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Thursday, August 27, 2009

स्व. हृषिकेश मुख़र्जी

आज भारतकी फिल्म शौख़ीन जनता की फ़िल्मो की पसंद में सकारात्मक परिवर्तन करने वाले यानी साफ़-सुथरी फ़िर भी सफ़ल फिल्मों के निर्माता-निर्देषक, सम्पादक और एक पाठशाला समान श्री हृषिकेश मुख़र्जी की भी स्व. मूकेशजी के अलावा पूण्यतिथी है । पर विविध भारती की केन्द्रीय सेवा के सदा-बहार गीत कार्यक्रम को छोड़ बहोत कम याद किया गया, जब की गायक को काम और नाम तभी नसीब होता है, जब कि हृषिदा जैसे लोग अच्छे विषय पर फिल्में बनानेका साहस करके गुणी संगीतकारों तथा साथ साथ गीतकारों के लिये काम खडा करते है ।
हृषिदाने संवेदनशील फिल्में तो बनाई ही है पर हास्यप्रधान फिल्मोंमें भी साफ-सुथरापन और स्थूल हास्य के स्थान पर परिस्थितीजन्य हास्य को अपनी फिल्मों में बखूबी इस्तेमाल किया । और यह भी हर बार एक नयी कहानी और नया विषय ले कर । पाश्चात्य संगीत के लिये जानेमाने श्री राहुल देव बर्मन साहब को कई बार अपनी फिल्मोंमें गुलझारजी के गानों के साथ उन्होंनें लिया और बड़े सुन्दर गाने हमें प्राप्त हुए । कई अभिनेताओं की स्थापित छबीयों को उन्होंने बखूबी बदा डाला । उदाहरणके तौर पर हीमेन के रूपमें जाने पहचाने श्री धर्मेन्द्र को मझली दीदी, सत्यकाम और अनूपमा जैसी संवेदन शील फिल्मोंमें चावीरूप भूमीकाएं दी तथा चूपके चूपकेमें बड़ी मझेदार हास्य कलाकार हीरो के रूपमें प्रस्तूत किया । बिन्दूजी और शशिकलाजी को वेम्प यानि ख़ल-नायिका के रूपमें से बाहर निकालके अनुपमा, अभिमान और अर्जून-पंडित (चरित्र अभिनेत्रीके रूपमें बिन्दूजी ) भी प्रस्तूत किया । ग्ल्रेमरस भूमिका के लिये जानिमानी शायरा बानूजी को चैतालीमें सादगी भरी भूमिकामें प्रस्तूत किया । और देवेन वर्माजी का सह अभिनेता या ख़ल नायक (देवर) के रूपमें से हास्य अभिनेता के रूपमें फिल्म बूढ्ढा मिल गया से परिवर्तन किया । श्री बासु चेटर्जीने हास्य-प्रधान फिल्में अपने तरीकेसे बनाई पर साफ-सुथरापन और परिस्थितीजन्य हास्य के हृषिदा के राह पर तो वे चले ही चले । यानि हृषिदाका प्रदान कई जगहो पर मील का पत्थर साबित हुआ । हास्य फिल्मों की कोई भी चर्चा उनके नामोल्लेख़ के बिना अधूरी ही है । श्री युनूसजी द्वारा सम्पादीत और प्रस्तूत हास्य-प्रधान फिल्मों के स्तर पर मंथन कार्यक्रममें एक कड़ीमें मूझे इस बारेमें बोलनेका मोका मिला था ।
इन दोनों व्यक्तिविषेषों को रेडियोनामाकी और से श्रद्धांजलि ।

पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Tuesday, August 25, 2009

हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का

आज याद आ रहा है बरसात फिल्म का निम्मी पर फ़िल्माया गया और लता जी का गाया एक गीत जो पहले रेडियो के सभी केन्द्रो से फरमाइशी और गैर फरमाइशी कार्यक्रमो में बहुत सुनवाया जाता था, विविध भारती के भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में तो बहुत सुनते थे पर अब लम्बे समय से सुना नही. इस गीत के जो बोल याद आ रहे है वो इस तरह है -

हवा में उड़ता जाए
मेरा लाल दुपट्टा मलमल का जी
मोरा लाल दुपट्टा मलमल का
हो जी हो जी

इधर-उधर लहराए
मेरा लाल दुपट्टा मलमल का जी
मोरा लाल दुपट्टा मलमल का
हो जी हो जी

सरसरसर हवा चले ओए जियरा जगमग डोले
जियरा जगमग डोले
फ़रफ़रफ़र उड़े चुनरिया
घूँघट मोरा खोले ओए घूँघट मोरा खोले
हवा में उड़ता जाए
मेरा लाल दुपट्टा मलमल का जी
मोरा लाल दुपट्टा मलमल का
हो जी हो जी

झरझरझर झरना बहता
ठंडा-ठंडा पानी ठंडा-ठंडा पानी
घुँघरू बाजे ठुमक-ठुमक
चाल हूई मस्तानी ओए चाल हूई मस्तानी
हवा में उड़ता जाए
मेरा लाल दुपट्टा मलमल का जी
मोरा लाल दुपट्टा मलमल का
हो जी हो जी

अंतिम पंक्तियों में संगीत बहुत अच्छा दिया गया है।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Tuesday, August 18, 2009

राधा रे ओ राधा रे कान्हा रे ओ कान्हा रे

अवसर जन्माष्टमी का हो और राधा की याद कृष्ण के साथ न आए ऐसा नही हो सकता.

आज याद करेंगे गोपाल कृष्णा फिल्म का यसुदास और हेमलता का गाया यह युगल गीत.

राजश्री प्रोडक्शन्स की 1981 के आसपास रिलीज इस फिल्म में यह गीत सचिन और जरीना वहाब पर फिल्माया गया था जिन्होंने राधा कृष्ण की भूमिकाए की थी. इन दोनों की भूमिकाए कम ही थी बालकृष्ण की ही भूमिका अधिक थी.

पहले रेडियो से यह गीत बहुत सुनते थे. अब लम्बे समय से नही सुना. गीत के बोल कुछ इस तरह है -

नीर भरन का करके बहाना (यसुदास)
मेरे लिए ज़रा बोझ उठाना
राधा रे राधा जमुना किनारे आना रे

न न न न (हेमलता)
भेद हमारा ओ कान्हा
भेद हमारा सबने है जाना
अब न चलेगा कोई बहाना
कान्हा रे कान्हा
बान्सुरी अब न बजाना रे

राधा रे राधा जमुना किनारे आना रे (यसुदास)
राधा रे ओ राधा रे

ओ ओ ओ ओ ओ ओ (हेमलता)
कान्हा रे ओ कान्हा रे

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बंसी की धुन सुन सुन राधा दौडी दौडी आई
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राधा मैं तो प्रेम दीवाना (यसुदास)
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जमुना से पूछा पनघट से पूछा कोई कुछ न बताए (हेमलता)
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मान गए तुम्हे नटखट कान्हा
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पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Sunday, August 16, 2009

उदयपुर की ट्रेन चली गई क्या?

सभी रेडियो प्रेमियों ने इस नाटक को कई बार सुना होगा, परन्तु मैं इस नाटक को सुन नहीं पाया क्यों कि मैं रेडियो पर सिर्फ सुबह भूले बिसरे गीत और संगीत सरिता ही सुन पाता हूँ। कल यूनुसजी ने मेल भेजी कि एक मजेदार चीज मिली है इंटरनेट पर, फटाफट सुनिये। अब बड़ी मजेदार बात हुई, लिंक खुलता ही नहीं ! दोनों ने आधे घंटे तक दिमाग खपाया तब कहीं जाकर ये नाटक सुना जा सका।

हमने भी इसे फटाफट रेडियोनामा के पाठकों के लिये लगाने का निश्चय किया ताकि जो श्रोता इसे आई इसे सुनकर आनन्द ले सकें।

तो प्रस्तुत है रेडियो नाटक "उदयपुर की ट्रेन"

skit-udaipur ki train
duration-20 mts aprx.
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Friday, August 14, 2009

साप्ताहिकी 14-8-09 और साप्ताहिकी का एक साल

आप सबको जन्माष्टमी और स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ !

साप्ताहिकी लिखते हुए मुझे एक साल हो गया है। बीच-बीच में कुछ सप्ताह मैं निजी कारणों से साप्ताहिकी नहीं लिख पाई। विविध भारती के उन्हीं कार्यक्रमों पर मैं लिखती हूँ जो एफ़एम पर हैदराबाद में सुनाई देते है, इसीसे कुछ कार्यक्रम साप्ताहिकी में शामिल नहीं हो पाते है। कुछ कार्यक्रम मैं पूरे नहीं सुन पाती हूँ, घर और आफिस की दौड़धूप में कोशिश करके भी कठिन हो जाता है ऐसे में कार्यक्रमों की सूचना अवश्य देने की कोशिश करती हूँ। कभी-कभार साप्ताहिकी लिखते समय कुछ कार्यक्रमों की कुछ बातें दिमाग़ से निकल गई और शामिल नहीं हो पाई जैसे परमाणु पनडुब्बी अरिहन्त की जानकारी दी थी युनूस जी ने यूथ एक्सप्रेम में जो साप्ताहिकी में शामिल नहीं हो पाई।

अब एक नज़र इस सप्ताह के कार्यक्रमों पर… इस सप्ताह ख़ास रहा सेहतनामा कार्यक्रम जिसमें स्वाइन फ़्लू पर चर्चा हुई।

सुबह 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में स्वामी रामतीर्थ, स्वरूपानन्द जैसे महर्षियों और महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसे मनीषियों के कथन बताए गए। वन्दनवार में नए पुराने अच्छे भक्ति गीत सुनवाए गए जैसे -

भजमन रामचरण सुखदाई

कृष्ण भक्ति गीत अधिक सुनने को नहीं मिले और विषेषकर आज तो बढिया कृष्ण भक्ति गीत सुनने की आशा थी जो पूरी नहीं हुई। कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा। अच्छे देशभक्ति गीत सुनवाए गए जैसे -

प्यारी जन्मभूमि मेरी प्यारी जन्मभूमि
नीलम का आसमान है सोने की धरा है
चाँदी की है नदिया पवन भी शीत भरा है

सप्ताह में एकाध बार ही गीतों का विवरण बताया गया। कम से कम अगस्त के इन दिनों में तो हर देशभक्ति गीत विवरण के साथ सुनवाया जाना चाहिए।

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में अधिकतर कम सुने जाने वाले गीत सुनवाए गए जैसे सुरेन्द्र का गाया अनमोल घड़ी का गीत, बहार फ़िल्म का किशोर कुमार का गाया गीत और कुछ अधिक सुने जाने वाले गीत सुनवाए गए जैसे अपने पराए फ़िल्म का शीर्षक गीत।

आज का कार्यक्रम पूरा कृष्ण भक्ति में रंगा रहा। बढिया प्रस्तुति, अच्छे गीतों का चुनाव जिसमें कान्हा के विभिन्न रूप समेटे गए जैसे मौसी फ़िल्म का गीत - मेरी गोदी में नन्दलाला

कृष्णराधा का मुग़ले आज़म का लोकप्रिय गीत - मोहे पनघट में नन्दलाल छेड़ गयो रे

और शास्त्रीय पद्धति में ढला कैसे कहूँ फ़िल्म का गीत - मनमोहन मन में हो तुम्हीं

7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला - मदनमोहन के संगीत में शास्त्रीय संगीत जारी रही। इसे प्रस्तुत कर रही है डा अलका देव मालवीकर। मदन मोहन जी के चुने हुए गीतों के साथ विभिन्न रागों जसे अहीर भैरव, पीलू, बागेश्री, रागेश्री पर चर्चा की गई। इन रागों पर आधारित गीत भी सुनवाए गए जैसे राग दरबारी कानड़ा पर आधारित गीत -

अगर मुझसे मोहब्बत है मुझे सब अपने ग़म दे दो

रागों के चलन के साथ सामान्य जानकारी भी दी जा रही है जैसे राग बागेश्री और रागेश्री में बहुत समानता है। चर्चा में विभिन्न गीत रहे जैसे दस्तक के गीत -

माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की

बय्या न धरो ओ बलमा

ग़ज़ल फ़िल्म से - रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ

7:45 को त्रिवेणी में धन-दौलत-ऐश्वर्य पाने की होड़ की बातें अच्छी लगी। रविवार को 9 अगस्त होने से आज़ादी के नग़में गूँजे जिसमें पुरानी फ़िल्म किस्मत का अमीर बाई कर्नाटकी, अरूण कुमार और साथियों का गाया यह गीत भी शामिल रहा -

दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है

यही गीत भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में भी सुनवाया गया था। एक घण्टे के भीतर एक गीत को दो बार सुनना अच्छा नहीं लगा जबकि इस विषय पर अन्य गीत है। सोमवार की प्रस्तुति मज़ेदार रही। गंभीर विषय धन-दौलत के मद का रिश्ते-नातों पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा अच्छी रही।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में शुक्रवार को अमरकान्त जी लाए दिल ही है तो है, संबंध, लव इन टोकियो जैसी लोकप्रिय फ़िल्में। सोमवार को यूनूस (खान) जी आए सनम तेरी कसम, कसमें वादे, खेल खेल में और इस दिन आज़ादी का रंह भी रहा उपकार फ़िल्म के गीत से। मंगलवार की फ़िल्में रही आशा, आँखों आँखों में, आखिरी ख़त, हथकड़ी, दो आँखें बारह हाथ जैसी नई पुरानी लोकप्रिय फिल्मे। बुधवार को यादों की बारात, आँधी, मिली जैसी कुछ पुरानी फिल्मे रही। गुरूवार को गीत, मर्यादा, दिल दिया दर्द लिया जैसी सदाबहार फ़िल्में रही। सप्ताह भर इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने।

1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में शुक्रवार को तेजेन्द्र नारायण का सरोद वादन सुनवाया गया। शनिवार को बड़े ग़ुलाम अली खाँ का गायन सुनवाया गया। सोमवार को वी के दातार का वायलन वादन सुनवाया गया। मंगलवार को विदुषी ज़रीन दारूवाला का सरोद वादन सुनवाया गया। बुधवार को पंडित यशवन्त वी जोशी का गायन और सत्यदेव पवार का वायलन वादन सुनवाया गया। गुरूवार को सितार वादन और तबला वादन सुनवाया गया।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में सोमवार को आज़ादी का रंग नज़र आया जैसे फ़रमाइशी पत्र पर देशप्रेमी फ़िल्म का यह गीत सुनवाया गया -

मेरे देशप्रेमियों आपस में प्रेम करो

कुछ पुरानी फ़िल्म एक कली मुस्काई का रफ़ी साहब का गाया गीत सुनवाया गया -

ज़ुल्फ़ बिखराती चली आई हो
ऐ जी सोचो तो ज़रा बदली का क्या होगा

बुधवार और गुरूवार को श्रोताओं के ई-मेल से प्राप्त संदेशों पर फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए जिसमें पुरानी फ़िल्म वक़्त के इस गीत के लिए भी संदेश आए -

कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी
दिल के सोए हुए तारों में खनक जाग उठी
कौन आया

और नई फ़िल्म कभी अलविदा न कहना के शीर्षक गीत के लिए भी संदेश आए।

ई-मेल की संख्या कम ही रही। एकाध गीत तो एक ही ई-मेल पर सुनवाया गया। अभी तो शुरूवात है, आगे जैसे-जैसे पता चलता जाएगा लगता है संख्या बढती जाएगी। इस तरह पत्रों और ई-मेल संदेशों दोनों से ही प्राप्त नई पुरानी फ़िल्मों के गीतों के अनुरोध पर सप्ताह भर मिले-जुले गीत सुनवाए गए।

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। पटना, रायगढ - मध्य प्रदेश, बिजनौर - इन्दौर, बरलापुरा - सतारा और कुछ अन्य भागों से सखियों ने बात की। इस बार भी ज्यादातर कस्बों, ज़िलों, गाँव से फोन आए। इस बार भी कुछ छात्राओं ने बात की अपनी पढाई और नौकरी की योजना के बारे में बताया और कुछ कम शिक्षित घरेलु महिलाओं ने भी बात की। बातचीत से पता चला कि गोदिया हरी भरी जगह है पर यह नहीं पता चला कि यह किस राज्य में है। सावन का महीना बीत गया, वैसे भी यह त्यौहारों का मौसम है जिनका गाँवों कस्बों में अलग ही रंग होता है, अगर कुछ बातें इस बारे में भी होती तो अच्छा लगता, कुछ नयापन आता।

युवा सखियों ने नई फ़िल्मों के गीत पसन्द किए जैसे दिल का क्या कसूर फ़िल्म का गीत -

आशिकी में हर आशिक हो जाता है मजबूर
इसमें दिल का मेरे दिल का
इसमें दिल का क्या कसूर

कुछ सखियों के अनुरोध पर पुराने गीत सुनवाए गए जैसे मिस्टर एक्स इन बाम्बे का गीत -

मेरे महबूब कयामत होगी
आज रूसवा तेरी गलियों में मोहब्बत होगी

सोमवार को त्यौहारों को ध्यान में रखकर सखियों के पत्रों से मटर की खीर बनाना बताया गया। मंगलवार को डीटीपी (डेस्क टाप पब्लिशिंग) यानि कंप्यूटर साफ़्टवेयर पर काम करने के क्षेत्र में करिअर बनाने के लिए जानकारी दी गई। बुधवार को इस बार बारिश में बालों और त्वचा की देखभाल के बारे में बताया गया। बारिश में मेकअप न करने की या हल्का करने की और थोड़ा सा सिरका मिलाकर बाल धोने की सलाह दी गई। गुरूवार को सफल महिलाओं के बारे में बताया जाता है। इस बार दक्षिणी अमेरिका की पहली महिला साहित्यकार गैबरिला को उनकी काव्य कृति साँनेट आँफ़ डेथ पर मिले नोबुल पुरस्कार की जानकारी दी गई। उनके जीवन और साहित्य संसार पर विस्तार से बताया गया। इस दिन जन्माष्टमी की भी धूम रही। सामान्य बातों के साथ-साथ मथुरा नगरी के बारे में भी बताया गया। अमर प्रेम का गीत सुनवाया गया -

बड़ा नटखट है कृष्ण कन्हैया

और सखियों के अनुरोध पर शम्मी कपूर और रफ़ी साहब का वो गीत भी शामिल रहा जिसके बिना जन्माष्टमी की चर्चा फ़िल्मों गीतों के संदर्भ में अधूरी रहती है -

गोविन्दा आला रे आला
ज़रा मटकी सँभाल बृजबाला

सप्ताह भर सखियों के अनुरोध पर सुनवाए गए गीतों में नए पुराने गीत शामिल रहे जैसे बहुत पुरानी फ़िल्म दर्द का उमादेवी का गाया गीत -

अफ़साना लिख रही हूँ दिले बेकरार का
आँखों में रंग भरके तेरे इंतेज़ार का

नई फ़िल्म ओम शान्ति ओम का गीत सुनवाया गया

आँखों में तेरी अजब सी अजब सी अदाएँ है

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए।

पिटारा में शाम 4 बजे शुक्रवार को सुना कार्यक्रम पिटारे में पिटारा जिसमें आरंभ में वर्षा ॠतु के गीत सुनवाए गए जिसके बाद सुनवाई गीतों भरी कहानी - अबके सावन घर आजा जिसके रचयिता है गंगा प्रसाद माथुर और निर्देशक गौरीशंकर। बहुत अच्छी कहानी जिसमें मुख्य स्वर ओम शिवपुरी का है। कहानी लम्बी है पर सुहाने मौसम के लोकप्रिय गीतों से सजी होने से अच्छी लगी जैसे प्यार का मौसम फ़िल्म का शीर्षक गीत। बताया गया यह कार्यक्रम 1970 में पहली बार प्रसारित किया गया था।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में स्वाइन फ़्लू के संबंध में डा जयराज थाणेकर से रेणु (बंसल) जी की बातचीत सुनवाई गई। विस्तार से अच्छी जानकारी और सलाह दी गई। बताया कि कैसे यह रोग फैल रहा है। इसके लक्षण भी बताए जैसे सर्दी, खाँसी, ज़ुकाम और तेज़ बुखार। अगर बुखार कम नहीं हो रहा है तो सरकारी अस्पताल में जाँच करवाए। अगर कोई विदेश से आए तो दूर ही रहे क्योंकि संक्रमण होने का अवसर रहता है। यह वायरस दो-तीन दिन तक रहता है इस बीच दूसरों को संक्रमण हो सकता है। अगर वायरस का प्रभाव रोगी में समाप्त हो जाता है तो उस रोगी को ठीक मान कर अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है। यह भी बताया कि इस रोग को रोकने के लिए टीका विकसित करने पर तेज़ी से काम चल रहा है। यह भी नज़र रखी जा रही है कि दवा सभी राज्यों में उपल्ब्ध रहे।

बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में गायक अमित कुमार से युनूस (खान) जी की बातचीत की पहली कड़ी प्रसारित हुई। उसी दिन अमित कुमार जी का जन्मदिन भी था। हिन्दी सिनेमा के श्रोता शायद इसी भ्रम में है कि अमित कुमार का पहला गीत 1974 में रिलीज़ बालिका वधू फ़िल्म का है पर बातचीत से पता चला कि पहला गीत 1966 में गाया था और फ़िल्म रिलीज़ हुई थी 1969 में पर गीत फ़िल्म से निकाल दिया गया था। उसके बाद 1972 में दुर्गा पूजा के लिए गाए अमित जी के रिकार्ड किशोर कुमार और आशा जी जैसे गायको के होते एचएमवी से तीन में 6000 की संख्या में बिके। यह नई जानकारी अच्छी रही। पूरी बातचीत अच्छी रही जिसमें पिता किशोर कुमार को भी याद किया गया। इस रिकार्डिंग की तस्वीरें विविध भारती की वेबसाइट पर देखी जा सकती है। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई। श्रोताओं की पसन्द के नए पुराने गीत सुनवाए गए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में शनिवार को विशेष जयमाला कार्यक्रम में गीतकार गुलशन बावरा को याद करते हुए उनके द्वारा 1984 में प्रस्तुत किए गए कार्यक्रम की रिकार्डिंग सुनवाई। बढिया प्रस्तुति। पी एल संतोषी जैसे पुराने दिग्गजों से लेकर साहिर लुधियानवी तक सबको याद किया और याद भी कुछ अनोखे अंदाज़ में किया, उनके बारे में एक-एक पंक्ति में ख़ास बात बताते हुए उनके लोकप्रिय गीतों की झलक सुनवा दी। इस तरह इस अंक में बहुतों को नमन किया गया। सोमवार से पत्रों और एस एम एस द्वारा भेजी गई फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर गीत सुनवाए गए। पुरानी फ़िल्म मिलन का यह गीत भी शामिल रहा -

बोल गोरी बोल तेरा कौन पिया

और आजकल की फ़िल्मों के गीत भी फ़रमाइश पर सुनवाए गए।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत कार्यक्रम में इस बार नेपाली, बृज लोकगीत सुनवाए गए। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और कमल (शर्मा) जी आए। सेहतनामा और कुछ अन्य कार्यक्रमों की श्रोताओं ने तारीफ़ की। एक पत्र में शिकायत थी कि एसएमएस के बहाने वीबीएस के तराने कार्यक्रम के बारे में सुना पर ठीक से सुनाई नही देने के तकनीकी कारण से कार्यक्रम कभी भी नहीं सुन पाए जिसके जवाब में डीटीएच के अलावा अन्य समाधान देखने की बात कही गई। एक बड़ी उपयोगी जानकारी दी गई कि विविध भारती के पूर्व निदेशक राजेश रेड्डी जी ने बशीर बद्र साहब के एक शेर से लिया है कार्यक्रम का शीर्षक - उजाले उनकी यादों के। मंगलवार को सुनवाई गई ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ। राग-अनुराग कार्यक्रम में रविवार को एक ही राग चारूकेशी पर और गुरूवार को विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनवाए।

8 बजे हवामहल में इस बार सुनी झलकियों में कुछ ऐसे नाम भी शामिल रहे जो कम सुने जाते है। झलकियाँ रही - आँगन में स्वर्ग (निर्देशन दुर्गा मल्होत्रा), नौकर और दामाद (रचना बी एम आनन्द निर्देशक कमल दत्त), स्वर्ग का चक्कर (रचना कमलेश खरबन्दा निर्देशन विजय चौहान), अच्छी लगी नाटिका गरम मसाला

9 बजे गुलदस्ता में गजले और गीत सुनवाए गए। वेलवेट वायस एलबम से हरिहरन की आवाज़ में खुमार बाराबंकी की रचना ज्यादा अच्छी लगी। वैसे तो पूरा ही गुलदस्ता महक रहा था।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में मौसम, महल, बहारों के सपने, आप तो ऐसे न थे, संघर्ष जैसी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अभिनेता शम्मी कपूर से बातचीत की अगली कडी प्रसारित हुई। संगीतकार रवि को याद किया। वाकई कल्पना (शेट्टी) जी बधाई की पात्र है जिनके कारण हम एक कलाकार शम्मी कपूर जी की अभिनय यात्रा से अनेक सितारों के बारे में जान रहे है।

10 बजे छाया गीत में शुक्रवार को कमल (शर्मा) जी ने रात की तारों की बातें की। निम्मी (मिश्रा) जी ने भी रात की बात की और सुनवाया पाकिज़ा का गीत -

आज की रात बचेगें तो सेहर देखेंगे

राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने नए अच्छे चुने हुए प्यार भरे गीत सुनवाए। इसके अलावा इंतेज़ार पर प्रस्तुति और गीत भी अच्छे रहे।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर लोकप्रिय गीत सुनवाए गए। 11 बजे समाचार के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

Tuesday, August 11, 2009

श्याम रंग रंगा रे हर पल मेरा रे

जन्माष्टमी आ रही है और याद आ रहे है कृष्ण भक्ति के फ़िल्मी और ग़ैर फ़िल्मी गीत। आज याद आ रहा है सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों की एक फ़िल्म का गीत। फ़िल्म का नाम है - अपने पराए

यह फ़िल्म शरतचन्द्र के उपन्यास सविता पर आधारित है। नायक नायिका है शबाना आज़मी और अमोल पालेकर तथा अन्य मुख्य भूमिकाओं में है उत्पल दत्त और आशालता।

यह गीत पर्दे पर गाते है अमोल पालेकर और साथ में है बच्चों का समूह। इस गीत को गाया है यसुदास ने। यूँ तो यसुदास के सभी गीत अच्छे है पर यह गीत बहुत बढिया है। पहले रेडियो के विभिन्न केन्द्रों से बहुत सुनवाया जाता था ख़ासकर इन दिनों में, अब तो एक लम्बा समय बीत गया इस गीत को सुने हुए। गीत के जितने बोल मुझे याद आ रहे है वो इस तरह है -

श्याम रंग रंगा रे हर पल मेरा रे
मेरा मतवाला है मन मधुबन तेरा रे
श्याम रंग रंगा रे हर पल मेरा रे

जिसके रंग में रंगी ओ मीरा रंगी थी राधा रे
मैनें भी उस मनमोहन से बंधन बाँधा रे
श्याम रंग रंगा रे हर पल मेरा रे

मेरी साँसों के फूल खिले है तेरे ही लिए
जीवन है पूजा की थाली नैना ही दिए
श्याम रंग रंगा रे हर पल मेरा रे

नहीं चैन पड़े देखे बिना तुझको कान्हा
नहीं चैन पड़े
मोहे काहे छले
दिन भी तेरा रैन नहीं चैन पड़े

कान्हा रे ए ए ए ए ए ए ए
ओ कान्हा आ आ आ आ आ

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, August 7, 2009

साप्ताहिकी 6-8-09

इस सप्ताह चार ख़ास बातें रही - रक्षा बन्धन, रफ़ी साहब की पुण्य तिथि, किशोर कुमार का जन्मदिन और फ्रेण्डशिप डे। यह सभी दिन विविध कार्यक्रमों में झलक आए।

सुबह 6 बजे समाचार के बाद चिंतन में चाण्क्य, वेद व्यास, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानन्द जैसे मनीषियों, कीट्स जैसे साहित्यकारों के कथन बताए गए। वन्दनवार में नए पुराने अच्छे भक्ति गीत सुनवाए गए। शास्त्रीय पद्धति में ढले भक्ति गीत अच्छे लगे ख़ासकर कबीर को सुनना अच्छा लगा। कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा।

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम शुक्रवार को रफ़ीमय रहा। विभिन्न कलाकारों के साथ गाए दोगाने भी सुनवाए गए जैसे मुकेश के साथ, शमशाद बेगम के साथ सावन फ़िल्म का यह गीत -

भीगा भीगा प्यार का समाँ
बता दे तुझे जाना है कहाँ

राखी को जाने-पहचाने राखी के गीत सुनने को मिले। सप्ताह भर अधिकतर कम सुने जाने वाले और कुछ अधिक सुने जाने वाले गीत सुनवाए गए।

7:30 बजे संगीत सरिता में श्रृंखला - मदनमोहन के संगीत में शास्त्रीय संगीत जारी रही। इसे प्रस्तुत कर रही है डा अलका देव मालवीकर। मदन मोहन जी के चुने हुए गीतों को प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे -

रस्में उल्फ़त को निभाए तो निभाए कैसे (फ़िल्म दिल की राहे)
आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे (अनपढ)
तू जहाँ जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा (मेरा साया)
आज सोचा तो आँसू भर आए मुद्दते हो गई मुस्कुराए (हसते ज़ख़्म)

सभी गीतों को अलका जी ने गाकर सुनाया जिससे इन गीतों ग़ज़लों की शास्त्रीयता को समझना आसान हो गया।

7:45 को त्रिवेणी में शनिवार का अंक सावन की मस्ती में झूमा। बहुत दिन बाद सुना यह गीत -

आयो रे आयो रे आयो रे
ओ सावन आयो रे
ओ सावन आयो रे

गाना आए या न आए गाते है विषय पर प्रस्तुति मज़ेदार रही। गंभीर विषय - श्रम, भी अच्छा रहा।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम शुक्रवार को मोहम्मद रफ़ी को समर्पित रहा। अजय (जोशी) जी फ़िल्में लेकर आए प्यार का मौसम, लोफ़र, एन ईवनिंग इन पेरिस। शनिवार को निकाह, डर जैसी अस्सी नब्बे के दशक की फिल्मे रही। सोमवार को रेणु (बंसल) जी हरे काँच की चूड़ियाँ, तीन देवियाँ, अभिलाषा जैसी लोकप्रिय फ़िल्में लेकर आई और श्रोताओं ने भी बहुत लोकप्रिय गीतों (मेरे पसंदीदा गीतों की सूची में ऊपर) के लिए संदेश भेजे। मंगलवार को शहनाज़ (अख़्तरी) जी ले आईं अगर तुम न होते, लगान, स्लम्डाग मिलिएनर जैसी नई पुरानी लोकप्रिय फिल्मे। बुधवार को निम्मी (मिश्रा) जी जोश, बंटी और बबली, जाने तू या जाने न, ओम शान्ति ओम जैसी नई फिल्मे लेकर आई। गुरूवार को आया सावन झूम के, राम तेरी गंगा मैली, सौतन जैसी सदाबहार फ़िल्में लेकर आए अमरकान्त जी। सप्ताह भर इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने।

1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में शुक्रवार को अर्जुन शेचवाल का पखावज वादन और उल्लास बापट का संतूर वादन सुनवाया गया। शनिवार को सतीश व्यास का संतूर और आनन्दा चक्रवर्ती का तबला वादन सुनवाया गया। सोमवार को माधुरी देवकरे और हरिशचन्द्र भावसार का गायन सुनवाया गया। मंगलवार को बलराम पाठक का सितार वादन सुनवाया गया। बुधवार को भुवनेश्वर मिश्रा का वायलन वादन सुनवाया गया। गुरूवार को उस्ताद अमानत अली खाँ और उस्ताद फ़तेह अली खां का गायन सुनवाया गया।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम में शुक्रवार को श्रोताओं की फ़रमाइश पर शुरूवाती आधा कार्यक्रम रफ़ी साहब को समर्पित रहा। श्रोताओं ने बहुत अच्छे गीतों के लिए फ़रमाइश भेजी ख़ासकर लताजी के साथ गाए युगल गीत। तुमसे अच्छा कौन है, कारवाँ, मेरा गाँव मेरा देश और मन का मीत फ़िल्म का यह गीत शामिल था -

ओ जाने वाले आ जा तेरी याद सताए

मंगलवार को किशोर कुमार के जन्मदिन के अवसर पर श्रोताओं की फ़रमाइश में से किशोर कुमार के गीतों को चुन कर सुनवाया गया जैसे अनुरोध, जवानी दीवानी, कल आज और कल, प्रेमनगर, अजनबी और चलती का नाम गाड़ी फ़िल्म का यह मस्त-मस्त गीत -

हम थे वो थी और समाँ रंगीन समझ गए न
जाते थे जापान पहुँच गए चीन समझ गए न
अरे याने याने याने प्यार हो गया
ओ मन्नू तेरा हुआ अब मेरा क्या होगा

लेकिन आराधना और कटी पतंग के गाने में थोड़ी तकनीकी गड़बड़ हुई।

बुधवार और गुरूवार को श्रोताओं के एसएमएस और ई-मेल से प्राप्त संदेशों पर फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए। पुराने नए सभी तरह के गानों के लिए संदेश आए जैसे राखी के अवसर पर पुरानी फ़िल्म का गीत सुनवाया गया -

राखी धागों का त्यौहार

और नई फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी का गीत भी सुनवाया गया।

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने। देश के उत्तर, दक्षिण और मध्य भाग से ज्यादातर कस्बों, ज़िलों, गाँव से फोन आए। कुछ छात्राओं और कुछ घरेलु महिलाओं ने बात की। बातचीत से पता चला कि इलाहाबाद के कुछ स्थानों में सूखे की स्थिति है, बैंग्लौर में कुछ कम ही बारिश हुई है। मध्यप्रदेश में तहसील में अच्छी सुविधाएँ होने से आस-पास के गाँवों की लड़कियाँ वहाँ पढने आती है, वहाँ विकास कार्यक्रम भी अच्छे है जैसे आँगनवाड़ी से लड़कियों को पढने जाने के लिए साइकिलें दी जाती है। इस तरह अच्छी जानकारी मिली। नए पुराने गीतों की फ़रमाइश की गई। राखी पर्व पर भाई बहन का चंबल की कसम फ़िल्म का यह गीत सखियों की फ़रमाइश पर सुनवाया गया -

चंदा रे मेरे भैय्या से कहना बहना याद करे

सोमवार को फ्रेन्डशिप डे की शुभकामनाएँ दी गई, कार्यक्रम तो है ही सखियों-सहेलियों का। अगर ऐसा कोई गीत भी सुनवाया जाता तो मज़ा आ जाता… शायद ऐसा गीत बहुत ही कम या नहीं है… मुझे भी कुछ याद नहीं आ रहा जैसा कि पुरूषों के लिए शोले फ़िल्म का गीत है वैसा कोई गीत… इस दिन गोभी मन्चूरिया और अमरूद का मुरब्बा बनाना बताया गया। बुधवार को सखियों के भेजे गए सौन्दर्य संबंधी कुछ नुस्क़े बताए गए जिनमें से एकाध नुस्क़ा नया भी था। कुछ पुराने कुछ नए चुटकुले भी सुनवाए गए। ख़ास बात रही सखियों के अनुरोध पर राखी के भाई-बहन के रिश्ते के गीत सुनवाए गए। बहुत पुरानी फ़िल्म छोटी बहन का गीत शामिल रहा -

भय्या मेरे राखी के बंधन को निभाना
भय्या मेरे छोटी बहन को न भुलाना

सत्तर के दशक की फ़िल्म रेशम की डोरी का भी गीत शामिल रहा -

बहनों ने भाई की कलाई पे प्यार बाँधा है
प्यार के दो तार से संसार बाँधा है

पर ऐसे नए गीत सुनने को नहीं मिले, शायद नई फ़िल्मों में राखी के और भाई-बहन के रिश्ते के गीत नहीं है।

गुरूवार को सफल महिलाओं के बारे में बताया जाता है। इस बार अँग्रेज़ी लेखिका पर्ल बग के बारे में बताया गया। उनके प्रसिद्ध उपन्यास गुड अर्थ के बारे में भी बताया गया। मुझे याद आ गए वो दिन जब मैं एम ए कर रही थी तब गुडअर्थ की तुलना प्रेमचन्द के गोदान से की जाती थी और इस संबंध में बहुत बहसें हुआ करती थी। सखियों की पसन्द पर सप्ताह भर नए पुराने अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे संजोग फ़िल्म का गीत -

एक मंज़िल राही दो फिर प्यार न कैसे हो

शनिवार और रविवार को सदाबहार नग़में कार्यक्रम में सदाबहार गीत सुनवाए गए जैसे बीस साल बाद फ़िल्म का हेमन्त कुमार का स्वरबद्ध किया और गाया यह गीत -

ज़रा नज़रों से कह दो जी
निशाना चूक न जाए

3:30 बजे नाट्य तरंग में शनिवार को सुनावाया गया मूल मराठी नाटक - हम तुम्हें सच बोलते है जिसका हिन्दी रेडियो नाट्य रूपान्तर किया पुरूषोत्तम दारवेकर ने और निर्देशक है लोकेन्द्र शर्मा। रविवार को मौलियर की कहानी पर आधारित नाटक सुनवाया गया - पुराना मर्ज़ नया इलाज जिसका रेडियो रूपानतर और निर्देशन किया विनोद रस्तोगी ने।

पिटारा में शाम 4 बजे शुक्रवार को सुना कार्यक्रम पिटारे में पिटारा जिसमें रेणु (बंसल) जी द्वारा संयोजित किया गया कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया - चूल्हा चौका। इसमें सिन्धी व्यंजन बताए गए। भरवाँ भिंडी और आलू, कमल ककड़ी का व्यंजन, मैदे की पूरियाँ सभी नया सा लगा।

रविवार को यूथ एक्सप्रेस में किशोर कुमार को पूरे जोर-शोर से याद किया गया। उनके गाए गीतों के आ आ ऊऊ के विचित्र पर मज़ेदार सु्रों की लड़ी बना कर सुनवाई गई। आरंभ आराधना के गीत के सुर से हुआ। टुकड़ों को अच्छा जोड़ा गया, बधाई यूनूस जी ! किताबों की दुनिया में रविन्द्रनाथ टैगोर की चुनी हुई कहानियों की एक पुस्तक पर और हिन्दी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला पर वार्ता प्रसारित की गई। इसके अलावा हमेशा की तरह विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश की सूचना भी दी गई।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में अस्थमा बीमारी के संबंध में डा सौमिल पवार से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत सुनवाई गई। विस्तार से अच्छी जानकारी दी गई कि अस्थमा रोग इलाज से ठीक होता है। कुछ भ्रान्तियाँ भी दूर हुई इस जानकारी से कि अस्थमा के रोगी, खेल-कूद सकते है, परफ़्यूम की फूलों की सुगन्ध ले सकते है। इतना ही नही दवाई के साथ प्राणायाम भी कर सकते है। बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में अभिनेता प्रेम चोपड़ा से बातचीत की अगली कड़ी प्रसारित हुई जिसमें फ़िल्मी सफ़र की बातें हुई। शनिवार, मंगलवार और गुरूवार को हैलो फ़रमाइश में श्रोताओं से फोन पर बातचीत हुई। श्रोताओं की पसन्द के नए पुराने गीत सुनवाए गए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में फिर मिलेंगें जैसी नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

7 बजे जयमाला में शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया अभिनेता अनुपम खेर ने। खुद के बारे में भी बताया कि पहली फ़िल्म सारांश कैसे मिली। साथी कलाकारों के बारे में भी बताया और नए पुराने लोकप्रिय गीत सुनवाए। सोमवार से एस एम एस द्वारा भेजी गई फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर गीत सुनवाए गए। गाने नए और पुराने दोनों ही सुनवाए जा रहे है।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत कार्यक्रम में इस बार मराठी, कश्मीरी लोकगीत सुनवाए गए। शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और यूनूस (खान) जी आए। इस बार वन्दनवार की तारीफ़ में भी पत्र आए। ई-मेल की संख्या कुछ बढती नज़र आई जिनमें से एक मेल मेरा भी था जिसमें मैनें खेत-खलिहान के लोकगीत सुनवाने की फ़रमाइश की, जवाब में निम्मी जी ने कहा कि अभी तो ऐसे लोकगीत उपलब्ध नहीं है और नए रिकार्डस आने पर सुनवाए जाएगें। इस बार भी कुछ पत्र ठीक से सुनाई नही देने की तकनीकी शिकायत के थे। मंगलवार को सुनवाई गई ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ। राग-अनुराग में रविवार और गुरूवार को विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनवाए।

8 बजे हवामहल में सुनी झलकियाँ - परीक्षा की मुसीबत (लेखक उमाशंकर मालवीय निर्देशक विनोद रस्तोगी), अभिशाप (निर्देशक गंगाप्रसाद माथुर), हैदराबाद केन्द्र की प्रस्तुति - एक पार्टी में (रचना अज़हर अफ़सर निर्देशक ज़ाफ़र अली खाँ), चोर ऐसे आते है (निर्देशक आनन्द दयाल) डायरी (निर्देशक पुरूषोत्तम दारवेकर)

9 बजे गुलदस्ता में गजले और गीत सुनवाए गए। ग़ुलाम अली की लोकप्रिय ग़ज़लें भी शामिल रही।

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में प्रेमचन्द को उनकी जयन्ती पर याद करते हुए गोदान फ़िल्म के गाने सुनवाए गए। इसके अलावा सप्ताह में अलबेला, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएगें, चंबल की कसम जैसी नई पुरानी लोकप्रिय फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में अभिनेता शम्मी कपूर से बातचीत की अगली कडी प्रसारित हुई। संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को याद करते हुए अपनी फ़िल्म लैला मजनूँ को याद किया गया।

10 बजे छाया गीत में शुक्रवार को कमल (शर्मा) जी ने रफ़ी साहब को उन्हीं के गीतों से भावात्मक नमन किया। शुरूवात में सुनावाया गीत - मेरी आवाज़ सुनो, फिर तन्मय करने वाला भजन - मन तड़पत हरि दर्शन को आज। बढिया प्रस्तुति। अमरकान्त जी ने मोहब्बत के अच्छे नग़में सुनवाए। शहनाज़ (अख़्तरी) जी ने मौसम के गीत सुनवाए और राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने नए गीत सुनवाए। कुल मिलाकर सप्ताह भर अच्छा रहा पर खेद रहा कि मंगलवार को किशोर कुमार को याद नहीं किया गया।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर लोकप्रिय गीत सुनवाए गए। 11 बजे समाचार के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

Tuesday, August 4, 2009

किशोर कुमार का गाया फ़िल्म एक मुट्ठी आसमान का रोमांटिक गीत

आज किशोर कुमार के जन्मदिन के अवसर पर हम याद कर रहे है उनका शांत लहज़े में गाया एक रोमांटिक युगल गीत जिसमें उनके साथ आवाज़ मिलायी है शायद वाणी जयराम ने। फ़िल्म का नाम है - एक मुट्ठी आसमान

यह फ़िल्म सत्तर के दशक में शायद 1973 के आसपास रिलीज़ हुई थी। इसमें नायक है विजय अरोड़ा। सत्तर के दशक में विजय अरोड़ा और अनिल धवन दोनों नायक के रूप में लोकप्रिय हो रहे थे।

इस फ़िल्म में अचला सचदेव की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। बहुत अच्छी फ़िल्म है यह पर सफल नहीं हो पाई। इस फ़िल्म का यह युगल गीत विविध भारती के विभिन्न कार्यक्रमों में बहुत सुनवाया जाता था। अब बहुत समय से सुनवाया नहीं गया है। इस फ़िल्म के जो बोल मुझे याद आ रहे है वो इस तरह है -

तू लाली है सवेरे वाली गगन रंग दे तू मेरे मन का (किशोर कुमार)
जो सूरज तू मैं धरती तेरी तू साथी है मेरे जीवन का (वाणी जयराम)

तेरे मेरे बीच की मिटेगी कब दूरी (किशोर कुमार)
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओ (वाणी जयराम)
---------------------
तुम हो निगाहों में कब आओगी बाहों में (किशोर कुमार)
तुम में जो हिम्मत हो मुझसे मुहब्बत हो (वाणी जयराम)
जग से मुझे छीन लो
तू लाली है सवेरे वाली गगन रंग दे तू मेरे मन का (किशोर कुमार)
जो सूरज तू मैं धरती तेरी तू साथी है मेरे जीवन का (वाणी जयराम)

------------------
आँचल की मुझे छाँव दो (किशोर कुमार)
तू लाली है सवेरे वाली गगन रंग दे तू मेरे मन का (किशोर कुमार)
जो सूरज तू मैं धरती तेरी तू साथी है मेरे जीवन का (वाणी जयराम)

पहले बिना संगीत के दोनों मुखड़ा गाते है फिर धीरे-धीरे संगीत उभरता है। इस तरह सुनने में बहुत अच्छा, किशोर कुमार के गाए गंभीर शांत गीतों में से एक है।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Monday, August 3, 2009

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-8

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-8 - पंकज अवधिया

इस बार पता ही नही चला कि कब समय निकल गया और मेरे रेडियो का मसाला खत्म हो गया। इस बार न कोई पीछे पडा कि फलाँ-फलाँ आफर है न ही किसी तरह का फोन आया। बस एक दिन अचानक ही रेडियो ने मौन धारण कर लिया। तीन दिन बिन रेडियो कट गये। चौथे दिन मन नही माना और बंगलुरु फोन लगाया। पता लगा कि अभी उनके बात करने का समय नही हुआ है। शहर की उस दुकान का रुख किया जहाँ से इस रेडियो का पहले-पहल कनेक्शन लिया था। दुकान वाले ने कहा कि मन्दी का दौर है और रेडियो की दुकान बन्द पड रही है। शहर से बहुत कम लोगो ने रिचार्ज करवाया है। आप सोच लो, क्या रेडियो के लिये साल का 2000 खर्चना ठीक है? मै वापस आ गया।

दो दिन और कटे जैसे-तैसे। रेडियो का नशा तो नशा ही था। अगले ही दिन दुकान जाकर एक नही दो साल के पैसे दे दिये। कुछ कूट अंक प्राप्त किये और देखते ही देखते रेडियो फिर बोलने लगा। चारो ओर नाना प्रकार के रेडियो है। कोई अति सन्यमित भाषा मे बोल रहा है तो कोई सिरदर्द करने वाली रफ्तार मे। इस बीच मैने अपने पैसे वाले पुराने रेडियो को ही चुना। आज जब मै यह लेख लिख रहा हूँ तो इसका अप कंट्री चैनल अपने पूरे शबाब पर है।

इस बार इच्छा थी कि माता-पिता के कमरे मे भी यह रेडियो लगवा दूँ पर उन्होने साफ इंकार कर दिया। विविध भारती का उनका मोह छूटता नही दिखता। घर मे जब भी रसोई घर का रुख करो या पिताजी के अध्ययन कक्ष का, विविध भारती सुनने को मिल जाता है। मै भी मजाकिये लहजे मे माँ से पूछ लेता हूँ, सुबह आप इस मंजन से दाँत साफ करते है या नही?

मैने इस लेखमाला मे पहले लिखा है कि मेरे भोजन करने के समय रसोई मे सखी-सहेली कार्यक्रम आता रहता है। एक बार टमाटर से त्वचा की देखभाल के विषय मे कुछ बताया जा रहा था। यह उपाय मै सालो से सुन रहा था पर इस बार इसे सुनने पर मुझे अच्छा नही लगा। हाल ही मे टमाटर के खेतो से लौटा था। वहाँ कृषि रसायनो का इतना मनमाना प्रयोग हो रहा था कि दिल दहल गया। ये टमाटर जहर के पिटारे थे। इन्हे खाया ही नही जा सकता था पर कुछ ही देर बाद उन्हे बाजार पहुँचाया गया और फिर वहाँ वह हाथो-हाथ बिक गया। बेचारा खरीददार क्या जाने इन जहरीले पिटारो के बारे मे? मै सोच रहा था कि रेडियो कार्यक्रम सुनकर यदि कोई इसे त्वचा मे लगा ले तो पता नही उस पर क्या गुजरेगी? पर खरीददारो की तरह रेडियो वाले भी सच कहाँ जानते है? जानते होते तो ऐसा करने को नही कहते या बताते कि जैविक विधियो से तैयार टमाटर का प्रयोग ही बहने करे।

कल सुबह कुछ जल्दी ही उठ गया। विविध भारती चल रहा था। तभी किसी उद्घोषक ने कहा कि आप मनचाहे गीत की फरमाइश ई-मेल से भी भेज सकते है, पता है मनचाहे गीत एट जीमेल डाट काम। पिताजी अचानक ही पूछ पडे कि ये जीमेल क्या है? क्या यह सरकारी सेवा है? मैने कहा, नही, यह सरकारी सेवा नही है। पिताजी ने झट से पूछा कि फिर इन्होने विविध भारती वालो को पैसे दिये होंगे तभी तो उनका नाम लिया जा रहा है। मै शांत रहा। पिताजी का प्रश्न गलत नही था। मै भी उम्मीद कर रहा था कि विविध भारती की अपनी वेबसाइट तो होगी ही। कितना अच्छा होता कि ई-मेल मनचाहे गीत एट विविधभारती डाट काम या आर्ग होता। इसी बहाने लोग विविधभारती की साइट पर जाते और रेडियो जाकी के विषय मे जान पाते। बहुत से निजी रेडियो वालो के पास अपनी साइटे है जहाँ श्रोता मँडराते रहते है। मुझे विविध भारती की अपनी कोई अधिकारिक वेबसाइट नही मिली। हाँ, एक वेब पेज मिला पर पुराने ढंग का।

मै इस उधेडबुन मे लगा रहा कि इस बारे मे रेडियोनामा मे कुछ लिखूँ या नही। फिर सोचा अपने ही मन की बात साफ बता सकते है इसलिये प्रयास करने मे क्या हर्ज है?

उम्मीद है कि मै इस लेखमाला को जारी रख सकूँगा।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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