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Friday, April 29, 2011

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 28-4-11

नाटकों के दो कार्यक्रम हैं हवामहल और नाट्य तरंग हवामहल रात के प्रसारण का पुराना दैनिक कार्यक्रम हैं और नाट्य तरंग सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को दोपहर बाद प्रसारित होता हैं। आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

हवामहल रात में 8 बजे से 8:15 बजे तक प्रसारित होता हैं। इस सप्ताह धारावाहिक नाटक प्रसारित किया गया -उजड़ी हुई बस्ती में जिसकी लेखिका हैं विभा देवसरे। शुक्रवार को इसकी दूसरी कड़ी प्रसारित हुई। लेकिन सिलसिला मिलाने के लिए पहली कड़ी की जानकारी दी गई जिससे पूरे कथानक का शुरू से पता चल गया। नायक चेतन एक ऎसी बस्ती में पहुँच जाता हैं जो उजड़ चुकी हैं। यहाँ उसकी मुलाक़ात एक बुजुर्गवार से होती हैं। यह बुजुर्ग बाबा उसे बताते हैं कि जागरूकता न होने से, आबादी बहुत बढ़ने से, जीवन निर्वाह कठिन होने से यह बस्ती उजड़ गई। एक-एक खँडहर मकान के बारे बताते रहे कि यह परिवार कैसे उजड़ा। एक मकान में सुधा नाम की एक ग्राम सेविका रहती थी जो घर-घर जाकर समाज सुधार की बाते बताती पर उसके अपने ही माता-पिता को लड़का न होने का दुःख हैं। उसका विवाह एक ऐसे विधुर माधो से तय कर दिया जाता हैं जिसके बच्चे सुधा की उम्र के हैं। वह विवाह नही करना चाहती थी और यही बात समझाने बाबा उसके घर जाते हैं पर उसके पिता नही मानते फिर रातो रात सुधा और माधो के परिवार घर छोड़ कही चले जाते हैं। नायक अब भी यह कल्पना करता हैं कि सुधा यह संघर्ष जीत गई होगी। एक परिवार था मंगरू और संतो का। मंगरू आलसी हैं, उनका बेटा लंगडा और बेटी नेत्रहीन हैं। संतो बेटे का ऑपरेशन कराने बच्चो के साथ सरकारी अस्पताल जाती हैं, बस खाई में गिर जाती हैं, मंगरू वहां आता और अंधी बेटी उसकी आवाज पहचान जाती हैं पर वह उसे अपने साथ नही लाता। यहाँ बाबा के अलावा सुखिया भी हैं जो गाकर इस बस्ती के बारे में बताता हैं। बाबा इस सुखिया के बारे में बताते हैं कि यह पहले वाकई सुखी था। इसका एक दोस्त था शोभाराम। तारा शोभाराम की पत्नी और उनके चार बच्चे थे और वह पांचवी बार माँ बनने वाली थी। सुखिया के बहुत समझाने पर वह समझते हैं पर तब तक देर हो चुकी होती हैं, ग्राम सेविका कोई मदद नही कर पाती और पांचवे बच्चे को जन्म देते समय वह चल बसती हैं। उसकी मौसी चारो बच्चो को लेकर गाँव चली जाती हैं। एक दिन गाँव से मौसी के गुजरने की खबर आती हैं। वह बच्चो को लेने गाँव गया पर कभी नही लौटा। सुखिया के बेटे की तबियत बिगड़ जाती हैं पर डाक्टर पार्टी छोड़ कर आने के लिए तैयार नही। बस्ती में और डाक्टर, अस्पताल नहीं हैं। समय पर इलाज न होने से उसका निधन हो जाता हैं। एक महिला के ऑपरेशन के मामले में डाक्टर से ग्राम सेविका का विवाद होता हैं। बाद में डाक्टर का ह्रदय परिवर्तन होता हैं। मंगलवार को अंतिम कड़ी प्रसारित हुई। इसमे रज्जो के परिवार के उजड़ने की कहानी याद की गई। उसकी पत्नी सास के पोते की चाह में पांचवी बार गर्भवती हैं जिससे उसका शरीर भी कमजोर हो गया हैं। रज्जो बाहर दोस्तों के साथ ताश खेल रहा हैं, उसे लगता हैं फिर से लड़की हुई तो अम्मा बिगड़ेगी। पत्नी उससे मिलना चाहती हैं। सुखिया के कहने पर भी वह नही जाता। प्रसव घर पर दाई की सहायता से किया जाना हैं। ग्राम सेविका अस्पताल की गाड़ी लाती हैं फिर भी अस्पताल नही जाना चाहते। प्रसव के दौरान उसकी पत्नी दम तोड़ देती हैं। समाज का यथार्थ बताता बढ़िया धारावाहिक। जितना अच्छा लेखन उतनी अच्छी प्रस्तुति। बस, एक बात अखर गई, कलाकारों के नाम नही बताए गए। दिल्ली केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं कमल दत्त।

बुधवार को विपिन बिहारी मिश्रा की लिखी झलकी सुनी - मास्टरजी। लखनऊ केंद्र की इस प्रस्तुति के निर्देशक हैं जयदेव शर्मा कमल। सच्चाई भी बताई और सन्देश भी अच्छा रहा। गाँव के स्कूल में 9 कुल बच्चे हैं। मास्टरजी देर से आते हैं और बच्चो से नीम की छाँव में खेलने के लिए कहते हैं, वह सोना चाहते हैं और बच्चो से कहते हैं कुछ पूछना हो तो बाद में पूछ लो, वैसे बाद में उन्हें मीटिंग में जाना हैं। बच्चे फिल्मी गानों की अन्ताक्षरी खेलते हैं। निरीक्षक आ जाते हैं। मास्टरजी को लताड़ते हैं। कहते हैं इसीलिए सरकारी स्कूल में कम बच्चे हैं, अन्य बच्चे दूसरे स्कूलों में जाते हैं। तभी वहां विधायक आते हैं जिनके साथ मास्टरजी को चुनाव से सम्बंधित मीटिंग में जाना हैं। अंत में निरीक्षक की बातो से सबको अपनी गलती का एहसास होता हैं। इस तरह मनोरंजन भी हुआ और सन्देश भी मिला। गुरूवार को भी सुरिंदर कौर की लिखी ऎसी ही झलकी सुनी - अनमोल दौलत। रक्षा बंधन का त्यौहार हैं। पत्नी सोचती हैं कि पति की बहन अमीर घराने में ब्याही हैं उसे क्या भेंट दी जाए। जब बहन आती हैं तब लगता हैं उसके लिए स्नेह का बंधन ही अनमोल भेंट हैं। अच्छा तो लगा पर इस झलकी का प्रसारण किसी भी दृष्टि से उचित नही लगा। राखी पूनम के अवसर पर सुनवाते तो अच्छा लगता दूसरी बात दो दिन पहले ही दिल्ली केंद्र का धारावाहिक प्रसारित हुआ था, फिर से उसी केंद्र की झलकी और निर्देशक भी वही। वैसे भी गंभीर धारावाहिक के बाद एक सिर्फ मनोरंजन करने वाली झलकी की कमी महसूस हुई।

3:30 बजे से 4 बजे तक प्रसारित होने वाले नाट्य तरंग कार्यक्रम में शनिवार और रविवार को गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के लिखे मूल बंगला उपन्यास चोखेर बाली का रेडियो नाट्य रूपांतर सुनवाया गया - आँख की किरकिरी। यह उपन्यास इतना लोकप्रिय हैं कि इसका कथानक बहुत से लोग जानते हैं। नारी के दो रूप - एक सरल ह्रदय और दूसरी व्यावहारिक। पुरूष की प्रेम भावना कभी एक ओर तो कभी दूसरी ओर आकर्षित करती हैं। सरल पत्नी आशा को छोड़ महेंद्र विनोदिनी के साथ कही चला भी जाता हैं पर विधवा विनोदिनी उसे अपनाने से इन्कार कर देती हैं। रूपान्तरकार और निर्देशक हैं नंदलाल शर्मा। प्रस्तुति जयपुर केंद्र की हैं। कलाकारों के नाम नही बताए गए। गुरूदेव की 125 वी जयंति के अवसर पर यह प्रस्तुति अच्छी लगी।

यह एक अनमोल रचना और दूसरा समाज में जागरूकता का सन्देश देता धारावाहिक - दोनों उच्च स्तरीय प्रस्तुतियों के लिए हम विविध भारती के आभारी हैं।

Thursday, April 28, 2011

मशहूर रेडियो-प्रसारक श्री ब्रिज भूषणजी को जनम दिन की शुभ: कामना

आज पहेली बार इस मंच पर आवाझ की दुनिया की एक मशहूर हस्ती आदरणिय श्री ब्रिज भूषणजी को मैं याद फरमा रहा हूँ उनके जनम दिन के उपलक्षमें । मेरी उनसे श्री अमीन सायानी साहब के सौजन्य से दूर भाषी पहचान रही है और वह इस लिये की मुम्बई बहोत बड़ा शहर होने के कारण द्और बाहर से हंगामी रूपसे कुछ ही दिन गये लोगों के लिये अगर बहूत सी जगह जाना होता है तो कुछ एक या दोनों और के समय संजोग के कारण मुमकीन नहीं बनाया पाता हालाकि दोनों और से सैद्धांतीक रूप से मिलने की सहमती हो तो भी, पर इस वक्त तो उनकी तसवीर भी मेरे पास उपलब्ध नहीं है और मेरे मनमें भी इनकी काल्पनीक तसवीर ही बनी हुई है अपने हिसाबसे । नहीं तो आज उनका भी विडीयो इन्तर्व्यू इस स्थान से आप देख़ पाते ।
जहाँ तक मूझे याद है रेडियो श्री लंका से करीब 1960 में ज्न्हें फिल्म झूमरू के विज्ञापन और रेडियो प्रोग्रम में सुना था । यहाँ इस फिल्म के सप्ताहमें दो 15 मिनीट के कार्यक्रम आते थे, जिसमें बूधवार रात्री 9 बजे श्री अमीन सायानी साहब और रविवार दो पहर 12 बजे श्री ब्रिज भूषण साहब इसे प्रस्तूत करते थे । और अपना निज़ी व्यवसाय शुरू करने तक रेडियो सिलोन से अमीन सायानी साहब के सबसे अच्छे साथिदार के रूपमें लोगों की चाहना प्राप्त की थी, अन्य कार्यक्रमोमें शनिवार रात्री रेडियो कहानी और रविवार दो पहर 12.45 पर संगीत पत्रिका बारी बारी श्री कमल बारोट और स्व. शील कूमार वगैरह के साथ प्रस्तूत किये थे । उसके बाद विविध भारती से भी कई कार्यक्रम किये जो स्थानिय प्रसारणमें होने के कारण पूरे देशमें नहीं पहोंच पाये । जिसमें चेरि ब्लोसम नोक झोक उनके साथ उनकी पत्नी मधूरजी (झाहीरा) भी होती थी और इस कार्यक्रम की ओपनींग और क्लोझींग उन्होंने श्री अमीन सायानी साहब से करवाई थी,जो भी मशहूर रेडियो ब्रोडकास्टर रह चूकी है । जहाँ तक मूझे याद है उनका अंतीम रेडियो कार्यक्रम फेमीना की मेहफ़ील था और बादमें वे दृष्य माध्यम यानि टीवी की दुनियामें वोईस-ओवर कलाकार के रूपमें विज्ञापनोंमें ख़ास कर सक्रीय हो गये और रेडियो छूट गया जो श्री कमल शर्माजी के द्वारा उनकी मुलाकात आज के मेहमान अंतर्गत ली गई, तब जूडा ।
इस के अलावा हिन्दी फिल्मोमें संगीतकार के रूपमें उन्होंने फिल्म पठान ( उनके ससुर श्री आताउल्लह ख़ान की निर्मीत फिल्म जो उनका सम्बंध ज़ूड़ने से पहेले की थी सिर्फ एक गाना), मिलाप (दूसरी) एक नाँव दो किनारे, काम शास्त्र और संगदिल (दूसरी) संगीत दिया है ।
एक सुर पहेलू गायक के रूपमें फिल्म पूरब और पश्चीममें ओम जय जगदीश हरे के पहेले संस्कृत श्लोक कल्याणजी आनंदजीने ब्रिज भूषणजी से गवाये थे ।
डबींग कलाकार के रूपमें भी उन्होंनें फिल्म सरस्वती चन्द्रमें बंगाली भाषी कलाकार मनीष कूमार के लिये, फिल्म उपहारमें बंगाली भाषी कलाकार श्री स्वरूप दत्त के लिये और मन मेरा तन तेरा में कोलेज के प्रिन्सीपाल करने वाले कलाकार के लिये डबींग की है ।
श्री ब्रिज भूषण जी को रेडियोनामाकी और से लम्बे स्वस्थ और सक्रिय आयु की शुभ: कामनाएँ ।
पियुष महेता ।
सुरत ।

Wednesday, April 27, 2011

'मैं समय हूँ ।' મને ઓળખ્યો.

आदरणिय पाठक-गण,

आप को मिली जूली भाषा वाला शिर्षक देख़ ताज्जूब हुआ होगा, पर आगे पढ़ते जायेंगे तो यह स्वाभावीक लगेगा । हाल ही में श्री हरीष भीमाणीजी अहमदावाद एक गायिका श्री माया दीपक की एक सीडी मोक्ष के अंदर समाविष्ट श्लोको की सरल श्राव्य समझ की ध्वनि-मुद्री के लिये गये थे तो वहाँ किसी कारण अवकाश बना। तो दिव्य भास्कर की अमदावाद एडिसन वालोंनें उनसे सम्पर्क करके एक मुलाकात अपने अख़बार के लिये ली और ज्नके प्रतिनिधी थे श्री सुधा भट्ट । श्री हरीषजी से उस समाचारपत्रके उस पन्ने के उस हिस्से की प्रत उनसे प्राप्त हुई है । तो हमारा दोनों के गुजराती भाषी होने के गौरव के कारण इस हिन्दी ब्लोग पर उसे प्रस्तूत किया है, तो उसे गुजराती जाननेवाले सभी लोग चावसे पढ़े वैसी आशा है । और यह दिव्य भास्कर के सौजन्य से प्रस्तूत हुआ है ।


पियुष महेता ।
सुरत ।
अगर डो. अजीत कूमारजी को लगे क्री उनकी रेडियोनामा के ले-आऊट के बदलाव को और विचार-विमर्श की आवश्यकता है तो इस पोस्ट को वे एक दो दिन के लिये छिपा सकते है ।

रेडियोनामा का स्वरुप बदलाव....


रेडियोनामा के पाठको नमस्कार. रेडियो की चर्चाओं के बीच मैं आज ये चर्चा लेकर आया हूँ जो की जरूरी भी है, और जरुरत भी.
बहुत दिनों से रेडियोनामा के स्वरुप बदलाव पर चर्चा हो रही थी , पर समयाभाव के कारण कुछ बात आगे नहीं बढ़ पा रही थी. बहुत खोज बीन के बाद ,मैं धन्यवाद देता हूँ हमारे आपके मित्र मनीष भाई का जिन्होंने मुझे अपने ब्लॉग, मुसाफिर हूँ यारो , का टेम्प्लेट उपलब्ध कराया. उसी में मैंने कुछ अपनी ओर से जोड़ा है.

आज कल wide screen का ज़माना है इसी को देखते हुए इस बार रेडियोनामा का टेम्प्लेट wide screen का लिया गया है. पर अगर किन्हीं कारणों से कुछ दिक्कत हो रही हो दिखने में या पढने में, तो इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कराएं. आपके सारे सुझावों पर गौर किया जायेगा. साथ ही साथ यह भी लिखें की वर्तमान टेम्प्लेट कैसा लग रहा है.?

Tuesday, April 26, 2011

मोरा लागे नाही चित्त

आज इस श्रृंखला के सौंवे गीत की मैं चर्चा कर रही हूँ। यह गीत भी सत्तर के दशक के शुरूवाती वर्षों का हैं। फिल्म का नाम हैं शायद... इन्तेजार जो राकेश पाण्डेय और रिंकू जायसवाल अभिनीत हैं। इस गीत को शायद वाणी जयराम ने गाया हैं। अपने बोलो के कारण यह गीत खूब चला था। अब लम्बे समय से नही सुना। कुछ-कुछ बोल मुझे याद आ रहे हैं -

मोरा लागे नाही चित्त, ढूँढू इत उत नित नित लूं मैं तेरा नाम
पल-पल छिन छिन ........

पता नही विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत....

Friday, April 22, 2011

शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 21-4-11

विविध भारती से शास्त्रीय संगीत के दो कार्यक्रमों का प्रसारण होता हैं संगीत सरिता और राग-अनुराग एक कार्यक्रम के माध्यम से रोज हमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की कई जानकारियाँ मिलती हैं और दूसरे में विभिन्न फिल्मी गीतों के शास्त्रीय आधार का पता चलता हैं। आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -

सुबह 7:30 बजे 15 मिनट के लिए प्रसारित होने वाले संगीत सरिता कार्यक्रम में इस सप्ताह दो श्रृंखलाएं प्रसारित हुई। पांच कड़ियों की श्रृंखला प्रसारित की गई - ख्याल गायकी में बंदिश की परम्परा। इसे प्रस्तुत किया ख्यात शास्त्रीय गायक पंडित सी आर व्यास जी ने। शुक्रवार को इसकी पहली कड़ी प्रसारित हुई। बंदिश गायकी में पुराने समय की शास्त्रीय संगीत की शिक्षा की चर्चा की। बताया कि उस समय बंदिशे याद रखी जाती थी। शुरूवात राग यमन से किया, ख्याल गा कर सुनाया - ऐ री लाल मिले, राग यमन कल्याण की भी चर्चा हुई और इसमे भी ख्याल गा कर सुनाया। शनिवार को राग छायानट की चर्चा की। बताया कि इसमे मध्यम प्रभावी होता हैं। दो बंदिशे सुनाई जिसमे से एक के बोल हैं - तन बदन सब तुम पर वारो, खुद की बनाई बंदिश भी सुनाई - माने न जिया मोरा उन बिना, रविवार को राग भैरव की चर्चा करते हुए बंदिश भी सुनाई, द्रुत बंदिश में तराना भी सुनाया। राग गौड़ मल्हार में भी द्रुत बंदिश सुनाई। यह भी बताया कि हर पारंपरिक बंदिश में कोई न कोई महत्वपूर्ण बात होती हैं। सोमवार को राग गौड़ सारंग के बारे बताया गया। गौड़ के प्रकार भी बताए, संगति सुनाई और बताया कि यह संगति जहां हो वहां राग गौड़ होता हैं और यह संगति बार-बार दोहराना चाहिए जिससे राग अच्छा लगता हैं। इस तरह इस राग में यह संगति ही महत्वपूर्ण हैं। यह जानकारी भी मिली कि इस राग में धईवत भी लाया गया जो पहले नही था और असंभव सा लगता था। पारंपरिक बंदिशे भी सुनाई - कजरारे तोरे नैन, और रब ध्यान लावे, मंगलवार को समापन किया राग पूर्वी से। बताया कि यह पुराना राग हैं, इससे बहुत से राग निकले हैं जैसे राग बसंत, ललित आदि। राग पूर्या धनाश्री की भी चर्चा हुई। जानकारी दी कि इसमे पंचम पमुख हैं और राग पूर्वी में गंधार प्रमुख हैं। इसे समझाते हुए इन दोनों में बंदिशे भी सुनाई - नीलिमा लालिमा, और कारी कारी कामरिया, सामान्य जानकारी में बताया कि किसी राग में बहुत सी बंदिशे तैयार कर प्रस्तुत करने से राग अच्छा लगता हैं जिससे सामान्य जनता भी शास्त्रीय संगीत की ओर आकर्षित होती हैं। हर बंदिश को व्यास जी ने गा कर सुनाया जिसके लिए हारमोनियम पर संगत की पुरूषोत्तम मालावलकर जी ने और तबले पर मुकुंद राजदेव जी ने।

एक ख़ास बात हुई, इस श्रृंखला में एक भी दिन फिल्मी गीत नही सुनवाया गया। बिना फिल्मी रचनाओं के संगीत सरिता अधूरी लगी। वास्तव में इस कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत के किसी अंग की चर्चा करते हुए शास्त्रीय गायन या वादन सुनवा कर फिल्मी गीतों में इसका प्रयोग भी बताते हुए फिल्मी गीत सुनवाने से कार्यक्रम पूर्ण लगता हैं।

बुधवार से दूसरी श्रृंखला शुरू हुई - घुँघरू की तरह। लगा कि शायद संगीत में घुँघरू की आवाज पर, वाद्य पर चर्चा होगी। पर शीर्षक, संगीत के कार्यक्रम के अनुरूप नही लगा। बताया गया कि गीतकार, संगीतकार और गायक रविन्द्र जैन से बातचीत की जाएगी। फिर आगे बताया कि बातचीत करेंगे लेखक और गीतकार राजेश जौहरी। जब बातचीत शुरू हुई तो लगा कि संगीत सरिता नही सरगम के सितारे कार्यक्रम सुन रहे हैं। शुरूवात की कि बचपन में घर का माहौल साहित्यिक होने से इस दिशा में रुचि हुई। अलीगढ़ के रहने वाले हैं इसीसे हिन्दी, उर्दू और ब्रज भाषा के जानकार हैं। गायक बनना चाहते थे पर आकाशवाणी सुन कर लगा गायक बनना आसान नही। फिर संगीत संयोजन की ओर ध्यान दिया। अपने पहले गीत की चर्चा की जिसे रफी साहब ने गाया सिलसिला हैं प्यार का फिल्म के लिए पर यह फिल्म शायद बनी नही और यह गीत किसी भी फिल्म में नही आ पाया। गीत के बोल बताए जो संगीत सरिता के मिजाज के नही लगे - माना के तेरे होंठ मेरा प्यार नही हैं, यह भी बताया कि गीत तैयार करने के लिए फिल्म से सम्बंधित विस्तृत जानकारी लेते हैं। आगे उनके लोकप्रिय गीत पर चर्चा हुई - घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं, बताया कि यह गीत गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की रचना से प्रभावित हैं और वह रचना भी सुनाई। यह गीत तो सुनवाया ही गया।

गुरूवार को भी शुरू में बातचीत का अंदाज ऐसा ही रहा फिर जब चर्चा शुरू हुई उनके फिल्मी संगीत में लोकधुनो के प्रयोग पर तब से लगा कि हम संगीत सरिता सुन रहे हैं। एक लोक गीत भी सुनाया - मैं ब्रज को वासी, मन कान्हा का दास, आत्मा राधा की दासी। फिल्म सौदागर के संगीत की चर्चा की। बताया कि लोकधुने पारंपरिक हैं और उनका वैसा ही प्रयोग किया। अच्छा लगा कि दो लोकप्रिय गीतों के मुखड़े गाकर सुनाए और साथ ही जोड़ कर फिल्मी गीत सुनाए - नीर भरन का कर के बहाना, मेरे लिए ज़रा बोझ उठाना, राधा रे राधा जमुना किनारे आना रे और दूसरा गीत - दूर हैं किनारा। अब लग रहा हैं कि श्रंखला अच्छी चल रही हैं। यदि शीर्षक उचित होता और बातचीत का स्वरूप शुरू में कुछ बदल देते तो श्रंखला शुरू से ही अच्छी लगती थी।

दोनों श्रृंखलाएं रूपाली (कुलकर्णी) जी द्वारा तैयार की गई हैं। हर दिन कार्यक्रम के शुरू और अंत में संकेत धुन बजती रही जो बढ़िया और समुचित हैं। यहाँ हम एक बात कहना चाहते हैं। यह कार्यक्रम हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का हैं। इसमे चर्चा के दौरान कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की भी कुछ जानकारी मिल जाती हैं जैसे कुछ राग एक पद्धति से दूसरी पद्धति में आए हैं, दोनों पद्धतियों के कुछ रागों की समानता, विषमता और खासकर दोनों पद्धतियों में वाद्यों का प्रयोग। लेकिन एक तीसरी पद्धति हैं - रविन्द्र संगीत जिसको शायद इस कार्यक्रम में कभी छुआ तक नही गया। कुछ बहुत पुराने हिन्दी फिल्मी गीतों में और एस डी बर्मन और मन्ना दा (डे) के गाए हिन्दी फिल्मी गीतों में बंगाल के संगीत का जादू हैं, हो सकता हैं इसमे रविन्द्र संगीत भी समाया हो। चूंकि विविध भारती के अलावा अन्य किसी केंद्र से शास्त्रीय संगीत पर इतनी विस्तृत जानकारी नही दी जाती, इसीलिए हमारा अनुरोध हैं कि इस वर्ष जब सिर्फ हमारे देश में ही नही बल्कि समूचे उप महाद्वीप में गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर की 125 वीं जयंति मनाई जा रही हैं, इस अवसर पर रविन्द्र संगीत पर आधारित कुछ कार्यक्रम प्रस्तुत कीजिए।

गुरूवार को शाम बाद के प्रसारण में 7:45 पर प्रसारित हुआ साप्ताहिक कार्यक्रम राग-अनुराग। 15 मिनट के इस कार्यक्रम में विभिन्न रागों पर आधारित फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं। इस बार दो गीत अलग-अलग रागों पर आधारित थे पर तीसरी रचना शास्त्रीय पद्धति में ढली थी। पहला गीत राग झिंझोटी पर आधारित था। तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को पूरा सुनवाया गया जिससे शुरू की धीमी गति अच्छी लगी - ख़्वाब हो तुम या कोई हकीक़त कौन हो तुम बतलाओ। दूसरा गीत राग भैरवी पर आधारित था सोहनी महिवाल फिल्म से - चाँद छुपा और तारे डूबे रात गजब की आई और समापन किया उस्ताद अमीर खां की आवाज में शास्त्रीय पद्धति में ढले झनक झनक पायल बाजे फिल्म के शीर्षक गीत से। तीनो रचनाएं अलग अलग मूड की थी। प्रस्तुति बढ़िया रही। और भी अच्छी लगती प्रस्तुति अगर थोड़ा और ध्यान देते और तीनों में से एक रचना गायिका के स्वर में या युगल गीत होता क्योंकि तीनो गीत गायकों की आवाज में ही थे - किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और उस्ताद अमीर खां।

इस तरह, इस सप्ताह भी शास्त्रीय संगीत की जानकारी मिली जिसके अनुसार गायन सुना, शास्त्रीय आधार बताते हुए कुछ फिल्मी गीत भी सुनवाए गए परन्तु केवल शास्त्रीय गायन और वादन का आनंद नही मिला और इस तरह के कार्यक्रम अनुरंजनि की कमी महसूस हुई।

Saturday, April 16, 2011

हिन्दी फ़िल्म-संगीत के एक स्थम्भ श्री एनोक डेनिएल्सस जूग जूग जीओ और आकाशवाणी अमदावादको भी स्थापना दिन मुबारक

प्रिय पाठक गण,
आज मेरे बचपन से माने 12 साल की उम्र से चहीते और आज भी वैसे ही वहीते पियानो पियानो-एकोर्डियन, एलेक्ट्रीक ओर्गन और सिन्थेसाईझर वादक और कई नामी संगीत कारों के चहीते सिर्फ़ वादक ही नहीं पर वाद्य-वृंद एरेन्जर-संचालक और कुछ: हिन्दी और क्षेत्रीय भाषा के टीवी धारावाहीको के संगीत कार या एरेन्जर रह चूके श्री एनोक डेनियेल्स साहब का जनम दिन है । और आज जीवन के इस पडाव पर भी वे अपनी सक्रीयता बनाये हुए है तो रेडियोनामा के लेख़क समूह और पाठक गाण की और से उनको बधाई देते हुए उनके आज जैसे ही स्वस्थ ब्ने रहेने के और 100 से भी ज़्यादा साल तक सक्रीयता बनाये रख़ें और हमारा मनोरंजन करते रहे वैसी शुभ: कामना के साथ कुछ: साल पहेले बिल्लीमोरा में उनका जो शॉ सेक्षोफोन और वेस्टर्न फ्ल्यूट वादक श्याम राज जी के साथ प्रस्तूत किया था और उस शॉ के ओरगेनाईझर गुन्जन ललितकल के श्री नरेश मिस्त्री के सौजन्य से एक गीत मांग के साथ तूम्हारा-फिल्म नया दौर- के गीत की धून का अंश दृष्य स्वरूपमें प्रस्तूत कर रहा हूँ । (इस गीत की इसी कलाकार से इसी साझ पर कोई धून रेकोर्ड म्यूझी-केरसेट या ऑडियो सीडी पर अन्यत्र प्रकाशीत नहीं हुई है ।)
         
                 

और नीचे उस शॉ के देख़ने के दो-चार दिन बाद उस समय रेडियो श्री लंका हिन्दी सेवा पर गीनी चूनी फ़िल्मो गानो से (एस. एम. एस. के बहाने वीबीएस के तराने की तरह ही तो) तैयार सजीव फोन –इन कार्यक्रम ‘गीत मेरे मीत’ के दौरान मैनें इस शॉ के बारेमें और श्री एनोक डेनियेल्स साहब के बारेमें उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमारजी से जो बात की थी वह बात और मेरी पसंद के गाने का अंश (जो विविध भारती से सुनाई पड़ने का याद नहीं आता) भी आप सुन पायेंगे ।


एक बात और की रेडियो श्री लंका –हिन्दी सेवा से उद्दघोषिका श्री पद्दमिनी परेराजीने सुबह 6 बजे (6.17 तक़ सिर्फ 41 मीटर्स पर सुनाई पडा बादमें 25 मीटर पर पर नेट पर आज नहीं आया ) मेरे जीवन साथी –फिल्म साथी और दूरीयाँ नज़दीकीयाँ -फिल्म दुनिया) और करीब 7.30 से पहेले मेरा और अन्य श्रोता का बघाई संदेश प्रस्तूत करते हुए फिल्म संबंध से चल अकेला (सब धूने उनकी एल पी डिलाईटफूल डझन्स ओन एकोर्डियन बाय एनोक डेनियेल्स से जो बाद में म्यूझीकेसेट ऑडियो सीडी के रूपमें प्रकाशीत हुई और विविध भारती सेवा के पास एलपी और सीडी दोनों है पर बजाने का नाम नहीं । )
धून सुनवाई थी ।
आकाशवाणी अमदावाद का भी आज स्थापना दिन है तो उसको भी हमारा लोगों की और से बघाई और शुभ: कामनाएँ ।
आप की राय का इच्छूक,
पियुष महेता ।
सुरत ।

Thursday, April 14, 2011

सदविचारों के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 14-4-11

विविध भारती के दो कार्यक्रम ऐसे हैं जिनके माध्यम से सदविचार बता कर श्रोताओं को प्रेरित किया जाता हैं, ये दो कार्यक्रम हैं चिंतन और त्रिवेणी दोनों ही दैनिक कार्यक्रम हैं और सुबह की सभा में प्रसारित होते हैं। हालांकि इनका प्रसारण समय कम हैं पर गागर में सागर हैं ये कार्यक्रम। दोनों कार्यक्रम मिलाकर लगभग 15 मिनट का प्रसारण समय हैं।

आइए, इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं - 6:05 पर चिंतन में शुक्रवार को नेहरू जी का कथन बताया गया - जितना हम किताबो से सीखते हैं उससे सौ गुना अधिक हम अपने अनुभवों से सीखते हैं। शनिवार को विदेशी लेखक मैक्सिम गोर्की का कथन बताया गया - नवयुग की ज्योति को जो एक बार देख लेते हैं, वो उसी को पवित्र बनाती हुई जलाने लगती हैं।

रविवार को शेक्सपियर का कथन बताया गया - कोई वस्तु अच्छी हैं या बुरी, यह विचार ही उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं। सोमवार को विदेशी चिन्तक जेम्स एलन का कथन बताया - संकट पहले अज्ञान और दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं फिर ज्ञान की शक्ति का बोध कराते हैं। मंगलवार को पुराणों का कथन बताया - सज्जन अपने स्वार्थ की अपेक्षा मित्रो के हितार्थ कार्य करते हैं। बुधवार को प्रेमचंद का कथन बताया गया - समाज और साहित्य एक दूसरे का आईना हैं, यदि इस आईने में हमारा आचरण शुद्ध रूप से दिखता हैं तो जान लीजिए कि हमने इसी आईने को साफ़ किया हैं। आज चिन्तन हम सुन ही नही पाए। समाचार समाप्त होते ही खरखराहट शुरू हो गई। जब प्रसारण ठीक से सुनाई देने लगा तभी चिंतन समाप्त हुआ था।

शनिवार से सोमवार तक लगातार तीन दिन विदेशियों के सदविचार सुने। यह सच हैं कि अच्छाई कही से भी मिले ग्रहण करनी चाहिए लेकिन अपने सदविचारो को अनदेखा कर गैरों से प्रेरणा लेना कुछ ठीक नही लगा। हमारे चिन्तक, मनीषियों, बुद्धिजीवियों, विचारकों ने बहुत कुछ कहा हैं। हमारी संस्कृति से ही उदाहरण दिए जा सकते हैं। साहित्य में नीति विषयक दोहे हैं, कई साहित्यकारों के कथन हैं। इनके साथ सप्ताह में एक बार किसी विदेशी विद्वान का कथन सुनना अच्छा रहेगा, पर लगातार विदेशियों को इस श्रेणी में सुनना अच्छा नही लगता।

7:45 को त्रिवेणी में शुक्रवार को जीवन में सफलता की कुंजी बताई। कहा कि आत्म विश्वास, संकल्प और समर्पण से सफलता मिलती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में हौसला रखने से असंभव भी संभव होगा। यहाँ एक लघु बोध कथा सुनाई कि एक राजा जब पराजय से थक कर बैठा था तब उसने देखा कि एक मकडी बार-बार प्रयास कर अंत में दीवार पर चढ़ने में सफल हुई। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - हम जब चले तो ---------- आरजू हमारी आसमाँ को छूले राही तू रूक मत जाना कभी तो मिलेगी बहारो की मंजिल शनिवार को उन लोगो को प्रेरणा दी जो हींन भावना के शिकार हो जाते हैं। कहा कि जीवन में परेशानियाँ हमेशा रहती हैं, कुछ हार जाते हैं और कुछ संघर्ष करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। कोई भी लड़ाई हथियारों से नही बुलंद हौसले से लड़ी जाती हैं। जीवन में हौसला बुलंद रखे। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - दुनिया में कितना गम हैं मेरा गम कितना कम हैं निर्बल से लड़ाई बलवान की ये कहानी हैं दिए की और तूफ़ान की राही ओ राही, तेरे सर पे दुआओं के साए रहे मंजिले पथ में पलकें बिछाए रहे तू निराशा में आशा के दीपक जला हो हिमालय से ऊंचा तेरा हौसला अंत में सुनवाए गए गीतों की फिल्मो के नाम भी बताए गए -अमृत, तूफ़ान और दिया, हिमालय से ऊंचा।

रविवार को युवावस्था पर चर्चा हुई। बताया कि इस अवस्था में दो रास्ते नजर आते हैं। एक रास्ता सच्चाई का हैं और दूसरा रास्ता छोटा हैं, किसी भी तरह से सफलता पाने का। रास्ता चुनना कठिन होता हैं। इस उम्र में कुछ विचार रोमानी होते हैं और कुछ तर्क-वितर्क के। किसी को सुविधा संपन्न देख कर युवा उस जैसा बनना चाहते हैं। युवाओं को समय के महत्त्व को समझना होगा। यही समय हैं जब कोशिश कर जीवन को सफल बनाया जा सकता हैं। एक बार सफलता न मिले तो बार-बार कोशिश करनी चाहिए। गाने नए ही सुनवाए गए - मैं ऐसा क्यूं हूँ अभी अभी कुछ यकीं हैं पाया हैं मुझमे कमी वो सिकंदर ही दोस्तों कहलाता हैं बढ़िया प्रस्तुति।

सोमवार को मन के अँधेरे की चर्चा हुई। बताया कि इस अँधेरे में पूरा व्यक्तित्व ही डूब जाता हैं। निराशा को हावी न होने दे। जिस तरह रात की कालिख सुबह की किरण से धुल जाती हैं उसी तरह जीवन में भी सुबह आती हैं। चर्चा के दौरान तीन गीत सुनवाए गए - गम की अंधेरी रात में दिल को न बेकरार कर सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतज़ार कर रात भर का हैं मेहमां अन्धेरा किसके रोके रूका हैं सवेरा वो सुबह कभी तो आएगी

मंगलवार को बताया कि भारतीय दर्शन में किनारे को मुक्ति माना गया हैं। संसार रूपी भव सागर में हम किनारे की तलाश करते हैं। यह किनारा ही जीवन का लक्ष्य हैं। बुजुर्गो ने कहा हैं कि जीवन एक यात्रा हैं और लगातार किनारे की ओर यानि लक्ष्य कि ओर हमें बढ़ना हैं। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - दूर हैं किनारा गहरी नदी की धारा टूटी तेरी नय्या माझी खेते जाओ रे ओ माझी रे अपना किनारा नदिया की धारा जीवन से लम्बे हैं बंधू ये जीवन के रस्ते अंत में सुनवाए गए गीतों की फिल्मो के नाम भी बताए गए - किनारा, आशीर्वाद और खुशबू

बुधवार को बताया कि जीवन में हमेशा सफलता नही मिलती। सफल न होने पर अकर्मण्य होकर न बैठे। प्रयास करे, आगे बढे, आत्मबल ही मंजिल तक पहुंचाता हैं। चर्चा के दौरान ये गीत सुनवाए - रूक जाना नही तू कही हार के ओ नदिया चले चले रे धारा चन्दा चले चले रे तारा तुझको चलना होगा जो राह चुनी तूने उसी राह पे रही चलते जाना रे

आज की त्रिवेणी में शुरू में बताया कि जीवन एक तस्वीर हैं जिसमे आशा और निराशा के रंग हैं। यह कल्पना अच्छी लगी। आगे बताया कि इन विरोधाभासी रंगों से जीवन प्रभावित होता हैं। आगे जो भी कहा गया उसमे शुक्रवार और बुधवार के कार्यक्रमों की झलक नजर आई, कहा कि हौसला होना चाहिए, हार से न डरे, गिर कर उठने का हौसला रखे और वही बात बताई कि कैसे जीव दीवार पर गिर-गिर कर चढ़ने में सफल होता हैं। यहाँ तक कि एक गीत भी वही सुनवाया जो कल की त्रिवेणी में ऐसे ही विचारों पर सुनवाया गया था - रूक जाना नही तू कही हार के समापन पर अच्छी बात बताई कि जब ईश्वर ने हम पर विश्वास कर मानव जीवन देकर हमें संघर्षो में डाला हैं तो क्यों न हम उस विश्वास को बनाए रखते हुए जीवन का यह महासंग्राम जीते। कितना अच्छा होता अगर इस अंतिम बात को ही विस्तार देकर पूरा आलेख तैयार करते... सुनवाए गए शेष दो गीत ये रहे - जीवन से न हार जीने वाले और यह पुराना गीत - तेरी हिम्मत में बल भगवान का

 शुक्रवार और सोमवार को पुराने कार्यक्रमों को फिर से प्रसारित किया गया जबकि शनिवार, रविवार और मंगलवार को प्रस्तुति नई रही। त्रिवेणी कार्यक्रम क्षेत्रीय केंद्र से प्रायोजित रहा, प्रायोजक के विज्ञापन क्षेत्रीय केंद्र से प्रसारित हुए। दोनों ही कार्यक्रमों के लिए आरम्भ और अंत में संकेत धुन सुनवाई गई।

Wednesday, April 13, 2011

'आवाज़ की दुनिया के दोस्तो' के लेख़क श्री गोपाल शर्माजी को शादी की सालगिरह मुबारक हो

piyushji gopalji

पाठक गण,

आज का दिन रेडियो श्रीलंका की हिन्दी सेवा के भूतपूर्व और अनोख़े मौलिक प्रकार के उद्दघोषक और बादमें भारतमें फ्रीलान्सर प्रसारक रह चूके श्री गोपाल शर्माजीकी शादी की साल-गिरह और साथमें उनकी आत्मकथा 'आवाझ की दुनियाके दोस्तों' के प्रकाशन की भी साल गिरह है । तो श्री गोपाल शर्माजी को इस अवसर पर दोहरी बधाई और उनकी पत्नीजी श्रीमती शशी शर्माजी को भी बधाई रेडियोनामा की और से और उनकी आवाज़ के प्रेमी लोगों की और से प्रस्तूत है । नीचे लेबल्स या श्रेणीमें उनके नाम पर चटका लगाने पर मेरी इसी मंच पर उनके बारेमें लिख़ी गई पोस्ट परसे उनकी यही किताब के प्रथम प्रकाशन के कार्यक्रम के अंश तथा मेरी उनके घर उनसे की गई बात-चीत दृष्य-श्रव्य रूपमें आप पायेंगे । एक ख़ुशी इस बात की है कि आज रेडियो श्रीलंका से वहाँ की निवृत (हाल कैजुअल ) उद्दधोषिका श्री पद्दमिनी परेराजीने भी उनकी बधाई दी और मेरे सहित अन्य श्रोताओं के बधाई संदेश प्रस्तूत किये ।

पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Tuesday, April 12, 2011

रेडियो श्री लंका -हिन्दी सेवा अब सुबहमें भी नेट पर और वहाँ की उद्दघोषिका सुभाषिनी को जनम दिन की बधाई

रेडियो श्री लंका की उद्दघोषिका श्री सुभाषिनी डी'सिल्वाके आज जनम दिन पर उनको स्वस्थ और सक्रिय लम्बी उम्र की रेडियोनामा की और से शुभ: कामनाऐँ ।
इस के साथ एक और खुश: खबर पूराने अलभ्य गानों के चाहको और संग्राहको के लिये की दो दिन से रेडियो श्री लंका की हिन्दी सेवा का प्रसारण शॉर्ट वेव के 25 और 41 मीटरों के अलावा इन्टरनेट पर भी शुरू हुआ है और इस के कारणमें हम जैसे कई श्रोता की मांग का स्वीकार है पर इन श्रोतामें सबसे उपर नाम मूझे इन्दौर के श्री कैलाश शुक्ला का लेना उपयूक्त लगता है, जिन्होंने कई बार वहाँ के अलग अलग समय के अलग अलग चॆयरमेनसे लम्बी टेलीफोनीक बातें की और कई पत्र पोस्ट द्वारा भेज़े ।
इस का लिन्क www.slbc.lk के अन्तर्गत बाँये हाथ की और Listen Live के नीचे All Asia Hindi Service पर क्लिक करके एक फाईल अपने डेस्क टॉप पर डाऊनलोड करनी होगी, जिसे प्रसारण समय के दौरान विन्डोझ मिडीया प्लेयर से नेट कनेक्सन चालू रख़के प्ले करने पर सजीव प्रसारण भारतीय समय के मूताबीक सुबह 5.50 से 8 बजे (मंगलवार को 8.15 तक) सुना जा सकता है, जो अमेरिका केनेडा और पूर्वीय देशो में समय के अनुसार ज्यादा सहुलियत से सुना जा सकता है पर अरब देशो, अफ्रिका और युरोप के लिये थोडा तेढा समय बाला रहेगा । अगर बीबीसी और वोईस ओफ अमेरिका की तरह कोई भी प्रसारन एक हप्ते तक मिल पाये ऐसा कोई प्रबंध हो तो ज्यादा खुशी की बात होगी । पर एक बात तय है कि एक समय लगता था कि इस सेवा कभी भी बंद होने का डर था वह हाल तो नहीं रहा । कल ही एक और बधाई के साथ फिर मिलेंगे ।
पियुष महेता ।
सुरत-395001.

रामायण की चौपाइयों की फिल्मी प्रस्तुति

रामायण की चौपाइयों को शायद राजश्री प्रो ने पहली बार फिल्मी भक्ति गीत के रूप में प्रस्तुत किया।


अपनी दो फिल्मो में यह प्रस्तुतियां दी - पहली बार फिल्म गीत गाता चल में जसपाल सिंह की आवाज में जिसे सचिन पर फिल्माया गया और दूसरी बार फिल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाए फिल्म में हेमलता की आवाज में जिसे रामेश्वरी पर फिल्माया गया।


दोनों बार मुखड़े में एक ही चौपाई रही पर अंतरे में दोनों फिल्मो में चौपाइयां अलग रही। दोनों में एक ही धुन दी रविन्द्र जैन ने। पहले रेडियो से अक्सर सुनते थे, यहाँ तक कि विशेष अवसर के लिए फरमाइशी कार्यक्रम में भी पर अब लम्बे समय से नही सुना।


मुखड़े की चौपाई हैं मंगल भवन अमंगल हारी ------


राम सिया राम सिया राम जय जय राम


अंतरे की चौपाइयां हैं -


जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी


राम सिया राम ----------------------------


कैसी अनाथ पुरूष बिन नारी


राम सिया राम ---------------------


पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, April 8, 2011

जब विविध भारती कहे अपने मन की... कर्म की... साप्ताहिकी 7-4-11

लावण्या जी, बहुत दिन बाद रेडियोनामा पर आपकी उपस्थिति सुखद रही। इस समय साप्ताहिकी निकालना आवश्यक हैं क्योंकि अगली साप्ताहिकी के कार्यक्रम शुरू हो चुके हैं... आज चर्चा उन दो कार्यक्रमों की जिसमे श्रोताओं से रूबरू हैं विविध भारती - छाया गीत और पत्रावली एक कार्यक्रम के अंतर्गत रोज उदघोषक एक या कभी उससे जुड़े अधिक भाव लेकर चलते हैं और उससे सम्बंधित अपनी पसंद के गीत सुनवाते हैं, इस तरह आलेख प्रस्तुति के साथ फिल्मी गीत सुनवाए जाते हैं। दूसरे कार्यक्रम के माध्यम से सप्ताह में एक बार विविध भारती श्रोताओं के पत्रों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विश्लेषण करती हैं। आइए इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं - रात 10 बजे का समय छाया गीत का होता है। आधे घंटे के इस कार्यक्रम को शुक्रवार को प्रस्तुत किया कमल (शर्मा) जी ने। प्रस्तुति रही अपनी चिरपरिचित शैली साहित्यिक हिन्दी में। चर्चा प्यार की हुई, प्यार से जुड़ी यादों की हुई लेकिन लेकिन अंदाज वही पुराना रहा। गीतों के चयन में भी कोई नयापन नही। इन्ही भावो पर आधारित गीत सुनवाए जिनमे ये गीत भी शामिल थे - मेरे दो नैना मतवाले किसके लिए कितनी अकेली कितनी तन्हा सी लगी और अंत में सुनवा दिया - रामय्या वस्तावय्या मैंने दिल तुझको दिया शनिवार को प्रस्तुत किया अशोक जी ने। लगा, श्रोताओं को वर्ल्ड कप मैच देखने के लिए छुट्टी दी गई। वही चिरपरिचित भाव, मोहब्बत की, फूलो की, रूठने-मनाने की बाते। एक गीत अच्छा रहा - हुई शाम उनका ख्याल आ गया एकाध गीत ठीक रहा - रूठे सैय्या हमारे सैय्या क्यों रूठे बहुत सुस्त रही प्रस्तुति। ऐसे गीत भी सुनवाए जो बहुत कम सुनवाए जाते हैं। एक गीत के तो बोल भी ठीक से समझ में नही आए, शायद कुछ इस तरह हैं - प्यार में छुपने छुपाने से रविवार को प्रस्तुत किया युनूस (खान) जी ने। कोई नयापन नही था। बाते प्यार मोहब्बत की, विरह की हुई। कुछ लोकप्रिय गीत सुनवाए जैसे - तुम और हम भूल के गम गाए प्यार भरी सरगम कुछ ऐसे गीत भी सुनवाए गए जो कम ही सुनवाए जाते हैं जैसे - बुझ गया दिल का दिया तो चांदनी को क्या कहे तीनो दिन ये कार्यक्रम उदघोषको की पसंद के ही रहे, मुझ जैसे श्रोताओ के लिए ये कार्यक्रम सुस्त और ऊबाऊ रहे। सोमवार को प्रस्तुत किया अमरकान्त जी ने। दिल की बाते हुई। संक्षिप्त आलेख और चुने हुए लोकप्रिय गीतों के साथ अच्छी प्रस्तुति थी, हालांकि नयापन नही था। ज्वैल थीफ, शागिर्द, कटी पतंग के गीत सुनवाए। दिल ही तो हैं और दिल हैं कि मानता नही फिल्मो के शीर्षक गीत सुनवाए। समापन किया भीगी रात फिल्म के इस बढ़िया गीत से - दिल जो न कह सका वही राजे दिल कहने की रात आई मंगलवार को प्रस्तुत किया ममता (सिंह) जी ने। इस दिन भी प्रस्तुति अच्छी रही। चर्चा प्यार की हुई। लोकप्रिय गजले सुनवाई शंकर हुसैन, साथ-साथ, बाजार, प्रेमगीत फिल्मो से शायराना अंदाज में। केवल यह एक गजल ऎसी थी जो कम ही सुनवाई जाती हैं - झुकी झुकी सी नजर बेकरार हैं के नही बुधवार को प्रस्तुत किया राजेन्द्र (त्रिपाठी) जी ने। इस दिन भी शायराना अंदाज में प्यार की चर्चा हुई पर नए रोमांटिक गीतों के साथ। नए गीत चूंकि लम्बे होते हैं इसीलिए चार ही सुनवाए गए। दो गीत ऐसे थे जो अक्सर सुनवाए जाते हैं - तौबा तुम्हारे ये इशारे हम तुम्हारे हैं तुम्हारे सनम दो गीत ऐसे थे जो ज़रा कम ही सुनवाए जाते हैं - मेरी तरह तुम भी कभी प्यार करके देखो न गुरूवार को रेणु (बंसल) जी ने प्रस्तुत किया। इस दिन भी प्रस्तुति काव्यात्मक रही। शुरूवात की इस गीत से - मैंने रखा हैं मोहब्बत अपने अफसाने का नाम एकाध ऐसा गीत भी शामिल था जो कम ही सुनवाया जाता हैं - मीठी मीठी सी भीनी भीनी सी क्यों हैं हवा और समापन किया इस गीत से - अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ न सोमवार से गुरूवार तक प्रस्तुति में नयापन लाने की हल्की सी कोशिश नजर आई। पूरे सप्ताह प्रमुख भाव प्यार ही रहा। यह सच हैं कि प्यार एक अच्छी भावना हैं पर ऐसा भी क्या कि सातो दिन यह कार्यक्रम प्यार की भेंट चढ़ गया। किसी शायर ने क्या खूब कहा हैं - और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा... सोमवार को रात 7:45 पर पत्रावली में श्रोताओं के पत्र पढ़े रेणु (बंसल) जी ने और उत्तर दिए कमल (शर्मा) जी ने। 15 मिनट के इस कार्यक्रम में 15 पत्र शामिल हुए। इसके अलावा 6 पत्र ऐसे थे जिनमे सिर्फ छायागीत कार्यक्रम की तारीफ़ थी। मैं तो समझ ही नही पाई कि दिन पर दिन उबाऊ होते जा रहे इस कार्यक्रम में श्रोताओं को क्या पसंद आ रहा हैं, खैर... पसंद अपनी अपनी विभिन्न राज्यों से जिलों, शहरो और दूरदराज के गाँव से पत्र आए। कुछ नियमित श्रोताओं ने पत्र भेजे और कुछ नए श्रोताओं के भी पत्र पढ़े गए। लगभग सभी कार्यक्रमों की तारीफ़ थी। कुछ सुझाव भी थे। एक श्रोता ने सुझाव दिया कि फ़ौजी भाइयो के कार्यक्रम जयमाला में वीर भावना और देश भक्ति के गीत सुनवाए जाए। इसके जवाब में कहा गया कि देश की सुरक्षा का भार संभाले फ़ौजी भाइयो के मनोरंजन के लिए हैं जयमाला कार्यक्रम। एक सुझाव था कि लघु तरंग (शार्ट वेव SW) पर प्रसारण समय बढाया जाए जिसके उत्तर में कहा कि सम्बंधित अधिकारियों तक यह सुझाव पहुंचा दिया जाएगा। कुछ पत्रों में फरमाइशे भी थी। एक पत्र में रफी साहब, साहिर लुधियानवी और गुरूदत्त से की गई बातचीत की रिकार्डिंग सुनवाने की फरमाइश थी जिसका उत्तर सुन कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, कहा कि इनसे बातचीत की रिकार्डिंग उपलब्ध नही हैं। तीनो सिने जगत के दिग्गज हैं, तीनो का सिने जगत में महत्वपूर्ण योगदान हैं और इनसे की गई बातचीत की रिकार्डिंग संग्रहालय में उपलब्ध नही हैं.... एक बात खली कि अंत में डाक पता और ई-मेल आई डी नहीं बताया गया जिससे कुछ श्रोता अगर अब पत्र भेजना चाहे तो उन्हें दिक्कत हो सकती हैं। शुरू और अंत में उद्घोषणा की युनूस (खान) जी ने।

कुछ पुरानी यादें....लावण्‍या शाह।


हमारी , अन्नपूर्णा जी अक्सर " रेडियोनामा " के विविधरंगी कार्यक्रमों को न सिर्फ सुनतीं हैं बल्कि बहुत गंभीरता से, ध्यान से सुनकर इन संगीतमय कार्यक्रमों में क्या अच्छा लगा, क्या नहीं उनपर भी सुव्यवस्थित ढंग से अपने विचार, खुलकर प्रकट करतीं हैं और एक बंधे हुए अंतराल पर हमें " रेडिओ नामा " ब्लॉग से उनकी प्रविष्टी पढने को मिल जातीं हैं - इस नियमित तथा महत्त्वपूर्ण कार्य को वे जिस सहजता से करतीं रहीं हैं उसके लिए वे बधाई व बहुत बड़ी प्रशंशा की हकदार हैं - - यह मेरा निजी मत है जो मैं बेझिझक होकर लिख रही हूँ -- 
यदाकदा " रेडिओ नामा " पर , रेडियो की स्टेज की तथा साहित्य जगत की त्रिविध गतिविधियों पे मर्मग्य द्रष्टि रखे हुए, रेडिओ के शुभ चिन्तक श्री संजय पटेल जी की सच्ची और सही शिकायतें, डांट और  चिंता भी उनकी प्रविष्टियों से जाहीर हो जातीं हैं जैसा कुछ समय पूर्व उनहोंने रेडियो से जुड़े कार्यकर्ताओं  पे पोस्ट लिखकर , हमें सचेत किया था .
यूनुस भाई , " जादू " के पापा अपने निजी जीवन व सफल कार्यक्षेत्र की अपार व्यस्तता में इतने डूब गए हैं कि, उनकी पोस्ट यदाकदा ही आतीं हैं - हाँ , गुजरात प्रांत के  सुरत शहर  के रहनेवाले और एक सच्चे  रेडियो प्रेमी और रेडियो से जुड़े और संगीत से जुड़े हरेक कलाकार से  सच्ची ममता स्थापित करनेवाले भाई श्री पियूष  जी की संगीत सम्बंधित पोस्ट " रेडियो नामा " पर नियमितता में अन्नपूर्णा जी के साथ  साथ , सतत,  बराबर प्रकाशित होतीं रहीं हैं ...
 नका भी  सच्चे दिल से , शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ 

इतनी लम्बी भूमिका के  पश्चात,  आज एक और  मशहूर शख्शियत की , रेडियो के लिए   , एक पुरानी लिखी हुई , शिकायत  को लेकर , कहिये तो , आज , उनका आग्रह लिए  ही  मैं , उपस्थित हूँ ......
               मीडीया के ' एप्पिल ऑफ़ ध आय ' या भारत में सर्वाधिक चर्चित और मशहूर " बच्चन " नाम   को गौरव प्रदान करनेवाले , सिने कलाकार  एवं यश और ख्याति के आकाश पर दमकते सिने कलाकार श्री अमिताभ बच्चन जी के साहित्य मनीषी  पिता जी डाक्टर हरिवंश राय " बच्चन ' जी की सम्पूर्ण "  रचनावली  " पढने का हाल ही में , मुझे , अवसर मिला  है और उनका लिखा रेडियो से सम्बंधित , यह दिल में रह गया मलाल  पढ़कर उसे , प्रस्तुत करने  से अपने आप को रोक नहीं पाई - 
चूंकि, ताऊजी श्री " बच्चन " जी ने उनके अपने व मेरे स्व. पिता पंडित नरेंद्र शर्मा दोनों के पूरक गीत पर अपने मन के भाव यहाँ व्यक्त किये हैं --तब सोचा के , ' बच्चन जी की यह शिकायत , आप तक पहुंचा दूं ! 
 आप  लोग भी इसे अवश्य  पढ़िएगा और रेडियो से जुड़े , सभी से मेरा ,पुन: नम्र  निवेदन होगा कि वे " स्व. बच्चन " जी की इच्छाओं पर ध्यान दें और ये दोनों सुमधुर गीतों को एक साथ बजा दें ...........
कहते हैं , किसी दिवंगत  की इच्छाओं को , कभी झुठलाना नहीं चाहीये .......

अब प्रस्तुत है  " सुप्रसिध्ध " मधुशाला " के लिखनेवाले अमर कविवर श्री " बच्चन " जी के शब्द उनकी आत्मकथा से .... 
" बच्चन  रचनावली " 
 : पेज : ३१३ से साभार ..............
" सतरंगिनी " के पहले रंग की सातवीं कविता है " मयूरी " 
' मयूरी, नाच मगन मन नाच ! '
 " सतरंगिनी " पर लिखी गयी शुरू की समालोचनाओं में कतिपय पत्रों में , जहां तक मुझे स्मरण है , इस बात पर मेरी हंसी उडाई गयी थी की, मैंने मयूरी के नाचने की बात लिखी है जबकि प्राकृतिक सत्य इसके विपरीत है यानी मयूरी नाचती ही नहीं  !  
मैंने इसकी और कोइ ध्यान नहीं दिया , सोचा, मयूरी को नचाकर जो गूढ़ बात मैंने कही है उसे समझने के लिए अभी कम ही समय मिला है . 
मेरे भाव  प्रणव  और सहानूभुतिपूर्ण पाठक इसका रहस्य समझेंगें .
 पूर्वाग्रही पात्र - पत्रिकाओं के समालोचक तो गुण को भी दोष बनाकर दिखाते हैं 
 फिर जहां छिद्रान्वेषण की कोइ गुन्जाइश हो वहां का क्या कहना  ! 
फिर आगे  आदरणीय बच्चन जी लिखते हैं, 
  ' इधर ' मयूरी ' की गीतात्मकता ने एक बंगाली संगीतकार का ध्यान आकर्षित किया - उसने - ( नाम शायद ज्ञान घोष था ) ,  इसकी स्वरलिपि तैयार की  और किसी समय कलकता जाने पर मुझे वह गीत वाध्य यन्त्रों पर सुनवाया . मैं मुग्ध हो गया . 
 थोड़े दिनों बाद गीत का बँगला रूपांतर किया गया और वह भी उसी स्वर लिपि में बैठ गया . 
 कलकाता रेडियो से मैंने उसे भी कई बार सुना   और लोगों ने भी हिन्दी अथवा बँगला में निश्चय ' मयूरी ' वाला गीत सूना होगा - 
   " नाच रे मयूरा  SSSS ...." 
कुछ समय बाद एक दिन रेडियो पर बंधुवर नरेंद्र शर्मा का यह संगीत - बध्ध गीत सुनकर भाव विभोर हो उठा ! " मयूरी नाच , मगन मन नाच " की धुन भी  साथ  ही कानों में गूँज गयी सोचने लगा, शायद, नरेंद्र ने मेरे गीत से प्रेरणा ली हो, शायद उनहोंने यह  दीखाने  को लिखा हो कि, मयूर का नाचना ही प्राकृतिक सत्य है , शायद अपने गीत द्वारा उनहोंने मेरे गीत का पूरक उपस्थित किया हो ! इसे मैं, रेडियोवालों की कल्पना - हीनता ही कहूंगा कि, उनहोंने इन दोनों गीतों को कभी साथ प्रस्तुत नहीं किया -
 कम से कम, मैंने साथ नहीं  सुना  ! दोनों गीत साथ सुनाएँ जाएँ तो ध्वनि  के माध्यम से वे मयूर और मयूरी दोनों को साथ नाचते हुए प्रस्तुत कर दें ! दोनों गीतों की गति, लय , ताल , छंद  में कितना अनुरूप अंतर है !  नरेंद्र के गीत के स्वर - विस्तार ,में जैसे  मयूर का पंख ही फैला - सा जाता है - मेरे गीत के स्वर - लाघव में पुच्छ - रहित मयूरी का पद चापल्य सहज ही कल्पित किया जा सकता है - इन दोंन को पूरक मानकर मन में एक विशेष उल्लास अनुभव करने का मेरा अपना एक कारण था -
 " सतरंगिनी " में नर - नारी के आदर्श जोड़े के रूप में मैंने मयूर और मयूरी को ही प्रतीक माना है - मयूरी के नाचने अथवा न नाचने को जिन्होंने महत्त्व दिया है उससे मेरी शिकायत यहीं है कि, उनहोंने हाथी को नहीं देखा , सिर्फ उसकी पूँछ टटोली है ! 
- बच्चन 
[ प्रस्तुतकर्ता : लावण्या शाह ] 

Tuesday, April 5, 2011

फिल्म तीसरी क़सम का लाली लाली गीत

राजकपूर और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म तीसरी क़सम में लोकगीत पर आधारित गीत हैं। एक गीत बहुत लम्बे समय से रेडियो से नही सुना जिसे बहुत सारी गायिकाओं ने गाया हैं, शायद लताजी की भी आवाज हैं। इसके बोल मुझे ठीक से याद नही आ रहे, कुछ इस तरह हैं - लाली लाली ---- में लाली रे दुल्हनिया पिया की पियारी भोली भाली रे दुल्हनिया उत्तर प्रदेश के लोक गीत की छाप नजर आती हैं इस गीत में। पता नहीं विविध भारती की पोटली से कब बाहर आएगा यह गीत…

Friday, April 1, 2011

फिल्मी कलाकारों के रूपक कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 31-3-11

विविध भारती से फिल्मी कलाकारों के रूपक कार्यक्रम दो हैं - हिट सुपरहिट और आज के फनकार जो दैनिक हैं। दोनों ही कार्यक्रमों की अवधि आधा घंटा हैं। हिट सुपरहिट कार्यक्रम हर दिन दो बार प्रसारित होता हैं।


आइए इस सप्ताह प्रसारित इन दोनों कार्यक्रमों पर एक नजर डालते हैं -


दोपहर 1:00 बजे और रात 9 बजे प्रसारित हुआ हिट-सुपरहिट कार्यक्रम। शुक्रवार को यह कार्यक्रम अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे पर केन्द्रित रहा। पहला गीत सुनवाया सत्यम शिवम् सुन्दरम फिल्म का शीर्षक गीत जो जीनत अमान पर फिल्माया गया हैं। पद्मिनी कोल्हापुरे पर यह गीत फिल्माया गया -


यशोमति मय्या से बोले नंदलाला राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला


इस गीत के दो संस्करण हैं। एक में शशि कपूर के संवाद हैं और दूसरा युगल गीत के रूप में हैं। यह युगल गीत पद्मिनी कोल्हापुरे पर फिल्माया गया जहां वह बाल कलाकार के रूप में हैं। यह गीत उनके अभिनय कैरिअर का शायद पहला गीत हैं। रात में ज्यादा गड़बड़ हुई। शुरू में कलाकार का नाम ही नही बताया और इस पहले गीत को सुनवाने के बाद कहा गया कि इस गीत को सुनते ही समझ गए होगे कि नाम हैं पद्मिनी कोल्हापुरे जबकि सत्तर अस्सी के दशक की फिल्मो में रुचि रखने वाले श्रोताओं के दिमाग में इस गीत को सुनते ही नाम आता हैं - जीनत अमान


जमाने को दिखाना हैं, प्रेम रोग, प्यार झुकता नही फिल्मो के गीत सुनवाए। आहिस्ता आहिस्ता फिल्म से यह गजल भी सुनवाई -


माना तेरी नजर में तेरा प्यार हम नही कैसे कहे के तेरे तलबगार हम नही


रात में प्रेम रोग फिल्म के गीत के स्थान पर वो सात दिन फिल्म का गीत सुनवाया। यह भी बताया कि वो गायिका भी हैं लेकिन उनके पहले गीत की चर्चा नही की। उनका पहला गीत शायद यादो की बारात फिल्म का शीर्षक गीत हैं। इस गीत के दो संस्करण हैं। एक पद्मिनी कोल्हापुरे और उनकी बहन शिवांगी कोल्हापुरे ने गाया हैं। शायद इसी लोकप्रिय गीत से उनका फिल्म संसार में प्रवेश हुआ और इस लोकप्रिय गीत के बाद ही शायद उनकी अभिनय यात्रा शुरू हुई। इस गीत को सुनवाया जा सकता था या इस गीत की चर्चा की जा सकती थी।


शनिवार को प्रस्तुत हुआ - सैटरडे स्पेशल जिसके अंतर्गत किसी एक विषय पर गीत सुनवाए जाते हैं। इस दिन ऐसा विषय चुना गया जो रोमांटिक गीतों का अक्सर विषय रहा हैं पर आमतौर पर इस विषय पर खासकर गीतों के मामले में कम ही चर्चा होती हैं। यह विषय हैं - गुस्सा।


दिल ही तो हैं फिल्म का यह गीत सुनवाया -


गुस्से में जो निखरा हैं उस हुस्न का क्या कहना गुस्से में अभी हमसे तुम यूं ही खफा रहना


डिटेक्टिव फिल्म का यह गीत सुनवाया जो बहुत कम सुनवाया जाता हैं - छोडिए गुस्सा हुजूर ऎसी नाराजी भी क्या


अप्रैल फूल फिल्म का शीर्षक गीत और प्रोफ़ेसर, मर्यादा, काला पानी, लव स्टोरी फिल्मो के पुराने और बहुत पुराने लोकप्रिय गीत सुनवाए। गीतों का चुनाव अच्छा रहा। प्रस्तुति में छाया गीत की झलक मिली। अच्छी रही प्रस्तुति।


रविवार को आयोजन रहा - फेवरेट फाइव। इसमे कोई एक कलाकार आमंत्रित होते हैं, अपने पसंदीदा पांच गीत बताते हैं और यह भी बताते हैं कि यह गीत उन्हें क्यों पसंद हैं। साथ में कुछ और बातचीत भी हो जाती हैं। इस बार आमंत्रित रहे ख्यात अभिनेता, निर्माता निर्देशक राजा बुन्देला। बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। बताया कि उन्हें राजकपूर पसंद हैं। उनका हर गीत सार्थक हुआ करता हैं। सुनवाया आवारा फिल्म का शीर्षक गीत। बताया कि बचपन से उन्हें फिल्मे देखने की अनुमति नही मिली फिर भी गुरूदत्त, हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मे देखी। देव आनंद की शैली पसंद हैं। दूसरा गीत सुनवाया गाइड फिल्म से -


वहां कौन हैं तेरा मुसाफिर जाएगा कहाँ


गीतों की पसंद के सम्बन्ध में कहा कि प्रेरणादायी गीत पसंद हैं, सुनवाया समझौता फिल्म से लता जी का गाया शीर्षक गीत।


प्रेरणाप्रद गीतों की चर्चा की और सुनवाया यह गीत - जिन्दगी की यही रीत हैं हार के बाद ही जीत हैं


मनोज कुमार के सिने जगत में योगदान की चर्चा की। सुनवाया उनकी फिल्म उपकार का गीत - कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बाते हैं बातो का क्या


अंत में खैय्याम और उनके दौर के संगीतकारों की चर्चा की और सुनवाया उमराव जान फिल्म से दिल चीज क्या हैं गीत। इस तरह 6 गीत सुनवाए जबकि कार्यक्रम हैं फेवरेट फाइव यानि 5 गीत सुनवाने का। वैसे छठे गीत के लिए पर्याप्त समय भी नही था, गाना चलता रहा और साथ-साथ समापन उदघोषणा होती रही जिसमे प्रस्तुतकर्ता का नाम बताया - तनूजा कोंडाजी कानरे। शुरू और अंत में परिचय दिया और समापन किया युनूस (खान) जी ने।


सोमवार को गीतकार आनंद बक्षी को श्रद्धांजलि दी गई। ऐसे लोकप्रिय गीत सुनवाए जिनके लिए उन्हें फिल्मफेयर एवार्ड मिले।


पहला एवार्ड 1977 में अपनापन फिल्म के इस गीत के लिए - आदमी मुसाफिर हैं आता हैं जाता हैं 1981 में एक दूजे के लिए फिल्म के इस गीत के लिए दूसरा एवार्ड - तेरे मेरे बीच में कैसा हैं ये बंधन अनजाना 1995 में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएगे फिल्म के इस गीत के लिए - तुझे देखा तो ये जाना सनम प्यार होता हैं दीवाना सनम 1999 में आखिरी एवार्ड मिला ताल फिल्म के इस गीत के लिए - इश्क बिना क्या जीना यारा


लगभग 40 बार नामांकन किया गया पर एवार्ड 4 ही मिले, ऐसे कुछ गीतों की जानकारी भी दी जो एवार्ड के लिए नामांकित किये गए पर एवार्ड के लिए चुने नही जा सके। समापन किया 1972 में रिलीज फिल्म मोम की गुडिया के लिए उन्ही के गाए इस गीत से जिसे मैंने पहली ही बार सुना -


मैं ढूंढ रहा था सपनों में तुम हो अनजाने अपनो में


रात के कार्यक्रम में उनका गाया यह गीत न सुनवा कर चरस फिल्म का गीत सुनवाया जिसमे उन्होंने भी गाया हैं। उनके बारे में हल्की सी जानकारी भी दी।


मंगलवार को अभिनेत्री पूनम ढिल्लों पर फिल्माए गए गीत सुनवाए गए। नूरी फिल्म का यह गीत बहुत दिन बाद सुन कर अच्छा लगा - चोरी चोरी कोई आए


त्रिशूल, दर्द, सोहनी महिवाल, फिल्मो के गीत सुनवाए। तेरी क़सम फिल्म का यह गीत सुनवाया जो कुमार गौरव पर फिल्माया गया हैं - ये जमीं गा रही हैं आसमाँ गा रहा हैं


उनके सम्बन्ध में एक ही बात बताई जो मैंने पहली बार सुनी कि उनका सम्बन्ध थियेटर से भी हैं।


बुधवार को कार्यक्रम निर्माता निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा पर केन्द्रित था। परिंदा, 1942 अ लव स्टोरी, मुन्ना भाई एम बी बी एस, लगे रहो मुन्ना भाई फिल्मो के गीत सुनवाए। करीब फिल्म से यह गीत भी सुनवाया - चोरी चोरी जब नज़रे मिली अच्छा लगा कि रात में मोहाली में चल रहे क्रिकेट मैच की ताजा स्थिति भी बताई गई।


गुरूवार को यह कार्यक्रम अभिनेत्री मीनाकुमारी कि पुण्य स्मृति में समर्पित किया गया। मीनाकुमारी पर फिल्माए उन फिल्मो के गीतों को सुनवाया गया जिसे फिल्मफेयर एवार्ड मिले या एवार्ड के लिए नामांकित किया गया। बैजू बावरा, साहब बीबी और गुलाम, काजल, आजाद फिल्मो के गीत सुनवाए। पाकीजा का चलते चलते गीत भी सुनवाया। आरती फिल्म का यह गीत मीनाकुमारी और प्रदीप कुमार के संवादों के साथ सुनवाया -


कभी तो मिलेगी बहारो की मंजिल


फिल्मो की रिलीज के वर्ष और उनके अभिनय से सम्बंधित एक-दो बाते भी बताई।


पद्मिनी कोल्हापुरे और पूनम ढिल्लों पर कार्यक्रम प्रसारित करते समय यह कहा गया कि उनकी फिल्मो के गीत सुनवाए जा रहे हैं। शायद इसीलिए सत्यम शिवम् सुन्दरम और तेरी क़सम फिल्मो के गीत सुनवाए जो उन फिल्माए नही गए। मुझे लगता हैं किसी निर्माता निर्देशक की फिल्म को उनकी फिल्म कहा जा सकता हैं पर अभिनेता अभिनेत्री जिस फिल्म में काम करते हैं उस फिल्म को उनकी फिल्म नही कहा जा सकता। इसीलिए बेहतर होगा कि अभिनेता अभिनेत्री पर केन्द्रित कार्यक्रमों में वही गीत सुनवाइए जो उन पर फिल्माए गए हो। अजीब सी स्थिति हो गई जब कार्यक्रम सुन रहे थे पद्मिनी कोल्हापुरे पर और गीत सुना रहे थे वो जो जीनत अमान से जुडा हैं इसी तरह पूनम ढिल्लों पर कार्यक्रम सुनते समय कुमार गौरव पर फिल्माए गीत को सुनना बड़ा अजीब इसीलिए भी अधिक लगा कि यह गीत नायिका को संबोधित भी नही था।


रात 9:30 बजे आज के फनकार कार्यक्रम प्रसारित किया गया। शुक्रवार को यह कार्यक्रम अभिनेता फारूख शेख पर केन्द्रित था। इस दिन उनका जन्मदिन था। शुरूवात अच्छी की, कथा फिल्म के कौन आया गीत से। बताया कि उनकी पहली फिल्म गरम हवा थी। पहली व्यावसायिक फिल्म नूरी थी। उनकी विभिन्न फिल्मो में अभिनय की, उनकी हास्य और गंभीर भूमिकाओं की भी चर्चा की। बाजार फिल्म का सीन सुनवाया जिसमे उनके सुप्रिया पाठक के साथ हैदराबादी भाषा में संवाद हैं जहां वो चूडिया बेच रहे हैं। चश्मेबद्दूर, उमराव जान जैसी सभी प्रमुख फिल्मो की चर्चा की और गीत भी सुनवाए। उनके रंगमंच के काम की भी चर्चा हुई। बताया कि उन्होंने शबाना आजमी के साथ आपकी अमृता नाटक में काम किया, आज भी वो नाटको में व्यस्त हैं। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा।


शनिवार को यह कार्यक्रम केन्द्रित रहा आज के दौर की संगीतकार जोडी सलीम-सुलेमान पर। बताया कि पहली फिल्म हैं प्यार में कभी-कभी जिसमे पार्श्व संगीत दिया। अन्य फिल्मो में भी पार्श्व संगीत दिया - क़यामत, डरना मना हैं। भूत फिल्म के लिए एवार्ड भी मिला। इक़बाल और रब ने बना दी जोडी फिल्मो के गीतों में उनका संगीत लोकप्रिय हुआ। चेक दे इंडिया, फैशन उनकी उल्लेखनीय फिल्मे हैं और नई फिल्म बैंड बाजा बारात की भी चर्चा हुई। इन सभी फिल्मो के गीत सुनवाए।


रविवार को विश्व रंगमंच दिवस था। इस अवसर पर उन कलाकारों की चर्चा हुई जिनका सम्बन्ध सिनेमा के साथ रंगमंच से भी रहा। ऐसा पहला नाम हैं पृथ्वी राज कपूर जिनका सम्बन्ध पृथ्वी थियेटर से रहा। एक सीन भी सुनवाया जो शायद मुगले आजम फिल्म का था। अगला नाम बताया सोहराब मोदी। यहाँ भी एक सीन सुनवाया जो शायद पुकार फिल्म का था। उनकी रिकार्डिंग भी सुनवाई जिसमे उन्होंने ऐतिहासिक विषयो को पसंद करने की बात बताई। अगला नाम रहा बलराज साहनी का जिनका सम्बन्ध इप्टा से रहा। जिससे गीतकार कैफी आजमी, शौक़त आजमी और शबाना आजमी भी जुड़े हैं। इसी तरह नसीरूद्दीन शाह, फारूख शेख, अमोल पालेकर, दिनेश ठाकुर, अमरीश पुरी, ओम पुरी, पंकज कपूर, अनुपम खेर, परेश रावल, राकेश बेदी, इला अरूण की चर्चा हुई। आज के दौर के कलाकारों की भी चर्चा हुई - सीमा विश्वास, रघुवीर यादव, मनोज वाजपेयी, आशीष विद्यार्थी, इरफान खान। अभिनय के अलावा लेखन के लिए सौरभ शुक्ला, गीतकार स्वानंद किरकिरे, संगीतकार उत्तम सिंह की चर्चा हुई। सम्बंधित गीत भी सुनवाए। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा। अच्छी रही प्रस्तुति।


सोमवार को यह कार्यक्रम गीतकार आनंद बक्षी को समर्पित किया गया। इस दिन उनकी पुण्य तिथि थी। बताया कि उनका जन्म रावलपिंडी में हुआ था। कुछ दिन थल सेना में भी नौकरी की। फिर गायक और अभिनेता बनने का शौक़ लेकर बम्बई आए। लिखने का शौक़ भी था जो काम आया और भगवान दादा की फिल्म बड़ा आदमी के लिए पहला गीत लिखा। लेकिन लोकप्रियता मिली जब जब फूल खिले फिल्म के इस गीत से -


परदेसियो से न अँखियाँ मिलाना


पर आगे काम नही मिल पाया क्योंकि हर संगीतकार के अपने-अपने गीतकार रहे। इसके बाद मिली फिल्म मिलन जिसका यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ -


सावन का महीना पवन करे सोर


इस गीत के अनुभव उनसे ही सुने। उनकी आवाज में रिकार्डिंग भी सुनवाई। यह भी बताया कि उन्होंने लगभग 4500 गीत लिखे जिनमे अधिकाँश गीतों में प्यार के विविध रंग हैं। चर्चा में आए गीत सुनवाए। प्रस्तोता रही रेणु (बंसल) जी।


मंगलवार को यह कार्यक्रम हास्य अभिनेता जगदीप पर केन्द्रित रहा। इस दिन उनका जन्मदिन था। उनके बारे में जानकारी उन्ही के मुख से सुनवाई गई यानि रिकार्डिंग सुनवाई गई जिसमे उन्होंने खुद के बारे में बताया। रिकार्डिंग के वो अंश सुनवाए जिसमे उन्होंने बताया कि उनका बचपन संघर्षो में बीता। बचपन में काम करते थे। काम के रूप में ही फिल्मो में अभिनय किया और बाल कलाकार बन गए। बीच-बीच में उन फिल्मो के गीत सुनवाए - हम पंछी एक डाल के, गुरूदत्त की फिल्म आर-पार। यहाँ यह भी बताया की रफी साहब ने उनके लिए गाने के लिए कैसे आवाज का अंदाज बदला। इसके बाद बताया कि कैसे शोले फिल्म में सूरमा भोपाली की भूमिका मिली। इस फिल्म के दो सीन सुनवाए। सूरमा भोपाली फिल्म बनाने की बात भी बताई। कुल मिलाकर ऐसे लगा कि किसी कार्यक्रम के लिए की गई बातचीत के अंश यहाँ सुनवा दिए गए। अंशो का चुनाव भी ठीक नही रहा। उनकी आरंभिक फिल्मो की बात हुई यानि बाल कलाकार के रूप में, फिल्म शोले और फिल्म बनाने की बात हुई, इस तरह हास्य अभिनेता के रूप में उनकी छवि उभर कर नही आई। कई फिल्मो में उन्होंने हास्य भूमिकाएं की जिनके नाम तक नही बताए गए। जहां तक मेरी जानकारी हैं बतौर नायक उनकी एक फिल्म हैं नूरमहल। यह फिल्म नही चली पर इसमे उन पर और नायिका पर फिल्माया गया सुमन कल्याणपुर का गाया यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था -


मेरे महबूब न जा आज की रात न जा


इसकी भी चर्चा नही हुई। प्रस्तोता रहे युनूस (खान) जी।


बुधवार को निर्माता निर्देशक यश चोपड़ा पर कार्यक्रम केन्द्रित रहा। बताया कि पहले आई एस जौहर के सहायक थे फिर अपने भाई बी आर चोपड़ा के सहायक बने। बी आर चोपड़ा ने उन्हें पहली बार निर्देशन का मौक़ा दिया और उनकी पहली फिल्म आई धूल का फूल। इस तरह सामाजिक समस्या पर फिल्म निर्देशित की, अगली फिल्म रही वक़्त। 1973 में अपनी फिल्म कम्पनी खोली - यश राज प्रोडकशनस और पहली फिल्म बनाई दाग। इसके बाद सिलसिला चल पडा, प्यार के विविध रंग बताती एक के बाद एक फिल्मे बनाई जिनमे से कुछ नाम हैं - इत्तेफाक, कभी-कभी, काला पत्थर, सिलसिला, डर, मोहब्बते। दूसरे निर्माताओं के लिए भी फिल्मे निर्देशित की - त्रिशूल, दीवार। उन्हें मिले पुरस्कारों की भी जानकारी दी। फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे उनके दोनों बेटो के बारे में भी बताया - आदित्य चोपड़ा जिन्होंने दिल तो पागल हैं निर्देशित की और उदय चोपड़ा जिन्होंने धूम में अभिनय किया। प्रस्तोता रहे अमरकांत जी। अच्छा संतुलित रहा कार्यक्रम।


गुरूवार को अभिनेत्री मीनाकुमारी पर केन्द्रित रहा यह कार्यक्रम। इस दिन उनकी पुण्य तिथि थी। बताया कि असली नाम महजबीं हैं। पिता संगीत शिक्षक होने से बचपन से कला का माहौल रहा। पहली फिल्म मिली विजय भट्ट की, बाल कलाकार के रूप में। बतौर नायिका पहली फिल्म रही बैजू बावरा। साहब बीबी और गुलाम और परिणीता फिल्म में उनकी अभिनय क्षमता उभर कर आई। भावुक भूमिकाएं अधिक की। उनकी फिल्मे फूल और पत्त्थर, साहब बीबी और गुलाम के सीन सुनवाए। उनकी कॉमेडी भूमिका की भी चर्चा की मिस मेरी फिल्म से पर अधिक कॉमेडी फिल्म थी किशोर कुमार के साथ शरारत जिसका नाम भी नही बताया। इसी तरह से आजाद फिल्म की चर्चा भी नही की जिसमे उनके नृत्य बहुत पसंद किए गए थे जो शायद पहली बार उन्होंने किए थे। उन्हें मिले एवार्ड्स की चर्चा की जिसमे उल्लेखनीय हैं वर्ष 1962, इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए तीन फिल्मो को नामांकित किया गया, तीनो उन्ही की फिल्मे थी - साहब बीबी और गुलाम, मैं चुप रहूंगी और आरती जिनमे से साहब बीबी और गुलाम के लिए उन्हें एवार्ड मिला। जिन फिल्मो के लिए उन्हें एवार्ड मिला उनमे परिणीता, शारदा, बैजू बावरा फिल्मे भी शामिल हैं। उनके शायर रूप की भी चर्चा हुई और गुलज़ार द्वारा उनकी आवाज में उनकी शायरी को संपादित कर निकाले गए एलबम की भी जानकारी दी। बताया कि उनकी रूहानी आवाज लोगो ने बहुत पसंद की। पाकीजा और चित्रलेखा फिल्मो की भी चर्चा की पर दो महत्वपूर्ण फिल्मो की चर्चा नही हुई - मेरे अपने जिसमे उन्होंने नानी माँ की भूमिका की और अंतिम फिल्म गोमती के किनारे। उनके द्वारा फ़ौजी भाइयो के लिए प्रस्तुत जयमाला की रिकार्डिंग के अंश भी सुनवाए। प्रस्तुति अच्छी रही।


पूरे सप्ताह इस कार्यक्रम को विजय दीपक छिब्बर जी ने प्रस्तुत किया। सहयोग पी के ए नायर जी का रहा।


सोमवार और गुरूवार को दोनों ही कार्यक्रम गीतकार आनंद बक्षी और अभिनेत्री मीनाकुमारी को समर्पित रहे। हिट सुपरहिट में प्रस्तुति का नया अंदाज अच्छा लगा। वैसे सारी बाते एक ही कार्यक्रम में समेटी जा सकती थी। केवल आज के फनकार कार्यक्रम का प्रसारण पर्याप्त था।


विभिन्न कलाकारों के जन्मदिन और पुण्य तिथि पर अलग-अलग कार्यक्रम प्रसारित करने के बजाए एक ही रूपक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा सकता था। वैसे भी हर दिन एक ही फनकार कार्यक्रम सुनना अच्छा नही लगता।


हिट सुपरहिट कार्यक्रम भी दोपहर में 1 बजे से 1:30 बजे तक प्रसारित होता हैं फिर यही कार्यक्रम रात में 9 बजे से 9:30 बजे तक प्रसारित होता हैं। दो समय प्रसारण के बजाय एक समय अन्य कार्यक्रम प्रसारित किए जा सकते हैं। इस तरह रात के एक घंटे के और दोपहर के आधे घंटे के प्रसारण समय में अन्य कार्यक्रम सुनवाए जा सकते हैं। कार्यक्रमों में विविधता आने से रोचकता बढ़ेगी।


दोनों ही कार्यक्रमों की अपनी-अपनी संकेत धुन हैं। हिट-सुपरहिट की धुन में लोकप्रिय गीतों के संगीत के अंश हैं, यहाँ एक बढ़िया उपशीर्षक भी हैं - शानदार गानों का सुरीला सिलसिला। संकेत धुनें कार्यक्रमों के आरम्भ और अंत में सुनवाई गई। हिट सुपरहिट कार्यक्रम के दौरान और रात में दोनों कार्यक्रमों के बीच के अंतराल में अन्य कार्यक्रमों के प्रायोजको के विज्ञापन भी प्रसारित हुए। एकाध बार क्षेत्रीय विज्ञापन भी प्रसारित हुए। विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी देते संदेश (प्रोमो) भी प्रसारित हुए।


मंगलवार की रात और बुधवार दोपहर में प्रसारण में कुछ तकनीकी गड़बड़ रही। कुछ समय प्रसारण गायब रहा, खरखराहट रही, अन्य आवाजे सुनाई दी।

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