल थीफ़)

हर दिन कार्यक्रम के अंत में अगले दिन की 12 फ़िल्मों के नाम बताए जाते रहे। हमें तो बहुत अच्छा लग रहा है यह कार्यक्रम जिसमें ईंस्टेंट फ़रमाइश पूरी होती है, संदेश भेजो और तुरन्त सुन लो गीत। जिस जोश से प्रस्तुत किया जा रहा है हम उसी जोश से सुन रहे है और जिन्होनें अब तक नहीं सुना है हम उनसे भी उसी जोश से सुनने के लिए कहेंगे।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में राजू सिंह के संगीत में अलका याज्ञिक का गाया जावेद अख़्तर का यह गीत कार्यक्रम के स्वरूप के अनुसार मसालेदार तो नहीं पर अच्छा लगा -

सारे सपने कहीं खो गए
हाय हम क्या से क्या हो गए

शेष गाने सामान्य रहे।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में मिले-जुले गाने सुनवाए गए जैसे सत्तर के दशक की फ़िल्म सावन भादों और नई फ़िल्म मुझसे शादी करोगी के गीत। एक बात यहाँ हम बताना चाहेगें कि अक्सर फ़रमाइश करने वालों के नाम बताते समय जगह का नाम बताते हुए कहा जाता है - हैदराबाद मालकपेट से, यहाँ मैं थोड़ा सा सुधार कर दूँ, यह मालकपेट नहीं मलकपेट है, शायद अंग्रेज़ी में पता लिखे जाने से ऐसी ग़लती होती होगी।

3 बजे का समय मुख्यतः सखि-सहेली का होता है। शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम प्रस्तुत किया कल्पना (शेट्टी) जी ने और फोन पर सखियों से बातचीत की ममता (सिंह) जी ने। पटना के पास के क्षेत्र शायद फटुआ से स्कूल की छात्रा ने बात की और पुरानी फ़िल्म उड़न खटोला के गीत की फ़रमाइश की। खंडवा क्षेत्र से एक कम पढी-लिखी, खेत में काम करने वाली महिला ने नए गीत की फ़रमाइश की - वाह ! कमाल की फ़रमाइश है हमारी श्रोता सखियों की भी।

सोमवार का दिन होता है रसोई का, आलू के कुछ भरवाँ टोस्ट जैसा कुछ बताया गया जो न नया था न विशेष पर त्यौहारों का मौसम होने से कुछ अच्छी और नई बातें बताई गई जैसे एक स्थान मणिकरन में चट्टान के एक ओर ठण्डा और दूसरी ओर गरम पानी का झरना है। इस गरम पानी का उपयोग आसानी से रसोई में किया जाता है। अन्य स्थानों पर भाप पर भोजन बनाने के लिए एक के ऊपर एक मटकों में भोजन बनाया जाता है। मंगलवार को लघु और कुटीर उद्योग जैसे सिलाई, बुनाई करने, ब्यूटी पार्लर, छोटा सा पुस्तकालय खोलने जैसे काम करने की जानकारी दी गई। बुधवार को विभिन्न अवसरों और मौसम के पहरावे की बातें हुई।

इसके अलावा सामान्य जानकारी में डाक टिकट के बारे में जानकारी दी गई। अन्य बातों के साथ यह जानना अच्छा लगा कि सबसे बड़ा डाक टिकटों का नेट भारत में है।

शनिवार रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में हमेशा की तरह लोकप्रिय गीत सुनवाए गए।

इसके बाद नाट्य तरंग में रविवार को सुना मूल गुजराती नाटक का हिन्दी अनुवाद - खेमे जिसके निर्देशक है सत्येन्द्र शरत। बहुत भावुक नाटक था पिछले दिनों से हट कर सामाजिक समस्या अकेलेपन को लेकर।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस में आजकल दुनिया देखो स्तम्भ में युनूस जी सैर-सपाटा करवा रहे है। अभी-अभी शुरू हुआ यह स्तम्भ अच्छा लग रहा है। इस अंक में शुरू में कहा गया कि रूमानी यादें रहेगी, गीत भी ऐसे ही चुने गए पर किताबों की दुनिया में चित्रा कुमार की महादेवी वर्मा पर वार्ता सुनवायी गई। महादेवी वर्मा के गद्य में तो ऐसा कुछ है नहीं और काव्य में प्रियतम अलौकिक है। खैर…

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारे में पिटारा कार्यक्रम में गीतकार शायर शकील बदायूँनी पर आधारित सरगम के सितारे कार्यक्रम प्रसारित हुआ। यह दूसरी कड़ी थी। पहली कड़ी की तरह यह भी अच्छा था। इसमें उनके शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों की चर्चा हुई और गीत भी सुनवाए गए। अन्य गीतो की भी चर्चा हुई जैसे साहब बीबी और ग़ुलाम का गीत - भँवरा बड़ा नादाँ रे

एक ख़ास बात बताई गई कि होली के सबसे अधिक यानि 3 गीत शकील साहब के है, जिन्हें सुन कर भी मज़ा आया। इतने मज़ेदार कार्यक्रम में एक बात अख़रती रही बिल्कुल वैसे ही जैसे अंगूर खाते समय बीच में दाने आते है। युनूस जी कहते गए - पिछले सप्ताह में आपने सुना, जैसा कि पिछले सप्ताह बताया आदि। पिछले सप्ताह यह कार्यक्रम हुआ ही नहीं था। दो कड़ियों के बीच अधिक अंतराल आया। यह दुबारा प्रसारण था और बिना संपादन के प्रसारित हुआ, ऐसे में उचित यही रहता है कि रिकार्डिंग के समय ही पिछले सप्ताह के बजाए पिछले भाग जैसे शब्द कहे जाए तो हर प्रसारण में कार्यक्रम ताज़ातरीन लगता है।

कुछ ऐसा ही हाल रहा सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम का। रेणु (बंसल) जी ने बताया 27 फ़रवरी से 3 मार्च तक अंधत्व निवारण सप्ताह मनाया जाता है। यह सप्ताह आस-पास है इसीलिए इस विषय पर बातचीत के लिए आमंत्रित है डा रमेश शाह। अब बताइए इस अक्तूबर के महीने में यह सप्ताह आस-पास कैसे हुआ। कार्यक्रम अच्छा है और दुबारा प्रसारण भी उचित है पर थोड़ा संपादन कर देते या शुरूवात में यह बता देते कि उस सप्ताह के विशेष कार्यक्रम को आज दुबारा प्रसारित किया जा रहा है।

बुधवार को आज के मेहमान में निर्माता निर्देशक रचयिता शकील नूरानी से बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। काफ़ी विस्तार से बातें हुई कि कैसे सहायक निर्देशक की हैसियत से करिअर की शुरूवात हुई और वो भी स्कूल की पढाई समाप्त होते ही, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के काम की भी चर्चा हुई। सबसे अच्छे लगे गाने ख़ासकर दस्तक फ़िल्म का गीत -

बैंय्या ना धरो ओ बलमा
न करो मोसे रार

हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं के फोनकाल और उनके पसंदीदा गाने सुने। सब कुछ सामन्य लगा कोई विशेष बात नज़र नहीं आई।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानें सामन्य ही रहे।

स्वर्ण जयन्ति के बाद जयमाला पहले की तरह सामान्य हो गई। रोज़ फ़ौजी भाइयों के फ़रमाइशी गीत और शनिवार को विशेष जयमाला। इस सप्ताह यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गीतकार पंछी जालौन ने। एक गीतकार के अंदाज़ में बातें बताई और गीत सुनवाए। रविवार का जयमाला संदेश और सोमवार से शुक्रवार तक अंत में सलाम इंडिया से सुनवाया जाने वाला देशभक्ति गीत का कार्यक्रम स्वर्ण जयन्ति के साथ विदा हो गया।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सबसे पहले सुना अंजन की सीटी फिर इस राजस्थानी गीत के बाद हिमाचल प्रदेश का गीत सुनवाया गया। पत्रावली में शनिवार को पढे गए पत्रों में संगीत सरिता का समय बढाने की फ़रमाइश थी और स्वर्ण जयन्ति के विभिन्न कार्यक्रमों की तारीफ़ थी और सोमवार की पत्रावली सुन कर लगा विविध भारती के वीबीएस होते ही पत्रावली भी हाईटैक हो गई। चिट्ठियों की सौंधी ख़ुशबू उड़ कर नेट तक पहुँच गई। विविध भारती वेबसाइट पर भेजी गई टिप्पणियों को भी पढा गया। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनी। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में गायिका अभिनेत्री विजेता पंडित से रेणु (बंसल) जी ने बातचीत की। अच्छा लगा विजेता पंडित से मुख से अपने काम और जीवन के बारे में सुनना। एक लंबे अंतराल के बाद उनकी चर्चा अच्छी लगी। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में इस सप्ताह भी तू तू मैं मैं, यह भी ख़ूब रही जैसी पुरानी झलकियाँ ही सुनवाई गई लगता है स्वर्ण जयन्ति के अवसर पर भी नई झलकियाँ नहीं तैयार की गई।

रात 9 बजे गुलदस्ता में जगजीत सिंह, भूपेन्द्र सिंह, मिताली को सुनते रहे, राजेश रेड्डी जी के कलाम भी सुने पर जब सुना बेगम अख़्तर को तो लगा गुलदस्ता महक गया।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में सोमवार को अशोक कुमार के जन्मदिन और किशोर कुमार की पुण्य तिथि को ध्यान में रख कर फ़िल्म चुनी गई - चलती का नाम गाड़ी। हेमा मालिनी के जन्म दिन को ध्यान में रख कर गुरूवार की फ़िल्म रही ड्रीम गर्ल, इसके अलावा कोहिनूर जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अहमद वसी से बातचीत में संगीतकार नौशाद ने अपने गीतों के बनने की बातें बताई।

10 बजे छाया गीत में कोई भी अपना अंदाज़ बदलने के लिए तैयार नहीं लगे।

Wednesday, October 15, 2008

भारतीय फिल्म इतीहासकार श्री हरीश रधुवंशी की सालगिरह पर उनसे बातचीत

आदरणिय रेडियोनामा के पाठको,
नमस्कार, आज यानि दि. 15वी अक्तूबर, 2008 के दिन भारतीय सिने उद्योग के बारेमें बारीकी से संशोधन-कर्ताओं में से एक अव्वल दरज्जे के संशोधनकार तथा एक नया रास्ता बनाने वाले सुरत निवासी श्री हरीश रघुवंशी अपनी जीकवन यात्राके 59 साल समाप्त करके 60वे सालमें प्रवेष कर रहे है, तो इस खुशी के मोके पर मेरी तथा सिने संगीत प्रेमी लोगो की और से उनको हार्दीक शुभ: कामनाएं और इस मोके पर मेरे द्वारा उनके घर पर इन संशोधनों के बारेमें तथा इनके आधार पर अब तक प्रकाशित पुस्तको के बारेमें, जिनकी मुख: पृष्ठकी तसवीरें नीचे प्रस्तूत की गयी है, तथा आनेवाले दिनों मेँ उनके संशोधन पर आधारीत नये प्रकाशन के बारेमेँ, (हम दोनों गुजराती भाषी होते हुए भी इस मंच के लिये हिन्दी समझने वालों के लिये हिन्दी भाषामें) की गयी बात-चीत का दृष्यांकन चार भागोमेँ इधर प्रस्तूत किये है । (इस विचार का बीज मेरे मनमें मेरे और हरीश्भाई के मित्र और बलसाड निवासी श्री अखिल सुतरीया की गुजराती वेब-साईट www.akhiltv.com पर उनके प्रस्तूत हुए गुजराती साक्षात्कार को सुन कर पैदा हुआ । )(इधर एक बात मैं आपको बताना चाहता हूँ, कि मेरे शुरूआती कई सम्पर्को के लिये वे निमीत्त रहे है, जैसे हाल सुरत निवासी अभिनेता श्री क्रिश्नकांतजी, स्व. श्री केरशी मिस्त्री, उद्दधोषक श्री मनोह्र महाजन साहब । श्री एनोक डेनियेल्स के परिचय के लिये उन्हों ने उनका पूना का पता ढूंढने के लिये भी उनके पूणे निवासी पत्रकार मित्र श्री सुधाकर परूलेकर द्वारा मदद की थी जिनको हम दोनोंने और ष्री एनोक डेनियेल्स साहबने भी आज तक प्रत्यक्ष कभी नहीं देख़ा है ।) इन सँशोधनो को उन्होंने उनके 16 सालसे अकस्मातमेँ अपाहीज हुए आज करीब 38 साल के सुपुत्र की सेवा सुश्रुषा करते करते जारी किया है और इसमॆं कोई दाम कमानेका इरादा नहीं था क्यों की गाने पाने के लिये या फिल्मों की बूकलेट्स पाने के लिये या कभी मूसाफरी के लिये हुआ खर्च तो कोई गिनतीमेँ ही नही है ।
तो यह है मूकेश गीत कोष (जो किसी भी एक पार्श्व गायक के बारेमें इस प्रकार का सर्व प्रथम ग्रंथ है) का मुख़: पृष्ठ:



मूकेश गीत कोष के बारेमें अब सुनीये और देख़ीये श्री हरीशजी क्या कहते है । ( इस अभियानमेँ मैं भेटकर्ता और अकुशल सिनेमेट्रोग्राफर दोनों हूँ, इस लिये शुरूआती क्षणो के पश्चात मेँ आप को दिखूंगा नहीं ।)

गुजाराती फिल्मी गीत कोष (जो भारत की प्रादेषिक फिल्मो के बारेमें इस प्रकारका सबसे पहला ग्रंथ है) का मुख़: पृष्ठ



और अब् इनके बारेमें उनसे मेरी बात चीत :

इन्हें ना भूलाना तथा सायगल गीत कोष के मुख़;पृष्ठ






तथा इनके बारेमें उनसे बात चीत :




श्री हरीशजी के संशोधन पर आधारित आने वाले परिपाक के बारेमें उनसे बात चीत

इश्वर आपको तंदूरस्ती इस प्रकार दे की आप इन प्रकार के संशोधनों मेँ आनंद पूर्वक व्यस्त रहे और फिल्म इतिहास के रसिको को नयी नयी चीजें मिलती रहे ।
पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Friday, October 10, 2008

साप्ताहिकी 9-10-08

आप सबको दशहरा मुबारक !

इस सप्ताह का पहला और अंतिम दिन दिन ख़ास रहा। पहले दिन यानि 3 अक्तूबर को विविध भारती के स्वर्ण जयन्ति वर्ष के समारोह का अंतिम आयोजन हुआ।

सुबह-सवेरे पहला कार्यक्रम वन्दनवार रहा जो 6 बजे से 7:45 तक चला जिसे प्रस्तुत किया विख़्यात गायक अनूप जलोटा ने, मेजबान थी निम्मी (मिश्रा) जी और इस कार्यक्रम को तैयार किया कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने। शुरूवात हुई पंडित भीमसेन जोशी के इस भजन से -

सुन-सुन साधो जी राजा राम कहो

उसके बाद एम एस सुब्बालक्ष्मी का मीरा भजन -

मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई

पुरूषोत्तम दास जलोटा, हरिओम शरण जैसे विख़्यात भजन गायको के भजन सुने। सूफ़ी रचना सुनवाई गई फ़रीदा ख़ानम से। हरिहरन ने प्रस्तुत किया - बुद्धम शरणम गच्छामि। यूँ कहिए कि विविध भारती ने अपना भजनों का ख़ज़ाना खोल दिया और ऊपर से बोनस ये कि अनूप जलोटा जी इन सभी गायकों के बारे में बताते रहे। भक्ति संगीत से संबंधित रोचक अनुभव सुनवाते रहे। मैं बचपन से रेडियो सुन रही हूँ पर इतना लम्बा और इतना सरस वन्दनवार मैनें पहली बार सुना।

7:45 को त्रिवेणी लेकर आए खुद महेन्द्र मोदी जी, विषय रहा विविध भारती का श्रोताओं से संबंध जिसमें आलेख कहीं नज़र नहीं आया क्योंकि बातें सीधे विविध भारती के दिल से निकल कर महेन्द्र मोदी जी की आवाज़ में श्रोताओं तक पहुँच रही थी तभी तो पहला गीत सुनवाया गया -

हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू
हाथ से छूके इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो

और समापन हुआ इस गीत से - कभी अलविदा न कहना

12 बजे से गायिका सुनिधि चौहान से युनूस जी ने बातचीत की। कई गानों और कलाकारों की बातें हुई। गाने बनने की रोचक बातें भी हुई और उनके पसंदीदा गीत भी। इस तरह सुबह के प्रसारण से हट कर यह प्रसारण नई पीढी के नाम रहा। जिसके बाद राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी और शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने प्रस्तुत किए विशेष गोल्डन जुबिली मन चाहे गीत जो पूरी तरह से श्रोताओं का और श्रोताओं के लिए था। इसके बाद आया लाजवाब कार्यक्रम जो पूरे साल भर में शायद ऐसा कार्यक्रम पहला ही रहा, गायक तलत अज़ीज़ द्वारा प्रस्तुत ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का गुलदस्ता। प्रस्तुति भी ज़ोरदार रही, गायक ने अपने अनुभव सुनाए, संस्मरण सुनाए।

शाम 7 बजे विशेष जयमाला प्रस्तुत किया शत्रुघ्न सिन्हा ने। शुरूवात की ख़ुद की लोकप्रिय फ़िल्मों के संवादों से जैसे फ़िल्म कालीचरण। अपने लाजवाब अंदाज़ में कई अंतरंग बातें बताई जैसे अपने जीवन साथी से पहली मुलाक़ात, अपने घर-परिवार की बातें बताई और रोचक किस्से बयाँ किए अपने नाम से हुई ग़लतफ़हमियों के। गाने भी बढिया सुनवाए जिनमें से उनके नायक के रूप में असफ़ल फ़िल्म मिलाप का यह लोकप्रिय गीत भी था -

कई सदियों से कई जन्मों से तेरे प्यार को तरसे मेरा मन

अंत में रात 9 बजे प्रसारित हुअ छाया गीत जिसे प्रस्तुत किया संगीतकार रवि ने। कई गीतों के बारे बताया। यह भी बताया कि कैसे मिनटों में गीत लिखे गए और धुनें बनी और कभी-कभी कैसे धुनें बनने में बरसों लगे। कार्यक्रम अच्छा लगा पर आज के मेहमान कार्यक्रम जैसा लगा। अगर बातचीत के निम्मी (मिश्रा) जी के अंश हट जाते और सारी बाते खुद संगीतकार रवि बताते तो लाजवाब छायागीत अपने मूल रूप में झिलमिलाता।

शेष दिनों में चिंतन में गाँधीजी सहित विभिन्न विद्वानों के विचार बताए गए। वन्दनवार में आरंभ में नवरात्र के अवसर पर माँ दुर्गा के भजन सुनवाए गए। दशहरा को युनूस जी की ने बेहतरीन कार्यक्रम दिया, चिंतन में युवा शक्ति पुंज स्वामी विवेकानन्द के विचार बताए फिर शुरूवात हुई मुकेश की आवाज़ में रामचरित मानस के रामजन्म के अंश से जिससे जुड़ा यह भजन भी सुनवाया गया -

भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हिताकारी

इसके बाद सुनवाए गए सभी भजनों से सुबह-सवेरे दशहरा का आनन्द आ गया। सप्ताह भर अंत में बजते रहे लोकप्रिय देशगान।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में एकाध लोकप्रिय गीत भी बजते रहे। समाप्ति के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में इस सप्ताह भी प्रसिद्ध गायिका शकुन्तला नरसिंहन की प्रस्तुति में हिन्दुस्तानी और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक जैसे रागों की चर्चा चली और दोनों विधाओं के कलाकारों से गायन और वादन सुनवाए गए।

त्रिवेणी में इस सप्ताह भी अहिंसा की, गाँधी जी की बातें हुई, कुछ नए रंग भी रहे जैसे कोई ऐसी बात न कहे जिससे दूसरों को ठेस लगे। गीत गाने नए पुराने बजते रहे। पर दशहरा के दिन युनूस जी ने वन्दनवार की भावना बनाए रखी और असत्य पर सत्य की विजय की प्रतीक विजयदशमी की बातें कही और इससे जुड़े गीत भी अच्छे चुने।

12 बजे से प्रसारित होने वाले सुहाना सफ़र कार्यक्रम का अंदाज़ वही पुराना रहा जो जतिन-ललित, दिलीप सेन और समीर सेन (दिलीप-समीर) जैसे नए संगीतकारों के नए फ़िल्मी गीतों का रहा।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में चार्लस वैस का संगीत बद्ध किया एक गीत सुना जिसके गीतकार का नाम बताया गया योगेश, समझ में नहीं आया क्या ये वही योगेश है जो हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार है और जिनके गीत मन्नाडे जैसे गायकों ने भी गाए है। इस गीत के बोल थे -

लड़की हूँ मैं गोरी-गोरी
चोरी-चोरी ले लूँगी दिल तेरा
गोरी-गोरी

वैसे सुनने में गाना अच्छा ही है। शेष गाने सामान्य रहे।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में मिले-जुले गाने सुनवाए गए जिसमें सत्तर के दशक के गीत भी थे जैसे आप की कसम और नए गाने भी। एक बात ध्यान देने लायक रही कि कुछ गीत ऐसे सुनवाए गए जो बहुत दिन बाद सुनने को मिले जैसे फ़िल्म मिलन का यह गीत -

बोल गोरी बोल तेरा कौन पिया

3 बजे सखि-सहेली में सोमवार का दिन होता है रसोई का, नवरात्र के अवसर पर व्रत के लिए सिंघाड़े की बर्फ़ी बनाना बताया गया। मंगलवार को सविता (सिंह) जी पहली बार आई और साथ में थी चंचल जी, करिअर मार्ग दर्शन के अंतर्गत वीडियो संपादन के क्षेत्र में कोर्स करने और करिअर बनाने की जानकारी दी गई। बुधवार को एक अजीब बात हुई। कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही थी ममता (सिंह) जी और चंचल जी। आते ही चंचल जी ने बताया कि आज है राम नवमी, मैं हैरान हो गई, फिर ममता जी ने बताया कि नवरात्र का आज अंतिम दिन है, मुझे लगा कि मुझसे सुनने में ग़लती हुई और मैनें महानवमी को रामनवमी सुना पर शाम में 7 बजे समाचारों में लोचनीय (अस्थाना) जी ने समाचार पढे कि आज रामनवमी है और कलकत्ता में पंडालों में विशेष पूजा हो रही है। यहाँ थोड़ी सी (शायद गंभीर) सांस्कृतिक ग़लती हो गई। चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) की नवरात्रि के नौवें दिन को रामनवमी होती है क्योंकि इस दिन राम का जन्म हुआ था। वैसे दक्षिण भारतीय मानते है कि इस दिन राम का विवाह हुआ था। वैसे चौमासे की नवरात्र से भी राम जुड़े है पर राम और रावण ने भी शक्ति की आराधना की थी इसीलिए यह नवरात्र पूरी तरह से माता को समर्पित है। इसीलिए रामनवमी नहीं कहना चाहिए। इस दिन बुधवार होने से सजने-सँवरने की बातें हुई और गरबा खेलेने जाने के लिए और वैसे भी पार्टियों के लिए मेकअप करने के लिए कुछ ख़ास बातें बताई गई।

शनिवार रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में दिल ही तो है, मेरे सनम, घूँघट, साधना, दिल भी तेरा हम भी तेरे, नया दौर, धूल का फूल जैसी फ़िल्मों के लोकप्रिय गाने सुनने को मिले पर सबसे अच्छा लगा राजकुमार फ़िल्म का यह गीत सुनना -

नाच रे मन बतकम्मा ठुमक ठुमक बतकम्मा
मैं भी नाचूँ तू भी नाचे हर कोई नाचे बतकम्मा

बतकम्मा यहाँ आन्ध्रप्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र के वैश्व समुदाय का लोकपर्व है। जिस तरह दशहरा से पहले अन्य स्थानों पर नवरात्र मनाई जाती है उसी तरह यहाँ बतकम्मा मनाया जाता है। हैदराबाद और वरंगल ज़िले में बहुत धूम-धाम रहती है। पार्वती के गौरी रूप का नाम यहाँ बतकम्मा है। इस मौसम में एक तरह के जंगली फूल खिलते है जिनका प्रयोग इस पर्व में किया जाता है इसीलिए इन फूलों को बतकम्मा के फूल कहते है। इस बारे में बहुत सी बातें है जो इस चिट्ठे के लिए उचित नहीं है।

इसके बाद नाट्य तरंग में शनिवार और रविवार को दो किस्तों में आलोक भट्टाचार्य के मूल बंगला नाटक का दीप नारायण द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद मृत्युहीन प्राण प्रसारित किया गया जिसके निर्देशक है सुदर्शन कुमार। यह नाटक स्वतंत्रता संग्राम के वातावरण का है।

4 बजे पिटारा में सोमवार को सेहतनामा में मनोरोग चिकित्सक डा देवेन्द्र साधी से रेणु (बंसल) जी ने बातचीत की। डाक्टर साहब ने घबराहट, बैचेनी जैसी बातों पर विस्तार से जानकारी दी। बुधवार को आज के मेहमान में फ़िल्मी दुनिया के जाने-माने कला निर्देशक जयन्त देशमुख से बातचीत की कमल (शर्मा) जी ने। उनके अनुभव, उनके संस्मरण और गीत सभी बढिया रहे। हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं के फोनकाल और उनके पसंदीदा गाने सुने।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानें सामन्य ही रहे।

शनिवार को टुनटुन (उमादेवी) द्वारा प्रस्तुत विशेष जयमाला बहुत ही मज़ेदार रहा। संग्रहालय की यह पुरानी रिकार्डिंग बहुत ही रोचक थी। विभिन्न कलाकारों के लोकप्रिय गीत सुनने को मिले जैसे सुरैया, तलत महमूद। रविवार को अन्य दिनों की तरह जयमाला में सामान्य रूप से फ़ौजी भाइयों के फ़रमाइशी गाने सुनवाए गए यानि जयमाला संदेश कार्यक्रम स्वर्ण जयन्ति के साथ समाप्त हुआ लगता है। शेष दिन नए और कभी-कभार बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शनिवार और सोमवार को पत्रावली में पढे गए पत्रों में कुछ ऐसे पत्र थे जो बहुत पुराने श्रोताओं के थे। कई पत्र बहुत लम्बे रहे जिनमें कार्यक्रमों के बारे में कई बातें बताई गई। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनी। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में वृत्त चित्र निर्देशक भीरू भाई मिस्त्री से कमल (शर्मा) जी ने बातचीत की। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में इस सप्ताह टी वी और बीवी, ख़ातिरदारी, शादी की सालगिरह, सुहाना सफ़र जैसी हल्की-फुल्की हास्य झलकियाँ सुनवाई गई।

रात 9 बजे गुलदस्ता में इस सप्ताह भी अच्छी बंदिश की ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में आए दिन बहार के जैसी बीच के समय की और नसीब अपना अपना जैसी कुछ ही पुरनी और कहो न प्यार है जैसी नई लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे।
रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अहमद वसी से बातचीत में संगीतकार नौशाद ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि गीत तैयार करने के लिए पहले केवल सिचुएशन ही नहीं फ़िल्म की पूरी कहानी को ध्यान में रखा जाता था।

10 बजे छाया गीत में राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने अच्छी ग़ज़लें सुनवाई और युनूस जी ने अनमोल गीत सुनवाए जिसमें से कुछ गीत तो मैनें पहली बार सुने।

Friday, October 3, 2008

रेडियोनामा की विशेष पेशकश---विविध भारती के शुरूआती दिनों की विकल याद---लावण्‍या शाह के शब्‍दों में

( लावण्‍या जी रेडियोनामा पर लिखती रही हैं । वे विविध भारती के पितृपुरूष पंडित नरेंद्र शर्मा की सुपुत्री हैं और आजकल परदेस में रहती हैं । विविध-भारती के शुरूआती दिनों की यादों पर केंद्रित ये आलेख उन्‍होंने रेडियोनामा के विशेष आग्रह पर लिखा है----) 

बधाई हो जी बधाई ..
आप सारे श्रोताओँ को और दूर परदेस मेँ बसे या भारत मेँ विविध भारती के रंगारंग कार्यक्रमोँ को सुन रहे अनगिनत रसिक श्रोताओँ को विविध भारती के स्‍वर्ण जयँती के उपलक्ष्य मेँ अनेकोँ बधाईयाँ ! आशा है आपकी ईद बढिया मनी होगी और नवरात्र के उत्सव का आप भरपूर आनँद ले रहे होँगेँ ...आज आपके सामने विविध भारती की शिशु अवस्था की यादेँ लेकर लौटी हूँ ..
 
जनाब रिफत सरोश जी ने हमेँ यह बतलाया था कि, कैसे  पहले इन्डियन पीपल्स थियेटर यानी इप्टा रंगमंच की दुनिया में सक्रिय था ..वहीँ किसी कार्यक्रम मेँ रि‍फत साहब ने नाटक के सूत्रधार की आवाज़ सुनी और ये भी जान लिया कि श्रोता जिस आवाज़ के जादू से बँधे हुए से थे वह हिन्दी कविता से नाता रखते कवि नरेन्द्र शर्मा थे.
 
भारत की स्वतँत्रता के बाद आकाशवाणी की नीति मेँ परिवर्तन आया और रेडियो के लिये हिन्दी लेखकोँ और कवियोँ की तलाश जारी हुई. नीलकँठ तिवारी, रतन लाल जोशी, सरस्वती कुमार दीपक, सत्यकाम विध्यालँकार, वीरेन्द्र कुमार जैन, किशोरी रमन टँडन,डा. शशि शेखर नैथानी, सी. एल्. प्रभात, के. सी. शर्मा भिक्खु, भीष्म साहनी जैसे हिन्दी के अच्छे खासे लोग रेडियो प्रोग्रामोँ मेँ हिस्सा लेने लगे.

अब रि‍फत सरोश जी के शब्दोँ मेँ आगे की कथा सुनिये ..
 
" उन्हीँ दिनोँ हम लोगोँ ने पँ. नरेन्द्र शर्मा को भी आमादा किया- एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया- " कवि और कलाकार" उसमेँ सँगीत निर्देशक अनिल बिस्वास, एस्. डी. बर्मन, नौशाद और शैलेश मुखर्जी ने गीतोँ ,गज़लोँ की धुनेँ बनाई । शकील, साहिर और डाक्टर सफदर "आह" के अलावा नरेन्द्र जी भी इस प्रोग्राम के लिये राजी हो गये - नरेन्द्र जी के एक अनूठे गीत की धुन अनिल बिस्वास ने बनाई थी, जिसे लता मँगेशकर ने गाया था - " युग की सँध्या कृषक वधू -सी, किसका पँथ निहार रही "
पहले यह गीत कवि ने स्वयँ पढा, फिर इसे गायिका ने गाया उन दिनोँ आम चलते हुए गीतोँ का रिवाज हो गया था और गज़ल के चकते दमकते लफ्ज़ोँ को गीतोँ मेँ पिरो कर अनगिनत फिल्मी गीत लिखे जा रहे थे - ऐसे माहौल मेँ नरेन्द्र जी का यह गीत सभी को अच्छा लगा, जिसमेँ साहित्य के रँग के साथ भारत भूमि की सुगँध भी बसी हुई थी - और फिर नरेन्द्र जी हमारे हिन्दी विभाग के कार्यक्रमोँ मेँ स्वेच्छा से आने लगे - एक बार नरेन्द्र जी ने एक रुपक लिखा - " चाँद मेरा साथी " उन्होँने चाँद के बारे मेँ अपनी कई कवितायेँ जो विभिन्न मूड की थीँ एक रुपक लडी मेँ इस प्रकार पिरोई थी कि मनुष्य की मनोस्थिति सामने आ जाती थी - वह सूत्र रुपक की जान था - मुझे रुपक रचने का यह विचित्र ढँग बहुत पसँद आया और आगे का प्रयोग किया -

मैँ  बम्बई रेडियो पर हिन्दी विभाग मेँ स्टाफ आर्टिस्ट था और अब्दुल गनी फारुकी प्रोग्राम असिस्टेँट ! फारुकी साहब नरेन्द्र जी से किसी प्रोग्राम के लिये कहते , वे फौरन आमादा हो जाते - आते , और अपनी मुलायम मुस्कुराहट और शान्त भाव से हम सब का मन मोह लेते ! 

 
समय ने एक और करवट बदली उस समय के सूचना तथा प्रसारण मँत्री डा. बी.वी. केसकर फिल्मी गानोँ से आज़िज थे मगर पब्लिक गाना सुनना चाहते थे - केसकर साहब ने एक व्यापक कार्यक्रम बनाया कि आकाशवाणी के बडे बडे केन्द्रोँ पर लाइट म्युजिक यूनिट ( प्रसारण गीत विभाग ) बनायेँ जायेँ, परन्तु उनमेँ फिल्मी गानोँ जैसा छोछोरापन और बाजारुपन न हो ! बम्बई मेँ इस भाग के प्रोड्युसर नरेन्द्र जी नियुक्त किये गये - कल तक नरेन्द्र शर्मा हमारे अतिथि बनकर आया करते थे , अब वे, जिम्मेदार और प्रभावशाली अफसर बन गये जिनकी डायरेक्ट पहुँच मँत्री महोदय तक थी और हमने देखा कि बी. पी. भट्ट जैसे स्टेशन डायरेक्टर उनके आग पीछे घूमने लगे परन्तु नरेन्द्र जी की मुस्कुराहट मेँ वही मुलायमियत और वही रेशमीपन था ! वह सहज भाव से हम लोगोँ से बातेँ करते - 
 
उनको एक अलग कमरा दे दिया गया था प्रसार गीत विभाग भारतीय सँगीत का एक अँग नहीँ, बल्कि हमारे हिन्दी सेक्शन का एक हिस्सा था और नरेन्द्र जी की वजह से सेक्शन चलाने मेँ हमेँ बडी आसानी थी - कहीँ गाडी नहीँ रुकती थी , चाहे आर्टिस्‍टों का मामला हो या टेपोँ और स्टुडियो
का ! उन्होँने हिन्दी सेक्शन के अन्य कामोँ मेँ हस्तक्षेप करना उचित नहीँ समझा उन्हेँ प्रसार गीत से ही सरोकार था आधे दिन के लिये दफ्तर आते थे - या तो सुबह से लँच तक या लँच के बाद शाम तक ! अपने ताल्लुकात की वजह से उन्होँने फिल्मी दुनिया के मशहूर सँगीतकारोँ से प्रसार गीतोँ की धुनेँ बनवाईँ जैसे नौशाद , एस. डी बर्मन, सी. रामचन्द्र, राम गांगुली, अनिल बिस्वास, उस्ताद अली अकबर खाँ और कोई ऐसा फिल्मी गायक न था जिसने प्रसार गीत न गाये होँ - लता मँगेशकर, आशा भोँसले, गीता राय, सुमन कल्याणपुर, मुकेश, मन्ना डे, एच. डी. बातिश, जी. एम्. दुर्रानी, मुहम्मद रफी, तलत महमूद, सुधा मल्होत्रा - सब लोग हमारे बुलावे पर शौक से आते थे - यह नरेन्द्र जी के व्यक्तित्त्व का जादू था -
एक सप्ताह मेँ एक दो गाने जरुर रिकार्ड हो जाते, जो तमाम केन्द्रोँ को भेजे जाते आज मैँ अनुभव करता हूँ कि, नरेन्द्र जी का एक यही कितना बडा एहसान है आकाशवाणी पर कि उन्होँने उच्चकोटि के असँख्य गीत प्रसार विभाग द्वारा इस सँस्था को दिये !
 
आकाशवाणी को बदनामी के दलदल से निकालने और प्रोग्रामोँ को लोकप्रिय बनाने मेँ नरेन्द्र जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है " प्रसार -गीत " तो उसकी एक मिसाल है परन्तु जो अद्वितीय कार्य उन्होँने किया वह था, " विविध भारती " की रुपरेखा की तैयारी तथा प्रस्तुति ! अपने मित्र तथा आकाशवाणी के महानिर्देशक श्री जे. सी. माथुर के साथ मिलकर नरेन्द्र जी ने आल इँडीया वेरायटी प्रोग्राम का खाका बनाया जिसका अति सुँदर नाम रखा " विविध भारती " आकाशवाणी का ऐसा इन्कलाबी कदम था जिसने न सिर्फ उस की खोई हुई साख वापस दिलाई, बल्कि आकाशवाणी के श्रोताओँ मेँ नई रुचि पैदा की और उसमेँ हलके -फुलके प्रोग्रामोँ द्वारा राष्ट्रीयता और देश प्रेम का एहसास जगाया और आगे चलकर यह कार्यक्रम आकाशवाणी के लिये " लक्ष्मी का अवतार " साबित हुआ - इस तमाम आकाशवाणी के इतिहास मेँ उनका नाम सुनहरे अक्षरोँ मेँ लिखा जायेगा -
 
मेरे फरिश्तोँ को भी पता न था कि नरेन्द्र जी जैसे विद्वान मेरे बारे मेँ इतनी अच्छी राय रखते हैँ कि जब "विविध भारती " विभाग की स्थपना होने लगी तो उन्होँने अपने असिस्टँट प्रोद्युसरोँ के लिये जहाँ दिल्ली से बी. एस्. भटनागरजी, विनोद शर्मा, सत्येन्द्र शरत्` और नागपुर से भृँग तुपकरी को चयन किया तो बम्बई से मुझे योग्य समझा और मेरा नाम हिन्दी प्रोड्युसरोँ की सूची मेँ रखा इस प्रकार मेरी ज़िन्दगी मेँ एक नया मोड लाने मेँ नरेन्द्र जी का एह्सान है - उन दिनोँ आकाशवाणी मेँ " आसिस्टेँट प्रोड्यूसर " बनना बडे गौरव की बात समझी जाती थी
 
जब विविध भारती के लिये नमूने के प्रोग्राम तैयार किये जाते थे, तो मैँने नरेन्द्र जी की " चाँद मेरा साथी " वाली टेकनीक को अपनाकर गज़लोँ और गीतोँ का मिलाजुला प्रोग्राम " गजरा " बनाया जिसमेँ हल्की फुल्की चटाखेदार हिन्दुस्तानी जबान की कम्पेयरिँग मेँ पिरोया - यह पहला प्रोग्राम था जो श्री जे. सी. माथुर को सुनाया गया था और उन्हेँ पसँद आया " यह आकाशवाणी का पँचरँगी प्रोग्राम है - विविध भारती, गजरा ! गीत के रँग -बिरँगे फूलोँ से बनाया गया - गजरा "
 
बीच मेँ एक बात याद आ गई - नरेन्द्र जी अच्छे खासे ज्योतीषी भी थे - " विविध भारती " प्रोग्राम पहली जुलाई को शुरु होने वाला था - फिर तारीख बदली आखिर पँडित नरेन्द्र शर्मा ने अपनी ज्योतिष विध्या की रोशनी मेँ तय किया कि यह प्रोग्राम ३ अक्तूबर १९५७ के शुभ दिन से शुरु होगा और प्रोग्राम का शुभारँभ हुआ तो " विविध भारती " का डँका हर तरफ बजने लगा -
लेखक: ज़नाब रीफत सरोश साहब ....

( आगे की कथा ..फिर कभी सुनाऊँगी ..आज इतना ही ..कहते हुए आपसे आज्ञा ले रही हूँ ...और मेरे पापा जी के लगाये इस पवित्र बिरवे को आज हरा भरा सघन पेड़ बना हुआ देखकर विविध भारती व आकाशवाणी सँस्था को सच्चे ह्र्दय से शुभकामनाएँ दे रही हूँ !
 
ईश्वर करेँ कि हर इन्सान जो इनसे जुडा हुआ है कार्यक्रम प्रस्‍तुतकर्ता या श्रोता के रुप मेँ, चाहे देशवासी होँ या परदेसी श्रोता, मित्र व साथी, सभी को बधाई देते अपार हर्ष हो रहा है !
शुभम्-भवति ..
स-स्नेह सादर-
- लावण्या

साप्ताहिकी 2-10-08

आप सबको ईद मुबारक !
और विविध भारती की स्वर्ण जयन्ति मुबारक !

स्वर्ण जयन्ति वर्ष का अंतिम सप्ताह होने से यह पूरा सप्ताह ख़ास रहा।

सुबह के प्रसारण में समाचारों के बाद चिंतन में स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तितत्वों के विचार और चाणक्य नीति की बातें बताई गई। वन्दनवार में मंगलवार को नवरात्र के आरंभ पर माँ दुर्गा के भजन से शुरूवात की गई। हर बार साल में दो बार 30 जनवरी और 2 अक्टूबर को सुबह के प्रसारण का आरम्भ वन्देमातरम के बाद मंगल ध्वनि के स्थान पर सम्मिलित स्वरों में भक्ति पद - वैष्णव जन सुनवा कर किया जाता है, यह आयोजन क्षेत्रीय सेवा से होता है। गुरूवार का आरम्भ भी ऐसे ही हुआ। फिर समाचारों के बाद वन्दनवार का आरम्भ लता मंगेशकर की आवाज में इसी भक्ति पद से हुआ। सप्ताह भर लोकप्रिय भजन सुनवाए गए और अंत में लोकप्रिय देशगान।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में शुक्रवार को देवआनन्द के जन्मदिन के अवसर पर उन्हीं पर फ़िल्माए गए गीत सुन कर अच्छा लगा। इसके अलावा बहुत दिन बाद सुना सचिन देव (एस डी) बर्मन का गीत -

सुन मेरे बँधु रे सुन मेरे मितवा

और कृष्णा कल्ले (काले) की आवाज़ भी बहुत दिन बाद सुनी। गुरूवार को भूले-बिसरे गीत में रमजान का माहौल अच्छा लगा। तलत महमूद के पठान फ़िल्म के गीत के साथ कुछ गीत ऐसे थे जिन्हें पहले शायद ही सुना हो। समाप्ति के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गीतों से होती रही।

7:30 बजे संगीत सरिता में इस सप्ताह भी हिन्दुस्तानी और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक जैसे रागों की चर्चा चली और दोनों विधाओं के कलाकारों से गायन और वादन सुनवाए गए। प्रस्तुत कर रही है शकुन्तला नरसिंहन। यह श्रृंखला भी छाया (गांगुली) जी ने तैयार की है और 1993 में पहली बार प्रसारित की गई थी पर विविध भारती की स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर नई श्रृंखलाएँ तैयार की जाती तो ज्यादा अच्छा होता।

त्रिवेणी में जीवन की बातों के साथ लोकप्रिय गीत सुने लेकिन मंगलवार को पहेलियों के बारे में और बुधवार को बचपन पर आलेख और गीत अच्छे लगे और इस तरह की प्रस्तुति नई सी लगी। गुरूवार को रेणु (बंसल) जी ने त्रिवेणी बापू को समर्पित की।

दोपहर 12 बजे से शुरू हुआ विशेष प्रसारण - जुबली झंकार फ़्लैश बैक। शुक्रवार को इस कार्यक्रम की शुरूवात कमल (शर्मा) जी और निम्मी (मिश्रा) जी ने की। पूर्व उदघोषकों से मुलाक़ात की - मोना ठाकुर, भारती व्यास जिन्होने पुराने दिन याद किए। पूरे कार्यक्रम को विभिन्न उदघोषको ने प्रस्तुत किया और विभिन्न चरणों में उन हस्तियों से बात की जिन्होनें विविध भारती को संवारा जिसमें लोकेन्द्र शर्मा जी, यतीन्द्र जी, मधुप शर्मा जी, बृजभूषण साहनी जी, रामसिंह पवार जी, विजय चौधरी जी ने अपनी यादों के मोती बिखेरे और अपनी पसन्द के गीत सुनवाए।

सबसे अच्छे लगे मीनाकुमारी और लता मंगेशकर की जयमाला की रिकार्डिंग के संस्मरण।

बीच-बीच में विभिन्न फ़िल्मी हस्तियों की शुभकामनाएँ भी सुनवाई गई - कामिनी कौशल, श्यामा, जैकी श्रौफ़, ॠषि कपूर, सतीश कौशिक। नरेन्द्र शर्मा का गीत अन्नू कपूर के अनुरोध पर सुनवाया गया -

कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से

3 बजे अमीन सयानी से सुना स्टार जयमाला। 1962 से शुरू हुई जयमाला की वीनू मजूमदार द्वारा तैयार संकेत धुन सुनवाई गई। बताया गया कि वर्तमान धुन बाद में तैयार की गई है। कई नई बातें सामने आई जैसे पहले केवल महिला उदघोषक ही जयमाला प्रस्तुत किया करते थे, विशेष जयमाला 1965 से शुरू हुई और पहली विशेष जयमाला नर्गिस ने दिल्ली के स्टुडियो से प्रस्तुत की थी। नर्गिस की बाद में प्रस्तुत की गई जयमाला और हेमन्त कुमार, केदार शर्मा, सुरैया की जयमाला के अंश सुनवाए गए।

शनिवार को आईआईटी के छात्र छाए रहे जिनसे बातचीत की युनूस जी ने। एक छात्र ने खुद की लिखी हिन्दी कविता गोधूलि शीर्षक से सुनाई जिसमें साहित्यिक हिन्दी झलक रही थी। आमतौर पर लगता है कि आईआईटी जैसे क्षेत्र के छात्र हिन्दी बोल ले यही बहुत है पर कविता भी करते है ऐसा परिचय दिलवाने के लिए विविध भारती को धन्यवाद। निदेशक से भी बातचीत हुई। सारी बातचीत का आधार थे कुछ सवाल जिससे कई भ्रम टूटे जैसे इस क्षेत्र के छात्र अपने करिअर के लिए देश आसानी से छोड़ सकते है। फिर बोले सितारे में प्रस्तुति रही मधुश्री की। उसके बाद अमीन सयानी ने प्रायोजित कार्यक्रमों की महफ़िल सजायी। सभी कार्यक्रमों की जानकारी दी और अंश भी सुनवाए जैसे एस कुमार्स का फ़िल्मी मुकदमा से टुनटुन के कार्यक्रम के अंश मज़ेदार रहे और बाद में परिवर्तित इस कार्यक्रम एस कुमार्स की फ़िल्मी मुलाकात में नरेन्द्र शर्मा जी से मुलाकात के अंश।

रविवार को सुनवाया गया कार्यक्रम प्यार हुआ इकरार हुआ और उसके बाद प्यार के गीत गूँजे कवि सम्मेलन में जिसमें प्रतिष्ठित कवियों नें भाग लिया। फिर सुना कुछ कार्यक्रमों का बदला स्वरूप जैसे आज राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनावाए जाते है पर पहले गीतों के एक स्वरूप पर जानी-मानी हस्तियाँ यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया करती थी। सुनवाया गया संगीतकार लक्ष्मीकान्त द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम जिसमें फ़िल्मों में लोकगीतों की चर्चा करते हुए सुनवाए गए ये फ़िल्मी लोकगीत -

हाय हाय ये मजबूरी ये मौसम और ये दूरी (फ़िल्म - रोटी कपड़ा और मकान)
नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा (फ़िल्म - रोटी)

सोमवार को सुनवाया गया - शीरी शीरी सुर लहरी जिस पर हम विस्तार से पहले ही चिट्ठा लिख चुके है। उसके बाद प्रसारित हुआ आह फ़िल्में वाह फ़िल्में जिसमें चर्चा चली कि क्या फ़िल्में सिर्फ़ मनोरंजन का साधन है ? चर्चा रही कि करोड़ों की लागत से बनने वाली फ़िल्में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं संदेश भी देती है।

मंगलवार को सुनवाया गया कैसे कैसे हवा महल जिसमें लोकप्रिय झलकियों के अंश सुनवाए गए जैसे - लोकप्रिय चरित्र ख़लीफ़ा शिद्दू और मुमताज़ पहलवान की झलकी सातवें आसमान की सैर, बीसवीं सदी का बच्चा, मोहब्बत का इंपोर्टेड तरीक़ा, के पी सक्सेना की झलकी नया अलिबाबा और चालीस चोंचलें, हवामहल पर हमला जो महिला वर्ग की थी यानि समाज के विभिन्न वर्ग के लिए तैयार झलकियों के अंश संजो कर विविधता बनाए रखी साथ ही इससे जुड़े विभिन्न सृजनकर्ताओं की रचनाओं को लिया गया जैसे गंगा प्रसाद माथुर, राजकुमार दाग़, दीनानाथ, सत्येन्द्र शरद, लोकेन्द्र शर्मा। चटपटी रही करौंदे की चटनी और मज़ेदार रही उदयपुर की ट्रेन।

इसके बाद बच्चों का कार्यक्रम हुआ जिनमें से एक सई परांजपे की नाटिका और एक नाटक इलाहाबाद केन्द्र का साठ के दशक का था। इसके अलावा बच्चों के गीत भी सुनवाए गए। हमने तो बच्चों का कार्यक्रम विविध भारती पर पहली बार इस जुबली झंकार कार्यक्रम में ही सुना। जिसके बाद सिनेयात्रा की गवाह विविध भारती सुनवाया गया। इस यात्रा में कलाकारों के पहले काम को याद किया गया जिसमें प्राण ने अपनी पहली फ़िल्म ख़ानदान को याद किया तो नरगिस ने तक़दीर को। इसमें सबसे भावुक रहा फ़िल्म तूफ़ान और दिया का संस्मरण, समाज में एक छोटे से बालक को इस फ़िल्म से प्रेरणा लेकर काम करते देखना।

बुधवार को बुज़ुर्गों को समर्पित कार्यक्रम यह शाम मस्तानी प्रसारित हुआ जिसमें आमंत्रित थे अभिनेता रमेश देव और लेखिका श्रीमती राजम पिल्लै और बातचीत कर रहे थे कमल (शर्मा) जी और निम्मी (मिश्रा) जी। श्रोताओं के फोन आते रहे अपने अनुभव सुनाते रहे और चर्चा अच्छी चली। राजम जी अधिक सैद्धान्तिक लगी, उन्होनें सिद्धान्तों की बात अधिक की जिसमें किताबी ज्ञान छलकता रहा जबकि रमेश देव जी अधिक व्यावहारिक लगे। जब राजम जी ने महिलाओं को जीवन की शाम में भी एक जीवन साथी ढूँढने की बात कही तब रमेश देव जी ने कहा कि व्यावहारिक रूप से यह ठीक नहीं। इसी विषय पर बहुत पहले रिकार्ड की गई फ़िल्मकार ख़्वाजा अहमद अब्बास की रिकार्डिंग के अंश सुनवाए गए। गाने भी फोन पर बात करने वाले श्रोताओं की पसन्द से सुनवाए गए और जोधपुर आकाशवाणी द्वारा तैयार रूपक भी सुनवाया गया। इसके बाद लोकलड़ियाँ फ़िल्मी रूनझुन कार्यक्रम में उत्तरप्रदेश के लोकगीत सुनवाए और फ़िल्मी गीत सुनवाए गए। इन गीतों का चुनाव ऐसे किया गया कि फ़िल्मी गीतों में लोक गीत साफ़ झलक आया जैसे सुचरिता गुप्ता की गाई कजरी -

बरसे बदरिया सावन की

और इसी धुन का यह फ़िल्मी गीत -

दिल का खिलोना हाय टूट गया

फ़िल्म मदर इंडिया का गीत - पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली तो एक्दम लोकगीत - मोरे अँगने की सोन चिड़य्या चली पर ही है। नए तरह का कार्यक्रम होने से बहुत अच्छा लगा।

इसके बाद लता मंगेशकर से ममता (सिंह) जी की फोन पर की गई बातचीत सुनवाई गई और सुनवाए गए उनके पसंदीदा गीत जिसका समापन अच्छा था जिसमें लता जी के विभिन्न भाषाओं में गाए गीत सुनवाए गए। शायद दक्षिण की भाषाओं में उन्होनें गीत नहीं गाए या बहुत ही कम गाए। इसके बाद पधारे आज के दौर के गायक कैलाश खेर जिन्होनें खुद के बारे में भी बताया और श्रोताओं से फोन पर बात भी की। बहुत ही स्वाभाविक बातचीत की कैलाश जी ने। बीच-बीच में शुद्ध हिन्दी के शब्द बोलना अच्छा लगा।

गुरूवार को जुबली झंकार सेना को समर्पित रहा। सेना के तीनों अंगों से भेंट हुई। बातचीत हुई, उनके गीत उनकी देश भक्ति की धुनों की गूँज हमें और अधिक सुरक्षा का आश्वास्न दे गई।

शनिवार को अभिनेता मुकेश खन्ना ने प्रस्तुत किया विशेष जयमाला। सभी लोकप्रिय गीत सुनने को मिले जिनमें से पुराने गीत भी थे पर बातचीत में महाभारत छाई रही। रविवार को शेफ़ाली कपूर ने फ़ौजी भाइयों और उनके परिजनों के संदेशों के साथ गाने सुनवाए और साथ ही श्रद्धांजलि दी गायक महेन्द्र कपूर को जो देशभक्ति गीतों के लिए विख्यात रहे। गुरूवार को शुरूवात हुई परिवार फ़िल्म के गीत से -

आज है दो अक्तूबर का दिन आज का दिन बड़ा महान
आज के दिन दो फूल खिले जिनसे महका हिन्दुस्तान
जय जवान जय किसान

शेष दिन नए और कभी-कभार बीच के समय के गाने बजते रहे।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में सुनवाए गए पूर्वी लोकगीत। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में पढे गए पत्रों में कुछ नए तरह के पत्र थे जैसे यह पूछा गया कि विविध भारती के कुल कितने केन्द्र है। महेन्द्र मोदी जी ने एक अच्छी ख़बर सुनाई कि सुहाना सफ़र कार्यक्रम 3 अक्तूबर के बाद भी जारी रहेगा। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में क़व्वालियाँ सुनी जिसमें रमज़ान का ध्यान रखा गया। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में गायक महेन्द्र कपूर से की गई बातचीत की रिकार्डिंग सुनवाई गई। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने।

8 बजे हवामहल में गुरूवार को सुना सरस्वती कुमार दीपक का लिखा रूपक पूजा के फूल जो विशेष था 2 अक्तूबर के लिए जिसके निर्देशक थे पुरूषोत्तम दारवेकर। कई-कई बार सुना यह रूपक पर हर बार की तरह कल भी यह नया लगा। शेष दिन सामान्य झलकियाँ सुनवाई गई जैसे काग़ज़ की नाव जिसके निर्देशक है जयदेव शर्मा कमल।

रात 9 बजे गुलदस्ता में हेमन्त कुमार का गीत सुनना अच्छा लगा। अच्छी बंदिश की ग़ज़लें सुनवाई गई वरना कुछ आधुनिक बंदिशों में ग़ज़ल सुनने पर पता ही नहीं चलता कि ग़ज़ल कब शुरू हुई और कब ख़त्म।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में शुक्रवार को देवआनन्द के जन्मदिन को ध्यान में रखकर नवकेतन के बैनर तले बनी फ़िल्म देस परदेस के गीत सुनवाए पर कल सुनवाए गए 2 अक्तूबर फ़िल्म के गीत मौके के अनुसार कुछ जमे नहीं। इसके अलावा मैं सुन्दर हूँ, संघर्ष जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत बजे।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अहमद वसी से बातचीत में संगीतकार नौशाद ने पुराने दिनों को याद किया और बताया कि पहले फ़िल्मों में संगीतकार का अलग से नाम नहीं दिया जाता था। वैसे नाम गीतकार और गायक का भी नहीं दिया था। ग़ुलाम हैदर पहले संगीतकात थे जिनका नाम दिया गया था। साथ ही यह भी बताया कि पैसे भी बहुत कम मिला करते थे, सांजिदों को 10-20 से 50 रूपए तक मिलते थे। न्यू थियेटर की बात करते हुए आर सी बोराल और पंकज मलिक को गुरू माना और देवदास की चर्चा करते हुए जानकारी दी कि इसमें के एल सहगल के गाए सभी गीत विभिन्न रागों पर पूरी तरह आधारित थे।

10 बजे छाया गीत में स्वर्ण जयन्ति का रंग नज़र नहीं आया। सबका वही पुराना अंदाज़ रहा।

विविध भारती के स्‍वर्ण जयंती समारोह का समापन है आज । दिन भर होंगे विशेष कार्यक्रम ।

रेडियोनामा पर विविध भारती के स्‍वर्ण जयंती समारोहों का ना सिर्फ साल भर जिक्र होता आया है बल्कि उनके अंश भी अपलोड किये जाते रहे हैं । और उनकी समीक्षाएं भी होती रही हैं ।

आज तीन अक्‍तूबर है । आज ही के दिन सन 1957 में विविध भारती की स्‍थापना हुई थी  । पूरे साल भर विविध भारती ने अपनी स्‍वर्ण जयंती पर विशेष कार्यक्रम किए । और आज स्‍वर्ण जयंती समारोह का समापन हो रहा है ।

आज सबेरे छह बजे से पौने आठ बजे तक जाने माने गायक अनूप जलोटा ने विशेष वंदनवार प्रस्‍तुत किया ।

अगला विशेष शो है दिन में बारह बजे  । जिसमें जानी मानी पार्श्‍वगायिका सुनिधि चौहान बन जायेंगी रेडियोजॉकी । और यूनुस खान के संग वो प्रस्‍तुत करेंगी जुबली झंकार कार्यक्रम । इस कार्यक्रम में उनके कई गानों के बनने की कहानी है । सुनिधि के मन की बातें हैं । और हैं वो गाने जो उनके दिन के क़रीब हैं चाहे वो उनके हों या दूसरों के । बहुत ही अंतरंग और आत्‍मीय होगा ये कार्यक्रम ।

इसके बाद दिन में दो बजे दूसरा शो शुरू होगा--गोल्‍डन जुबली मनचाहे गीत । इसे प्रस्‍तुत कर रहे हैं राजेंद्र त्रिपाठी और शहनाज़ अख्‍तरी ।

दिन में तीन बजे से एक और नया शो होगा । जिसे पेश करेंगे जाने माने ग़ज़ल गायक तलत अज़ीज़ । ये दरअसल गैरफिल्‍मी ग़ज़लों, गीतों और क़व्‍वालियों का गुलदस्‍ता होगा । तलत अज़ीज़ अपनी शीरीं ज़बान में बयां करेंगे किस्‍से । और याद करेंगे कुछ कालजयी रचनाओं को ।

इसके बाद एक हस्‍ती आयेगी और कहेगी ख़ामोश । जी हां । जाने माने अभिनेता शत्रुघ्‍न सिन्‍हा विशेष जयमाला कार्यक्रम पेश करेंगे । आज उनकी अदाकारी का एक नया रंग सुनने को मिलेगा आपको ।

और फिर रात नौ बजे से होगा आज का आखिरी शो । ये है गोल्‍डन जुबली छायागीत । जिसमें संगीतकार रवि यादों के झरोखों में झांकेंगे ।

इस तरह होगा गोल्‍डन जुबली आयोजनों का समापन ।

वैसे आपको बता दें कि रेडियोनामा पर पंडित नरेंद्र शर्मा की सुपुत्री और जानी मानी ब्‍लॉगर लावण्‍या जी खासतौर पर एक आलेख तैयार कर रही हैं । ये आलेख आप रेडियोनामा पर पढ़ पायेंगे ठीक डेढ़ बजे के बाद  ।

Thursday, October 2, 2008

तुमसे ज़िन्दगी की सारी तल्ख़ियाँ हारती....विविध भारती

मन महक रहा है विविध भारती को नित नये सोपान रचते...देखते,सुनते.बस इसी आलम में लिख गया विविध भारती के नाम यह कविता.सच कहूँ कविता मुझे कभी आई नहीं लेकिन विविध भारती को एक बड़ी क़ामयाब पारी पूरी करते भावनाओं ने लिया विस्तार और काग़ज़ पर उतर आये ये शब्द.कविता का व्याकरण समझने वाले मेरी इस रचना से निराश ही होंगे लेकिन हम विविध भारती मुरीदों की भावनाओं का यह गुलदस्ता यानी मेरी यह कविता विविध भारती और अपने करोंड़ों श्रोताओं के लिये अपने आप को झोंक देने वाले प्यारे प्यारे प्रसारणकर्ताओं को हमारा आत्मीय सलाम है.

मेरे यह शब्द काव्य मनीषी और विविध भारती के प्रथम प्रोड्यूसर पं.नरेन्द्र शर्मा
की दूरगामी कल्पनाशीलता रचनात्मकता को भी विनम्र वंदन है.


रेडियोनामा की बधाई और शुभकामना....

विचार,सुर,शब्द,ज्ञान और मनोरंजन का यह पंचरंगी सिलसिला बना रहे बरसों बरस
हम रहें न रहें ..सिवैया और रसगुल्ले सी मीठी विविध भारती बनी रहे सरस.






भोर बेला में बाँध देती भावाभीने भजनों के वंदनवार
भूले-बिसरे गीतों से सुरभित होता है मन-संसार
दुनिया भर के समाचार
और बाद में एक ही फ़नकार

शास्त्रीय संगीत,लोक गीत और चित्रपट के
मनचाहे गीत सजाती जयमाला
हवा महल और चित्रशाला
बरसों बरस से है प्रीत पुरानी
ज़िन्दगी की नेमत रही है गीतों भरी कहानी

छायागीत से महकती है रात
मिलन यामिनी की क्या बात
हैलो फ़रमाइश बेमिसाल
हैलो सखी जैसे बिन्दी लगी हो भाल

बीते कल की और आज की आवाज़
हमेशा देती रही सुरीली परवाज़
गीत बजे,धुनें बजी और बजते रहे
अनगिनत और बेजोड़ साज़

लोक समवेदनाओं का चौबारा
जिससे आगे भागता समय हारा
रंग-तरंग में बहते रहे शेरोसुख़न
पत्रावली का अंदाज़ बड़ा प्यारा


मोगरे सी महकती अनुरंजनी
स्वर सुधा की बात निराली
इन सब में महकते रहे सुर-ताल
संगीत सरिता सरगम की प्याली

बीती आधी सदी और बीतेंगे साल
श्रोताओं के कान रहेंगे मालामाल
संस्कार और संस्कृति को देती विस्तार
मात्र मनोरंजन नहीं;है सार्थक विचार

पवित्रता और तहज़ीब की उतारती आरती
तुमसे ज़िन्दगी की सारी तल्ख़ियाँ हारती
सम्मानित होती भाषा और माँ भारती
जय जय विविध भारती,जय विविध भारती.


निवेदन :इन पंक्तियों को लिखते लिखते मेरी स्मृतियों में दर्ज़ वर्तमान और विगत के कार्यक्रमों के शीर्षक ताज़ा हो गए हैं . इनमें किसी तरह का कोई समयक्रम या छूट गये कार्यक्रमों के नामों की कोई कमीं न तलाशें ..यह एक सांकेतिक अभिव्यक्ति है.

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