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Thursday, October 28, 2010

गैर फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 28-10-10

विविध भारती फिल्मी गीतों का गढ़ माना जाता हैं। वास्तव में यही से बजने वाले फिल्मी गीतों से फिल्मे याद रहती हैं वरना हर सप्ताह रिलीज होने वाली फिल्मो के युग में पुरानी फिल्मो को याद रखना कठिन हैं।

फिल्मी गीतों के कार्यक्रम की दो श्रेणियां हैं - फरमाइशी और गैर फरमाइशी जिनमे से महत्वपूर्ण हैं गैर फरमाइशी फिल्मी गीतों के कार्यक्रम जिसमे गीत सुनवाने के लिए श्रोताओं का दबाव नही होता हैं। विविध भारती खुद निर्णय लेकर विभिन्न रूपों में कुछ इस तरह से गीत सुनवाती हैं कि सभी गीतों को सुना जा सकता हैं।

इस समय विविध भारती से गैर फरमाइशी फिल्मी गीतों के तीन कार्यक्रम हैदराबाद में सुने जाते हैं भूले-बिसरे गीत, गाने सुहाने और सदाबहार नगमें जिनमे से भूले-बिसरे गीत सुबह के पहले प्रसारण का और गाने सुहाने शाम में प्रसारित होने वाला दैनिक कार्यक्रम हैं तथा सदाबहार नगमें सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को दोपहर बाद में प्रसारित होने वाला कार्यक्रम हैं।

सुबह के प्रसारण में आधे घंटे के लिए 7 बजे से 7:30 तक प्रसारित होता हैं कार्यक्रम भूले-बिसरे गीत जिसमे पुराने फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं। शाम में 5 बजे दिल्ली से प्रसारित होने वाले समाचारों के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद 5:05 बजे से 5:30 तक प्रसारित होता हैं कार्यक्रम गाने सुहाने जिसमे अस्सी के दशक और उसके बाद के फिल्मी गाने सुनवाए जाते हैं। शनिवार और रविवार को आधे घंटे के लिए 3 बजे से 3:30 तक प्रसारित होता हैं कार्यक्रम सदाबहार नगमे जिसमे पचास-साठ के दशक के लोकप्रिय फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं।

इस तरह आजकल के फिल्मी गीतों के लिए कोई कार्यक्रम नही हैं। वैसे फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम में आजकल के गीत सुनवाए जाते हैं पर यदि गैर फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम में ऐसे गीत सुनवाए जाए तो सभी गीत सुनने को मिलेगे। हमारा अनुरोध हैं कि एक ऐसा कार्यक्रम भी शुरू कीजिए या हो सकता हैं ऐसा कोई कार्यक्रम किसी ऐसे समय प्रसारित हो रहा हैं जिसे क्षेत्रीय प्रसारण के कारण बहुत से शहरों के श्रोता नहीं सुन पाते हो, तब ऐसे समय प्रसारित कीजिए जो क्षेत्रीय प्रसारण का समय न हो ताकि सभी इसका आनंद ले सकें। इस तरह विविध भारती से बहुत पुराने गीतों से लेकर नई रिलीज फिल्मो के गीत तक सुनने को मिलेगे।

आइए इस सप्ताह प्रसारित इन तीनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

यह तीनो ही कार्यक्रम सुनने में कठिनाई हुई। तकनीकी गड़बड़ी थी। पता नही यह समस्या कहाँ से रही, क्षेत्रीय प्रसारण केंद्र से या हमारे ही क्षेत्र से किसी केबल समस्या के कारण प्रसारण ठीक से सुनाई नही दिया। आवाज बहुत धीमी रही, खरखराहट से कभी कुछ भी सुनाई नही दिया। कभी-कभार साफ़ आवाज आई। मंगलवार सुबह तक यही समस्या रही, बाद में प्रसारण सामान्य रहा। जो कुछ भी सुना उसी के आधार पर लिख रही हूँ।

सुबह 7 बजे भूले-बिसरे गीत कार्यक्रम में शुक्रवार को एक ख़ास बात रही, एक युगल गीत में आशा भोंसले की आवाज को छोड़ कर सभी गीतों में भूली-बिसरी आवाजे रही। मधुमती फिल्म का वह लोकप्रिय गीत सुनवाया गया जिसे बिजॉय मुखर्जी ने गाया हैं, जिनके गाए गीत बहुत ही कम हैं - तन जले मन जलता रहे

तलत महमूद का एक ऐसा शांत गीत सुनवाया गया जिसमे संगीत भी बहुत कम था। मुझे याद नही मैंने इस गीत को पहले कभी सुना हो - किसको खबर थी

अलग-अलग मूड के गीत सुनना अच्छा लगा - उदास गीत के बाद छैला बाबू फिल्म का यह मजेदार गीत सुनवाया गया -

देखो जी बहके हैं चाल संभाल के

इसी मूड का शमशाद बेगम और साथियों का गाया दिल्लगी फिल्म का यह अक्सर सुनवाया जाने वाला गीत भी शामिल था -

मेरी प्यारी पतंग, चली बादल के संग
दे ढील दे ढील ओ री सखि हाय वो काटा

शनिवार को ऐसे लोकप्रिय गीत सुनवाए गए जो अक्सर सुने जाते हैं - देख ली तेरी खुदाई

मुकेश का गाया गीत - मुझे रात-दिन ये ख्याल हैं

सुरैया का - धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम

टैक्सी ड्राइवर फिल्म का गीत भी शामिल था। साथ ही सुनवाया गया कम सुना जाने वाला गीत - आन बसों बनवारी

रविवार को विभिन्न मूड के अक्सर सुने जाने वाले गीत सुनवाए गए -

मोहब्बत इसको कहते हैं फिल्म से - महफ़िल में आप आए जैसे के चाँद आया

सुरैया का गाया अफसर फिल्म से - नैना दीवाने एक नही माने करे मनमानी

कम सुने जाने गीत भी शामिल थे, छैला बाबू, सात समुन्दर पार फिल्म से और सैया से नेहा लगाए फिल्म से कमल बारोट और शमशाद बेगम का गाया यह गीत मैंने शायद ही पहले सुना -

नैना मोरे कजरारे हमें लग गई नजरिया

सोमवार को कठपुतली, जग्गा डाकू, पंचायत फिल्मो के लोकप्रिय गीतों के साथ कम सुने जाने वाले गीतों में राकेट टार्जन फिल्म का गीत और यह गीत भी सुनवाया - मैं हो गई साजन तेरी

मंगलवार को यह कार्यक्रम भारतीय सिनेमा के ख्यात फिल्मकार - अभिनेता, निर्माता- निर्देशक व्ही। शांताराम की पुण्य स्मृति में समर्पित रहा। शुरूवात के लिए बहुत ही उचित गीत चुन कर सुनवाया गया, पंडित जसराज का गाया शास्त्रीय संगीत में पगा लड़की सहयाद्रि की फिल्म से -

वन्दना करो, अर्चना करो

जिसके बाद उनकी बेहतरीन फिल्म दो आँखे बारह हाथ से सम्मिलित स्वरों में यह प्रार्थना सुनवाई गई -

ऐ मालिक तेरे बन्दे हम

उनके बारे में भी बताया गया।

बुधवार को भी मिले-जुले गीत सुनवाए गए यानि जो अक्सर सुनवाए जाते हैं जैसे चंडीदास फिल्म से कुंदनलाल सहगल का गाया गीत, कम सुनवाए जाने वाले गीत भी सुनने को मिले जैसे मैं हूँ जादूगर फिल्म से यह गीत -

कोई नही मेहरबां मुश्किल में हैं जाँ

मदारी, तू ही मेरी जिन्दगी, एक राज, रंगीन रातें फिल्मो के गीत सुनवाए गए।

आज का कार्यक्रम गीतकार अंजान को समर्पित रहा। अक्सर सुने जाने वाले गीत सुनवाए गए - गोदान, हॉलीडे इन बॉम्बे फिल्मो से और यह गीत -

मेरे दो नैना मतवाले किस के लिए

कम सुनवाए जाने वाले गीत भी बजे जैसे रूस्तम कौन फिल्म से यह गीत -

क मने करले ह मने हमसे प मने प्यार

यह कार्यक्रम प्रायोजित रहा। प्रायोजक के विज्ञापन भी प्रसारित हुए।

5 बजे समाचारों के पाँच मिनट के बुलेटिन के बाद गाने सुहाने कार्यक्रम प्रसारित हुआ जिसमे अस्सी के दशक और उसके बाद के लगभग सभी ऐसे गीत सुनवाए गए जो लोकप्रिय हैं। शुक्रवार को शुरूवात की इस गीत से -

मदहोश दिल की धड़कन चुप सी तन्हाई

जिसके बाद कुर्बानी फिल्म का गीत सुनवाया गया फिर समापन किया आई मिलन की रात फिल्म के गीत से।

शनिवार को ख्वाबो की रानी जाने जाँ कब से तेरी तलाश हैं गीत के साथ तेरी क़सम फिल्म का गीत भी सुनवाया गया।

रविवार को हकीक़त, प्यार दीवाना होता हैं और दिल हैं के मानता नही फिल्म का शीर्षक गीत और आशिकी फिल्म से यह गीत सुनना भी अच्छा लगा -

नजर के सामने जिगर के पास कोई रहता हैं वो हो तुम

सोमवार को शुरूवात नाजायज फिल्म के पपिया झपिया गीत से की। सात रंग के सपने फिल्म का गीत भी सुनवाया गया और यह गीत भी शामिल था -

तुम क्या मिले जानेजाँ प्यार जिन्दगी से हो गया

मंगलवार को राम-लखन, दाग द फायर फिल्म के गीत और तेज़ाब फिल्म से यह गीत भी सुनवाया गया -

कह दो के तुम हो मेरी वरना

बुधवार को खिलाड़ी, मैं खिलाड़ी तू अनाडी फिल्मो के गीतों के साथ यह गीत भी शामिल था - ऐ मेरे हमसफ़र ऐ जानेजाना

आज शुरू में सुनवाया - इश्क बिना क्या जीना, इश्क बिना क्या मरना

और प्यार हो गया फिल्म के गीत के बाद समापन किया इस गीत से - वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता हैं

गानों के बीच में नई फिल्मो के विज्ञापन प्रसारित हुए। शुरू और अंत में संकेत धुन सुनवाई गई, जो विभिन्न फिल्मी गीतों के संगीत के अंशो को जोड़ कर तैयार की गई हैं।

दोपहर 3 बजे शनिवार और रविवार को प्रस्तुत हुआ कार्यक्रम सदाबहार नग़में। शनिवार को जब हम केन्द्रीय सेवा से जुड़े तब साथी फिल्म का शीर्षक गीत चल रहा था। इसके बाद अलग-अलग मूड के गाने सुनवाए गए -

दुनिया उसी की ज़माना उसी का

ये रात ये चांदनी फिर कहाँ

और हिमालय की गोद में फिल्म का कांकरिया मार के जगाया गीत भी शामिल था।

रविवार को जब हम केन्द्रीय सेवा से जुड़े तब अनाडी फिल्म के शीर्षक गीत का अंतिम अंतरा चल रहा था। इस कार्यक्रम में इसी फिल्म का एक और गीत सुनवाया गया, साथ ही कन्हैया और काली टोपी लाल रूमाल फिल्मो से भी दो-दो गीत सुनवाए गए। इससे लगा कि आयोजन विशेष था और शायद किसी एक वर्ष के सदाबहार गीत सुनवाए गए, पर न वर्ष बताया और न ही ऎसी कोई जानकारी दी। हो सकता हैं कार्यक्रम के शुरू में विवरण बताया गया हो, पर यहाँ हैदराबाद में और शायद कुछ अन्य शहरों में भी क्षेत्रीय प्रसारण के बाद 3 बजे से जुड़ते हैं तब तक कार्यक्रम शुरू हो चुका होता हैं इसी से कुछ पता नही चला। हमारा अनुरोध हैं कि ऎसी कोई जानकारी बाद में भी दीजिए और समापन पर अनिवार्य रूप से दीजिए जिससे सबको पता चले। विभिन्न मूड के गीत सुनने को मिले -

अब कहाँ जाए हम

लागी छूटे न अब तो सनम

तीनो कार्यक्रमों के दौरान अन्य कार्यक्रमों के प्रायोजको के विज्ञापन भी प्रसारित हुए।

Tuesday, October 26, 2010

मैं पीतल की पायलियाँ भी पहनूं जो पाँव में सोने का भाव गिर जाए

आज मुझे अस्सी के दशक का एक गीत याद आ रहा हैं जिसे शायद रीना राय पर फिल्माया गया हैं। इस फिल्म में शायद शत्रुघ्न सिन्हा भी हैं। फिल्म का नाम शायद कालीचरण या विश्वनाथ या कोई और हैं।

लताजी के गाए इस फिल्म का केवल मुखड़ा ही मुझे याद आ रहा हैं। पहले रेडियो से बहुत सुनते थे पर अब लम्बे समय से नही सुना। जो बोल याद आ रहे वो इस तरह हैं -

मैं पीतल की पायलियाँ भी पहनूं जो पाँव में सोने का भाव गिर जाए

शीशे का भी नथ जो चढ़ा लूं नथनियां में हीरे का भाव गिर जाए

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Thursday, October 21, 2010

गैर फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 21-10-10

गीतों के कार्यक्रम हमेशा से ही विविध भारती के प्रमुख कार्यक्रम माने गए हैं। जितना महत्व फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों का हैं उतने ही महत्वपूर्ण हैं गैर फिल्मी गीतों के कार्यक्रम। पहले लगभग हर विधा के गैर फिल्मी गीत सुनवाए जाते थे लेकिन कुछ ही समय पहले किए गए परिवर्तनों से विविध भारती की यह श्रेणी बहुत कमजोर हुई हैं।

शाम बाद के प्रसारण में जयमाला के बाद 7:45 पर 15 मिनट के लिए प्रसारित होने वाले दो साप्ताहिक कार्यक्रम मंगलवार को प्रसारित होने वाली बज्म-ऐ-क़व्वाली और शुक्रवार को प्रसारित होने वाला लोक संगीत कार्यक्रम या तो बंद कर दिए गए हैं या ऐसे समय प्रसारित हो रहे हैं जो क्षेत्रीय प्रसारण का समय हैं। अगर प्रसराण समय बदला हैं तब भी ठीक नहीं क्योंकि बहुत से श्रोता सुन नहीं पाते और अगर ये कार्यक्रम बंद कर दिए गए हैं तब हम यह अनुरोध करते हैं कि इन दोनों कार्यक्रमों को दुबारा शुरू कीजिए और ऐसे समय प्रसारित कीजिए जो क्षेत्रीय प्रसारण का समय न हो ताकि सभी इसका आनंद ले सकें।

आजकल गैर फिल्मी गीतों के दो ही कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं - वन्दनवार और गुलदस्ता। दोनों ही बढ़िया कार्यक्रम हैं और प्रसारण समय भी उचित हैं।

सुबह 6:00 बजे दिल्ली से प्रसारित होने वाले समाचारों के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद 6:05 पर हर दिन पहला कार्यक्रम प्रसारित होता हैं - वन्दनवार जो भक्ति संगीत का कार्यक्रम हैं। इसके तीन भाग हैं - शुरूवात में सुनवाया जाता हैं चिंतन जिसके बाद भक्ति गीत सुनवाए जाते हैं। इन गीतों का विवरण नही बताया जाता हैं। पुराने नए सभी गीत सुनवाए जाते हैं। उदघोषक आलेख प्रस्तुति के साथ भक्ति गीत सुनवाते हैं और समापन देश भक्ति गीत से होता हैं। आरम्भ और अंत में बजने वाली संकेत धुन बढ़िया हैं।

शाम बाद के प्रसारण में जयमाला के बाद सप्ताह में तीन बार शुक्रवार, रविवार और मंगलवार को 7:45 पर 15 मिनट के लिए प्रसारित किया जाता हैं कार्यक्रम गुलदस्ता जो गजलों का कार्यक्रम हैं।

इस तरह हम गैर फिल्मी गीतों में भक्ति गीत, देश भक्ति गीत और गजल सुनते हैं। इनमे अगर नई रचनाएं भी सुनवाई जाती हैं तब भी गीत की विधा सीमित ही हैं। आजकल नए जमाने के गीतों में किस तरह का गीत-संगीत चल रहा हैं, इसका पता विविध भारती से नहीं चल रहा जबकि लगता हैं नए गायक कलाकार आजकल बहुत हैं और निजी संकलन के गीतों के अलावा एलबम भी बहुत हैं। हमारा अनुरोध हैं कि नए जमाने के गीतों का एक ऐसा कार्यक्रम भी शुरू कीजिए या हो सकता हैं ऐसा कोई कार्यक्रम किसी ऐसे समय प्रसारित हो रहा हैं जिसे क्षेत्रीय प्रसारण के कारण बहुत से शहरों के श्रोता नहीं सुन पाते हो, तब ऐसे समय प्रसारित कीजिए जो क्षेत्रीय प्रसारण का समय न हो ताकि सभी इसका आनंद ले सकें। इस तरह पुराने नए और सभी विधाओं के गैर फिल्मी गीतों को हम सुन पाएगे।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

शुक्रवार को नवरात्र का महत्वपूर्ण दिन था - दुर्गाष्टमी। इस दिन सुबह-सवेरे पहले कार्यक्रम वन्दनवार में एक भी माँ दुर्गा का भक्ति गीत नही था। एक भी साकार रूप का भक्ति गीत नही सुनवाया गया। सभी निराकार रूप के भक्ति गीत सुनवाए गए। शुरूवात की इस भक्ति गीत से -

प्रभु संग प्रेम की डोर बाँध ले
और अपने जीवन को साध ले

उसके बाद कबीर की रचना सुनवाई - मैली चादर ओड़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं

फिर शास्त्रीय पद्धति में ढला भक्ति गीत सुनवाया गया -

ठाकुर तुम संग नाही आए
उतर गयो मेरो मन का संसार

भक्ति गीतों का समापन किया मलूकदास की इस रचना से - दीनबन्धु दीनानाथ मेरी सुध लीजिए

अगले दिन शनिवार को नवरात्र का अंतिम दिन था। इसे ध्यान में रख कर भक्ति गीतों का समापन किया माँ दुर्गा के इस भक्ति गीत से -

शेरा पहाडा वाली माँ
जब तेरा बुलावा आए
मैनु बड़ा चंगा लगता

इस दिन शुरूवात की इस साकार रूप के भक्ति गीत से - जय राधा माधव जय कुञ्ज बिहारी

इसके बाद निर्गुण भक्ति धारा बही - भटकता डोले काहे प्राणी

रविवार को सुबह के इस पहले कार्यक्रम में दशहरा की शुभकामनाएं तक नही दी। शुरूवात हुई इस भक्ति गीत से, यह भजन मैंने पहली बार सुना, अच्छा लगा -

अबकी बार उबारो प्रभुजी

अगला भजन राम की महिमा का रहा - जिनके ह्रदय राम बसे उन्हें काहे की कमी

इसके बाद के दोनों भक्ति गीत, शिव और कृष्ण की जयजयकार के लोकप्रिय भक्ति गीत रहे। सोमवार को सभी लोकप्रिय भक्ति गीत सुनवाए गए। शुरूवात की सामान्य भक्ति गीत से जिसके बाद राम और शिव भक्ति के गीत सुने -

मैं काँवडिया , मैं भोले का पुजारी
भोले बसे हैं मेरे मन में

मंगलवार को भी लोकप्रिय भक्ति गीत सुनवाए गए जैसे कबीर की रचना - बिना विचारे जो करे वो पाछे पछताए

बुधवार को यह कार्यक्रम बहुत खराब रहा। शुरूवात फिल्मी भक्ति गीत से की। दिन की शुरूवात का भक्ति संगीत का गरिमामय कार्यक्रम फिल्मी भजन से शुरू हो तो अच्छा नही लगता। पहले भजन के बाद दूसरा भजन भी फिल्मी ही रहा। बाद के दो - कृष्ण भक्ति और मीरा का भजन रहा।

आज मिले-जुले भजन सुनवाए गए। निर्गुण और सगुण साकार रूप की भक्ति, नया भक्ति गीत भी सुनवाया गया। समापन किया फिल्मी गीत से।

यह गैर फिल्मी गीतों का कार्यक्रम हैं। इस तरह के कार्यक्रम पहले ही बहुत कम हैं जबकि फिल्मी गीत तो दिन-रात बजते ही रहते हैं। यहाँ तक कि सेहतनामा जैसे कार्यक्रमों में भी फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं, फिर कम से कम गैर फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों को तो पूरी तरह से गैर फिल्मी रहने दीजिए। और फिर वन्दनवार जैसा प्रतिष्ठित कार्यक्रम... समझ में नही आता हैं वन्दनवार जैसे कार्यक्रम में फिल्मी घुसपैठ क्यों होती हैं। विनम्र अनुरोध है कृपया फिल्मी भक्ति गीतों का अलग कार्यक्रम रखिए, ऐसे समय जहां क्षेत्रीय कार्यक्रमों का समय न हो ताकि हम इन फिल्मी भक्ति गीतों का आनंद ले सके।

हर दिन वन्दनवार का समापन होता रहा देश भक्ति गीतों से, यह लोकप्रिय गीत सुनवाए गए -

किरण पुंज ले हम चले आ रहे हैं
धरा को सजाओ गगन ला रहे हैं

छोड़ मत पतवार न बिसरे

यह भूमि हमारी वीरों की
हम सिन्धों की संतान हैं
हम भारत माँ की शान हैं

थोड़ी मिट्टी ले ईश्वर ने सृजन किया

लिए मशालअपने-अपने घर से निकले हाथों में हम लिए मशाल

एक देश, देश के जवान एक हैं एक हैं जमीन आसमान एक हैं

किसी भी गीत के लिए रचयिता और संगीतकार के नाम नही बताए।

गुलदस्ता कार्यक्रम में शुक्रवार को आगाज हुआ कतिल राजस्थानी के कलाम से जिसे आवाजे दी मिताली और भूपेन्द्र सिंह ने -

राहों पे नजर रखना होठों पे दुआ रखना
आ जाए कोई शायद दरवाजा खुला रखना

इसके बाद मधुरानी की आवाज में सुनवाया फैज का मशहूर कलाम -

असर उसको ज़रा नहीं होता
वरना दुनिया में क्या नही होता

इस तरह दो गजले सुनी, एक नई और एक पुरानी, दोनों अच्छी रही।

रविवार को शुरूवात हुई परवेज मेहदी की आवाज में अदीम हाशमी के कलाम से - फासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था

महफ़िल एकतेदाम को पहुंची इन्द्राणी मुखर्जी की आवाज में कैजल उल जाफरी के कलाम से -

कितने जालिम हैं के गम को भी खुशी कहते हैं लोग
शमा पिघलती जा रही रोशनी कहते हैं लोग

मंगलवार को तीन गजले सुनी। कृष्ण बिहारी नूर की रचना से आगाज हुआ, गुलोकारा रही छाया गांगुली -

पलको के ओट में वो छुपा ले गया मुझे
यानि नजर नजर से बचा ले गया मुझे

फिर जफ़र कलीम का मशहूर कलाम सुना, गुलोकार रहे हरिहरन - कोई पत्ता हिले हवा तो चले

आखिर में आशा भोंसले की आवाज में हसन कमाल को सुना -

इन्तेजार का हुनर चला गया
चाहा था एक शख्स को जाने किधर चला गया

इस तरह, इस सप्ताह गुलदस्ता अच्छा रहा। इसकी संकेत धुन भी अच्छी हैं। सबसे अच्छा लगता हैं कार्यक्रम के अंत में यह कहना - ये था विविध भारती का नजराना - गुलदस्ता

Thursday, October 14, 2010

विविध भारती के मेहमान - साप्ताहिकी 14-10-10

विविध भारती में लगभग हर दिन मेहमान आते हैं। विशिष्ट व्यक्तियों के अनुभव, उनकी संघर्ष यात्रा के साथ महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी मिलती हैं। साथ-साथ सुनने को मिलते हैं उनके पसंदीदा गीत भी। यह कार्यक्रम हैं -

शुक्रवार - सरगम के सितारे
शनिवार - विशेष जयमाला
रविवार - उजाले उनकी यादो के
सोमवार - सेहतनामा
बुधवार - आज के मेहमान और इनसे मिलिए


इनमे से विशेष जयमाला विविध भारती की लगभग शुरूवात से ही हैं। जहां तक मेरी जानकारी हैं पहली मेहमान हैं ख्यात अभिनेत्री नरगिस। अन्य कार्यक्रम समय के साथ-साथ विविध भारती से जुड़ते गए। इनमे से विशेष जयमाला को छोड़ कर सभी भेंटवार्ताएं हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

शाम बाद के प्रसारण में 7 बजे दिल्ली से प्रसारित समाचारों के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद फ़ौजी भाईयों के जाने-पहचाने सबसे पुराने कार्यक्रम जयमाला में शनिवार को विशेष जयमाला प्रस्तुत किया आज के दौर के संगीतकार और गायक हिमेश रेशमिया ने। लेकिन उदघोषणा में केवल संगीतकार बताया गया। उन्होंने भी अपनी प्रस्तुति में खुद के स्वरबद्ध किए गीत सुनवाए पर खुद के गाए गीत नही सुनवाए, हालांकि उनके गाए गीत लोकप्रिय हैं।

अच्छा लगा कि उन्होंने नए पुराने सभी समय के गीत सुनवाए। शुरूवात उनके नए गीत प्यार किया तो डरना क्या फिल्म के शीर्षक गीत से की। समापन में भी ऐसे ही नए गाने सुनवाए। बताया कि शंकर जयकिशन उनके पसंदीदा संगीतकार हैं। पुरानी फिल्म ताजमहल फिल्म का गीत सुनवाया। अपने पिता के पसंदीदा संगीतकार एस डी बर्मन की फिल्म अभिमान का गीत सुनवाया।

कारगिल की हल्की सी चर्चा के साथ फ़ौजी भाइयो को नमन किया। शुरू में ही बताया कि जयमाला कार्यक्रम बचपन से सुनते रहे हैं। इस कार्यक्रम को रमेश (गोखले) जी के सहयोग से शकुन्तला (पंडित) जी ने प्रस्तुत किया। यह कार्यक्रम प्रायोजित था। प्रायोजक के विज्ञापन प्रसारित हुए। बीच में क्षेत्रीय केंद्र से सन्देश भी प्रसारित हुए। शुरू और अंत में जयमाला की संकेत धुन बजी।

इसी समय के प्रसारण में बुधवार को जयमाला के बाद 7:45 पर 15 मिनट के लिए प्रसारित होता हैं कार्यक्रम इनसे मिलिए। इस कार्यक्रम की अवधि बहुत कम हैं, केवल 15 मिनट हैं। इसीलिए कभी-कभी यहाँ विविध भारती आधुनिक तकनीक का भी प्रयोग करती हैं जिसके अंतर्गत मेहमान को अपने स्टूडियो में आमंत्रित न कर टेलीफोन पर ही बात कर ली जाती हैं। इस सप्ताह भी यही हुआ। संगीतकार उत्तम सिंह से अमरकांत (दुबे) जी की टेलीफोन पर की गई बातचीत सुनवाई गई। यह बातचीत की दूसरी और अंतिम कड़ी थी। इसमे बताया कि मनोज कुमार ने शिरडी के साईँ बाबा फिल्म बनाते समय उत्तम सिंह को आमंत्रित किया और पहले से ही वहां जगदीश खन्ना काम कर रहे थे। यही पर बनी जोडी उत्तम-जगदीश और इसके साईँ बाबा बोलो सहित दो गाने तैयार किये। फिर साथ काम किया। एलबम भी शुरू किया। लेकिन जगदीश जी के निधन से जोडी टूटी। बाद में यश चोपड़ा ने उत्तम सिंह को आमंत्रित किया, यहाँ दिल तो पागल हैं शीर्षक गीत की हल्की चर्चा हुई गीत सुनवाया गया और यह कार्यक्रम यह कहते हुए समाप्त हुआ कि लम्बी बातचीत की जा सकती हैं।

मुझे लगा यह बातचीत सरगम के सितारे या आज के मेहमान कार्यक्रम के अंतर्गत की जा सकती थी। उनका वारिस फिल्म से यह गीत सदाबहार हैं -

मेरे प्यार की उम्र हो इतनी सनम तेरे नाम से शुरू तेरे नाम पे ख़त्म

और भी अच्छे गीत हैं। इस कार्यक्रम को तेजेश्री (शेट्टे) जी के तकनीकी सहयोग से वीणा (राय सिंघानी) जी ने प्रस्तुत किया।

शेष कार्यक्रम शाम 4 से 5 बजे तक पिटारा कार्यक्रम के अंतर्गत प्रसारित किए जाते हैं। पिटारा कार्यक्रम की अपनी परिचय धुन है और सेहतनामा को छोड़कर अन्य दोनों कार्यक्रमों की अलग परिचय धुन है जिसमे आज के मेहमान कार्यक्रम की धुन अच्छी लगती हैं जिसमे यह श्लोक भी हैं -

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम
आनंद मंगल मंगलम
इत प्रियम भारत भारतम

पहले पिटारा की संकेत धुन बजती हैं फिर कार्यक्रम की संकेत धुन।

शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम सरगम के सितारे। इस कार्यक्रम के मेहमान संगीत के क्षेत्र से होते हैं और बातचीत गीतों के बनने पर केन्द्रित होती हैं जैसा कि शीर्षक से ही समझा जा सकता हैं। इस सप्ताह आज के दौर की पार्श्व गायिका महालक्ष्मी अय्यर से ममता (सिंह) जी की बातचीत सुनवाई गई। दो भागो में की गई इस बातचीत के दूसरे भाग का प्रसारण हुआ। शुरू में फना फिल्म के इस गीत पर चर्चा हुई जो गाने में कठिन हैं - चन्दा चमके जिसके लिए बताया कि जो शास्त्रीय संगीत सीखते हैं उनके लिए कठिन नही क्योंकि नियमित रियाज से जबान पतली हो जाती हैं। यह भी बताया कि बच्चो को यह गीत बहुत पसंद आया। जतिन-ललित के साथ तैयार इस गीत के अनुभव बताए। इसी फिल्म के इस देश भक्ति गीत पर भी चर्चा हुई - देश मेरा रंगीला

गानों के विविध रंगों की भी जानकारी दी जैसे दक्षिण में मैलोडी अधिक हैं, पंजाब में रिदम, बंगाली गीतों में लोक संगीत आदि। यह भी बताया कि बचपन से गा रही हैं। अब तक गाए गीतों में सलाम नमस्ते का गीत - तू जहां, अधिक पसंद हैं। पहली बार सुभाष जी और अनु मलिक के साथ रिकार्डिंग के अनुभव बताए। शादी-ब्याह की नोंक-झोक के गीत की रिकार्डिंग के समय को भी याद किया जो अमिताभ बच्चन और जावेद साहब के साथ के अनुभव हैं। चर्चा किए गए सभी गीत सुनवाए और उनका यह ख़ास गीत भी सुनवाया जो बहुत लोकप्रिय हैं -

कभी शाम ढले तो मेरे दिल में आ जाना

लगभग बारह साल का ही करिअर हैं इसीलिए बातचीत में भी आसानी रही। अंत में व्यक्तिगत जानकारी भी दी कि उनकी बहने भी गाती हैं। शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली हैं।

इस भेंटवार्ता का ध्वन्यांकन किया चित्रलेखा (जैन) जी ने। इस कार्यक्रम को दिलीप (कुलकर्णी) जी के तकनीकी सहयोग से वीणा (राय सिंघानी) जी ने प्रस्तुत किया।

रविवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम उजाले उनकी यादो के। शीर्षक के अनुसार इस कार्यक्रम में बीते समय के कलाकार अपनी यादे श्रोताओं से बाँटते हैं। इस सप्ताह मेहमान रही बीते समय की जानी-मानी पार्श्व गायिका शमशाद बेगम। इस कार्यक्रम में एक ख़ास बात होती हैं, जब भी मेहमान बुजुर्गवार हो तब विविध भारती उन्हें अपने स्टूडियो आने का कष्ट नही देती बल्कि खुद ही उनके घर जाती हैं रिकार्डिंग के लिए। यह अच्छी संस्कृति हैं विविध भारती की। इस बार भी यही हुआ। शमशाद बेगम के घर पर बातचीत रिकार्ड की गई। बातचीत की कमल (शर्मा) जी ने।

बातचीत की शुरूवात शुरू से ही हुई यानि बचपन से जब न हमारी यह प्रिय गायिका और न ही उनके घरवाले ग्रामोफोन जैसी चीज को जानते-पसंद करते थे। बताया कि गाने का शौक तो बचपन से रहा पर किसी ने हौसला नही बढ़ाया। माहौल भी ऐसा ही था। प्रारम्भिक शिक्षा भी लाहौर के प्राइमरी स्कूल में हुई।बाद में अवसर मिला और ऑडिशन देने पहुंची मास्टर गुलाम हैदर के पास। पहली बार गामोफोन के लिए 12 गाने रिकार्ड किए। पहले भुगतान की भी बात बताई। फिर पेशावर रेडियो से शुरूवात की जहां ग्रामोफोन आर्टिस्ट की हैसियत से गाना शुरू किया।

हम उन्हें फिल्मो की पार्श्व गायिका की हैसियत से जानते हैं पर बातचीत में फिल्मो में प्रवेश के पहले की बातों से न सिर्फ गायिका का परिचय मिला बल्कि उस समय के सामाजिक माहौल, संगीत के प्रति नजरिए की जानकारी मिली। साथ ही यह भी पता चला कि पहले गाने की शुरूवात ग्रामोफोन रिकार्ड निकाल कर होती थी। रेडियो संस्कृति के बारे में भी बताया की पहले प्रोड्यूसर नही केंद्र निदेशक हुआ करते थे।

इस तरह इस पहली कड़ी से न सिर्फ फिल्मी बल्कि उनकी यादो से बहुत सी अन्य जानकारियाँ भी मिली। गीत भी अच्छे चुनकर सुनवाए गए - लोकप्रिय गीत जैसे -

बूझ मेरा क्या नाव रे

काहे कोयल शोर मचाए रे

कही पे निगाहें कही पे निशाना

और ऐसे गीत भी सुनवाए जो बहुत ही कम सुनने को मिलते हैं जैसे - मोरे घुंघरवाले बाल

आशा हैं आने वाले सप्ताहों में कड़ियाँ अधिक दिलचस्प रहेगी।

सोमवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम सेहतनामा। जाहिर हैं, इसमे डाक्टर साहब तशरीफ लाते हैं। इस सप्ताह मेहमान रहे, नेत्र रोग विशेषज्ञ डा राहुल नवलकर जिनसे निम्मी (मिश्रा) जी की बातचीत सुनवाई गई। सबसे पहले संक्रमण के बारे में विस्तार से जानकारी दी कि पहले बैक्टीरिया से संक्रमण होता था, आजकल वायरस से होता हैं। गरमी बढ़ने से संक्रमण बढ़ता हैं। संक्रमित आँखों की ओर देखने से संक्रमण नही फैलता बल्कि संक्रमित व्यक्ति जिन चीजो को छूते हैं उसे छूने से संक्रमण फैलता हैं। इसीलिए जिन्हें संक्रमण हैं उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर नही जाना चाहिए। काला चश्मा संक्रमित आँखों के संरक्षण के लिए दिया जाता हैं। इस तरह इससे सम्बंधित भ्रान्ति दूर हुई। सलाह भी अच्छी दी कि संक्रमण होने पर पहले गुनगुने पानी से आँखों को धोए। अगर सुबह उठने पर पलकें चिपकने लगे तब डाक्टर के पास जाए, लेकिन केवल केमिस्ट की सलाह से दवा न ले।

महत्वपूर्ण जानकारी यह भी दी कि आँखों का विकास 80% गर्भ में होता हैं इसीलिए गर्भवती महिला के खानपान में विटामिन ऐ होना चाहिए जिसके लिए गाजर, संतरा, हरी पत्तेदार सब्जियां खाएं। इसीलिए शिशुओं की आँखों की जांच भी 9 साल तक हर साल कराएं। अगर तिरछापन होगा तो इसी समय ठीक किया जा सकता हैं जिसके लिए ऑपरेशन से न घबराएं।

कैटेराक के बारे में भी अच्छी जानकारी दी कि अब पकने से पहले ही इसका ऑपरेशन किया जा सकता हैं। यह महत्वपूर्ण बात भी बताई कि विश्व में पहला रिकार्ड किया गया ऑपरेशन यही हैं जिसे भारतीय वैद्य ने किया था।

बातचीत के साथ डाक्टर साहब की पसंद के नए-पुराने बढ़िया गीत सुनवाए गए - ओंकारा फिल्म से नैना ठग लेंगे गीत से शुरूवात की तो उमराव जान की आँखों की मस्ती के गीत से समापन। डाक्टर साहब गाने का भी शौक रखते हैं इसीलिए गीत, मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया सुनवाने से पहले गुनगुनाया तो सुनकर बहुत अच्छा लगा। इस कार्यक्रम को पी के ए नायर जी के तकनीकी सहयोग से कमलेश (पाठक) जी ने प्रस्तुत किया।

बुधवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम आज के मेहमान जिसमे आमंत्रित मेहमान रहे जाने-माने फिल्म लेखक, शायर और गीतकार जावेद अख्तर। बातचीत की ममता (सिंह) जी ने। बातचीत की शुरूवात आज के दौर से हुई इसीलिए इस पहली कड़ी में संगीत पक्ष की बातचीत अधिक हुई क्योंकि इस दौर में जावेद साहब का नाम गीत रचना से अधिक जुड़ा हैं। शुरूवाती बात लक्ष्य फिल्म लेखन से हुई जिसे उन्होंने बताया कि लिखने में अधिक समय लगा। पहले आलोचना भी हुई पर बात में फिल्म पसंद की गई। इस गीत की भी चर्चा हुई -

कंधो से मिलते हैं कंधे

यहाँ हल्की सी चर्चा इस फिल्म को बनाने वाले उनके सुपुत्र फरहान की करना थोड़ा विषयांतर लगा पर गीत के बाद विषय सामान्य हो गया। आगे जावेद साहब ने बताया कि वह गीतकार नही लेखक बनना चाहते थे। अपने पहले गीत के बारे में बताया कि केवल यश चोपड़ा ही जानते थे कि वह शायर हैं, इसीलिए सिलसिला फिल्म में गीत लिखने के लिए कहा और इस तरह पहला गीत बना -

देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए

उनकी गीत लेखन की सीधी-सादी शैली पर भी चर्चा हुई, साथ-साथ जैसी फिल्मो के माध्यम से। इस शैली को उन्होंने पिता से मिली प्रेरणा बताया। अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भाषा पर नियंत्रण होना चाहिए और भाषा के साथ ख्याल होना चाहिए। अपने काम के बारे बताया कि धुन पर भी वह गीत लिख सकते हैं और लिखे गीत पर भी धुन तैयार की जाती हैं। संगीतकार ऐ आर रहमान की तारीफ़ की। एक बढ़िया बात बताई कि आजकल कि तेज धुन पर जरूरी नही कि अर्थ हीन बोल के गीत हो, बोल अच्छे भी हो सकते हैं। जुबेदा फिल्म के गीत को पसंद फरमाया।

चर्चा में आए गीत सुनवाए गए। बातचीत आगे की कड़ियों में जारी रहेगी। इस कार्यक्रम का सम्पादन किया युनूस (खान) जी ने। इसे संजय जी और विनायक (रेणके) जी के तकनीकी सहयोग से शकुन्तला (पंडित) जी ने प्रस्तुत किया।

इस तरह इस सप्ताह डाक्टर साहब को छोड़ कर सभी मेहमान फिल्म जगत से रहे और बातचीत भी गीत-संगीत की हुई। विविधता का न होना खासकर पिटारा कार्यक्रम में बहुत खराब लगा। शुक्रवार का कार्यक्रम हैं ही संगीत जगत के लिए। रविवार को भी गायिका से बातचीत की शुरूवात हुई। ऐसे में बुधवार की बातचीत रोकी जा सकती थी क्योंकि जावेद साहब से आज के दौर से बातचीत शुरू होने से यह पहली कड़ी गीत-संगीत की ही रही। वैसे बुधवार को अलग क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों से बातचीत की जाती तो बेहतर होता। फिल्मी माहौल से हट कर अन्य क्षेत्रों से भी परिचय होता। खासकर, इस समय देश में राष्ट्रमंडल खेलों के माहौल में अगर खेल जगत से कोई मेहमान आते तो अच्छा लगता। पुरानी रिकार्डिंग भी सुनवाई जा सकती थी।

Tuesday, October 12, 2010

जौहर महमूद इन गोवा (गोवा) फिल्म का नवरात्र का गरबा गीत

नवरात्र के इस शुभ अवसर पर याद आ रहा हैं एक गरबा गीत जिसकी फिल्म का नाम हैं - जौहर महमूद इन गोवा (गोवा)

गोवा मुक्ति आन्दोलन पर बनी यह सफल और लोकप्रिय फिल्म हैं। इसके अन्य गीत अकसर विविध भारती से सुनवाए जाते हैं पर यह गीत नही सुने लम्बा समय बीत गया।

आई एस जौहर, महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया हैं यह गीत शायद मन्नाडे, रफी साहब ने गाया हैं। यह माँ जगदम्बा का भक्ति गीत हैं। बहुत बढ़िया डांडिया डांस हैं। बहुत पसंद किया गया था यह गरबा गीत। पर मुझे इसका एक भी बोल याद नहीं आ रहा।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Thursday, October 7, 2010

महिला और युवा वर्ग के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 7-10-10

महिला और युवा वर्ग के कार्यक्रम आधुनिक विविध भारती की देन हैं। शुरूवाती दौर के कार्यक्रमों में ऐसे कोई कार्यक्रम नही हुआ करते थे। ये कार्यक्रम हैं सखि-सहेली और जिज्ञासा सखि-सहेली कार्यक्रम ख़ास तौर पर महिला वर्ग के लिए तैयार किया गया हैं। महिलाओं के लिए विशेष रूप से कार्यक्रम शायद पहली बार नब्बे के दशक में तैयार किया गया था। शाम 4 बजे प्रसारित होने वाले पिटारा के अंतर्गत दो कार्यक्रम चूल्हा-चौका और सोलह श्रृंगार जो रेणु (बंसल) जी प्रस्तुत किया करती थी। आजकल भी कभी-कभार चूल्हा-चौका के कुछ अंको का फिर से प्रसारण होता हैं।

सखि-सहेली कार्यक्रम पहले साप्ताहिक था पर अब सप्ताह में 5 दिन सोमवार से शुक्रवार तक प्रसारित होता हैं। इसमे महिलाओं के सम्पूर्ण अस्तित्व पर निगेहबानी की कोशिश की जा रही हैं। इसका समय भी महिलाओं के लिए अनुकूल हैं, दोपहर बाद 3 से 4 बजे तक एक घंटे के लिए यह कार्यक्रम प्रसारित होता हैं। इनमे से मंगलवार का कार्यक्रम युवा सखियों के लिए होता हैं, इस दिन करिअर संबंधी जानकारी दी जाने के कारण यह केवल लड़कियों के लिए ही नही बल्कि लड़को के लिए भी उपयोगी हैं। इस तरह इस दिन का कार्यक्रम युवा वर्ग का कार्यक्रम हुआ। वैसे युवाओं के लिए विशेष रूप से साप्ताहिक कार्यक्रम हैं - जिज्ञासा। 15 मिनट के इस कार्यक्रम का प्रसारण समय भी युवाओं के लिए उचित हैं - शनिवार रात 7:45 पर।

पहले विविध भारती पर युवाओं के लिए कोई विशेष कार्यक्रम नही था। बाद के वर्षों में जिज्ञासा कार्यक्रम शुरू किया गया था जो सामान्य ज्ञान का कार्यक्रम था। फिर इसे बंद कर रविवार को पिटारा के अंतर्गत यूथ एक्सप्रेस कार्यक्रम एक घंटे के लिए प्रसारित होता था फिर इसे भी बंद कर कुछ ही समय पहले जिज्ञासा शुरू किया गया। पहले के सामान्य ज्ञान के कार्यक्रम से अब इस कार्यक्रम का स्वरूप कुछ अलग हैं। वास्तव में यह सामान्य ज्ञान का कार्यक्रम हैं, इस तरह सबके लिए हैं पर इसी कारण से यह युवाओं के लिए अधिक उपयोगी हैं। शुरूवात और अंत में संकेत धुन बजती हैं जो अच्छी लगती हैं, संकेत धुन के साथ उपशीर्षक के साथ शीर्षक कहना भी अच्छा लगता हैं - ज्ञान की रेडियो एक्टिव तरंग - जिज्ञासा पर शीर्षक जिज्ञासा जिस अंदाज से कहा जाता हैं वो अच्छा नही लगता। सामान्य ज्ञान के इस कार्यक्रम के शीर्षक कहने में ऊर्जा, स्फूर्ति होनी चाहिए, यह तेज गति नजर नही आती।

सखि-सहेली कार्यक्रम का फलक विशाल हैं। सोमवार से गुरूवार तक के कार्यक्रमों का स्वरूप एक जैसा हैं, शीर्षक हैं - सखि-सहेली और शुक्रवार के कार्यक्रम का स्वरूप अलग हैं, शीर्षक हैं - हैलो सहेली। इसी के अनुसार इस कार्यक्रम की दो परिचय धुनें हैं - सोमवार से गुरूवार तक एक धुन जो थोड़ी लम्बी हैं और इसका एक अंश नई फिल्म यादें के एक गीत के संगीत का अंश हैं, इस तरह यह धुन उतनी अच्छी नही लगती। शुक्रवार को हैलो सहेली की अलग धुन सुनवाई जाती हैं जो ठीक हैं। इसमे शीर्षक के साथ उपशीर्षक भी कहा जाता हैं - सखियों के दिल की जुबां - हैलो सहेली ! शुरूवाती चार दिनों में हर दिन के लिए एक विषय निर्धारित हैं -सोमवार - रसोई, मंगलवार - करिअर, बुधवार - स्वास्थ्य और सौन्दर्य, गुरूवार - सफल महिलाओं की गाथा।

इन चारो दिनों में हर दिन दो उदघोषिकाएं आती हैं। विषय पर जानकारी देती हुई आपस में बतियाती हैं। सखियों की फरमाइश पर फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं। सखियों के पत्र भी पढ़े जाते हैं जिसमे नियत विषय पर जानकारी भी होती हैं। इस तरह हर विषय पर कुछ जानकारी विविध भारती की ओर से और कुछ जानकारी सखियों के पत्रों से दी जाती हैं। बीच-बीच में कभी-कभार कुछ अलग तरह से भी जानकारी दी जाती हैं जैसे झलकी या किसी अन्य भेंटवार्ता कार्यक्रम के अंश सुनवाए जाते हैं। शुक्रवार को कोई एक उदधोषिका सखियों से फोन पर बातचीत करती हैं और उनकी पसंद के फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं।

इन दोनों कार्यक्रमों को सुनकर ऐसा लगता हैं जब विविध भारती अपने पुराने पारंपरिक स्वरूप से अलग कार्यक्रम तैयार कर ही रही हैं तब बच्चो के लिए कोई कार्यक्रम क्यों नही किया जा सकता। बच्चो के लिए विविध भारती पर कुछ भी नही हैं। हमारा बचपन भी विविध भारती के प्यार-मोहब्बत के गाने सुनते हुए ही बीता हैं। अब तो कोई कार्यक्रम तैयार किया जा सकता हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

शुक्रवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम हैलो सहेली। फोन पर सखियों से बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। 8-10 फोन काल थे जिनमे से अधिकतर काल महाराष्ट्र से ही थे। एक बाढ़ग्रस्त स्थान से काल आया। सखि ने बताया कि गंगा के किनारे बाढ़ आई हैं जो कुछ ही दूरी पर हैं, सरकार सहायता कर रही हैं। पर फोन पर पूरी स्पष्ट बात हुई। कोई गड़बड़ नही।

ज्यादातर घरेलु महिलाओं ने बात की। बताया कि घर का कामकाज करती हैं। एक विवाहिता बहुत ही कम उम्र की थी, एक संयुक्त परिवार से थी। एक महिला ने बताया वह सिलाई का काम करती हैं जिससे अच्छी आय हो जाती हैं। एक सखि ने अपनी मूक-बधिर बेटी के बारे में बताया कि वह उसी विशेष स्कूल में पढ़ती हैं। एक शारीरिक रूप से कमजोर सखि ने भी बात की और कहा कि वह अपना काम स्वयं करती हैं। इस दिन वृद्धावस्था दिवस था। एकाध सखि से इस बारे में भी बात हुई, सखि ने बताया कि हमें बुजुर्गो का ध्यान रखना हैं जिससे यही संस्कार बच्चों में भी आते ही।

एक सखि ने 2 अक्टूबर की चर्चा कर बालक फिल्म का यह गीत सुनवाने का अनुरोध किया -

सुन ले बापू ये पैगाम मेरी चिट्ठी तेरे नाम

सखियों की पसंद पर नए-पुराने और बीच के समय के गाने सुनवाए गए जैसे पुराना गीत -

दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियाँ

नगीना, मैंने प्यार किया, हीर रांझा फिल्मो के गीत।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से शहरों से भी फोन आए, गाँव, जिलो से फोन आए। पूरा कार्यक्रम सुन कर लगा कि सखियाँ दुःख, कष्ट होने पर भी राह निकाल कर आगे बढ़ रही हैं। सखियों ने विविध भारती के कार्यक्रमों को पसंद करने की बात कही लेकिन खेद रहा कि 3 अक्टूबर, विविध भारती के जन्मदिन की चर्चा किसी ने नही की और उसके तुरंत बाद आयोजित हो रहे विश्व स्तर के राष्ट्रमंडल खेलो की भी चर्चा नही की। कम से कम इन खेलो के बारे में रेणु जी खुद चर्चा करती। कम से कम महिला खिलाड़ियों को शुभकामनाएं देते। कार्यक्रम के समापन पर बताया गया कि इस कार्यक्रम के लिए हर बुधवार दिन में 11 बजे से फोन कॉल रिकार्ड किए जाते हैं जिसके लिए फोन नंबर भी बताए - 28692709 28692710 मुम्बई का एस टी डी कोड ०२२

इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया वीणा (राय सिंघानी) जी ने, माधुरी (केलकर) जी के सहयोग से, तकनीकी सहयोग तेजेश्री (शेट्टे) जी का रहा।

सोमवार से आज तक, चारो दिन यह कार्यक्रम ले कर आईं - निम्मी (मिश्रा) जी और रेणु (बंसल) जी।

सोमवार को पहले दोनों ने सभी को नमस्कार किया और बड़ो को नमन किया। फिर 1 अक्टूबर को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस की जानकारी दी। संयुक्त परिवार के महत्त्व और बुजुर्गो की ठीक से देखभाल की चर्चा की। इस सन्दर्भ में तीन उदाहरण दे कर चर्चा की गई - नई फिल्म शरारत पर चर्चा हुई जो वृद्धाश्रम पर है, साहित्य से ख्यात लेखिका उषा प्रियंवदा की इसी विषय पर आधारित कहानी वापसी की चर्चा की और हिन्दी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की कहानी बूढ़ी काकी की चर्चा हुई। इन तीनो चर्चाओं के बजाए अच्छा होता अगर बूढ़ी काकी कहानी पढ़ कर सुनाई जाती।

यह दिन रसोई का होता है, प्याज की खीर बनाना बताया गया। पिछली बार के व्यंजन में बताए अनुसार भुट्टा कद्दूकस न होने की शिकायत भी की, पत्र पुरूष श्रोता से प्राप्त हुआ। सामान्य चर्चा में बिजली और पानी की बचत की बात चली।

सखियों की पसंद पर पुरानी फिल्मो के गीत सुनवाए गए - बड़ी बहन, आदमी, मदर इंडिया, आधी रात के बाद, छाया, इंसान जाग उठा, दिल्लगी फिल्मो के गीत और शमा फिल्म से यह गीत भी -

धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम

पर अफसोस, एक भी बुजुर्गो को समर्पित गीत शामिल नही था।

मंगलवार को करिअर का दिन होता है। इस दिन नर्स बनने की जानकारी दी गई। अच्छा होता इस दिन खेल जगत में करिअर की जानकारी दी जाती। हर स्कूल में खेल टीचर होते हैं। कुछ कॉलेजों में भी होते हैं। खेल टीचर बनने के लिए फिजिकल एजुकेशन या ऐसे ही किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती हैं। इस बारे में विस्तृत जानकारी दी जा सकती थी। देश में बने खेल के माहौल में युवाओं के लिए यह उपयोगी होता।

चूंकि यह दिन युवा सखियों के लिए ख़ास होता हैं इसीलिए इस दिन अधिकतर नए गाने ही सुनवाए जाते हैं क्योंकि युवा सखियों की फरमाइश नए गानों के लिए ही अधिक होती हैं।

लव आजकल, फैशन, वीर, अजब प्रेम की गजब कहानी, रावण, जब वी मेट फिल्मो के गीत सुनवाए और ओम शान्ति ओम फिल्म का यह गीत भी शामिल था -

आँखों में तेरी अजब सी गजब सी अदाएं हैं

बुधवार को स्वास्थ्य और सौन्दर्य संबंधी सलाह दी जाती है्। सखियों के भेजे गए पत्रों से पपीता, चौलाई के औषधीय गुणों की जानकारी दी। निखार के लिए ग्वारपाठा के गुण बताए।

सखियों की फरमाइश पर कुछ पुराने गीत हीरा, मनोकामना, राजा और रंक, गैम्बलर फिल्मो से सुनवाए गए और किनारा फिल्म से यह गीत भी शामिल था -

नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा

आज गुरूवार हैं और गुरूवार को सफल महिलाओं के बारे में बताया जाता है। इस दिन सखियों के पत्रों से कुछ बाते हुई फिर राष्ट्रमंडल खेल पर सन्देश प्रसारित हुआ जिसके बाद महिला खिलाड़ियों को शुभकामनाएं दी गई पर एक भी महिला खिलाड़ी के बारे में कुछ भी नही बताया, यहाँ तक कि किसी का नाम भी नही लिया।

सखियों के अनुरोध पर कुछ ही समय पहले की फिल्मो - परिणीता, मिशन कश्मीर, बार्डर, जहर, वीरजारा से गीत सुनवाए और यह गीत भी शामिल था -

कभी शाम ढले तो मेरे दिल में आ जाना

हर दिन श्रोता सखियों के पत्र पढे गए। वृद्ध दिवस के सन्दर्भ में ऎसी उमरदराज महिला का पत्र पढ़ा गया जिसका युवा पुत्र इस संसार में नही हैं। उसने सबके लिए आशावादी सन्देश भेजा। कुछ पत्रों में प्रकृति प्रेम का भी सन्देश था, राष्ट्रमंडल खेल के सभी देशी-विदेशियों खिलाड़ियों को शुभकामनाएं दी, अपने प्रदेश के लोकपर्व के बारे में बताया। कुछ पत्रों में कार्यक्रमों की तारीफ़ थी पर यहाँ भी किसी ने भी 3 अक्टूबर, विविध भारती के जन्मदिन की चर्चा नही की।

उदघोषिकाओं ने बचपन की सहपाठिन से मिलने का किस्सा बताया जिनमे से एक के बारे में कि कैसे वह परेशानियों से जूझते हुए जीवन में आगे बढी। शिक्षाप्रद छोटी कहानियां भी सुनाई गई जैसे प्राथमिक कक्षाओं में बच्चो को सुनाई जाती हैं। ऎसी ही चर्चाएँ होती रही। बेहतर होता इस सप्ताह राष्ट्रमंडल खेलो की ताजा जानकारी दी जाती जैसे मन चाहे गीत कार्यक्रम में युनूस (खान) जी फरमाइशी गीत सुनवाते हुए दे रहे थे। कम से कम महिला खिलाड़ियों के खेल की ताजा जानकारी दे देते।

चारो दिन इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया कमलेश (पाठक) जी ने।

शनिवार को सुना सामान्य ज्ञान का कार्यक्रम जिज्ञासा। बताया गया कि इस कार्यक्रम में राष्टमंडल खेलों पर श्रृंखला चल रही हैं। इस दिन विभिन्न खेलों में भारतीय टीम का स्तर, टीम और खिलाड़ियों की उपलब्धियां बताई गई। इस तरह यह कड़ी उन खेलो और खिलाडियों पर केन्द्रित रही जिनसे भारत को पदक मिलने की आशा हैं। पहले हॉकी की चर्चा हुई। पुरूषों की टीम में शिवेंदर सिंह और अन्य खिलाड़ी भी चर्चा में रहे। महिला टीम में रानी रामपाल, सुरिंदर कौर और सभी के बारे में बताया। उसके बाद निशाने बाजी यानि शूटरों की चर्चा हुई - तेजस्विनी सावंत, गगन नारंग, बिंद्रा के अंदाज पर बात हुई। फिर कुश्ती की चर्चा में सुशील कुमार, भुवनेश्वर दत्त, अलका तोमर पर जानकारी दी। साथ में यह जानकारी भी दी गई कि पिछले राष्ट्रमंडल खेलों में इन खेलो को कब शामिल किया गया और स्थिति क्या रही जिसमे यह भी बताया कि कुश्ती में पहला पदक भारत ने ही जीता था। बीच-बीच में फिल्मी गीत भी सुनवाए गए। गीत थोड़ा कम बजे पर कार्यक्रम के अनुरूप रहे जैसे चेक दे इंडिया फिल्म का शीर्षक गीत।

श्रृंखला अगले सप्ताह भी जारी रहेगी। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा। अच्छी जानकारी पूर्ण रही यह कड़ी। कार्यक्रम को प्रस्तुत किया कल्पना (शेट्टे) जी ने, तकनीकी सहयोग पी के ए नायर जी का रहा।

एक बात अखर गई, दोनों ही कार्यक्रमों में लगातार कॉमन वेल्थ गेम्स कहा गया, एक बार भी राष्ट्रमंडल खेल नही कहा गया।

Tuesday, October 5, 2010

बिन फेरे हम तेरे फिल्म का शीर्षक गीत

1978 के आसपास रिलीज हुई थी फिल्म - बिन फेरे हम तेरे

इसमे विनोद मेहरा की दुहरी भूमिका हैं, नायिका सारिका हैं। राजेन्द्र कुमार और शायद नूतन की प्रमुख भूमिकाएं हैं.

इसका शीर्षक गीत किशोर कुमार ने गाया हैं. किशोर दा के गाए चंद संजीदा गीतों में से हैं यह गीत. पहले रेडियो के सभी केन्द्रों से बहुत सुनवाया जाता था पर अब बहुत समय से नही सुना. इसके बोल शायद कुछ इस तरह हैं -

सजी नहीं बारात तो क्या
आई न मिलन की रात तो क्या
ब्याह किया तेरी यादों से
गठबंधन तेरे वादों के
बिन फेरे हम तेरे

तूने अपना मान लिया हैं
हम थे कहाँ इस काबिल
वो एहसान किया जाँ देकर
जिसको चुकाना मुश्किल
देह बनी न दुल्हन तो क्या
पहने नही कंगन तो क्या
बिन फेरे हम तेरे

तन के रिश्ते टूट भी जाए
टूटे न मन के बंधन
जिसने दिया हमको अपनापन
उसी का हैं ये जीवन
बाँध लिया मन का बंधन
जीवन हैं तुझ पर अर्पण
बिन फेरे हम तेरे

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, October 1, 2010

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 30-9-10

शुरूवाती दौर से ही नाटक विविध भारती का अभिन्न अंग रहे हैं। रेडियो नाटक के लगभग सभी रूपों का श्रोता आनंद लेते रहे हैं। विविध भारती के नाटको का फलक भी विशाल हैं, इसमे सामाजिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक नाटक शामिल हैं। साहित्य में केवल हिन्दी ही नही, सभी भारतीय भाषाएँ और देश काल की सीमा से परे विदेशी साहित्य से भी रचे गए नाटक सुनवाए जाते हैं।

एक ओर तो इन नाटकों से सन्देश मिलता हैं, दूसरी ओर हमारी सांस्कृतिक विरासत का पता चलता हैं, इसके अलावा ऐतिहासिक घटनाओं से भी हम भली-भांति परिचित होते हैं। इन सबके साथ हास्य का विशाल सागर भी लहराता हैं जो शुद्ध मनोरंजन तो करता ही हैं साथ ही समाज पर अपनी पैनी दृष्टि से व्यंग्य भी करता हैं।

नाटकों के दो कार्यक्रम प्रसारित होते हैं हवामहल और नाट्य तरंग हवामहल रात के प्रसारण का दैनिक कार्यक्रम हैं और नाट्य तरंग सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को दोपहर बाद प्रसारित होता हैं।

हवामहल बहुत ही पुराना कार्यक्रम हैं। इतना पुराना और लोकप्रिय कि लगता हैं हर रेडियो श्रोता इस कार्यक्रम से परिचित हैं। कार्यक्रम का यह नाम शायद विविध भारती के पितामह पंडित नरेंद्र शर्मा जी ने रखा हैं। इस कार्यक्रम का स्वरूप अपने दोनों ही रूपों में फिट बैठता हैं - जयपुर की शान हवामहल की तरह यह विषय को खोल कर रख देता हैं फिर चाहे पति-पत्नी की नोंक झोंक हो या प्रेम का इजहार आप सपरिवार इसका आनंद ले सकते हैं। मुहावरे की तरह यह हवाई किले भी बनाता हैं जिसमे आसमाँ की सैर भी होती हैं तो चाँद के लोग जमीन पर मिलने भी आते हैं। सबसे बढ़िया हैं इसकी गुदगुदाती संकेत धुन जो बरसों से सुन रहे हैं। हालांकि प्रसारण समय बदल गया हैं, पहले सालो तक रात 9:15 से 9:30 तक प्रसारित होता था अब पिछले कुछ वर्षो से रात 8:00 से 8:15 तक प्रसारित हो रहा हैं। अवधि 15 मिनट की ही हैं।

नाट्य तरंग अपने मूल श्रव्य नाटक रूप में प्रसारित होता हैं। इसकी प्रसारण अवधि भी आधा घंटा हैं जबकि हवामहल में नाटक के विभिन्न रूप सुनने को मिलते हैं - नाटिका, प्रहसन, झलकी। इन दोनों ही कार्यक्रमों में एक ख़ास बात हैं कि विभिन्न केन्द्रों की प्रस्तुतियां होने से देश के विभिन्न भागो की प्रतिभाओं को जानने का अवसर मिलता हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

रात 8 बजे का समय है हवामहल का, जिसकी शुरूवात हुई गुदगुदाती धुन से जो बरसों से सुनते आ रहे है। यही धुन अंत में भी सुनवाई गई।

शुक्रवार को इसकी विशिष्ट शैली से मनोरंजन हुआ। प्रहसन सुना - आसमान से टपके खजूर में अटके। पृथ्वी लोक की सैर के लिए सोच-विचार के बाद विष्णु और लक्ष्मी रात में महानगर बंबई में उतरने का निर्णय लेते हैं। उन्हें समुद्र के किनारे टहलता देख अपराधी समझा जाता हैं। गहनों से लदी लक्ष्मी जी को देख कर यह अनुमान लगाया जाता हैं कि इस स्त्री को भगा कर लाया गया हैं। पुलिस थाने में उनके संयत व्यवहार को देख कर उन्हें मनोचिकित्सक के पास भेजा जाता हैं जहां पागलखाना देख कर वे हैरान हो जाते हैं और लौट जाते हैं। संवाद में मुम्बई को बंबई कहा गया जिससे पता चलता हैं यह पुरानी रचना हैं। भोपाल केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं मक़बूल हसन और लेखक हैं आर ऐ चतुर्वेदी।

शनिवार को दिनेश भारती की लिखी नाटिका सुनी - नीलामी। फिल्मो और फिल्मी कलाकारों के प्रति दीवानगी बताई गई जिसमे बुजुर्ग भी शामिल हैं। विभिन्न फिल्मो में लोकप्रिय कलाकारों द्वारा उपयोग की गई विभिन्न चीजो की नीलामी हो रही हैं जैसे कपडे, तकिया, तावीज जिसे बढ़-चढ़ कर दाम देकर खरीद रहे हैं। नामो से भी हास्य पैदा किया गया जैसे फिल्म का नाम देसी कबूतर विलायती चोंच, नायिका का नाम चमचा चतुर्वेदी। बहुत देर से तमाशा देख रही एक बुजुर्गवार की पत्नी बाद में सबको फटकार कर दुकान बंद करवाती हैं। इलाहाबाद केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं मधुर श्रीवास्तव।

रविवार को श्रीमती मीना आनंद की लिखी झलकी सुनी - चक्कर छकाने का। कुछ ख़ास नही रही। पत्नी बच्चो के साथ रामलीला में अभिनय की बात करती हैं। पत्नी के लिए पति सरप्राइज तोहफा लाता हैं। दरवाजा भीतर से बंद हैं बहुत देर तक आवाज लगाने से भी नही खुलता। तभी पत्नी बाहर से आती हैं। पीछे के दरवाजे से भीतर कूदने पर छोटी लड़की दरवाजा खोलती हैं यानि कुम्भकरण के अभ्यास में सबको छकाती हैं। प्रस्तुति में तस्वीर आबिदी ने सहयोग दिया और निर्देशक हैं जयदेव शर्मा कमल। इस दिन एक बात अच्छी हुई कि कलाकरों के नाम भी बताए गए। हर दिन नही बताए जाते।

सोमवार को सुधा जौन की लिखी नाटिका सुनी - सिफारिश। एक कार्यालय में इंटरव्यू हैं। अफसर के घर पर उसकी माँ अपनी दूर की रिश्तेदारी से एक उम्मीदवार के लिए सिफारिश करती हैं। ऐसे ही पिता भी एक की सिफारिश करते हैं। नौकर भी एक की सिफारिश करता हैं, उसकी मित्र जिस घर में काम करती हैं, वहीं का उम्मीदवार हैं। वो लोग बतौर रिश्वत नौकर को एक नई कमीज भी देते हैं। लेकिन अधिकारी इनमे से किसी का भी चयन नही करता क्योंकि कोई भी योग्य नही हैं। वह एक योग्य उम्मीदवार का चयन करता हैं। नाटिका क्या थी, हकीक़त ही थी। वैसे अच्छा सन्देश मिला। इसे निर्देशित किया मुमताज शकील ने। बढ़िया प्रस्तुति जयपुर केंद्र से।

मंगलवार को मोहिनी जोशी की लिखी झलकी सुनी - राम मिलाई जोडी जिसके निर्देशक हैं रमेश जोशी। मैनेजर का ट्रांसफर हो गया, सभी कर्मचारी विदाई समारोह में ऐसे दुखी हैं जैसे उनका जाना बहुत दुखद हैं। विवाह की बात पक्की होने में भी वही हाल हैं, दोनों लगता हैं एक दूसरे के लिए बने। इस तरह की हैं राम मिलाई जोडी। प्रस्तुति लखनऊ केंद्र की रही।

बुधवार को सुनवाई गई झलकी - एक दिन का प्यार। यह प्यार सास-बहू का हैं। दोनों के बीच रिश्ते ठीक नही हैं। इस रिश्ते को ठीक करने के लिए ससुरजी पहल करते हैं। दोनों को अलग-अलग यह बताते हैं कि बाजार में एक नया मिट्टी का तेल (कैरोसिन) आया हैं जिसे छिड़कने के चौबीस घंटे बाद अपने आप जल जाएगा। दोनों को सलाह देते हैं छिड़कने की और चौबीस घंटे के दौरान प्यार जताने की फिर अंत में कही चले जाने की ताकि पुलिस को शक न हो। दोनों एक दूसरे के साथ ऐसा ही करते हैं। लेकिन बाद में डर जाते हैं। तब ससुरजी बताते हैं वह कैरोसिन नही गुलाब जल था। इस तरह भयंकर परिस्थिति से दो-चार होते ही अपराध बोध हो जाता हैं और आपसी प्यार हो जाता हैं। अच्छा सन्देश मिला इस झलकी से कि आपसी रिश्तों में सुधार के लिए घर-परिवार से ही किसी को पहल करनी चाहिए। दिल्ली केंद्र की इस प्रस्तुति के लेखक वी एम आनंद हैं और निर्देशक सुदर्शन कुमार हैं।

गुरूवार को झलकी सुनी - शान्ति जिसे गंगा प्रसाद माथुर ने लिखा। कवि महोदय अपनी पत्रिका शान्ति की चर्चा करते हैं और पत्नी मान लेती हैं कि उसके पति का शान्ति नाम की महिला से सम्बन्ध हैं। वह घर छोड़ने भी तैयार हो जाती हैं। विषय बहुत पुराना हैं, अब ऐसे विषयों से न मनोरंजन होता हैं न सीख मिलती हैं। हाँ, जिस समय यह झलकी लिखी गई थी तब मनोरंजन भी खूब हुआ होगा और सीख भी मिली होगी। एकाध संवाद से पता चला कि रचना बहुत पुरानी हैं या कुछ पुराने समय के बहुत कम विकसित क्षेत्र की हैं जैसे कहा गया - हमारे घर बिजली लग गई तो पड़ोसी को जलन हो गई। निर्देशिका लता गुप्ता हैं। प्रस्तुति जयपुर केंद्र की रही।

3:30 बजे नाट्य तरंग कार्यक्रम में शनिवार को कमलेश्वर की लिखी कहानी राजा निरबंसिया का अभय कुमार सिंह द्वारा किया गया रेडियो रूपांतर सुनवाया गया। नाटक में सूत्रधार कहानी को आगे बढाता रहा। दो कहानियों के माध्यम से प्राचीन और आधुनिक समय की स्थिति बताई गई। दोनों कहानियां समान हैं। बचपन में सुनी गई राजा निरबंसिया की कहानी और आज के निम्न मध्यमवर्ग के पति-पत्नी की समस्या वही हैं। पति-पत्नी के बीच आपसी विश्वास-अविश्वास, बीच में तीसरे का अहसास। अपनी कमजोरियों से ही पति उस दूसरे के साथ जीवन में आगे बढ़ता हैं। पर बाद में पत्नी पर विश्वास नही कर पाता। पुरानी कहानी में पत्नी ने अपनी पवित्रता सिद्ध कर दी थी पर आज की नारी सिद्ध नही कर पाती। वैसे पति को बाद में पश्चाताप होता हैं। आत्महत्या करते समय चिट्ठी लिखता हैं कि पत्नी के आने पर ही दाह संस्कार होगा और बेटा ही अंतिम संस्कार करेगा। यह कहानी पढ़ने में अच्छी लगती हैं पर विविध भारती पर सुनकर अच्छा नही लगा। ऐसे विषय टेलीविजन धारावाहिकों में सभी देखते हैं, अगर विविध भारती भी उसी राह पर चले तो ठीक नही लगता। यहाँ इतने परिपक्व विषय सुनने में उलझन होती हैं। यह दिल्ली केंद्र की प्रस्तुति रही।

रविवार को योगेश त्रिपाठी का लिखा नाटक प्रसारित किया गया - कैंसर जिसके निर्दशक हैं राकेश ढ़ोंढीयाल. एकदम सच्चाई, सुन कर लगा जैसे हमारे आस-पास घटने वाली कोई घटना हैं। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार हैं। कर्ज भी ले रखा हैं। पता चलता हैं पिता को कैंसर हैं। तुरंत इलाज कराना हैं। दफ्तर से पैसा मिलने में समय लगेगा। इसीलिए विभिन्न दफ्तरों में जाकर चन्दा जमा कर इलाज करा लेते हैं। जब दफ्तर से पैसा मिलता हैं तो गाड़ी-गहने खरीद लेते हैं। कर्जदार रात को कुछ आदमियों को लेकर पैसा वसूलने आता हैं तो बेटी से छेड़छाड़ और गुंडागर्दी का आरोप लगाते हैं। इतना ही नही पुलिस में रिपोर्ट की धमकी से पैसा भी वसूलना चाहते हैं। क्योंकि अब तक वे गलत रास्ते से पैसा लेना सीख गए। भोपाल केंद्र की अच्छी प्रस्तुति रही।

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