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Thursday, December 30, 2010

गैर फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 30-12-10

विविध भारती से गैर फिल्मी गीतों के दो कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं - वन्दनवार और गुलदस्ता. एक भक्ति गीतों का दैनिक कार्यक्रम हैं और दूसरा गजलो का कार्यक्रम हैं जो सप्ताह में तीन बार प्रसारित होता हैं।

सुबह 6:00 बजे दिल्ली से प्रसारित होने वाले समाचारों के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद 6:05 पर हर दिन पहला कार्यक्रम प्रसारित होता हैं - वन्दनवार जो भक्ति संगीत का कार्यक्रम हैं। इसके तीन भाग हैं - शुरूवात में सुनवाया जाता हैं चिंतन जिसके बाद भक्ति गीत सुनवाए जाते हैं। इन गीतों का विवरण नही बताया जाता हैं। पुराने नए सभी गीत सुनवाए जाते हैं। उदघोषक आलेख प्रस्तुति के साथ भक्ति गीत सुनवाते हैं और समापन देश भक्ति गीत से होता हैं। आरम्भ और अंत में बजने वाली संकेत धुन बढ़िया हैं।

शाम बाद के प्रसारण में जयमाला के बाद सप्ताह में तीन बार शुक्रवार, रविवार और मंगलवार को 7:45 पर 15 मिनट के लिए प्रसारित किया जाता हैं कार्यक्रम गुलदस्ता जो गजलों का कार्यक्रम हैं।

इस तरह हम गैर फिल्मी गीतों में भक्ति गीत, देश भक्ति गीत और गजल सुनते हैं। आजकल नए जमाने के गीतों में किस तरह का गीत-संगीत चल रहा हैं, इसका पता विविध भारती से नहीं चल रहा। हमारा अनुरोध हैं कि नए जमाने के गीतों का एक ऐसा कार्यक्रम भी शुरू कीजिए।

कुछ समय पहले तक शाम बाद के प्रसारण में जयमाला के बाद 7:45 पर 15 मिनट के लिए दो साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होते थे मंगलवार को बज्म-ए-क़व्वाली और शुक्रवार को लोक संगीत का कार्यक्रम हम अनुरोध करते हैं कि हमारी संस्कृति से जुड़े इन दोनों कार्यक्रमों को दुबारा शुरू कीजिए जिससे गैर फिल्मी गीतों के सिमटते समय को विस्तार भी मिलेगा और सबसे बड़ी बात श्रोतागण विशेष कर युवा पीढी संस्कृति से दूर नही होगी।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

शुक्रवार को शुरूवात की गणेश वन्दना से - जय गणेश जय गणपति नायक सब विधि पूजत सब विधि नायक
उसके बाद प्रार्थना सुनवाई - हम जाने प्रभु या तुम जानो हमें तुमसे हैं प्यार कितना

भक्ति गीतों का समापन किया शबरी के इस भक्ति गीत से - राम जी आएँगे लक्ष्मण आएगे शबरी कि कुटिया को स्वर्ग बनाएगे

शनिवार को प्रार्थना और नाम की महिमा बताते भक्ति गीत सुनवाए गए - प्रार्थना श्री भगवान कीजिए जन जन का कल्याण

राम रमैया रटा करो कृष्ण कन्हैया रटा करो
भक्ति से मिल जाए दोनों
नाम उन्ही का लिया करो

रविवार को शुरूवात की रामचरित मानस के अंश से। मुकेश और साथियो के गाए इस अंश से जुड़ा यह भक्ति गीत भी सुनवाया - भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी

अगला भजन भी राम की महिमा का रहा, इसके बाद तुलसी दास द्वारा रचित यह पुराना लोकप्रिय भजन बहुत दिन बाद सुन कर अच्छा लगा - श्री रामचंद्र कृपालु भजमन

सभी रामभक्ति गीत सुनवाए गए जिसमे प्रमुख तुलसी की रचनाएं रही, ध्यान नही आ रहा यह क्या ख़ास दिन रहा।

सोमवार को शुरूवात की भक्ति गीत से -

जब यही हो लगन मन ये गाए मगन
मन पुलकित हुआ आनंदित हुआ
मन में प्रभुजी समाने लगे

जिसके बाद राम और कृष्ण भक्ति के गीत सुने - अवधपुरी ले चलो और माँ यशोदा जब कहे माखन चोर हैं ग्वाला

मंगलवार की शुरूवात अच्छी रही, गणेश स्तुति सुनवाई गई, मुझे याद नही आ रहा.... यह पहले॥ शायद ही मैंने सुनी हो। भक्ति गीत सुना -

गोविन्द के गुण गाइए गोपाल के गुण गाइए
द्वार मन के खोल कहिए आइए प्रभु आइए

बुधवार को शुरूवात हुई इस लोकप्रिय भक्ति गीत से -

सबकी नैय्या पार लगाइय्या कृष्ण कन्हैय्या सांवरे, राम धुन लागी गोपाल धुन लागी

इसके बाद सुनवाई गई कबीर की रचना। समापन कृष्ण भक्ति गीत से किया।

आज का कार्यक्रम ठीक नही रहा। शुरूवात की इस रचना से -

गोविन्द के गुण गाइए गोपाल के गुण गाइए
द्वार मन के खोल कहिए आइए प्रभु आइए

जो मंगलवार को सुनवाई गई थी। इसके बाद अनूप जलोटा का गाया भक्ति गीत सुना, इस सप्ताह अनूप जलोटा के गाए पहले ही दो-तीन भक्ति गीत सुनवाए जा चुके। इसके बाद कबीर की रचना सुनवाई जबकि कबीर की एक रचना कल ही सुनवाई गई थी।
इस तरह एक ही सप्ताह में एक ही रचनाकार के, गायक के भक्ति गीत बार-बार सुनवाए गए, और एक तो वही भजन दुबारा सुनवा दिया गया जबकि कई रचनाकारों और गायक कलाकारों के कई भक्ति गीत ऐसे हैं जो लम्बे समय से नही सुनवाए गए - जैसे रसखान की भक्ति रचनाएं, सूरदास के पद, प्रकाश कौर की आवाज में नानक की वाणी, जुतिका राय के गाए भक्ति गीत, आगे के समय की रचनाओं में वाणी जयराम के गाए मीरा भजन, अनुराधा पौडवाल की गाई स्तुतियाँ। यह अनुरोध हैं कि नए-पुराने सभी भक्ति गीत सुनवाइए। हमें पता हैं कि इतनी रचनाएं विविध भारती के संग्रहालय में हैं कि जल्दी-जल्दी दुबारा प्रसारण की आवश्यकता नही रहती हैं।

हर दिन वन्दनवार का समापन होता रहा देश भक्ति गीतों से, रविवार को नया देशभक्ति गीत सुनना अच्छा लगा -

सपनों से प्यारे देश हमारे मिटने न देगे तेरी शान रे

यह लोकप्रिय गीत सुनवाए गए -

मिल के चलो, चलो भाई मिल के चलो

जय जय जय जन्म भूमि सकल दुःखहारी

यह भूमि हमारी वीरो की हम हिन्दो की संतान हैं

जननि जन्मभूमि प्रिय अपनी

जिन्हें बार-बार सुनवाया जाता हैं। बहुत से देशभक्ति गीत ऐसे हैं जिन्हें लम्बे समय से नही सुना जैसे सतीश भाटिया के स्वरबद्ध किए गीत, लक्ष्मी शंकर और अम्बल कुमार के गाए गीत। खासकर एक विशेष काल अवधि में लिखी गई हिंदी साहित्य की रचनाएं जैसे जयशंकर प्रसाद, सोहनलाल द्विवेदी, सुभद्राकुमारी चौहान की रचनाएं साहित्य की अनमोल धरोहर हैं जिसे संगीत में ढाल कर आकाशवाणी ने संगीत की अमूल्य निधि बना दिया। अगर इन रचनाओं को सुनवाने में तकनीकी असुविधा हैं तो इन रचनाओं को नए कलाकारों से गवाया जा सकता हैं।

इस सप्ताह भी वन्दनवार में फिल्मी भजन और फिल्मो से देश भक्ति गीत सुनवाए गए। हमारा अनुरोध है कृपया फिल्मी भजन और देश भक्ति गीतों का अलग कार्यक्रम रखिए, ऐसे समय जहां क्षेत्रीय कार्यक्रमों का समय न हो ताकि हम इन फिल्मी भक्ति गीतों का अलग से आनंद ले सके।

गुलदस्ता कार्यक्रम में शुक्रवार को रफी साहब के जन्म दिन पर यह कार्यक्रम उन्ही को समर्पित रहा। उनकी गाई विविध गजले सुनवाई गई। शुरूवात की इस मक़बूल गजल से, कलाम अंजान का जिसकी तर्ज बनाई श्याम सरन ने -

मेरे लिए तो वही पल हैं हसीं बहार के
तुम सामने बैठी रहो मैं गीत गाऊँ प्यार के

इसके बाद कैफी आजमी का कलाम सुना, तर्ज खैय्याम की जिसके बाद यह गजल सुनवाई गई पर इसके शायर का नाम नही बताया -

एक ही बात जमाने की किताबो में नही
जो गमे दोस्त में नशा हैं वो शराबो में नही

महफ़िल एक़तेदाम को पहुंची सबा अफगानी के कलाम से - हाल देखा जो बेकरारो का दिल लरजने लगा सितारों का

रविवार को शुरूवात हुई मोहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन की युगल आवाजों में कतिल राजस्थानी के कलाम से -

दिल ने चाहा तो पैदा रास्ता जरूर होगा

जिसके बाद कतिल शिफाई को सुना अशोक खोसला की आवाज में - जब तेरे शहर से गुजरता हूँ तेरी रुसवाइयों से डरता हूँ

मंगलवार का गुलदस्ता बेहतरीन रहा। मशहूर कलाम सुनवाए गए और गुलोकार रहे गजल की दुनिया के सिरमौर। तीन गजले सुनी। मोमिन के कलाम से आगाज हुआ, गुलोकारा रही गजल की दुनिया की मलिका बेगम अख्तर -

वो जो हममे तुममे करार था, तुम्हे याद हो के न याद हो

उसके बाद सुना गजलो के सरताज मेहदी हसन की आवाज में यह मशहूर कलाम - पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने हैं

यहाँ एक बात खटक गई, शायर का नाम नही बताया गया। फिर शायर जानिस्सार अख्तर के कलम से निकली गजल जिसे प्रस्तुत किया लोकप्रिय गायक जोडी राजेन्द्र मेहता और नीना मेहता ने -

जब आँचल रात का गहराए और सारा आलम सो जाए
तुम मुझसे मिलने शमा जला कर ताजमहल में आ जाना

इस सप्ताह नए पुराने शायर, गुलोकार और गायिकी के अंदाज से खूब महका गुलदस्ता। इसकी शुरू और आखिर में बजने वाली संकेत धुन भी अच्छी हैं। सबसे अच्छा लगता हैं कार्यक्रम के अंत में यह कहना - ये था विविध भारती का नजराना - गुलदस्ता !

और ये थी इस साल की आखिरी साप्ताहिकी....

आप सबको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

Monday, December 27, 2010

वरिष्ठ रेडियो उदघोषक श्री गोपाल शर्माजी को उनके जनम दिन की शुभ: कामनाओं के साथ दृष्य साक्सातकार

इस पोस्ट को दि. 28 के ही दिन 1 ए.म. पर रख़ा गया था, पर इस पर साईन इन 12 के पहेले होने के कारण ता. 27 ही दिख़ाई देती है । और दूसरी बात की इस रेकोर्डींग को देख़ते सुनते किसी और के बताये बिना ही मेरे ध्यानमें मेरी एक गलती आयी है कि मैनें श्री गोपाल शर्माजी की अत्मकथा के लिये गलती से ओटोबायोग्राफ़ी की जगह बायोग्राफ़ी शब्द इस्तेमाल किया है । पर भले शर्माजीने मूझे उस समय सुधारना ठीक़ नहीं समझा होगा । वैसे उनकी भाषा पर काबू का कोई जवाब नहीं है । और तीसरी बात इस रेकोर्डिंगमें केमेरा मेन यानि विडीयोग्राफर , लाईट मेन , सेट मास्तर और इन्टरव्यूअर और बाद्में सम्पादक की पाँचो भूमीकाएँ मूझसे जैसे बनाया पडा, निभाई है । तो मूल रेकोर्डिं सही होने पर भी सम्पादन के दौरान कहीं विडीयो की गुणवत्ता नीचले हिस्सेमें कहीं कहीं थोड़ी सी ठीक नहीं आयी है । तो इसके लिये क्षमा प्रार्थी हूँ । और इस निर्धारीत समय मर्यादामें काम निपटाने के लिये थकान तो होनी ही थी ।
आज यानि दि. 28-दिसम्बर के दिन रेडियो प्रसारण के एक महत्व पूर्ण पायोनियर श्री गोपाल शर्माजी की जनम तारीख़ है, तो
इस अवसर पर उनको जनम दिन की रेडियोनामा की और से शुभ: कामनाएँ देते हुए मेरी हाल ही की मुम्बई यात्रा के दौरान दि. 19 के दिन उनके बुलावे पर उनक्रे धर की गई उनके केरियर के बारेमें वातचीत को आप सुन ही नहीं पर देख़ भी पायेंगे, जो अवसर आज से तीन साल पहेले वहाँ की लोकल ट्रेईन्स की गरबडीयों के कारण खो दिया था । जो चार भागोमें बाँटना पडा है । शायद दूसरा भाग आप देख़ नहीं पाये तो इसका ऑडियो भी रख़ा जायेगा । यहाँ एक और बात बता दूँ, कि दि. 21 दिसम्बर के दिन श्री अमीन सायानी साहब को सुरत में गैरहाज़री के कारण उनको इस मंच से बधाई नहीं दे पाया पर उनको उसी दिन उनके कार्यालय जा कर बधाई देनेका सुनहरी मोका मिला ।









पियुष महेता ।
सुरत ।

Thursday, December 23, 2010

विविध भारती के मेहमान - साप्ताहिकी 23-12-10

विविध भारती में लगभग हर दिन पधारे मेहमानों से उनके अनुभव और संघर्ष यात्रा को जानने का मौक़ा मिला, साथ ही मिली महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी और साथ-साथ सुनने को मिले उनके पसंदीदा गीत भी। यह कार्यक्रम हैं -

शुक्रवार - सरगम के सितारे
शनिवार - विशेष जयमाला
रविवार - उजाले उनकी यादो के
सोमवार - सेहतनामा
बुधवार - आज के मेहमान और इनसे मिलिए

इनमे से विशेष जयमाला को छोड़ कर सभी भेंटवार्ताएं हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

शाम बाद के प्रसारण में 7 बजे दिल्ली से प्रसारित समाचारों के 5 मिनट के बुलेटिन के बाद फ़ौजी भाईयों के जाने-पहचाने सबसे पुराने कार्यक्रम जयमाला में शनिवार को विशेष जयमाला में मेहमान रहे गायक जोडी भूपेन्द्र और मिताली सिंह। कुछ नई जानकारी मिली कि भूपेन्द्र जी की पहली फिल्म हैं - हकीक़त जिसमे उन्होंने एक फ़ौजी की भूमिका की और रफी साहब के साथ गाया यह गीत - होके मजबूर मुझे

और मिताली सिंह की पहली हिन्दी फिल्म हैं सत्यमेव जयते वैसे अन्य भाषाओं की फिल्मो के लिए भी उन्होंने काम किया हैं।

अपने गाए फिल्मी गीत सुनवाए भूपेन्द्र जी ने और गैर फिल्मी गीत सुनवाए मिताली जी ने अपने एलबम - अर्ज किया हैं से - दरवाजा खुला रखना और एक रिकार्ड से गजल सुनवाई। अंत में दोनों ने साथ-साथ बातचीत की और उसी एलबम से एक रचना सुनवाई और साथ-साथ ही समापन किया। एक बात अखर गई दोनों मिल कर बातचीत करते हुए, अपनी संगीत यात्रा की कुछ बाते बताते हुए प्रस्तुति देते तो अच्छा लगता। वैसे अच्छी संगीतमय प्रस्तुति रही, खासकर गजलो से अच्छा समां बंधा।

शरू और अंत में जयमाला की संकेत धुन सुनवाई गई लेकिन कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता का नाम नही बताया गया। यह कार्यक्रम प्रायोजित था। प्रायोजक के विज्ञापन, क्षेत्रीय केंद्र से सन्देश भी प्रसारित हुए।

इसी समय के प्रसारण में बुधवार को जयमाला के बाद 7:45 पर 15 मिनट के इनसे मिलिए कार्यक्रम में बहुत ही दिलचस्प मेहमान तशरीफ लाए - डबिंग कलाकार विनय नाटकर्नी जिन्हें डोनाल डग की आवाज से पहचाना जाता हैं। बातचीत की कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने। बताया कि पहले मिमिक्री किया करते थे और अपनी आवाज को तोते की आवाज मानते थे। दर्शक भी यही मानते थे। कुछ कार्यक्रम किए जिसमे संगीतकार कल्याण जी आनंद जी का भी कार्यक्रम था। बाद में डिजनी वाले मुम्बई आए और एक ऎसी आवाज ढूंढ रहे थे डबिंग के लिए तब डोनाल डग के बारे में पता चला। अपनी इस डबिंग के बारे में भी बताया कि लगातार ऎसी आवाज निकालने में ऊर्जा बहुत लगती हैं। अपनी इस मिमिक्री में शोले फिल्म से गब्बर सिंह का लोकप्रिय सीन सुनाया। माई नेम इज एंथोनी गोंजाल्विज गीत अपनी मूल आवाज और इस आवाज में सुनाया। अच्छा रही बातचीत, अगर एक-दो बाते डोनाल डग पर भी बता देते तो उचित रहता क्योंकि विविध भारती के कार्यक्रम दूरदराज के इलाको में भी सुने जाते हैं। इस कार्यक्रम को तेजेश्री (शेट्टे) जी के तकनीकी सहयोग से वीणा (राय सिंघानी) जी ने प्रस्तुत किया।

शेष कार्यक्रम शाम 4 से 5 बजे तक पिटारा कार्यक्रम के अंतर्गत प्रसारित किए जाते हैं। पिटारा कार्यक्रम की अपनी परिचय धुन है जो शुरू और अंत में सुनवाई जाती हैं और सेहतनामा को छोड़कर अन्य दोनों कार्यक्रमों की अलग परिचय धुन है जिसमे आज के मेहमान कार्यक्रम में संकेत धुन के स्थान पर श्लोक का गायन हैं।

शुक्रवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम सरगम के सितारे। जैसा कि शीर्षक से ही समझा जा सकता हैं इस कार्यक्रम के मेहमान संगीत के क्षेत्र से होते हैं। इस सप्ताह पार्श्व गायिका और अभिनेत्री विजेता पंडित से कमल (शर्मा) जी की बातचीत सुनवाई गई। शुरूवाती बातचीत से एक ख़ास बात सामने आई कि मंगेशकर परिवार के बाद इन्ही के परिवार के अधिकाँश सदस्य फिल्मी संगीत से जुड़े हैं। अपने बार में विजेता ने बताया कि संगीत उन्हें विरासत में मिला हैं। पिता पंडित रामनारायण से बचपन से ही संगीत सीखा। माँ द्वारा गाए जाने वाले भक्ति गीत को गुनगुनाया - हे गोविन्द मुरारी
अपने पहले गीत के बारे में बताया कि एस डी बर्मन के निर्देशन में गाया, गीत सुनवाया गया जिसे मैंने पहली ही बार सुना और फिल्म का नाम भी जाना-पहचाना नही लगा - एक राजा था एक बेटा था

इसके बाद जिनी और जानी फिल्म के लिए किशोर कुमार के साथ गाए गीतों के अनुभव बताए। उन्ही के साथ गाए वफ़ा फिल्म के लिए होली गीत की रिकार्डिंग से सम्बंधित चर्चा की। अपने भाइयो जतिन-ललित के निर्देशन में रफी साहब के साथ पहली बार गाए रोमांटिक गीत के अनुभव बताए। रफी साहब से इस दौरान गाने संबंधी मिले निर्देशों की भी चर्चा की। अपनी बहन सुलक्षणा पंडित पर फिल्माए गए फिल्म दिल ही दिल में के इस गीत के बनने के भी अनुभव बताए और इसे गुनगुनाया -

गीत वफ़ा के दिल से जुबां पे आने लगे हैं

यह जानकारी भी दी जो शायद बहुत कम श्रोता जानते हैं कि बच्चो के सभी लोकप्रिय गीतों में अपनी आवाज दी जैसे मिली का गीत मैंने कहा फूलो से, परिचय का सारे के सारे। अपने उस एलबम की भी चर्चा की जिसे खुद ही संवारा हैं जिसमे हरिहरन और कुमार सानू के साथ गाया। अन्य भाषाओं में गाए अपने लोकप्रिय गीतों की भी जानकारी दी। अंत में यह दर्द छलक ही आया कि मौक़ा नही मिला पर अब भी कोशिश कर रही हैं स्थापित गायिका बनने के लिए।

विविध भारती को देश की शान बताया और जयमाला, छायागीत कार्यक्रम सुनने और पुराने गीत पसंद करने की बात बताई। अच्छी रही बातचीत, कई नई जानकारियाँ सामने आई। बातचीत अगले सप्ताह भी जारी रहेगी। इस कार्यक्रम को गणेश (शिन्दे) जी के तकनीकी सहयोग से कल्पना (शेट्टे) जी ने प्रस्तुत किया। सम्पादन खुद कमल जी ने किया। शुरू और अंत में इस कार्यक्रम की संकेत धुन सुनवाई गई जो लोकप्रिय गीतों के संगीत के अंशो से तैयार की गई हैं।

रविवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम उजाले उनकी यादो के। मेहमान रहे लोकप्रिय गीतकार गुलशन बावरा जिनसे बातचीत की कमल (शर्मा) जी ने। बातचीत की शुरूवात बहुत बढ़िया रही। जब वरिष्ठ गीतकार के रूप में परिचय दिया गया तब ही मेहमान गीतकार ने कह दिया कि मन से वो युवा ही हैं। फिर बातचीत शुरू हुई उनके बचपन से जो पाकिस्तान में बीता। आरंभिक शिक्षा भी वहीं उर्दू में हुई। तब रेडियो नही था, ग्रामोफोन सुना करते थे। रतन फिल्म का गीत - सावन के बादलो जैसे गीत, यही गीत सुनवाया भी गया। माँ के साथ भजन मंडली में जाया करते थे और वही एकाध पंक्ति लिखने भी लगे थे। बाद में नए रिकार्ड भी सुने जैसे - आ जा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे

यह गीत सुनवाया गया। लाहौर में ही पहली फिल्म देखी - मीरा। बंटवारे में परिवार बिखर गया और बहन के पास जयपुर चले आए। अंदाज फिल्म का गीत सुना करते थे - झूम झूम के नाचो आज जिससे गानों को समझने लगे थे। 11 साल की उम्र में पड़ोसन से एकतरफा प्यार रहा, उसकी शादी से कुछ-कुछ लिखने लगे। यहाँ एक बात अच्छी बताई कि लिखने में गंभीरता थी आजकल के गानों की तरह नही कि प्यार, जुल्फे जैसे शब्द डाल देने से ही समझते हैं कि गीत अच्छा बन गया। फिर दिल्ली में शिक्षा ली, हिन्दी सीखी। फिर बंबई आए और रेलवे में बतौर क्लर्क नौकरी की। इतनी बातचीत से समय समाप्त होने लगा। यहाँ बताया कि जंजीर फिल्म का गीत उन्होंने ही लिखा और उन्ही पर फिल्माया गया -

दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए, मोहब्बत भरी एक नजर चाहिए

अगर यह लम्बी बातचीत का पहला भाग होता जैसा कि आमतौर पर इस कार्यक्रम में होता हैं, तो बहुत बढ़िया कड़ी रही क्योंकि इस पहली कड़ी में ही उनके गीतकार बनने की शुरूवात बचपन से ही नजर आई। लेकिन समापन पर कमल जी ने धन्यवाद दिया और बातचीत समाप्त की। उद्घोषणा से भी लगा यह पूरी बातचीत थी, ऐसे में यह कार्यक्रम बिलकुल भी ठीक नही रहा। उनकी फिल्मी यात्रा पर बात ही नही हुई। केवल इतना पता चला कि जंजीर फिल्म का गीत लिखा, पर कुल कितने गीत लिखे, किस-किस के साथ, किस तरह से काम किया। पहला गीत, बढ़िया गीत, कोई पुरस्कार आदि किसी भी बात की चर्चा नही। इस कार्यक्रम को कल्पना (शेट्टे) जी ने प्रस्तुत किया।

सोमवार को प्रस्तुत किया गया कार्यक्रम सेहतनामा। इसमे रेटीना से जुड़ी बीमारियों पर बातचीत की गई। मेहमान रहे रेटीना विशेषज्ञ डाक्टर विक्रम मेहता जिनसे रेणु (बंसल) जी की बातचीत सुनवाई गई। बहुत विस्तार से जानकारी दी। आधुनिक शोध तकनीक पर आधारित रेटीना सम्बंधित जानकारी भी दी, इससे सम्बंधित रोग और उनके इलाज पर चर्चा की और सावधानी बरतने के लिए सलाह भी दी। रेटीना की विशेषताएं और कार्य बताते हुए यह बताया कि आजकल मधुमेह (डायबिटीज), रक्त चाप, किडनी के रोग से भी इसके अधिक रोगी देखे जा रहे हैं। उम्र के साथ भी आँखों के परदे पर धब्बे दिखाई देते हैं। रेटीना पर प्रतिबिम्ब गिरता हैं, यह परदा हिलने से नजर में फर्क आता हैं। कम दिखने के लिए विस्तार से बताया कि वेस्ट प्रोडक्ट यानि बेकार की चीजे शरीर में रह जाने से फोटो रिसेप्टर मृत हो जाते हैं। चश्मा किसी भी उम्र में आ सकता हैं। इलाज में कार्निया के टिशू को ठीक किया जाता हैं जिससे नंबर कम हो सकता हैं। इलाज के लिए खर्च की भी जानकारी दी कि मशीनों के महंगे होने से खर्च बढ़ा हैं, दोनों आँखों के ऑपरेशन में 25-30 हजार तक खर्च होगा। सलाह दी कि यह जांच करवाते रहे कि कही परदा सरक तो नही रहा हैं। बार-बार आँख में उंगली न डाले, कंप्यूटर पर काम करते हुए बीच-बीच में इधर-उधर देखते रहे।

बातचीत के साथ डाक्टर साहब की पसंद के गीत सुनवाए गए। आधुनिक डाक्टर साहब की पसंद के गीत भी आधुनिक हैं। नए फिल्मी गीत सुनवाए गए - माई नेम इज खान फिल्म से तेरे नैना तेरे नैना, ओंकारा फिल्म से नैना ठग लेंगे। इस कार्यक्रम को विनायक (तलवलकर) जी के तकनीकी सहयोग से कमलेश (पाठक) जी ने प्रस्तुत किया।

बुधवार को आज के मेहमान कार्यक्रम मे मेहमान रहे जाने-माने चरित्र अभिनेता, लेखक और निर्देशक सौरभ शुक्ला जिनसे बातचीत की कमल (शर्मा) जी ने। बताया कि बचपन से ही फिल्मे देखने का शौक रहा और फिल्म बनाना चाहते थे। कॉलेज में आने पर दोस्तों की सलाह से फिल्म न बना कर नाटको में काम करना शुरू किया। अपने नाटको के अनुभव भी बताए। टेलीविजन धारावाहिक भी किए। इसी दौरान शेखर कपूर ने उन्हें फिल्म बैंडिट क्वीन के लिए एक भूमिका का सृजन कर काम दिया। मुझे लगा यह बड़ी बात हैं पर इस फिल्म पर अधिक चर्चा नही की गई। अधिक चर्चा हुई सत्या फिल्म पर जो बतौर लेखक पहली फिल्म हैं जिसमे अनुराग कश्यप के साथ सहलेखन किया। लेखन कार्य के अनुभव बताए और इस काम को कठिन बताया। एक चरित्र अभिनेता, लेखक और निर्देशक से बहुत ही उचित प्रश्न था कमल जी का कि क्या फिल्मो में विषय के मामले में अकाल हैं... इस प्रश्न में नक़ल की बात पर भी चर्चा हो सकती थी कि कई फिल्मे विदेशी और देसी फिल्मो की नक़ल होती हैं। लेकिन जवाब स्पष्ट नही दिया। फिल्मो में ठहराव की बात की और अनावश्यक रूप से टेलीविजन धारावाहिकों से तुलना कर दी। सत्या फिल्म के साथ उनकी पसंद के पुराने गीत भी सुनवाए। बातचीत अगले सप्ताह जारी रहेगी। इस कार्यक्रम को कमलेश (पाठक) जी ने प्रस्तुत किया।

शुरू में इस कार्यक्रम की संकेत धुन के स्थान पर इस श्लोक का गायन सुना -

अथ स्वागतम शुभ स्वागतम
आनंद मंगल मंगलम
इत प्रियम भारत भारतम

इस सप्ताह विविध क्षेत्रो के मेहमान आने से माहौल अच्छा रहा। डाक्टर साहब से उपयोगी जानकारी मिली। फिल्मी क्षेत्र से अलग-अलग समय की बातो को जाना।

Tuesday, December 21, 2010

आ बता दे के तुझे कैसे जिया जाता हैं

1974 के आसपास रिलीज उस समय की लोकप्रिय फिल्म हैं - दोस्त जिसमे नायक नायिका हैं धर्मेन्द्र हेमामालिनी और शत्रुघ्न सिन्हा की भी महत्वपूर्ण भूमिका हैं।

पहले इसके गीत बहुत सुनवाए जाते थे। फिर लम्बे समय से सुना नही पर पिछले लगभग एक-दो महीने से गाड़ी बुला रही हैं गीत दो-चार बार सुना तो इसका एक और लोकप्रिय गीत याद आ गया जिसे नही सुने बहुत समय हो गया।

इस गीत को रफी साहब ने गाया हैं। बीच-बीच में शत्रुघ्न सिन्हा की आवाज में शेरो-शायरी हैं। एक अंतरा शायद लताजी ने भी गाया हैं। इसके जो बोल याद आ रहे हैं वो इस तरह हैं -

दिल पे सह कर सितम के तीर भी पहन कर पाँव में जंजीर भी

रश्क किया जाता हैं आ बता दे के तुझे कैसे जिया जाता हैं

(लता) चैन महलों में नही रंगरलियो में नही दे दो थोड़ी सी जगह अपनी गलियों में मुझे

झूम कर नाचने दो अपनी मस्ती में ज़रा

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Thursday, December 16, 2010

महिला और युवा वर्ग के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 16-12-10

महिला और युवा वर्ग की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए निर्धारित दो कार्यक्रम - सखि-सहेली और जिज्ञासा लगता हैं विविध भारती के दूर-दराज के इलाको तक फैले नेटवर्क को ध्यान में रख कर तैयार किए जाते हैं। इनकी विषय-वस्तु में परिवर्तन की अब भी गुंजाइश हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

सप्ताह में पांच दिन एक घंटे के लिए दोपहर 3 बजे से प्रसारित होने वाले महिलाओं के कार्यक्रम सखि-सहेली में शुक्रवार को प्रसारित हुआ कार्यक्रम हैलो सहेली। फोन पर सखियों से बातचीत की रेणु (बंसल) जी ने। 8-10 फोन काल थे जिनमे से लोकल कॉल भी थे। घरेलु महिलाओं, छात्राओं ने बात की। एक छात्रा की बातचीत से पता चला कि उसके गाँव में अधिक सुविधाए नही हैं, वह प्राइवेट पढाई करती हैं, अब हिन्दी साहित्य में एम ए की पढाई कर रही हैं। परीक्षा के लिए गाँव से बाहर जाती हैं। अच्छा लगा कि गाँव के परिवार शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहे हैं। घरेलु महिलाओं ने बताया कि घर का कामकाज करती हैं, सिलाई का काम करती हैं। विभिन्न क्षेत्रो से आए कॉलों से पता चला कि महाराष्ट्र में ठण्ड शुरू हो गई हैं, कश्मीर में गुलमर्ग में बर्फ पड़नी शुरू हो गई हैं पर अन्य स्थानों पर मौसम सुहावना हैं, हल्की धूप हैं। एक सखि ने बताया कि उसे डांस, गाना और खाना बनाने का बहुत शौक हैं। इस तरह सभी से बातचीत सुन कर लगा कि अब महिलाओं के प्रति सोच में गाँव, जिलो, कस्बो में भी शहरों की तरह विचारधारा बन रही हैं। वैसे अब भी कई महिलाए घरेलु कामो में ही रुचि ले रही हैं।

सखियों की पसंद पर नए-पुराने और बीच के समय के गाने सुनवाए गए जैसे पुरानी फिल्म नागिन का गीत, कुछ पुरानी फिल्म कटी पतंग और नई फिल्म व्हाट इज योर राशि फिल्म के गीत। इसके अलावा एक सखि ने शेरा डाकू फिल्म से एक गीत सुनवाने का अनुरोध किया जो बहुत ही कम सुनवाया जाता हैं -

इन्तेजार का आलम,तन्हाई और गम

रतनपुर, बरेली, छिंदवाड़ा से भी फोन आए, गाँव, जिलो से फोन आए। एक-दो नई सखियों ने फोन किया यानि पहली ही बार विविध भारती से संपर्क किया। एकाध कॉल ऎसी सखियों का था जो अक्सर फोन करती रहती हैं।

सखियों ने विविध भारती के कार्यक्रमों को पसंद करने की बात कही। कार्यक्रम के समापन पर बताया गया कि इस कार्यक्रम के लिए हर बुधवार दिन में 11 बजे से फोन कॉल रिकार्ड किए जाते हैं जिसके लिए फोन नंबर भी बताए - 28692709 28692710 मुम्बई का एस टी डी कोड 022 और कुछ अनिवार्य बाते भी बताई जैसे फोन करते समय यह देख ले कि आसपास बहुत शोर न हो रहा हो जिससे रिकार्डिंग साफ़ नही होगी, नेटवर्क भी ठीक होना चाहिए, यह भी पहले से तय कर ले कि किस गीत की फरमाइश करनी हैं।

शुरू और अंत में संकेत धुन सुनवाई गई जिसमे शीर्षक के साथ उपशीर्षक भी कहा जाता हैं - सखियों के दिल की जुबां - हैलो सहेली ! पूरे कार्यक्रम के दौरान रेणु जी ने सौम्य वातावरण बनाए रखा। इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया वीणा (राय सिंघानी) जी ने, रमेश (गोखले) जी के सहयोग से, तकनीकी सहयोग विनायक (तलवलकर) जी का रहा।

अन्य चार दिनों में सखि-सहेली कार्यक्रम में हर दिन दो प्रस्तोता सखियाँ आपस में बतियाते हुए कार्यक्रम को आगे बढाती हैं। हर दिन के लिए एक विषय निर्धारित हैं -सोमवार - रसोई, मंगलवार - करिअर, बुधवार - स्वास्थ्य और सौन्दर्य, गुरूवार - सफल महिलाओं की गाथा।

सोमवार को प्रस्तोता रही रेणु (बंसल) जी और ममता (सिंह) जी। यह दिन रसोई का होता है, सर्दियों के मौसम को ध्यान में रख कर सखियों द्वारा भेजे गए पत्रों में से व्यंजन चुन कर बताए गए। सरसों का साग पारम्परिक विधि से बनाना बताया गया, मिठाई में खीर सेप रबड़ी और सब्जियों में खट्टी भिंडी बनाना बताया गया। दोनों प्रस्तोता सखियों की बातचीत से यह भी पता चला कि इस तरह की भिंडी मध्य प्रदेश का व्यंजन हैं।

सखियों की पसंद पर पुरानी फिल्मो के लोकप्रिय गीत सुनवाए गए इन फिल्मो से - मदारी, प्यार की राहे, गूँज उठी शहनाई, गुमराह, नया रास्ता और दिल एक मंदिर फिल्म का शीर्षक गीत और नूरजहाँ फिल्म से यह गीत भी सुनवाया गया जो कम ही सुनवाया जाता हैं -

वो मुहब्बत वो वफाए किस तरह हम भूल जाए

मंगलवार को प्रस्तोता रही रेणु (बंसल) जी और निम्मी (मिश्रा) जी। यह करिअर का दिन होता है। इस दिन ऐसे करिअर के बारे में जानकारी दी गई जिसे मैंने पहली बार सुना - मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन। डाक्टर जब रोगी के बारे में कहते हैं तब उन बातो को लिख कर रिपोर्ट रूप में तैयार करना। इस तरह यह कड़ी केवल लड़कियां ही नही लड़को के लिए भी उपयोगी रही।

यह दिन युवा सखियों के लिए हैं इसीलिए इस दिन नए गाने ही सुनवाए गए। वांटेड, वंस अपॉन ए टाइम इन मुम्बई, जब वी मेट फिल्मो के गीत सुनवाए और दिल्ली 6 फिल्म से सखियों की फरमाइश पर यह क़व्वाली सुनना अच्छा लगा क्योंकि विविध भारती से आजकल कव्वालियाँ कम ही सुनने को मिल रही हैं - मौला मेरे मौला

बुधवार को प्रस्तोता रही निम्मी (मिश्रा) जी और ममता (सिंह) जी। इस दिन स्वास्थ्य और सौन्दर्य संबंधी सलाह दी जाती है्। सखियों के भेजे गए पत्रों से शहद, अंजीर, पुदीना, सरसों के तेल के उपयोग की सलाह दी, बताया कि पीने का पानी साफ़ पारदर्शी होना चाहिए और उबले पानी का उपयोग 24 घंटे बाद न करे।। इसके अलावा कुछ और जाने-पहचाने घरेलु नुस्के बताए गए। कोई नई जानकारी नही थी।

सखियों की फरमाइश पर सत्तर अस्सी के दशक की लोकप्रिय रोमांटिक फिल्मो के लोकप्रिय रोमांटिक युगल गीत सुनवाए गए, चितचोर, एक दूजे के लिए, जूली, लव स्टोरी, नागिन फिल्मो से और वारिस फिल्म से यह सदाबहार गीत भी शामिल था -

मेरे प्यार की उम्र हो इतनी सनम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम पे ख़त्म

आज गुरूवार हैं, आज प्रस्तोता रही रेणु (बंसल) जी और ममता (सिंह) जी। इस दिन सफल महिलाओं के बारे में बताया जाता है। इस दिन सखियों के पत्रों से एक ऎसी सखि का पत्र पढ़ कर सुनाया गया जिसमे संघर्षो से जूझते हुए मंजिल पाने की गाथा थी।

सखियों के अनुरोध पर कुछ ही पहले के समय की फिल्मो के गीत सुनवाए - मैं हूँ न, लगे रहो मुन्ना भाई , दूरियां फिल्मो से, बंटी और बबली से कजरारे और जोधा अकबर फिल्म से यह गीत भी शामिल था -

कहने को जश्ने बहारां हैं

हर दिन श्रोता सखियों के पत्र पढे गए। एक पत्र में कवि पन्त जी के बारे में संक्षिप्त जानकारी थी। एक पत्र में सिकंदर और अरस्तु की लघु बोध कथा सुनवाई गई। कुछ पत्रों में लिखा था संघर्ष करते हुए मंजिल की ओर बढ़ना हैं, प्लास्टिक का उपयोग कम करे, ऎसी ही जीवन में अमल करने योग्य बाते। पत्र पढ़ते हुए चर्चा भी होती हैं जिसमे जीवन संबंधी बाते बताई गई जैसे गुस्सा नही करना। विविध भारती के कार्यक्रमों संबंधी पत्र जब पढ़े जाते हैं तब ऐसा लगता हैं जैसे पत्रावली कार्यक्रम सुन रहे हैं। हमारा अनुरोध हैं कि हैलो सहेली में की जाने वाली सीधी बातचीत ठीक हैं। इन चारों दिन पत्रों का सिलसिला बंद कर साहित्य की चुनी हुई रचनाओं का पठन किया जा सकता हैं। साहित्य में महिलाओं के लिए कई प्रेरणादायी रचनाए हैं। कभी एक काव्य रचना पढी जा सकती हैं तो कुछ कहानियों और उपन्यासों का हर दिन कुछ अंश पढ़ते हुए सिलसिलेवार पठन किया जा सकता हैं। साहित्य के साथ हर दिन का विषय जैसे रसोई, करिअर आदि जारी रखते हुए फरमाइशी गीत सुनवाना उचित रहेगा।

कार्यक्रम के शुरू और अंत में सखि-सहेली की संकेत धुन सुनवाई गई। चारो दिन इस कार्यक्रम को प्रस्तुत किया कमलेश (पाठक) जी ने।

शनिवार को रात 7:45 पर सुना सामान्य ज्ञान का साप्ताहिक कार्यक्रम जिज्ञासा। समय यात्री टाइम मशीन के अंतर्गत मदर टेरेसा के जन्म शती पर उनके जीवन चरित की झांकी प्रस्तुत करती विशेष रेल की जानकारी दी गई जो मुबई सहित कुछ शहरों में आ चुकी हैं और कुछ शहरों में आने वाली हैं। इसके तुरंत बाद सुनवाया गया यह पुराना गीत बहुत अच्छा लगा - आइए बहार को हम बाँट ले - अच्छा चुनाव। 41 वे अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव और उसमे दिए गए एवार्डो की जानकारी दी। खेल जगत से इस निर्णय की जानकारी दी कि विश्व कप फुटबौल की मेजबानी 2018 के लिए रूस और 2022 के लिए क़तर करेगे, यहाँ नया गीत चुन कर सुनवाया गया। खोजी रिपोर्टर ने बताया कि दूरदर्शन ने श्याम बेनेगल के चर्चित धारावाहिक भारत एक खोज का वीडियो जारी किया जिसका शीर्ष संगीत सुनवाया गया जिसे सुन कर उन दिनों की याद आ गई। इंटरनेट कनेक्शन में वायरल हैकिंग में वाई हाई के प्रयोग की जानकारी दी साथ ही यह सलाह भी दी कि बिल अधिक आने पर पूछताछ करे। बताया गया कि खोजी रिपोर्टर का विशेष कार्यक्रम तैयार किया जाएगा, अगर आप के पास कोई सवाल हैं तो इस पते पर भेजे - gys@gmail.com

इस पूरे कार्यक्रम में श्याम बेनेगल की जानकारी को छोड़ कर सभी बाते समाचार पत्रों और इंटरनेट से आसानी से शहरियों को मिल जाती हैं। कुछ और स्तम्भ जोड़ कर शहरी युवाओं के लिए भी इसे अधिक उपयोगी बनाया जा सकता हैं। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा। कार्यक्रम को प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने, तकनीकी सहयोग पी के ए नायर जी का रहा।

इन दोनों कार्यक्रमों को सुनकर ऐसा लगता हैं जब विविध भारती महिला और युवा वर्ग के लिए अलग कार्यक्रम तैयार कर ही रही हैं तब बच्चो के लिए भी कोई कार्यक्रम तैयार किया जा सकता हैं। बाल श्रोताओं के लिए भी विविध भारती में जगह होनी चाहिए।

इस सप्ताह ख़ास बात रही कि इस साल की बिदाई की तैयारियां शुरू हो गई। 31 दिसंबर को फोन-इन मन चाहे गीत कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा हैं। इसके लिए श्रोताओं से इस साल का अपना मन चाहा गीत सुनने के लिए 21 दिसंबर को फोन करने की सूचना दी गई। रिकार्डिंग 11 बजे से होगी। इसके लिए फोन नंबर वही हैं जो हमने ऊपर हैलो सहेली कार्यक्रम के लिए बताए हैं।

Tuesday, December 14, 2010

सांच को आंच नही फिल्म के गीत

वर्ष 1977 के आसपास राज्यश्री प्रोडक्शंस के बैनर तले एक फिल्म रिलीज हुई थी - सांच को आंच नही

राज्यश्री की अन्य फिल्मो की तरह यह फिल्म भी पारिवारिक हैं और मनोरंजक होने के साथ-साथ शिक्षाप्रद भी हैं। इस फिल्म के गीत उन दिनों बहुत लोकप्रिय हुए थे, शायद एक शीर्षक गीत भी हैं। रेडियो से गाने बहुत सुनवाए जाते थे। अब बहुत दिनों से यह गीत नही सुने। अब तो एक बोल भी याद नही आ रहा।

न गीतों से सम्बंधित कोई नाम याद आ रहे हैं और न ही किसी कलाकार के नाम। शायद इसमे रामायण फेम अरूण गोविल हैं।

पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Sunday, December 12, 2010

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 9-12-10

रेडियो नाटको के विभिन्न रूपों को सुनने के लिए एक मात्र चैनल हैं - विविध भारती। नाटकों के दो कार्यक्रम हैं हवामहल और नाट्य तरंग हवामहल रात के प्रसारण का दैनिक कार्यक्रम हैं और नाट्य तरंग सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को दोपहर बाद प्रसारित होता हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

हवामहल में रात 8 बजे शुक्रवार को हास्य व्यंग्य झलकी सुनवाई गई - काश ऐसा होता जिसमे उन पर व्यंग्य हैं जो समाज में अपना स्तर बनाए रखने के लिए उस भाषा को अधिकार से बोलते हैं जिसकी ठीक से जानकारी नही हैं। चाचा को उर्दू सीखने का शौक हुआ। कुछ उर्दू के शब्द बता दिए जैसे स्थानान्तरण को तबादला और इंतकाल भी कहते हैं। चाचा ने पत्नी को उसके भाई के तबादले की खबर देते हुए कहा इंतकाल हो गया। जाहिर हैं नाराजगी झेली फिर अंग्रेजी सीखने का शौक हुआ। यस नो सीख कर गाँव में ब्याह में झगड़ा मोल लिया। भाषा सिखाने वाले भतीजे ने प्रयोग कर बताया भाषा के प्रयोग कॉमन सेन्स होनी चाहिए। उन्होंने घर में पत्नी को प्रयोग कर बताया, पत्नी प्रयोग तो नही समझ पाई पर कह दिया, ये क्या किया, कॉमन सेन्स होनी चाहिए। अच्छी रही झलकी जिसके लेखक हैं कमर इरशाद राही और लखनउ केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं जयदेव शर्मा कमल।

शनिवार को नाटिका सुनी - अलाउद्दीन का चिराग। कबाड़ की दुकान से एक पुराना चिराग खरीद लाता हैं, यह सोच कर कि सफाई के बाद शायद सोने का निकल आए। चिराग को साफ़ करते समय उसमे से जिन निकल आता हैं। इस बार जिन गुलाम न होकर मालिक बन कर उससे काम करवाता हैं। कहता हैं कि अब तक उसे बहुत बेवकूफ़ बनाया गया, अब उसने दुनिया की सभी भाषाए भी सीख ली हैं और अब वह मालिक बन दूसरो से काम कराएगा। गुलामी की बात सुन वह घबरा जाता हैं, यह उसका सपना होता हैं। इस तरह हवामहल की पारंपरिक शैली की यह हास्य प्रस्तुति रही। दिल्ली केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं दीनानाथ और लेखक हैं अमृत कश्यप।

रविवार को इतिहास से विषय लिया गया। राममूर्ति चतुर्वेदी की लिखी नाटिका सुनी - आम्र मंजरी। वैशाली के लिच्छवी समाज और वहां के शासन और सामजिक प्रथा का पता चला। इतिहास का जाना-पहचाना चरित्र हैं नर्तकी आम्रपाली। जब वह देश में आए संकट में सहायता करना चाहती हैं तो शासन की ओर से इन्कार कर दिया जाता हैं क्योंकि उसे केवल भोग-विलास की वस्तु माना जाता हैं। एक भेंट में सेनापति पद्मनाभन के कहने पर वह अपने बालो से आम्र मंजरी निकाल कर देती हैं जिसकी कीमत वह समय आने पर लेना चाहती हैं। इसी संकट में वह सेनापति को कीमत के रूप में रोक लेना चाहती हैं और वचन के अनुसार सेनापति बिना उसकी अनुमति कहीं जा नही सकता। नगर सेठ और आम्रपाली के संवाद अच्छे हैं जिसमे नारी को केवल ऐश्वर्य के लिए अपनाने और उसके गुणों पर ध्यान नही दे कर उसे अपमानित करते समाज की झलक हैं। अच्छी प्रस्तुति, निर्देशिका हैं रमा बावा।

सोमवार की प्रस्तुति में नारी का दूसरा पहलू देखने को मिला। हरी आत्मा की लिखी नाटिका काली चादर की नारी महत्वाकांक्षी हैं। वह रंगमंच की उम्दा अभिनेत्री हैं और आगे बढ़ कर यश कमाना चाहती हैं। इसके लिए वह माँ भी नही बनना चाहती। बहुत प्यार करने वाले पति को छोड़ कर सहकलाकार से विवाह कर लेती हैं। दो वर्ष तक उसका शोषण करने के बाद वह उसे छोड़ देता हैं। तब वह पहले पति के पास लौटती हैं पर वह अपनाने से इन्कार कर देता हैं। दोनों में हुई बहस से वह आत्महत्या को प्रेरित होती हैं। इसे निर्देशित किया गंगा प्रसाद माथुर ने। बढ़िया प्रस्तुति रही विविध भारती की।

मंगलवार को बहुत दिन बाद नए विषय पर झलकी सुनना अच्छा लगा - तू तू मैं मैं वाली एकता। क्रिकेट जगत पर रही झलकी। सभी जानते हैं आजकल खेल के अलावा उस दुनिया में क्या-क्या हो रहा हैं। खिलाड़ी खेल से ज्यादा मॉडलिंग पर ध्यान दे रहे हैं, मैच फिक्स हो रहे हैं। खिलाड़ियों में एकता नही हैं। कोच से बनती नही हैं। मैच हारने पर खुश होते हैं कि सिरदर्दी ख़त्म हुई। इन्ही सब बातो की प्रस्तुति थी। मूल लेखक हैं डा ज्ञानचन्द्र द्विवेदी जिसका रेडियो नाट्य रूपांतर किया गया। कलाकरों के नाम भी इस बार बताए गए। प्रस्तुति भोपाल केंद्र की रही।

बुधवार को विदेशी साहित्य से हास्य नाटिका सुनवाई गई - सफ़ेद हाथी की चोरी जिसका हिन्दी नाट्य रूपांतर सुरेन्द्र गुलाटी ने किया। महाराजा के सफ़ेद हाथी को कुछ समय के लिए बाहर लाया जाता हैं और वह गुम हो जाता हैं। जासूस से संपर्क किया जाता हैं। बड़े पैमाने पर ढूंढा जा रहा हैं। शहर भर में खोज हो रही हैं जिसमे हजारो का खर्च हो गया। इनाम की रकम बढ़ा कर एक लाख हो गई। चार दिन की खोज के बाद हाथी मिलता हैं पटाखों की दुकान पर जहां उसके टुकडे हो गए। जासूस सभी टुकड़ो को सुरक्षित भेजने का वादा करता हैं और दावत के आयोजन की भी बात करता हैं, क्योंकि टुकड़ो में ही सही हाथी को ढूंढा तो हैं। इनाम की रकम और ढूँढने का खर्च भी देने को कहता हैं। कुछ संवाद ऐसे भी रहे जिनमे बताया कि बड़ो से किस तरह धन उगाही की जाती हैं जैसे चोरो से सांठ-गाँठ कर इनाम की रकम बाँट लेना। समुद्र के किनारे से जासूस का तार भेजना जहां तार घर ही नही हैं। विविध भारती की इस प्रस्तुति के निर्देशक सत्येन्द्र शरद हैं।

गुरूवार को झलकी सुनी - बुरे फंसे बदली करवा कर। अपने कुछ कारणों से नौकरी का शिमला में तबादला करवा लेते हैं, यह सोच कर कि अब शान्ति से रह सकेगे। पर शिमला घूमने के लिए रिश्तेदार एक के बाद एक आने शुरू हो जाते हैं, घर भी छोटा पड़ जाता हैं और खर्च भी बढ़ जाते हैं। अच्छी यथार्थवादी रचना रही जिसे लिखा आरती शर्मा ने। गुरमीत रमण के निर्देशन में यह शिमला केंद्र की प्रस्तुति रही।

इस तरह इस सप्ताह हवामहल में विषयो को लेकर अच्छी विविधता रही। हास्य के साथ व्यंग्य भी रहा जिससे मनोरंजन भी हुआ। नारी के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूप गंभीरता से प्रस्तुत किए गए। इतिहास से विषय भी लिया और सामायिक विषय भी जैसे आज के दौर का क्रिकेट और विदेशी साहित्य की भी झलक मिली। सामाजिक समस्या भी बताई और दुनियादारी निभाने में आने वाली उलझनों का भी चित्रण हुआ। प्रस्तुति में भी विविधता नजर आई जैसे मूल रचनाओं का रेडियो नाट्य रूपांतर हुआ, झलकी, नाटिका सुनवाई गई।

3:30 बजे नाट्य तरंग कार्यक्रम में शनिवार को असद जैदी का लिखा नाटक सुना - वायलन वादक। अकेलेपन के द्वन्द पर आधारित इस नाटक में युवा वायलन वादक के पिता नही हैं। माँ ने उसका पालन किया, वह अध्यापिका हैं। अपने अकेलेपन की चर्चा वह बेटे से नही कर सकती। अपने सहयोगी बत्रा के साथ विवाह करना चाहती हैं जो खुद भी बरसों से अकेला हैं। वह अपने बेटे को बत्रा के नाटको में काम करने के लिए कहती हैं। रिहर्सल पर माँ का आना युवक को पसंद नही। माँ अपने विवाह की बात कहती हैं पर युवक को बत्रा के साथ उसका सम्बन्ध पसंद नही। माँ विवाह कर लेती हैं। बेटा नए घर में सहज नही हो पाता और पुराने घर में जाकर रहने लगता हैं। उदास और अकेलेपन में दो साल गुजार देता हैं। वायलन बजाता हैं और उसकी पड़ोसन लड़की हमेशा की तरह सुनती हैं। एक बार तनाव में दूर निकल जाता हैं और लगातार वायलन बजाता रहता हैं, लड़की भी वहां आकर सुनती हैं। समाचार बन जाता हैं कि वह विश्व रिकार्ड बनाने के लिए लगातार बजा रहा हैं। बारह- चौदह घंटे तक बजाता जाता हैं। समाचार सुन कर पुलिस की सहायता से उसको ढूंढ रही माँ वहा आती हैं। पता चलता हैं युवक ने आत्म हत्या कर ली। इस नाटक पर ख्यात हिन्दी लेखिका मन्नू भंडारी के चर्चित उपन्यास आपका बंटी की छाप नजर आई। नाटक का निर्देशन अच्छा लगा, खासकर युवक के मन में चल रही बातो की प्रस्तुति अच्छी की। जयपुर केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं मदन शर्मा।

रविवार को सिद्धनाथ कुमार का लिखा नाटक प्रसारित किया गया - यात्रा का अंत। इसमे कुछ वर्ष पहले के मध्यमवर्गीय परिवार का यथार्थवादी चित्रण हैं, जब लड़कियां खुद अपने आप को समाज में बोझ समझने लगती थी। बेटी का विवाह न कर पाने से निराश पिता घर छोड़ देते हैं और रेल में उद्देश्यहीन यात्रा कर रहे। पति के कही चले जाने से दुखी माँ अपने बेटे से कहती हैं कि बच्चो को अच्छी शिक्षा दी, अच्छा पालन किया फिर भी पिता इतने हताश हैं। बेटा कहता हैं उसने कोई दुःख नही दिया, फिर भी ऐसा हुआ। बेटी को लगता हैं उसका विवाह न कर पाने से पिता ने घर छोड़ा हैं। माँ कहती हैं अगर वो वापस नही आए तो वह भी घर छोड़ देगी, बेटी कहती हैं माँ-पिता के जाने के बाद वह भी घर में नही रहेगी। बेटा अलग घर में रहने वाले अपने भाई से बात करता हैं। चर्चा होती हैं कि पिता को अपनी बेटी के ब्याह के लिए चालीस हजार रूपए चाहिए। दोनों बेटो में से कोई भी पूरे पैसे नही दे सकते। एक बेटा आधे दे सकता हैं पर दूसरा कुछ भी नही क्योंकि दोनों को अपने घर बनवाने हैं। स्थिति देख कर दोनों शादी की व्यवस्था के लिए तैयार हो जाते हैं पर तभी पता चलता हैं कि बहन ने आत्महत्या कर ली हैं और चिट्ठी में लिखा हैं कि वह एक बोझ हैं और भाइयो का उसके लिए त्याग करना उसे पसंद नही। रेल में पिता को अखबार में बेटे द्वारा छपवाए गए पत्र से यह समाचार मिलता हैं जिसमे घर आने का अनुरोध होता हैं। आज के दौर में यह सब ठीक नही लगता पर उस समय के अनुसार बहुत मार्मिक रहा यह नाटक। निर्देशक हैं एम एस बेग। रांची केंद्र की अच्छी प्रस्तुति रही। इस केंद्र की कम ही रचनाए सुनने को मिलती हैं।

इस तरह इस सप्ताह नाट्य तरंग के दोनों नाटको में नारी के दोनों रूप प्रस्तुत हुए - आधुनिक और पारंपरिक, और दोनों ही रूपों में नारी संघर्ष करती नजर आई।

सप्ताह के सभी नाटको से विविध भारती के साथ विभिन्न केन्द्रों की प्रतिभाओं का परिचय मिला। लेकिन खेद हैं कि एक दिन को छोड़ कर किसी भी दिन कलाकारों के नाम नही बताए गए। प्रतिभाओं को नाम से पहचानना अच्छा रहेगा।

Friday, December 10, 2010

श्री अमीन सायानी साहब को हर हप्ते सुनिये 'संगीत के सितारों की महेफ़ील'में तथा एकोर्डियन वादक श्री सुमित मित्राजी को फ़िर से याद

आदरणिय पाठक गण,

दो दिन पहेले श्री अमीन सायानी साहब से दूर भाषी बात-चीत के दौरान तथा कल उनके बेटे श्री राजील सायानीजी से मिले फ़ोन के आधार पर यहाँ बात यहाँ आप सभी को बताना चाहता हूँ, कि एक बार भारत के सिर्फ़ तीन शहरोमें रेड एफ एम 93.5 पर और बाद में करीब दो साल पहेले आकाशवाणी के उत्तर और मध्य भारतीय गीने-चूने प्रायमरी और विविध भारती केन्द्रो से प्रसारित संगीत के सितारों की महेफ़ील को अब निज़ी चेनल रेडियो सिटी 91.1 के Ahmedabad, Ahmednagar, Akola, Delhi, Hyderabad, Jaipur, Jalgaon, Lucknow, Mumbai, Nagpur, Nanded, Pune, Sangli, Solapur, Surat and Vadodra (Baroda). से प्रसारित किया जायेगा हर रविवार दो पहर 12 बजे और पुन: प्रसारण रात्री 9 बजे से एक घंटे तक । शहरो की पूरी उनकी तरफ़ से मिले मेईल के बाद वहाँ से कोपी पेस्ट करके यहाँ दी है । तो पूराने अलभ्य गायको गीतकारो और संगीत कारो (जिनमें कई आज हयात नहीं है) एक बार फ़िर सुनिये अमीन सायानी साहब के अनमोल संग्रहालय से और चूकीये मत । श्री अन्नपूर्णाजी की साप्ताहीकी का आज दिन है तो क्या वे दो दिन यानि रविवार सुबह तक ठहर सकती है ?दि.26, नवम्बर, 2010 की मेरी इसी विषय की पोस्ट जो श्री सागर भाईने इस ब्लोग के सम्पादक की हेसीयत से हंगामी रूप से हटा कर रख़ी थी, जो मैनें फ़िर से जारि तो की पर एक जाया टिपणी चिदाम्बर जी के अलावा किसी से नहीं मिली और मिले भी कैसे ? पिछले पन्ने पर कितने लोग जायेंगे ? तो उसे उस कलाकार को जनम दिनकी बधाई के रूपमें इतने दिनों के बाद प्रस्तूत करना तो कोई रूपसे सही तो कैसे लगेगा पर उस कलाकार के बारेमें थोड़ी सी पहचान देने के लिये और जो उन्हें और उनके भारतीय फिल्म संगीत में उनके योददान को जानते है उनको ताझा करने के लिये उनकी जानकारीयोँ में से बहोत कम नीचे इन संजोग के आधीन जरूरी सुधार के साथ प्रस्तूत कर रहा हूँ ।

दि. 26 नवम्बर के दिन मुम्बई स्थित भारतीय फिल्म संगीत में अपने एकोर्डियन वादन द्वारा योगदान प्रदान करने वाले
श्री सुमित मित्राजीने अपना जन्मदिन मनाया था । मैं ख़ुश-किस्मत हूँ कि 21 (शायद?), फरवरी, 2010 के दिन बिल्लीमोरा के मेरे मित्र और वहाँ की गुन्जन ललित कला संस्थाके कर्ताहर्ता श्री नरेश मिस्त्रीजी (खूद भी एकोर्डियन वादक) द्वारा आयोजित एक फिल्म वाद्य संगीत के शो में उनके द्वारा आमंत्रित हो कर मैं मेरे मित्र सुरत के जी. रझाक बेन्ड के श्री फारूक भाई और अन्य मित्र श्री शिरीष भाई के साथ गया था और उस कार्यक्रम में सुमितजी और सेक्सोफोन, क्लेरीनेट और वेस्टर्न फ्ल्यूट वादक श्री सुरेश यादव को बहूत आनंद से सुना और देख़ा था ।

उनकी फिल्मी धुनों की आज तक सिर्फ एक रेकोर्ड उस समय की पोलिडोर नाम धारी रेकोर्ड कम्पनी ने निकाला था जिसमें फिल्म बॉबी के चार गीत उन्होंने एकोर्डियन पर नहीं पर इलेक्ट्रिक ऑर्गन पर बजाई थी, जिसमें उनकी मेरे साथ हुई बात के अनुसार एकोर्डियन पर धीरज कुमार ने साथ दिया था । जब की मूल गानेमें सुमितजीने ही एकोर्डियन बजाया है और बाद में उस इ पी रेकोर्ड को स्व. अरूण पौडवाल की बजाई एकोर्डियन पर फिल्म मेरा नाम जोकर के तीन गानो के ई पी रेकोर्ड की धून के साथ मिली जुली एल पी रेकोर्ड प्रस्तुत हुई थी । उस समय मुझे उनके साथ तसवीर खिंचवाने का मौका मिला था जो फारूक भाई और सुमितजी के सौजन्य से नीचे प्रस्तुत की है ।


नीचे देख़ीये और सुनिये उसी कार्यक्रम में उनके द्वारा बजाई गई फिल्म झुक गया आसमान के शीर्षक गीत की एकोर्डियन पर धुन जिसमें सिन्थेसाईझर पर बडोदरा के श्री दिलीप रावल है और पर्क्यूसन (इस शब्दमें कोई गलती हो तो सुधार बताईए) पर मुम्बईमें फिल्म उद्योग में सालों काम करने वाले श्री नरेन्द्र वकील है ।



नीचे आज रेडियो श्रीलंका पर मेरे द्वारा भेजी गई सूचना के आधार पर सुबह 7.34 पर वहाँ की उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमारजी ने प्रस्तुत किया हुआ बधाई संदेश सुनिये ।



रेडियोनामा के इस मंच से भी श्री सुमितजी को जनम दिन की ढेर सारी शुभ: कामनाएँ ।
(सामान्य रूप से मेरी यह नीति नहीं रही है कि अन्य पोस्ट लेख़क की पोस्ट पर तूर्त (तुरंत) ही मेरी पोस्ट लिख़ दूँ । पर जनम दिन के बारेमें पोस्ट उसी दिन प्रकाशित करनी होती है, इस लिये संजयजी और अन्नपूर्णाजी क्षमा करें और नये जूडने वाले पाठको से अनुरोध है कि वे पोस्ट भी पढे, हालाकि युनूसजी जैसे तो पढ चूके (चुके) है संजय जी की पोस्ट)
पियुष महेता ।
सुरत ।

Friday, December 3, 2010

शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 2-12-10

मेरी समझ में विविध भारती ही एक ऐसा चैनल हैं जो शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों को न सिर्फ गंभीरता से प्रस्तुत करती हैं बल्कि इसे शिक्षाप्रद बनाए रखती हैं। शास्त्रीय संगीत के आजकल दो कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं संगीत सरिता और राग-अनुराग एक शिक्षाप्रद कार्यक्रम हैं और दूसरे में विभिन्न फिल्मी गीतों के शास्त्रीय आधार का पता चलता हैं। लेकिन खेद हैं कि केवल शास्त्रीय गायन और वादन का आनंद देने वाला हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम अनुरंजनि बंद कर दिया गया हैं। अनुरोध हैं कि इस कार्यक्रम का प्रसारण फिर से शुरू कीजिए।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

सुबह 7:30 बजे दैनिक कार्यक्रम संगीत सरिता में श्रृंखला प्रसारित की गई जिसमे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों का परिचय दिया गया। इसे प्रस्तुत कर रही हैं ख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना। हर दिन एक राग के बारे में बताया गया। इस राग के वादी संवादी स्वर, आरोह अवरोह, राग का चलन और राग की पकड़ बताई गई और उस राग में निबद्ध रचनाएं सुनवाई गई।

शुक्रवार को राग भोपाली का परिचय दिया गया। इस राग में पंडित वसंत राव देशपाण्डेय का गायन सुनवाया गया। उसके बाद इस राग पर आधारित फरीदा खानम की गाई सूफी तबस्सुम की गजल सुनवाई गई।

शनिवार को राग मालकौंस पर चर्चा हुई। इस राग में निखिल बैनर्जी का सितार वादन सुनवाया गया, तबले पर संगत की थी कन्हाई दत्त ने और उसके बाद इस राग पर आधारित फिल्म स्वर्ण सुन्दरी का गीत सुनवाया गया - मुझे न बुला

रविवार को राग बागेश्री का परिचय मिला। इस राग में द्रुत ख्याल में बंदिश भी सुनवाई गई, स्वर जगदीश प्रसाद का रहा, तबले पर संगत की थी निजामुद्दीन खान ने। अंत में इस राग पर आधारित गायत्री महिमा फिल्म से रफी साहब का गाया यह गीत सुनवाया जो मैंने पहली ही बार सुना और जिसे सुन कर बहुत अच्छा लगा -

सांची हो लगन जो मन में, दुःख दर्द मिटे पल छिन में

सोमवार को राग रागेश्री के बारे बताया गया। इस राग में रोनू मजूमदार का बाँसुरी वादन सुनवाया गया जिसमे तबले पर संगत की थी सदानन नायनपल्ली ने। इस राग पर आधारित आज और कल फिल्म का गीत भी सुनवाया - मोहे छेड़ो न कान्हा बजरिया में

मंगलवार को राग मालवी का परिचय मिला। इस राग में उनका खुद का गायन सुनवाया गया।

बुधवार को सुबह के प्रसिद्ध राग भैरवी का परिचय दिया गया। पन्नालाल घोष का शुद्ध भैरवी में बाँसुरी वादन सुनवाया गया जिसके बाद संत ज्ञानेश्वर फिल्म का गीत सुनवाया - जोत से जोत जगाते चलो

सामान्य जानकारी में बताया गया कि गायकी के लिए सबसे पहले आवाज अच्छी होनी चाहिए फिर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा होनी चाहिए और उस शिक्षा पर अमल भी किया जाना चाहिए। फिल्मी और गैर फिल्मी रचनाओं का चुनाव भी अच्छा रहा। यह श्रृंखला विविध भारती के संग्रहालय से चुन कर सुनवाई गई, इसका सम्पादन और संयोजन छाया (गांगुली) जी ने किया हैं। अच्छा चुनाव रहा संग्रहालय से। हमारा अनुरोध हैं कि आगे भी निश्चित अवधि से इसका प्रसारण कीजिए ताकि नए श्रोता ख़ास कर नई पीढी को रागों का परिचय मिलेगा।

गुरूवार से एक बढ़िया श्रृंखला शुरू हुई - सिने संगीत ताल के माध्यम से जिसे प्रस्तुत कर रहे हैं प्रसिद्ध संतूर वादक पंडित उल्लास बापट। आप से बातचीत कर रही हैं निम्मी (मिश्रा) जी। बातचीत का आधार हैं, एक ही ताल किस-किस रूप में फिल्मी गानों में सुनाई देता हैं। जानकारी दी गई कि ताल एक ही हैं पर हर गाने में इसका ठेका अलग हैं। तीन ताल में बंदिश सुनाई इस जानकारी के साथ कि शिक्षा की शुरूवात ही इस ताल से होती हैं। इसके मूल स्वर भी बताए। इस ताल में तीन फिल्मी गीत चुन कर सुनवाए गए जिनमे पहले दो गीतों में इस ताल का पूरा स्वरूप हैं -

कर नही पाए जिया मोरे पिया

लोकप्रिय गीत - मेरे संग गा गुनगुना

तीसरा गीत ऐसा चुना जो सुगम संगीत के निकट हैं - छलक गई बूंदे मितवा, यह भी पता चला कि इस गीत में पहली बार पंडित उल्लास बापट जी ने संतूर बजाया था।

इस दिन भी गीतों का चुनाव अच्छा रहा, खासकर दो ऐसे गीत सुनवाए जो कम ही सुनवाए जाते हैं।

इस श्रृंखला को रूपाली रूपक जी प्रस्तुत कर रही हैं वीणा (राय सिंघानी) जी के सहयोग से, तकनीकी सहयोग प्रदीप (शिंदे) जी का हैं।

हर दिन कार्यक्रम के शुरू और अंत में संकेत धुन बजती रही जो बढ़िया और समुचित हैं।

गुरूवार को शाम बाद के प्रसारण में 7:45 पर प्रसारित हुआ साप्ताहिक कार्यक्रम राग-अनुराग। इस कार्यक्रम में विभिन्न रागों पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाए गए।

शुरूवात की गुमराह फिल्म के गीत से जिसका दूसरा संस्करण सुनवाया गया जो आमतौर पर नही सुनवाया जाता - चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों, जिसके लिए राग का नाम मैंने सुना - नायकी कानडा

दूसरा युगल गीत सुनवाया गया गाइड फिल्म से - गाता रहे मेरा दिल जिसके लिए राग का नाम ठीक से सुनाई नही दिया।

समापन किया राग किरवानी में जुआरी फिल्म के गीत से - न जाने क्या करेगी तेरी झुकी झुकी नजर

इस तरह इस बार गीतों के चुनाव में विविधता नजर आई पर रागों की स्थिति स्पष्ट नही हो पाई।

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