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Tuesday, June 30, 2009

दिलीप कुमार की दास्तान और रफी साहब की आवाज

आज मैं जो गीत याद दिलाने जा रही हूँ वो एक ख़ास फ़िल्म का है। फ़िल्म का नाम है - दास्तान।

यह फ़िल्म दो बार बनी। अब आप सोच रहे होंगे की इसमे क्या ख़ास बात है, कई फिल्में दो बार बनती है। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह है कि दोनों बार फ़िल्म का नाम वही, कहानी वही कोई बदलाव नहीं और सबसे बड़ी बात नायक भी वही। जी हां दोनों बार फ़िल्म के नायक है दिलीप कुमार जिनका इसमें डबल रोल है। एक है रंगमंच के नायक और दूसरे वकील साहब।

पहली बार दास्तान फ़िल्म शायद पचास के दशक में बनी जिसमें नायिका है सुरैया और दूसरी भुमिका यानी वकील साहब की बेवफा पत्नी की भूमिका में शायद निगार सुल्ताना है जिनके प्रेमी बने है शायद याकूब। दूसरी बार यह फ़िल्म रिलीज हई 1972 में जिसमें नायिका है शर्मिला टैगोर और वकील साहब की बेवफा पत्नी है बिन्दु जिसके प्रेमी है प्रेमाचोपडा।

एक और ख़ास बात है कि पहली बार बनी फ़िल्म में संगीत पर नृत्य है और यह संगीत बहुत पसंद किया गया और शायद यही संगीत मशहूर कार्यक्रम बिनाका गीत माला में शायद सरताज गीत के लिए बजने लगा।

आज हम गीत याद कर रहे है दूसरी बार बनी फ़िल्म का। सिचुएशन कुछ शायद ऎसी है कि डबल रोल से होती है गलतफहमी और वकील साहब को म्रृत मान लिया जाता है तब वकील साहब अपने शहर में आते है ऐसे में ऊँचे सुर में रफी साहब का यह गीत गून्जता है -

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
तेरा वजूद है सिर्फ़ दास्ताँ के लिए
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

पलट के नूरे चमन देखने से क्या होगा
वो शाख ही न रही ------------
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

ग़रज़ परस्त जहां में वफ़ा तलाश न कर
ये शय बनी है किसी दूसरे जहां के लिए
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

किसी शायर के बोल लगते है। भाव भी ऊँचे स्तर के है। पहले विविध भारती, सीलोन और क्षेत्रीय केन्द्रों से बहुत सुनवाया जाता था यह गीत - फरमाइशी और गैर फरमाइशी दोनों ही कार्यक्रमों में पर अब तो लंबा समय हो गया यह गीत सुने।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, June 26, 2009

साप्ताहिकी 25-6-09

सुबह 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में चक्रवर्ती राजगोपाल चारी का त्याग की महत्ता बताता कथन, महात्मा गाँधी और अन्य महर्षियों के कथन, रामनरेश त्रिपाठी की प्रेम और घृणा संबंधी कविता की पंक्तियाँ, भगवदगीता से दान संबंधी कथन बताए गए। वन्दनवार में हर दिन अच्छे भजन सुनवाए गए। शास्त्रीय संगीत से सजा यह भजन सुनना बहुत अच्छा लगा - भवानी दयानी ! कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा, एकाध गीत लगा पहली बार सुना।

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में न भूलने वाले गीत भी शामिल रहे यानि ऐसे गीत भी सुनवाए गए जो बहुत ही कम सुनवाए जाते है जैसे कुछ ऐसे ही बोलों का गीत सुना -


मौसम है सलोना चलो कहीं घूमने चले न


बड़ा अच्छा लगा यह गीत जो शायद एकाध बार ही सुनवाया गया।


7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला शुरू हुई - पंचसुर के राग जिसे प्रस्तुत कर रहे है ख़्यात गायक पंडित राम देशपाण्डेय जिनसे बातचीत कर रही है निम्मी (मिश्रा) जी। इसमें औड़व जाति के पाँच सुर वाले रागों की चर्चा की गई जैसे राग वृन्दावनी सारंग, भोपाली, दुर्गा, मालकौंस और दक्षिण शैली में प्रचलित राग हंसध्वनि। विभिन्न रागों के पाँचों सुर बताए गए साथ में उनका चलन, आरोह-अवरोह बता कर सामान्य जानकारी दी गई जैसे राग हिंडोल में वीर रस की रचनाएँ होती है। इन रागों में बंदिशें भी सुनवाई गई जिसमें तबला संगत की सूर्याक्ष देशपाण्डेय और हारमोनियम पर श्रीनिवास आचार्य ने। इन रागों पर आधारित फ़िल्में गीत भी सुनवाए गए जैसे लव इन टोकियो फ़िल्म का गीत - सायोनारा

यह दिनेश तापोलकर जी के तकनीकी सहयोग और वीणा राय सिंघानी के सहयोग से तैयार काँचन (प्रकाश संगीत) जी की एक और बढिया प्रस्तुति है।


7:45 को त्रिवेणी में शुक्रवार की प्रस्तुति बहुत मार्मिक रही। माता-पिता द्वारा बच्चों का प्यार से पालन-पोषण और बाद में बच्चों द्वारा माता-पिता की अवहेलना। इसके अलावा बारिश और लहलहाते खेत, जल की समस्या की, यातायात, इन्सानियत जैसे मुद्दों पर बात होती रही और गाने भी नए पुराने उचित सुनवाए गए जैसे -

इन्सान बनो करलो भलाई का कोई काम

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में शुक्रवार को आखिर क्यों, ख़ूबसूरत जैसी कुछ पुरानी और नई फ़िल्में रही। सोमवार को तेरे बिना जैसी नई फ़िल्में रही। मंगलवार को रफ़ूचक्कर जैसी कुछ पुरानी फ़िल्मे रही। बुधवार को ली गई कारवाँ, मेरे सनम, पड़ोसन जैसी पुरानी लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को कुछ पुरानी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।


1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में शुक्रवार को बुद्धादित्य मुखर्जी का सितार वादन सुनवाया गया, राग रहे - मिश्र खमाज और भीमपलासी। शनिवार को उस्ताद अलि अकबर खाँ का सरोद वादन सुनवाया गया। सोमवार को वीणापाणि मिश्र का उपशास्त्रीय गायन सुनवाया गया। मंगलवार को पंडित रविशंकर का सितार वादन सुनवाया गया। गुरूवार को कृष्ण मोहन भट्ट और विष्णु मोहन भट्ट की गिटार और सितार पर जुगलबन्दी सुनवाई गई।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में श्रोताओं की फ़रमाइश पर मिले-जुले गीत सुनवाए गए जैसे सत्तर के दशक की फ़िल्म हाथ की सफ़ाई का यह गीत -

वादा कर ले साजना

नई फ़िल्म वीरज़ारा का यह गीत -


ये हम आ गए है कहाँ

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। विभिन्न स्थानों जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, लुधिआना, राजस्थान से स्कूल कालेज की कुछ छात्राओं ने बात की। अपनी पढाई के बारे में बताया। नए गीतों की फ़रमाइश की। कुछ घरेलु महिलाओं ने भी बात की और बीच के समय के गीतों की फ़रमाइश की जैसे यादगार फ़िल्म का गीत -

जिस पथ पे चला उस पथ पे मुझे
आँचल तो बिछाने दे

सखियों की बातचीत से पता चला कि कश्मीर में अभी सैलानी बहुत आए है और मौसम सर्द है, कहीं-कहीं बर्फ़बारी भी हो रही है तो राजस्थान में गर्मी है, शाम में अँधड़ का माहौल रहता है, धूल भरी आँधी चलती है।

सोमवार को कटहल का अचार बनाना बताया गया। मंगलवार को करिअर संबंधी बातें बताई जाती है। इस बार प्रभावशाली ढंग से बोलना सीखने-सिखाने के बारे में यानि स्पीच थैरोपी के बारे में बताया गया। बुधवार को स्वास्थ्य और सौन्दर्य के घरेलु उपाय बताए गए। गुरूवार को सफल महिलाओं की गाथा बताई जाती है। इस बार श्रोताओं ने कुछ सफल महिलाओं के बारे में पत्र लिखे जैसे माण्टेसरी शिक्षा की शुरूवात करने वाली महिला मण्टेसरी। सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने अच्छे गीत सुनवाए गए जिनमें से सत्तर के दशक की फ़िल्म सबक़ का मुकेश का गाया यह गीत बहुत दिन बाद सुनना अच्छा लगा -

बरखा रानी ज़रा जम के बरसो
मेरा दिलबर जा न पाए झूम कर बरसो

नई फ़िल्म अकेले हम अकेले तुम का उदित नारायण और आदित्य नारायण का गाया शीर्षक गीत जो फ़ादर्स डे के संदर्भ में सुनवाया गया।

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए जैसे गैम्बलर फ़िल्म का रफ़ी साहब का यह गीत -

मेरा मन तेरा प्यासा
पूरी कब होगी आशा

वैसे फ़िल्मी गीतों का यही कार्यक्रम ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि इसमें सदाबहार यानि लोकप्रिय गीत सुनवाए जाते है और गीतों के लिए छोटी-छोटी आवश्यक उदघोषणाएँ ही की जाती है जिससे अधिक गीत सुनने को मिलते है।

3:30 बजे शनिवार और रविवार को नाट्य तरंग में सुनवाया गया नाटक - माँ निशाथ जिसके लेखक है डा कुँअरचन्द्र प्रकाश शर्मा और निर्देशक है जय देव शर्मा कमल। यह लखनऊ केन्द्र की प्रस्तुति थी। अच्छी शास्त्रीय प्रस्तुति।

पिटारा में शाम 4 बजे रविवार को यूथ एक्सप्रेस में अच्छी शुरूवात की गई, ब्लागों से जानकारी लेकर दी जाने की जिसमें दो ब्लागों से जानकारी दी गई एक से भौतिक शास्त्र की और दूसरे से बारिश के पानी के संरक्षण की। युवाओं को यह सलाह भी दी गई कि एक ही करिअर के पीछे न पड़कर विकल्प भी तलाशें। किताबों की दुनिया स्तम्भ में इस बार आलोचना की बातें हुई, अँग्रेज़ी से। विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना भी दी गई।

शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम पिटारे में पिटारा जिसमें सुनो कहानी कार्यक्रम में सलाम बिन रज़ाक की लिखी कहानी विष्णु शर्मा ने पढकर सुनाई। बहुत अच्छी प्रस्तुति रही पर लगातार आधे घण्टे तक सुनना बोझिल लगा। इसके बात राग-अनुराग कार्यक्रम प्रस्तुत किया गुलज़ार ने। बढिया प्रस्तुति, लगा कवि लेखक बोल रहा है, अपने गीत सुनवाए - मेरे अपने, परिचय फ़िल्म से और बहुत कम सुने गए गीत भी सुनवाए और गीतों से संबंधित बातें बताई। सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में डा वीणा पंडित से रेणु (बंसल) जी की बातचीत हुई। विषय रहा अंगदान और रक्त दान। यह सही बताया गया कि कुछ कृत्रिम अंग तो बनाए जा रहे है पर रक्त नहीं बनाया जा सकता इसीलिए रक्तदान महत्वपूर्ण है। अच्छी जानकारी मिली। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में इन्सपेक्टर ईगल से मिलना अच्छा लगा यानि अभिनेता निर्माता निर्देशक सुधीर कुमार से बातचीत सुनवाई गई। रेडियो टेलीविजन और फ़िल्में - तीनों माध्यमों से जुड़े होने से बातचीत अधिक रोचक लगी। फ़िल्मों का संघर्ष, धारावाहिकों का निर्माण और व्यक्तिगत बातें सभी सुनकर लगा कि नए लोगों को एक मार्गदर्शन इस बातचीत से मिल सकेगा। उनकी पसन्द के सुनवाए गए सभी गाने अच्छे लगे ख़ासकर बहुत दिन बाद उनकी नायक के रूप में पहली फ़िल्म रातों का राजा का शीर्षक गीत सुनना अच्छा लगा -

मेरे लिए आती है शाम चन्दा भी है मेरा ग़ुलाम
धरती से सितारों तक है मेरा इन्तेज़ाम
रातों का राजा हूँ मैं

शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई। श्रोताओं की पसन्द के नए पुराने गीत सुनवाए गए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए जैसे आजकल गूँजने वाले हिमेश रेशमिया के गीत।

7 बजे जयमाला में शनिवार को गायक शैलेन्द्र सिंह ने प्रस्तुत किया विशेष जयमाला। खुद के बारे में बताया, खुद के गीत सुनवाए जो सभी लोकप्रिय गीत है। एक बात खटकी कि एक मज़ेदार फ़िल्म में उन्होनें अभिनय किया नायक के रूप में, नायिका है रेखा, फ़िल्म का नाम है एग्रीमेन्ट। यह फ़िल्म खूब चली थी पर इसकी कोई चर्चा उन्होनें नही की। सोमवार से एस एम एस द्वारा भेजी गई फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर गीत सुनवाए गए। गाने नए और पुराने दोनों ही सुनवाए जा रहे है। अक्सर एक ही संदेश पर भी गीत सुनवाए जा रहे है।

7:45 पर शुक्रवार को असमी लोकगीत सुना पर प्रकाश कौर और सुरिन्दर कौर का गाया पंजाबी लोकगीत अच्छा लगा, सुन कर लगा यह फ़िल्मी गीत इसी लोकगीत पर आधारित है -

रेशमी सलवार कुर्ता जाली का
रूप सहा नहीं जाए नख़रेवाली का

शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। श्रोताओं ने विभिन्न कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। एक पत्र से मैं भी सहमत हूँ कि एक कार्यक्रम चुटकुलों का होना चाहिए और मेरी समझ में साथ में हास्य, मज़ेदार गीत सुनवाए जाने चाहिए पर एक अनुरोध है कि कृपया ऐसे समय पर प्रसारित करें कि सभी सुन सकें सांध्य गीत की तरह नहीं कि हैदराबाद समेत कुछ शहरों में प्रसारित ही नहीं होता है। मंगलवार को सुनवाई गई ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ। बुधवार को गुजराती रंगमंच और धारावाहिक तथा हिन्दी धारावाहिकों के अभिनेता से बातचीत हुई। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग भोपाली पर आधारित ममता फ़िल्म का गीत -

इन बहारों में अकेले न फिरों राह में काली घटा रोक न ले
मुझको ये काली घटा रोके भी क्या ये तो खुद है मेरी ज़ुल्फ़ों के तले

8 बजे हवामहल में इस सप्ताह प्रहसन और हास्य नाटिकाएँ सुनवाई गई जैसे दुनिया रंग रंगीली, एक मर्ज़ लाइलाज

9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में ससुराल, चन्द्रकान्ता, दूर की आवाज़ जैसी पुरानी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

10 बजे छाया गीत में सभी का वही अन्दाज़ रहा। गीत भी कुछ-कुछ वही सुनवाए गए जो दोपहर में सुनवाए गए।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर गानों की संख्या कम ही हो गई है क्योंकि उदघोषक श्रोताओं से बातचीत भी कर रहे है। 11 बजे समाचार के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

Tuesday, June 23, 2009

रामू दादा फ़िल्म का नाज़ुक सा गीत

देश के कुछ भागों में गर्मी से राहत तो मिली है पर मानसून सिर्फ़ दस्तक ही दे गया। ऐसे में धूप की तेज़ी भी नहीं है और बारिश की झमाझम भी नही यानि मौसम सुहावना सा है। तो क्यों न आज ऐसे ही एक गीत की याद ताज़ा करें।

यह गीत भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में बहुत सुनवाया जाता था। कभी-कभार मन चाहे गीत में भी श्रोताओं की फ़रमाइश पर सुनवाया जाता और कभी त्रिवेणी में भी बज उठता।

सिलोन के पुराने फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम में अक्सर सुनवाया जाता। अंतिम बार मैनें यह गीत शायद छह-सात साल पहले मन चाहे गीत कार्यक्रम में सुना था और शायद उस कार्यक्रम को मोना (ठाकुर) जी प्रस्तुत कर रही थी।

रामू दादा फ़िल्म के इस गीत को अपनी बारीक सुरीली आवाज़ दी है कमल बारोट ने। गीत का मुखड़ा मुझे याद है वो भी कुछ-कुछ -

सुना है जब से मौसम है प्यार के क़ाबिल
लरज़ रहे है अरमां धड़क रहा है दिल
लगी न छूटे अब तो ये प्यार के है दिन
लरज़ रहे है अरमां धड़क रहा है दिल

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Tuesday, June 16, 2009

जँगल में मोर नाचा किसने देखा

साठ के दशक के अंत में एक फिल्म रिलीज हुई थी - शतरंज

इसके नायक नायिका है राजेन्द्र कुमार और वहीदा रहमान। यह फिल्म हमारे देश की किसी देश से बैर पर आधारित है जिसमे नायक सैनिक छावनी में है। फिल्म शायद उतनी लोकप्रिय नही हुई थी पर सभी गीत रेडियो पर बहुत सुनवाए जाते थे।

आज याद आ रहा है लता जी का गाया यह गीत जिस पर वहीदा जी का बहुत अच्छा नृत्य है -

जँगल में मोर नाचा किसने देखा
मैनें देखा मैनें देखा मैनें देखा

इ़स गीत का केवल मुखडा मुझे याद है। बहुत समय से यह गीत सुना नही

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Saturday, June 13, 2009

जब नायक नायिका ने रेडियो से गाना गाया ।

लावण्‍या जी का तकरीबन एक सप्‍ताह पहले एक संदेश आया था--


आज रेडियोनामा के लिये २ गीतों के लिन्क भेज रही हूँ । दोनों गीत ऐसे हैं जिनका संबंध रेडियो से है । नायक और नायिका अपने दिल के अहसास गीतों में पिरोकर रेडियो के द्वारा एक दूसरे के मन की बात सुन रहे हैं । और इस तरह रेडियो-मैसेन्जर क्यूपीड माने प्रेम देवता का रूप ले लेता दिखलाया गया है । 


आगे लावण्‍या जी लिखती हैं--'जी हाँ ! ऐसा अकसर होता भी है, कोई गीत रेडियो मेँ बज रहा होता है और उसी के साथ, किसी के दिल की धडकनोँ मेँ अपने बिछुडे सजन की याद भी गूँथ जाती है, कभी कोई प्रेमी अपनी निराशा का भाव रेडियो मेँ बजाये गीत के साथ हूबहू मिलता हुआ महसूस करता है - और रेडियो मशीन ना रहकर तनहाईयोँ का एक साथी - सा जान पडता है - ज्यादा लँबी बात क्या कहेँ ..अब ये गीत और दो प्रेमी मन से उठती टीस आप भी अनुभव कीजिये और रेडियोनामा के रेडियो को अपना साथी समझ लीजिए । हां आप याद करके जरुर ऐसे गीत बतायें  जिनमें "रेडियो" की खास भूमिका हो ?

Song : 1 " ज़िँदगी भर नहीँ भूलेगी वो बरसात की रात

फिल्‍म-बरसात की रात । संगीत रोशन

Song : 2 " ऐ अजनबी , तू भी कभी , आवाज़ दे कहीँ से ..." फिल्म : दिल से । सँगीत : ए. आर.रहमान

मैंने लावण्‍या जी की बात आप तक पहुंचा दी । कुछ ऐसे गीत याद आ रहे हैं जिनमें नायक या नायिका रेडियो स्‍टेशन से गा रहे हैं । पर ये जिम्‍मेदारी तो उन्‍होंने आपको दी है ।

बताएं आपको कौन-कौन से गाने याद आये ।

Tuesday, June 9, 2009

साथी फ़िल्म का प्यारा सा गीत

आज याद आ रहा है साथी फ़िल्म का लता जी का गाया एक गीत। यह फ़िल्म साठ के दशक के अंतिम वर्षों में रिलीज़ हुई थी। यह फ़िल्म और इसके गीत बहुत लोकप्रिय रहे और आज भी है।

इस फ़िल्म में नायक और नायिका की भूमिकाओं में है राजेन्द्र कुमार और वैजन्तीमाला और सहनायिका है सिम्मी ग्रेवाल। अक्सर नायक और नायिका के गीत ही लोकप्रिय होते है लेकिन आज मैं जिस गीत की चर्चा कर रही हूँ वह गीत सहनायिका सिम्मी ग्रेवाल और राजेन्द्र कुमार पर एक पार्टी में फ़िल्माया गया है जिसे पर्दे पर बहुत ही ख़ूबसूरती से गाया है सिम्मी ने।

मुझे तो इस फ़िल्म का यही गीत बहुत पसन्द है। यह गीत भी इस फ़िल्म के अन्य गीतों की तरह बहुत लोकप्रिय रहा और रेडियो के सभी केन्द्रों से बहुत सुनवाया जाता था फिर धीरे धीरे कम होता गया और अब तो बहुत समय से इसे नहीं सुना।

इस गीत के कुछ बोल मुझे याद नहीं आ रहे, जो याद है वो इस तरह है -

ये कौन आया रोशन हो गई महफ़िल जिसके नाम से
मेरे घर में जैसे सूरज निकला है शाम से
ये कौन आया

यादें है कुछ आई सी या किरणें लहराई सी
मन में सोए अरमानों ने ली है इक अँगड़ाई सी
अरमानों की मदिरा छलके अँखियों के जाम से
ये कौन आया

क्या कहिए इस आने को आया है तरसाने को
देखा उसने हँस हँस के हर अपने बेगाने को
लेकिन कितना बेपरवाह है मेरे ही सलाम से
ये कौन आया

… …
चुपके चुपके राधा कोई पूछे अपने श्याम से
ये कौन आया

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, June 5, 2009

साप्ताहिकी 4-6-09

सुबह 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में स्वामी रामातीर्थ, महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानन्द, विदेशी साहित्यकार शेक्सपीयर के विचार बताए गए। वन्दनवार में हर दिन अच्छे भजन सुनवाए गए। बहुत दिन बाद सुना पिनाज़ मसाणी की आवाज़ में कन्हैय्या का बालपन। बुधवार को पुराने भजन सुनवाए गए जैसे -

स्वीकारो मेरे परणाम

मैं तो प्रेम दीवानी

कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा, अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे -

मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में लोकप्रिय गीत भी शामिल रहे जैसे सीआईडी फ़िल्म का शमशाद बेगम का गाया गीत - कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना। ऐसे गीत भी सुनवाए गए जो बहुत ही कम सुनवाए जाते है जैसे फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब का शमशाद बेगम का गाया गीत।

7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला जारी रही - सरोद का सुर संसार जिसे प्रस्तुत कर रहे है ख़्यात सरोद वादक पंडित बृजनारायण। इस सप्ताह सरोद वाद्य पर और अधिक जानकारी दी गई। बताया गया कि यह बहुत भारी वाद्य है पर इसका अर्थ यह नहीं कि इस पर केवल गंभीर राग ही अच्छे लगते है। इसके बनारस घराने की दो विशेष शैलियों पर चर्चा की गई। हर कड़ी में सरोद पर विभिन्न राग सुनवाए गए। पंडित जी की शिक्षा के बारे में भी जानकारी दी गई कि घरेलु वातावरण संगीत का रहा इसीलिए आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई और पहले गुरू रहे पिताश्री पंडित रामनारायण जो सारंगी वादक है। इस तरह सारंगी वादक से शिक्षा लेकर सरोद वादक बनने के अनुभव बताए कि सारंगी ऐसा वाद्य है जिस पर सभी तरह का संगीत बजाया जा सकता है। शिक्षा में गुरू यानि पिता से सभी कलाकारों के बारे में जाना। पहला कार्यक्रम 12 साल की उमर में किया। इस श्रंख़ला में यह एक अच्छी बात रही कि फ़िल्मी गीत नहीं सुनवाए गए।

7:45 को त्रिवेणी में इज्ज़त फ़िल्म का यह गीत मैं सुनते-सुनते थक गई -

क्या मिलिए ऐसे लोगों से

किसी न किसी समस्या पर चर्चा में किसी न किसी संदर्भ में यह गीत बज ही उठता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गीत बहुत अच्छा है और विभिन्न संदर्भों में सुनना भी अच्छा लगता है पर किसी भी बात की अति अच्छी नहीं लगती।

सप्ताह भर जल की समस्या की, ज़िन्दगी की बातें हुई और गाने भी नए पुराने उचित सुनवाए गए। मंगलवार को विषय अच्छा लिया गया - अफ़वाह पर आलेख ठीक ही था लेकिन गीत जम नहीं रहे थे, शायद इस विषय पर उचित गीत ढूँढना कठिन हो, ऐसे में इस विषय को सीधा न लेकर परोक्ष रूप से लिया जा सकता था।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में शुक्रवार को चीनी कम, गुरू, युवा जैसी नई फ़िल्में लेकर आए अशोक जी। शनिवार को युवा, राज़, काँटे, सिंग इज़ किंग जैसी नई फ़िल्में लेकर आई निम्मी (मिश्रा) जी। सोमवार को बस यूँ ही, यहाँ, रोशनी जैसी नई फ़िल्में लेकर आईं शहनाज़ (अख़्तरी) जी। समझ में नहीं आया जिन फ़िल्मों के नाम भी बहुत नए और कम सुने गए है उसके लिए इतने संदेश आए, ख़ैर… मंगलवार को धूल का फूल, काश्मीर की कलि, आदमी जैसी पुरानी फ़िल्मे रही। बुधवार को मंजू (द्विवेदी) जी लाईं कन्यादान, बेटी-बेटे, साथी, कारवाँ जैसी पुरानी लोकप्रिय फ़िल्में। गुरूवार को कमल (शर्मा) जी लाए लोकप्रिय फ़िल्में - गुमराह, काली टोपी लाल रूमाल, दुल्हन एक रात की, झुमरू।

1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में शुक्रवार को आनन्दो चटर्जी का तबला वादन और विमल मुखर्जी का सितार वादन सुनवाया गया। शनिवार को उस्ताद अब्दुल करीम खाँ का गायन सुनवाया गया। सोमवार को उस्ताद बिस्मिला खाँ का शहनाई वादन सुनवाया गया। मंगलवार को बृजभूषण काबरा का गिटार वादन सुनवाया गया। बुधवार को शुभा मुदगल का गायन सुनवाया गया। गुरूवार को पंडित जसराज का गायन सुनवाया गया।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में श्रोताओं ने मिले-जुले गीतों के लिए फ़रमाइश की जैसे साठ के दशक की फ़िल्म अनुपमा का लताजी का गाया यह गीत जो मुझे भी बहुत है -

कुछ दिल ने कहा
कुछ भी नहीं
कुछ ऐसी भी बातें होती है

नई फ़िल्म अजनबी का यह गीत -

मेरी ज़िन्दगी में अजनबी का इंतेज़ार है
मैं क्या करूँ अजनबी से मुझे प्यार है

बीच के समय की फ़िल्म आक्रमण के किशोर कुमार और लताजी के गाए इस गीत की फ़रमाइश बहुत दिन बाद की श्रोताओं ने -

ये मौसम आया है कितने सालों में
आजा के खो जाए ख़्वाबों ख़्यालों में

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। कुछ छात्राओं ने बात की। अपनी पढाई के बारे में बताया। अपने सिलाई-कढाई के काम के बारे में बताया। एक सखि ने कश्मीर से फोन किया और वहाँ के दर्शनीय स्थलों के नाम बताए और जानकारी नहीं दी। भोजपुर में शीशम के वृक्ष बहुत है, यह जानकारी भी मिली। एक फोनकाल बहुत प्यारा लगा, एक छोटी सी सखि प्रीति ने मध्यप्रदेश से बात की जो नौवीं कक्षा में पढती है। हल्की-फुल्की बात की, घरवालों के नाम बताए और बताया कि खेती की जाती है, पूछने पर कि खेती में क्या हुआ कहने लगी - अजी कुछ भी नहीं हुआ जी ! गाना पसन्द किया अस्सी के दशक की लोकप्रिय फ़िल्म नदिया के पार का -

कौन दिशा मे लेके चला रे बटुरिया
अरे ठहर ठहर ये सुहानी सी डगर
ज़रा देखन दे

सोमवार को कच्चे आम का पना बनाना बताया गया। मंगलवार को करिअर संबंधी बातें बताई जाती है। इस बार बताया गया कि करिअर का चुनाव कैसे करें। बच्चों को किसी विशेष करिअर के लिए दबाव न डाले। सलाहकार से कौंसिलर से करिअर के लिए सलाह भी ली जा सकती है। बुधवार को त्वचा को मुलायम बनाने के घरेलु उपाय बताए गए। गुरूवार को सफल महिलाओं की गाथा बताई जाती है। इस बार चित्रकार अमृता शेरगिल के बारे में बताया गया। सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने और बीच के समय के अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे पुरानी फ़िल्म सट्टा बाज़ार का गीत -

तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे
मोहब्बत की राह में मिलके चले थे

नई फ़िल्म युवराज का यह गीत

तू मुस्कुरा जहाँ भी है तू मुस्कुरा
तू धूप की तरह बदन को छू ज़रा

बीच के समय की फ़िल्म जवानी दीवानी का किशोर-आशा का गाया यह लोकप्रिय रोमांटिक गीत -

जानेजाँ ढूँढता फिर रहा धूप में रात दिन मैं यहाँ से वहाँ
मुझको आवाज़ दो छुप गए हो सनम
तुम कहाँ मैं यहाँ

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए जैसे एक गाँव की कहानी फ़िल्म का तलत महमूद का यह गीत -

रात ने क्या क्या ख़्वाब दिखाए

3:30 बजे शनिवार को नाट्य तरंग में सुनवाया गया नाटक - महानगर जिसके मूल लेखक है नरेन्द्रनाथ मित्र, इस बंगला नाटक का अनुवाद और रेडियो रूपान्तर किया है राधाकृष्ण प्रसाद ने और निर्देशक है सत्येन्द्र शरत। महानगर में संघर्ष करते मध्यवर्गीय परिवार की कहानी जिसमें बहू को लगता है आर्थिक तंगी के लिए उसे काम करना ज़रूरी है पर परिवार को अपनी परम्पराओं के कारण यह नहीं भा रहा। हमें तो यह सुनते-सुनते राखी, परीक्षित साहनी और विश्वजीत की फ़िल्म हमक़दम याद आने लगी।

पिटारा में शाम 4 बजे रविवार को यूथ एक्सप्रेस की शुरूवात बहुत अच्छी रही, जो युवा परीक्षा में सफल नहीं हुए उन्हें कारणों को तलाशने की सलाह दी गई। किताबों की दुनिया स्तम्भ में इस बार कहानी सुनवाई गई। जवाहरलाल नेहरू की पुण्य तिथि और तम्बाकू निषेध दिवस पर जानकारी दी गई। कुतुबमीनार के बारे में बताया गया। विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना भी दी गई।

शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम बाईस्कोप की बातें जिसमें कारवाँ फ़िल्म की बातें हुई। इस बार भी लोकेन्द्र शर्मा ने निर्माता निर्देशक की पिछली फ़िल्मों की भी जानकारी दी और इस फ़िल्म के बारे में भी विस्तार से बताया।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में त्वचा के रोंगों पर डा कल्पना सारंगी से रेणु (बंसल) जी की बातचीत हुई। अच्छी जानकारी मिली। बताया गया कि किसी भी तरह से ख़राबी त्वचा पर दिखाई दे तो तुरन्त डाक्टर से संपर्क करें, यहाँ मैं एक बात बताना चाहूँगी कि अक्सर महिलाएँ ख़ासकर लड़कियाँ कहती है कि मस्से जैसे ही त्वचा पर दिखाई दे तो खींच कर निकाल सकते है, अच्छा किया कि डाक्टर ने स्पष्ट शब्दों में इसकी मनाही की। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में अभिनेत्री रवीना टंडन से बातचीत सुनवाई गई। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई। श्रोताओं की पसन्द के नए पुराने गीत सुनवाए गए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में शनिवार को युवा निर्माता निर्देशक हैरी बवेजा ने प्रस्तुत किया विशेष जयमाला। खुद की फ़िल्मों के बारे में भी बताया, गीत सुनवाए। अच्छा लगा कि वो हर गीत को कहीं न कहीं से फ़ौजी भाइयों के जीवन से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। सोमवार से पत्रों और एस एम एस द्वारा भेजी गई फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर गीत सुनवाए गए। गाने नए और पुराने दोनों ही सुनवाए जा रहे है।

7:45 पर शुक्रवार को कच्छी लोकगीत सुना, बुन्देलखण्डी लोकगीत अच्छा लगा -

जो मैं होती राजा बन की हिरणिया

शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। श्रोताओं ने सेहतनामा, इनसे मिलिए कार्यक्रम की तारीफ़ थी, कुछ कार्यक्रम सुनवाने का अनुरोध किया। एक पत्र आया कि भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में लता मंगेशकर के गीत अधिक बजते है और अन्य पुरानी गायिकाओं के कम सुनवाए जाते है जिसके जवाब में कहा गया कि दूसरी गायिकाओं के गीत कम है और लता जी के ज्यादा। इस जवाब से निम्मी जी तो सहमत हो गई पर मैं सहमत नहीं हूँ। अब भला किसी के गीत एक लाख है तो सुबह से शाम तक हर तरह के कार्यक्रम में उन्हीं के गीत सुनते रहेंगें ? सबसे बड़ी बात यह है कि इस कार्यक्रम में जिस दौर के गीत सुनवाए जाते है लताजी उस दौर की कम चर्चित, कम लोकप्रिय और वास्तव में नई गायिका है, दूसरी बात गायिकाओं के अलावा कई गायकों के भी गीत है जो लम्बे समय से नहीं सुनवाए गए जैसे सी एच आत्मा, पहाड़ी सान्याल, पंकज मलिक, सुरेन्द्र, श्याम, यहाँ तक कि तलत महमूद के गीत भी कम ही सुनवाए जाते है। अगर गीतों का चुनाव करते समय सिर्फ़ गायक कलाकारों पर ही ध्यान दिया जाए और भूली बिसरी आवाज़ों को सुनवाने का प्रयास किया जाए तो प्रस्तुति सही और सार्थक होगी।

मंगलवार को सुनवाई गई फ़िल्मी क़व्वालियाँ। रविवार और गुरूवार को राग-अनुराग में विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुने जैसे राग भीमपलासी पर आधारित कोहरा फ़िल्म का लताजी का गाया गीत।

8 बजे हवामहल में इस सप्ताह सुमन कुमार, एम एस बेग, विनोद रस्तोगी, कमल दत्त जैसे चर्चित और नए निर्देशकों की नाटिकाएँ सुनवाई गई।

9 बजे गुलदस्ता में गीत और ग़ज़लें सुनवाई गई।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में मुग़ले आज़म, अक्सर, तराना, ये वादा रहा, दुलारी जैसी नई पुरानी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में निर्माता निर्देशक शक्ति सामन्त से कमल (शर्मा) जी की बातचीत की अगली कड़ी प्रसारित हुई जिसमें फ़िल्म आराधना की बातें बताई गई। 10 बजे छाया गीत में शुक्रवार को कमल जी ने रात के अच्छे गीत सुनवाए जिसमें से यह गीत बहुत अच्छा लगा जो मुझे भी बहुत पसन्द है -

नैना बरसे रिमझिम रिमझिम

सभी गीत ऐसे थे जिन्हें रात में सुनना बहुत अच्छा लग रहा था।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर गाने सुनवाए गए जिनमें बीच के समय की फ़िल्मों के गीतों की अधिक फ़रमाइश थी। 11 बजे समाचार के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

Tuesday, June 2, 2009

मोनिका बनाम लवलीना

पिछले शुक्रवार को पिटारा के अंतर्गत बाइस्कोप की बातें कार्यक्रम में फ़िल्म कारवाँ की बातें हुई जो लोकप्रिय संगीतमय फ़िल्म है। इसके सभी गीत लोकप्रिय हुए जिनमें से एक गीत का अंदाज़ निराला है जिसे आशा भोंसलें और आर डी बर्मन ने गाया है -

पिया तू अब तू आजा
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मोनिका ओ माई डार्लिंग

इसके लगभग 3-4 साल बाद 1975 के आसपास रिलीज़ एक फ़िल्म में कुछ-कुछ ऐसा ही गीत रखा गया जिसे आशा भोंसले के साथ किशोर कुमार ने गाया।

फ़िल्म का नाम शायद बहुतों को पता भी नहीं होगा। इस फ़िल्म का नाम है - ऐजेन्ट विनोद

जैसा कि नाम से ही पता चलता है यह फ़िल्म अपराध की पृष्ठ भूमि पर बनी। बतौर नायक महेन्द्र सन्धु की यह पहली फ़िल्म है और शायद यह एक ही फ़िल्म है, क्योंकि इसके बाद वह कुछ फ़िल्मों में ही छोटी-छोटी भूमिकाओं में नज़र आए। पहचान के लिए मैं बता दूँ कि देवानन्द और हेमामालिनी अभिनीत जोशीला फ़िल्म में राखी के पति के रूप में महेन्द्र सन्धु ने छोटी सी भूमिका की थी।

यह गीत फ़रमाइशी और ग़ैर फ़रमाइशी कार्यक्रमों में बहुत सुनवाया जाता था। विविध भारती समेत सभी स्टेशनों से इसे सुना। बाद में बजना कम हो गया। अब तो एक अर्सा हो गया इस गीत को सुने। गीत के जो बोल याद आ रहे है वो इस तरह है -

लवलीना आ गया मैं (किशोर)

तू आ गया तो जाने जाँ बाहों में ले थाम ले
पास आ के मुस्कुरा के छलकता हुआ जाम ले
मेरे साथ झूम के तू दीवाने मेरा नाम ले

लवलीना आ गया मैं (किशोर)

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

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