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Saturday, January 30, 2010

विविध भारती कार्यक्रमोंमें हाल किये गये परिवर्तन राष्ट्रीय और सुरत के स्थानिक

विविध भारतीके कार्यक्रमोंमें 1 जनवरीसे परिवर्तन किये गये है वो ज्यादातर तो समय के साथ श्रोताओं की मांग के अनुसार है और कुछ पुराने कार्यक्रमों की वापसी है । हिट सुपर हिट कार्यक्रम जैसे अन्नपूर्णाजीने बताया था, आज के फनकार कार्यक्रम का थोड़ा सा बदला हुआ स्वरूप है, जिसमें ज्यादा पुराने कलाकारों को स्थान शायद नहीं है । पर जो श्रोता अनुरंजनी के समय निजी चेनल्स के प्रति मूड़ जाते थे उनको पकड के रख़ने की कोशिश है । हा, अनुरन्जनी बंद होने के कारण कई श्रोतालोगो को आपत्ती भी हो सकती है, जिन लोगोने शाम के 6.30 के इस कार्यक्रम के समय को ख़त लिख़ लिख़ कर बदलवाया था । आजके फनकार भी ज्यादा तर पूरानी किस्तें है या कहीं थोडे से पुन:सम्पादीत है । लगता है कि आज के फनकार और एक ही फिल्म से की समय समय पर अदलाबदली होती रहेगी ।
बाईस्कोप की बातें अब पिटारेके अंदरके छोटे पिटारे से निकल कर फ़िरसे बड़े पिटारे का साप्ताहीक हिस्सा बन गया है । पर सब जानते है, कि ये सब किस्तें श्री लोकेन्द्र शर्माजी की निवृती के पहेले के ही है, तो इसमें मेरी राय इसे सम्पूर्ण रूपसे गलत बताना नहीं है, पर इस कार्यक्रम के निर्माण विभागको फिरसे गठीत करने की जरूरत है और पूरानी पर इस कार्यक्रम के लिये नयी फिल्मों को लेकर नयी किस्ते तैयार करने की शीघ्र आवस्यक्ता है और ऐसा अगर नहीं किया गया तो इस कार्यक्रम की अवधी एक साल से ज्यादा नहीं होगी ऐसा लगता है ।
पूरी फिल्मी धूनों के अलग कार्यक्रमकी कमी बार बार लिख़ने पर भी पूरी नहीं हो रह्री है, जहाँ तक विविध भारतीके रेडियोके एफ एम और मिडीयम वेव नेटवर्क प्रसारण का सवाल है, यह बात अख़रती है और निराशा पेदा कर रही है । और आज कल अंतरालमें तथा डीटीएच पर शाम करीब 6.08 पर होने वाले प्रसारण का सवाल है तो सिर्फ वाय एस मूल्की की एकोर्डियन पर मेग्निफीसन्ट मेलोडीझ और वी बालसारा की पियानो-एकोर्डियन और युनिवोक्ष पर प्रस्तूत एलपीझ ही बजती रहती है । या वान शिप्ले की उनकी सक्रियता के अंतिम दौर की एपपी या कभी ब्रियान सिलाझ की पियानो पर सीडी पर ही बात पूरी हो जाती है । एनोक डेनिलेल्सके पियानो-एकोर्डियन तथा वाद्यवृन्द को कुछ गिनेचुने अपवाद को छोड कर बजाया ही नहीं जाता, करीब 8-10 महिनों से \
रात्री 7.45 के तथा सुबह 9.30 के किसी भी प्रसारण को क्रमानूसार दूसरे दिन 9.15 पर और रात्री 9.30 पर पुन: प्रसारण कि आवश्यक्ता ज्यादातर स्थानिय विविध भारती के विज्ञापन प्रसारण सेवा के केन्दों के तेढेपन के कारण ही है । जैसे विविध भारतीका सुरत केन्द्र सुबह 10 के बजाय 9.30 पर ही अपना प्रसारण स्थानिय कर देता है, जिसका कारण यह बताया जाता है, कि उस समय स्थानिय रोज़ाना फोन इन कार्यक्रम प्राईम टाईममें रख़ने से विज्ञापन कार ज्यादा मिलते है , जब कि हक़ीकत यह है कि इनमें से ज्यादातर विज्ञापन या एक या दो प्राजोजित कार्यक्रम सरकारी विभागो के ही होते है । और यह भी सुबह 11 बजे सोमवार से शुक्रवार तक प्रसारण एक घंटे के लिये बंध करके किया जाता है ।
यहा सुरतमें पहेले फोन-इन कार्यक्रम सुबह 9.15 से 10 बजे के अलावा 10.05 से 11.00 बजे तक होते थे, उनको बदल कर 10.05 से 10.30 तक पहेले से ही मिले एसएमएस आधारित फरमाईशे प्रसारित कि जाती है । जो राजस्व पानेका एक नया ज़रिया है । पर उसके बाद सोमवार से गुरूवार महिलाओं केर लिये विशेष कार्यक्रम होते है जिनका स्वरूप प्राईमरी चेनल्स पर आनेवाले माहिलाओं के कार्यक्रमों जैसा ही होता है, बिचमें बजने वाले कुछ फिल्मी गीतों को छोड़ कर । इसमें समाजसेवी महिलालोगोकी मुलाक़ात की बात होती है वहाँ तक तो ठीक है पर व्यवसायी महिलालोगो को बुलाकर उनके साहस के नाम और उनके पूरे नहीं तो पूरे के नज़दीक पते भी प्रसारित होते है, तो यह तो कैसी अफलातून सुविधा हुई, कि पुरस्कार पाओ और अपने व्यवसाय का भी प्रचार करो ! एक एक कार्यक्रम गुजराती वार्ताकार और कविलोगो को दिये गये है अपनी रचनाएं प्रस्तूत करने के लिये, पर यह रचनाएं तरोताझा होती है या नहीं वह तो बहोत बहोत सहित्य पढने वाले ही बता सकते है, जो मैं नहीं हूँ ।
अभी नवसारीमें गुजराती साहित्य परिसद का अधिवेसन पिछले माह को हुआ था तो उसकी गतिविधी को लेकर उनके संचालकोकी कई मुलाकाते प्रसारित कि गयी । जो वास्तवमें प्राईमरी चेनल्स के लिये ज्यादा उपयूक्त हो सकती है । पर एक सवाल यह भी मनमें उठा है कि यह प्रसंग तो पूरे राज्य के लिये खास है तो वि.प्र.सुरत के इस निर्माण को राज्यके अहमदावाद, बडोदरा, राजकोट और भूजने सहप्रसारित या बादमें अपने समय पर प्रसारित किया क्या ?

मैंनें पूरानी पोस्टोमें कुछ बार लिख़ा है, कि विविध भारती की लोकप्रियतामें रूकावटे खूद आकाशवाणी के केन्द्रीय बिक्री एकांश (सेंट्रल सेल्स युनिट) तथा राज्यों के राज़धानीयोके या मूख़्य शहरों के विविध भारतीके विज्ञापन प्रसारण केन्द्रों तथा कुछ हद तक स्थानिय केन्द्रों खुद ही है, और इसका आज श्रेष्ठ उदाहरण एस एम एस के बहाने वीबीएस के तराने के दौरान प्रसारित होने वाले सरकारी प्रायोजित कार्यक्रम है, जिसमें ख़ास बात यह भी है, कि केन्द्रीय विविध भारती सेवाका प्रासारण जहाँ तक रेडियोका सवाल है, लघू-तरंग पर नहीं हो कर सिर्फ़ स्थानिय मध्यम तरंग और एफ एम पर ही होता है । डीटीएच मोबाईलमें नहीं चलता है । और इस दौरान श्रोता लोग निजी चेनल्स पर जाकर आते है । तो इससे एक बात साफ़ होती है कि क्षेत्रीय भाषाओं के राज्यव्यापी अलग एफ एम नेटवर्क की जारूरत है है और है ही । सरकार और आकाशवाणी स्थानिय केन्दों के रोल के बारेमें कुछ भी कहे आम श्रोताके मनमें ये स्थानिय केन्द्रों सर्वप्रथम विविध भारती सहप्रसारण-केन्द्रों ही है ।
पियुष महेता।
नानपूरा, सुरत ।

Friday, January 29, 2010

शाम बाद के पारम्परिक कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 28-1-10

शाम 5:30 बजे फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम की समाप्ति के बाद क्षेत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाते है, फिर हम शाम बाद के प्रसारण के लिए 7 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है।

इस सप्ताह एक ख़ास दिन रहा - गणतंत्र दिवस, इस दिन और इसकी पूर्व संध्या पर दोनों ही प्रसारणों में मिलाजुला माहौल रहा। देश भक्ति के साथ अन्य स्वर भी गूंजे।

7 बजे सोमवार को छोड़ कर हर दिन दिल्ली से प्रसारित समाचारों के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद शुरू हुआ फ़ौजी भाईयों की फ़रमाइश पर सुनवाए जाने वाले फ़िल्मी गीतों का जाना-पहचाना सबसे पुराना कार्यक्रम जयमाला। अंतर केवल इतना है कि पहले फ़ौजी भाई पत्र लिख कर गाने की फ़रमाइश करते थे आजकल एस एम एस भेजते है। कार्यक्रम शुरू होने से पहले धुन बजाई गई ताकि विभिन्न क्षेत्रीय केन्द्र विज्ञापन प्रसारित कर सकें। फिर जयमाला की ज़ोरदार संकेत (विजय) धुन बजी जो कार्यक्रम की समाप्ति पर भी बजी। संकेत धुन के बाद शुरू हुआ गीतों का सिलसिला।

फ़ौजी भाइयों की फ़रमाइश में से मिले-जुले गीत चुने गए। नए गीत जिनमे आजकल के गीत और कुछ समय पुराने गीत, साथ ही पुराने गीत भी सुनवाए गए। देशभक्ति गीत भी शामिल थे, प्यार के नगमे भी गूंजे और अन्य गीत भी सुनवाए गए। संदेशो में से अच्छा चुनाव।

शुक्रवार को एल ओ सी कारगिल फ़िल्म का देशभक्ति गीत सुनवाया गया। कुछ कुछ होता है, कहो न प्यार है, जब वी मेट, राजा हिन्दुस्तानी के नए गीतों के बीच जानी मेरा नाम फिल्म का यह पुराना गीत भी गूंजा -

पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले

रविवार को रेडियो के गीत से शुरूवात की, अच्छा लगा हिमेश रेशमिया का यह गीत -

मन का रेडियो बजने दे ज़रा

विवाह, फिर हेरा फेरी, राजा हिन्दुस्तानी, अनाडी फ़िल्मों के गीत भी शामिल थे। सोमवार को 7 बजे समाचार बुलेटिन नही सुनवाया गया और 7 बजे से ही गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति महोदया का सन्देश सुनवाया गया - पहले हिन्दी में फिर अंग्रेजी में जो 40 मिनट तक जारी रहा। इसके बाद नई फिल्मो से देशभक्ति गीत सुनवाए गए जो गैर फरमाइशी थे -

ये जो देश है तेरा स्वदेश है मेरा

मेरा मुल्क मेरा देश मेरा ये चमन

वीर जारा का गीत और रोजा का गीत - भारत हमको जान से प्यारा है - पर आगे बहुत देर तक इस गीत के बजाय दिल है छोटा सा गीत की धुन बजती रही। यह गाने 8:15 तक जारी रहे।

मंगलवार को 26 जनवरी थी, देशभक्ति गीत से शुरूवात हुई, बार्डर फ़िल्म से - संदेशे आते है गीत सुनवाया जिसके बाद एक और देश भक्ति गीत गूंजा नई फिल्म का -

सीमाएं बुलाए तुझे चलना है

इसके बाद अन्य भावो के साठ के दशक से शुरू कर हर दशक से एक गीत चुन कर सुनवाए इन फिल्मो से - खानदान, अभिमान, अनुरोध और नई फिल्म छुपा रूस्तम

बुधवार को सभी ऐसे रोमांटिक गीत सुनवाए गए जिनमे विरह, दुःख झलका। शुरूवात हुई निकाह फिल्म के सलमा आगा के गाए इस गीत से -

दिल के अरमां आंसुओ में ढल गए

जिसके बाद मन, राजा हिन्दुस्तानी, सरस्वती चन्द्र और जनता हवलदार फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए। गुरूवार को बार्डर और करमा फिल्मो के दो देश भक्ति गीत शुरू में सुनवाए गए जिसके बाद निकाह, लोफर, कारन-अर्जुन फिल्मो से विविध भावो के गीत गूंजे।

अधिकतर गीत एक ही सन्देश पर सुनवाए गए। कार्यक्रम में अंतराल में गणतंत्र दिवस के अवसर पर मंगल ध्वनी सुनवाई गई जो अच्छी लगी।

शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया लता मंगेशकर ने। शुरूवात में युनूस (खान) जी ने औपचारिकता निभाते हुए लता जी का परिचय देने का प्रयास किया, शब्द भण्डार खोल दिया पर हम श्रोता तो, एक वाक्य पूरा नही हो पाया तभी समझ गए।

लता जी ने सहगल साहब को याद किया, हिन्दी में गैर फिल्मी गीतों के कम होने पर खेद जताया और आशा जी का मराठी गैर फिल्मी गीत सुनवाया। भारतीय सन्गीत की प्रशंसा की और सुबह और रजिया सुलतान फ़िल्म के गीत सुनवाए। नए गानों की भी तारीफ़ की कि तेज सन्गीत के साथ कही रिदम भी है और यह गीत सुनवाया -

फुटपाथों के हम है साथी

सबसे अच्छा लगा जब विदेशो में दिए गए कार्यक्रमों के अनुभव बताते हुए कहा कि खाड़ी देश में कार्यक्रम करते समय बताया गया था कि वही गीत चुने जिसमे उर्दू के शब्द हो पर वहाँ पंडित नरेंद्र शर्मा जी का लिखा गीत सत्यम शिवम् सुन्दरम बहुत पसंद किया गया। इस तरह हर विषय को उठाते हुए बढ़िया प्रस्तुति दी। वास्तव में विविध भारती ने संग्रहालय से नगीना उठा कर हमारे सामने रख दिया।

7:45 पर शुक्रवार को सुना लोकसंगीत कार्यक्रम। मराठी लोकगीत से शुरूवात हुई जिसे शाहिर सांवले साठे और साथियो ने गाया, बहुत मजेदार गीत रहा। इसके बाद चुनमय चटर्जी की आवाज़ में बांग्ला गीत सुना। इस बार चार गीत सुनवाए गए। सुरिंदर कौर की आवाज में सुना पंजाबी गीत और समापन किया गुजराती गीत से जिसे गाया जीवा भगत ने।

शनिवार को पत्रावली में पधारे निम्मी (मिश्रा) जी और कमल (शर्मा) जी। श्रोताओं ने बहुत सारे कार्यक्रमों की तारीफ़ की। ख़ास बात यह रही कि यह सूचना दी गई कि कार्यक्रमों में परिवर्तन हो रहे है और सोमवार को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या रही और राष्ट्रपति महोदया के संबोधन के बाद देशभक्ति गीतों के कारण पत्रावली का प्रसारण नही हुआ।

मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली भी गणतंत्र दिवस के रंग में रंगी थी। शुरूवात हुई आक्रमण फिल्म की क़व्वाली से -

पंजाबी गाएगे मराठी गाएगे बंगाली गाएगे गुजराती गाएगे
आज चलो हम सब मिल कर क़व्वाली गाएगे

जिसके बाद रंग बदला और सुनवाई गई यह क़व्वाली -

कोई मर जाए किसी पे कहाँ देखा है
छोडिए हमने भी जहां देखा है

बुधवार को इनसे मिलिए कार्यक्रम इस बार बहुत जानकारी पूर्ण रहा। फिल्म समीक्षक कोमल नाहटा जी से अमरकांत जी की बातचीत सुनवाई गई। यह बातचीत की दूसरी कड़ी थी। फिल्म ट्रेड यानी कारोबार से जुड़े नाहटा जी ने इस विषय पर खुल कर बात की। यहाँ तक की आजकल नायको द्वारा लिए जा रहे पारिश्रमिक पर भी बात की। फिल्म की लागत और छोटे बड़े शहरों में कारोबार, मल्टीप्लेक्स से कारोबार यानी फिल्म से होने वाली आय और पहले दिन फिल्म रिलीज होते ही सभी स्थानों से वहां की स्थिति का जायजा लेना और समीक्षा लिखना कि फिल्म चलेगी या नही। इस पूरे विषय को विस्तार से समेटा।
अचरज हुआ यह जानकर कि ऐसे व्यक्ति को भी पक्का नही पता कि फिल्मे शुक्रवार को ही क्यों रिलीज होती है। सभी की तरह अंदाजा ही लगा कि शनिवार रविवार छुट्टी होने से शुक्रवार को रिलीज होती होगी। बढ़िया बातचीत। प्रस्तुति कल्पना (शेट्टी) जी की रही।

गुरूवार और रविवार को दो दिन प्रसारित हुआ कार्यक्रम राग-अनुराग। रविवार को विभिन्न रागों की झलक लिए यह फ़िल्मी गीत सुनवाए गए -

राग सिन्धु भैरव - प्यार से देखे जो कोई (फिल्म डार्क स्ट्रीट)

राग पहाडी - मोहब्बत बड़े काम की चीज है (फिल्म त्रिशूल)

और यह बहुत ही कम सुना गीत राग देसी में - गले से लगा ले नजर झुक गई

गुरूवार को इन रागों पर आधारित यह गीत सुनवाए गए -

राग बागेश्री - कोई नही मेरा इस दुनिया में आशिया बर्बाद है (फिल्म दाग)

राग धानी - हमारी याद आएगी फिल्म का शीर्षक गीत

राग मालकौंस में बहुतही कम सुना जाने वाला स्वर्ण सुन्दरी फिल्म का नृत्य गीत - तुम तन तुम तन

राग बिलावल - ये दिल न होता बेचारा (ज्वैल थीफ)

एक ही कार्यक्रम दो बार प्रसारित हो रहा है जबकि केन्द्रीय सेवा के कई ऐसे कार्यक्रम है जिन्हें क्षेत्रीय कार्यक्रमों के कारण श्रोता सुन नही पाते है। हमारा अनुरोध है कि एक दिन कोई ऐसा ही कार्यक्रम और एक दिन राग-अनुराग का प्रसारण हो।

8 बजे का समय है हवामहल का जिसकी शुरूवात हुई गुदगुदाती धुन से जो बरसों से सुनते आ रहे है। यही धुन अंत में भी सुनवाई जाती है। शुक्रवार को सुनवाई गई झलकी - प्रश्न तो यही है जिसके लेखक है वृंदा मंजीत और निर्देशक है अजीमुद्दीन। परिवार में बहू चाहती है बुजुर्ग सास-ससुर वृद्धाश्रम चले जाए पर पति ऐसा नही चाहता। अंत में सास-ससुर का स्नेह और बच्चो द्वारा यह कह कर चौकाना कि भविष्य में उन्हें भी आश्रम में भेज देगे, बहू की आँखे खुल जाती है और वह अपने विचार बदल देती है। बहुत मार्मिक प्रस्तुति। यह भोपाल केन्द्र की प्रस्तुति थी।

शनिवार को रामनारायण बिसारिया कि लिखी झलकी सुनवाई गई - मौजीराम की बैठक जिसके निर्देशक है सुलतान सिंह। जयपुर केन्द्र की इस प्रस्तुति में बात चली वर्ग पहेली की। कई बातें होती रही। पहेली भर कर भेजी गई पर वही हुआ जिसका डर था, वर्ग पहेली आफिस के बॉस के पास पहुँच गई। कुछ ख़ास मजा तो नही आया, चलता है...

रविवार को बी एम आनंद की लिखी झलकी सुनी - मोटी मछली। एक स्टोर में सेल्समैन से मालिक कहता है ग्राहक को मछली समझो और फांसो। एक ग्राहक को मोटी मछली समझ कर फंसाने की कोशिश में कुछ भी हाथ नही लगता। इलाहाबाद केंद्र से यह जयदेव शर्मा कमल जी की प्रस्तुति रही। अच्छा मनोरंजन हुआ।

सोमवार को देश भक्ति गीतों के बाद हवामहल में सलाम बिन रज्जाक की लिखी और गंगाप्रसाद माथुर द्वारा निर्देशित नाटिका सुनी नाटक में नाटक। घर में नायिका नायक के साथ अनारकली नाटक की रिहर्सल करती है, सैनिक पिता आकर गुस्से का अबिनय करते है फिर नायक के प्यार के इजहार पर नायिका गुस्से का अभिनय करती है। इस तरह नाटक की रिहर्सल में नाटकीय अंदाज में प्यार हो गया। अच्छा मनोतंजन हुआ।

मंगलवार को राजकुमार दाग की लिखी झलकी सुनी - एक बार फिर जिसके निर्देशक है सुशील बैनर्जी। पति-पत्नी में नोकझोक फिर सपने में प्यार फिर नोकझोक फिर सपना टूटता है फिर शान्ति। दिल्ली केंद्र की यह प्रस्तुति रही।

सोमवार और मंगलवार दोनों ही दिन यानी गणतंत्र दिवस और पूर्व संध्या पर मनोरंजनात्मक झलकियाँ ही प्रसारित हुई। अच्छा होता अगर शुक्रवार को प्रसारित समस्या प्रधान झलकी इन दो में से किसी एक दिन सुनवाई जाती।

बुधवार को शंकर सुल्तानपुरी की लिखी झलकी सुनी - मकान खाली है जिसके निर्देशक है सतीश माथुर। लखनऊ केंद्र की इस प्रस्तुति में मकान खाली कराने की जद्दोजहद की हास्य स्थिति बताई गई।

गुरूवार को विदेशी कहानी का गंगाप्रसाद माथुर द्वारा किया गया रेडियो नाट्य रूपांतर सुनवाया गया - व्यथा जिसका निर्देशन भी उन्ही का रहा। विदेशी परिवेश की इस कहानी में कोचवान की व्यथा है। उसका बेटा मर गया पर उसे कोई हमदर्द नही मिला जिससे वह यह व्यथा सुना सके। अंत में घोड़े के लिए चारा जुटाना भी कठिन हो जाता ही तब घोड़े से ही दुःख बांटता है।

इस तरह हवामहल में विविधता रही। विभिन्न केन्द्रों की झलकियाँ सुनने से उन केन्द्रों की प्रतिभा का परिचय मिला। ज्यादातर कार्यक्रम के अनुरूप गुदगुदाने वाली झलकियाँ थी, समस्या प्रधान भी सुनवाई गई और देश की सीमा लांघ कर विदेशी साहित्य भी सुनने को मिला।

प्रसारण के दौरान संदेश भी प्रसारित किए गए, केन्द्रीय सेवा से दूरदर्शन पर दिखाई जाने वाली फिल्म की सूचना भी मिली और क्षेत्रीय केंद्र से पोलियो दवाई के वितरण की सूचना भी मिली।

इस प्रसारण को अजेन्द्र (जोशी) जी, रेणु (बंसल) जी, सविता (सिंह) जी, कमल (शर्मा) जी, अशोक जी ने शशांक (काटगरे) जी, राजीव (प्रधान) जी, सुभाष (कामले) जी, साइमन (परेरा) जी, विनायक (रेणके) जी के तकनीकी सहयोग से हम तक पहुँचाया और यह कार्यक्रम श्रोताओं तक ठीक से पहुँच रहा है, यह देखने (मानीटर करने) के लिए ड्यूटी रूम में ड्यूटी अधिकारी रही वसुंधरा (अय्यर) जी।

रात में हवामहल कार्यक्रम के बाद 8:15 से क्षेत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाते है फिर हम 9 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है।

Thursday, January 21, 2010

दोपहर बाद के जानकारीपूर्ण कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 21-1-10

दोपहर में 2:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम की समाप्ति के बाद आधे घण्टे के लिए क्षेत्रीय प्रसारण होता है जिसके बाद केन्द्रीय सेवा के दोपहर बाद के प्रसारण के लिए हम 3 बजे से जुड़ते है।

3 बजे सखि सहेली कार्यक्रम में शुक्रवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम हैलो सहेली। फोन पर सखियों से बातचीत की कांचन (प्रकाश सन्गीत) जी ने। कार्यक्रम का स्वरूप बदल गया है। यह विविध भारती के पुराने कार्यक्रम मंथन जैसा हो गया है। मंथन तो अब बंद हो चुका है। पर इसमे मंथन जैसी बात नही। इस बार का विषय रहा, क्यो तनाव ग्रस्त होती है नारी। पहले काल में अच्छी बात हुई कि पति के व्यसन जैसे शराब आदि की आदत से तनाव हो जाता है। अन्तिम काल भी अच्छा रहा जिसमे श्रोता सखी ने अपना अनुभव बताया कि कैसे पति के निधन के बाद उसने बच्चो का पालन पोषण किया। शेष अच्छा नही लगा। एक तो कांचन जी का बहुत बोलना अखर गया। वह कहती गई ऐसा करने से, वैसा करने से, ऐसा होने से तनाव होता है और श्रोता सखियाँ फोन पर हाँ हाँ कहती गई। एक प्रमुख मुद्दे पर बात ही नही हुई। इस आधुनिक जीवन में कई बार पतियों का किसी के साथ अफेयर चलता है और पत्निया तनाव में रहती है, कई बार ऐसा कुछ नही होता पर महिलाए अनावश्यक शक कर तनाव पाल लेती है। ऐसे तनाव कई बार आत्महत्या की कगार पर ले जाते है। हालांकि विभिन्न स्तर की महिलाओं ने बात की। घरेलु, छात्रा, कम पढी लिखी, शिक्षित। एक सखी ने बताया कि बीमार होने से पढाई छोड़ दी है, उसे इस बात का कितना तनाव रहा होगा पर इस सन्दर्भ में बात ही नही हुई। कुछ बातें बड़ी अजीब लगी, कहा कि धोबी समय पर कपडे नही लाता है, सब्जी जल्दी काटने के लिए कहा जाता है और जल्दी में उंगली कट जाती है तो तनाव होता है... यह तनाव नही खीझ है, तनाव वो होता है जब कोई समस्या मन में हो और उस पर सोचते सोचते मन में कसाव हो। विषय बहुत गहराई लिए था पर कार्यक्रम सतही रहा।

सखियों की पसंद पर नए-पुराने विभिन्न मूड के गाने सुनवाए गए। कार्यक्रम तेजेश्री (शेट्टे) जी के तकनीकी सहयोग से प्रस्तुत किया गया।


सोमवार को पधारे निम्मी (मिश्रा) जी और अंजू जी। इस दिन बसंत का रंग चढ़ा। सखियों की पसंद पर गीत भी उसी रंग का उपकार फिल्म से सुनवाया
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आई झूम के बसंत झूमो संग संग रे

इसके अलावा गूँज उठी शहनाई, दिल ही तो है जैसी पुरानी फिल्मो के गीत सुनवाए गए। यह दिन रसोई का होता है। श्रोता सखि द्वारा भेजा गया व्यंजन बताया गया - उत्तपम

मंगलवार को पधारी सखियां मंजू (द्विवेदी) जी और सुधा (अत्सुले) जी। इस दिन हमेशा की तरह सखियो के अनुरोध पर गाने नए ही सुनवाए गए जैसे रब ने बना दी जोडी, थ्री इडियट्स फिल्मो के गीत और यह गीत -

दिल है छोटा सा छोटी सी आशा

यह करिअर का दिन होता है। इस दिन इंटरनेट बैंकिंग के बारे में बताया गया। एयर होस्टेस बनने के लिए भी जानकारी दी गई।

बुधवार को सखियाँ पधारीं - निम्मी (मिश्रा) जी और सुधा (अत्सुले) जी। इस दिन बसंत पंचमी थी। ऋतुराज बसंत का बहुत जोरदार स्वागत किया गया। सखियों के अनुरोध पर इन गीतों से स्वागत हुआ -

संग बसंती अंग बसंती रंग बसंती छा गया
मस्ताना मौसम आ गया

ओ बसंती पवन पागल

पुरवा सुहानी आई रे पुरवा
ऋतुओ की रानी आई रे पुरवा

साथ ही श्री पंचमी और सरस्वती पूजन की भी चर्चा हुई। बड़े ही काव्यात्मक ढंग से वर्णन किया गया। सुन्दर आलेख और प्रस्तुति। बधाई कमलेश (पाठक) जी।

इस दिन स्वास्थ्य और सौन्दर्य संबंधी सलाह दी जाती है्। श्रोता सखियों के पत्रों के आधार पर बालो की समस्या पर चर्चा हुई। बताया गया की क्या खाए और क्या न खाए। फरमाइश पर कुछ अलग तरह के अच्छे गीत इन फिल्मो से सुनवाए गए - खामोशी, चितचोर, गुमनाम, झुक गया आसमान।

आज पधारी रेनू (बंसल) जी और चंचल (वर्मा) जी। गुरूवार को सफल महिलाओं के बारे में बताया जाता है। आजकल श्रंखला चल रही है स्वतंत्रता सेनानी लेखिकाओं की। इस बार स्वर्ण कुमारी देवी के बारे में बताया गया जिनका पहला उपन्यास है दीप निर्वाण जो राष्ट्रीय चेतना पर है। एक प्रश्न भी पूछा कि वैसे तो सभी पेड़-पौधे रात में कार्बन-डाई-आक्साइड छोड़ते है पर कौन सा पौधा ऐसा है जो रात में भी आक्सीजन छोड़ता है। सखियों के अनुरोध पर आराधना, दादा, आशा, ईमानदार फिल्मो के लोकप्रय गीतों के साथ ऐसे गीत भी आज सुनने को मिले जो कम ही सुने जाते है। रखवाला और फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली का यह गीत -

इक राधा इक मीरा
इक प्रेम दीवानी एक दरस दीवानी

हर दिन श्रोता सखियों के पत्र पढे गए। कुछ पत्रों में कार्यक्रमों की तारीफ़ थी, कुछ पत्रों में सखियों ने विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार भी बताए जैसे शहर की लड़की की शादी गाँव में हो तब भी उसे कठिनाई नही होनी चाहिए। शुक्रवार के हैलो सहेली के लिए विषय बताया गया - कैसे छुटकारा पाया जाए तनाव से, इसके अलावा यह सूचना भी दी कि अगले महीने से विभिन्न क्षेत्रो के विशेषज्ञों को बुलाया जा रहा ही। अगली बार एक वकील को आमंत्रित किया जा रहा है, विषय होगा - तलाक़। सखियाँ अपनी समस्याएँ भेज सकती है।

इस कार्यक्रम की दो परिचय धुनें सुनवाई गई - एक तो रोज़ सुनी और एक विशेष धुन हैलो सहेली की शुक्रवार को सुनी।

इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया कांचन (प्रकाश संगीत) जी, कमलेश (पाठक) जी ने सुनील (भुजबल) जी के तकनीकी सहयोग से और यह कार्यक्रम श्रोताओं तक ठीक से पहुँच रहा है, यह देखने (मानीटर करने) के लिए ड्यूटी रूम में ड्यूटी अधिकारी रही आशा (नायकन)जी।

शनिवार और रविवार को प्रस्तुत हुआ सदाबहार नग़में कार्यक्रम। शनिवार की प्रस्तुति में नयापन रहा। ओ पी नय्यर को याद करते हुए उनके स्वरबद्ध किए गीत सुनवाए अमरकांत जी ने। गीतों का पूरा आनंद मिला। एक के बाद एक सदाबहार नगमे गूंजते रहे और गीत के शुरू या समाप्ति पर या बीच में सन्गीत धीमा कर गीत का विवरण बताया गया। विभिन्न मूड के गीत सुनवाए गए। शरारती गीत मिस्टर एंड मिसेज 55 से -

जाने कहाँ मेरा जिगर गया जी

संबंध का गहरा अर्थपूर्ण गीत -

चल अकेला चल अकेला चल अकेला
तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला

प्यार के भी विभिन्न मूड सुनवाए -

दिल की आवाज भी सुन

इक परदेसी मेरा दिल गया

कश्मीर की कलि, तुम सा नही देखा, दिल और मोहब्बत, आर पार फिल्मो के गीत शामिल रहे।

रविवार की प्रस्तुति में छाया गीत की छाप रही। नाईट इन लन्दन, दस्तक, एक कलि मुस्काई फिल्मो के गीतों के साथ यह गीत भी शामिल थे -

भीगी पलकें न उठा
दिन जुदाई के गुजर जाएगे

वक़्त करता जो वफ़ा आप हमारे होते

उडी जब जब जुल्फे तेरी

3:30 बजे नाट्य तरंग कार्यक्रम रसमय रहा। शनिवार और रविवार को दो भागो में महाकवि जयदेव जी की रचना गीत गोविन्द की गीत नाट्य प्रस्तुति हुई। गीतों के साथ इसमे नाटक का पुट भी था। मूल संस्कृत रचना का हिन्दी रेडियो नाट्यरूपांतर, संगीतकार और प्रस्तुतकर्ता है राजेश रेड्डी जी। इसमे भाग लेने वाले कलाकारों के नाम सुन कर लगा यह पुरानी रिकार्डिंग है। संवादों में आवाजे है - छाया आर्य, सुधा शिवपुरी, विनोद शर्मा, कृष्ण भूटानी और गायक कलाकार - छाया गांगुली, अशित देसाई, रविन्द्र साठे, अपर्णा, मिताली मुखर्जी। बढ़िया सुरूचिपूर्ण प्रस्तुति।

शाम 4 से 5 बजे तक सुनवाया जाता है पिटारा कार्यक्रम जिसकी अपनी परिचय धुन है और हर कार्यक्रम की अलग परिचय धुन है।

शुक्रवार को सुना कार्यक्रम पिटारे में पिटारा जिसमें कुछ चुने हुए कार्यक्रमों का दुबारा प्रसारण होता है। इस बार प्रसारित हुआ कार्यक्रम बाई स्कोप की बातें जिसमे मुगले आजम फ़िल्म की बातें। लोकेन्द्र शर्मा जी ने यह बातें बताई जिसके लिए शोध किया कलीम राही जी ने और हम तक पहुंचाया पी के ऐ नायर जी की तकनीकी सहायता से। बताया कि फ़िल्म बनाने का ख़्वाब दो साल तक के आसिफ की आँखों में पलता रहा। बताया कि
कैसे के आसिफ साहब ने एक-एक किरदार के लिए कलाकारों को चुना। पहले बड़े गुलाम अली खान साहब ने गाने से मना किया फिर कैसे उन्हें मनाया गया, राजस्थान में लड़ाई की शूटिंग हुई जिसके लिए पैसे की दिक्कत भी हुई। प्रमुख सीनों के संवाद सुनवाए। हमेशा की तरह इस बार भी अच्छा, जानकारीपूर्ण रहा यह कार्यक्रम।

रविवार को यूथ एक्सप्रेस लेकर आए युनूस (खान) जी। शुरूवात हुई युवा दिवस की शुभकामना से। श्रोताओं के पत्रों के आधार पर हिन्दी उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा के बारे में जानकारी दी गई जो किताबो की दुनिया स्तम्भ के अंतर्गत रही। मेरे गीतों की कहानी स्तम्भ में जावेद अख्तर के एलबम तुम याद आए के गीतों पर चर्चा हुई। 12 जनवरी से शुरू हुए अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता वर्ष के बारे में बताया की यह कई प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने के लिए मनाया जा रहा है। इसके अलावा आई आई टी और एन आई डी - राष्ट्रीय डिजाइन संस्थानों के पाठ्यक्रमो के बारे में जानकारी दी। इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने पी के ए नायर जी के तकनीकी सहयोग से।

सोमवार को सेहतनामा कार्यक्रम में त्वचा रोग पर डा दत्तात्रेय गोपाल साल्वे से निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत सुनवाई गई। त्वचा रोग के कारण और इलाज पर विस्तार से जानकारी दी।

बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम में ख्यात संगीतकार कल्याण जी आनंद जी जोडी के आनंद जी से गणेश (शर्मा) जी की बातचीत प्रसारित हुई। आरम्भ में और बीच में उनके स्वरबद्ध किए लोकप्रिय गीतों के मुखड़े सुनवाए गए। बातचीत में बताया की पढाई के दौरान ही इस दिशा में आने की प्रेरणा मिली। चैरिटी शो करते रहने की बाते बताई, कुछ गीतों के बनाने के अनुभव बताए -

बाबुल का ये घर अपना कुछ दिन का ठिकाना है

गुजराती होने के बावजूद अफगानी सन्गीत तैयार करने का अनुभव -

यारी है ईमान मेरा यार मेरी बंदगी

ख़ास लगे सफ़र फिल्म के गीतों को बनाने के अनुभव। नदी में नाव चलने और मोटर के हार्न का सन्गीत -

नदिया चले चले रे धारा

जो तुमको हो पसंद वही बात कहेगे

वाकई सफलता के पीछे छिपी मेहनत और लगन को जानना प्रेरणादायक रहा। प्रस्तुति शकुन्तला (पंडित) जी की रही। तकनीकी सहयोगी रहे विनय (तलवलकर) जी।

हैलो फ़रमाइश कार्यक्रम में शनिवार को श्रोताओं से फोन पर बात की निम्मी (मिश्रा) जी ने। कुछ श्रोताओ से नई जानकारी मिली जैसे टिबरी में खोखरी माता का मन्दिर जो पहले पानी में था। कुछ ऐसे गीत श्रोताओं की अनुरोध पर सुनवाए गए जो बहुत दिन से नही सुने थे जैसे पहचान फ़िल्म का गीत -

वो परी कहाँ से लाऊ

कुछ ऐसे गीत भी थे जो शायद ही कभी सुनवाए जाते है। श्रोताओं ने अपने काम के बारे में भी बताया। एक काल बहुत स्वाभाविक था। मौसम का पूरा असर दिख रहा था, ठंड में गरमागरम खाते हुए जोर-जोर से बात की। एक छात्रा से बातचीत भी अच्छी रही, उसने फ़ौज के अपने भाइयो और सभी फ़ौजी भाइयो के लिए नई फ़िल्म अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो के शीर्षक गीत के लिए अनुरोध किया। अपने भाइयो को यहाँ से संदेश भेजा, अपने करिअर की भी बात की।

मंगलवार को फोन पर श्रोताओं से बातचीत की अशोक जी ने। पहला ही फोन काल बढ़िया रहा। लोकल काल था। मुम्बई में विश्व हिन्दी दिवस के आयोजन की जानकारी दी। देश की भाषा हिन्दी के प्रति सकारात्मक विचार बताए। अच्छी बातचीत चली। गीत भी अच्छा पसंद किया जो लंबे समय बाद सुनने को मिला, बालक फ़िल्म का यह गीत -

सुन ले बापू यह पैगाम
मेरी चिट्ठी तेरे नाम

इस दिन गाने कुछ अलग ही सुनवाए गए श्रोताओं की पसन्द पर जो अच्छे रहे जैसे देशभक्ति गीत, मुकेश और रफी साहब के गाए पुराने गीत।

और आज श्रोताओं से फोन पर बातचीत की कमल (शर्मा) जी ने। अलग अलग तरह के श्रोताओं ने बात की जैसे शोधार्थी, मिठाई बनाने का काम करने वाले। घडियों के बारे में भी बात हुई। पुराने गाने भी पसंद किए गए जैसे -

तेरे फूलो से भी प्यार तेरे कांटो से भी प्यार

बातचीत से पता चला इलाहाबाद में ठंड ही। एक श्रोता ने बताया कि खेती का सामान पास की नानदेड की कृषि मंडी में बेचते है।

तीनो ही कार्यक्रमों में श्रोताओं ने विविध भारती के विभिन्न कार्यक्रमों को पसंद करने की बात बताई। कुछ श्रोताओ ने बहुत ही कम बात की। तीनो ही कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया महादेव (जगदाले) जी ने। तकनीकी सहयोग तेजेश्री (शेट्टी) जी, परिणीता (नाईक) जी, सुनील (भुजबल) जी, प्रस्तुति सहयोग रमेश (गोखले) जी का रहा।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद प्रसारित हुआ नए फिल्मी गीतों का कार्यक्रम फिल्मी हंगामा। शुक्रवार को रंग दे बसंती से मस्ती की पाठशाला गीत के साथ भागमभाग, गौड तुस्सी ग्रेट हो, एक खिलाड़ी फिल्मो के गीत सुनवाए गए।

शनिवार को रेस, चमेली के गीतों के साथ इक़बाल फ़िल्म का यह गीत बहुत अच्छा लगा -

आँखों में सपना सपनों में आशा
आशा है जिन्दगी

रविवार को नमस्ते लन्दन, लाटरी के साथ शान का गाया यह लोकप्रिय गीत भी शामिल था -

जबसे मेरे नैना तेरे नैनो से लागे रे

सोमवार को दे ताली फिल्म के शीर्षक गीत - दे ताली दे दे ताली के साथ फिर हेरा फेरी, जनतरम, ममंतरम फिल्मो के गीत भी शामिल रहे। मंगलवार को बाम्बे टू गोवा जैसी नई फ़िल्मों के गाने शामिल रहे। बुधवार को बिच्छू, मंगल पांडे, तारे जमीन पर फ़िल्मों के गीत सुनवाए गए। आज सन्डे, बिल्ला नंबर 786, 1971 के गीत सुनवाए और एक मुजरा सुनवाया यात्रा फ़िल्म से जिसके गीतकार का नाम अहमद वसी बताया, अगर यह विविध भारती के वसी साहब है तो खुशी भी हुई और आश्चर्य भी नए गीतों में नाम सुनकर।

प्रसारण के दौरान अन्य कार्यक्रमों के प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए और संदेश भी प्रसारित किए गए जिसमें विविध भारती के विभिन्न कार्यक्रमों के बारे में बताया गया।

शाम 5:30 बजे फ़िल्मी हंगामा कार्यक्रम की समाप्ति के बाद क्षेत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाते है, फिर हम शाम बाद के प्रसारण के लिए 7 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है।

Thursday, January 14, 2010

प्यार-मोहब्बत के गानों की दुपहरियों की साप्ताहिकी 14-1-10

आप सबको मकर संक्रांति, पोंगल, माघ बीहू और लोढ़ी की शुभ कामनाएं !

सवेरे के त्रिवेणी कार्यक्रम के बाद क्षेत्रीय प्रसारण तेलुगु भाषा में शुरू हो जाता है फिर हम दोपहर 12 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुडते है। कभी-कभार एकाध मिनट देर से जुड़ते है।

दोपहर 12 बजे का समय होता है इंसटेन्ट फ़रमाइशी गीतों के कार्यक्रम एस एम एस के बहाने वी बी एस के तराने का। हमेशा की तरह शुरूवात में 10 फ़िल्मों के नाम बता दिए गए फिर बताया गया एस एम एस करने का तरीका। पहला गीत उदघोषक की खुद की पसन्द का सुनवाया गया ताकि तब तक संदेश आ सके। फिर शुरू हुआ संदेशों का सिलसिला और इन संदेशों को 12:50 तक भेजने के लिए कहा गया ताकि शामिल किया जा सकें।


शुक्रवार को जानेमन, नमस्ते लन्दन, गैंग स्टर, सिंह इज किंग, बस इतना सा ख़्वाब है, नील एंड निक्की, सलामे इश्क, कमीने, इन नई फिल्मो को लेकर आईं रेणु (बंसल) जी। शनिवार को भी नई फ़िल्में लेकर आईं रेणु (बंसल) जी। इस दिन फरहान अख्तर और फरहा खान को जन्म दिन की बधाई दी गई, साथ ही उनके काम की भी कुछ जानकारी दी, फिल्मे भी कुछ उनकी चुनी गई - मैं हूँ ना, दिल चाहता है, कभी अलविदा ना कहना, लक्ष्य

सोमवार को बढ़िया फिल्मो का चुनाव किया गया और श्रोताओं ने भी लोकप्रिय गीतों के लिए संदेश भेजे - मेरा गाँव मेरा देश, प्रेम रोग, देवता, हमजोली, आन मिलो सजना, जुगनू, मेरे सनम, झुक गया आसमान, रात और दिन। मंगलवार को बेटा, धूम 2, बंटी और बबली, भूल भुलैया के साथ दिल तो पागल है और सोलजर के शीर्षक गीत और इसके अलावा पुरानी फिल्मे बाबी और मैंने प्यार किया भी शामिल रही। बुधवार को फिल्मे रही - जाने तू या जाने न, दोस्ताना, सरफरोश, जिस्म, लन्दन ड्रीम्स, तारारमपम, लव। इस दिन 12:15 से क्षेत्रीय प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित हुआ फिर 12:30 बजे से हम केन्द्रीय सेवा से जुड़े। आज कार्यक्रम की शुरूवात में मकर संक्रांति की शुभकामना दी गई फिर शुरू हुआ मिलेजुले गीतों का सिलसिला। फिल्मे रही - डान, शराबी, खेल खेल में, रफूचक्कर, नो एंट्री, सिंह इज किंग, कल हो न हो और आ गले लग जा

सोमवार से आज तक गीत सुनवाने आई शेफाली (कपूर) जी। आधा कार्यक्रम समाप्त होने के बाद फिर से बची हुई फ़िल्मों के नाम बताए गए और फिर से बताया गया एस एम एस करने का तरीका। एक घण्टे के इस कार्यक्रम के अंत में अगले दिन की 10 फ़िल्मों के नाम बताए गए।

इस सप्ताह पुराने साठ के दशक से लेकर आज के दौर की फ़िल्में शामिल रही लेकिन नई फिल्मे अधिक रही।

इस सप्ताह भी संदेशों की संख्या अधिक रही बिल्कुल उसी तरह जैसे फ़रमाइशी पत्रों के नामों की सूची पढी जाती है। सप्ताह भर इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने।

1:00 बजे नए साल में एक नया कार्यक्रम शुरू हुआ है - हिट सुपर हिट। कार्यक्रम का सिर्फ नाम ही नया है स्वरूप एक ही फनकार कार्यक्रम जैसा है। शुक्रवार को यह कार्यक्रम अभिनेत्री माधुरी दीक्षित पर प्रस्तुत किया गया। रेणु जी ने प्रस्तुत किया यह कार्यक्रम। माधुरी दीक्षित का घर का नाम बताया -बबली, आगे बताया कि तेज़ाब फिल्म से एक दो तीन गर्ल के नाम से जानी जाने वाली बेटा फिल्म से धकधक गर्ल के नाम से जानी जाने लगी। उनके हिट गीत सुनवाए गए - तेज़ाब, राम लखन, बेटा फिल्म का गीत सुनावाया। अभिनय के अलावा नृत्य में भी कुशल है। यह कहते हुए दिल तो पागल है, राजा फिल्मो के गीत सुनवाए, अनिल कपूर के साथ् उनकी जोडी पसंद की गई। उनकी सफलता इतनी रही कि एक फिल्म भी उनके नाम से बनी - मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूँ। यह कार्यक्रम इसी तरह से शनिवार को अभिनेत्री रानी मुखर्जी, सोमवार को अभिनेत्री काजोल, मंगलवार को श्रीदेवी के लिए प्रस्तुत किया गया। बुधवार को संगीतकार नदीम श्रवण और गुरूवार को संगीतकार जतिन ललित पर यह कार्यक्रम प्रस्तुत हुआ।

इसमें और आज के फनकार कार्यक्रम में बहुत बारीक सा ही फर्क है। इसीलिए इस कार्यक्रम के स्वरूप को बदला जा सकता है।

1:30 बजे का समय रहा मन चाहे गीत कार्यक्रम का। पत्रों पर आधारित फ़रमाइशी गीतों में शुक्रवार को कन्यादान, खलनायक, बदलते रिश्ते, भीगी पलकें, प्रेमकहानी, रंगीला और एक नई फिल्म ऐतेराज से प्यार-मोहब्बत के लोकप्रिय गीत सुनवाए। पर कुछ अलग गीत भी शामिल रहे - विधाता फिल्म का यह गीत -

हाथो की चाँद लकीरों का सब खेल है तकदीरों का

परिंदा फ़िल्म से बहुत ही कम सुना गया यह गीत -

तुमसे मिलके ऐसा लगा अरमां हुए पूरे दिल के

रविवार को नए रोमांटिक गीत सुनवाए गए -

हम है एक पल यहाँ

तुमसे मिलना बातें करना बड़ा अच्छा लगता है

सोमवार की फ़िल्में रही - हीरो, ये वादा रहा, हिना, क्योकि, दिल से, किस्मत कनेक्शन

मंगलवार को पुरानी बढ़िया फिल्मो के गीत सुनवाए गए - यादो की बरात, आक्रमण, आशिकी फिल्मो के रोमांटिक गीतों के अलावा अलग विषय के गीत भी शामिल रहे -

याराना फिल्म से - तेरे जैसा यार कहाँ

रामपुर का लक्ष्मण फिल्म से -

काहे अपनो के काम नही आए तू
कहते है सबकी बिगड़ी राम बनाए

और इन नई फिल्मो के गीत भी सुनवाए गए - चमेली, जाने तू या जाने न, गजनी



बुधवार और आज श्रोताओं के ई-मेल से प्राप्त संदेशों पर फ़रमाइशी गीत सुनवाए गए। इस सप्ताह भी ज्यादातर लोकप्रिय रोमांटिक गीत सुनवाए गए।

बुधवार को रेणु जी ने लोढी त्यौहार के बारे में बताया। आराधना, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएगे, प्यार झुकता नही, चलते-चलते, अंदाज, बाजीगर फिल्मो से रोमांटिक गीत सुनवाए गए और नाम फिल्म से यह अलग सा गीत - चिट्ठी आई है
आज अशोक जी ने मकर संक्रांति, माघ बीहू की शुभकामना दी, कुम्भ स्नान की बात कही। प्रेम रोग, मासूम, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएगे, नमक हलाल, अक्सर, खानदान, हम किसी से कम नही और अभी-अभी कार्यक्रम समाप्त किया नया दौर फ़िल्म के गीत से जिससे नए पुराने मिलेजुले गीतों का आनन्द मिला।

इस सप्ताह भी अधिकतर गीत एक-एक मेल प्राप्त होने पर ही सुनवा दिए गए, अभी भी मेल संख्या बढी नहीं है जबकि पत्रों की स्थिति पहले जैसी ही रही।
इस कार्यक्रम में अन्य कार्यक्रमों के प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए और संदेश भी प्रसारित किए गए जिसमें विविध भारती के विभिन्न कार्यक्रमों के बारे में बताया गया।

इस सप्ताह भी इस समय के प्रसारण में एक भी कार्यक्रम प्रायोजित नहीं था।
इस प्रसारण को रेणु (बंसल) जी, शेफाली (कपूर) जी, निम्मी (मिश्रा) जी, नन्द किशोर (पाण्डेय) जी, मंजू (द्विवेदी) जी, अशोक जी ने प्रदीप (शिंदे) जी, सुनील (भुजबल) जी, निखिल (धामापुराकर) जी, रीटा (गोम्स) जी, विनायक (रणवे) जी, जयंत (महाजन) जी के तकनीकी सहयोग से हम तक पहुँचाया और यह कार्यक्रम श्रोताओं तक ठीक से पहुँच रहा है, यह देखने (मानीटर) करने के लिए ड्यूटी रूम में ड्यूटी अधिकारी रहे कमला कुन्दर जी और आशा नायकन जी।
दोपहर में 2:30 बजे मन चाहे गीत कार्यक्रम की समाप्ति के बाद आधे घण्टे के लिए क्षेत्रीय प्रसारण होता है जिसके बाद केन्द्रीय सेवा के दोपहर बाद के प्रसारण के लिए हम 3 बजे से जुड़ते है।


Thursday, January 7, 2010

सुबह के पंचरंगी प्रसारण की साप्ताहिकी 7-1-10

सप्ताह का पहला दिन, सुबह का प्रसारण, साल का पहला प्रसारण था। नई शुरूवात भी रही और रोचक भी रहा।

सप्ताह के हर दिन परम्परा के अनुसार शुरूवात संकेत धुन से हुई जिसके बाद वन्देमातरम फिर बताए गए दिन और तिथि, संवत्सर तिथि भी बताई गई जिसके बाद मंगल ध्वनि सुनवाई गई। यह सभी क्षेत्रीय केंद्र से प्रसारित हुआ। इसके बाद 6 बजे दिल्ली से प्रसारित हुए समाचार, 5 मिनट के बुलेटिन के बाद मुम्बई से प्रसारण शुरू हुआ जिसकी शुरूवात में सुबह के कार्यक्रमों के प्रायोजकों के विज्ञापन प्रसारित हुए जिसके बाद पहले कार्यक्रम वन्दनवार की शुरूवात मधुर संकेत धुन से हुई, फिर सुनाया गया चिंतन।

चिंतन में इस बार शामिल रहे कथन - साल के पहले ही दिन हज़रत मोहम्मद साहब का कथन बताया गया - बुराई को भलाई से दूर रखो। संत ज्ञानेश्वर का कथन - उचित कार्य हेतु रहित करो। महात्मा गांधी के कथन - जीवन को सरल बनाने से समस्या नही होगी, दूसरा कथन - सच्चा मनुष्य कभी विचलित नहीं होता क्योकि सच की शक्ति से बल मिलता है। शेक्सपियर का कथन - सबके चेहरे सस्ते होते है चाहे हाथ कैसे भी हो, दूसरा कथन - मेरा मुकुट मेरे मन में है जिसे कोई देख नही सकता और न ही इसमे हीरे जड़े है, यह मुकुट है - संतोष। स्वामी विवेकानंद का कथन - जाग्रत रह कर अधिकार और दायित्व के बारे में जान सकते है।

बढिया प्रस्तुति।

वन्दनवार में भक्ति गीतों में इस बार भी विविधता रही। शुक्रवार, साल का पहला दिन था, नई शुरूवात हुई, शिव स्तुति सुनवाई गई जो संस्कृत में है -

भक्ताः प्रभो स्वीकरमः श्री महादेव शम्भों

वाकई आनन्द आ गया। इसके अलावा सप्ताह में एकाध और भी नए भजन सुनवाए गए -

जय राधे राधे राधे जय जय श्री राधे
जय कृष्णा कृष्णा कृष्णा

साकार रूप के भक्ति गीत - लीला तुम्हारी श्याम रूप भी तुम्हारा

और पुराने लोकप्रिय भजन सुनवाए गए -

जप ले हरी का नाम जप ले

मोह माया के जाल में मन को क्यों भरमाए

निराकार रूप के भक्ति गीत शामिल रहे - मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे मैं तो तेरे पास मैं

भक्तों के भक्ति गीत जैसे -

शेरां पहाडा वाली माँ
तेरा जयकारा पुकारे
मैनु बडा चंगा लगता

कार्यक्रम का समापन देशगान से होता रहा, लोकप्रिय देशभक्ति गीत सुनवाए गए जैसे -

ज़िन्दगी को बन्दगी समझ के तू काम कर
इस देश का रहनुमा है तू नाम कर

छोड़ मत पतवार न बिसरे रे
न बिसरे

मिल के चलोचलो भई मिल के चलो

चलो देश पर मर मिट जाए
मिल कर नया भारत बनाए

अपने वतन को स्वर्ग बनाए
आओ कदम हम मिल के बढाए

मन हो निर्भय जहा
सपनों के भारत को जा निर्मित करो

नया, एकाध बार सुनवाया गया देश गान भी शामिल रहा -

भारत एक दिया है हम सब इस दिये की बातियाँ

गीतों के लिए विवरण न बताने की आदत बीते साल के साथ नहीं गई।

6:30 बजे से क्षेत्रीय प्रसारण में तेलुगु भक्ति गीत सुनवाए गए जिसके बाद 6:55 को झरोका में केन्द्रीय और क्षेत्रीय प्रसारण की जानकारी तेलुगु भाषा में दी गई।

7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम के दूसरे भाग से हम जुड़े। यह भाग प्रायोजित रहा। शुक्रवार, साल का पहला दिन होने से ज़ोरदार रहा। बड़े हँसी-ख़ुशी के गीत सुनवाए गए -

मस्ती में छेड़ के तराना कोई दिल का
आज लुटाएगा ख़ज़ाना कोई दिल का

हँसता हुआ नूरानी चेहरा

बार बार देखो हज़ार बार देखो
ताली हो…

और यह गीत सुन कर बहुत मज़ा आया -

नाच रे मन बतकम्मा ठुमक ठुमक बतकम्मा
मैं भी नाचूँ तू भी नाचे हर कोई नाचे बतकम्मा

बतकम्मा, तेलंगाना की लोक संस्कृति है और आजकल तेलंगाना का गाना देश में गाया जा रहा है।

शनिवार को सुनवाए गए, नया दौर, दिल ही तो है, दूर की आवाज़ और यह गीत -

तेरे सुर और मेरे गीत

रविवार को शिकारी, बीस साल बाद, अनपढ़, तुम सा नही देखा फिल्मो के लोकप्रिय गीतों के साथ यह गीत भी सुनवाया गया -

लाखो है यहाँ दिलवाले पर प्यार नही मिलता

सोमवार को निरूपा राय और प्रदीप कुमार को याद करते हुए सुनवाए गए यह गाने -

आ लौट के आजा मेरे मीत तुझे मेरे गीत बुलाते है

दुपट्टा मेरा मलमल का

इसके अलावा गूँज उठी शहनाई, अनामोल घड़ी के गीत भी शामिल थे।

मंगलवार को काजल, संगम, ग़बन, ये रास्ते है प्यार के, नमस्तेजी फ़िल्मों के हमेशा सुने जाने वाले गीत और कश्मीर की कलि फ़िल्म यह गीत -

बलमा खुली हवा में

बुधवार को लीडर, जाल, हमारी याद आएगी का शीर्षक गीत और यह गीत सुनवाया गया -

मुझे तुम से कुछ भी न चाहिए

गुरूवार को शोला और शबनम, रंगोली, काजल और यह गीत भी शामिल था -

ऐसे तो न देखो के बहक जाए कही हम

एकाध ऐसा गीत भी शामिल रहा जो कम सुनवाया जाता है -

मेरा दिल है तेरा, तेरा दिल है मेरा

इस तरह साठ के दशक के ऐसे गीत छाए रहे जो उस समय बहुत लोकप्रिय थे। उससे पहले के समय की भूली-बिसरी आवाज़ों में से सिर्फ़ एक फ़िल्म अनमोल घड़ी का सुरैया का गाया यह गीत शामिल था -

मन लेता है अँगड़ाई

और हर दिन कार्यक्रम के समापन पर सुनवाए जाने वाले कुंदनलाल सहगल के गीत के अलावा एकाध गीत ही पचास के दशक और उससे पहले की फ़िल्मों से सुनवाए गए। सुरैया और सहगल साहब के अलावा उस दौर की कोई और आवाज़ नहीं सुनवाई गई। समय की गति के साथ-साथ इस कर्यक्रम में सुनवाए जाने वाले गीत भी आगे के समय के हो गए है पर पीछे छूट गई सुमधुर आवाज़े, उस दौर का संगीत और गीतों के बोल सुनवाने के लिए कोई और व्यवस्था करने के लिए विविध भारती से हमारा अनुरोध है।

इस कार्यक्रम में कुछ सामान्य जानकारी भी दी गई जैसे कुछ फ़िल्मों के बारे में बताया गया कि इसके सभी गाने लोकप्रिय है। कुछ फिल्मों के रिलीज का वर्ष और बैनर बताया गया। कलाकारों के नाम और फिल्म का विषय भी बताया गया।

7:30 बजे संगीत सरिता श्रृंखला चल रही है - पार्श्व गायन के रंगीन ताने-बाने जिसे प्रस्तुत कर रहे है प्रख़्यात संतूर वादक शिवकुमार शर्मा। बताया गया उप शास्त्रीय संगीत से किस तरह फ़िल्मी संगीत तैयार किया गया। गीतों के संगीत पक्ष की पूरी जानकारी देते हुए गीत सुनवाए। दो- दो गीत सुनवाते हुए यह बताया कि आधार एक होते हुए भी संयोजन अलग है -

हमसफ़र साथ अपना छोड़ चले

ऐसे तो न देखो

बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ की गायकी भी सुनवाई - याद पिया की आए

राग भैरवी में उप शास्त्रीय सन्गीत के लिए दो गीत -

जा जा रे जा बालमा

सांवरे सांवरे (फ़िल्म अनुराधा)

और अरेबियन संगीत भैरवी के लिए दो गीतों के अलग संयोजन को समझाया गया -

घर आया मेरा परदेसी

सुनो छोटी सी गुडिया की लम्बी कहानी

ठुमरी का अंदाज भी बताया - कैसी आऊं जमुना के तीर

राग भैरवी का अलग-अलग मूड में संगीतकार शंकर-जयकिशन द्वारा दो गीतों में प्रयोग भी बताया -
दर्द का मूड जिसमें दादरा ताल - मिट्टी से खेलते हो बार-बार किसलिए और ख़ुशी का मूड जिसमें कहरवा ताल - किसी ने अपना बना के मुझको

मदन मोहन के गीतों के भी विविध संयोजन बताए इन गीतों से -

बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुम से मिले हम

कदर जाने न मोरा बालम

भैरवी पर आधारित फिल्मी गीतों में वाद्यों का प्रयोग भी समझाया इन गीतों से -

जीत ही लेगे बाजी हम तुम

मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज न दो

और गीतों के सुरों को बजा कर भी बताया। इस श्रृंखला की प्रस्तुति छाया (गांगुली) जी की है।

7:45 को त्रिवेणी का प्रसारण हुआ जो प्रायोजित था . शुक्रवार को साल के पहले ही दिन अच्छा पाठ पढाया, बताया गया विचार था - जीवन का हर दिन चुनौती भरा होता है इसीलिए सकारात्मक सोच होनी चाहिए। सुनवाए गए गीत रहे -

ये तो ज़िन्दगी है कभी ख़ुशी कभी ग़म

शनिवार को भी बढिया विचार रहा - प्रकृति ने केवल मनुष्य को ही मुस्कुराने की कला दी है इसीलिए खुद भी मुस्कुराओ और दूसरों को भी मुस्कुराने का अवसर दो, इस तरह मुस्काने के सभी पक्ष बताए इन गीतों से -

कहता है जोकर

तुम इतना जो मुस्कुरा रही हो

रविवार का विषय था - आज के दौर में अच्छा श्रोता बनाना जरूरी है। आलेख और गीत अच्छे थे। उमर क़ैद फ़िल्म का यह गीत पहली बार सुना, शायद कम सुनवाया जाता है -

सुनो जी एक बात तुम हमारा दिल हुआ गुम

सोमवार का विचार था - मन में नएपन का एहसास होने से मन में उत्साह आता है।आलेख भी अच्छा था और गाने भी अच्छे चुने गए -

मैं वही दर्पण वही न जाने ये क्या हो गया
के सब कुछ लागे नया-नया

और यह नया गीत - रूकी रूकी सी जिन्दगी

मंगलवार का विचार था - वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी उन्नति। बात टेलीफोन की हुई, पुराने से नए तक, गाने भी वैसे ही रहे -

मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से टेलीफून

मुन्ना मोबाइल पप्पू पेजर

बुधवार का विचार - परोपकारी अपने आपको प्रताड़ित महसूस करते है, ऐसे ही गीतों से आलेख सजाया गया -आदमी हूँ आदमी से प्यार करता

और आज का विचार था - मन में ठान ले तो आसमान भी झुक जाता ही। साथ् में सभी नए गीत सुनवाए गए - ये जिन्दगी क्या क्या दिखलाती ही

इस प्रसारण को निम्मी (मिश्रा) जी, अशोक (हमराही) जी, नन्द किशोर (पाण्डेय) जी ने विनायक तलवलकर जी, विनायक रणवे जी, विन्की फ़र्नाडिज़ जी के तकनीकी सहयोग से हम तक पहुँचाया गया और यह कार्यक्रम श्रोताओं तक ठीक से पहुँच रहा है, यह देखने (मानीटर) करने के लिए ड्यूटी रूम में ड्यूटी अधिकारी रही कमला कुन्दर जी.

सवेरे के त्रिवेणी कार्यक्रम के बाद क्षेत्रीय प्रसारण तेलुगु भाषा में शुरू हो जाता है फिर हम दोपहर 12 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुडते है।

Tuesday, January 5, 2010

हार्मोनिका (माऊथ ओर्गन) पर फिल्मी धून

सुनिये और देख़ीये माऊथ ओर्गन पर एक फिल्मी धून मूझसे । यहाँ मेरा कोई सिद्धहस्त कलाकार होनेका कोई दावा नहीं है । बस थोड़ीसी याद को कायम किया है ।



पियुष महेता ।
नानपूरा, सुरत ।
पियुष महेता, माऊथ ओर्गन,हार्मोनिका,PIYUSH MEHTA, MOUTH ORGAN, HARMONICA

फ़िल्म कोरा काग़ज़ का रूठे पिया का गीत

सत्तर के दशक के शुरूवाती वर्षों की एक बेहतरीन फ़िल्म है - कोरा काग़ज़

इस फ़िल्म का लताजी का गाया एक गीत आज मुझे याद आ रहा है जो पहले रेडियो के लगभग सभी केन्द्रों के फ़रमाइशी और ग़ैर फ़रमाइशी कार्यक्रमों में बहुत सुनवाया जाता था, अब बहुत दिनों से नहीं सुना है।

जया भादुडी (बच्चन) और विजय आनन्द पर फ़िल्माए गए इस गीत के बोल है -

रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
आज न जाने बात हुई वो क्यों रूठे मुझसे
जब तक वो बोले न मुझसे मैं समझूँ कैसे

रूठे रूठे पिया, पिया आ आ आ आ
रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
रूठे रूठे पिया

वो बैठे है कुछ ऐसे शादी में दुल्हन जैसे
क्या बन के दूल्हा मैं जाऊँ और उनकी मांग सजाऊँ
लम्बी दुल्हन ठिंगना दूल्हा जोडी जमे कैसे

रूठे रूठे पिया पिया आ आ आ आ
रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
रूठे रूठे पिया

क्या मुझसे हसीं है किताबें, पिया प्यार से जिनको थामे
मैं नैन मिलाना चाहूँ पर नैन मिला न पाऊँ
सौतन चश्मा बीच में आए, नैन मिले कैसे

रूठे रूठे पिया पिया आ आ आ आ
रूठे रूठे पिया मनाऊँ कैसे
रूठे रूठे पिया

बोलों में हास्य का पुट है पर गीत फ़िल्म में देखने में बहुत ही भावुक है।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, January 1, 2010

रात के सुकून भरे कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 31-12-09

आप सबको नया साल मुबारक !

इस सप्ताह दो नई बातें हुई। आज के फ़नकार कार्यक्रम फिर से शुरू किया गया और साल को अलविदा कहा गया।

रात में हवामहल कार्यक्रम के बाद 8:15 से क्षेत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाते है फिर हम 9 बजे ही केन्द्रीय सेवा से जुड़ते है।

9 बजे का समय होता है ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं के कार्यक्रम गुलदस्ता का। शुक्रवार को सुनवाई गई अहमद फराज की गजल मिताली मुखर्जी की आवाज में -

मुझे माफ़ कर मेरे हमसफ़र
तुझे चाहना मेरी भूल थी

कृष्ण बिहारी नूर की रचना छाया गांगुली की आवाज में -

पलकों की छाँव में छुपा ले गया मुझे

बेहद लोकप्रिय कलाम नासिर काजमी का पंकज उधास की आवाज में - दिल धड़कने का सबब याद आया

इसरार अंसारी के बोल -

वो मेरी मोहब्बत का गुजरा ज़माना
नही मेरे बस में उसे भूल पाना

रूप कुमार राठौर और सोनाली राठौर की आवाजो में और जगजीत सिंह की आवाज में फैय्याज जैदी का कलाम भी शामिल था। शनिवार को लोकप्रिय रचनाएँ शामिल रही। नक्षलायल पुरी की रचना आशा भोंसले और गुलाम अली की आवाजों में -

नैना तोसे लागे सारी रैन जागे

रविवार को सुदर्शन फ़ाकिर की रचनाएँ गूँजी। पंकज उदहास की आवाज़ में -

कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब
तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब

जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की आवाज़ों में बहुत लोकप्रिय रचना - काग़ज़ की किश्ती बारिश का पानी

सुधा मल्होत्रा की आवाज़ भी सुनी पर आनन्द आया बेगम अख़्तर को सुनकर -

ज़िन्दगी कुछ भी नहीं फिर भी जिए जाते है
तुझपे ऐ वक़्त ऐहसान किए जाते है

सोमवार को अच्छा लगा जगजीत सिंह की आवाज़ में -

कल चौदहवीं की रात शब भर रहा चर्चा तेरा
किसी ने कहा चाँद किसी ने कहा चेहरा तेरा

पंकज उदहास, रीता गांगुली, पार्वती ख़ान की आवाज़ों में कैफ़ी आज़मी, राही मासूम रज़ा के कलाम गूँजे। मंगलवार को विभिन्न एलबमों से रचनाएँ सुनवाई गई। नईम कादरी का कलाम -

जब तक मैं न आऊँ शमा जलाए रखना

जगजीत सिंह की आवाज़ में वाजिदा साजिद का कलाम, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का कलाम आबिदा परवीन की आवाज़ में सुना पर सबसे अच्छा लगी शास्त्रीय संगीत में ढली रचना अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की आवाज़ों में।

बुधवार को लोकप्रिय ग़ज़ल सुनवाई गई -

दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है
हम भी पागल हो जाएगें ऐसा लगता है

हरिहरन की आवाज़ में सुनवाया गया -

कोई पत्ता तो गिरे हवा तो चले
कौन अपना है पता तो चले

इसके अलावा फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का कलाम फ़रीदा ख़ानम की आवाज़ में और चन्दन दास की आवाज़ में इब्राहिम अश्क का कलाम भी शामिल-ए-बज्म रहा। गुरूवार को साल के अंतिम दिन की प्रस्तुति फीकी रही। मिताली सिंह की आवाज़ में सुना -

ख़त बार लिखूँ इल्तेजा करूँ
फिर भी न आए तो ख़ुदा से दुआ करो

साथ ही नक्शलायल पुरी की आवाज़ में जगजीत सिंह को सुना, ग़ुलाम अली से भी ग़ज़ल सुनवाई गई। अन्य दिनों से भी इस दिन का चयन कमज़ोर रहा।

सप्ताह में ग़ज़लों का ही बोलबाला रहा जबकि कहा जाता रहा यह ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का कार्यक्रम है। क्या समूह गीत, गीत, भजन, लोरी फ़िल्मों में ही होते है ? अगर ग़ैर फ़िल्मी भी होते है तो इस कार्यक्रम में ग़ज़ले ही क्यों सुनने को मिलती है।

कार्यक्रम के समापन में कहा जाता रहा - यह था सुनने वालों के लिए विविध भारती का नज़राना - गुलदस्ता ( जो एक ही तरह के फूलों से बना है)। आरंभ और अंत में बजने वाला संगीत अच्छा है।

9:30 बजे चार विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित हुए। एक दिन उजाले उनकी यादो के, दो दिन आज के फनकार, तीन दिन एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम और अंतिम दिन, साल के अंतिम दिन का अंतिम प्रसारण होने से एक विशेष कार्यक्रम प्रसारित किया गया।

रविवार को उजाले उनकी यादो के कार्यक्रम में संगीतकार जोडी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के प्यारेलाल जी से कमल (शर्मा) जी की बातचीत सुनवाई गई। उनकी पहली फ़िल्म पारसमणी की चर्चा हुई और पहला गीत बताया -

हँसता हुआ नूरानी चेहरा

साथ में यह जानकारी भी दी कि वास्तव में उनकी पहली फ़िल्म चंद्रसेना है जिसमे वो कल्याण जी आनंद जी के सहायक रहे। किशोर कुमार और आनंद बक्षी के साथ अनुभव बताए। दोस्ती फ़िल्म के लिए मिले फिल्मफेयर अवार्ड की भी जानकारी दी। इस तरह इस कड़ी में काफी जानकारी समेटी गई। इस कार्यक्रम को तैयार करने में तकनीकी सहयोग दिया स्वाती भंडारकर और जे के महाजन ने।

आज के फनकार कार्यक्रम संगीतकार नौशाद और अभिनेता राजेश खन्ना पर प्रसारित किया गया। शुक्रवार को संगीतकार नौशाद का जन्मदिन था इसीलिए इस दिन के फ़नकार थे नौशाद। प्रमुख बातें बताई गई जैसे दादा साहेब फ़ालके पुरस्कार मिला, 3 फ़िल्मों की डायमन्ड जुबिली हुई। ख़ास बात यह बताई कि सभी गीत किसी न किसी शास्त्रीय राग पर आधारित रहे। कुछ बातें युनूस जी बताते रहे और कुछ बातें नौशाद साहब ने खुद ही बताई, अच्छा लगा उनकी आवाज़ सुनना। बताया कि पहली बार आर्केस्ट्रा की जगह गायक, गायिका की आवाज़ का प्रयोग किया इस गीत में -

मोरे सैय्या जी उतरेंगे पार नदिया धीरे बहो

अच्छा जानकारीपूर्ण कार्यक्रम रहा।

मंगलवार को अभिनेता राजेश खन्ना का जन्मदिन था इसीलिए इस दिन के फ़नकार थे राजेश खन्ना। पर कार्यक्रम अधूरा लगा। बहुत सी महत्वपूर्ण बातें नहीं बताई गई। असली नाम जतिन खन्ना है जो नहीं बताया गया। पहली फ़िल्म जब जब फूल खिले में इतनी छोटी भूमिका थी कि दर्शक नोटिस ही नही कर पाए जिसकी चर्चा नही हुई। यह बताया कि वह स्टार रहे पर यह नही बताया कि स्टार शब्द का प्रयोग पहली बार राजेश खन्ना के लिए ही हुआ उनसे पहले हुए बड़े कलाकारों जैसे दिलीप कुमार, देव आनंद के लिए भी इस शब्द का प्रयोग नही हुआ क्योकि राजेश खन्ना को अपार लोकप्रियता मिली। राजेश खन्ना को रोमांटिक हीरो तो बताया गया पर यह नही बताया कि परदे पर प्यार की जो खुली अभिव्यक्ति राजेश खन्ना ने दी वह पहले देखने को नही मिली। हालांकि रोशन जैसे संगीतकारों ने रफी साहब से प्यार के बेहतरीन तराने गवाए पर परदे पर अभिव्यक्ति दबी दबी ही रही। अमर प्रेम फ़िल्म की चर्चा तक नही हुई जिसमें राजेश खन्ना ने प्यार की एक नई परिभाषा दी। फ़ैशन जगत में भी राजेश खन्ना का योगदान रहा जिसके बारे में भी कार्यक्रम ख़ामोश ही रहा। इस नायक ने युवकों को बालों की दो विशिष्ट शैलियाँ दी - गर्दन पर झूलते लम्बे बाल जो उस समय लगभग सभी युवकों कि हुआ करते थे और एक ओर छोटी सी मांग निकाल कर बाल संवारना जो वास्तव में लड़कियों की शैली है। पर उनकी बेहतरीन फ़िल्म आनंद के संवाद सुनवाए और उनकी कुछ फिल्मो के लोकप्रिय गीत सुनवाए।

एक ही फ़िल्म से कार्यक्रम में नई पुरानी और बहुत पुरानी फिल्मे शामिल रही। शनिवार को संतोष जी ले आई सत्तर के दशक की फ़िल्म कर्ज के गीत। मुख्य गीत अंत में सुनवाया जो समय की कमी से पूरा नही बजा। इस गीत के शुरू होते ही ऋषि कपूर के बारे में थोड़ी सी जानकारी दी, उनकी पहली फ़िल्म और बाल कलाकार के रूप में की गई फ़िल्म के नाम बताए। यही कुल जानकारी रही। इस फ़िल्म में महत्वपूर्ण भूमिका में है सिम्मी ग्रेवाल जिनका नाम तक नही लिया गया। यह भी नहीं बताया कि इस फ़िल्म को इसी नाम से दुबारा बनाया गया और कुछ ही समय पहले रिलीज की गई यह रिमेक फिल्म।

मंगलवार को नन्द किशोर (पाण्डेय) जी लेकर आए नई फ़िल्म कहो न प्यार है। फ़िल्म निर्माण से जुड़े सभी नाम बताए और सामान्य जानकारी भी दी कि इसे 8 एवार्ड मिले, गीत और संगीत की भी चर्चा की। बुधवार को संगीतकार एन दत्ता की पुण्य तिथि पर उनकी लोकप्रिय फ़िल्म धूल का फूल के गीत सुनवाए गए। प्रस्तुति राजुल (अशोक) जी की रही। बढिया जानकारी देने का अच्छा प्रयास किया। पूरा नाम बताया - नारायण दत्ता। एस डी बर्मन के सहायक के रूप में काम की शुरूवात की। इस फ़िल्म के निर्माण से जुड़े सभी नाम बताए और सामन्य बातें भी बताई।

गुरूवार को वर्ष के अंतिम प्रसारण में विशेष आयोजन किया गया - इस बरस के चर्चित फ़नकार जिसे लेकर आई निम्मी (मिश्रा) जी और पी के ए नायर जी के तकनीकी सहयोग से इसे प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने। पूरे वर्ष की सिनेमा के चर्चित नाम और काम बताए गए। निर्देशक अनुराग कश्यप, इम्तियाज़ अली के सफल प्रयास की चर्चा हुई, बताया गया कि रणधीर कपूर सबके चहेते अभिनेता बने रहे (मुझे तो ऐसा नहीं लगा), शाहिद कपूर की भी चर्चा की। वास्तव में चर्चा योग्य यह तीन ही रहे - ए आर रहमान, संगीतकार विशाल भारद्वाज और दिल्ली 6 के गाने पर इन तीनों की विस्तृत चर्चा नहीं की गई, उतनी ही चर्चा हुई जितनी अन्यों की हुई जो अन्याय सा लगा। आलेख जिन्होने लिखा उनका नाम मैं नोट नहीं कर पाई।

10 बजे का समय छाया गीत का होता है। शुक्रवार को प्रस्तुत किया कमल (शर्मा) जी ने। हमेशा की तरह साहित्यिक हिन्दी में काव्यात्मक प्रस्तुति। अकेलेपन की, यादो की बातें हुई। गीत भी ऐसे ही सुनवाए गए -

हम तेरे बिन जी न सकेगे सनम

कही एक मासूम नाजुक सी लड़की

शनिवार को प्रस्तुत किया अशोक जी ने। हमेशा की तरह उर्दू लफ्ज बहुत बोले। ख्यालो से होते हुए मोहब्बत के परवान चढ़ने की बात कही। गानों का चुनाव अच्छा रहा जिससे आलेख उठता रहा -

मै तो तेरे हसीं ख्यालो में खो गया

मेरा छोटा सा घर-बार मेरे अंगना में

रविवार को प्रस्तुत किया युनूस खान जी ने। नयापन रहा। यादो की बातें अक्सर होती है पर इस रात अलग बातें हुई इसीलिए अच्छी लगी। बचपन का माहौल याद किया जब रिक्शा से स्कूल जाते थे, उन दिनों घर पर आकर आवाज लगाते थे - बर्तन पर कलई लगवा लो। ऐसा ही गीत भी सुनवा दिया। वाकई पुराना माहौल याद आ गया। कुंवारा बाप का गीत भी सुनवाया -

मैं हूँ घोड़ा ये है गाड़ी मेरी रिक्शा सबसे निराली

पर एक बात खटकी, कहा गया बाईस्कोप के बारे में फिर खेलो की बात लाकर आशीर्वाद का बच्चो का रेलगाड़ी गाना सुनवा दिया जबकि बाईस्कोप का एक बढ़िया गाना है, राजेश खन्ना, मुमताज अभिनीत फ़िल्म दुश्मन का जिसे लता जी ने गाया है -

देखो देखो देखो बाईस्कोप देखो
दिल्ली का कुतुबमीनार देखो, बंबई शहर की बहार देखो
ये आगे रखा है ताजमहल, घर बैठे सारा संसार देखो
पैसा फेको तमाशा देखो

इस गाने की कमी बहुत खली। सोमवार को अमरकान्त जी एक आदि प्रश्न लेकर आए - जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते है, और आधे घण्टे तक मंथन करते रहे। ये रास्ते है प्यार के, दिल ही तो है फ़िल्मों के शीर्षक गीतों के साथ त्रिशूल फ़िल्म का गीत और यह गीत भी शामिल रहा -

बाबूजी धीरे चलना प्यार में ज़रा सँभलना

मंगलवार को रेणु (बंसल) जी ने यादो की बातें की और बहुत शांत, गंभीर गीत चुन कर सुनवाए -

वो तेरे प्यार का गम

फिर तेरी कहानी याद आई

चाँद फिर निकला मगर तुम न आए

बुधवार को राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी नए गीत लेकर आए जिसमें परिणीता का पिउ बोले गीत भी शामिल था। गुरूवार को साल का अंतिम छाया गीत लेकर आईं रेणु (बंसल) जी। बहुत जोश से प्रस्तुत किया। बातें हुई धूम-धड़ाके की पर इन नए गानों में धूम-धड़ाका भी शोर सा लगा। संगीत में ही जान नहीं है, कार्यक्रम कैसे सरस बन पाएगा।

10:30 बजे कार्यक्रम प्रसारित हुआ आपकी फ़रमाइश जो प्रायोजित था इसीलिए प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए। इसमें श्रोताओं ने पुराने लोकप्रिय गीत सुनने की फ़रमाइश अधिक की। शुक्रवार को क्रिसमस और संगीतकार नौशाद के जन्मदिन को ध्यान में रखकर श्रोताओं की फ़रमाइश में से गीत छाँट कर सुनवाए गए। शुरूवात की भीगी पलकों के ओ मदर मेरी गीत से जिसके बाद लीडर, राम और श्याम, दिल दिया दर्द लिया, बैजू बावरा के गीत सुनवाए गए। शनिवार को कश्मीर की कलि, तुम सा नहीं देखा, भाभी, जानी मेरा नाम, सरस्वती चन्द्र फ़िल्मों से लोकप्रिय गीत सुनवाए गए। रविवार को सुनवाया गया -

नैन तुम्हारे मज़ेदार ओ जनाबे आली

साथ ही राजहट, धर्मवीर फ़िल्मों के गीत भी शामिल रहे। सोमवार को शर्मिली, धरती, नीलकमल, गूँज उठी शहनाई और सती सावित्री फ़िल्म का यह गीत -

तुम गगन के चन्द्रमा हो मैं धरा की धूल हूँ

मंगलवार को राजेश खन्ना के जन्मदिन को ध्यान में रखकर श्रोताओं की फरमाइश में से उन्ही की फिल्मो के गीत चुन कर सुनवाए गए। सच्चा झूठा, आराधना, कटी पतंग, महबूब की मेहंदी, प्रेम कहानी फिल्मो के लोकप्रिय गीत सुनवाए गए। बुधवार को पुष्पांजलि, हिमालय की गोद में और हीर रांझा फ़िल्म का यह गीत -

ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं

गुरूवार को सेहरा, आराधना, घर, कन्यादान फ़िल्मों के गीतों के साथ यह गीत भी शामिल रहा -

आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ एक ऐसे गगन के तले

बुधवार और गुरूवार को ईमेल से प्राप्त फ़रमाइशें पूरी की जाती है अन्य दिन पत्र देखे जाते है। देश के अलग-अलग भागों से बहुत से पत्रों से गानों की फ़रमाइश भेजी गई और हर पत्र में भी बहुत से नाम रहे जबकि ई-मेल की संख्या कम ही रही।

प्रसारण के दौरान अन्य कार्यक्रमों के प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए और संदेश भी प्रसारित किए गए जिसमें यह बताया गया कि फ़रमाइशी फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम में अपनी पसन्द का गाना सुनने के लिए ई-मेल और एस एम एस कैसे करें। हैलो सहेली कार्यक्रम में भाग लेने के लिए बुधवार को फोन-इन-कार्यक्रम की रिकार्डिंग की सूचना दी गई जिससे पता चला कि कार्यक्रम का अवतार कुछ बदल सा गया है - बातचीत का विषय बताया गया - भारतीय समाज में नारी का स्थान। इसके अलावा नए साल से दोपहर 1 बजे से शुरू होने वाले नए कार्यक्रम हिट-सुपरहिट की भी सूचना दी।

कुल मिलाकर सप्ताह के अंतिम दिन के कार्यक्रम फीके ही रहे, हालांकि जान डालने की कोशिश की गई, गुलदस्ता और आपकी फ़रमाइश कार्यक्रम के बीच में चर्चित कलाकारों ने नए साल की शुभकामना देते हुए विविध भारती से अपने संबंध बताए और एक गीत की चंद पंक्तियों से शुभकामना दी। इला अरूण ने वक़्त फ़िल्म के गीत - ए मेरी ज़ोहरा ज़बीं गुनगुनाया।

इस प्रसारण को विनायक तलवलकर जी, नि्खिल धामापुरकर जी, फ़र्नाडिज़ जी, विनायक जी, मंगेश सांगले जी के तकनीकी सहयोग से हम तक पहुँचाया गया और यह कार्यक्रम श्रोताओं तक ठीक से पहुँच रहा है, यह देखने (मानीटर) करने के लिए ड्यूटी रूम में ड्यूटी अधिकारी रहे मीरा नायक, मालती माने।

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