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Friday, May 29, 2009

साप्ताहिकी 28-5-09

सुबह 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में विदेशी चिंतक, जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गाँधी के विचार बताए गए लेकिन 27 मई को जवाहरलाल नेहरू की पुण्य तिथि थी इस दिन स्वामी विवेकानन्द के युवा शक्ति संबंधी विचार बताए गए, क्या ही अच्छा होता अगर इस दिन नेहरू के विचार बताए जाते। वन्दनवार में हर दिन अच्छे भजन सुनवाए गए। यह भजन बहुत दिन बाद सुन कर अच्छा लगा -

सतगुरू नानक परकटया

कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा। इस सप्ताह भी अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे -

हज़ार बार स्वर्ग से हसीन है मेरा वतन
मेरा वतन मेरा वतन मेरा वतन

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में इस सप्ताह भी गीतों में कुछ भूली बिसरी आवाज़े सुनवाई गई जैसे मीना लपूर की। एक भूला बिसरा गीत बहुत अच्छा लगा - फ़िल्म का नाम बड़ी माँ और आवाज़ नूरजहाँ की, दिया जला कर आग बुझाई… कुछ ऐसे ही बोल है। हर दिन कार्यक्रम का समापन के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गाए गीतों से होता रहा।

7:30 बजे संगीत सरिता में मंगलवाद्य शहनाई पर श्रृंखला - शहनाई के रंग शहनाई के संग समाप्त हुई, जिसे प्रस्तुत कर रहे थे ख़्यात शहनाई वादक कृष्णाराम चौधरी। आपसे बात कर रही थी कांचन जी। इस श्रृंखला में फ़िल्मी गीतों में शहनाई के प्रयोग पर चर्चा हुई। इस सप्ताह विभिन्न फ़िल्मी गीत सुनवाए गए और गीत सुनवाने से पहले इन गीतों को शहनाई की धुन पर सुनवाया गया। साथ ही इन गीतों के रागों की भी चर्चा हुई। यह बताया गया कि कौन सा गीत किस राग पर आधारित है और किस गीत में किस राग की झलक है जैसे हीर रांझा के गीत -

दो दिल टूटे दो दिल हारे

यह गीत राग पहाड़ी पर आधारित है और इसमें राग मांड की झलक है। जब बात हो शहनाई की और शादी-ब्याह के गीतों की चर्चा न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता, शनिवार का अंक ऐसा ही रहा। प्रसिद्ध बिदाई गीत सुनवाया गया जो फ़िल्म नीलकमल के लिए रफ़ी साहब ने गाया है -

बाबुल की दुआएँ लेती जा जा तुझको सुखी संसार मिले

सभी गीतों को शहनाई पर भी सुनवाया गया। अधिकतर गीत शहनाई पर ही ज्यादा अच्छे लगे लेकिन अनोखी रात फ़िल्म का विदाई गीत -

महलों का राजा मिला के रानी बेटी राज करेगी

शहनाई पर अच्छा नहीं लगा। शुरू में तो गीत पकड़ में ही नहीं आया कुछ धुन सुनने के बाद ही गीत को पहचान पाए। एक अच्छी बात इस सप्ताह यह हुई कि सेहरा फ़िल्म के गीतों की चर्चा के समय संगीतकार रामलाल की अहमद वसी से इस संबंध में की गई बातचीत का अंश भी सुनवाया गया। वैसे इस श्रृंखला में संगीतकार रामलाल की बहुत चर्चा हुई, शायद उनके ही संगीत में शहनाई का बहुत प्रयोग हुआ है। समापन कड़ी अच्छी रही जिसमें विभिन्न गीतों के अंश सुनवाए गए जहाँ शहनाई की धुन है।

7:45 को त्रिवेणी में असामाजिक तत्व और उन्हें निकाल फेंकने की पहल की बात अच्छी लगी। छुट्टियाँ है इसीलिए छुट्टियों की बात भी हुई, गाने भी नए पुराने उचित सुनवाए गए जैसे -

कोलम्बस छुटटी है आज
आजा कोई देश खोजे भाई

शादी के बंधन की, दाम्पत्य की भी चर्चा हुई और जल की समस्या भी उठी तो कटुवचन और ग़लतफ़हमी की भी बात चली। 27 मई को जवाहरलाल नेहरू की पुण्य तिथि पर त्रिवेणी उन्हें समर्पित की जा सकती थी, इस दिन बात हुई मंज़िल की, वहाँ तक पहुँचने की, इसी बात को थोड़ा मोड़ देकर नेहरू के नवनिर्माण की बात की जा सकती थी।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में शुक्रवार को डान, खून पसीना, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी जैसी नई पुरानी फ़िल्में लेकर आए राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी। शनिवार को झलक दिखला जा जैसी नई फ़िल्में रही। सोमवार को आँधी, राम और श्याम, रफ़ूचक्कर जैसी नई पुरानी लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आईं शहनाज़ (अख़्तरी) जी। मंगलवार को दिल्ली 6 जैसी नई फ़िल्मे लेकर आई सलमा जी। बुधवार को रेणु (बंसल) जी लाईं बारादरी, अनुपमा, काला पानी जैसी पुरानी लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को कमल (शर्मा) जी लाए लोकप्रिय फ़िल्में - मर्यादा, सफ़र, पारसमणि। इस कार्यक्रम में पचास के दशक की फ़िल्म से लेकर आजकल चल रही फ़िल्में तक शामिल रहती है। इस तरह यह कार्यक्रम हर पीढी के श्रोता का है जिसके लिए हम धन्यवाद देते है इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता विजय दीपक छिब्बर जी को।

1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में शुक्रवार को पंडित राजन मिश्रा और साजन मिश्रा, शनिवार को विदुषी माणिक वर्मा का गायन सुनवाया गया। सोमवार को पंडित किशन महाराज का तबला वादन और विदुषी गंगुबाई हंगल का शास्त्रीय गायन सुनवाया गया। मंगलवार को विदुषी किशोरी अमोलकर का शास्त्रीय गायन सुनवाया गया। बुधवार को पंडित शिवकुमार शर्मा संतूर का वादन सुनवाया गया। गुरूवार को उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ का गायन सुनवाया गया।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में श्रोताओं ने मिले-जुले गीतों के लिए फ़रमाइश की जैसे साठ के दशक की फ़िल्म जीने की राह का यह गीत -

आ मेरे हमजोली आ खेले आँख मिचोली आ

नई फ़िल्म क्या यही प्यार है का यह गीत -

मेरी तरह तुम भी कभी प्यार करके देखो न

बीच के समय की फ़िल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाए का हेमलता का गाया यह गीत -

ले तो आए हो हमें सपनों के गाँव में
प्यार की छाँव में बिठाए रखना
सजना सजना

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। इस बार अधिकतर फोनकाल घरेलु महिलाएँ के आए, कुछ छात्राओं ने भी बात की। हल्की-फुल्की बातचीत हुई। एक सखि ने महाराष्ट्र की पैठनी साड़ियों के बारे में बताया कि इस पर सोने के तार से काम होता। लगभग सभी अच्छे गीतों की फ़रमाइश हुई पर बीते समय की फ़िल्म खिलौना फ़िल्म का यह लोकप्रिय गीत सुनना अच्छा लगा -

खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी

सोमवार को खुद कमलेश (पाठक) जी का एक व्यंजन बताया गया - गवार की दानेदार सब्जी जो गवार की फली, आलू और दरदरा पिसी मूँगफली मिलाकर बनाई जाती है। अच्छा लगा, मैने पहली बार सुना पर लगा यह तो हम भी बनाते है फर्क इतना है कि दरदरी मूँगफली के बजाय कैरी (कच्चा आम) को घिस कर यानि कदूकस कर डाले, अच्छी लगती है सब्जी। मंगलवार को करिअर संबंधी बातें बताई जाती है। इस बार आर्केटेक्चर के क्षेत्र की बातें बतायी गई। बुधवार को जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि और राणा प्रताप की जयंति थी। इस अवसर पर दोनों ही के बारे में बताया गया। गुरूवार को सफल महिलाओं की गाथा बताई जाती है। इस बार कल्थक नृत्यांगना सितारा देवी के बारे में बताया गया। यह नई जानकारी रही कि उनका असली नाम धनलक्ष्मी है। सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने और बीच के समय के अच्छे गीत सुनवाए गए जिनमें से पुराने गीत - लरलप्पा लरलप्पा के लिए बहुत दिन बाद सखियों ने फ़रमाइश भेजी। नई फ़िल्म जोधा अकबर का यह गीत -

कहने को जश्ने बहारा है

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए जैसे जानवर फ़िल्म का रफ़ी साहब का यह गीत -

मेरी मोहब्बत जवाँ रहेगी सदा रही है सदा रहेगी

3:30 बजे शनिवार को नाट्य तरंग में सुनवाया गया नाटक - अपना अपना सच जिसके लेखक है एक़बाल मजीद और निर्देशक है राकेश भौडिंयाल। आधुनिक जीवन शैली को दर्शाता संवेदनशील नाटक जो कामकाजी महिला पर केन्द्रित है।

पिटारा में शाम 4 बजे रविवार को यूथ एक्सप्रेस में किताबों की दुनिया स्तम्भ में पूर्व राष्ट्रपति डा ए पी जे अब्दुल कलाम की पुस्तक अग्नि की उड़ान पर जानकारी मिली। हिमाचल प्रदेश की एक ख़ास कोठी के बारे में जानकारी दी गई। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को श्रृद्धांजलि दी गई, सुनवाया गया मेरे जीवन साथी फ़िल्म का गीत, युनूस जी आपने वाकई बहुत बढिया गीत चुना। विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना भी दी गई।

शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम सरगम के सितारे जो गीतकार शकील बदायूँनी पर केन्द्रित था। इसकी दूसरी और अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) विषय पर डा उर्वशी अरोरा से बातचीत हुई। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में अभिनेत्री रवीना टंडन से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत सुनवाई गई। अच्छी जानकारी मिली कि कैसे पहली फ़िल्म की। शुरूवात में किस तरह प्रस्ताव मिलते रहे और वहां से पूरा सफ़र। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई। विभिन्न स्तर के श्रोताओं ने बात की जैसे एक छात्र ने कहा कि इस समय वह परिक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा है और वह फ़ौज में जाना चाहता है। श्रोताओं की पसन्द के नए पुराने गीत सुनवाए गए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में शनिवार को निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा को श्रृद्धांजलि दी गई। उनके द्वारा प्रस्तुत पूर्व प्रसारित विशेष जयमाला सुनवाई गई। खुद की फ़िल्मों के बारे में बताया, गीत सुनवाए। कुछ बातें साथियों की याद की। सोमवार से एस एम एस द्वारा भेजी गई फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर गीत सुनवाए जा रहे है।

7:45 पर शुक्रवार को सिंधी और भोजपुरी लोकगीत सुनवाए गए। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। श्रोताओं ने संगीत सरिता, सेहतनामा कार्यक्रम की तारीफ़ थी, कुछ कार्यक्रम सुनवाने का अनुरोध किया। क्षेत्रीय केन्द्रों के विज्ञापन से आते व्यवधान की शिकायत हुई जिसका जवाब वही मिला कि डीटीएच लगवा लो। दिलचस्प बात यह हुई कि एक श्रोता ने लिखा कि उन्होनें बैंग्लोर में मन्नाडे साहब से मुलाक़ात की और उनसे विविध भारती के कार्यक्रम में पधारने के लिए कहा, इस पत्र का पत्रावली में स्वागत हुआ, हमने सोचा - अच्छा है मियाँ को घर बैठे ही बीवी मिल गई। मंगलवार को सुनवाई गई ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में कर्नाटक संगीत की कलाकार श्री विद्या श्रीराम से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत सुनवाई गई। दक्षिण भारतीय शैली में हिन्दी सुनने को मिली। निम्मी जी ने कहा कि यह पहला प्रयास है। यह नया अंदाज़ कैसा है अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग भीमपलासी पर आधारित कोहरा फ़िल्म का लताजी का गाया गीत।

8 बजे हवामहल में इस सप्ताह भी जाने माने रचनाकार जैसे के पी सक्सेना, राजकुमार दाग़, मुमताज़ शकील, कमल दत्त, अरूणा कपूर, सुल्तान अहमद और गंगाप्रसाद माथुर की झलकियाँ सुनवाई गई।

9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में दिल तो पागल है, ख़ानदान, कभी ख़ुशी कभी ग़म, आन जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में निर्माता निर्देशक शक्ति सामन्त से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की अगली कड़ी प्रसारित हुई जिसमें फ़िल्म हावड़ा ब्रिज बनाने के अनुभव बताए।

10 बजे छाया गीत में सभी का अंदाज़ वही रहा, गीत भी जाने-पहचाने, विषय भी वही, कहीं कुछ भी नया नज़र नहीं आया।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर गाने सुनवाए गए जिनमें बीच के समय की फ़िल्मों के गीतों की अधिक फ़रमाइश थी। 11 बजे समाचार के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

Thursday, May 28, 2009

शहनाई के रंग- फिल्मी गीतों के संग

पत्नी की छुट्टियां इस बार मेरे लिये कम से कम एक मामले में सुखद सी रही, रो सुबह वन्दनवार, भूले बिसरे गीत, संगीत सरिता और त्रिवेणी पिछली सात मई से रोजाना सुन पाता हूं, खाना बनाते बनाते :) यह अलग बात है कि खाना बनाना मेरे लिये कितना दुखद रहता है

खैर..

पिछले बारह दिनों से चल रही इस सीरीज की ग्यारहवी कड़ी के साथ इस सुन्दर कार्यक्रम का आज समापन हो गया। ( आप सोच रहे होंगे कि बारह दिनों में ग्यारह कड़ी कैसे? तो यहां बताना चाहूंगा कि दसवीं कड़ी दो बार प्रसारित हो गई थी) आमंत्रित कलाकार कृष्णा राम जी चौधरी मेरे प्रिय संगीतकार और शहनाई नवाज राम लाल जी के भतीजे हैं जानकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। रामलाल जी को जवाहरात पहनने का बहुत शौक था इसलिये फिल्म जगत में उन्हें रामलाल हीरापन्ना के नाम से भी जाना जाता था। कार्यक्रम की एंकर कांचन प्रकाश संगीत का संगीत ज्ञान भी इस कार्यक्रम से पता चला, कि कैसे फटाफट वे रागों को पहचान जाती है।

पता नहीं क्यों इस कार्यक्रम को सुनने के बाद लगता है कि अभी इस में बहुत सी कड़ियां और आ सकती थी, अन्तिम दो दिन तो बहुत जल्दी बीत गये। देखते हैं विविध भारती कल कौनसा नया कार्यक्रम लेकर आती है।
:)

Tuesday, May 26, 2009

लोकप्रिय गीतों के मुखड़ों की पैरोडी का मिश्रित गीत

अगर हम कहें कि विभिन्न लोकप्रिय गीतों के मुखड़ों की पैरोडी का मिश्रित गीत तो लोग शायद तुरन्त याद करेगें मिस्टर इंडिया फ़िल्म का गीत जो अनिल कपूर, श्रीदेवी और बहुत सारे बच्चों पर फ़िल्माया गया जिसमें सरगम फ़िल्म के गीत के इस मुखड़े -


डफ़ली वाले डफ़ली बजा


की पैरोडी है - टोपी वाले बाल दिला


एक ऐसा ही मिश्रित गीत है लगभग 1970 के आस-पास रिलीज़ फ़िल्म एक फूल दो माली का जो नायक संजय कामेडियन मनोरमा और कुछ साथी कलाकारों पर फ़िल्माया गया। इस मिश्रित गीत में विभिन्न पैरोडियाँ इस तरह है -

पुराना फ़िल्मी गीत, सरस्वती राणी का स्वरबद्ध किया -

चल चल रे नौजवान

इसकी पैरोडी मुझे ठीक से याद नहीं आ रही।

जिन्दगी फिल्म के सहगल साहब के गाए गीत का मुखड़ा -


मै क्या जानू क्या है जादू है जादू है जादू है

इन दो मतवाले नैनो में जादू है जादू है जादू है


इसकी पैरोडी है -


इस .... थाली में लड्डू है लड्डू है लड्डू है


लता जी के गाए इस लोकप्रिय गीत के मुखड़े - मेरा परदेसी न आया
की पैरोडी - मेरा खाना नहीं क्यों आया


जन्म जन्म के फेरे फ़िल्म के गीत का मुखड़ा -


ज़रा सामने तो आओ छलिए छुप छुप छलने में क्या राज़ है

यूँ छुप न सकेगा परमात्मा मेरी आत्मा की ये आवाज़ है


इसकी पैरोडी, शुरूवात याद नहीं, बाद में है -


हिम्मत है तो कर ले मुकाबला इस जंगल में मेरा ही राज है

यहाँ मुझे थोड़ा सन्देह है कि यह सारे मुखड़े फ़िल्म एक फूल दो माली के गीत में है या साठ के दशक की फ़िल्म जंगली या जानवर या किसी और फ़िल्म में है…

यह गीत विविध भारती से तो बहुत aक्म सुनवाय गया पर सिलोन के दोपहर एक से दो बजे तक प्रसारित होने वाले जाने-पहचाने गीत कार्यक्रम में श्रोताओं की फ़रमाइश पर बहुत सुनवाया जाता था। अब तो एक अर्सा हो गया यह गीत सुने।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, May 22, 2009

साप्ताहिकी 21-5-09

सुबह 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में भगवदगीता का कथन, मनीषियों जैसे दिव्यानन्द, शंकराचार्य के विचार बताए गए, वन्दनवार में हर दिन अच्छे भजन सुनवाए गए। इस सप्ताह कुछ पुराने अच्छे भजन भी सुनवाए गए। यह कृष्ण भक्ति गीत बहुत समय बाद सुनवाया गया -

प्रबल प्रेम के पाले पड़ कर प्रभु को नियम बदलते देखा
अपना मान टले टल जाए भक्त का मान न टलते देखा

कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा। इस सप्ताह भी अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे प्रेमधवन का लिखा यह गीत -

मिलके चलो मिलके चलो
चलो भाई मिलके चलो

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में इस सप्ताह भी लोकप्रिय गीतों के साथ भूले बिसरे गीत सुनवाए गए। दिल्लगी, भाई-बहन फ़िल्मों के ऐसे गीत सुनवाए गए जो बहुत ही कम बजते है। हर दिन कार्यक्रम का समापन के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गाए गीतों से होता रहा।

7:30 बजे संगीत सरिता में कांचन (प्रकाश संगीत) जी द्वारा मंगलवाद्य शहनाई पर तैयार श्रृंखला आरंभ हुई - शहनाई के रंग शहनाई के संग जिसे प्रस्तुत कर रहे है ख़्यात शहनाई वादक कृष्णाराम चौधरी। आपसे बात कर रही है कांचन जी। रागेश्री और बागेश्री रागों से आरंभ किया गया। राग मदमाद सारंग, चन्द्र कौंस, शिवरंजनि पर भी चर्चा हुई। शहनाई वादन भी सुनवाया जा रहा है और फ़िल्मी गीत भी, शुरूवात बहुत ही उचित फ़िल्मी गीत से हुई, शहनाई फ़िल्म का रफ़ी साहब का गाया गीत -

क्या अजब साज़ है ये शहनाई
दो ही सुर का ये खेल सारा है

शहनाई की लंबाई, उसकी बनावट आदि सभी बातें बताई गई जैसे सागौन की लकड़ी से शहनाई बनती है, फूँक से बजने वाले इस वाद्य में सुर कैसे मिलाए जाते है।

7:45 को त्रिवेणी में मौसम की, ॠतुओं की, प्रकृति की बात हुई और सबंधित गीत भी अच्छे सुनवाए गए जैसे ख़ानदान फ़िल्म का यह गीत -

नील गगन पे उड़ते बादल आ आ आ
धूप में जलता खेत हमारा कर दे तू छाया

पर्यावरण की भी चर्चा हुई। वैसे इस सप्ताह यह कार्यक्रम प्रकृति के अधिक करीब रहा। गुरूवार को जल की बातें हुई, नदी सरोवर की बात हुई और दो गीत ऐसे भी शामिल हुए जो बहुत ही कम सुनवाए जाते है शायद… मैनें तो पहली बार सुना पर अंत में फ़िल्मों के नाम नहीं बताए गए। इस कार्यक्रम में कभी फ़िल्मों के नाम बताए जाते है कभी नहीं। मेरा अनुरोध है कि जब ऐसे गीत शामिल हो जो बहुत ही कम बजते हो तब फ़िल्मों के नाम अवश्य बताए।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में मंगलवार को कमल (शर्मा) जी ले आए मेरे जीवन साथी, मिलन जैसी कुछ पुरानी और पुरानी लोकप्रिय फ़िल्में। बुधवार को शहनाज़ (अख़्तरी) जी लाईं साया जैसी नई लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को कमल (शर्मा) जी लाए लोकप्रिय फ़िल्में हीरा पन्ना, ज़ंजीर, जानी दुश्मन, लाखों में एक, शोर। हर दिन श्रोताओं ने भी इन फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों के लिए संदेश भेजें।

1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में गायन प्रस्तुति में शुक्रवार को बड़े ग़ुलाम अलि ख़ाँ का गायन राग केदार, दरबारी, अटाना, भीमपलासी और कामोद में सुनवाया गया। सोमवार को बी वी पलोसकर का गायन सुनवाया गया।

वादन प्रस्तुति में मंगलवार को साहित्य कुमार नाहर का सितार वादन सुनवाया गया। बुधवार को पंडित हरिप्रसाद चौरसिया का बांसुरी वादन सुनवाया गया। गुरूवार को उस्ताद अमजद अली खाँ का सरोद वादन सुनवाया गया।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में श्रोताओं ने मिले-जुले गीतों के लिए फ़रमाइश की जैसे साठ के दशक की फ़िल्म गुमनाम का यह गीत -

हमें काले है तो क्या हुआ दिलवाले है

नई फ़िल्म गैंगस्टर का यह गीत -

तू ही मेरी शब है सुबह है तू ही दिन है

बीच के समय की फ़िल्म दोस्ताना का यह गीत -

बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा सलामत रहे दोस्ताना हमारा

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। इस बार भी अधिकतर छात्राओं ने बात की। एकाध घरेलु सखियों से भी बातचीत हुई। पढाई की, करिअर योजना की बात हुई। इस बार लगा सखियाँ कुछ खुलकर सामने आईं, एकाध सखि ने कुछ गुनगुनाया भी। नए पुराने गाने पसन्द किए गए जैसे कुली नं 1 का गीत तो पुरानी फ़िल्म हमराज़ का गीत -

तुम अगर साथ देने का वादा करो
मैं यूँ ही मस्त नज़रे लुटाता रहूँ

सोमवार को गर्मियों के लिए ठंडे पेय बनाना बताया गया। मंगलवार को करिअर संबंधी बातें बताई जाती है। इस बार न्यूज़ एडिटर के क्षेत्र की बातें बतायी गई। बुधवार को सौन्दर्य और स्वास्थ्य पर चर्चा में कुछ पुराने नुस्क़े बताए गए कुछ बातें नई रही जैसे हमारी ऊँचाई, वज़न और उमर में संतुलन बनाए रखने की बात। कुल मिलाकर पिछले सप्ताहों से इस सप्ताह बुधवार का अंक ठीक रहा। गुरूवार को सफल महिलाओं की गाथा बताई जाती है। इस बार हिन्दी साहित्यकार शिवानी (गौरा पन्त) के जीवन और उनकी रचनाओं के बारे में बताया गया। सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने और बीच के समय के अच्छे गीत सुनवाए गए। शंकर हुसैन फ़िल्म के रफ़ी साहब के गाए इस गीत की फ़रमाइश सखियों ने बहुत दिन बाद की -

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत ख़ूबसूरत मगर साँवली सी

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए जैसे नौ दो ग्यारह फ़िल्म का गीत।

3:30 बजे शनिवार और रविवार को नाट्य तरंग में सुनवाया गया नाटक - जाने अनजाने जो आकाशवाणी के जम्मू केन्द्र की भेंट थी।

पिटारा में शाम 4 बजे रविवार को यूथ एक्सप्रेस में विश्व संचार दिवस पर विशेष जानकारी दी गई। किताबों की दुनिया स्तम्भ में विभारानी की दो लघु कथाएँ सुनवाई गई और विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना दी गई।

शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम सरगम के सितारे जो गीतकार शकील बदायूँनी पर केन्द्रित था। शोध, आलेख और प्रस्तुति यूनूस जी की थी। फली कड़ी सुनवाई गई जिसमें मुशायरों के शायर और फ़िल्मी गीतकार के रूप की जानकारी मिली। सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में होमियोपेथी चिकित्सा पर बातचीत हुई। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में नए अभिनेता विनय से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत सुनवाई गई। अच्छी जानकारी मिली कि विदेशों में अपने कलाकार अपनी कला के प्रति समर्पित है, वहाँ भी अभिनय का प्रशिक्षण देने वाले गुरू है। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई। विभिन्न स्तर के श्रोताओं ने बात की जैसे नौकरीपेशा श्रेणी में कंपाउंडर, छात्र आदि और उनकी पसन्द के गीत सुनवाए गए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में शनिवार को विविध भारती के संग्रहालय से तीन दशक पुरानी रिकार्डिंग सुनवाई गई, यह है निर्माता निर्देशक शक्ति सामन्त द्वारा प्रस्तुत विशेष जयमाला। अधिकतर गीत खुद की फ़िल्मों के ही सुनवाए। बातें कुछ खुद की रही और कुछ साथियों को याद किया। सप्ताह के शेष दिन नए पुराने गीत सुनवाए गए पर फ़ौजी भाइयों की पसन्द पर नहीं बल्कि विविध भारती की ओर से फ़ौजी भाइयों के लिए यह गीत सुनवाए गए। यह भी बताया गया कि फ़ौजी भाइयों के पत्र आने बन्द हो गए है पर पत्र भेजने के लिए अनुरोध किया जा रहा है।

7:45 पर शुक्रवार को शशि तिवारी और सखियों का गाया बृज लोकगीत बढिया रहा। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में डोगरी लोकगीत भी अच्छा लगा। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। इस बार भी कुछ कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। ख़ास बात यह बताई गई कि फ़ौजी भाइयों के पत्र जयमाला कार्यक्रम के लिए आने बन्द हो गए है जिसका कारण शायद आजकल बढती तकनीकी सुविधाएँ है। मंगलवार को सुनवाई गई फ़िल्मी क़व्वालियाँ। बुधवार को आजकल लोकप्रिय हो रहे धारावाहिक बिदाई की अवनि से मिलना अच्छा लगा। निम्मी (मिश्रा) जी की सहज स्वाभाविक बातचीत रही। प्रीति (अवनि) ने बताया कि कैसे वो बिना संघर्ष के कला की इस दुनिया में आईं। यह जानना अच्छा लगा कि यह बात ग़लत है कि इस क्षेत्र में संघर्ष करके ही प्रवेश किया जा सकता है। बातचीत अच्छी लगी। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग जौनपुरी पर आधारित रफ़ी साहब का गाया यह गीत -

गुज़रे है आज इश्क में हम उस मक़ाम से
नफ़रत सी हो गई है मुहब्बत के नाम से

वैसे राग जौनपुरी आजकल कम ही सुनवाया जा रहा है, संगीत सरिता में तो लम्बा समय बीत गया इसकी चर्चा नहीं हुई।

8 बजे हवामहल में आकर्षक रही धारावाहिक की बढिया प्रस्तुति। कालिदास की रचना मालविकाअग्निमित्र का सीताराम चतुर्वेदी द्वारा किया गया अनुवाद जिसके रेडियो नाट्य रूपान्तरकार और निर्देशक है चिरंजीत। हवामहल में जब भी चिरंजीत का नाम आया, सामान्य हँसने-हँसाने से अलग प्रेरणादायी रचनाओं के साथ आया। यह कृति भी अन्य प्रस्तुतियों की तरह अच्छी बल्कि बहुत अच्छी रही। पूरा माहौल ही गरिमामय हो गया।

9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में मजबूर, रफ़ूचक्कर, कोई मिल गया जैसी नई पुरानी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में निर्माता निर्देशक शक्ति सामन्त से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की पहली कड़ी प्रसारित हुई जिसमें आरंभिक संघर्ष की बातें हुई - अशोक कुमार से मुलाक़ात और सहायक निर्देशक स्तर से काम की शुरूवात जबकि मुंबई आए थे अभिनेता बनने का सपना लिए।

10 बजे छाया गीत में शुक्रवार को कमल (शर्मा) जी ने अच्छे गीत सुनवाए, आलेख में तो कोई नई बात नहीं थी। शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने प्यार की दास्तान के गीत सुनवाए। बाकी सब सामान्य रहा।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर गाने सुनवाए गए जिनमें बीच के समय की फ़िल्मों के गीतों की अधिक फ़रमाइश थी। 11 बजे समाचार के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

Tuesday, May 19, 2009

एक गीत फिल्म 'वीर बालक' से सोना सोना क्या करते हो सोने क्या क्यो रोना है' यादें: कार्यक्रम 'यादों के झरोखोसे' की

रेडियोनामा: एक गीत रसोई से, सखि सहेली कार्यक्र्म को समर्पित

आदरणिय श्रीमती अन्नपूर्णाजी,
आज मेरी यह पोस्ट आपकी ही श्रेणी के साथ जोड़ रहा हूँ ।
एक समय था जब दो पहर 2.30 पर यादों के झरोखो से नामका पूराने गानों का एक और रोज़ाना कार्यक्रम भूले बीसरे गीत के अलावा होता था । तब उसमें दो गीत समय समय पर प्रसारित होते रहते थे, जिसमें एक था 'चलो झूमके सर पे बांधे कफ़न' जो फिल्म काबूलीख़ान से है और दूसरा जो इस पोस्ट का शिर्षक है, 'सोना सोना क्या करते हो सोने क्या क्यों रोना है' जो फिल्म वीर बालक से है और इस दूसरे गीत के संगीतकार सुप्रसिद्ध पियानो, एकोर्डियन और सोलोवोक्स वादक स्व. केरशी मिस्त्री थे । पहला गाना तो कोई खाश राष्ट्रीय दिन के कोई कार्यक्रममें बहोत ही कम लेकीन प्रसारित जरूर होता है । पर यह दूसरा गाना तो इस कार्यक्रम के साथ ही मेरी यादें बन कर रह गया है । इस के बारेमें श्री युनूसजी को कई साल दो साल पहेले छाया गीत के लिये बता चूका हूँ । हालाकि, मूझे पता है, कि इस तरह के अनुरोध वाले गाने आनेमें देरी होनी स्वाभाविक है । और मेरे बताये दो गाने वे सुमन कल्याणपूरके गाये फिल्म फरेब (2) से ये ज़िंदगी के साथी और फिल्म ब्लेक प्रिन्स से निगाहें ना फ़ेरो प्रस्तूत कर भी चूके है । और दूसरी एक बात की यह वीर बालक वाले गीत को तो करीब तीन साल पहेले हल्लो फ़रमाईश में सुनने की श्री अमरकांतजी से भी मांग की थी पर उस स्थान पर मेरी दूसरे विकल्प वाली फरमाईश श्री रमेश सेठी द्वारा प्रस्तूत की गयी थी और दो साल पहेले जब श्री कमल शर्माजी से इस की चाहना एक और विकल्प के साथ की थी तब उस कार्यक्रम की निर्मात्री डो. उषा गुजराती और सहायक श्री रमेश गोखलेने पूरे का पूरा फोन कोल निकम्मा किया था । इस गीत की याद तो में पहेले हर 2 फ़रवरी और पिछले साल से हर 5 मार्च के दिन के लिये करवाता ही हू । पर केवल निराशा के अलावा कुछ हाथ नहीं आता । इस कोरस गाने की गायिका में एक स्व. गीता दत्त है और अन्य है बी. कमलेश कूमारी जिनका सही नाम जालू भेसानिया है, जिनके धर स्व. केरशी मिस्त्रीजी के साथ दो बार मेरा जाना हुआ है । (मेरी पोस्ट के पूराने पाठक कुछ बात को दोहराने के लिये क्षमा करें) । क्या मोदी साहब और श्री युनूसजी मेरा अनुरोध पूरा करवायेंगे या करेंगे ? मोदी साहब से एक और बिनती है, कि हर मंगल वार विविध भारती की अस्थायी उद्दधोषक श्री मंजू द्विवेदी अंतरालमें श्री अनिल मोहिले की वायोलिन पर बजाई एक 45 आरपीएम एलपी से कोई धून सुनवाती है, वह अन्य सभी एलपी की तरह 33 पर बजा कर ही सुनवाती है तो उनको खुद को या प्रसारण अधिकारी को आज तक उसमें अपने आप सुनते वक्त कुछ अलग सा महसूस नहीं होता है ? इसको आने वाले मंगलवारको 45 आरपीएम पर सुनवाने का प्रबंधन करें । आज रजनीगंधा के शिर्षक गीत की धून 7.15 पर सुनाई थी ।

पियुष महेता ।
नानपूरा, सुरत-395001.

एक गीत रसोई से, सखि सहेली कार्यक्र्म को समर्पित

आजकल गर्मी की छुट्टियाँ चल रही है। हमारे देश में चलन है कि इन दिनों में महिलाएँ अपने बच्चों को लेकर अपने मायके यानि माता-पिता के घर छुट्टियाँ मनाने जाती है। ऐसे में घर में अकेले रह जाते है पति महोदय और उनके सामने सबसे बड़ी समस्या आ जाती है खाने-पीने की। यही ध्यान में रख कर आज याद कर रहे है अस्सी के दशक की एक चर्चित फ़िल्म का गीत।

इस फ़िल्म का नाम है मेरी बीवी की शादी। इसके मुख्य कलाकार है अमोल पालेकर और रंजीता और एक महत्वपूर्ण भूमिका में है अशोक श्रौफ़ जो आजकल फ़िल्मों और सीरियलों में कामेडी करते नज़र आते है। यह गीत इन्हीं पर फ़िल्माया गया है।

वैसे भी अमोल पालेकर की फ़िल्में उस दौरान बहुत पसन्द की जाती थी। अशोक श्रौफ़ की शायद यह दूसरी हिन्दी फ़िल्म है इससे पहले उन्होनें अमोल पालेकर के ही साथ दामाद फ़िल्म में काम किया था।

इस गीत को सुरेश वाडेकर ने गाया है। देखने और सुनने में मज़ेदार है यह गीत। पहले रेडियो से भी बहुत सुनवाया जाता था फिर बजना बन्द हो गया। जो बोल मुझे याद आ रहे है वो इस तरह है -

राम दुलारी मैके गई जोरू प्यारी मैके गई
खटिया हमरी खड़ी कर गई

हमसे बने न बैंगन का भर्ता
बने ए ए ए ए न
हमसे बने न बैंगन का भर्ता
मिर्ची मसाले से जिया बड़ा डरता
दाल भात खाने की ॠत नाहीं भइय्या
भूखा न मर जाऊँ ओ मोरी मइय्या
दो दिन में तबीयत चकाचक भई रे भय्या
राम दुलारी मैके गई

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पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, May 15, 2009

साप्ताहिकी 14-5-09

सुबह 6 बजे समाचार के बाद बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर गौतम बुद्ध के विचार बताए गए। इसके अलावा सप्ताह भर विदेशी चिंतक, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी के विचार बताए गए, कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता की पंक्तियाँ बताई गई। वन्दनवार में भगवान बुद्ध के नए भक्ति गीत सुनवाए गए और हर दिन नए पुराने भजन सुनवाए गए। कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा पर किसी भी दिन विवरण न बताना खटकता रहा।


7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम इस सप्ताह शनिवार को तलत महमूद की पुण्य स्मृति में समर्पित किया गया। इसी तरह रविवार को अभिनेता, संगीतकार, गायक पंकज मलिक को समर्पित रहा। रविवार के कार्यक्रम के बारे में पहले ही अन्य कार्यक्रमों में संदेश दिया गया था। इस दिन पंकज मलिक के गाए और स्वरबद्ध किए गीत एक के बाद एक सुनवाए गए पर उनके बारे में कुछ बताया नहीं गया। हो सकता है उनके बारे में अधिक जानकारी न हो पर कुछ तो कहा जा सकता था, यहाँ तक कि समाप्ति पर भी यह नहीं बताया कि कार्यक्रम उन्हें समर्पित था। हर दिन कार्यक्रम का समापन के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गाए गीतों से होता रहा।

7:30 बजे संगीत सरिता में कांचन (प्रकाश संगीत) जी द्वारा तैयार की गई श्रृंखला - भिण्डी बाज़ार घराने की बंदिशें - जारी रही जिसे प्रस्तुत कर रही है इसी घराने की ख़्यात गायिका डा सुहासिनी कोरटकर। आपसे बात कर रहे है अशोक (सोनावले) जी। इस सप्ताह विभिन्न रागों जैसे शिवरंजनि में बंदिशों की चर्चा की गई। बंदिशों में साहित्य की चर्चा की गई। घराने के नाम के बारे में रोचक बात बताई गई कि अंग्रेज़ इस क्षेत्र को behind the bajar कहते थे जिसे अंग्रेज़ी के कम जानकार भारतीयों ने भिण्डी बाज़ार बना दिया। ख़्यात कलाकारों जैसे अमान अलि खाँ की और उनकि शिष्यों की बंदिशें भी सुनवाई गई। फ़िल्मी गीत भी इन रागों पर आधारित सुनवाए गए।

7:45 को त्रिवेणी में ज़िन्दगी की मंज़िल और रास्तों की बात हुई, छुट्टियों की चर्चा हुई। ज़िन्दगी में सुख-दुःख और दूसरों के जीवन में ख़ुशी की लहर लाने की बात हुई। सभी आलेख अच्छे थे। गीत कहीं-कहीं खटकने लगे जैसे गुरूवार को बताया गया कि अच्छे-बुरे सभी गुण होते है , पर अपनी बुराइयों पर ध्यान नहीं दिया जाता, इस तरह अच्छी बातें बता कर रफ़ी साहब का यह गीत सुनवाया गया -

किसी ने कहा है मेरे दोस्तों

बुरा मत कहो बुरा मत देखो बुरा मत सुनो


इसके बाद गौतम बुद्ध की संक्षिप्त कथा बताई गई कि एक बार किसी ने उनसे अपशब्द कहे लेकिन वो चुप रहे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होनें बताया कि जो कहा गया उसे उन्होनें ग्रहण नहीं किया। बहुत ऊँची बात कह दी गई कि अपने मन में प्रेमभावना होनी है और करना वही है जो अपना दिल कहता है और सुनवाया गया यह गीत और गीत शुरू होते ही त्रिवेणी का और आलेख का स्तर नीचे आ गया, गीत है -


सुन ले तू दिल की सदा


अरे भई यह दिल की सदा नायक सुना रहा है नायिका को जो रोमांटिक प्यार है जबकि बुद्ध द्वारा जिस प्यार की चर्चा हुई वो एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के प्रति प्रेम है। प्यार के अलग-अलग रूप है, इस तरह ऊँचे स्तर पर जाकर ऐसे रोमांटिक गीतों का चुनाव ठीक नहीं लगता है। वैसे त्रिवेणी में अक्सर गीतों के चुनाव में ग़लतियाँ देखी गई।



दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में शुक्रवार को क़ुर्बानी, धर्मात्मा, मिशन काश्मीर जैसी नई पुरानी फ़िल्में लेकर आई सलमा जी। सोमवार को मैनें प्यार किया, अकेले हम अकेले तुम जैसी लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आए युनूस जी। मंगलवार को निम्मी (मिश्रा) जी लाईं लोकप्रिय फ़िल्में - खेल खेल में, सौदागर, अमर अकबर एन्थोनी, तेरे मेरे सपने। बुधवार को अजेन्द्र (जोशी) जी ले आए कभी ख़ुश कभी ग़म, मैं हूँ ना, अजनबी जैसी नई फ़िल्में। गुरूवार को कमल (शर्मा) जी लाए नाइट इन लंदन, शागिर्द, हमसाया जैसी लोकप्रिय फ़िल्में। हर दिन श्रोताओं ने भी इन फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों के लिए संदेश भेजें।

1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में गायन प्रस्तुति में शुक्रवार को पंडित कुमार गंधर्व का गायन - राग तोड़ी और सहेली तोड़ी में सुनवाया गया। गुरूवार को विदूषी शोभा गुर्टू का उप शास्त्रीय गायन सुनवाया गया जिसमें मिश्र तेलंग ठुमरी, राग मांज खमाज और राग सिन्धु काफ़ी में रचनाएँ सुनवाई गई।

वादन प्रस्तुति में सोमवार को पंडित वी जी जोग का वायलन वादन सुनवाया गया - राग अहीर भैरव। मंगलवार को बनारस घराने के प्रख्यात तबला वादक पंडित किशन महाराज का तबला वादन - तीन ताल में और अप्पा जलगाँवकर का हारमोनियम वादन प्रस्तुत हुआ। बुधवार को विदूषी एम राजम से वायलन पर काफ़ी ठुमरी, बुद्धादित्य मुखर्जी से सितार पर राग देस, शिवकुमार शर्मा से संतूर पर राग मिश्र भैरवी तथा पंडित कार्तिक कुमार और निलाद्री कुमार से राग सिन्धु भैरवी में सितार और सुरबहार पर जुगलबन्दी सुनवाई गई।

इस तरह सप्ताह भर गायन के साथ विभिन्न वाद्यों का आनन्द मिला।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में श्रोताओं ने मिले-जुले गीतों के लिए फ़रमाइश की जैसे साठ के दशक की फ़िल्म पत्थर के सनम का शीर्षक गीत। नई फिल्म ख़ूबसूरत का कविता कृष्णमूर्ति और कुमार सानू का गाया यह गीत -

मेरा एक सपना है के देखूँ तुझे सपनों में
तू माने या न माने के तू है मेरे अपनों में


पुरानी फ़िल्म दिल और अपना प्रीत पराई का लता जी का गाया यह गीत -

अजीब दास्ताँ है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम
ये मंजिलें है कौन सी न वो समझ सके न हम

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। पहला फोनकाल बिहार के एक पिछड़े गाँव से आया, छात्रा थी, बताया कि गाँव में बिजली नहीं है, आगे की पढाई की सुविधा नहीं है पर वहाँ से मुंबई - विविध भारती तक फोन करने की सुविधा है, बड़ा अजीब लगा यह जानकर कि कैसी-कैसी सुविधाएँ है और कैसी-कैसी नहीं है। अधिकतर छात्राओं ने बात की। एकाध घरेलु सखियों से भी बातचीत हुई। उत्तरप्रदेश से अधिक सखियों ने बात की। नए गाने कुछ अधिक ही पसन्द किए गए जैसे -

तुम्हें देखें मेरी आँखें इसमें क्या मेरी ख़ता है

सोमवार को रविवार को मनाए गए मदर्स डे की चर्चा की गई और तलाश फ़िल्म का एस डी बर्मन का गाया यह गीत सखि सहेली की ओर से सबको समर्पित किया गया, बहुत अच्छा लगा -

मेरी दुनिया है माँ तेरी आँचल में

सखियों के भेजे गए कुछ व्यंजन बताए गए जिसमें सबसे अच्छा लगा छत्तीसगढ का पारम्परिक व्यंजन जो चावल और छाँछ से बनाया जाता है। मंगलवार को करिअर संबंधी बातें बताई जाती है। इस बार इंटिरियर डिज़ाइनिंग यानि आंतरिक सज्जा के क्षेत्र की बातें बतायी गई। बुधवार को सौन्दर्य और स्वास्थ्य पर चर्चा में सखियों के भेजे पुराने नुस्क़े ही बताए गए। सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने और बीच के समय के अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे नई फ़िल्म दिल्ली 6 का यह गीत -

मटककली मटककली
मटक मटक ज़रा पंख झटक

और अस्सी के दशक की फ़िल्म थोड़ी सी बेवफ़ाई का यह गीत -

मौसम मौसम लवली मौसम
कसक अन्जानी है मद्धम मद्धम
चलो घुल जाए मौसम में हम
मौसम मौसम लवली मौसम

पिटारा में शाम 4 बजे रविवार को यूथ एक्सप्रेस में रेड क्रास दिवस और रविन्द्रनाथ टैगोर की जन्मतिथि पर विशेष बातें बताई गई। गीतकार प्रेम धवन को याद किया गया। विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना दी गई।

शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम बाईस्कोप की बातें जिसमें फ़िल्म नया दौर की बातें बताई गई। हमेशा की तरह इस बार भी लोकेन्द्र शर्मा जी ने बहुत अच्छी तरह से हर बात बताई। सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में डा शरद साठे से राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने किडनी रोग पर बातचीत की। बहुत अच्छी जानकारी मिली कि अक्सर गुर्दे (किडनी) का रोग 50% तक फैलने तक पता नहीं चलता। माँसाहार से रोग का ख़तरा बढता है। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में गायक कुमार सानू से बातचीत सुनवाई गई, आरंभ में गानों के अंश सुनवाने के बाद कमल (शर्मा) जी ने ठीक कहा कि एक गायक की एक गीतकार से बातचीत अधिक ठीक रहती है, इस तरह कुमार सानू से बातचीत की गीतकार राजेश जौहरी ने। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई और उनकी पसन्द के गीत सुनवाए गए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में हर दिन नए पुराने गीत सुनवाए गए जैसे नई फ़िल्म कृष का गीत और सत्तर के दशक की लोकप्रिय फ़िल्म कच्चे धागे का लता जी का गाया यह लोकप्रिय गीत जिसकी फ़रमाइश फ़ौजी भाइयों ने बहुत-बहुत दिन बाद की -

हाय हाय एक लड़का मुझको ख़त लिखता है
लिखता है हाय मुफ़्त में ले ले तू मेरा दिल बिकता है

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने। बहुत अच्छा लगा सुनकर। अधिकतर ख़ुद की फ़िल्मों के गीत सुनवाए। साथी कलाकारों की प्रशंसा की जैसे संजीव कुमार और कुमकुम।

7:45 पर शुक्रवार को पूर्वी, असमी लोकगीतों का आनन्द लिया, भूपेन हज़ारिका को सुनने के बाद दूसरे गीत कुछ फीके लगे। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। इस बार भी कुछ कार्यक्रमों की तारीफ़ तो कुछ पुराने कार्यक्रमों को फिर से शुरू करने का अनुरोध था। कार्यक्रमों में परिवर्तन की सूचना देते हुए बताया गया कि फ़िल्मी भजनों का कार्यक्रम सांध्य गीत शाम 6:15 बजे से प्रसारित हो रहा है। इस बारे में हम बता दे कि हैदराबाद में प्रसारित नहीं हो रहा। यहाँ 5:30 बजे फ़िल्मी हंगामा के बाद क्षेत्रीय प्रसारण शुरू हो जाता है फिर शाम 7 बजे ही हम केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है। मंगलवार को सुनवाई गई ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ। बुधवार को फैशन फोटोग्राफ़र और माडल कोआडिनेटर मोहित इसरानी से रेणु (बंसल) जी की बातचीत सुनवाई गई। बताया कि पारिवारिक माहौल से ही वह इस क्षेत्र में आए। इस नए काम के बारे में जानना अच्छा लगा। बातचीत अच्छी लगी। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग पहाड़ी पर आधारित नूरी फ़िल्म का ख़ैय्याम का स्वरद्ध किया यह गीत -

चोरी चोरी कोई

8 बजे हवामहल में सुनी झलकी - शादी की तैयारी (निर्देशिका लता गुप्ता), हास्य नाटिका - एक लड़का कुँवारा (निर्देशक महेन्द्र मोदी), ड्रामा ड्रामा (रचना इब्राहिम अश्क निर्देशक गंगाप्रसाद माथुर)

9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में जो जीता वही सिकन्दर, आशा जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए और सबसे अच्छा लगा विश्वास फ़िल्म के गीतों को बहुत-बहुत समय बाद सुनना जिसमें मुकेश की आवाज़ के विविध रंग है और शायद मनहर ने पहली बार गाया है। एक से बढ कर एक गीत -
ढोल बजा ढोल ढोल जानियाँ

आपसे हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया

ले चल ले चल मेरे जीवन साथी
ले चल मुझे उस दुनिया में प्यार ही प्यार है जहाँ

चाँदी की दीवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में गीतकार नक्शलायल पुरी से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की अगली कड़ी प्रसारित हुई।

10 बजे छाया गीत के नाम पर इस बार भी निम्मी (मिश्रा) जी भूले बिसरे गीत ले आईं, बात कही दिल के तार पर नए गीत छेड़ने की और सुना दिया पुराना गीत। राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने भी पहले की तरह नए गीत ही सुनवाए। रेणु (बंसल) जी ऐसे गीत लेकर आईं जिनमें दर्द तो है पर वे दिल को सुकून देते है।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर गाने सुनवाए गए जिनमें बीच के समय की फ़िल्मों के गीतों की अधिक फ़रमाइश थी। 11 बजे समाचार के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

Tuesday, May 12, 2009

हीर रांझा का देवर-भाभी का मस्त-मस्त गीत

शादी-ब्याह के इस मौसम में याद आ रहा है देवर-भाभी का एक गीत। यह गीत फ़िल्म हीर रांझा का है।

इस नाम से और भी फ़िल्में बनी पर आज हम चर्चा कर रहे है 1972 के आस-आस रिलीज़ हुई इस फ़िल्म की जिसमें हीर रांझा की मुख्य भूमिकाओं में है राजकुमार और प्रिया राजवंश तथा मामा की महत्वपूर्ण भूमिका में है जीवन।

रांझा के ब्याह की बात चलती है तब उसकी छह भाभियाँ उसे छेड़ते हुए गाती है।

इस गीत को जगजीत कौर और शमशाद बेगम के साथ कुछ और गायिकाओं ने भी गाया है जिनके नाम याद नहीं आ रहे। बोल भी ठीक से याद नहीं आ रहे जो याद आ रहे, कुछ इस तरह है बोल -

नाचे अंग में छलके रंग में
लाएगा मेरा देवर
आहा (कोरस)
गोरे गाल वाली
आहा (कोरस)
लंबे बाल वाली
आहा (कोरस)
बांकी चाल वाली
हाय (कोरस)
नाचे अंग में छलके रंग में ओए

छोड़ दो रस्ता मेरा बगिया-बगिया जाऊं मैं
फूल चुरा के कच्ची कलियां चुन कर लाऊं मैं
सेहरा सजाऊँ मैं
----------
नाचे अंग में छलके रंग में ओए

यह गाना विविध भारती सहित सभी रेडियो स्टेशनों से सुनवाया जाता था। वास्तव में अस्सी के दशक तक और इसके शुरूवाती सालों में भी रेडियो के सभी स्टेशनों से लगभग सभी फ़िल्मों के सभी गीत सुनवाए जाते थे। यह गाने फ़रमाइशी ग़ैर फ़रमाइशी किसी न किसी कार्यक्रम में शामिल हो ही जाते थे। इसीलिए जो रेडियो के नियमित श्रोता है उन्हें सभी गाने याद है चाहे वो गाने उनकी पैदाइश के पहले के ही क्यों न हो। बाद में तो विभिन्न चैनलों पर और विडियो में पुरानी फ़िल्में देखकर गानों और फ़िल्मों की अच्छी जानकारी भी हो गई।

अस्सी के दशक के बीच के वर्षों से पहले दूरदर्शन फिर निजी चैनलों के लोकप्रिय होते जाने से रेडियो स्टेशन भी नए गाने ज्यादा सुनवाने लगे। दूसरा कारण यह भी रहा कि गानों की संख्या लगातार बढती जाने से कुछ गीतों का बजना बन्द होना स्वाभाविक हो गया।

हम जैसे श्रोता जिन्होनें बचपन से ही रेडियो सुना हो, ऐसी उमर से जब गाने भी ठीक से समझ में नहीं आते थे, ऐसे श्रोताओं के लिए बहुत सारे गीतों का याद आना स्वाभाविक है। यह गीत भी उन्हीं में से एक है।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, May 8, 2009

रेडियोनामा: साप्ताहिकी 7-5-09

रेडियोनामा: साप्ताहिकी 7-5-09
श्रीमती अन्नपूर्णाजी,
समीक्षा सुन्दर रही । एक जानकारी देना काहता हूँ, कि फिल्मी हंगामा शाम ६:३० पर कर दिया गया है और ६.३० पर सांध्य गीत नाम का कार्यक्रम फिल्मी भजनो पर आधारित होता है वह फ़िर से शुरू किया गया है और इस प्रकार अर्पण बंध होने पर निराश हुए श्रोता को शांत किया गया है । रहा सिर्फ़ फिल्मी धूनो के कार्यक्रम को डीटीएच के दायरे से बाहर निकाल कर रेडियो के दायरेमें लाना जो लगता है कि विविध भारती किसी भी बाहने करना ही नहीं चाहती । नहीं तो रविवार के दिन सदा बहार गीत को जो नियमीत आधे घंटे के स्थान पर एक घंटे का किया गया है इस की जगह एक साप्ताहीक कार्यक्रम के रूपमें तो प्रस्तूत किया ही जा सकता है । पर इसके लिये विविध भारती को मन मनाना होगा और एक और बात की अगर ऐसा कार्यक्रम शुरू किया भी गया तो इसकी शुरूआती किस्तों की ध्वनि-मूद्रीत करके थोड़े लम्बे अरसे के बाद पुन; प्रसारित करने के लालच से बचना होगा । जिस तरह अभी एक ही फिल्म से के लिये किया जाता है । यहाँ एक बात स्पस्ट करता हूँ, कि मेरा इशारा सुबह की रेकोर्डिंग को रात्री पुन: प्रसारित करने की और हरगीझ नहीं है । पर उसी कार्यक्रम को वो ही उद्दघोषक की आवाझ के साथ कुछ: महिनो या एक दो साल के बाद वैसे का वैसा फ़िर से प्रस्तूत करने की और है, जिससे एलपी या सीडीमें जो गाने पहेले होते है, वे दूबारा प्रस्तूत होते रहते है और पिछे रहने वाले गाने छुटते ही रहते है । और जिस पूरानी फिल्म की एल पी या सीडी बाझारमें नहीं आयी हो उनके गीत ७८ या ४५ आरपीएम पर अगल अलग होते है वे फिल्में इस कार्यक्रम में कभी शामिल नहीं होगी । जब की रेडियो श्रीलंका पर ऐसा नहीं है । वहाँ ७८ या ४५ आरपीएम वाले गाने बजाने के कारण गानों में एक अन्तरा कम बजता है पर सभी गाने शामिल हो जाते है । एक और बात कि आपने इज्जत के गाने की तो मैंनें फिल्म देख़ी तो नहीं है पर रेडियो सिलोन का श्री अमीन सायानी साहब का अपनी ही आवाझ को समान आवाझ वाले दो अलग अमीन साहब की विषेष असर खडी करने वाला विज्ञापन याद आता है तो इस गाने को शायद तनूजाजी के नाम से जूड़ा गया था और जागी रे बदन में ज्वाला गीत को जय ललीताजी के नाम के साथ जूडा गया था । फ़िर भी अगर मेरी गलती हो रही हो तो माफ़ करना । रही बात आपकी कोई एक कार्यक्रम के लिये साप्ताहीक समीक्षा लिख़ने की तो मेरे पास आप और युनूसजी या संजय पटेलजी जैसा शब्दो का चयन नहीं है पर जब भी कोई बात दिलमें किसी कार्यक्रम के लिये दिलमें आ जाती है तो उसको शब्दोंमें परिवर्तीत कर देता हूँ, पर अच्छे कार्यक्रमों, जिसमें नामी कलाकारों की मुलाकातें या मुलाकातों की शृंखलायें शामिल है तो जो पहेली बार लिख़ा जा सकता है उनको ही विविध भारती की तरह पुन: प्रकाशित करें क्या ? यहाँ भी एक बात स्पस्ट करता हूँ , कि मैं पुन: प्रसारण का सम्पूर्ण विरोधी नहीं हूँ, पर अगर एक किस्त वाला कार्यक्रम होता है तो दो या तीन साल और मुलाकातों की शृंखला की बात हो तो ५ या ६ साल मूझे साल उपयूक्त लगते है । यह बात उजाले उनकी यादों के के सुबह और रात्री प्रसारण के लिये नहीं है ।
पियुष महेता ।
नानपूरा, सुरत-३९५००१.

साप्ताहिकी 7-5-09

इस सप्ताह परिवर्तन की हल्की सी, पर ख़ुशनुमा लहर आई - दोपहर एक बजे म्यूज़िक मसाला की जगह शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम अनुरंजनि शुरू किया गया।

सप्ताह भर सुबह 6 बजे समाचार के बाद चितन में भगवद गीता का कथन, गौतम बुद्ध जैसे मनीषियों के विचार बताए गए। बहुत पुराने भजन इस सप्ताह भी नहीं सुनवाए गए पर सप्ताह भर भजन अच्छे ही सुनवाए गए -

मैं तो राह निहारूँ मेरे राम आएगें
शबरी के राम आएगें
ओ मैं तो राह निहारूँ


कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा जैसे शुक्रवार को सुनवाया गया - हम होंगे कामयाब

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम इस सप्ताह भी अच्छा रहा। कुछ लोकप्रिय गीत भी सुनवाए गए जैसे सीआईडी का शमशाद बेगम का गाया गीत -


कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना

रविवार को भूले-बिसरे गीत अधिक सुनवाए गए। अन्य दिनों में भी कुछ ऐसे गीत सुनवाए गए जैसे ज़िद्दी फ़िल्म का गीत। कार्यक्रम का समापन के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गाए गीतों से होता रहा।

7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला एक राग दो मध्यम राग बसन्त की चर्चा से समाप्त हुई। इसमें ऐसे रागों की चर्चा की जा रही थी जिसमें दो मध्यमों का प्रयोग होता है। इस सप्ताह कल्याण थाट के लोकप्रिय राग केदार, कामोद, मारू बिहाग की चर्चा की गई। बंदिशें भी सुनवाई गई। फ़िल्मी गीत भी इन रागों पर आधारित सुनवाए गए जैसे राग छाया नट पर आधारित तलाश फ़िल्म का मन्नाडे का गाया गीत - तेरे नैना

सप्ताह के अंतिम दिन से नई श्रृंखला शुरू हुई - भिंडी बाज़ार घराने की बंदिशें। पहली ही कड़ी में समझा दिया कि सुर ताल में शब्दों को ऐसे पिरोना की भाव अच्छी तरह समझ में आ जाए, यही बंदिश है। बंदिशें छोटी 4-5 लाइनों की होती है। शास्त्रीय संगीत की बंदिशें और सुगम संगीत की बंदिशें अलग होती है। शुरूवात की गई सुबह के राग वैरागी से।

7:45 को त्रिवेणी शुक्रवार को बहुत अच्छी रही, गुणों अवगुणों की बात हुई, दूसरों को सुखी करने की बात हुई गाने भी उचित और अच्छे सुनवाए गए जैसे साजन बिना सुहागन का गीत -


मधुबन ख़ुशबू देता है


पर प्रसारण किसी और दिन भी हो सकता था क्योंकि इस दिन थी पहली मई यानि मज़दूर दिवस, विश्व भर में श्रमिकों को सम्मान देने का दिन, अगर इस दिन सुबह सवेरे त्रिवेणी में विविध भारती भी मज़दूर भाई-बहनों को सलाम करती तो अच्छा लगता।


इसके अलावा ज़िन्दगी के अँधेरों की, स्वाभिमान की चर्चा हुई। रविवार का अंक अच्छा रहा, प्रकृति की पर्यावरण की बातें हुई।


दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में शुक्रवार को युनूस जी लाए लोकप्रिय फ़िल्में - चाँदनी, त्रिशूल, सिलसिला जिसमें से श्रोताओं ने रोमांटिक गीतों के लिए संदेश भेजें। शनिवार को रेणु (बंसल) जी पधारी ऐसी लोकप्रिय फ़िल्में लेकर जिनके सभी गीत अच्छे है जैसे जानी मेरा नाम, लोफ़र, कन्यादान। सोमवार को अस्सी के दशक के डिस्को गीत लेकर आए युनूस जी - क़ुर्बानी, डान्स डान्स। मंगलवार को अमरकान्त जी लाए लोकप्रिय फ़िल्में - लव इन टोकियो, तीसरी मंज़िल, सत्ते पे सत्ता। बुधवार को कमल (शर्मा) जी ले आए अनुपमा, दो बदन, ख़ामोशी, तीसरी कसम जैसी संजीदा फ़िल्में। गुरूवार को राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी लाए धूम, रब ने बना दी जोड़ी, गुप्त, दिल का रिश्ता जैसी नई फ़िल्में। हर दिन श्रोताओं ने भी इन फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों के लिए संदेश भेजें।

1:00 बजे पहले की तरह शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम अनुरंजनि शुरू हो गया। गायन प्रस्तुति में सोमवार को पंडित भीमसेन जोशी का गायन सुनवाया गया - राग यमन कल्याण में - पिया बिन रतिया बैरन, राग यमन में - पिया की नजरिया। बुधवार को उस्ताद अमीर खाँ का गायन सुनवाया गया - राग बैरागी भैरव - तुमरो नाम।

वादन प्रस्तुति में मंगलवार को उस्ताद अमजद अली खाँ का सरोद वादन जिसमें रचना शुभलक्ष्मी सुनवाई गई, शिवकुमार शर्मा का संतूर वादन जिसमें राग कलावती सुनवाया गया और अंत में हरि प्रसाद चौरसिया का बाँसुरी वादन सुनवाया गया। गुरूवार को पंडित विजय राघव राव का बाँसुरी वादन सुनवाया गया - तीन ताल में राग नटहंस, द्रुत एक ताल में राग हिंडोल।

बहुत आनन्द आ रहा है। इस कार्यक्रम को दुबारा इसी समय शुरू करने के लिए धन्यवाद महेन्द्र मोदी जी।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में श्रोताओं ने मिले-जुले गीतों के लिए फ़रमाइश की और विविध भारती ने भी हर दिन बड़े चाव से ये गीत सुनवाए जैसे कभी-कभी फ़िल्म का यह गाना -
कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है

इस गीत को सुनवाते समय शुरूवात का वो हिस्सा भी शामिल किया जहाँ इसे नज्म की तरह पढा गया।

नई फिल्म बाग़बान का अलका याज्ञिक और अमिताभ बच्चन का गाया यह गीत -

मैं यहाँ तू वहाँ ज़िन्दगी है कहाँ
तू ही तू है सनम देखता हूँ जहाँ

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। श्रीनगर की बातें तो सभी जानते है कि वहाँ सूखे मेवे बहुत होते है और शिकारे तथा डल झील के बारे में भी, अच्छा होता अगर उनसे वहाँ के कुछ लोक गीतों और पर्वों के बारे में पूछा जाता या वहाँ की खान-पान की संस्कृति के बारे में बात होती जैसे चाय की जगह कहवा पिया जाता है। सतारा, महाराष्ट्र से फोन आए और उत्तर प्रदेश से तो छोटी सी सखि ने बात की। कुछ छात्राओं ने भी बात की अपने करिअर की योजना बताई। एक सखि ने बीकानेर से बात की पर पूछने पर भी उसने स्पष्ट नहीं बताया कि बीकानेरी रसगुल्ले किस तरह से अलग होते है, पर भई, हमें तो याद आ गए छोटे-छोटे रंगबिरंगे, ठेठ राजस्थानी रंग - गहरे गुलाबी, चटक पीले, हरे, सफ़ेद रसगुल्ले, प्लेट में आकर्षक दिखने वाले जिसे चम्मच से पूरा एक रसगुल्ला मुँह में भरकर खाया जा सकता है, सामान्य रसगुल्ले की तरह नहीं कि एक पूरा रसगुल्ला मुँह में रखना ही मुश्किल हो जाता है। इस तरह विभिन्न क्षेत्रों की बात हुई। नए गाने भी पसन्द किए गए पर इज्ज़त फ़िल्म के इस यह गीत की बहुत दिन बाद फ़रमाइश आई जिसे जयललिता पर फ़िल्माया गया है -

रूक जा ज़रा किधर को चला मैं सदके तेरे रे
बाबू रे बाबू रे बाबू रे

सोमवार को ख़जूर की खीर बनाना बताया गया। मंगलवार को करिअर संबंधी बातें बताई जाती है। इस बार इंटरव्यू में कैसे जाए, व्यवहार कैसे हो, तैयारी कैसे करें आदि बातें बताई गई। यह सब पहले भी बताया गया था, ख़ैर… इस तरह की बातें कई बार बताई जा सकती है। बुधवार को सौन्दर्य और स्वास्थ्य पर चर्चा में कुछ नई बातें बताई गई जैसे आम का फेस पैक, इसके अलावा यह भी बताया गया कि गर्मी में तैराकी तो अच्छी लगती है पर तैरना और उसके बाद गर्मी, ऐसे में त्वचा की सुरक्षा के लिए सन स्क्रीन का प्रयोग किया जाना चाहिए।

सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने और बीच के समय के अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे कलाकार फ़िल्म का यह गीत - नीले नीले अम्बर पर चाँद जब आए, नई फ़िल्म जब वी मेट का यह गीत - ये इश्क हाय बैठे बिठाए जन्नत दिखाए, पुरानी फ़िल्म शगुन का यह गीत - तुम अपना रंजोग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए जैसे सगाई फ़िल्म का रफ़ी साहब और आशा जी का गाया यह गीत -

न ये ज़मीन थी न आसमाँ था
न चाँद तारों का ही निशाँ था
मगर ये सच है के उन दिनों भी
तेरा मेरा प्यार यूँ ही जवाँ था

3:30 बजे शनिवार को नाट्य तरंग में सुनवाया गया नाटक - लेकिन अब वो नहीं रहा। गोकुलानन्द महापात्र के उड़िया नाटक का हिन्दी रेडियो नाट्य रूपान्तर किया राधाकान्त मिश्रा ने जिसके निर्देशक है मुख़्तार अहमद। दुर्घटना में याददास्त चली जाती है। एक दंपती उसे बेटा कहते है, पर वो कहता है उसका परिवार है, जहाँ जाने पर उसे कोई नहीं पहचानता, उसका चेहरा बदल गया है। वह अपनी बातों से याद दिलाने की कोशिश करता है। बहुत ही भावुक था नाटक।

शाम 4 बजे रविवार को यूथ एक्सप्रेस में गरमी की छुट्टियों का पूरा ख़्याल रखा गया। कुछ अलग दिशा में ध्यान लगाकर समय के सदुपयोग की बात कही गई जिसके लिए इंटरनेट पर उपलब्ध हिन्दी अंग्रेज़ी द्विभाषी और तेलुगु सहित त्रिभाषी शब्दकोशो की जानकारी दी गई, हिन्दी सीखने के लिए उपलब्ध सरकारी साफ्टवेयरों की भी जानकारी दी गई, कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण नृत्यकला मोहिनीअट्टनम की और अभिनय कला की जानकारी दी गई।

पिटारा में शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम चूल्हा-चौका जिसमें महाराष्ट्र के व्यंजन बताएँ अपर्णा जी ने, आपसे बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। व्यंजन बनाने में आसान है जिसका आनन्द घर-घर के चूल्हे-चौके में लिया जा सकता है। अरवी के पत्तों की बेसन की वड़ी अच्छी लगी। झुनका व्यंजन हरे प्याज़ का बताया गया और कहा गया कि इसके बजाय शिमला मिर्च भी ले सकते है जबकि हम शिमला मिर्च का ही बनाते और इसे बेसन की शिमला मिर्च कहते है, यही तो है हमारे देश की ख़ासियत, पकवान वही पर नाम और रंग-रूप थोड़े से बदले-बदले।

पिटारा में सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में डा हेच आर झुनझुनवाला से निम्मी (मिश्रा) जी ने अस्थि रोग पर बातचीत की। घुटने के रोग, नी रिप्लेसमेन्ट पर विस्तृत जानकारी मिली कि इसमें उमर और मोटापा ख़ासकर माँसपेशियो की गति से बहुत असर होता है। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में निर्माता निर्देशक हैरी बवेजा से यूनूस जी की बातचीत की अगली कड़ी सुनवाई गई। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई और उनकी पसन्द के गीत सुनवाए गए। कुछ ख़ास बात नहीं हुई श्रोताओं से।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद फ़िल्मी हंगामा में एक दो तीन जैसी नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में हर दिन नए पुराने गीत सुनवाए गए जैसे नई फ़िल्म ढोल का गीत और पुरानी फ़िल्म समाधि का लोकप्रिय गीत - काँटा लगा

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत हुआ विविध भारती के संग्रहालय से जिसका संयोजन किया कल्पना (शेट्टी) जी ने, यह कार्यक्रम है निर्माता निर्देशक चेतन आनन्द द्वारा प्रस्तुत विशेष जयमाला। सुनकर लगा वाकई हकीकत का फ़िल्मकार बोल रहा है। सारी प्रस्तुति, एक एक शब्द फ़ौजी भाइयों के लिए था। कुछ अपने शूटिंग के अनुभव बताए और बढिया गीत सुनवाए।

7:45 पर शुक्रवार को लोकगीतों का आनन्द लिया। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। इस बार भी कुछ कार्यक्रमों की तारीफ़ तो कुछ पुराने कार्यक्रमों को फिर से शुरू करने का अनुरोध था। मंगलवार को सुनवाई गई फ़िल्मी क़व्वालियाँ जैसे मुग़ले आज़म की। बुधवार को राजस्थान के लोकवाद्य के बारे में वादक कलाकार किशोर सिंह जी से बातचीत की गई। लोक संगीत में तो यह वाद्य एक तार का होता है पर फ़िल्मी गीतों में प्रयोग के लिए दो और तीन तार का भी होता है। वैसे भी नई फ़िल्मों में राजस्थानी लोकगीत कुछ ज्यादा ही आ गए है। इस वाद्य का चलन भी नई फ़िल्मों में ही है। बातचीत अच्छी लगी। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग मिश्र शिवरंजनी पर आधारित ज़िद्दी फ़िल्म का आशा भोंसले का गाया गीत।

8 बजे हवामहल में सुना नाटक - वो कचरा कर दिया (रचना सीमा मिश्रा निर्देशक विजय दीपक छिब्बर), शादियाँ (निर्देशक अनूप सेठी), कदरदान ( रचना महेश्वर दयाल निर्देशक सुशील बैनर्जी), हाय हाय (निर्देशिका चन्द्रप्रभा भटनागर), अशर्फ़ीलाल बी काम (रचना पी डी मिश्रा निर्देशक मुख़्तार अहमद)

9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में बनारसी बाबू, आहिस्ता आहिस्ता, अधिकार, अराउंड द वर्ल्ड, पवित्र पापी जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में गीतकार नक्शलायल पुरी से कमल (शर्मा) जी की बातचीत प्रसारित हो रही है। इस कड़ी में सपन जगमोहन के साथ काम करने और उनके साथ नाराज़गी की बातें बताई, इन्दीवर के साथ अनुभव बताए गए।

10 बजे छाया गीत में सोमवार को अमरकान्त जी ने बहुत अच्छे गीत सुनवाए। बुधवार को भी अच्छे रोमांटिक गीत सुनवाए गए।

Tuesday, May 5, 2009

रेखा ओ रेखा जब से तुम्हें देखा

आज हम याद कर रहे है रफ़ी साहब के एक गीत को जिसे बहुत ही चुलबुले अंदाज़ में गाया है रफ़ी साहब ने।

इस गीत के फ़िल्म का नाम मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा, शायद अधिकार फ़िल्म का गीत है यह पर यह जानकारी पक्की है कि यह गीत वर्ष 1972 के आस-पास का है। विविध भारती सहित सभी स्टेशनों से इसे बहुत सुना है। बाद में धीरे-धीरे कम होकर बजना बन्द हो गया।

इस गीत के बोल मुझे कुछ-कुछ याद है -

रेखा ओ रेखा जब से तुम्हें देखा
खाना पीना सोना दुश्वार हो गया
मैं आदमी के काम का बेकार हो गया
होए रेखा ओ रेखा जब से तुम्हें देखा

तुमसे दिल का लगाया है तुमको साथी बनाया है
दिन रात सताती हो दीवाना बनाती हो
मेरा भी एक दिन ज़रूर आएगा
ओए ओए ओए रेखा ओ रेखा जब से तुम्हें देखा
खाना पीना सोना दुश्वार हो गया
मैं आदमी के काम का बेकार हो गया

काफी महँगा ये प्यार है शादी का इंतेज़ार है
----------------
ओए ओए ओए रेखा ओ रेखा जब से तुम्हें देखा
खाना पीना सोना दुश्वार हो गया
मैं आदमी के काम का बेकार हो गया

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Saturday, May 2, 2009

नाच रे मयूरा---विविध भारती पर गूंजा पहला गीत । पंडित नरेंद्र शर्मा, अनिल विश्‍वास और मन्‍ना डे का संगम

मन्‍ना डे एक मई यानी मज़दूर दिवस को अपना जन्‍मदिन मनाते हैं । और विविध-भारती अपना जन्‍मदिन मनाती है तीन अक्‍तूबर को । एक ऐसी घटना का जिक्र आज रेडियोनामा पर किया जा रहा है जिसका ताल्‍लुक मन्‍ना डे से है और है विविध भारती से ।

विविध-भारती की स्‍थापना दरअसल रेडियो सीलोन के बढ़ते प्रभुत्‍व का मुक़ाबला करने के लिए की गई थी । जिन दिनों विविध भारती को शुरू करने की तैयारियां चल रही थीं, पंडित नरेंद्र शर्मा इस नए और ऐतिहासिक रेडियो-चैनल की डिज़ायनिंग के काम में अपनी टोली के साथ जुटे हुए थे  । ये तय पाया गया था कि विविध भारती की शुरूआत एक गीत से की जायेगी । पंडित जी ने ये गीत लिखा । इसके संगीत संयोजन की जिम्‍मेदारी सौंपी गयी अनिल बिस्‍वास को और गायक के रूप में मन्‍ना दा का चुनाव किया गया ।

तीन अक्‍तूबर 1957 को जब उदघोषक शील कुमार ने विविध भारती के आग़ाज का ऐलान किया तो यही गीत बजाया गया था । विविध भारती का आरंभ इसी गीत से हुआ । इस मायने में ये बेहद खास है । सागर नाहर  ने इस गाने को यूट्यूब पर खोज निकाला और हमने वहां से इसका ऑडियो निकाल लिया । ताकि मन्‍ना डे को जन्‍मदिन की बधाईयां भी दे सकें और विविध भारती के शुभारंभ से जुड़े इस ऐतिहासिक कालजयी अद्वितीय अदभुत गीत को रेडियोनामा पर आपके लिए संजो सकें ।

मुझे पता है कि आपकी इच्‍छा इसे अपने मोबाइल, आइ-पॉड, सी.डी.प्‍लेयर वग़ैरह पर संजोने की भी होगी । इससे पहले कि आप इसे चुराने का कोई और तरीक़ा खोजें ये रहा डाउनलोड लिंक ।

इस गाने के बारे में पंडित जी की सुपुत्री लावण्‍या जी ने जो लिखा है उसे यहां
पढिये ।


ये रहे इस गीत के बोल--


नाच रे मयूरा!
खोल कर सहस्त्र नयन,
देख सघन गगन मगन
देख सरस स्वप्न, जो कि
आज हुआ पूरा !
नाच रे मयूरा !

गूँजे दिशि-दिशि मृदंग,
प्रतिपल नव राग-रंग,
रिमझिम के सरगम पर
छिड़े तानपूरा !
नाच रे मयूरा !

सम पर सम, सा पर सा,
उमड़-घुमड़ घन बरसा,
सागर का सजल गान
क्यों रहे अधूरा ?
नाच रे मयूरा !



मन्‍ना डे को रेडियोनामा परिवार की ओर से जन्‍मदिन की बधाईयां ।।

Friday, May 1, 2009

साप्ताहिकी 30-4-09

सप्ताह भर सुबह 6 बजे समाचार के बाद चितन में पुराणों के कथन और अम्बेडकर, गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी के विचार बताए गए। सप्ताह भर भजन भी अच्छे सुनवाए गए जैसे सूरदास की भक्ति रचना -

अँखियाँ हरिदर्शन की प्यासी

इसके अलावा अनूप जलोटा, पिनाज़ मसाणी की गाई भक्ति रचनाएँ भी सुनवाई गई। कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा।

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम इस सप्ताह भी अच्छा रहा। एक दिन यह कार्यक्रम संगीतकार शंकर-जयकिशन के शंकर को समर्पित रहा। उनके कुछ लोकप्रिय तो कुछ भूले बिसरे गीत सुनवाए गए। इसके अलावा एक ही रास्ता फ़िल्म का - भैय्या लाए गोरी मेम जैसे बोलों का गीत अच्छा लगा, यह भूला बिसरा गीत मैनें पहली बार सुना। ऐसा ही मधुबाला झवेरी का गुड्डे-गुड्डी के ब्याह वाला गीत भी था। साथ ही कुछ लोकप्रिय गीत भी सुनवाए गए। कार्यक्रम का समापन के एल (कुन्दनलाल) सहगल के गाए गीतों से होता रहा।

7:30 बजे संगीत सरिता में नई श्रृंखला आरंभ हुई - एक राग दो मध्यम -इसमें ऐसे रागों की चर्चा की जा रही है जिसमें दो मध्यमों का प्रयोग होता है, इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं भारती वैशमपायन और आपसे बातचीत कर रहे है आशीष (दवे) जी। बताया गया कि संधिप्रकाश के समय गाए जाने वाले रागों में प्राःत कालीन राग में शुद्ध मध्यम और सांय कालीन रागों में तीव्र मध्यम लगता है। शुरूवात की गई राग ललित से। चर्चा में रहे राग भिलावल के लिए बताया गया कि इसमें फ़िल्मी गीत बहुत है। दो मध्यम के विभिन्न रागों के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है, राग के थाट के अलावा वादी संवादी भी बताए जा रहे है और आरोह अवरोह गाकर समझाया जा रहा है। आलाप और बंदिशें भी सुनवाई गई। वादन और फ़िल्मी गीत भी इन रागों पर आधारित सुनवाए जा रहे है जैसे राग नट पर आधारित मेरा साया फ़िल्म का गीत -

तू जहाँ-जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा

7:45 को त्रिवेणी में अच्छा लगा वह अंक जिसमें खुद भी ख़ुश रहने और दूसरों को भी ख़ुश रखने की बात कही गई। इसके अलावा मंज़िल पहचान कर रास्ता तय करने की बात कही गई। गाने भी अच्छे सुनवाए गए जैसे इम्तिहान फ़िल्म का गीत -

रूक जाना नहीं तू कहीं हार के

ज़िन्दगी की भी बातें हुई, कुछ नए अंदाज़ और गानों के साथ।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में शुक्रवार को रेणु (बंसल) जी नई फ़िल्मों के साथ एकाध पुरानी फ़िल्म भी ले आई जिसमें से श्रोताओं ने संदेश भेजें इन फ़िल्मों के लिए - मुझसे शादी करोगी, बीवी नं 1 जैसी नई और बहारों के सपने जैसी पुरानी फ़िल्म के लिए। शनिवार को भी रेणु जी ही पधारी फ़ना जैसी नई लोकप्रिय फ़िल्में लेकर। मंगलवार को नया दौर जैसी पुरानी सदाबहार फ़िल्में रही। बुधवार को रेणु (बंसल) जी ले आई प्रोफेसर, तेरे घर के सामने जैसी पुरानी लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को निम्मी (मिश्रा) जी लाई टशन, दोस्ताना, हलचल जैसी नई फ़िल्में लेकर। हर दिन श्रोताओं ने भी इन फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों के लिए संदेश भेजें।

1:00 बजे म्यूज़िक मसाला कार्यक्रम में सपना अवस्थी का गाया यह गीत सुनना अच्छा लगा जो लोकगीतों की याद दिलाता है -

मेरी छोटी सी उमर में सगाई कर दी
तुझे क्या दुःख देउँ मेरी प्यारी अम्मी
अपनी लाड़ली बेटी को पराई कर दी

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में कुछ पुरानी फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए जैसे धनवान फ़िल्म का यह गाना -

यह आँखे देख कर हम सारी दुनिया भूल जाते है
तुम्हें पाने की धुन में हर तमन्ना भूल जाते है
तुम अपनी महकी महकी ज़ुल्फ़ के पेंचों को कम कर दो
मुसाफ़िर इनमें घिर कर अपना रास्ता भूल जाते है

और नई फिल्मों के गीत भी सुनवाए गए जैसे सपने फ़िल्म का यह गीत -

चंदा रे चंदा रे कभी तो ज़मीं पर आ बैठेगें बातें करेंगें

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। शोलापुर के एक गाँव से, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे विभिन्न स्थानों से फोन आए। ऐसे स्थान से भी फोन आया जहाँ देखने लायक केवल एक पुराना मन्दिर ही है। अपने बारे में एक सखि ने बताया कि उसके घर में साड़ियों पर काम करने का व्यवसाय किया जाता है। कुछ छ्त्राओं ने बात की। इस तरह विभिन्न क्षेत्रों की सखियों से बात हुई। गाने नए ही पसन्द किए गए जैसे -

चूड़ी मज़ा न देगी कंगन मज़ा न देगा

मंगलवार को करिअर संबंधी विशेष जानकारी नहीं दी गई पर इस बात की ओर इशारा किया गया कि अपने शौक को चाहे तो करिअर बनाया जा सकता है। बुधवार को सौन्दर्य और स्वास्थ्य पर चर्चा पिछले सप्ताहों की तरह इस बार भी कुछ यूँ ही रही, वही नुस्क़े जैसे संतरे के छिलकों के पाउडर का लेप, कमलेश (पाठक) जी से अनुरोध है कि बुधवार के अंक को सुधारने की कृपया कोशिश कीजिए। गुरूवार को सफल महिलाओं के बारें में बताया जाता है, इस बार कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ भारत रत्न एम एस सुब्बालक्ष्मी के बारें में जानकारी दी गई। उनका बचपन, शिक्षा, संगीत के क्षेत्र में योगदान, जीवन शैली, विवाह आदि के संबंध में जानकारी दी गई। सामान्य जानकारी में इजिप्ट के रहस्यमयी पिरामिडों की जानकारी दी गई। सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने और बीच के समय के अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे दो रास्ते फ़िल्म का यह गीत -

छुप गए तारे नज़ारे होए क्या बात हो गई
तूने काजल लगाया दिन में रात हो गई

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए जैसे सरस्वती चन्द्र फ़िल्म का मुकेश का गाया यह गीत -

चन्दन सा बदन चंचल चितवन धीरे से तेरा ये मुस्काना

3:30 बजे शनिवार को नाट्य तरंग में सुनवाया गया हरिशंकर परसाई का लिखा नाटक एक लड़की पाँच दीवाने। मज़ेदार नाटक ! पचास साल का हलवाई भी लड़की का दीवाना है पर बाद में लड़की की शादी… और सब लड़की और उसकी माँ की बुराई करने लगते। चुटीला व्यंग्य जैसे कि लेखक की विशेषता है, समाज की सच्ची तस्वीर दिखाने की।

शाम 4 बजे रविवार को यूथ एक्सप्रेस में केरल की सैर करवाई गई, पृथ्वी दिवस पर चर्चा हुई, करिअर के लिए क्रिकेट के युवा अंपायर द्वारा इस क्षेत्र में विभिन्न दिशाओं में करिअर बनाने की जानकारी दी गई।

पिटारा में शुक्रवार को अच्छी शुरूवात हुई। गीतों भरी कहानी सुनवाने की शुरूवात की गई। आधे-आधे घण्टे की दो कहानियाँ सुनवाई गई - यादगार और आज मुझे कुछ कहना है। दोनों कहानियाँ रोचक शैली में पढी गई और आवश्यकता होने पर संवादों के साथ सीन भी रखे गए। पहली कहानी यादगार अच्छी लगी इसमें एक ही सीन था, बहुत भावुक कहानी थी पर दूसरी कहानी कुछ-कुछ फ़िल्मी लगी जिसकी शुरूवात ही सीन से हुई, कुछ अधिक ही संवाद थे। सामाजिक स्तर में अंतर को लेकर रची गई इस कहानी में ख़ासकर एक गीत और सीन लोकप्रिय फ़िल्म जब-जब फूल खिले से सीधे उड़ा लिया गया था, गीत है -

यहाँ मैं अजनबी हूँ

हम मानते है कि ऐसी स्थितियाँ समाज में होती ही है पर प्रस्तुति कुछ बदली जा सकती थी। वैसे गाने सभी पुराने ही चुने गए और सही स्थानों पर सुनवाए गए, जबरन ठूँसे नहीं गए थे। कुल मिलाकर कार्यक्रम अच्छा लगा। इस प्रस्तुति के लिए धन्यवाद सत्येन शरत जी। आशा है सिलसिला जारी रहेगा…

बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में निर्माता निर्देशक हैरी बवेजा से यूनूस जी की बातचीत सुनवाई गई। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई और उनकी पसन्द के गीत सुनवाए गए। कुछ श्रोताओं से तो बिल्कुल ही बातचीत न हो पाई, वे सिर्फ़ फ़िल्म का नाम और गाने के बोल ही बता पाए और कुछ अधिक बोल नहीं पाए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद फ़िल्मी हंगामा में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में नए पुराने गीत सुनवाए गए जिसमें आजकल के फ़िल्मी गीतों के साथ फ़ौजी भाइयों ने सूरज फ़िल्म के शारदा के गाए तितली उड़ी गाने की भी फ़रमाइश की।

शनिवार को विशेष जयमाला निर्माता निर्देशक बासु भट्टाचार्य ने प्रस्तुत किया जिसमें आरंभिक और अंतिम गीत फ़ौजी भाइयों के लिए था। कुछ अपनी बातें बताई कुछ कलाकारों को भी याद किया गया। गाने एक से बढ कर एक सुनवाए जैसे एस डी बर्मन का सुन मेरे बंधु रे। अच्छी प्रस्तुति रही।

7:45 पर शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। कोई विशेष पत्र नहीं था, कुछ कार्यक्रमों की तारीफ़ तो कुछ पुराने कार्यक्रमों को फिर से शुरू करने का अनुरोध था। मंगलवार को सुनवाई गई क़व्वालियाँ। बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में रंगमंच और फ़िल्मों के कलाकार संजय जी से रेणु (बंसल) की बातचीत अच्छी लगी। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग मिश्र काफी पर आधारित साहब बीबी और ग़ुलाम फ़िल्म का आशा भोंसले का गाया गीत -

भँवरा बड़ा नादान रे

8 बजे हवामहल में सुना हास्य नाटक - कहीं दाल न गल जाए, क्या मुसीबत है (निर्देशक गंगाप्रसाद माथुर)

9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में लैला मजनूँ जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।
रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में गीतकार नक्शलायल पुरी से कमल (शर्मा) जी की बातचीत प्रसारित हो रही है। इस कड़ी में साथी संगीतकार ख़य्याम के साथ काम करने के अनुभव बताए गए।

10 बजे छाया गीत में सोमवार को प्यार की नज़र को समर्पित छाया गीत अच्छा लगा।

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