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Friday, October 30, 2009

श्री अमीन सायानी साहब रेडियो श्री लंका से बोले करीब 20 साल बाद !

आदरणिय पाठकगण,

अभी कुछ समय पहेले रेडियो श्रीलंका की वहाँ की ही रहेनेवाली वैसी निवृत पर केझ्यूल उद्दघोषिका श्रीमती पद्दमिनी परेरा एक लम्बे समय भारतमें घूम कर फ़िर सिलोन पहोँच कर रेडियो पर प्रवृत्त हुई । वे जब भारतमें थी, उस दौरान अपनी सुविधा अनुसार कई श्रोतालोगो से मिली (जिसमें मैं शामिल नहीं हूँ ।) और रेडियो श्रोता संधकी सभाओमें भी गयी और रेडियो श्रीलंका से जूडे कई पूराने लोगो से मिली । उनमें श्री गोपाल शर्माजी तो स्वाभावीक ही है पर श्री अमीन सायानी साहब से भी मिली और उनकी व्यस्तता होते हुए भी आगंतूक को उनकी और से प्राप्त होते हुए बहूमान के स्वानुभवसे बहोत ही प्रभावीत हुई और उनके साथ की गयी बातचीत की ध्वनि-मूद्री अपने साथ ले गयी जो दि. 21 अगस्त, 2009 की बात थी । और परसों यानि दि. 29 अक्तूबर, 2009 के दिन सुबह 8 बजे अपने नियमीत कार्यक्रम को स्थगीत करके उसके स्थान पर सुनवाई । हालाकी मैं रेकोर्ड तो नहीं कर सका । पर 1989 में सिलोन रेडियो से सिबाका गीतमाला के साप्ताहीक प्रसारण की समाप्ती के बाद कुछ समय श्री मनोहर महाजन द्वारा प्रस्तूत एक अगरबत्ती बनानेवालो द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमके दौरान उस उत्पादन के विज्ञापन तक करीब एक साल तक सीमीत रही थी । बादमें उनके जन्मदिन पर कुछ साल पहेले एक प्रायोजित कार्यक्रमकी पूरानी रेकोर्डिंग से सिर्फ शुरूके उद्दबोधन को ही प्रसारित किया गया था । तो यह तो एक चमत्कार जैसा ही लगा । रेडियो श्रीलंका से जूडे कई लोगोमें से सिर्फ़ कुछ ही लोगोने उस संस्था को प्यार और आदर से याद रख़ा है, उनमें श्री गोपाल शर्माजी, श्री अमीन सायानी सहब और उनके अलावा शी रिपूसूदन कूमार औलावादी और श्री मनोहर महाजन प्रमूख़ है ।
पद्द्मिनीजी और अमीन सायानी साहब को धन्यवाद और बधाई ।

पियुष महेता ।
नानपूरा, सुरत ।

प्यार-मोहब्बत के गानों की दुपहरियों की साप्ताहिकी 29-10-09

त्रिवेणी कार्यक्रम के बाद क्षेत्रीय प्रसारण तेलुगु भाषा में शुरू हो जाता है फिर हम दोपहर 12 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुडते है। रविवार को क्षेत्रीय प्रायोजित कार्यक्रम के कारण 12:30 बजे से जुड़ते है।

दोपहर 12 बजे एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने कार्यक्रम में हमेशा की तरह शुरूवात में 10-11 फ़िल्मों के नाम बता दिए गए फिर बताया गया एस एम एस करने का तरीका। पहला गीत उदघोषक की खुद की पसन्द का सुनवाया गया ताकि तब तक संदेश आ सके। फिर शुरू हुआ संदेशों का सिलसिला और इन संदेशों को 12:50 तक भेजने के लिए कहा गया ताकि शामिल किया जा सकें।

शुक्रवार को सत्तर अस्सी के दशक की यह फ़िल्में रही- बाबू, एक चादर मैली सी, आहिस्ता-आहिस्ता, मनचली, महबूबा, दुल्हन, गीत गाता चल, अपनापन, आपकी कसम, पलकों की छाँव में। इन फ़िल्मों के गीत सुनवाने आईं शहनाज़ (अख़्तरी) जी। शनिवार को नई फ़िल्में रही - चमेली, रेफ़्यूज़ी, अशोका, बेटा, परिणीता, चीनी कम, बीवी नं 1, विरासत, तेज़ाब, राम लखन, दिल तो पागल है, इन फ़िल्मों के गीत सुनवाने आईं रेणु (बंसल) जी। रविवार को नई फ़िल्में रही - ग़ुलाम, ओंकारा, हम, देवदास। सोमवार को कार्यक्रम विशेष रहा। इस दिन याद किया गया दो महान हस्तियों को शायर गीतकार - साहिर लुधियानवी और फ़िल्मकार व्ही शान्ताराम को साथ ही जन्मदिन पर याद किया अभिनेत्री रवीना टंडन और संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर को। इनकी फ़िल्में लेकर शहनाज़ (अख़्तरी) जी आई और श्रोताओं ने भी इनके लोकप्रिय गीतों के लिए संदेश भेजे -

साहिर लुधियानवी की नई पुरानी फ़िल्में लैला मजनूँ, काजल, कभी-कभी, गुमराह और हमराज़ का यह गीत -

न मुँह छुपा के जिओ और न सर झुका के जिओ

व्ही शान्ताराम की फ़िल्म नवरंग का यह गीत - आधा है चन्द्रमा रात आधी

अभिनेत्री रवीना टंडन की फ़िल्में - पत्थर के फूल, बड़े मियाँ छोटे मियाँ और उनका मोहरा फ़िल्म से यह लोकप्रिय गीत - तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त

संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर की फ़िल्म लेकिन का यह लोकप्रिय गीत - यारा सिलीसिली

सुनवाया गया। व्ही शान्ताराम की दो आँखें बारह हाथ फ़िल्म को शामिल नहीं किया तो अच्छा नहीं लगा। उनकी दो-तीन फ़िल्में शामिल होती तो अच्छा लगता क्योंकि न केवल वो वरिष्ठ फ़िल्मकार है बल्कि सिनेमा के विकास में भी उनका योगदान है।

मंगलवार को सत्तर अस्सी के दशक की लोकप्रिय फ़िल्में रही - कटी पतंग, निकाह, बाबी, दूसरा आदमी, दिल है कि मानता नहीं, साजन, अभिमान, कर्ज़। इनके सीडी लेकर आईं मंजू (द्विवेदी) जी।

बुधवार को मुझ से शादी करोगी, ओम शान्ति, रब ने बना दी जोड़ी, सिंह इज़ किंग, जैसी नई फ़िल्मों के साथ आईं मंजू (द्विवेदी) जी। इस दिन 12:15 से क्षेत्रीय प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित हुआ फिर 12:30 बजे से हम केन्द्रीय सेवा से जुड़े। गुरूवार को लाल पत्थर, महल, अलबेला, किनारा, अभिलाषा, भूत बंगला, ममता, कश्मीर की कलि, नमक हराम - इनके सीडी लेकर आईं शायद राजुल जी

आधा कार्यक्रम समाप्त होने के बाद फिर से बची हुई फ़िल्मों के नाम बताए गए और फिर से बताया गया एस एम एस करने का तरीका। एक घण्टे के इस कार्यक्रम के अंत में अगले दिन की 10-11 फ़िल्मों के नाम बताए गए। इस कार्यक्रम में यह सप्ताह महिला सप्ताह रहा, हर दिन उदघोषिका (महिला उदघोषक) पधारी। आवाज़ों में विविधता होती तो अच्छा लगता एकरसता अच्छी नहीं लगी।

इस सप्ताह भी पुराने पचास के दशक से लेकर आज के दौर की फ़िल्में शामिल रही, यानि हर उमर के श्रोता के लिए रहा यह कार्यक्रम। अलग-अलग उम्र के श्रोता के लिए अलग-अलग दिन जैसे शनिवार, रविवार और बुधवार सिर्फ नए गाने, इस तरह हर दिन एक दौर के गाने। हर दिन के लिए अच्छी फिल्में चुनी गई।

अधिकतर संदेश लोकप्रिय गीतों के लिए आए इसीसे इन फ़िल्मों के कम लोकप्रिय गीत सुनवाए नहीं जा सके। कभी कुछ गीत लम्बे होने से 10 से कम गीत बजे। अधिकतर रोमांटिक गीत सुनवाए गए पर कुछ अलग तरह के गीतों के लिए भी संदेश आए जैसे -

आदमी मुसाफ़िर है आता है जाता है (फ़िल्म अपनापन)

नाम गुम जाएगा (किनारा)

इस सप्ताह लगा संदेशों की संख्या बढी, हर गाने के लिए औसत 8 संदेश आए। सप्ताह भर इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने। तकनीकी सहयोग रहा प्रदीप शिन्दे, सुभाष कामले, सुनील भुजबल, विनायक तलवलकर…

यहां एक और बात, यह नई उदघोषिकाएं अपना नाम तक बताने में इतना शर्माती है कि ठीक से हम सुन नहीं पाते, अरे भई... अपना और साथियों का नाम जोर-शोर से बताया करो आखिर विविध भारती का प्रसारण पहुंचा रहे हो।

1:00 बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम अनुरंजनि में शुक्रवार को वेंकटेश गौड़चिन्दी का गायन सुनवाया गया, राग मुल्तानी में ख़्याल, राग पूरिया और राग यमन में तराना सुनवाया गया जिसमें हारमोनियम पर संगत की मधुसूदन पंडित ने और तबले पर संगत की भावसाहब दीक्षित ने। शनिवार को विनायक पाठक का तबला वादन तीन ताल में, जगन्नाथ और साथियों का बजाया शहनाई वादन - राग अहीर भैरव और भैरव सुनवाया गया। रविवार को के जी गिंडे का गायन सुनवाया गया, राग भीमपलासी के बाद छोटी-छोटी बंदिशे सुनवाई गई - राग यमन में धुपद, धमाल, राग ललित में होरी धमाल की जिसके लिए हारमोनियम पर संगत की थी गुरूदत्त हेपलेकर और तबले पर लोकेश शमसी ने। सोमवार को पंडित बी वी पलोसकर का गायन सुना राग आसावरी, केदार, गौड़ सारंग, हमीर, मियाँ की मल्हार, मालकौंस, विभास में ख़्याल और राग तिलक कामोद में -

कोयलिया बोले अमवा की डाल पर

सुनकर वाकई आनन्द आ गया, मुझे तो बचपन की याद आ गई, मैनें बचपन में यह सीखा था। मंगलवार को वीरेश्वर गौतम का उप शास्त्रीय गायन सुनवाया गया। सबसे पहले सुनवाई गई राग मिश्र गारा में ठुमरी -

गुज़र गई रतिया पिया नहीं आए

उसके बाद हमने आनद लिया बारहमासी और दादरा का। वादक कलाकारों के नाम नहीं बताए गए।

बुधवार को शरत केलवडे का गायन सुनवाया गया, राग रस रंजनि में बोल थे - अबुहन आए पिया, राग मधु रंजनि में बोल थे - आए बलमा मोरे अंगना जिसके लिए हारमोनियम पर संगत की थी गुरूदत्त हेपलेकर और तबले पर विश्वनाथ मिश्र ने। गुरूवार को उप शास्त्रीय गायन सुनवाया गया - माधुरी देवलकर की आवाज़ में राग काफ़ी में ठुमरी जिसके बोल थे - होली खेलत गिरधारी और सविता देवी की आवाज़ में मिश्र काफ़ी में होरी - उड़त अबीर गुलाल।

सप्ताह में उप शास्त्रीय गायन और गायन में एक दिन में कम से कम तीन और अधिक से अधिक आठ प्रस्तुतियाँ रही। छोटी-छोटी बंदिशें सुनने में भी आनन्द आया। लेकिन एक बात अखर गई वादन केवल एक ही दिन सुनवाय गया।

1:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम जो प्रायोजित था। इस कार्यक्रम और अन्य कार्यक्रमों के केवल प्रायोजक के विज्ञापन ही प्रसारित हुए। पत्रों पर आधारित फ़रमाइशी गीतों में शुक्रवार को पुरानी नई फ़िल्मों के अधिक लोकप्रिय कम लोकप्रिय मिले-जुले गीत सुनवाए गए - कल आज और कल, प्रिंस, पराया धन, आदमी खिलौना है, हवालात, पत्थर के फूल, लुटेरे, बड़े मियाँ छोटे मियाँ। शनिवार को सत्तर अस्सी के दशक की लोकप्रिय फ़िल्मों जैसे शान, मर्यादा, अमर अकबर एंथोनी, प्रेमरोग और अंतिम दौर में दो-तीन नई फ़िल्मों जैसे क्यों हो गया न के गीत भी सुनवाए गए। रविवार को तलाश, दुश्मन, जुगनू, डिस्को डांसर, यादों की बारात, पराया धन, दूसरा आदमी, अलबेला, साथिया फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए। सोमवार की फ़िल्में रही - पिया का घर, पुलिस पब्लिक, पराया धन, हमजोली, ख़ानदान, जब वी मेट। मंगलवार को अधिकतर सत्तर अस्सी के दशक के गीत शामिल रहे - मस्ताना, देस परदेस, धर्मात्मा, मन मन्दिर, लगान, विजयपथ, हथकड़ी, हमराज़ और इस तरह एकाध नई फ़िल्म के गीत भी सुनवाए गए।

इस तरह पिछली सदी यानि सत्तर अस्सी के दशक के गीत सुनवाए गए एकाध गीत साठ और नब्बे के दशक से भी था। अंतिम दौर में दो-तीन नई फ़िल्मों के गीत भी सुनवाए गए।

बुधवार और गुरूवार को श्रोताओं के ई-मेल से प्राप्त संदेशों पर फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए। इस सप्ताह भी कुछ पुरानी फ़िल्मों के गीत अधिक सुनवाए गए। ज्यादातर लोकप्रिय गीत सुनवाए गए। अधिकतर गीत एक-एक मेल प्राप्त होने पर ही सुनवा दिए गए, अभी भी मेल संख्या बढी नहीं है जबकि पत्रों की स्थिति पहले जैसी ही रही। देश के दूरदराज से कई फ़रमाइशी पत्र और हर पत्र में नामों की लम्बी सूची।

सप्ताह भर सुनवाए गए गीतों में ज्यादातर गीत रोंमांटिक ही रहे, और रोमांटिक गाने भी ऐसे…

चुपके से दिल दे दे नई ते शोर मच जाएगा

हाय रे हाय नींद नहीं आए चैन नहीं आए

कमाल की पसन्द है हमारे श्रोताओं की भी। मुझे याद आ गई फ़िल्म नरम-गरम जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा को स्वरूप सम्पत से प्यार हो जाता है और वो गैरेज काम-काज छोड़ कर विविध भारती के प्यार-मोहब्बत के गाने सुनते है।

हालांकि कई बढिया विषयों पर उम्दा गीत है फ़िल्मों में और कुछ श्रोता ऐसे गीतों के लिए अनुरोध भी करते है। जैसे बुधवार को संयोजन बड़ा अच्छा रहा - आपकी क़सम का यह गीत -

ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते है जो मक़ाम
वो फिर नहीं आते

रोमांटिक गाना भी अच्छा रहा - फ़िल्म अँखियों के झरोके से का शीर्षक गीत। इसके अलावा इन फ़िल्मों के गीतों से विविधता बनी रही - दिल-ए-नादाँ, अर्पण, कटी पतंग, प्यार झुकता नहीं और नई फ़िल्मों में धड़कन और स्लम डाग करोड़पति का - जय हो

वैसे सप्ताह भर में एकाध गीत प्यार-मोहब्बत का बड़ा अच्छा भी सुनवाया गया, विजयपथ फ़िल्म से -

राह में उनसे मुलाक़ात हो गई
जिससे डरते थे वही बात हो गई

कम सुने गीत भी सुनवाए गए जैसे हवालात फ़िल्म से शैलेन्द्र सिंह का गाया यह गीत -

शायद तू मुझसे प्यार करती है
लेकिन ज़माने से डरती है

नोक-झोक, छेड़छाड़ के गीत भी शामिल थे जैसे -

बच के जाने न दूँगी दिलदार तेरी मेरी लागी शरत
खाली गाएगें नैनो के वार तेरी मेरी लागी शरत (फ़िल्म - प्रिंस)

गुरूवार को भी अच्छे मिलेजुले गीतों के लिए मेल आए जैसे नई फ़िल्म के लिए पंडित जसराज का गाया गीत और शारदा की आवाज़ में पुरानी फ़िल्म सूरज से -

देखो मेरा दिल मचल गया

चाहे ई-मेल हो, एस एम एस या पत्र एक बात देखी गई दोनों ही फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम में देश के कई भागों से फ़रमाइश आई जैसे राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश

दोपहर के इस पूरे प्रसारण के दौरान संदेश भी बहुत बार प्रसारित हुए जिसमें यह बताया गया कि फ़रमाइशी फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम में अपनी पसन्द का गाना सुनने के लिए ई-मेल और एस एम एस कैसे करें।

दोपहर में 2:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम की समाप्ति के बाद आधे घण्टे के लिए क्षेत्रीय प्रसारण होता है जिसके बाद केन्द्रीय सेवा के दोपहर बाद के प्रसारण के लिए हम 3 बजे से जुड़ते है।

Tuesday, October 27, 2009

फ़िल्म आदमी और इंसान का ज़िन्दगी के रंग बताता गीत

साठ के दशक के अंतिम वर्षों में एक फ़िल्म आई थी आदमी और इंसान जिसे अपार सफलता मिली थी। तब से लेकर आज तक इसके कुछ गीत रेडियो से गूँज रहे है पर एक गीत है जिसे लम्बे समय से नहीं सुना।

यह गीत सायरा बानो पर फ़िल्माया गया है पर इस बात की मुझे ठीक से जानकारी नहीं कि इसे लताजी ने गाया है या आशाजी ने। इस गीत के बोल बहुत अच्छे है। ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा है। लगता है ज़रूर किसी शायर ने ही लिखे है। नाम मुझे याद नहीं आ रहा। एक बात कह सकती हूँ, यह फ़िल्म बी आर चोपड़ा की है तो शायर शायद साहिर लुधियानवी होंगें। बोल है -

ज़िन्दगी के रंग कई रे साथी रे
ज़िन्दगी के रंग कई रे

ज़िन्दगी दिलों को कभी जोड़ती भी है
ज़िन्दगी दिलों को कभी तोड़ती भी है
ज़िन्दगी दिलों को कभी तोड़ती भी है
ज़िन्दगी के रंग कई रे साथी रे
ज़िन्दगी के रंग कई रे

ज़िन्दगी की राह में ख़ुशी के फूल भी
ज़िन्दगी की राह में ग़मों के शूल भी
ज़िन्दगी की राह में ग़मों के शूल भी
ज़िन्दगी के रंग कई रे साथी रे
ज़िन्दगी के रंग कई रे

ज़िन्दगी कभी यकीं कभी गुमान है
हर क़दम पे तेरा मेरा इम्तिहान है
हर क़दम पे तेरा मेरा इम्तिहान है
ज़िन्दगी के रंग कई रे साथी रे
ज़िन्दगी के रंग कई रे

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Thursday, October 22, 2009

सुबह के पंचरंगी प्रसारण की साप्ताहिकी 22-10-09

सप्ताह भर सुबह पहले प्रसारण की शुरूवात परम्परा के अनुसार संकेत धुन से हुई जिसके बाद वन्देमातरम फिर बताए गए दिन और तिथि, संवत्सर तिथि भी बताई गई जिसके बाद मंगल ध्वनि सुनवाई गई। मंगल ध्वनि के बाद दीपावली के दिन तमसो माँ ज्योतिर्गमयी श्लोक से शुभकामनाएँ दी गई और दीपावली के दूसरे दिन व्यापारी वर्ग को नए वर्ष की शुभकामनाएँ दी गई। यह सभी क्षेत्रीय केंद्र से प्रसारित हुआ। इसके बाद 6 बजे दिल्ली से प्रसारित हुए समाचार, 5 मिनट के बुलेटिन के बाद मुम्बई से प्रसारण शुरू हुआ। कभी-कभार प्रसारण की शुरूवात प्रायोजकों के विज्ञापनों से होती रही जिसके बाद पहले कार्यक्रम वन्दनवार की शुरूवात मधुर संकेत धुन से हुई, फिर सुनाया गया चिंतन। शनिवार दीपावली के दिन शुभकामना देकर शुरूवात की।

चिंतन में गूढ़ विचार बताए जाते है जो आध्यात्म की उंचाइयो को छूते है और हर दिन जीवन दर्शन का एक पाठ पढाते है जैसे रामकृष्ण परमहंस का कथन कि अहंकार बार-बार सिर उठाता है, इसे भगवान का दास बना दो तथा एक अन्य कथन - मन को मारने से माया मरती है इसीलिए मोह से मन को मुक्त करने के लिए मन को मारे। स्वामी रामतीर्थ द्वारा बताया गया वेदान्त का कथन कि ईश्वर स्वयं में है जिसे अनुभव किया जाना है। स्वामी विवेकानन्द का कथन कि युवाओं का जोश सही दिशा में अपना असर दिखाए तो दुनिया की तक़दीर बदल सकता है। साहित्यकार जयशंकर प्रसाद का कथन - महत्वकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता है और शेक्सपियर का कथन - मेरे मुकुट का नाम संतोष है जो मेरे मन में रहता है।

अच्छी प्रस्तुति, संकलित करने योग्य।

वन्दनवार में विभिन्न रूपों के अच्छे भक्ति गीत सुनवाए गए। शुक्रवार को शुरूवात पारंपरिक आरती से हुई - ऊँ जय जगदीश हरे

फिर सुनवाया गया कीर्तन - गोविन्द जय जय गोपाल जय जय - जिसके बाद सुनवाए गए अन्य भक्ति गीत। शनिवार दीपावली को शुरूवात की आदि लक्ष्मी की स्तुति से -

जय जय जय मधुसूदन स्वामिनी
आदिलक्ष्मी जय पालयन माँ

साकार रूप के भक्ति गीत जैसे - पतित पावनी पाप नाशनी गंगा ओ गंगा मैय्या

निराकार रूप की भक्ति - सुमिरन कर ले मेरे मना

भक्तों के भक्ति गीत जैसे - जप ले हरि का नाम मेरे मन

शास्त्रीय पद्धति में ढले भक्ति गीत - राम सुमिरे राम सुमिरे

पुराने लोकप्रिय भजन भी शामिल रहे - निसदिन बरसत नैन हमारे

नया भजन भी सुनवाया गया - ऊँ जय श्री राधा जय श्री कृष्णा श्री कृष्णाय नमः

सप्ताह भर कार्यक्रम की प्रस्तुति के आलेख में वही बातें दोहराई गई - मानव मन जल के समान है, ईश्वर सर्वत्र है कहीं भी याद कर सकते है, आत्मबल आध्यात्मिकता से मिलता है जिसके लिए मन में बुरे विचार न आने दे, संतों की वाणी की भी चर्चा हुई। ख़ैर… सीमित विषय पर रोज़-रोज़ क्या आलेख लिखा जा सकता है…

कार्यक्रम का अंत देशगान से होता रहा। अच्छे देशभक्ति गीत सुनवाए गए, लोकप्रिय गीत जैसे -

चलो देश पर मर मिट जाए

भारत में सुख शान्ति भरो हे

मन हो निर्भय जहाँ

दीपावली के दिन देशगान भी इसी रंग में रंगा था - आओ सखि मिल मंगल गावे

यह गीत सप्ताह में दो बार सुनवाया गया तो अच्छा नहीं लगा -

ये भूमि हमारी वीरों की
हम हिन्दों की संतान है
हम भारत माँ की शान है

जबकि कई गीत ऐसे है जिन्हें लम्बे समय से नहीं सुना जैसे सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला, सुमित्रा कुमारी सिन्हा की रचनाएँ।

6:30 बजे से क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु भक्ति गीत सुनवाए गए जिसके बाद 6:55 को झरोका में केन्द्रीय और क्षेत्रीय प्रसारण की जानकारी तेलुगु भाषा में दी गई।

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम के दूसरे भाग से हम जुड़े जो प्रायोजित है जिसके विज्ञापन भी प्रसारित हुए। सप्ताह भर कम सुने, भूले-बिसरे गीत अधिक सुनवाए गए। मंगलवार को सभी गीत ऐसे ही थे। सप्ताह भर सुनवाए गए ऐसे गीतों में शामिल थे -

मैं सुहागन हूँ फ़िल्म से सुधा मल्होत्रा और आशा भोंसले की आवाज़ों में - ऐसी मुहब्बत हुई दोनों गए काम से

शमशाद बेगम का गाया फिल्म मेरा सलाम का यह गीत जिसकी तर्ज बनाई हफीज खां ने। इस संगीतकार का नाम शायद ही श्रोताओं ने सुना हो -

आग लगी शमा पे परवाना गिरा

परदेसी फ़िल्म का मन्नाडे का गाया गीत जो भजन की तरह है -

ये हिन्दुस्तान है प्यारे हमारी जान है प्यारे
यहाँ बड़े-बड़े है …
राम लखन कृष्ण कन्हाई

मुजरिम फ़िल्म का गीता दत्त और साथियों का गाया - चंदा चंदनी से जब चमके

हेमन्त कुमार की आवाज़ में - आँखें बरसती है बारहो महीने, इनके आगे बरसात क्या है

गूँज फ़िल्म से सुरैया की आवाज़ में -

चले जा रहे हो यूँ नज़रे झुकाए
हमें कुछ न कहना जो हम याद आए

कुछ ऐसे गाने भी सुने जिनके बारे में शायद बहुत से श्रोताओं को जानकारी नही जैसे कि रफ़ी साहब ने अमीरबाई कर्नाटकी के साथ बिखरे मोती फ़िल्म के लिए गाया है, अच्छा लगा यह युगल गीत सुनना।

हर दिन कुछ लोकप्रिय गीत भी सुनवाए गए -

रफ़ी साहब की आवाज़ में - ले लो ले लो दुआएँ माँ बाप की

मिर्जा गालिब का सुरैया का गाया यह गीत - आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक

प्रकाश मेहरा और क़मर जलालाबादी का लिखा गीत - झंकार पायल की तोसे बिनती करे

पंचायत का गीता दत्त और लताजी का गाया गीत - ता थैय्या करके आना मोरे जादूगर मोरे सैंय्या

और यह लोकप्रिय गीत बहुत दिनों बाद सुनवाया गया - महफ़िल में जल उठी शमा परवाने के लिए

हर दिन कार्यक्रम का समापन कुंदनलाल सहगल के गीत से होता रहा। शनिवार को दीपावली का गीत सुनवाया गया तानसेन फिल्म से -

दिया जलाओ जगमग जगमग

इस तरह इस सप्ताह कार्यक्रम सुन कर लगा कि इसका शीर्षक सार्थक है।

इस कार्यक्रम में कुछ सामान्य जानकारी भी दी गई जो अच्छी लगी जैसे कुछ फिल्मों के रिलीज का वर्ष और बैनर बताया गया। एकाध बार उदघोषक ने अपना नाम भी बताया और उनके साथ कंट्रोल रूम और ड्यूटी रूम के साथियो के नाम भी बताए। यह जानकारी अगर हर प्रसारण में दी जाए तो अच्छा रहेगा, आख़िर हमें भी तो पता चलेगा कि हम तक यह प्रसारण कौन पहुँचा रहे है।

7:30 बजे संगीत सरिता में अच्छी शिक्षाप्रद श्रृंखला प्रसारित हुई - कौंस के प्रकार जिसमें आमंत्रित कलाकार थे विदुषी अश्विनी भेडे देशपाण्डे। बातचीत कर रहे थे अशोक (सोनामने) जी। इसमें चर्चा की गई कौंस के प्रकारों की। अच्छा समझा कर बताया गया कि मूल राग तो मालकौंस है जिसका प्राचीन ग्रन्थों में नाम है - मालव कौशिक। इसमें ॠषभ और पंचम स्वर पूरी तरह वर्जित है, इस तरह इस राग में पाँच स्वर ही है जिससे यह औड़व जाति का राग है। जब इन दोनों स्वरों को विशेष शैली में लिया जाता है तब सातों सुर होने से यह नया राग संपूर्ण मालकौंस कहलाता है। मालकौंस में निशाथ को शुद्द कर राग चन्द्रकौंस बनाया गया है, जो आजकल चल रहा है वह चन्द्रकौंस लगभग 80 वर्ष पुराना राग है। प्राचीन चन्द्रकौंस जिसे पुराना चन्द्रकौंस कहते है, इससे और राग बागेश्री से मिलकर बना बागेश्री कौंस। राग मधुवन्ती में निषाथ कोमल और ॠषभ वर्जित करने से बना राग मधुकौंस जो औड़व जाति का है। राग जोल में पंचम की जगह मध्यम लेने से बना जोल कौंस। कर्नाटक शैली के राग चारूकेशी से मध्यम लेकर बनाया गया चारूकौंस। विभिन्न रागों के चलन को गाकर बताया गया, बंदिशें भी सुनवाई गई जिसमें हारमोनियम पर संगत की सीमा शिरोडकार जी और तबले पर संगत की विश्वनाथ शिरोडकर जी ने। फिल्मी गीत भी सुनवाए गए -

चन्द्रकौंस - फ़िल्म स्वर्ण सुन्दरी - सुन लो सुन लो मेरी पुकार

राग मधुवन्ती और मधुकौंस दोनों रागों की झलक फ़िल्म देवदास फ़िल्म के इस गीत में - ओ री पिया

राग मधुवन्ती स्पष्ट दिखता है दिल की राहे फ़िल्म के गीत में - रस्में उल्फ़त को निभाए तो निभाए कैसे

जोलकौंस पर फ़िल्मी गीत की जगह भजन सुनवाया गया - निसदिन बरसत नैन हमारे

चारूकौंस की झलक - फ़िल्म प्यार का मौसम - तुम बिन जाऊँ कहाँ

इस श्रृंखला की प्रस्तुति कांचन (प्रकाश संगीत) जी की थी और इन्हीं की प्रस्तुति में आज से एक और श्रृंखला शुरू हुई - मेरी संगीत यात्रा जिसमें प्रख़्यात शास्त्रीय गायक पद्म विभूषण पंडित जसराज जी दे रहे है अपनी संगीत यात्रा की जानकारी। आपसे बात कर रहे है आपके बालसखा वल्लभ आश्रम के आचार्य श्री हरिप्रसाद जी। आज की पहली कड़ी में बताय गया कि जसराज जी का जन्म हरियाणा के गाँव में हुआ फिर तीन वर्ष की आयु में हैदराबाद आ गए और घर पर शुरू हुई संगीत की शिक्षा।

इस श्रृंखला का फिर से प्रसारण हो रहा है। पिछले वर्ष की सापताहिकी में इस श्रृंखला के बारे में मैं लिख चुकी हूँ।

7:45 को त्रिवेणी में शुक्रवार को एक विचार के बदले कुछ अच्छी बातें बताई गई कि दुःख में हम ईश्वर को याद करते है पर ईश्वर ने कभी हमसे यह नहीं कहा कि उसका प्रचार करो। सुनवाया गया यह गीत -

इतनी शक्ति हमें देना दाता

विशाल अख्ण्ड संस्कृति की बात हुई। प्रगति के लिए विचारों से आधुनिक बनने की सलाह दी गई और सुनवाया यह गीत -

कितने दिन आँखें तरसेगी -----
नया ज़माना आएगा

शनिवार को दीपावली के पारम्परिक रंग में रंगी थी त्रिवेणी। अच्छा आलेख था और गीत भी -

ज्योति कलश छलके

और बहुत दिन बाद जीवन ज्योति फ़िल्म का यह गीत सुनना अच्छा लगा -

जिस द्वारे पे घर की बहू रंगोली सजाती है
उस द्वारे के घर के अन्दर लक्ष्मी आती है

रविवार को भी दीवाली का रंग था, इस दिन विचार था - आतिशबाज़ी में ये न भूले कि हमारे आस-पास कई लोगों के जीवन में अँधेरा है। आलेख और गीत दोनों अच्छे रहे -

दिए जलाए प्यार के

दिए जलते है फूल खिलते है

सोमवार का विचार था - कोई काम छोटा नहीं होता, काम में ईमानदारी होनी चाहिए। बढिया आलेख और गाने भी अच्छे चुने गए, ऐसे काम से संबंधित जो छोटे काम माने जाते है -

करा ले साफ़ करा ले मेरी जाँ साफ़ करा ले
प्यारे कानों का ये मैल

और जानीवाकर का तेलमालिश का लोकप्रिय गीत।

मंगलवार का विचार था - मीठे बोल बोलो। आलेख के साथ गीत भी अच्छे रहे -

एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल
जग में रह जाएगें प्यारे तेरे बोल

बुधवार का विचार था - एकता में शक्ति है। अच्छे आलेख के साथ उपयुक्त गीत सुनवाए गए जैसे - हम साथ-साथ है

और आज का विचार था - सबका आदर करें किसी का अपमान न करें। आलेख में प्रेमचन्द की कहानी दो बैलों की कथा और उस पर आधारित फ़िल्म हीरा मोती का भी उल्लेख किया गया और गाने बढिया सुनवाए ख़ासकर पहला गीत। गायक का नाम नहीं बताया पर इतनी अच्छी गायकी लगा बैलों की ही आवाज़ है और कोशिश करने पर भी मुखड़े के बोल मैं लिख नहीं पाई। सुन्दर प्रयोग… अन्य गीत भी अच्छे थे जैसे हमराज़ फ़िल्म से -

न मुँह छुपा कि जिओ और न सर झुका के जिओ

इस तरह हर दिम की शुरूवात के लिए अच्छे प्रेरणादायी विचार रहे।

त्रिवेणी कार्यक्रम के बाद क्षेत्रीय प्रसारण तेलुगु भाषा में शुरू हो जाता है फिर हम दोपहर 12 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुडते है।

Tuesday, October 20, 2009

फ़िल्म इंतेक़ाम का रफ़ी सा हब का गाया शान्त धीमा गीत

आज याद आ रहा है साठ के दशक की फ़िल्म इंतेक़ाम का एक गीत। इस गीत को संजय और साधना पर फ़िल्माया गया है। रफ़ी साहब का गाया यह बहुत ही शान्त धीमा गीत है और सुनने में बहुत अच्छा लगता है।

पहले यह गीत रेडियो से बहुत बजता था। आजकल भी इस फ़िल्म के दूसरे गीत सुनवाए जाते है पर इस गीत को सुने लम्बा समय हो गया -

जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा

तो ए दिल मोहब्बत की किस्मत बना दे
तड़प ओ तड़प कर अभी जान दे दे
यूँ मरते है मर जाने वाले दिखा दे
जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा

न उनका तबस्सुम तेरे वास्ते है
न तेरे लिए उनकी ज़ुल्फ़ों के साए
तू बेआस फिर क्यों जिए जा रहा है
जवानी में यूँ ज़िन्दगानी लुटा के
जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा

सितम या करम हुस्न वालों की मर्जी
कभी कोई उनसे शिकवा न करना
सितमगर सलामत रहे हुस्न तेरा
यही उसको मिटने से पहले दुआ दे
जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, October 16, 2009

रात के सुकून भरे कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 15-10-09

हवामहल के बाद 8:15 से क्षेत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाते है फिर हम रात 9 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुडते है।

9 बजे गुलदस्ता कार्यक्रम की शुरूवात होती है परिचय धुन से जो अंत में भी बजती है। छोटी सी पर अच्छी है धुन। यह गैर फिल्मी रचनाओं का कार्यक्रम है। इसमें विभिन्न मूड की रचनाएँ सुनवाई गई।

शुक्रवार को शुरूवात हुई मोबिन के कलाम से -

मैनें तुमको दिल दिया तुमने मुझको रुसवा किया
मैनें तुमसे क्या किया और तुमने मुझसे क्या किया

इसे आवाजे दी - अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन ने

इसके बाद जगजीत सिंह की आवाज में सुना - रिश्तों में दरार आई

फिर माहौल बदला और सोनाली राठौर की आवाज में सुनवाई गई इशारा एलबम से यह रचना -

सुन्दर कोमल सपनों की बरात गुजर गई जाना

समापन हुआ हरिहरन की आवाज में राशिद के कलाम से -

कोई मौसम हो तेरे रंग में ढल जाउंगा
मैं कोई वक़्त नहीं के बदल जाउंगा

शनिवार को आशा भोंसले की आवाज़ में सुनवाया गया निदा फ़ाज़ली का कलाम -

दिल का लगाना खेल न जानो
दिल का लगाना मुश्किल है

फिर बशीर बद्र का कलाम सुना हरिहरन की आवाज़ में -

यूँ ही बेसबब न फिरा करो

इसके अलावा जगजीत सिंह की आवाज़ में अनवर मिर्ज़ापुरी और ग़ुलाम अली की आवाज़ में ज़ाफ़र का कलाम सुनवाया गया। रविवार को कतिल शिफ़ाई का कलाम ग़ुलाम अली की आवाज़ में सुना, इस दिन एक प्रस्तुति अच्छी थी -

आसमानी रंग है आँखों का

पहले कलाम पढा गया फिर ग़ज़ल की शक्ल में सुनवाया गया। सोमवार को पूरा कार्यक्रम शायर निदा फ़ाज़ली के नाम रहा। उन्हीं के चार कलाम चन्दन दास, जगजीत सिंह - लताजी, पंकज उदहास और आशा भोंसले की आवाज़ों में सुनवाए गए। मंगलवार को विभिन्न एलबमों से रचनाएँ सुनवाई गई। चयन अच्छा रहा - बहादुर शाह ज़फ़र का कलाम अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की आवाज़ों में, ज़फ़र गोरखपुरी का कलाम पंकज उदहास की आवाज़ मे और वीनू पुरूषोत्तम की आवाज़ में सुना -

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहां राह भूल जाता हूँ

बुधवार को अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की युगल आवाज़ों में कबीर राजस्थानी के बोलों को शास्त्रीय पद्धति में सुनना अच्छा लगा -

बोल रहा था कल वो मुझसे

इसके अलावा घनश्याम वासवानी की आवाज़ में निदा फ़ाज़ली की रचना, पंकज उदहास की आवाज़ में सरदार अंजुम का कलाम सुना और दाग़ देहलवी का कलाम भी शामिल-ए-बज्म रहा।

गुरूवार को बहुत लोकप्रिय आवाज़े गूँजी। शुरूवात हुई बेगम अख़्तर से, सुदर्शन फ़ाकिर का कलाम -

ज़िन्दगी कुछ भी नहीं फिर भी जिए जाते है
तुझपे ऐ वक़्त हम एहसान किए जाते है

फिर जुगल आवाज़े रही अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की जिसके बाद मेहदी हसन, पिनाज़ मसाणी और समापन हुआ सुमन कल्याणपुर से। पूरा गुलदस्ता महक उठा।

इस तरह सप्ताह भर गजलों का बोलबाला रहा। एक बात समझ में नहीं आई, इस कार्यक्रम के बारे में कहा जाता है कि यह ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का गुलदस्ता है फिर ग़ज़लें ही ज्यादा क्यों सुनवाई जाती है। गीत शामिल क्यों नहीं किए जाते। योगेश के कई अच्छे गीत है मन्नाडे की आवाज़ में। हेमन्त कुमार, भूपेन हज़ारिका के गाए गीत है। कई ऐसे गीत भी है शान्ता सक्सेना, उषा टंडन, शान्ति माथुर की आवाज़ों में जो अक्सर आकाशवाणी के सुगम संगीत के कार्यक्रम में सुनवाए जाते थे। अनूप जलोटा, अनुराधा पौडवाल के कई गीत है फिर कई नए कलाकार भी तो है। गीत और ग़ज़ल मिलकर सुनेगें तो ज्यादा मज़ा आएगा या फिर इस कार्यक्रम को ग़ज़लों का ही कर दीजिए।

हर दिन इस वाक्य से समापन अच्छा लगा - सुनने वालों के लिए ये था विविध भारती का नजराना - गुलदस्ता

9:30 बजे एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में शुक्रवार को सुनवाए गए 1965 में रिलीज खानदान फिल्म के गीत. शुरूवात इस गीत से की -

बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तके बृज बाला

फिल्म से जुड़े सभी के नाम बताए गए और साथ ही सामान्य जानकारी भी दी कि इस फिल्म के लिए अभिनय और गीत के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले पर यह नहीं बताया कि यह मुमताज़ की पहली फ़िल्म है। शनिवार को 1956 में रिलीज़ गुरूदत्त की फ़िल्म सी आई डी के गीत सुनवाए गए। सभी गीत सुनवाए गए जो बहुत लोकप्रिय है जैसे -

बूझ मेरा क्या नाव रे नदी किनारे गाँव रे

आँखों ही आँखों में इशारा हो गया

इस फ़िल्म से जुड़ी सामान्य जानकारी भी दी और फ़िल्म से जुड़े सभी नाम बताए पर यह नहीं बताया कि यह वहीदा रहमान की पहली फ़िल्म है। सोमवार को 1965 में रिलीज़ नीला आकाश फ़िल्म के गीत सुनवाए। साथ ही फ़िल्म से जुड़े सभी नाम बताए। इसके कुछ गीत बहुत अच्छे है -

आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है

तेरे पास आके मेरा वक़्त गुज़र जाता है

मंगलवार को 1958 में रिलीज़ फ़िल्म चलती का नाम गाड़ी फ़िल्म के गीत सुनवाए गए जिसका चयन शायद अशोक कुमार जी के जन्मदिन को ध्यान में रखकर किया गया पर ऐसा कुछ बताया नहीं गया। फ़िल्म से संबंधित कुछ ख़ास बातें भी नहीं बताई, बस इससे जुड़े प्रमुख नाम बताए और सभी गीत सुनवाए जैसे -

हाल कैसा है जनाब का

दे दो मेरा पाँच रूपया बारह आना
मारेगा भय्या न न न न

बुधवार को नई फ़िल्म टशन के गीत सुनवाए गए और फ़िल्म से जुड़े सभी प्रमुख नाम बताए गए।

गुरूवार को सत्तर के दशक की फ़िल्म दाग़ के गीत सुनवाए गए। गीत सुनवाते गए और फ़िल्म से जुड़े नाम बताते गए पर कुछ सामान्य बातें बताई जा सकती थी जो नहीं बताई गई जैसे इस फ़िल्म में पहली बार राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी ने एक साथ काम किया। यह हिट फ़िल्म गुलशन नन्दा के उपन्यास पर बनाई गई जिनके उपन्यासों पर बहुत हिट फ़िल्में बनी है।

इस तरह इस सप्ताह पुरानी फ़िल्मों का बोलबाला रहा।

रविवार को उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम में ख़्यात गायिका शारदा से युनूस (खान) जी की बातचीत प्रसारित हुई। कार्यक्रम की परम्परा के अनुसार शुरू में शारदा के गीतों का संसार सजाया गया, उनके गीतों के मुखड़े सुनवाए गए। यह सुर संसार भी कुछ कम नहीं है, बढिया गीत गाए है शारदा ने। फिर बातचीत का सिलसिला पिछली कड़ी से आगे बढा। शारदा ने बताया कि आजकल वह बच्चों के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी में एलबम निकालने में व्यस्त है। गा कर भी सुनाया साधारण सी अंग्रेज़ी में बच्चों का गीत। एक और गीत गाकर सुनाया - जाने भी दे सनम। दो बातें अच्छी और सच्ची बताई - बच्चों के लिए हमारे देश में गीत कम है और दूसरी बात कि जब ईश्वर ने उन्हें कुछ दिया है तो वो भी समाज को कुछ दे। अपने बचपन को याद करते हुए बताया कि तब भी बच्चों के लिए कुछ ख़ास नहीं था और कर्नाटक संगीत की कुछ पंक्तियाँ गाकर सुनाई जो कृष्ण जी के बचपन से संबंधित थी। अपने काम के समय की बात करते हुए प्रख़्यात गायिका नूरजहाँ को शिद्दत से याद किया, उनके गीत भी गुनगुनाए जैसे - मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग। साथ ही याद किया बेगम अख़्तर और इक़बाल बानो को। अच्छी चल रही है बातचीत, इसकी रिकार्डिंग की तस्वीरें विविध भारती की वेबसाइट पर देखी जा सकती है। इस कार्यक्रम का संयोजन निखिल (धामापुरकर) जी के तकनीकी सहयोग से कल्पना (शेट्टी) जी ने किया।

10 बजे छाया गीत में शुक्रवार को कमल (शर्मा) जी की प्रस्तुति बढिया रही. प्यार की शुरूवात से लेकर धीरे-धीरे परवान चढ़ने की बात कही. आलेख भी अच्छा था जैसे - धीरे-धीरे मन की पंखुडियां खिलने लगती है. पचास साठ के दशक के अच्छे गाने चुने गए -

कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी

तेरे मेरे सपने अब एक रंग है

शनिवार को अशोक (सोनावले) जी ने मोहब्बत की बातें की, कुछ यादों की भी बातें हुई जिसमें उर्दू के शब्द बहुत थे। रविवार को युनूस (खान) जी ने प्यार की ऊँचाई की चर्चा की। दोनों ही दिन एक ख़ास बात हुई, कुछ ऐसे गीत भी सुनवाए जो आजकल बहुत ही कम सुनने को मिलते है। अशोक जी ने सुनवाया एक समय का बहुत लोकप्रिय गीत -

हर चेहरा यहाँ चाँद तो हर जर्रा सितारा
ये वादी-ए-कश्मीर है जन्नत का नज़ारा

युनूस जी ने ऐसे गीत शामिल किए जो शायद ही कभी सुने जाते हो -

प्यार की मंज़िल हारी

सोमवार को छायागीत प्रस्तुत किया अमरकान्त जी ने जो छायागीत तो नहीं पर ग़ैर फ़रमाइशी फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम लग रहा था। दो-दो गानों के बाद एकाध वाक्य में कुछ कह दिया। हालांकि बढिया रोमांटिक गीत सुनवाए -

इशारों इशारों में दिल लेने वाले बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से

दीवाना मुझसा नहीं इस अंबर के नीचे

सच्चा झूठा, आराधना, शर्मिली के गाने भी शामिल रहे और जैसा कि अक्सर होता है अमरकान्त जी का कार्यक्रम देव आनन्द की किसी फ़िल्म के गीत के बिना पूरा नहीं होता, इस बार ज्वैल थीफ़ का गीत सुनवाया। क्या ही अच्छा होता अगर हर गीत के आगे-पीछे ज्यादा नहीं सिर्फ़ एक दो वाक्य बोल देते।

मंगलवार को निम्मी (मिश्रा) जी की प्रस्तुति रही। हमेशा की तरह इस बार भी समझ में नहीं आया कि भूले-बिसरे गीत सुन रहे है या छाया गीत, खैर… हमें तो यह गीत अच्छा लगा -

सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी

बुधवार को राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने अच्छे चुने हुए प्यार भरे गीत सुनवाए -

सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था
आज भी है और कल भी रहेगा

सेहरा, पत्थर के सनम के गीत भी सुनवाए गए। आलेख भी अच्छा रहा।

गुरूवार को रेणु (बंसल) जी की प्रस्तुति रही, प्यार की बातें हुई और सुनवाए गए गीतों में यह गीत भी शामिल थे -

नैन सो नैन नाही मिलाओ

हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ आराम कहाँ

निम्मी जी और रेणु जी में जो ऊर्जा अन्य कार्यक्रमों में नज़र आती है वो छाया गीत में कहीं खो सी जाती है। दोनों छाया गीत बहुत ही सुस्त लगे वैसे आलेख अच्छा रहा।

10:30 बजे से श्रोताओं की फ़रमाइश पर लोकप्रिय गीत सुनवाए गए आप की फरमाइश कार्यक्रम में। यह कार्यक्रम प्रायोजित रहा। हर गीत की फ़रमाइश में देश के कोने-कोने से ढेर से पत्र और हर पत्र में नामों की लम्बी सूची। अधिकतर साठ सत्तर के दशक के गीतों की फ़रमाइश की गई। बुधवार और गुरूवार नई तकनीक का दिन रहा यानि एस एम एस से श्रोता फ़रमाइश भेजते है। अच्छा लगा कि इन दो दिनों में भी पुराने गीतों की फ़रमाइश आई वैसे पुराने गीतों के लिए एकाध एस एम एस ही आए जबकि नए गीतों के लिए 3-4 तक रही संदेशों की संख्या।

शुक्रवार की फिल्में रही - मेरे सनम, अनुपमा, बिन बादल बरसात, पहचान, निकाह और गीत फिल्म का यह गीत -

जिसके सपने हमें रोज आते रहे दिल लुभाते रहे
ये बता दो कहीं तुम वही तो नहीं

शनिवार को सुनवाया गया जिगरी दोस्त का यह गीत -

मेरे देश में पवन चले पुरवाई

आरती, मेरे अपने, अभिमान, तीसरी कसम फ़िल्मों के गीत भी शामिल रहे। रविवार को असली नकली, दिल ने फिर याद किया और दिल एक मन्दिर फ़िल्म का यह गीत शामिल रहा -

रूक जा रात ठहर जा रे चन्दा बीते न मिलन की बेला

सोमवार को शुरूवात हुई शिकार फ़िल्म के गीत से -

पर्दे में रहने दो पर्दा न उठाओ

फिर सुनवाए गए काली टोपी लाल रूमाल, प्यार की जीत, नया दौर और राजपूत फ़िल्मों के गीत।

मंगलवार को आनन्द का गीत सुनवाया गया -

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

और चन्द्रकान्ता जैसी पुरानी फ़िल्मों के गीत शामिल रहे।

बुधवार को सुना -

ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ
सुन जा दिल की दास्ताँ

इसके अलावा दिल एक मन्दिर का शीर्षक गीत, गुमराह, आनन्द और नई फ़िल्म कहो न प्यार है का शीर्षक गीत शामिल रहा।

गुरूवार को असली नकली और मेरे महबूब फ़िल्म का यह गीत शामिल था -

जानेमन एक नज़र देख ले

और नई फ़िल्मों में तुम बिन, जानी दुश्मन और कल हो न हो फ़िल्म का शीर्षक गीत फ़रमाइश पर सुनवाया गया।

कभी-कभार आपकी फ़रमाइश की प्रस्तुति में हल्का सा छायागीत का आभास हुआ जो फ़रमाइशी कार्यक्रम के लिए अच्छा नहीं लगा।

11 बजे अगले दिन के कार्यक्रमों की जानकारी दी गई जिसका प्रसारण सीधे केन्द्रीय सेवा से होने से सभी कार्यक्रमों की जानकारी मिली हालांकि क्षेत्रीय प्रसारण के कारण सभी कार्यक्रम यहां प्रसारित नहीं होते. जिसके बाद दिल्ली से समाचार के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद प्रसारण समाप्त होता रहा।

आप सबको दीपावली की शुभकामनाएँ !

Tuesday, October 13, 2009

आशा भोंसलें की आवाज़ का एक लाजवाब रंग - यार बादेशाह यार दिलरूबा

आज याद आ रहा है साठ के दशक की एक फ़िल्म का गीत। फ़िल्म का नाम है सी आई डी 909

यह फ़िल्म तो इतनी सफल नहीं हुई थी पर इसके गाने बहुत लोकप्रिय हुए थे। रेडियो के सभी केन्द्रों से फ़रमाइशी और ग़ैर फ़रमाइशी कार्यक्रमों में खूब बजा करते थे। अब बहुत समय से सुना नहीं है। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार है शायद फ़िरोज़ खान और मुमताज़।

आज जिस गीत को हम याद दिला रहे है उसे आशा भोंसले ने गाया है। आशा जी एक और लाजवाब रंग इस गीत में है जिसका संगीत भी बहुत बढिया है शायद ओ पी नय्यर का है। गीत के जो बोल याद आ रहे है वो इस तरह है -

यार बादेशाह यार दिलरूबा
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
यार बादेशाह यार दिलरूबा

कातिल आँखों वाले
ओ दिलबर मतवाले
दिल है तेरे हवाले
यार बादेशाह यार दिलरूबा
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
यार बादेशाह यार दिलरूबा

रातों की तनहाई मेरी जान न ले ले
तेरी लापरवाही मेरी जान से खेले
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
नज़रे है नूरानी
मैं तेरी दीवानी
यार बादेशाह यार दिलरूबा
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
यार बादेशाह यार दिलरूबा

मस्ताने अलबेले मेरी बात समझ ले
--------------------
क्यूँ तड़पाए आ जा
चैन न आए आ जा
यार बादेशाह यार दिलरूबा
ओ ओ ओ ओ ओ ओ
यार बादेशाह यार दिलरूबा

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, October 9, 2009

शाम बाद के पारम्परिक कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 8-10-09

शाम के प्रसारण में विविध भारती के पारम्परिक कार्यक्रम शामिल है यानि वो कार्यक्रम जिनसे विविध भारती की पहचान है और जो विविध भारती के लगभग शुरूवाती दौर से लेकर आजतक प्रसारित हो रहे है।

शाम 5:30 बजे फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम के बाद क्षेत्रीय प्रसारण शुरू हो जाता है जिसके बाद दुबारा हम 7 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है।

7 बजने से 2-3 मिनट पहले क्षेत्रीय भाषा में झरोका प्रसारित होता है जिसमें 7 बजे के बाद से प्रसारित होने वाले क्षेत्रीय और केन्द्रीय सेवा के कार्यक्रमों की जानकारी दी जाती है फिर 7 बजे से 5 मिनट के लिए दिल्ली से समाचार प्रसारित होते है।

समाचार के बाद कुछ समय के लिए धुन बजती है ताकि क्षेत्रीय केन्द्र अपने विज्ञापन प्रसारित कर सके। इसके बाद गूँजती है जयमाला की ज़ोरदार परिचय (विजय) धुन जिसके बाद शुरू होता है कार्यक्रम। अक्सर शुरूवात में उदघोषक ने अपना और अपने साथ स्टूडियो में तैनात साथियों के नाम बताए फिर शुरू होता है फ़रमाइशों का सिलसिला।

सप्ताह भर एस एम एस द्वारा भेजी गई फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश पर ही गीत सुनवाए गए। ज्यादातर एक ही एस एम एस प्राप्त होने पर ही गीत सुनवा दिया गया।

शुक्रवार को सभी गीत नए थे जैसे दिल दिया है, इजाजत, जन्नत, चाँद के पार चलो और विवाह फ़िल्म का यह गीत -

हमारी शादी में अभी बाकी है हफ़्ते चार

शुक्रवार को विविध भारती के शनिवार को होने वाले जन्मदिन के लिए पुराने समय के निर्माता-निर्देशक जे ओमप्रकाश और नई गायिका मधुश्री के शुभकामना संदेश सुनवाए गए साथ में गीतों की झलक भी थी।

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया पार्श्व गायक अमित कुमार ने। बढिया प्रस्तुति। कार्यक्रम का एक बहुत बड़ा भाग अपने पिताश्री किशोर कुमार को समर्पित किया। ऐसी बातें बताई जो श्रोता नहीं जानते जैसे किशोर कुमार अभिनय नहीं करना चाहते थे। फ़रेब फ़िल्म के गाने की रिकार्डिंग में बहुत ग़लतियाँ करते रहे। चतुरनार गीत पुराना है जो शास्त्रीय पद्दति का है जिसे बाद में पड़ोसन में हास्य रूप में रखा गया। इसके अलावा, मन्नाडे, हेमन्त कुमार और रफ़ी साहब को याद किया और उनके गीत सुनवाए इसीसे पुराने गीत अधिक सुनवाए। खुद के गीत भी सुनवाए जैसे बालिका वधू से और लव स्टोरी का गीत। आगे नहीं गाने का तय किया था फिर तेजाब के लिए अनुराधा पौडवाल के साथ गाया -

कह दो के तुम हो मेरी वरना

इस तरह कई नई जानकारियाँ देती अच्छी प्रस्तुति। इस कार्यक्रम को तैयार किया विनय तलवलकर और जयंत महाजन के तकनीकी और परिणीता नायक के प्रस्तुति सहयोग से कलपना (शेट्टी) जी ने।

रविवार और सोमवार को लगभग हर दशक से एक फ़िल्म का गीत फ़ौजी भाइयों के संदे्शों से प्राप्त अनुरोध पर सुनवाया गया। पचास के दशक से अब तक और सुनवाने का क्रम नया-पुराना मिलाजुला रखा।

रविवार को फ़िल्में रही - आओ प्यार करें (नई फ़िल्म), कुंआरा बाप, लावारिस, संगम, एक और नई फ़िल्म का ना मैं भूल रही हूँ और कवि कालिदास फ़िल्म का यह गीत -

शाम भई घनश्याम न आए

सोमवार की फ़िल्में रही - मेरे हमसफ़र (शीर्षक गीत), दादी माँ, नसीब, जांबाज़, ज़ुल्म की पुकार फ़िल्म का गीत संवादों के साथ सुनवाया गया और नई फ़िल्म तेरे नाम का यह शीर्षक गीत -

तेरे नाम हमने किया जीवन अपना सारा सनम

मंगलवार के लिए एक-दो पुराने गानों के साथ ज्यादा नए गाने चुने गए - हरियाली और रास्ता, धडकन, मासूम, कारपोरेट, प्रोफ़ेसर का यह गीत -

मैं चली मैं चली पीछे पीछे जहाँ

बुधवार को करवा चौथ को ध्यान में रखकर फ़ौजी भाइयों ने एक ख़ास गीत सुनने के लिए एस एम एस भेजा और इसी गीत से कार्यक्रम की शुरूवात की गई तो बहुत अच्छा लगा। सुहागरात फ़िल्म का यह गीत है -

हैय्या ओ गंगा मैय्या
गंगा मैय्या में जब तक के पानी रहे
मेरे सजना तेरी ज़िन्दगानी रहे

इसके अलावा स्वर्ण सुन्दरी और इन नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए - फूल और कांटे, राजा हिन्दुस्तानी, बार्डर

गुरूवार को सुनवाए गए इन नई-पुरानी फ़िल्मों के गीत - जब वी मेट, कोयला, हद कर दी आपने, गोलमाल, आरज़ू, ब्रह्मचारी और शर्मिली फ़िल्म का यह गीत -

खिलते है गुल यहाँ खिल के बिखरने को

कभी-कभार फ़ौजी भाइयों को एस एम एस भेजने के लिए तरीका और नम्बर बताया जाता रहा।

कार्यक्रम के दौरान विविध भारती के विभिन्न कार्यक्रमों के प्रायोजकों के विज्ञापन ही प्रसारित हुए। इस तरह विज्ञापनों की संख्या बहुत कम रह गई। समझ में नही आता कि कंपनियों ने विविध भारती से मुँह क्यों मोड़ लिया जबकि लगभग हर चैनल पर विज्ञापन नज़र आते है। क्षेत्रीय विज्ञापन तो एक भी नही था।

कार्यक्रम का समापन भी परिचय धुन से होता रहा। हाँ, एक बात मुझे बहुत अख़र गई, फ़ौजी भाइयों को फ़ौजी दोस्तों कहना। यहाँ भाई शब्द इतना अच्छा लगता है कि किसी और शब्द के प्रयोग से फ़ौजी भाइयों से अपनापन कम होता नज़र आता है। हर जगह नए प्रयोग ठीक नहीं होते ख़ासकर भावनात्मक स्तर पर।

7:45 पर शुक्रवार को लोकसंगीत कार्यक्रम प्रसारित होता है। यह भी एक पारम्परिक कार्यक्रम है, बरसों से सुन रहे है, समय अक्सर बदलता रहता है पर इसकी परिचय धुन वही है। इस शुक्रवार को तो तमाशा सा हो गया। लोकसंगीत कार्यक्रम की उदघोषणा हुई, परिचय धुन भी बजी फिर कहा गया, आज लोकसंगीत में सुनिए ग़ैर फ़िल्मी गीत, फिर विवरण बताया गया फिर शुरू हुआ गाँधीजी का यह गीत -

सुनो सुनो ए दुनिया वालों बापू की यह अमर कहानी

इस तरह की प्रस्तुति अजीब लग रही थी कम से कम गाँधी जी की के जन्मदिन के अनुरूप गौरवशाली तो नही थी। तभी बड़ी अजीब बात हुई बीच में से गीत बन्द हो गया और संगीत बजा फिर बीच में से एक लोकगीत शुरू हो गया। लोकगीत समाप्त होने पर बताया गया - अभी आप राजस्थानी लोकगीत सुन रहे थे फिर एक और लोकगीत शुरू हो गया जिसका एक भी बोल समझ में नहीं आया। फिर समाप्ति की अजीब घोषणा हुई - कहा गया अभी आप फोक संगीत सुन रहे थे लोक संगीत कार्यक्रम में, बस फिर बज उठी परिचय धुन. क्या तमाशा था यह... विविध भारती के प्राण प्रतिष्ठित कार्यक्रम की इतनी गंदी प्रस्तुति...

शनिवार और सोमवार को पत्रावली में निम्मी (मिश्रा) जी और महेन्द्र मोदी जी आए। श्रोताओं ने पत्रों में आज के मेहमान कार्यक्रम की तारीफ़ की जिसमें युनूस खान जी ने गायक शब्बीर कुमार से बात की थी और उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम की भी तारीफ़ हुई जिसमें ख़्यात गायिका शारदा से बातचीत की जा रही है। मंथन कार्यक्रम को दुबारा शुरू करने का अनुरोध किया गया जिसके जवाब में कहा गया कि फ़िलहाल संभव नहीं है। एक पत्र आया कि पिटारा का चूल्हा चौका अच्छा कार्यक्रम नहीं है फिर उन्हें समझाया गया कि यह एक विस्तृत कार्यक्रम है। गुलदस्ता कार्यक्रम को कम से कम एक दिन फ़रमाइशी करने के अनुरोध में भी पत्र आया। दो-चार पत्र ऐसे भी आए जिनमें कहा गया कि जिन फ़िल्मों में गानों की संख्या बहुत कम है ऐसी दो-तीन फ़िल्मों के गाने मिलाकर एक दिन एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में प्रसारित किए जा सकते है जिस पर विचार करने की बात कही गई।

मंगलवार को ग़ैर फ़िल्मी क़व्वालियाँ सुनवाई गई। यहाँ एक शिकायत है विवरण यानि गायक कलाकार, संगीतकार और रचयिता के नाम एक ही बार बताए गए, और नाम भी कठिन थे इसीलिए सुनना कठिन हो गया। आराम से और हो सके तो दो बार नाम बता दे तो ठीक रहेगा। तीन क़व्वालियाँ सुनवाई गई -

पैसा ही रंग रूप है

हसीना तेरे माथे पे ये आँचल अच्छा लगता है

तु हो महबूब ख़ुदा के - यहाँ शायद गायक कलाकार शिराज क़व्वाल और साथी है

बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम में रेणु (बंसल) जी की राधिका नायर से बातचीत प्रसारित हुई। राधिका जी पालतू जानवरों की सहायता से मंद बुद्धि बच्चों, मानसिक रोगी बड़ों-बुज़ुर्गों का इलाज करती है। बताया गया कि कुत्तों की ज्यादा सहायता ली जाती है, बिल्ली की सहायता लेना कठिन है। इन जानवरों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है। पूरी बातचीत सुनने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इलाज कैसे किया जाता है। बताया यह गया कि याददाश्त कमज़ोर होने पर कुत्ता साथ रखा जाता है जिससे रोगी कुत्ते से बात करता है लेकिन इससे याददाश्त ठीक होने में कैसे सहायता मिलती है, यह समझ में नहीं आया।

राग-अनुराग कार्यक्रम में रविवार को विभिन्न रागों पर आधारित फ़िल्मी गीत सुनवाए जैसे -

राग सिन्धु भैरवी - प्यार से देखे जो कोई बहक बहक जाऊँ मैं (फ़िल्म - डार्क स्ट्रीट)

राग पीलू - सैया छोड़ दे बैय्या मोरी पतली कलैया मुड़ जाएगी

बहुत से राग - सोहनी, यमन, बहार, जौनपुरी पर आधारित स्वर्ण सुन्दरी फ़िल्म का यह गीत - कूँहू कूँहू बोले कोयलिया

गुरूवार को सुनवाए गए यह गीत -

राग दरबारी - फ़िल्म - आरज़ू - जब इश्क कहीं हो जाता है, तब ऐसी ही हालत होती है

राग बिलावल - फ़िल्म जिसने तेरा नाम लिया - मेरी अँखियों से दिल में तू आ रसिया

राग वृंदावनी सारंग - फ़िल्म महबूबा - गोरी तोरी पैंजनिया

राग-अनुराग एक ऐसा कार्यक्रम है जो सप्ताह में दो बार एक ही समय पर प्रसारित होता है। इस बारे में एक सुझाव है - कई बार पत्रावली कार्यक्रम से यह जानकारी मिली कि शाम 6:15 से 15 मिनट का कार्यक्रम सान्ध्य गीत प्रसारित होता है जिसमें फ़िल्मी भजन सुनवाए जाते है। यह कार्यक्रम हम क्षेत्रीय प्रसारण के कारण नहीं सुन पाते हो सकता है दूसरे शहरों में भी श्रोता नहीं सुन पाते हो। इस तरह हमें फ़िल्मी भजन बहुत ही कम सुनने को मिलते है। अगर राग-अनुराग सप्ताह में एक बार प्रसारित कर, एक दिन फ़िल्मी भजन सुनवाए जाए तो हमें भी इस कार्यक्रम का आनन्द मिलेगा।

8 बजे हवामहल में 2 अक्टूबर को यानी शुक्रवार को शिमला केंद्र की अच्छी प्रस्तुति थी। गुरूमीत रामल मीत का लिखा और निर्देशित लघु रूपक सुनवाया गया - महान आत्मा जिसमें गांधीजी के जीवन की झलक मिली, उनके धर्म, अहिंसा, विश्व बंधुत्व संबंधी विचार मिले साथ ही डा राधा कृष्णन्न के गांधी जी के संबंध में विचार भी जानने को मिले. पार्श्व में बापू का प्रिय भजन वैष्णव जन गूंजता रहा।

शनिवार को रोमेश शर्मा की लिखी झलकी सुनवाई गई - जूतों भरी कहानी जिसके निर्देशक है विजय दीपक छिब्बर। दुकान का मालिक और नौकर दोनों लड़कियों में गहरी रूचि रखते है, बहुत शौकीन भी है। चप्पलों के नाम भी लड़कियों और फ़िल्म कलाकारों पर रखे है - मीना, दिलीप… चप्पल दिखाते हुए लड़कियों का पैर भी पकड़ लेते है। एक ही पैर की चप्पल बेच देते है पर लड़की के बजाय उसकी माँ बड़बड़ाते हुए आती है और कहती लड़कियों को बार-बार बुलाने के लिए एक ही पैर की चप्पल बेचते हो… ऐसे ही चलता रहा नाटक…

रविवार की नाटिका अच्छी लगी। शबनम ख़य्यूम की लिखी - क्या मुसीबत है जिसके निर्देशक है गंगाप्रसाद माथुर। एक सही खरी बात के आस-पास हास्य बुना गया था, खरी बात है कि एक पढे-लिखे व्यक्ति के लिए चार कम पढे-लिखों के साथ रहना व्यावहारिक रूप से कठिन है। पति कहता है वो माँ ढूँढ रहा है पत्नी कहती है माँ भीतर के कमरे में है जबकि वह मैक्सिम गोर्की की पुस्तक माँ ढूँढ रहा है। हद तो तब हो जाती है जब वह शौख़त ख़ानवी की पुस्तक पगली ढूँढता है और पत्नी समझती है कि वह बेटी को पगली कह रहा है… वाकई क्या मुसीबत है यह अशिक्षित होना भी…

सोमवार को मज़ा नहीं आया। भोपाल केन्द्र की प्रस्तुति थी। प्रभा देवी दीक्षित की नाटिका - झगड़ा और निर्देशन मीनाक्षी मिश्र का। पति-पत्नी की नोक-झोक है। पत्नी ने बिल्ली पाल रखी है जो पति को पसन्द नहीं जिसके जवाब में पति ने कुत्ता पाला पर कुत्ता-बिल्ली दोनों में दोस्ती हो गई। उपदेश और हास्य दोनों एक साथ लेकर चलना कठिन है।

मंगलवार से धारावाहिक शुरू हुआ - एक क़दम आगे जिसकी लेखिका है विभा देवसरे और निर्देशक है कमल दत्त। वैसे कमल दत जी का नाम हो तो बात कुछ ख़ास ही होती है। यह धारावाहिक भी ख़ास है। पहली ही कडी से अच्छा लगने लगा। हमारे समाज में बेटी और बेटे के बीच होने वाले भेदभाव को विषय बनाया गया है। एक परिवार में लडकियाँ है - मीना और रीना जो पढाई के अलावा अन्य प्रतियोगिताओं की भी तैयारी करती है पर पिता को शिकायत है कि बेटा नहीं है जिसे पडोसी वर्माजी और बढावा देते है। पडौसी का लडका है गणेश जिसका मन न पढाई में लगता है और न खेल-कूद में। पिता से तेज़ आवाज़ में बात करता है तो कुछ नहीं पर जब लडकियों से कहा जाता है कि लडकी की तरह घर के काम करे तब लडकी का केवल यह कहना कि वह लडकी है तो इसमें उसका क्या दोष, अखर जाता है। हालांकि जब खेल-खेल में गेंद झाडियों में चली जाती है और वहाँ साँप नज़र आता है तब लडकी ही साहस दिखा कर साँप को लकडी से पीट कर भगाने की कोशिश करती है पर लडका डर जाता है।

बुधवार की कड़ी और भी अच्छी लगी। पेन्टिंग प्रतियोगिता में मीना और ग़णेश दोनों भाग लेते है। मीना को नग़द पुरस्कार मिलने से उन पैसों से बिजली का बिल चुक जाता है इस तरह गणेश के पिता वर्माजी से उधार लेने से अपने परिवार को वह बचा लेती है। गुरूवार को कहानी एक और कदम आगे बढी। रीना होनवार है और उसकी प्रिंसिपल चाहती है कि वह कैंप जाए जिससे उसकी प्रतिभा में और निखार आए पर दकियानूस पिता परम्पराओं की दुहाई देकर लड़की को बाहर कुछ दिन के लिए भेजने को तैयार नहीं उसके बाद वह शहर से बाहर चला जाता है ऐसे में बरसाती रात में वर्माजी की तबियत ख़राब होने पर उनका बेटा ग़णेश तो डर जाता है पर यह लड़कियाँ ही साहस कर डाक्टर को बुला लाती है। धारावाहिक जारी है…

वैसे यह हमारे समाज की सच्ची तस्वीर है। दिल्ली केन्द्र की बढिया प्रस्तुति।

हवामहल के बाद 8:15 से क्षेत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाते है फिर हम 9 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुडते है।

Tuesday, October 6, 2009

मेरा नाम है सुल्ताना

उषा मंगेशकर ने वैसे भी गीत कम ही गाए है और उनमें भी दो-चार ही लोकप्रिय है। जय संतोषी माँ फ़िल्म के भक्ति गीतों ख़ासकर आरती के अलावा एक ग़ज़ल भी लोकप्रिय हुई जो शायद दीदार-ए-यार फ़िल्म से है और यह एक गीत तराना फ़िल्म से जिसकी चर्चा अब की जा रही है।

फ़िल्म तराना राजश्री प्रोडक्शनस के बैनर तले वर्ष 1980 के आस-पास रिलीज़ हुई थी। उषा मंगेशकर का गाया यह गीत रंजीता पर फ़िल्माया गया जो नायिका है और नायक है मिथुन चक्रवर्ती। यह गीत बहुत लोकप्रिय है। रेडियो के लगभग सभी केन्द्रों से बहुत सुनवाया जाता था। अब बहुत समय से नहीं सुना।

गीत का केवल मुखड़ा याद आ रहा है -

सुल्ताना सुल्ताना मेरा नाम है सुल्ताना
मेरे हुस्न का हर अंदाज़ मस्ताना

मैं परी की रानी मेरी चढती जवानी
जो भी देखे हो जाए दीवाना
सुल्ताना

यह उन गीतों में से है जिन्हें सुन कर मस्ती का माहौल बनता है।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Saturday, October 3, 2009

विविध भारती को सालगिरह मुबारक

मुझसे दो साल बड़ी विविध भारती की आज साल गिरह है । श्रोताओं और मुरीदों की ओर से विविध भारती परिवार को हार्दिक शुभ कामना |चिट्ठालोक और विविध भारती की सम्पर्क कड़ी युनुस ख़ान को विशेष शुभ कामना । तकनीकी रूप से विविध भारती तरक्की करे । कम-से-कम उसके एफ़ एम स्टेशनों से स्टीरियो-प्रभाव वाला प्रसारण हो ।
इस अवसर पर प्रस्तुत हैं मोहम्मद रफ़ी के ऐसे गीत जिन्हें विविध भारती ने सदाबहार बनाया है ।

Friday, October 2, 2009

दोपहर बाद के ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 1-10-09

कभी-कभी बडी कोफ़्त होती है यह सुनकर कि विविध भारती मनोरंजन सेवा है। ख़ासकर दोपहर बाद के प्रसारण पर जब हम नज़र डालते है तब लगता है यहाँ मनोरंजन कम महत्वपूर्ण हो जाता है। इस समय के कार्यक्रमों में विभिन्न जानकारियां मिलती है और विशिष्ट योग्यताओं से परिचय होता है।

दोपहर में 2:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम की समाप्ति के बाद आधे घण्टे के लिए क्षेत्रीय प्रसारण होता है जिसके बाद केन्द्रीय सेवा के दोपहर बाद के प्रसारण के लिए हम 3 बजे से जुड़ते है।

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को हैलो सहेली कार्यक्रम में फोन पर सखियों से बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य भागों से सखियों ने बात की। कस्बों, ज़िलों, गाँव से फोन आए। छात्राओं ने बात की अपनी पढाई के बारे में बताया और कुछ कम शिक्षित घरेलु महिलाओं ने भी बात की। बातचीत से पता चला कि गांव से बस में बैठ कर दूर तक लडकिया पढने जाती है। एक महिला ने खुलकर घरेलु बातचीत की कि पति काम नहीं करते और वो ही घर देखती है। ज्यादातर सखियों ने अपना शौक सिलाई-कढाई ही बताया। नए-पुराने मिले जुले गीतों की फ़रमाइश हुई जैसे दिलवाले फ़िल्म का गीत। एक सखि के अनुरोध पर पुराना प्रदीप का गाया गीत सुनवाया गया -

पिंजरे के पंछी रे

कम सुना जाने वाला गीत आदमी खिलौना है फ़िल्म से सुनवाय गया। इस तरह पता चला कि हमारे देश में सखियां किन परिस्थितियों में रह रही है। दूरदराज में क्या-क्या सुविधाएँ है आदि बातों की जानकारी घर बैठे ही मिली। बातचीत इतनी सहज स्वाभाविक बातचीत रही कि लगा आमने-सामने बैठ कर बात कर रहे है। इस कार्यक्रम को तेजेश्री शेट्टी जी के तकनीकी सहयोग और माधुरी (केलकर) जी के सहयोग से वीणा (राय सिंहानी) जी ने प्रस्तुत किया।

सोमवार को पधारे रेणु (बंसल) जी और निम्मी (मिश्रा) जी. शुरूवात में राम सीता लक्ष्मण के बारे में बताया. काव्य की पंक्तियां भी कही गई. फिर सुनवा दी यह प्रार्थना -

तुम आशा विश्वास हमारे

बड़ा अजीब लगा सखियों का यह अनुरोध. अरे भई धार्मिक पर्व धार्मिक श्रद्धा से मनाओ, कोई भक्ति गीत का अनुरोध कर सकते है. फिर लता जी को उनके जन्मदिन पर बधाई देते हुए उनका एक गीत सखियों के अनुरोध पर सुनवाया गया. एक श्रोता सखी का पत्र जिसने बताया विविध भारती बरसों से सुन रही है. कार्यक्रमों की तारीफ़ की और लता जी की काव्यात्मन तारीफ़ की और उनकी पसंद पर लता जी का एक और गीत सुनवा दिया गया. फिर सिलसिला चल पड़ा सखियों के अनुरोध पर लता जी के गीत सुनवाते हुए उनके बारे में बताते जाना। पूरा कर्यक्रम संगीत रूपक की तरह लगा जिसका आलेख और प्रस्तुति कमलेश (पाठक) जी की थी।

मंगलवार को पधारी सखियां मंजू द्विवेदी और सुनीता। शुरू में उन सखियों के नाम बताए जिनसे दशहरा की शुभकामनाओं के पत्र प्राप्त हुए। फिर बताया कि दीपावली आना यानि बरसात का समाप्त होना इसीलिए साफ़-सफ़ाई आवश्यक है।सही बात बता दी कि भारतीय त्यौहारों में जो भी किया जाता है वो सब जीवन से जुड़ा है जैसे विभिन्न मौसमी खान-पान, साफ़-सफ़ाई, मनोरंजन आदि। श्रोता सखि के पत्र के आधार पर सिनेमा में करिअर बनाने की जानकारी दी गई जैसा कि हर मंगलवार को करिअर की बात होती है। पत्र के आधार पर यह भी बताया कि करिअर के लिए एक साथ अधिक कोर्स भी करने पडते है। इस दिन हमेशा की तरह सखियो के अनुरोध पर गाने नए ही सुनवाए गए जैसे फ़िल्म जोधा अकबर और यह गीत -

ये इश्क हाय बैठे बिठाए जन्नत दिखाए

बुधवार को सखियाँ पधारीं - शहनाज़ (अख़्तरी) जी और सुधा जी। इस दिन स्वास्थ्य और सौन्दर्य संबंधी सलाह दी जाती है, नुस्ख़े बताए जाते है। इस दिन पुरानी अच्छी जानकारी दी गई, बताया गया - इज़राइल का मड पैक बहुत लाभदायक होता था जिसका उपयोग सौन्दर्य साम्राज्ञी क्लियोपेट्रा भी किया करती थी। इसी तरह लाभदायक घरेलु प्रसाधन सामग्री में कैसेलिया तेल, मिस्त्र का बकरी का दूध, बालों के लिए चीन की हरी पत्तियों की चाय शामिल है। इसके अलावा कई बार पढे-सुने गए नुस्के जैसे बेसन, मूँग की दाल, शहद आदि से फेस पैक बनाना बताया गया। इस दिन सखियों के अनुरोध पर कुछ पुराने लेकिन बहुत अच्छे गीत सुनवाए गए जैसे सफ़र, जुर्म, आनन्द फ़िल्म का यह गीत -

मैनें तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने

गुरूवार को भी पधारीं - शहनाज़ (अख़्तरी) जी और सुधा जी। इस दिन सबसे पहले ताज़ा ख़बर सुनाई - मन्नाडे जी को सर्व प्रतिष्ठित पुरस्कार दादा साहेब फ़ालके पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की सूचना देकर और उनके इस गीत से शुरूवात की जो सखियों की पसन्द से चुना गया -

यह रात भीगी-भीगी

इस दिन सफल महिलाओं के बारे में बताया जाता है। इस बार नोबुल पुरस्कार प्राप्त बरथा वाट सेटलर के बारे में बताया गया जो उपन्यासकार थी जिसने अपने साहित्य से शान्ति के प्रयास किए। उनके पूरे साहित्य के बारे में बताया गया। इस दिन नए पुराने गीत सुनवाए गए। अनुपमा फ़िल्म से -

धीरे-धीरे मचल ए दिले बेवफ़ा कोई आता है

नई फ़िल्म दिल से का गीत सुनवाया गया

इस कार्यक्रम की दो परिचय धुनें सुनवाई गई - एक तो रोज़ सुनी और एक विशेष धुन हैलो सहेली की शुक्रवार को सुनी।

सदाबहार नग़में कार्यक्रम में शनिवार को अभिनेता देवआनन्द को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हुए उनकी ही फ़िल्मों के सदाबहार गीत सुनवाए गए। अलग-अलग मूड के अच्छे गीत चुने गए जैसे फ़न्टूश फ़िल्म से यह गीत -

दुःखी मन मेरे सुन मेरा कहना

हम दोनों फ़िल्म का प्रेरणादायक गीत - मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया

प्रेमपुजारी फ़िल्म का रोमांटिक गीत - फूलो के दल से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज़ पाटी

जब प्यार किसी से होता है, नौ दो ग्यारह, गैम्बलर, गाईड फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

और रविवार को इस कार्यक्रम में गायक और संगीतकार हेमन्त कुमार की पुण्य तिथि पर उनके सदाबहार गीत सुनवाए गए। विभिन्न मूड के गीत शामिल थे -

गंगा आए कहां से गंगा जाए कहां रे

तुम्हें जो भी देख लेगा किसी का न हो सकेगा

ख़ामोशी, ब्लफ़ मास्टर, दूर का राही, बीस साल बाद फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए।

3:30 बजे नाट्य तरंग में शनिवार और रविवार को सामाजिक नाटक सुनवाया गया - हम तो भई सच बोलते है। इस मराठी मंच नाटक का हिन्दी रेडियो नाट्य रूपान्तर किया पुरूषोत्तम दारवेकर जी ने और जिसके निर्देशक है लोकेन्द्र शर्मा जी। मूल रूप से इस नाटक को लिखा है श्याम फ़ड़के ने। इसमें यह बताया गया है कि हम तो हमेशा सच बोलने वाले क्या वाकई सच बोलते है। 5000 की एक मोती की माला, पति-पत्नी और एक महिला, बस घूम रहा है नाटक। स्थिति को स्पष्ट करने के बजाय जैसे-तैसे निपटाना चाहते है। जीवन के एकदम करीब लगा नाटक।

शाम 4 से 5 बजे तक सुनवाया जाता है पिटारा कार्यक्रम जिसकी अपनी परिचय धुन है.

शुक्रवार को सुना कार्यक्रम पिटारे में पिटारा जिसमें वादक कलाकार जयन्तीलाल गोशर से रेणु जी की बातचीत सुनवाई गई। एक अच्छे कार्यक्रम को दुबारा सुनना अच्छा लगा। जैसा कि कार्यक्रम के शीर्षक से ही पता चलता है कि इसमें पिटारा में प्रसारित कार्यक्रमों में से चुनिंदा कार्यक्रमों को यहाँ दुबारा सुनवाय जाता है। बातचीत से पता चला कि जयन्तीलाल जी बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार है और बाँसुरी से शुरू कर विभिन्न नए पुराने वाद्य जैसे बाँसुरी, मैन्डोलिन, रवाब, गिटार बहुत सरसता से बजाते है इसीलिए जिन फ़िल्मी गीतों में उन्होनें बजाया वो गीत भी लोकप्रिय है -

मैन्डोलिन पर गीत - तुझे देखा तो ये जाना सनम

रवाब पर - चप्पा चप्पा चरखा चले

बताया कि विभिन्न वाद्य सीख लेते है जैसे संगीतकार उत्तम सिंह के कहने पर रवाब बजाना सीखा। सुनकर लगा कि इस कलाकार में संगीत की गहराइयों में उतरने की कितनी ललक है, हालांकि बचपन से पिताजी आकाशवाणी के कलाकार होने से संगीत का माहौल तो रहा पर इस क्षेत्र में आगे बढने के लिए प्रोत्साहन नहीं मिला। इन रागों के अलग-अलग तारों की भी जानकारी दी। साथ ही सामान्य जानकारी भी मिली कि गायक जगजीत सिंह ने संगीत की दृष्टि से ग़ज़ल गायन में कई प्रयोग लिए। पुरानी फ़िल्म नागिन की लोकप्रिय धुन वास्तव में बीन नहीं है बल्कि संगीतकार कल्याण जी द्वारा सफ़ाई से बजाया गया क्ले वायलन है। एक बडी अच्छी बात बताई कि म्यूज़िक कंपोज़र और म्यूज़िक डायरेक्टर में अंतर है - कंपोज़र गाना कंपोज़ करता है जबकि डायरेक्टर फ़िल्म में सिचुएशन के अनुसार गाना तैयार करता है। पहले जब गानों के लिए संगीतकार और संगीत निर्देशक दो अलग शब्द कहे जाते थे तो मात्र इन्हें दो पर्याय शब्द ही समझा जाता था, अब हम भेद समझने लगेंगे।

जैसा कि अनुमान लगाया जा सकता है इस संगीतमय कार्यक्रम को वीणा राय सिंहानी जी के सहयोग से काँचन (प्रकाश संगीत) जी ने प्रस्तुत किया।

रविवार को यूथ एक्सप्रेस लेकर आए युनूस खान जी. शुरूवात में पूना फिल्म संस्थान के बलराम जी से बात की. अच्छी विस्तृत जानकारी मिली कि विभिन्न पाठ्यक्रम है पर केवल प्रवेश लेने से ही करिअर नहीं बनता, मेहनत करनी पढती है. वहां के ओमपुरी जैसे दिग्गजों के नाम लिए. एक ई-मेल के आधार पर ईंनजिनियरिंग में प्रवेश की तैयारी के बारे में बताया. सबसे बड़ी बात रैगिंग के बारे बताया और शिकायत के लिए हेल्पलाइन भी बताई. घडियों के बारे में जानकारी अच्छी लगी ख़ासकर पुरानी विभिन्न घडियों के बारे में. किताबों की दुनिया स्तम्भ में श्रोता के पत्र के अनुसार रविन्द्रनाथ टैगोर की चुनी हुई कहानियों पर वार्ता सुनवाई गई।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में स्तन कैंसर विषय पर टाटा मेमोरियल अस्पताल और शोध संस्थान के निदेशक डा आर ए बडवे से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत सुनवाई गई. बहुत अच्छी और विस्तृत जानकारी रही। बताया कि इलाज से कैंसर ठीक हो सकता है। पाँच साल तक दवाई लेनी है और बहुत अधिक ख़र्च भी नहीं है। 22-27 साल की उमर तक बच्चों का जन्म हो जाने कैंसर का खतरा नहीं रहता है। गाँव की महिलाओं में कम और शहर की महिलाओं में इस रोग का ख़तरा अधिक रहता है। इस रोग के लक्षण विभिन्न स्तर भी समझा कर बताए गए। इसे स्वाति (भंडारकर) जी के सहयोग से कमलेश (पाठक) जी ने प्रस्तुत किया।

बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में अभिनेता जैकी श्रौफ़ से युनूस (खान) जी की बातचीत की पहली कड़ी प्रसारित हुई। पूरी बातचीत अच्छी रही जिसमें आरंभिक संघर्ष की बात बताई गई जिसमें माडलिंग जैसे काम भी किए गए। अनिल कपूर के साथ बहुत काम करने और अपने मधुर संबंधों की बात बताई। सुभाष घई के साथ अपने संबंध पर भी खुल कर बताया। यह सुन कर अजीब लगा कि विलन बनने आए थे और हीरो बन गए क्योंकि आमतौर पर इसका उल्टा होता है। हीरो, राम-लखन फ़िल्मों के गीत सुनवाए। अच्छी रही पहली कड़ी।

हैलो फ़रमाइश कार्यक्रम में शनिवार को श्रोताओं से फोन पर बात की निम्मी (मिश्रा) जी ने. अलग अलग तरह के श्रोता थे जैसे कोई पढ़ता है तो कोई मिल में काम करता है. बातचीत से जानकारी भी अच्छी मिली जैसे उस्मानाबाद के श्रोता ने बताया की वहां माता के मंदिर में नवरात्र का मेला लगा है. सूरत और अन्य स्थानों से फोन आए. कुछ नई फ़िल्में और कुछ बीच के समय की फ़िल्में जैसे निकाह के इस गीत का अनुरोध किया। पुराने गीत भी अनुरोध पर सुनना अच्छा लगा जैसे -

गोरी चलो न हंस की चाल ज़माना दुश्मन है।

और समापन किया जय संतोषी माँ की आरती से -

मैं तो आरती उतारूँ रे संतोषी माता की

मंगलवार को फोन पर श्रोताओं से बातचीत की अमरकान्त (दुबे) जी ने। नए गानों की भरमार थी। एकाध गीत तो बहुत ही धूम-धाम वाले थे। कयामत, किसना का शीर्षक गीत और यह गीत भी शामिल था -

यह तो सच है के भगवान है

बातचीत श्रोताओं से थोड़ा कम ही हुई। एक महिला ने तो बहुत ही कम बात की। छात्राओं ने बताया अपनी पढाई के बारे में। एक ख़ास बात, अमरकान्त जी को छोटे-छोटे बच्चे कुछ ज्यादा ही फोन करते है, जाने क्या राज़ है…

और गुरूवार को श्रोताओं से फोन पर बातचीत की राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने. इस दिन बातचीत अधिक खुल कर की श्रोताओं ने. अपनी खेती के काम के बारे में बताया तो एक श्रोता ने कहा कि वह विभिन्न अवसरों पर जैसे शिक्षक दिवस, फादर्स डे पर कार्यक्रम आयोजित करते है. एक महिला ने पुराने गीत का अनुरोध कर उसे गुनगुना कर सुनाया. इस दिन गानों में दशहरा और दीपावली दोनों का आनंद मिला. दोनों की बात करते हुए श्रोताओं के अनुरोध पर सुनवाया गया सरगम फिल्म से यह गीत -

रामजी की निकली सवारी

और शिरडी के साईंबाबा फिल्म का यह गीत -

दीपावली मनाई

इस कार्यक्रम को तेजेश्री शेट्टे जी के सहयोग से महादेव (चांडोल) जी ने प्रस्तुत किया.

हैलो सहेली और हैलो फरमाइश के तीनो दिन के प्रसारण के अंत में रिकार्डिंग का दिन और फोन नंबर बताए गए.

हैलो फ़रमाइश, यूथ एक्सप्रेस और आज के मेहमान कार्यक्रमों की अपनी परिचय धुन भी बजाई जाती है जो अच्छी है।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद सप्ताह भर फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम में नई फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए। हर दिन कार्यक्रम हंगामेदार रहा। नई फ़िल्में जैसे डू नाट डिस्टर्ब और वान्टेड के विज्ञापन सुन कर पुराने दिन याद आ गए। माहौल में हंगामा मचाने वाले गीत सुनवाए गए जैसे शुक्रवार को -

बिल्लो रानी

मकड़ी फ़िल्म का गीत भी शामिल था

शनिवार को शामिल फ़िल्मों में थी जिंदादिलि तो रविवार को सुनवाया गया -

देखो 2000 ज़माना आ गया

इसके अलावा कर्ज, आंखो में सपने लिए जैसी फिल्में भी शामिल रही. सोमवार को लक, गोलमाल रिटर्न जैसी फ़िल्में शामिल रही। मंगलवार को पिछले समय की फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए जैसे विरासत, नील एण्ड निक्की, रब ने बना दी जोड़ी का यह शीर्षक गीत -

तुझ में रब दिखता है यारा मैं क्या करूँ

बुधवार को सुनवाए गए नए फ़िल्मी गीतों में कच्ची सड़क, तक्षक जैसी फ़िल्में शामिल रही और गुरूवार को द टू मैं मर्डर और तुम सा नहीं देखा फिल्में शामिल थी।

फ़िल्मी हंगामा के बाद 5:30 से क्षेत्रीय प्रसारण शुरू हो जाता है फिर हम 7 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है।

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