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Friday, November 28, 2008

साप्ताहिकी 27-11-08

सप्ताह की समाप्ति पर पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के निधन के समाचार से शोक की लहर उठी और गुरूवार रात में छाया गीत की जगह संजीदा गीत सुनवाए गए।

पूरे सप्ताह सवेरे 6 बजे समाचार के बाद प्रेमचन्द, टाँलसटाय, महात्मा गाँधी जैसे विद्वानों के विचार और स्वामी विवेकानन्द की युवा शक्ति को आह्वान करने की बातें चिन्तन में बताई गई। वन्दनवार में भजन भी सप्ताह भर अच्छे सुनवाए गए। अंत में देशगान भी अच्छे रहे पर विवरण नहीं बताया गया। हालांकि ऐसे गीत सुनवाए गए जो प्रसिद्ध कवियों की रचनाएँ है जैसे -

भारतमाता ग्राम वासिनी - सुमित्रानन्दन पंत का लोकप्रिय गीत है
यही है मेरा देश मेरा देश मेरा देश - बालकवि बैरागी की रचना है

कम से कम रचयिता का नाम तो बताया जा सकता था।

7 बजे भूले-बिसरे गीत में अधिकतर भूले बिसरे गीत ही बजे जैसे -

औरत तो है ज़हर की पुड़िया
बन्दूक से नहीं गोली से नही
प्यार से मर्द को बना रखा है ग़ुलाम

पर कुछ लोकप्रिय गीत भी सुनवाए गए जैसे मीना कपूर का गाया यह गीत -

मोरी अटरिया पे कागा बोले
मोरा जिया डोले कोई आ रहा है

7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला कौंस के प्रकार समाप्त हुई जिसे प्रस्तुत कर रही थी प्रसिद्ध गायिका अश्विनी भेड़े देशपाण्डेय। कौंस के विभिन्न रागों पर आधारित इस श्रृंखला में हर राग को गाकर समझाया गया जिसमें हारमोनियम पर संगत की सीमा शिरोडकर और तबले पर संगत की विश्वनाथ शिरोडकर ने। राग चन्द्र कौंस की जानकारी दी गई, बताया गया कि मालकौंस में दो स्वर कम कर राग चन्द्र कौंस तैयार किया गया। इस तरह तैयार यह राग 50-80 वर्ष पुराना ही है। इसमें गायन भी सुनवाया गया। इसी तरह राग मधुवन्ती से जन्म हुआ राग मधु कौंस का। इसकी जानकारी देते हुए राग मधुवन्ती पर आधारित ग़ज़ल सुनवाई गई -

रस्में उल्फ़त को निभाए तो निभाए कैसे
हर तरफ़ आग है दामन को बचाए कैसे

और एक गीत सुनवाया गया जिसमें राग मधुवन्ती और मधुकौंस दोनों की झलक थी पर अच्छा होता अगर ऐसा गीत सुनवाया जाता जो केवल मधुकौंस पर आधारित होता। राग सम्पूर्ण मालकौंस की जानकारी देते हुए बंदिशे सुनवाई गई। बताया गया कि संपूर्ण मालकौंस में कोई फ़िल्मी गीत ध्यान में नहीं आ रहा है और मराठी लोक गीत सुनवाया गया। बताया गया कि राग चारूकौंस कर्नाटक शैली के राग चारूकेशी से निकला है, जानकारी देने के बाद इस राग में भी गायन सुनवाया गया और साथ में प्यार का मौसम फ़िल्म का यह गीत -

तुम बिन जाऊँ कहाँ

कुल 7 कड़ियों की छोटी सी इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी में बागेश्री कौंस और पंचम मालकौंस की जानकारी दी। यह बताते हुए श्रृंखला समाप्त की गई कि कौंस के कई प्रकार है जैसे हरि कौंस, श्याम कौंस आदि। बातचीत की अशोक (सोनावने) जी ने। धन्यवाद कांचन (प्रकाश संगीत) जी इस जानकारीपूर्ण कार्यक्रम को तैयार कर प्रस्तुत करने के लिए।

एक और श्रृंखला आरंभ हुई - नाद निनाद जिसे प्रस्तुत कर रहे है ख़्यात बांसुरीवादक विजय राघव राव। इसमें संगीत की प्रवृतियों को बताया जा रहा है। एक बहुत अच्छी बात से शुरूवात की गई कि गीत वाद्य और नृत्य की त्रिवेणी है हमारा संगीत। यह श्रृंखला छाया (गांगुली) जी द्वारा 1992 में तैयार की गई।

7:45 पर त्रिवेणी में शुक्रवार को क्रोध विषय पर बातें हुई पर गीत सुनवाए गए भूल विषय पर, पहला गीत ऐसी स्थिति का है कि जहाँ नायक से एक घर के मुखिया का एक्सीडेंट हो जाता है जिससे वह घर तहस-नहस हो जाता है, यह नायक की भूल है या अपरिपक्वता, यह फ़िल्म है राजश्री प्रोडक्शनस की शिक्षा इसमें क्रोध है ही नहीं, कृपया गानों के चुनाव ध्यान से करें। इसके अलावा वैज्ञानिक उन्नति की और किसी भी तरह का भेदभाव न करने की बातें हुई। मंगलवार को विषय स्पष्ट नहीं हुआ, पहले कहा गया हर एक में प्राकृतिक गुण और वर्जनाएँ होती है फिर प्रकृति की बात हुई फिर कुछ और…

दोपहर 12 बजे हर दिन प्रसारित हुआ कार्यक्रम एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने। शुक्रवार को पधारी निम्मी (मिश्रा) जी फ़िल्में रही काँटे, ताल, ज़ख़्म, अपने, अक्सर, सिंह इज़ किंग, चमेली, लगान जैसी नई लोकप्रिय फ़िल्में। आरंभिक काव्यात्मक उदघोषणा अच्छी लगी। शनिवार को दुश्मन, हरे राम हरे कृष्ण, आए दिन बहार के, तेरे घर के सामने, तेरे मेरे सपने, मेरा गाँव मेरा देश जैसी पचास से सत्तर के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आए अमरकान्त जी। रविवार को जब जब फूल खिले, त्रिशूल, कन्यादान, मेहदी लगी मेरे हाथ, हसीना मान जाएगी जैसी साठ से अस्सी के दशक की अभिनेता शशिकपूर की लोकप्रिय फ़िल्में रही। सोमवार को दिल है कि मानता नहीं, राम लखन, पेज 3, जब वी मेट, मैनें प्यार क्यों किया, पुकार जैसी नई फ़िल्में लेकर आईं रेणु (बंसल) जी। मंगलवार को आए राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी, फ़िल्में रही वीर ज़ारा, सलाम नमस्ते, गुरू, जानेमन जैसी नई फ़िल्में। बुधवार को आए कमल (शर्मा) जी फ़िल्में रही याराना, जवानी दीवानी, पराया धन, कारवाँ, अपना देश, टूटे खिलौने, खट्टा मीठा जैसी सत्तर अस्सी के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को आए कमल (शर्मा) जी और फ़िल्में रही सुजाता, बन्दिनी, दुलारी, बरसात, दिल दिया दर्द लिया, बरसात की रात, ग़ज़ल जैसी पचास साठ के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में।

ऐसे गीत भी सुने जो बहुत लम्बे समय से नहीं बजे जैसे अपना देश फ़िल्म का यह गीत -

कजरा लगाके गजरा सजाके बिजली गिराके जय्यो न

समझ में नहीं आया श्रोताओं ने इस फ़िल्म में आशा भोंसलें और आर डी बर्मन के अपने विशेष अंदाज़ में गाए इस गीत के लिए एस एम एस क्यों नहीं भेजा -

दुनिया में लोगों को धोखा कभी हो जाता है

यह गीत अपने समय का बहुत-बहुत लोकप्रिय गीत है।

हर गाने के लिए संदेश भेजने वालों के नाम और शहर का नाम बताया जाता रहा। इस कार्यक्रम को विजय दीपक (छिब्बर) जी प्रस्तुत कर रहे है और प्रस्तुति सहयोग रहा निखिल धामापुरकर जी, मंगेश सांगले, सुभाष भावसार, स्वाति भण्डारकर और दिलीप (कुलकर्णी) जी का।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में मन के मंजीरे एलबम से शुभा मुदगल की आवाज़ में राजस्थानी गीत सुना -

पधारो म्हारे देश

केवल भाषा सुन कर ही लग रहा था कि यह राजस्थानी गीत है, न तो गायकी और न ही अंदाज़ राजस्थानी था, आवाज़ भी काँप रही थी, लगा जैसे ज़बरदस्ती राजस्थानी गीत उनसे गवाया गया।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में नए पुराने गीत सुनवाए गए। प्रिंस फ़िल्म का यह गीत बहुत दिन बाद सुना -

बदन पे सितारे लपेटे हुए ऐ जाने तमन्ना किधर जा रही हो

3 बजे शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। गृहणियों के, छात्राओं के, शिक्षित और कम पढी लिखी महिलाओं से बातचीत हुई। अक्सर फोन गाँव ज़िले से ही आते है पर इस बार एक फोन दिल्ली शहर से भी था। अधिकतर नए गाने ही पसन्द किए गए।

सोमवार को सूखे मेवे की चक्की और मूँगफली की बर्फ़ी बनाना बताया गया। इस दिन सांस्कृतिक एकता दिवस होने से संबंधित बातें भी बताई गई। साथ ही राजनैतिक क्षेत्र में विभिन्न क्षेत्रों से आई प्रथम महिलाओं से संबंधित जानकारी दी गई। मंगलवार को पर्यटन में मार्किंटिंग, कैटिरिन, टिकेटिंग जैसे पर्यटन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में करिअर बनाने के लिए कोर्स करने की जानकारी दी गई। गाने नए सुनवाए गए। बुधवार को सर्दियों में त्वचा की देखभाल के लिए घरेलु नुस्ख़े बताए गए जिसमें कहा गया कि सब्जियों और फलों के रस जैसे आलू, गोभी आदि साथ ही शहद और खाने का तेल आदि लगाने से त्वचा अच्छी रहती है। गुरूवार को सखियों की इस शिकायत पर कि उनके पत्र शामिल नहीं किए जा रहे, सखियों के पत्र ही पढे गए। एक पत्र उड़ीसा से आया था जिसमें अच्छी जानकारी दी गई कि मानव की रसोई का आरंभ कैसे हुआ जैसे आदि मानव ने कैसे कच्चे मांस से पका हुआ भोजन खाना और नमक मिला खाना शुरू किया। पर दोनों सखियों (निम्मी जी और चंचल जी) ने इसे मानव का विकास कहा जबकि यह सभ्यता का विकास कहलाता है और यह समाज शास्त्र का विषय है जबकि मानव का विकास विज्ञान की बातें है जिसमें मनुष्य के शारीरिक और मानसिक विकास की बातें की जाती है।

3 बजे शनिवार को क्षेत्रीय केन्द्र हैदराबाद से तेलुगु में पर्यावरण से संबंधित प्रायोजित कार्यक्रम सुना - कोशिश सुनहरे कल की। रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में हमेशा की तरह लोकप्रिय फ़िल्मों के लोकप्रिय गीत सुनवाए गए।

शनिवार और रविवार को नाट्य तरंग में सुना नाटक सात कदम आसमान में इस मूल गुजराती नाटक के लेखक है कुन्दनिका कपाड़िया जिसका हिन्दी रेडियो नाट्य रूपान्तर किया है प्रशान्त पाण्डेय ने जिसके निर्देशिक है सुदर्शन कुमार। यह नाटक आधुनिक होती महिलाओं पर केन्द्रित था कि कैसे उन्हें घर और समाज में हर स्तर पर दिक्कतें होती है क्योंकि जिस तरह महिलाएँ अपने विचार बदल रही है उसी तरह पुरूष और समाज नहीं बदल रहा।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस इस सप्ताह भी छुक-छुक करती रही। गानों के लिए समय कुछ अधिक ही रहा। किताबों की दुनिया में विदेशी चिंतक सुकरात पर जानकारी दी चित्रा कुमार ने। संगीतकार भप्पी लहरी को जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी गई और उनके गीत सुनवाए गए। एक श्रोता की भेजी सचिन तेंदुलकर के करिअर संबंधी जानकारी पढकर सुनाई गई जिसका औचित्य मुझे समझ में नहीं आया क्या युवा सचिन के बारे में नहीं जानते ?

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारे में पिटारा कार्यक्रम के अंतर्गत बाईस्कोप की बातें कार्यक्रम में चाचाचा फ़िल्म की बातें बताई गई। इस फ़िल्म के बहुत से तार हैदराबाद से आन्ध्रप्रदेश से जुड़े है। यह फ़िल्म मैंनें देखी है। इस कार्यक्रम में लोकेन्द्र शर्मा जी ने इतनी अच्छी तरह से इस फ़िल्म की बातें बताई कि बहुत दिन पहले देखी गई इस फ़िल्म के सीन नज़रों के सामने आ गए ख़ासकर मन्दिर में जन्माष्टमी के समय गाया जाने वाला गीत - लल्ली सज धज कर चली, बालों में गजरा…

इस सीन में साड़ी पहने सिर पर पल्लू लिए हाथ में पूजा की थाली लिए पारम्परिक भारतीय छवि में हेलन बेहद ख़ूबसूरत लगी। बातें सुनते गए तो सीन याद आते गए, हेलन का बेजोड़ अभिनय जिसमें भरी हुई आँखों से बैसाखियों की ओर देखना फिर गाना सुन कर बैसाखियाँ घिसटते हुए दौड़ना सभी याद आने लगे। अच्छे संवाद संपादित कर सुनवाए गए। इतनी अच्छी प्रस्तुति रही कि पाश्चात्य नृत्य चाचाचा को लेकर बनाई गई नायक चन्द्रशेखर की इस फ़िल्म का श्रोता पूरा आनन्द ले सकें।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में आयुर्वेद चिकित्सक कन्हैया लाल शाह से कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने गठिया रोग पर बातचीत की। बढती उमर में होने वाला जोड़ो का दर्द उसके कारण पर विस्तार से जानकारी दी गई। एक बात अच्छी बताई गई कि अन्य देशों में मौसम के कारण स्वास्थ्य के लिए कुछ सीमा तक मदिरापान किया जाता है पर भारत के मौसम के अनुसार इसकी आवश्यकता ही नहीं है। बुधवार को आज के मेहमान में लेखक, निर्माता, अभिनेता सचिन से ममता (सिंह) जी की बातचीत सुनवाई गई। बालकलाकार से शुरू करिअर की अच्छी जानकारी दी। चंदा और बिजली जैसी फ़िल्म को भी याद किया और बालिका वधू की भी बातें हुई।

हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को विभिन्न स्तर के श्रोताओं के फोन आए जिसमें कम शिक्षित कामकाजी श्रोता भी थे, सभी से हल्की-फुल्की बातचीत होती रही और उनके पसंदीदा नए पुराने गीत बजते रहे।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में सभी गीत नए सामान्य रहे।

7 बजे जयमाला में रोज़ फ़ौजी भाइयों के फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए जिसमें नए गाने ज्यादा थे, कभी-कभार पुराने गीत भी सुनवाए गए जिसमें रविवार को बहुत अच्छे गीत शामिल रहे और स्वामी फ़िल्म का लता जी का गाया यह गीत तो बहुत दिन बाद सुना -

पल भर में यह क्या हो गया
लो मैं गई वो मन गया
चुनरी कहे सुन री पवन
सावन लाया अब के सजन

बहुत अच्छे बोल अमित खन्ना के और बहुत ही मधुर गीत।

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया शायर और गीतकार नुसरत बदरू ने। प्रस्तुति काफी शायराना रही पर गीत ऐसे सुनवाए जो जाने-पहचाने नहीं थे, अंतिम दो गीत तो ग़ैर फ़िल्मी थे ही पर पूरा कार्यक्रम सुन कर लग रहा था जैसे ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का गुलदस्ता कार्यक्रम सुन रहे है।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में मराठी, पूर्वी गीत सुनवाए गए जिसमें इन्द्राणी पाटिल का मराठी लोकगीत अच्छा लगा। पत्रावली में दोनों दिन, शनिवार और सोमवार को कुछ ऐसे श्रोताओं के पत्र शामिल रहे जो बरसों से रेडियो सुन रहे है। कुछ अच्छे कार्यक्रम बंद होने की शिकायतें भी हुई और सुझाव भी दिए गए। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनी। बुधवार के इनसे मिलिए कार्यक्रम में गायिका जसविन्दर नरूला से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की अगली कड़ी सुनवाई गई। गायिका ने आध्यात्मिक अनुभूति की बात की, जब कमल जी ने संघर्ष के बारे में पूछा तो भाग्य की बात बता दी। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे पाकीज़ा फ़िल्म का गीत।

8 बजे हवामहल में हास्य झलकियाँ सुनी -चक्कर बहस का (निर्देशक - एम एस बेग), तलाश एक वकील की (रचना - नदीम अजमेरी और निर्देशक - जटाशंकर शर्मा), शान्ति (रचना गंगा प्रसाद माथुर निर्देशिका लता गुप्ता) , अंगूर खट्टे है (निर्देशक कमल दत्त और रचना वी एस आनन्द)

रात 9 बजे गुलदस्ता में गीत कुछ कम ही रहे और ग़ज़लों की संख़्या अधिक रही। अच्छा लगा अहमद वसी का कलाम ख़ैय्याम के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले की आवाज़ में सुनना।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में पगला कहीं का, तेजाब, पहेली, दौलत जैसी साठ से अस्सी के दशक तक की लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अभिनेत्री माला सिन्हा से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की पहली कड़ी सुनी। अच्छी शुरूवात हुई। यह नई बात पता चली कि माला सिन्हा बचपन में गायिका थी, शिक्षा भी ली थी पर बन गई अभिनेत्री जिसकी शुरूवात हुई बंगला फ़िल्मों से, यह भी नई बात पता चली कि बम्बईया हिन्दी फ़िल्मों की तरह रोने-धोने के सीन के लिए कलकत्ता में ग्लिसरीन नहीं लगाई जाती बल्कि सचमुच रोना पड़ता है और रोना न आने पर निर्माता थप्पड़ मार कर रूलाते है। हर बात उन्होनें दिल से बताई और खुल कर बातें की। हिमालय की गोद में फ़िल्म का सीन सुनवाया गया और अनपढ फ़िल्म के साथ दिल तेरा दीवाना जैसी अन्य फ़िल्मों के गीत भी सुनवाए गए।

10 बजे शुक्रवार को कमल (शर्मा) जी द्वारा प्रस्तुत छाया गीत मज़ेदार रहा जो फ़िल्मों में प्रेतात्माओं पर आधारित था। सच बताया कि फ़िल्मों में भूत-प्रेत विशेषकर चुड़ैलें (महिला भूत) बहुत ग्लैमरस होती है जबकि वास्तव में भूत-प्रेत-चुड़ैलों को भयानक माना जाता है। संबंधित गाने भी अच्छे चुने गए। अमरकांत जी ने अपना वही पुराना कार्यक्रम दुबारा, तिबारा, जाने कितनी बार प्रसारित, को फिर से सुनवाया।

राष्ट्रीय शोक,आकाशवाणी और एफ़एम चैनल्स.

पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथप्रताप सिंह के निधन के कारण भारत सरकार ने राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है. आज सुबह आकाशवाणी का स्थानीय क्षेत्रीय चैनल ट्यून किया तो गीता-पाठ सुनाई दिया. विविध भारती पर भी पूरी संजीदगी थी. हाँ प्रसारण की शुरूआत में बजने वाली शहनाई की मंगल ध्वनि भी नहीं थी उसकी जगह बिना तबले की सारंगी से दिन शुरू हुआ. उदघोषक के स्वर में भी एक सहज गंभीरता थी. इधर विविध भारती को ट्यून करने में रोज़ ही ख़ासी मशक्क़त करनी पड़ती है क्योंकि हैवी ट्रांसमीटर्स से एफ़एम चैनल्स (मेरे शहर इन्दौर में रेडियो मिर्ची,माय एफ़एम,बिग एफ़एम. और एस.एफ़एम हैं) ऐसा अतिक्रमण कर बैठे हैं कि विविध भारती को वाक़ई ढूंढना ही पड़ता है. बहरहाल बरास्ता एफ़एम.चैनल्स जब विविध भारती तक पहुँचा तो लाज़मी है इन नये ज़माने के चैनल्स के प्रसारणों पर भी कान चला गया. जब से इन एफ़एम चैनल्स को पता पड़ा है कि विविध भारती के पास सुबह भक्ति संगीत के स्लॉट वंदनवार या रीजनल प्रसारण के वंदना को अधिकतम श्रोता मिलते हैं तो ये चैनल्स भी कोई सुबह पाँच बजे या साढ़े पाँच बजे भकितमय हो जाते हैं .शोक के पल में भक्ति संगीत भी किस क्वालिटी का हो ये देखने वाला इन नये-नकोरे चैनल्स पर कोई नहीं होता.कोई माता रानी के गीत बजा रहा है तो कोई विष्णु सहस्त्रनाम,कोई गायत्री मंत्र बजा रहा था तो कोई श्री गणेश अथर्वशीर्ष.यानी राष्ट्रीय शोक के समय में भक्ति संगीत भी किस मूड हो ये देखने की किसे फ़ुरसत है. सात बजे के बाद तो वही शोर मचाते रेडियो जॉकीज़ नमूदार हो गए,वही उनका खिलंदड़ अंदाज़ , वही वायब्रेंसी और एनर्जी लेवल बढ़ाती धमाल.रीजनल स्टेशन पर शुभलक्ष्मी,शंकर-शंभू,
और दीगर कई स्थानीय कलाकारों की आवाज़ों में निबध्द ऐसी रचनाएँ थीं जो संकेत दे रहीं थीं की ये राष्टीय शोक की बेला में बजने वाला भक्ति संगीत है.

एफ़एम चैनल्स के साथ प्रसार भारती क्या अपने अनुबंध में इन राष्ट्रीय महत्व के प्रसारणों के लिये कोई विशेष नियमों का खुलासा नहीं करती.जब चार-चार चैनल्स पर नये गीतों के तड़क भड़क वाले गीत बज रहे हों तब आकाशवाणी और विविध भारती का सोग भरा प्रसारण गुम हो जाता सा प्रतीत होता है.

याद है मुझे जब डाँ.ज़ाकिर हुसैन,फ़क़रूद्दीन अली अहमद,डॉ.शंकरदयाल शर्मा,इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी,जयप्रकाश नारायण,वी.वी.गिरि,ज्ञानी ज़ैलसिंह जैसी राष्ट्रीय हस्तियों के दिवंगत होने पर आकाशवाणी और दूरदशन के ह्र्दयस्पर्शी प्रसारणों से घर-परिवार में भी ऐसा वातावरण बन जाता था जैसे परिवार में ही कोई ग़मी हो गई हो. जसदेवसिंह,मैलविन डिमेलो,सुरजीत सेन और कमलेश्वरजी की खनकती आवाज़ों की वे सारी धीर-गंभीर कमेंट्री दिवंगत शख़्सियतों को हमारी आँखों के सामने ला खड़ा करती थी.
आज एन एफ़एम चैनल्स के पास टैक्नीक है,पैसा है,स्पॉंसरशिप्स है,एंडोर्समेंट्स हैं और है बेताहाशा शोर जो मनुष्य की समवेदना को की थाह नहीं ले पा रहा है.

Thursday, November 27, 2008

शौकिया रेडियो ऑपरेटर को HAM क्यों कहा जाता है?

आईये रेडियोनामा पर बी.एस. पाबला का स्‍वागत करें । उनका अपना ब्‍लॉग है 'जिंदगी के मेले' । इस ब्‍लॉग पर जब उन्‍होंने हैम रेडियो पर ये पोस्‍ट लिखी तो हमने उनसे रेडियोनामा पर जुड़ने का आग्रह किया । जिसे उन्‍होंने सहर्ष स्‍वीकार कर लिया । हैम रेडियो से पाबला जी का बड़ा जुड़ाव है ज़ाहिर है कि उनकी इस श्रृंखला के ज़रिए रेडियोनामा पर एक नया आयाम जुड़ेगा ।

- यूनूस ख़ान ।

HAM रेडियो की तुलना इंटरनेट से नही की जा सकती। किसी प्राकृतिक विपत्ति में जब सब साधन नष्ट हो जायें तो यही है जिससे शेष विश्व से संपर्क हो सकता है। आज से 30-35 साल पहले के मुकाबले शौकिया रेडियो ऑपरेटर बनने व आनंद उठाने की प्रक्रिया में ज़्यादा अन्तर नहीं आ पाया है। जैसा कि कहा जाता है 'विचारधारा कभी नहीं बदलती, मात्र व्यवस्था बदल जाती है' आज समय के साथ चलते हुए, शौकिया रेडियो ऑपरेटर की सहायता के रूप में कई software भी आ गए हैं।

एक शौकिया रेडियो ऑपरेटर को HAM कहे जाने का कोई विशेष कारण ज्ञात नहीं है। कुछ व्यक्ति, इस तीन अक्षरों के शब्द HAM का सम्बन्ध, तीन महान रेडियो प्रयोगधर्मियों के नाम से जोड़ते हैं। वे हैं, हर्ट्ज (Hertz), जिन्होंने व्यवहारिक रूप में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों का प्रदर्शन, 1988 में किया था, आर्मस्ट्रांग (Armstrong) जिन्होंने रेडियो तरंगों के लिए आवश्यक resonant oscillator circuit विकसित किया था और मारकोनी (Marconi) जिन्होंने वर्ष 1901 में अटलाण्टिक महासागर के आर-पार, पहला रेडियो संपर्क स्थापित किया था और वे वर्ष 1909 में भौतिकी के नोबल पुरस्कार विजेता भी रहे।

दूसरों के अपने संस्करण है, उन के अनुसार रेडियो संचार के शुरूआती दिनों के दौरान, सरकार ने शौकिया रेडियो ऑपरेटरों को कुछ निश्चित फ्रीक्वेंसियों का उपयोग करने की अनुमति दी। शौकिया रेडियो स्टेशनों की frequency की स्थिति, उस समय बाक़ी फ्रीक्वेंसियों (की सारिणी) के बीच एक तरह से sandwich जैसी थी। फैशन में था हैम सैंडविच (जैसे आजकल हैम बर्गर है) और इतना ही काफी था शौकिया रेडियो ऑपरेटर HAM को कहा जाने के लिए।

एक और अटकल लगाई जाती है कि इस शब्द HAM का अभिप्राय है Help All Mankind, जो कि प्राकृतिक आपदाओं में संकटग्रस्त व्यक्तियों, नागरिक आपात परिस्थितियों के दौरान सहायता देने के लिए इसकी सेवा के रूप को दर्शाता है।

वैसे शब्द, HAM का उपयोग 1908 में पहले शौकिया वायरलेस स्टेशन के हार्वर्ड रेडियो क्लब के कुछ शौकीनों द्वारा उपयोग किया गया था। ये व्यक्ति थे Albert S. Hyman, Bob Almy तथा Poogie Murray. उन्होंने अपने पहले स्टेशन को HYMAN-ALMY-MURRAY का नाम दिया। जैसा कि होता ही है, इस तरह का एक लंबा नाम, मोर्स कोड (Morse code) के द्वारा भेजा जाना, जल्द ही थकाऊ महसूस किया गया और एक संशोधन की गुहार हुयी। फिर प्रत्येक व्यक्ति के नाम के पहले दो अक्षरों का उपयोग किया गया और हो गया HY-AL-MY। इसी बीच कुछ भ्रम की स्थिति पैदा होने लगी, जब एक शौकिया रेडियो स्टेशन HY-ALMU से और HYALMO नामक एक मैक्सिकन जहाज से संकेत प्राप्त होने लगे। फिर उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति के नाम का प्रथमाक्षर उपयोग करने का निर्णय लिया और बन गया HAM!

शुरूआती दिनों में जब किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं हुया करता था, शौकिया रेडियो ऑपरेटर अपनी मर्जी से कोई भी frequency चुन लेते थे। कई बार तो उनका प्रसारण व्यवसायिक रेडियो स्टेशनों के मुकाबले ज़्यादा स्पष्ट होता था। परिणाम स्वरूप अमेरिकी कांग्रेस का ध्यान शौकिया रेडियो गतिविधि को सीमित करने के लिए की ओर गया। 1911 में, Albert Hyman ने, हार्वर्ड में शोध के लिए, विवादास्पद Wireless Regulation विधेयक को चुना। उनके प्रशिक्षक ने शोध की एक प्रतिलिपि, सेनेटर डेविड एल वॉल्श, जो इस विधेयक की सुनवाई समिति के एक सदस्य थे, को भेजे जाने पर जोर दिया। इस सेनेटर इस शोध से इतना प्रभावित हुए कि उन्हें समिति के सामने हाजिर होने को कहा गया।

अल्बर्ट ने अपना पक्ष रखा और बताया कि कैसे ये छोटे से स्टेशन बनाए गए। वह खचाखच भरे समिति के कमरे में यह बताते हुए रो ही पड़े कि यदि यह विधेयक पास हो गया तो ये शौकिया रेडियो स्टेशन बंद हो जायेंगे क्योंकि वे लाइसेंस शुल्क और अन्य सभी आवश्यकताओं का खर्च नहीं उठा सकते। अमेरिकी कांग्रेस की Wireless Regulation विधेयक पर बहस शुरू हुई और देखते ही देखते यह छोटा सा शौकिया स्टेशन HAM, देश के उन सभी छोटे शौकिया स्टेशनों के लिए संघर्ष का प्रतीक बन गया, जिन्हें बड़े वाणिज्यिक स्टेशन अपने लालच के चलते, खतरा मानते थे व अपने आसपास भी उनकी उपस्थिति नहीं चाहते थे। अंत में यह विधेयक अमेरिकी कांग्रेस के सभापटल पर आ ही गया, उस समय लगभग हर वक्ता की जुबान पर था ".... बेचारा नन्हा सा HAM"

बस उसी दिन से शौकिया रेडियो ऑपरेटरों को HAM कह कर पुकारा जाने लगा और शायद रेडियो समयकाल के अंत तक पुकारा जाएगा।

Friday, November 21, 2008

साप्ताहिकी 20-11-08

इस सप्ताह दो दिन विशेष रहे, पहला दिन - बालदिवस और बुधवार को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का जन्मदिन जिस दिन से शुरू हुआ क़ौमी एकता सप्ताह।

सवेरे 6 बजे समाचार के बाद चिंतन से प्रसारण की शुरूवात हुई जिसमें जवाहरलाल नेहरू के विचार बताए गए लेकिन उसके बाद वन्दनवार में हम प्रतीक्षा करते रह गए पर एक भी भजन बालगोपाल का नहीं बजा। वैसे देशगान हल्का सा नेहरू के आदर्शों को छूने वाला था। अन्य दिनों में गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, प्रेमचन्द जैसे विद्वानों के विचार चिन्तन में बताए गए पर अच्छा होता अगर बुधवार को संबंधित बात बताई जाती। वन्दनवार में भजन भी सप्ताह भर अच्छे ही सुनवाए गए जैसे -

मैं काँवड़ियाँ मैं भोले का पुजारी
भोले बसे है मेरे मन में

7 बजे भूले-बिसरे गीत में भी यही हाल रहा। एक भी गीत बच्चों के लिए नहीं सुनवाया गया और न ही बुधवार को कोई संबंधित गीत सुनवाया गया। अन्य दिनों में कुछ वाकई भूले बिसरे गीत सुनवाए गए तो कुछ लोकप्रिय गीत भी बजे जैसे सुरैया का गाया गजरे फ़िल्म का भूला बिसरा गीत सुनवाया गया और शमा फ़िल्म का यह लोकप्रिय गीत -

धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम

7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला रागों में भक्ति संगीत की धारा इस सप्ताह समाप्त हुई जिसे प्रस्तुत कर रहे थे गायक और संगीतकार शेखर सेन। इस सप्ताह विभिन्न रागों में ग़ैर फ़िल्मी लोकप्रिय भजन सुनवाए गए जैसे -

राग भैरवी में दुर्गा सप्तशती के अंश अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में

राग जोड़ कौंस में लता मंगेशकर की आवाज़ में सूरदास की भक्ति रचना -
निसदिन बरसत नैन हमारे
फिर इसी राग में ज़रीन दारूवाला का सरोद वादन और आरती अंगलीकर का गायन

कबीर की भक्ति रचनाएँ जुतिका राय की आवाज़ में -

घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगें

राग देस में अनूप जलोटा के स्वर में - झीनी चदरिया

राग मिश्र ख़माज में अनुराधा पौडवाल का गाया भजन और यह लोकपिय भक्ति पद -

मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे मै तो तेरे पास

एक नई श्रृंखला आरंभ हुई - कौंस के प्रकार जिसे प्रस्तुत कर रही है प्रसिद्ध गायिका अश्विनी (भेड़े) देशपाण्डेय, इसे तैयार किया है कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने। लगता है यह पहली बार प्रसारित हो रही है क्योंकि याद नहीं आ रहा कि इसे पहले कभी सुना था। जैसे कि शीर्षक से ही समझा जा सकता है कि यह कौंस के विभिन्न रागों पर आधारित है। शुरूवात की गई राग मालकौंस से जिसमें बैजू बावरा फ़िल्म का प्रसिद्ध गीत गायन रूप में प्रस्तुत किया गया -

मन तड़पत हरि दर्शन को आज

जिसके बाद नवरंग फ़िल्म का गीत सुनवाया गया -

तू छुपी है कहाँ मैं तड़पता यहाँ

बातचीत कर रहे है अशोक (सोनावने) जी। कौंस की प्राचीनता के बारे में बताते हुए विभिन्न रागों की पूरी जानकारी दी जा रही है जैसे राग मालकौंस शांत प्रकृति का राग और रात में गाया बजाया जाता है।

7:45 पर त्रिवेणी में शुक्रवार को पुराना अंक प्रसारित हुआ जिसमें जीवन में हर स्तर पर मिलावट की बात कही गई, क्या ही अच्छा होता अगर इस दिन त्रिवेणी बच्चों के नाम होती। इसी तरह बुधवार को भी संबंधित विषय नहीं उठाया गया। अन्य दिनों में भी बहुत ही उच्च स्तरीय बातें हुई। वैसे भी संगीत सरिता में भक्ति रचनाएँ चलती रही उसके बाद त्रिवेणी में भी लगभग यही माहौल कुछ ठीक नहीं लगा। एक दिन बताया गया कि दुनिया भर के झगड़े ज़मीन को लेकर है और संबंधित गाने सुनवाए गए जैसे फ़िल्म ताजमहल का गीत -

ख़ुदाए बरकत तेरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यों है

भई त्रिवेणी के इस अंक को सुनने के बाद हमने फ़्लैट ख़रीदने का इरादा छोड़ दिया है… :):):) अरे भई ऐसी भी सीख न दो कि सुनने वाले दुनियादारी छोड़ कर सन्यासी हो जाए।

दोपहर 12 बजे हर दिन प्रसारित हुआ कार्यक्रम एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने।

शुक्रवार को कटी पतंग, किस्मत, आई मिलन की बेला, मेरे जीवन साथी, काला बाज़ार, ललकार जैसी साठ सत्तर के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में लेकर पधारी मंजू (द्विवेदी) जी। शनिवार को वारिस, अनमोल मोती, गीत गाया पत्थरों ने, अनोखी अदा, फ़र्ज़, सुहाग रात, गहरी चाल, मवाली जैसी साठ से अस्सी के दशक की जितेन्द्र की लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आए अशोक (सोनावने) जी। जितेन्द्र के बारे में हल्की-फुल्की बातें भी बताई। सोमवार को पार्टनर, मर्डर, टैक्सी नं नौ दो ग्यारह, ताल, बंटी और बबली जैसी नई फ़िल्में लेकर आए अमरकान्त जी पर पहली बार ऐसा हुआ कि टेलीफोन लाइन की गड़बड़ी के कारण एसएमएस मिल ही नहीं रहे थे और बिना संदेशों के ही गाने सुनवाए गए। मंगलवार को आए कमल (शर्मा) जी, फ़िल्में रही दामिनी, कयामत से कयामत तक, धड़कन, नो एन्ट्री, नील एंड निक्की, झूम बराबर झूम जैसी अस्सी के दशक से अब तक की फ़िल्में। बुधवार को पधारीं सलमा (सय्यैद) जी और फ़िल्में रही जानी मेरा नाम, आँखें, कहो न प्यार है जैसी साठ के दशक से अब तक की लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को पधारीं शहनाज़ (अख़्तरी) जी और फ़िल्में रही समाधि, माया, नूरी, टशन, आरज़ू, मेरे हमदम मेरे दोस्त, किस्मत कनेक्शन, रेस जैसी साठ के दशक से अब तक की लोकप्रिय फ़िल्में। लेकिन बीच में 12:30 बजे से 15 मिनट के लिए कार्यक्रम को काट कर क्षेत्रीय (तेलुगु) समाचार बुलेटिन का प्रसारण किया गया।

इसमें कुछ ऐसे गीत भी सुने जो बहुत लम्बे समय से नहीं बजे जैसे -

हैय्या ओ गंगा मय्या (फ़िल्म सुहाग रात)

हर गाने के लिए संदेश भेजने वालों के नाम और शहर का नाम बताया जाता रहा। इस कार्यक्रम को विजय दीपक (छिब्बर) जी प्रस्तुत कर रहे है और प्रस्तुति सहयोग रहा निखिल धामापुरकर जी और दिलीप (कुलकर्णी) जी का।

1 बजे म्यूज़िक मसाला में तुम याद आए एलबम का अलका याज्ञिक का गाया जावेद अख़्तर का लिखा और राजू सिंह का स्वरबद्ध किया यह गीत बहुत बहुत बार सुन चुके है फिर भी बजता ही रहता है -

सारे सपने कहीं खो गए
हाय हम क्या से क्या हो गए

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में शुक्रवार को अमरकान्त जी ने इस गाने से शुरूवात कर जता दिया कि विविध भारती पर बालदिवस भी मनाया जाता है -

जिंगल बेल जिंगल बेल
आओ तुम्हें चाँद पे ले जाए

पर बुधवार को प्रस्तुत किया रेणु (बंसल) जी ने और फ़रमाइशी गीतों में से एक भी गीत ऐसा नहीं चुना जो महिलाओं या क़ौमी एकता पर आधारित हो।

3 बजे शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। आते ही बताया कि आज बालदिवस है पर न तो पहला फोनकाल इससे संबंधित था और न ही गीत, इस गीत से शुरूवात हुई -

हमारी शादी में अभी बाकी है हफ़्ते चार
पूनम ओ जानम ओ

स्कूल की लड़कियों के फोनकाल आए, बातचीत तो अच्छी हुई, उनकी उमर के शौक पता चले पर बच्चों के गाने पसन्द नहीं किए गए।

सोमवार को रसोई की बातें होती है जिसमें विटामिन सी से भरपूर आँवले की चटनी बनाना बताया गया जो एक सखि ने भेजा था। साथ ही बताया गया ख़ाना परोसना भी। इस दिन पचास साठ के दशक की फ़िल्मों के अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे आम्रपाली का गीत -

तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी
तुम ले गए हो अपने संग नींद भी हमारी

मंगलवार को करिअर की बातें की जाती है जिसके अंतर्गत जानकारी दी गई कि एयर होस्टेस कैसे बनें। क्योंकि बातें करिअर की होती है इस दिन यानि युवाओं की इसीलिए गाने नए सुनवाए जाते है। बुधवार को सुबह से ही लग रहा था कि इस दिन की ख़ासियत शायद विविध भारती भूल गई है पर सखि-सहेली में क़ौमी एकता (एकता संभाव) दिवस की बात जोर-शोर से हुई और ज़ोरदार ग़ैर फ़िल्मी गीत सुनवाया गया -

मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा

और विशेष रूप से इस दिन लोक गीत गायिका अनुराधा श्रीवास्तव और प्रभा सिंह से कांचन (प्रकाश संगीत) जी की बातचीत अच्छी लगी। विभिन्न अवसरों के लोक गीत भी गाकर सुनवाए जैसे जनेऊ पर गाया जाने वाला गीत और बच्चों को पहले स्माल पाँक्स निकला करता था जिसे लोक भाषा में कहा जाता था कि माताजी ने दर्शन दिए, इस अवसर पर गाया जाने वाला गीत। एक अच्छे अंक के लिए धन्यवाद कमलेश (पाठक) जी !

बुधवार होने से सर्दियों में सेहत की देखभाल की बातें बताई गई। गुरूवार को सफल महिला सावित्री बाई फूले के बारे में बताया गया जो भारत की प्रथम अध्यापिका और समाज सेविका थी।

3 बजे शनिवार को क्षेत्रीय केन्द्र हैदराबाद से पर्यावरण से संबंधित प्रायोजित कार्यक्रम सुना - कोशिश सुनहरे कल की जो तेलुगु में सुनवाया गया। रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में हमेशा की तरह लोकप्रिय फ़िल्मों के लोकप्रिय गीत सुनवाए गए।

शनिवार को नाट्य तरंग में सुना समीर गांगुली का लिखा नाटक डबल बेल जिसके निर्देशिक है अनूप सेठी। यह बम्बई की बस यात्रा है जिसमें तरह-तरह के यात्री है। यात्री शहर की बस से गाँव की बस की तुलना करते है। लगा यह नाटक पुराना है क्योंकि कडंकटर से पाँच पैसे छुट्टे माँगे गए। रविवार को जयदेव शर्मा कमल के निर्देशन में स्वामी जी पर आधारित प्रबुद्ध स्तर का नाटक सुना।

रविवार को शाम 4 बजे यूथ एक्सप्रेस न तो एक्सप्रेस थी और न ही लोकल ट्रेन की तरह भीड़-भाड़ थी, बस छुक-छुक करती गाड़ी घिसट रही थी। विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना दी गई। एक जानकारी नई थी कि कैसे कप्यूटर पर काम करते हुए कलाई का दर्द होता है। नए गाने सुनवाए गए। गानों के लिए कुछ अधिक समय रहा। किताबों की दुनिया में विदेशी लेखक थे।

4 बजे पिटारा में शुक्रवार को पिटारे में पिटारा कार्यक्रम के अंतर्गत सरगम के सितारे कार्यक्रम में संगीतकार एस एन त्रिपाठी के बारे मे जानकारी दी गई। बहुत अधिक जानकारी तो नहीं मिल पाई पर गाने अच्छे सुनवाए गए जैसे -

ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े

न किसी की आँख का नूर हूँ

वैसे भी इस संगीतकार के सभी गीत अच्छे है।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में हृदय रोग विशेषज्ञ डा देव पहलाज़नी (शायद नाम लिखने में ग़लती हो) से निम्मी (मिश्रा) जी ने बातचीत की। बच्चों में हृदय रोग शरीर में नसों से विषैला पदार्थ फैलने से होता है जिसे रूमाटिक रोग कहते है और बड़ों में तनाव, रक्तचाप आदि से होता है। इस तरह हृदय रोग के बारे विस्तृत जानकारी दी गई। बुधवार को आज के मेहमान में फ़िल्म समीक्षक प्रह्लाद अग्रवाल से युनूस (ख़ान) जी की बातचीत सुनवाई गई। दोनों का संबंध जबलपुर से है इसीलिए बातचीत अधिक आत्मीय लगी।

हैलो फ़रमाइश में शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को श्रोताओं से फोन पर हल्की-फुल्की बातचीत होती रही और उनके पसंदीदा नए पुराने गीत बजते रहे।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद नए फ़िल्मी गानों के कार्यक्रम फ़िल्मी हंगामा में सभी गीत नए सामान्य गीतों की तरह रहे जैसे आवारापन फ़िल्म से यह गीत -

प्यार यार यार यार

7 बजे जयमाला में रोज़ फ़ौजी भाइयों के फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए जिसमें नए गाने ज्यादा थे, कभी-कभार पुराने गीत भी सुनवाए गए जैसे फ़िल्म चोरी-चोरी का यह गीत -

जहाँ भी मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो
ये तो बताओ के तुम मेरे कौन हो

पर बड़ा अजीब लगा जब बालदिवस यानि नेहरू जी के जन्मदिन पर उपकार फ़िल्म का मेरे देश की धरती सोना उगले जैसा गीत सुनवाया गया, ख़ैर… पसन्द फ़ौजी भाइयों की…

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया गायक और संगीतकार जगजीत सिंह ने। खुद के बारे में बहुत ही कम बताया, गाने नए पुराने सभी सुनवाए जिसमें पंजाबी गीत भी शामिल रहा और इधर-उधर की बातें की।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत में कच्छी और बृज गीत सुनवाए गए। पत्रावली में स्वर्ण जयन्ति के कार्यक्रमों की तारीफ़ का सिलसिला थमा नहीं है, दोनों दिन, शनिवार और सोमवार को इससे संबंधित पत्रों के साथ ईमेल भी शामिल रहे। मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली में फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनी जैसे अमर अकबर एंथोनी फ़िल्म की क़व्वाली। बुधवार के इनसे मिलिए कार्यक्रम में गायिका जसमिन्दर नरूला से कमल (शर्मा) जी ने बातचीत की। अच्छी जानकारी मिली। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग पहाड़ी पर आधारित नवरंग फ़िल्म का गीत -

अरे जा रे हट नटखट न छू रे मेरा घूँघट
पलट के दूँगी आज तुझे गाली रे
मुझे न समझो न तुम भोली भाली रे

ऐसे गीत सुनते है तो कार्यक्रम की सार्थकता लगती है वरना तो…

8 बजे हवामहल में हास्य झलकियाँ सुनी - अब आए चक्कर में (लेखिका निर्मला अग्रवाल और निर्देशक कमल दत्त) मेहमान, चाचा मुंशी (निर्देशिका साधना भारद्वाज), लाँटरी पचास हज़ार की (निर्देशक गंगा प्रसाद माथुर), इसके अलावा पाप की गठरी (निर्देशक मक़बूल हसन), पार्थ सारथी द्वारा निर्देशित झलकी सुनी अब और नहीं।

रात 9 बजे गुलदस्ता में रूना लैला की आवाज़ में यह ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी -

रंजिशे सही दिल ही दुखाने के लिए आ

वैसे अन्य गीत और ग़ज़लें भी अच्छी रही।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में शुक्रवार को बालदिवस को ध्यान में रखकर मि इंडिया फ़िल्म के गीत सुनवाए गए। इसके अलावा कसमें वादे, जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली, दोस्ताना, किशन कन्हैया फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए जिनमें जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली फ़िल्म के गीत बहुत-बहुत दिन बाद सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की अगली कड़ी सुनी। ज़ज़ीर की बात हुई और बात हुई प्राण साहब के किरदार की। कलाकारों के भुगतान संबंधी बातों को खुल कर बताया। कलाकारों के सहयोग की भी बातें हुई जैसे हेरा फेरी की शूटिंग के दौरान सायरा बानो के साथ मिला सहयोग। यह जानकर बहुत दुःख हुआ कि पहली ही फ़िल्म ज़ंजीर से अमिताभ बच्चन जैसा कलाकार और सितारा देने वाले की झोली में कोई एवार्ड नहीं।

10 बजे छाया गीत में वही रात, चाँद, तारे, यादों के गीत ही सुनवाए गए।


Sunday, November 16, 2008

प्रचार के अभाव में दम तोड़ता रेडियो संगीत सम्मेलन


शास्त्रीय संगीत को जन जन में पहुँचाने का जो ख़ास काम आकाशवाणी ने किया है वह स्तुत्य है. इसी नेक मक़सद को विस्तृत करने के उद्देश्य से रेडियो संगीत सम्मेलन की शुरूआत की गई थी. तक़रीबन पचास बरसों से ये सिलसिला चल रहा है. इस आयोजन का फ़ॉरमेट बड़ा रचनात्मक रहा है. किया यूँ जाता रहा है कि पहले देश के विभिन्न शहरों में जहाँ आकाशवाणी केन्द्र मौजूद हैं ; संगीतप्रेमी श्रोताओं की उपस्थित में संगीत सभा आयोजित की जाती है. बाक़ायदा निमंत्रण पत्र छपवा कर रसिकों को भेजे जाते थे. तस्वीर के साथ कलाकारों का परिचय अख़बारों में प्रकाशित किया जाता. इसी मजमे की रेकॉर्डिंग कर लगभग महीने भर पहले रात ९.३० बजे और इन कुछ बरसों में रात १०.०० बजे इन सभाओं का प्रसारण रेडियो संगीत सम्मेलन के रूप आकाशवाणी के सभी केन्द्रों से राष्ट्रीय प्रसारण के रूप में किया जाता था.शास्त्रीय संगीत के इस अनुष्ठान की प्रतिष्ठा का ये आलम था का मैनें ख़ुद देश के नामचीन कलाकारों के परिचय ब्रोशर में यह उल्लेख देखा है कि आपने आकाशवाणी संगीत सम्मेलन में अब तक तीन बार प्रस्तुतियाँ दी हैं. गोया इस आयोजन में शिरक़त एक बड़ा काम माना जाता रहा है. इस लिहाज़ से भी रेडियो संगीत सम्मेलन का बड़ा नाम रहा है कि इसके ज़रिये देश के कई युवा कलाकारों को न केवल देशव्यापी पहचान मिली बल्कि देश के विभिन्न अंचलों में जाकर अपना विशिष्ट श्रोतावर्ग तैयार करने में भी मदद मिली है.और हाँ साथ ही दक्षिण के संगीत को उत्तर और उत्तर के संगीत को दक्षिण मे पहुँचाने का बहुत आदरणीय सेतु रहा है आकाशवानी संगीत सम्मेलन.

भारतरत्न पं.रविशंकर,भारतरत्न पं.भीमसेन जोशी,विदूषी गंगूबाई हंगल पं.ओंकारनाथ ठाकुर,विदूषी सिध्देश्वरी देवी,गिरजा देवी,निर्मला अरूण,परवीन सुल्ताना,किशोरी अमोणकर,प्रभा अत्रे,मल्लिकार्जुन मंसूर,कुमार गंधर्व,पं.जसराज,वसंतराव देशपांडे,जितेन्द्र अभिषेकी से लेकर शुभा मुदगल,राजन साजन मिश्र,छन्नुलाल मिश्र,हरिप्रसाद चौरसिया,शिवकुमार शर्मा, विश्वमोहन भट्ट जैसे एकाधिक और नामचीन कलाकारों की शिरक़त से आकाशवांणी संगीत सम्मेलन की शान का जलवा रहा है. कैसेट और सी.डी से परे पचास से अस्सी के शुरूआती दशक तक रेडियो ही ऐसे गुणी संगीतज्ञों को घर घर में मुफ़्त में पहुँचाने का जो काम आकशावाणी ने किया वह अदभुत है. मैंने ख़ुद अपने परिवारों में और मित्रों के यहाँ देर रात तक कई लोगों को रेडियो संगीत का समवेत श्रवण करते देखा है. लेकिन अब तो यह सुरीला अनुष्ठान दम तोड़ता और रस्म पूरी करता नज़र आ रहा है. ख़ुद अपने हाथों से इस राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के आयोजन के कर्ता धर्ताओं ने अपनी किरकिरी करवा रखी है.


लेकिन अब मामला गड़बड़ हो गया है.

-रेडियो संगीत सम्मेलन में सितारा कलाकार आने से झिझकते हैं.कारण दीगर आयोजनों से मिलने वाला अधिक पारिश्रमिक और फ़ाइव स्टार मेज़बानी.

-प्रचार प्रसार का अभाव.ख़ुद आकाशवाणी अपने कार्यक्रमों में रेडियो संगीत सम्मेलन का प्रचार नहीं कर रहा है. क्या एक सुरीला प्रोमो बना कर विविध भारती के कार्यक्रमों में प्रसारित नहीं करना चाहिये.प्रचारित किया जा रहा है कि विविध भारती देश का सबसे लोकप्रिय रेडियो चैनल है तो रेडियो संगीत सम्मेलन का प्रचार तो विविध भारती को करना ही चाहिये ही. ये इसलिये भी कि तमाम संगीतप्रेमी विविध भारती के श्रोता तो हैं ही.

-आकाशवाणी की अपनी अधूरी अधूरी सी वैबसाइट पर रेडियो संगीत सम्मेलन जैसे महत्वपूर्ण आयोजन की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

-प्रसार भारती तमाम एम.एम.चैनल्स को बाध्य कर सकता है कि वे शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से अपने चैनल्स पर आकाशवाणी संगीत सम्मेलन का प्रोमो बजाए.

-देश के समस्त समाचार पत्रों में आकाशवाणी संगीत सम्मेलन की विज्ञप्ति प्रसारित की जाए कि इस साल के आकर्षण फ़लाँ कलाकार हैं.

-बच्चों में शास्त्रीय संगीत को प्रचारित करने के लिये रेडियो संगीत सम्मेलन को स्कूल परिसरों में ले जाया जाए जहाँ अन्य संगीतप्रेमी भी निमंत्रित किये जाएँ.

-समाचार आज भी आकाशवाणी का सबसे सशक्त और विश्वसनीय प्रसारण है. उसमें उसी दिन प्रस्तुति देने वाले कलाकार का नाम दिया जाए कि आज रात रेडियो संगीत सम्मेलन में आप उस्ताद राशिद ख़ाँ या डॉ.बाळ मुरळीकृष्ण का शास्त्रीय गायन सुनेंगे.

-दूरदर्शन प्रसार भारती और आकाशवाणी की सहोदर संस्था है. उसके प्रसारणों में समय समय पर आकाशवाणी संगीत सम्मेलन का प्रोमो दिखाया जाए.या स्क्रीन पर चलने वाले स्ट्रिप पर रात को प्रसारित होने वाले कार्यक्रम का समय और कलाकार का नाम चलाया जाए.


हुज़ूर कोई कुछ करना चाहे तो अनेक है राहें.लेकिन नौकरशाहों के मकड़जाल में फ़ँसा तंत्र कुछ नया,रचनात्मक और श्रोता हित का करने का माहौल ही नहीं बनने देता. जब कार्यक्रम की लोकप्रियता में कमीं आती जाती है तो कलाकार भी उसमें रूचि क्यों लें.हो सकता है आकाशवाणी की अपनी विवशताएँ हों लेकिन मन में सुरीलेपन को संक्रामक बनाने वाली इस महान संस्था की कार्यशैली का सुनहरा दौर तो अब काल कवलित हो चुका है इसमें की शक नहीं

विविध्ग भारती की वेब साईट पर टिपणी डालने के लिये दिक्कत -वादक कलाकार जयंती गोसर- (आल्बम हिट्स ओफ़ 85-जयंती एंड हनी)

इधर मैनें एक विविध भारती की वेब साईट पर टिपणी पोस्ट करने के बाद भी 'post a massage' की सुचना स्वीकृती की सुचना के स्थान पर मिलती है, वह बताता हुआ चित्र चिपका कर भेज़ा है । तो आशा है की मोदी साहब पत्रावलि में इसका कुछ: मार्गदर्शन करेंगे ।


एक और बात की परसों यानि 9 नवम्बर, 2008 के दिन युनूसजी द्वारा आप की फ़रमाईश कार्यक्रममें मेरा और मेरे सुरत के ही मित्र जिमी वाडिया का नाम शामिल किया गया पर सुरत शहर के नाम के स्थान पर गुजरात का जिक्र किया गया ऐसा क्यों ? जब की पत्रमें सुरत (गुजरात) का जिक्र होता है ।(इस बारेमें मैं निम्मीजी की सराहना करता हूँ, कि भूत-कालीन सिने पहेली कार्यक्रममें मेरे नाम के साथ नानपूरा, सुरत का जिक्र नियमीत रूपसे करती रही थी ।) कार्यक्रम का आलेख़ लिख़ने वाले आप के साथी भविष्य में यह बात ध्यान में रखेंगे, जब की मुम्बई, दिल्ही के श्रोता के नाम के साथ विले पारले, करोल बाग जैसे जिक्र होते है ।
शायद 31अक्तूबर के दिन पिटारेमें पिटारा अन्तर्गत वादक कलाकार स्ज्री जयन्ती गोसर के साथ रेणूजी की बातचीत वादक कलाकार मनोहरी सिंह जी के बाद ऐस्री दूसरी मूलाकात थी जो सिर्फ़ और सिर्फ़ फिल्म संगीत से जूडी हुई वादक कलाकार हस्ती के की गयी थी । ( चाहे वे शास्त्रीय संगीत से परिचीत हो यह अलग बात है ।) इस बारेमें विविध भारती को किये गये मेईल की प्रत नीचे रखी है जो स्व्यं बताने वाली है, हालाकि मेरे मेईल्स एक लम्बे (शायद एक सालके) अरसे से पत्रावलि में मेरे नाम के साथ समाविष्ट नहीं हुए है ।

Producer-PATRAVALI PROGRAMME,

VIVIDH BHARTI SERVICE,

MUMBAI

DATE: 01ST November, 2008.

Respected Sir,

I enjoyed much the interview of musician of many musical instruments, Shri Jayanti Grosar. Congratulations to the Programme Producer, Shri Renuji and the whole creative team of VBS.

It is the first occasion after Shri Manohari Singh's interview by Shri Yunusji, to call a musician connected to film music basically in Vividh Bharti's Programme on national level.

I hope in future also, musicians and arrangers of old time like shri Enoch Deniels would be called.

His contact No is 9520-25659344. (Pune).

His E mail ID is enoch@vsnl.net .

Thanks,

PIYUSH MEHTA
SURAT-395001.
इस वक्त अगर लाईफ़ लोगर काम कर रहा होता मैं जयन्तीजी और हनी जी के संयूक्त आल्बम की एक धून जरूर सुनवाता, जो विविध भारती के पास भी है ।

Friday, November 14, 2008

संगीत की अमृत धारा और ग़लती के बाँध

दो सप्ताह से अस्वस्थता के कारण साप्ताहिकी नहीं लिख पाई। वैसे रेडियो में भी केवल सवेरे का ही प्रसारण सुन पाती थी। ख़ैर अब सब ठीक है, और आज साप्ताहिकी की जगह हम कुछ बात करते है केवल सवेरे के प्रसारण की…

आज भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में एक हादसा (इस स्थिति को हादसा ही कहा जा सकता है) हुआ। एक युगल गीत सुनवाया गया सुमन कल्याणपुर और मुकेश की आवाज़ों में -

अखियों का नूर है तू अखियों से दूर है तू
फिर भी पुकारे चले जाएगें तू आए न आए

बहुत ही लोकप्रिय गीत है और यही नहीं इस फिल्म के सभी गीत लोकप्रिय है और फ़िल्म भी बहुत लोकप्रिय हुई - जौहर महमूद इन गोआ जो गोआ मुक्ति आन्दोलन पर आधारित थी। बरसों से फ़रमाइशी और ग़ैर फ़रमाइशी कार्यक्रम में विविध भारती समेत कई स्टेशनों से इस फ़िल्म के गीत सुनते आए है पर पिछले एक-दो साल से विविध भारती पर इस फ़िल्म के गीत सुनवाते समय फ़िल्म का नाम बताया जा रहा है - गोआ। यह ग़लती क्यों और कैसे हो रही है यह तो समझ में नहीं आ रहा पर यह ग़लती छोटे-बड़े नए-पुराने सभी उदघोषक कर रहे है। कारण चाहे जो भी हो पर विविध भारती जैसे प्रतिष्ठित केन्द्र से इस तरह की ग़लती अक्षम्य अपराध है क्योंकि इस तरह की (ग़लत) उदघोषणा से फ़िल्म का इतिहास ही बदल रहा है। हालांकि जो पुराने उदघोषक है वे अच्छी तरह से जानते होगें (जानना चाहिए) कि फ़िल्म का नाम जौहर महमूद इन गोआ है, गोआ नहीं फिर भी ऐसी क्या मजबूरी है जो केवल गोआ नाम बताया जा रहा है। इस तरह से आने वाली पीढी तो इस फ़िल्म का नाम गोआ ही समझेगी। हमारा अनुरोध है कि कारणों की जाँच कर शीघ्र ही ग़लती को सुधारा जाए।

7:30 बजे संगीत सरिता में इन दिनों चल रही है श्रृंखला - रागों में भक्ति संगीत की धारा जिसे प्रस्तुत कर रहे है गायक और संगीतकार शेखर सेन। इस श्रृंखला को तैयार किया है छाया (गांगुली) जी ने और पहली बार 1992 में इसका प्रसारण किया गया था। वास्तव में यह श्रंखला इतनी अच्छी है कि इसे दुबारा सुनने से भी पहली बार सुनने जैसा आनन्द आ रहा है। इसमें विभिन्न रागों पर आधारित पहले फ़िल्मों से लिए गए भक्ति गीत सुनवाए गए आजकल ग़ैर फ़िल्मी भक्ति सुनवाए जा रहे है। हर दिन एक राग के बारे में बताया जा रहा है। फिर इस राग पर भक्ति गीत और गायन, वादन सुनवाया जा रहा है। राग सिन्धु भैरवी से श्रृंखला की शुरूवात की गई जिसमें मुकेश का गाया भक्ति गीत सुनवाया गया -

जोत से जोत जगाते चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो

इसके बाद इसी राग पर निखिल बैनर्जी का सितार वादन सुनवाया गया। सुनवाए गए विभिन्न राग है -
राग चारूकेशी - गीत - श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम (फ़िल्म गीत गाता चल) ,

कम प्रचलित राग कुकुभ भिलावल में पारम्परिक आरती ॐ जय जगदीश हरे (फ़िल्म पूरब और पश्चिम) इसी राग को सुना सरोद पर वादक कलाकार बुद्ध देव दास गुप्ता,

राग यमन कल्याण - गीत - मन रे तू काहे न धीर धरे - फिर इस राग में गायन और वादन सुना,

ग़ैर फ़िल्मी भक्ति गीतों में लोकप्रिय भक्ति गीत सुने -

लता की आवाज़ में - ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैजनिया

आज सुनवाए गए राग भैरवी और मिश्र भैरवी, कलाकार थे - ग़ैर फ़िल्मी भक्ति रचनाओं के शीर्ष कलाकार हरिओम शरण

कुछ समय से पत्रावली में निरन्तर श्रोता फ़िल्मी भक्ति गीतों का कार्यक्रम अर्पण, बन्द किए जाने की शिकायत कर रहे थे। यह कार्यक्रम विविध भारती पर लम्बे समय से प्रसारित हो रहा था, पहले भी ऐसा ही कार्यक्रम सान्ध्य गीत शीर्षक से प्रसारित होता था, इसमें फ़िल्मी भक्ति गीत सुनवाए जाते थे। यह श्रृंखला कुछ हद तक अर्पण की भरपाई करेगी।

शुक्रिया छाया जी इस अनमोल श्रृंखला को तैयार करने के लिए और बहुत-बहुत धन्यवाद महेन्द्र मोदी जी !

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