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Wednesday, July 27, 2011

चाय-पुराण-'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' कड़ी 5

रेडियो वालों (रेडियो कर्मचारियों और श्रोताओं दोनों) का काम चाय के बिना नहीं चल सकता। दिलचस्‍प बात ये है कि कई महत्‍त्‍‍वपूर्ण आयडियाज़ 'चाय-पान' के दौरान ही आते हैं। इस एक चाय ने जाने कितने गुल खिलाए हैं रेडियो में। आज जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा अपनी श्रृंखला में लेकर आईं हैं समाचार-कक्ष का चाय-पुराण।  


हमारे हिंदी समाचार कक्ष में जितना महत्त्व अनुवाद, संपादन और वाचन का है, उतना ही चाय का भी है. जब तक बुलेटिन का प्रसारण नहीं होता तब तक यही तीनों बातें सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बनी रहती हैं. लेकिन बुलेटिन पूरा होते ही सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न होता है कि आज चाय कौन पिलाएगा. बात दो-चार चाय की तो होती नहीं. न्यूज़ रूम में एक समय में कम से कम पंद्रह चायार्थी मौजूद होते हैं. ऐसे में बेचारे चाय पिलाने वाले को भी सोचना पड़ता है....किसे याद रक्खूँ, किसे भूल जाऊँ ....

जन्मदिन, विवाह की सालगिरह, बच्चों के परीक्षा परिणाम जैसे विशेष अवसर हों तो लोग ख़ुद ही ख़ुशी-ख़ुशी चाय मंगवा देते हैं. नयी गाड़ी, नया फ्लैट या नयी पोस्टिंग भी इसी श्रेणी में आती है, जब चाय पिलायी जाती है.

कुछ दोयम दर्जे के अवसर भी आते हैं...जैसे अख़बार में नाम या फोटो छपना, मोहल्ले या शहर स्तर का Publication1कोई पुरस्कार मिलना, बच्चे को मनचाहे कॉलेज में प्रवेश मिलना, चिटफंड या लॉटरी जीतना, वगैरह वगैरह.... लोग इन अवसरों को  छिपाने की कोशिश में रहते हैं लेकिन किसी न किसी स्रोत से ख़बर न्यूज़ रूम तक पहुँच ही जाती है और चाय पिलाना लाज़मी हो जाता है.

पुरानी परंपरा के अनुसार पहली बार मेजर बुलेटिन (जैसे सुबह आठ या रात पौने नौ बजे का) पढ़ने या बनाने वाले को भी चाय पिलानी पड़ती है. अगर वह इस परंपरा को निभाने में आनाकानी करे तो उसे सहज ही छोड़ा नहीं जाता. वसूली करने वाले बड़े सख्त दिल लोग हैं. बातों से टाले नहीं जा सकते. इनमें मेरा नाम भी काफ़ी ऊपर आता है. ऊपर लिखी बातों के अलावा मैंने कमीज़ या साड़ी सुन्दर लगने के उपलक्ष में भी भाई लोगों को चाय पिलवायी है. बल्कि हमारे एक सहयोगी जोगिन्दर शर्मा तो यहाँ तक कहते थे कि ये काशी की बाम्हन सुबह-सुबह जजमान की तलाश में ही ऑफिस आती है. 

इन तमाम गौरवशाली परम्पराओं के बावजूद कई दिन ऐसे भी होते हैं जब कोई जजमान हाथ नहीं लगता, तब ख़ुद ही पैसे ख़र्च कर चाय पीनी पड़ती है. हालाँकि इसमें बड़ा जी दुखता है.

एक बार यह नयी परंपरा शुरू करने की भी कोशिश हुई कि हर व्यक्ति सिर्फ अपनी चाय के पैसे दे लेकिन इतनी अधिक लोकतान्त्रिक परंपरा हिंदी समाचार कक्ष में निभ नहीं सकी. छुट्टे पैसों यानी चिल्लर का अभाव भी इसके आड़े आया.

दरअसल हमारे इस चाय प्रेम के लिए काफ़ी हद तक शिफ्ट ड्यूटी भी ज़िम्मेदार है. सुबह की ड्यूटी हो तो नींद भगाने के लिए, दोपहर की हो तो काम का मूड बनाने के लिए और शाम की हो तो खाना हज़म करने के लिए चाय की ज़रुरत पड़ती ही है.

अबसे कोई बीस साल पहले की याद करूँ तो सुबह की ड्यूटी तब इतने सवेरे शुरू होती थी कि घर से निकलते समय चाह कर भी कुछ खाया नहीं जा सकता था. आठ बजे के बुलेटिन तक पूरा ध्यान उसी में लगा रहता था. लेकिन सवा आठ के बाद इतने ज़ोर की भूख लगती कि संयम नहीं होता था. ऐसे में वो गाना याद आता था.....कहाँ जायें हम दो मोहब्बत के मारे .... अंतर सिर्फ इतना था कि यहाँ मोहब्बत के बजाय भूख के मारे होते थे और दो से कहीं ज़्यादा होते थे.

आकाशवाणी की कैंटीन में तब तक चूल्हा जलने की प्रक्रिया शुरू हो रही होती थी, जबकि वहां से थोड़ी सी दूरी पर समाचार एजेंसी यू एन आई की कैंटीन में तब तक न सिर्फ चूल्हा जल चुका होता था, बल्कि इडली-उपमा-वडा भी तैयार हो चुका होता था. इसलिए हम सब अक्सर बच्चन जी के शब्दों में ..... बस वही एक राह पकड़कर चल पड़ते थे और इच्छानुसार नाश्ता पा जाते थे.

विशेष अवसरों पर अच्छे बुलेटिन की शाबाशी के रूप में भी चाय-नाश्ते की परंपरा थी. मुझे याद है, वह १५  अगस्त पर मेरी पहली ड्यूटी थी. लाल क़िले से प्रधान मंत्री के भाषण का सीधा प्रसारण होना था और उसके फ़ौरन बाद हिंदी का बुलेटिन जाना था. भाषण का आलेख नहीं था, टीवी या रेडियो से सीधा प्रसारण सुनकर उसे नोट करना था....फिर उसे न्यूज़ आइटम के रूप में सम्पादित करना था और महत्त्वपूर्ण बातों का हेडलाइन के रूप में उल्लेख करना था. इन सब कामों के लिए वरिष्ठ संपादक और स्टेनो पहले से तैनात थे लेकिन फिर भी यूनिट के प्रभारी अविनाश गोयल जी बराबर मौजूद थे. हर व्यक्ति को सहयोग दे रहे थे, हर काम पर बारीकी से नज़र रख रहे थे. बुलेटिन के प्रसारण के बाद उन्होंने सबको बधाई दी और कलेवा (गोल मार्केट की एक प्रसिद्ध मिठाई की दुकान) से बढ़िया नाश्ता मंगवाकर सबको खिलाया.

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बुलेटिन की किसी बारीकी को लेकर दो-तीन लोगों में मतभेद हो जाता है, या फिर

किसी राजनीतिक या साहित्यिक विषय पर गर्मागर्म बहस छिड़ जाती है, तब उनका कैंटीन में बैठकर, चाय की चुस्कियों के साथ मुद्दे की उलझन को सुलझाना तो समझ में आता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बिला वजह, सिर्फ पैसे बचाने की नीयत से, चुपचाप एक-दो लोगों के साथ खिसक जाते हैं और चाय-पानी कर आते हैं.

ऐसे एक सज्जन के बारे में मुझे भी बताया गया था. कहा तो यहाँ तक गया था कि इनसे चाय पीकर दिखाओ तो जानें. मैंने चुनौती स्वीकार कर ली और मौके की तलाश में रहने लगी. उन्हीं दिनों पुणे में राष्ट्रीय खेलों का आयोजन हुआ. आकाशवाणी की ओर से उन सज्जन को कवरेज पर भेजा गया. उन दिनों स्टेट्समैन अख़बार में हर हफ्ते 'लिसनिंग पोस्ट' नाम से आकाशवाणी के कार्यक्रमों की समीक्षा छपा करती थी. उस कॉलम में खेलों की कवरेज की काफी प्रशंसा छपी. मैंने उसे काटकर नोटिस बोर्ड पर चस्पाँ कर दिया. वे जब पुणे से लौटकर आये तो मैंने उन्हें बधाई दी और वह कटिंग दिखाई. वे बड़े खुश हुए. बस, लोहा गर्म देख मैंने फ़ौरन वार किया.

कहा - देखिये, आपकी इतनी तारीफ छपी है, हम सब की चाय तो बनती है न?

पीछे से किसी ने आवाज़ लगायी - नहीं जी, इस पर तो पकौड़े और बर्फी भी बनती है.

न्यूज़ रूम में तब तेरह लोग मौजूद थे. किसी ने इंकार नहीं किया. सब यही कहते गये कि हाँ-हाँ, बड़ी ख़ुशी की बात है. हम भी खायेंगे.

लेकिन असली मज़ा तब आया, जब उस दिन की दावत से वंचित रह गये हमारे एक साथी ने कहा - शुभ्रा, सुना है कि तूने तो कटड़ा दुह लिया. 

'न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा' इस श्रृंखला की बाक़ी कडियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए।

Saturday, July 23, 2011

पहला "भीली" रेडियो...वन्या

दुनिया का पहला भीली रेडियो आज २३ जुलाई को मध्यप्रदेश के भाबरा (ज़िला आलिराजपुर) में शुरू किया जा रहा है। वन्य और आदिम-जाति कल्याण विभाग के सहयोग से शुरू किए जाने वाले वन्या रेडियो ९०.४ एफ़.एम.पर से आदिवासियों द्वारा अपनी बोली "भीली' और हिन्दी में कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाएगा। वन्या img-15761-Bhagoria_010 रेडियो का प्रसारण स्थल भाबरा मध्यप्रदेश और गुजरात की सीमा पर बसा है और यहाँ की बोली में गुजराती का स्पष्ट पुट सुना जा सकता है.

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की जन्मस्थली भाबरा में आज इसका शुभारंभ म.प्र.के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी करने जा रहे हैं। इससे रोज़ दो घंटे के कार्यक्रम प्रसारित किए जाएँगे, जिन्हें २० किलोमीटर की परिधि में सुना जा सकेगा। इसका संचालन स्थानीय जनजातीय समुदाय करेगा। स्थानीय स्तर पर प्रसारण उनकी अपनी भीली बोली में होगा। यह केन्द्र जहॉं एक ओर राज्य शासन द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने में अपनी महती भूमिका निभाएगा वहीं दूसरी ओर जनता और राज्य शासन के बीच में एक सेतु का काम करेगा।

दुनिया में शायद यह पहला मौक़ा है, जब जनजातीय समुदाय के लिए अलग से सामुदायिक रेडियो केन्द्र(कम्युनिटि रेडियो) शुरू किया जा रहा है। सरकारी प्रवक्ता ने दावा किया कि सामुदायिक रेडियो केन्द्र के ज़रिये योजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन एवं जन-समस्याओं को जल्दी हल करने में शासन-प्रशासन को भी मदद मिल सकेगी, इसीलिए राज्य सरकार इस केन्द्र को शुरू कर रही है।

रेडियोनामा के लिये संजय पटेल की रपट.

Sunday, July 17, 2011

अलविदा साप्ताहिकी

मुझे साप्ताहिकी लिखते हुए तीन वर्ष होने को आए। तीन वर्ष पहले 15 अगस्त के दिन मैंने पहली साप्ताहिकी लिखी थी। पहले वर्ष मैं पूरे कार्यक्रमों पर लिखने का प्रयास करती थी। कार्यक्रमों सबंधी पूरी जानकारी देना कठिन हो जाता था। पोस्ट लम्बी होती जाती थी फिर भी बहुत सी बाते अनकही रह जाती थी। इसीलिए मैंने दूसरे वर्ष में एक-एक समय के प्रसारण पर लिखना शुरू किया जैसे सुबह के प्रसारण, दोपहर के प्रसारण वगैरह। फिर मुझे लगा कि अब भी कुछ बाते हैं जो मैं कह नही पा रही जैसे गैर फिल्मी गीतों का सिमटता प्रसारण वगैरह। इसी बात को ध्यान में रख कर तीसरे वर्ष में मैंने विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत कार्यक्रमों की चर्चा शुरू की जिसमें सभी तरह की चर्चा विस्तार से करने का मौक़ा मिला। एक-एक श्रेणी के अंतर्गत सभी कार्यक्रमों में क्या, कैसे प्रसारित हुआ, मेरी नजर में क्या सही रहा और कहाँ क्या हो सकता, इसकी भी चर्चा मैंने बेबाकी से की। इस तरह विविध भारती के कार्यक्रमों के प्रति मैंने अपना दृष्टिकोण रखा जिसे आप पिछले सप्ताह तक पढ़ते रहे। अब साप्ताहिकी से मैं विदा ले रही हूँ लेकिन रेडियोनामा से जुड़ी रहूंगी।

Saturday, July 16, 2011

मेरी ज़िन्दगी का नमक - रेडियो : दूसरी कड़ी

आकाशवाणी इन्दौर के वरिष्ठ प्रसारणकर्ता नरहरि पटेल की यादें-2

मित्रों, पिछले शनिवार को आकाशवाणी इन्दौर के वरिष्ठ प्रसारणकर्ता और कवि नरहरि पटेल ने मालवा हाउस में अपनी आधी सदी पुरानी यादों को सहेजा। आज उसी का दूसरा भाग रेडियोनामा पर पेश करते हुए प्रसन्नता है। इस ब्लॉग के माध्यम से प्रयास रहा है कि प्रसारण विधा से जुड़ी उन तमाम शख़्सियतों के अनुभवों का दस्तावेज़ीकरण हो सके जिन्होंने किसी भी रूप में रेडियो को समृध्द किया है. गुज़ारिश यह भी है कि यदि हम उन तक नहीं पहुँच पा रहे हों और आप रेडियोनामा के पाठक के रूप में ऐसे किसी व्यक्तित्व से परिचित हैं तो हमें ईमेल द्वारा उनका संपर्क(फ़ोन/मोबाइल/ईमेल) भेजने की कृपा करें; हम आभारी होंगे। तो लीजिये मुलाहिज़ा फ़रमाइये नरहरिजी की आत्मीय रेडियो यात्रा की दूसरी और अंतिम कड़ी....

आकाशवाणी इन्दौर ने मुझे पूरे मध्यप्रदेश में एक सुपरिचित आवाज़ के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसकी वजह थे ऐसे प्रस्तोता जो मेरी अकिंचन क़ाबिलियत को सम्मान देते थे और अतिथि कलाकार के रूप में काम करने की स्वतंत्रता और मौक़ा मुहैया करवाते थे। हाँ यह भी बता दूँ कि आज भगवान की कृपा से मेरे पास ज़िन्दगी को आराम से जीने का सारा साज़ो-सामान है लेकिन पचास से सत्तर के दशक के उस मध्यमवर्गीय परिवेश के मुझ जैसे एक व्यक्ति को आकाशवाणी के इन प्रसारण अनुबंधों से काफ़ी आर्थिक बल भी मिला. यदि यह स्वीकारोक्ति नहीं करूंगा तो शायद वह नमक हलाली कहलाएगी।

मैं रेडियो की वाचिक परम्परा का प्रमुख स्वर बना उसके लिए डॉ. श्याम परमार, नंदलाल चावला, श्री नगरकर (सिने तारिका लीला चिटनीस के भाई) एन.पी. लैले, के.के.नैयर, अमीक़ हनफ़ी, जयदयाल बवेजा, पी.के.शिंगलू, केशव पाण्डे, महेन्द्र जोशी,ब्रज शर्मा (वॉइस ऑफ़ अमेरिका) दीनानाथ, स्वतंत्र कुमार ओझा, भारतरत्न भार्गव(बीबीसी) सत्येन शरत, विश्व दीपक त्रिपाठी - वीरेन्द्र मुंशी (दोनो बीबीसी हिन्दी सेवा) प्रभु जोशी, लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा और राकेश जोशी जैसे प्रतिभासंपन्न प्रसारणकर्ताओं और प्रशासकों को श्रेय देना होगा जो प्रतिभा-पहचान के धनी रहे मेरी आवाज़ और क़लम का सही इस्तेमाल करते रहे।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे मालवा हाउस की आत्मीय यादें झकझोर देतीं हैं। बच्चों के गीत, किसानों के कार्यक्रम, युववाणी, रेडियो नाटक, रेडियो रूपक के साथ ही आकाशवाणी की उन प्रस्तुतियों की भी याद आती है जो श्रोताओं-दर्शकों की उपस्थिति में सभागारों और खेत-खलिहानों में होती आई हैं।

आकाशवाणी का वह सुनहरा दौर इसलिये भी याद आता है क्योंकि उस व़क़्त की कार्य संस्कृति कुछ ऐसी थी जो आकाशवाणी का पूरा स्टाफ़ बाहर से आने वाले कलाकार को भरपूर सम्मान देता था और उसकी कला का प्रशंसक होता था। मेरे कई नाटकों की रिहर्सल्स रात को ग्यारह-बारह बजे तक चलती रही है और उसके बाद देर रात को मैं अपनी सायकल से आठ-दस मील दूर बसे अपने घर पहुँचता था लेकिन तब भी थकान का नामोनिशान नहीं होता था क्योंकि मालवा हाउस में जाना और किसी प्रसारण का हिस्सा बनना मुझे गर्व से भर देता था.। हिन्दी रेडियो नाटकों ने मुझे अपार लोकप्रियता दी.नमक का दरोग़ा ईदगाह,,(प्रेमचंद) स्वप्न वासवदत्ता(महाकवि भास) नये हाथ(विनोद रस्तोगी) थैक्यू मिस्टर ग्लॉड(अनिल बर्वे)ऑलिवर ट्विस्ट(चार्ल्स डिकेंस) बिराज बहू(शरदचंद्र चटोपाध्याय)दो ध्रुव(वी.एस.खाण्डेकर) हूर का बेटा-बेनहुर (ल्यू वॉलेस), ख़ामोश अदालत जारी है(विजय तेंडुलकर) कुछ एक ऐसे नाटक हैं जो मेरी ज़िंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे और इनके बहाने मेरी आवाज़ को एक मुक़म्मिल पहचान मिली।

आज भी एक वरिष्ठ प्रसारणकर्ता, सलाहकार समिति के सदस्य या कभी ऑडिशन कमेटी के मेम्बर के रूप में मालवा हाउस जाना-आना होता है लेकिन अब मालवा हाउस में न तो पुराने ज़िंदादिल प्रसारणकर्मी हैं और न ही उन जैसा काम करने का ज़ज़्बा। रेडियो ने मुझे अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम दिया,माइक्रोफ़ोन पर साँस का इस्तेमाल सिखाया,मेरी ज़िन्दगी को एक ऐसा नमक दिया जिसका स्वाद मुझे मानसिक रूप से बहुत स्वस्थ बनाता रहा है। मालवा हाउस के परिसर में आज भी कई बूढ़े दरख़्त हैं जो मुझसे अपने मौन के ज़रिये बतियाते हुए पूछते हैं क्यों भाई कैसे हो ? और मुझे इन पेड़ों के पत्तों से एक बार फिर डॉ. श्याम परमार की उस आवाज़ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जैसे वह पूछ रहे हों "अरे भाई आप जैसे लोगों को ही तो ढूँढ रहा हूँ मैं'। आते रहना मालवा हाउस में।

चित्रों में
  1. नरहरि पटेल
  2. जाने माने नाट्य निर्देशक दीनानाथ के साथ हैं नरहरि पटेल
  3. शरद बाबू के नाटक परिणिता की रेकॉर्डिंग का दृश्य। एकदम बाँई ओर हैं नरहरि पटेल.बीच में स्वतंत्रकुमार ओझा और वीरेन मुंशी.
नरहरि पटेल से संबधित लेखों को एक साथ देखने के लिए यहां क्लिक कीजिए।

Wednesday, July 13, 2011

तिनके विच जान--'न्यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा' कड़ी 4

रेडियोनामा पर जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं--'न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा'। ये इस श्रृंखला की चौथी कड़ी है जिसमें वो समाचार-लेखन और संपादन की बारीकियों से अवगत करा रही हैं।


रात भर की ड्यूटी में ठीक-ठाक प्रदर्शन रहा होगा, क्योंकि जल्दी ही मेरी ड्यूटी रात दस और ग्यारह बजे के बुलेटिन पढ़ने पर भी लगने लगी थी. अधिकतर रात की पारी हम कैजुअल लोग ही सँभालते थे. कभी-कभी कुछ महत्त्वपूर्ण दिनों में नियमित लोग भी रात की ड्यूटी करते थे. जैसे कि एक बार बजट का दिन था. पौने नौ के बुलेटिन के बाद शाम की शिफ्ट के सभी लोग जा रहे थे. मैं छह-सात पन्नों का बजट का आइटम देखकर बहुत परेशान थी कि इसे कहाँ से और कैसे काटूँगी. पाँच मिनट के बुलेटिन में काटना ज़रूरी था जबकि मुझे हर बात महत्त्वपूर्ण लग रही थी. ऐसे में पता चला कि एक नियमित संपादक ड्यूटी पर हैं, जो आगे के बुलेटिन बनायेंगे. कुछ हिम्मत बढ़ी, लेकिन उनकी काटने की कला देखकर मैं दंग रह गयी. मसलन उन्होंने गेहूं के दाम बढ़ाये तो अरहर-चने के काट दिए, पेट्रोल- डीज़ल के बढ़ाये तो मिटटी के तेल और रसोई गैस के काट दिए, आयात की बात बतायी तो निर्यात की ग़ायब कर दी. बहरहाल मैं इस बात से खुश थी कि मुझे अपना दिमाग़ लगाये बग़ैर बना-बनाया बुलेटिन मिल गया था.

रात की शिफ्ट की एक घटना और याद आ रही है. भुवन चन्द्र खंडूरी (उत्तराखंड के पूर्व मुख्य मंत्री नहीं, हमारे एक सहायक संपादक) हिंदी समाचार कक्ष में नये-नये आये थे और रात की ड्यूटी कर रहे थे. तब तक रात भर, हर घंटे अंग्रेज़ी और हिंदी के पाँच-पाँच मिनट के बुलेटिन शुरू हो गये थे. लेकिन उनका क्रम एक सा नहीं था, कभी हिंदी का पहले होता तो कभी अंग्रेज़ी का. बार-बार चार्ट देखना पड़ता था कि हमारा बुलेटिन तीन बजे है या तीन बजकर पाँच मिनट पर. खंडूरी जी और मैं बुलेटिन तैयार करके बैठे थे कि समय हो तो पढ़ने जायें. रेडियो धीमी आवाज़ में चला रखा था. तभी अनाउंसर ने क्यू दिया - अब आप समाचार सुनेंगे. पहले अंग्रेज़ी और उसके बाद हिंदी में.

लेकिन ये क्या? ....समाचार शुरू ही नहीं हुए.

मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं, हिंदी का बुलेटिन पहले जाना हो.

मैं फ़ौरन बुलेटिन लेकर स्टूडियो की तरफ दौड़ी. पीछे-पीछे खंडूरी जी भी थे.

उन्होंने कहा भी कि मैं देखकर आया हूँ, अभी हमारा नहीं अंग्रेज़ी का बुलेटिन है.

लेकिन मुझे लग रहा था कि पांच मिनट तक आकाशवाणी से कोई प्रसारण न होना तो बड़ी लज्जाजनक बात होगी. इस तर्क के साथ मैं अंग्रेज़ी के समाचार स्टूडियो में चली गयी और वहां से अपना हिंदी का बुलेटिन पढ़ना शुरू कर दिया. इसी बीच अंग्रेज़ी के समाचार वाचक भी पहुँच गये थे. खंडूरी जी ने उन्हें बाहर ले जाकर स्थिति समझायी और उन्होंने पाँच मिनट बाद हिंदी के स्टूडियो से अपना बुलेटिन पढ़ा.

बाद में इस गफ़लत के लिए अंग्रेज़ी समाचार वाचक के साथ मुझे भी मेमो मिला, जिसमें कहा गया था कि आइन्दा मैं अपने काम से काम रखूँ. सफ़ाई देने का कोई मौक़ा नहीं. बस एकतरफ़ा नसीहत !

मुझे बड़ा ग़ुस्सा आया. मैंने आकाशवाणी को ब्रेक डाउन से बचाया और वे मुझे ही ग़लत साबित कर रहे हैं. तब शांत हुई जब पापा ( आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा ) ने मुझे समझाया कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी सिर्फ तुम्हारे चंक की है. अंग्रेज़ी की जगह तो तुमने भर दी लेकिन अगर तुम्हारे चंक पर ब्लैंक जाता तो वह और भी गंभीर अपराध होता.

जिन दिनों रात के साथ तड़के शिफ्ट की भी ड्यूटी करती थी, उन दिनों कुछ ऐसे लोग भी आते थे जिनका या तो स्कूटर स्टार्ट नहीं होता था या फिर ऑफिस की गाड़ी छोड़कर चली आती थी. जब कई बार....लगातार... उनसे  देर से आने का यह कारण सुन चुके तो हम सब सतर्क हो गये और एक दूसरे को आगाह करने लगे कि भैया, इनकी ड्यूटी हो तो छह बजे की तैयारी ख़ुद ही कर लेना  ....क्योंकि वे बस ऐसे समय पहुंचेंगे कि आपके बनाये बुलेटिन को थोड़ा सा उलट-पुलट कर मंज़ूरी दे देंगे और स्टूडियो ले जाकर पढ़वा देंगे. यह अनौपचारिक अनुवाद और संपादन  करते- करते हमें तनाव के माहौल में, जल्दी-जल्दी में काम करने की आदत होने लगी.

वैसे विधिवत अनुवाद सीखने की शुरुआत शाम की शिफ्ट में हुई थी. पहले-पहल वर्षा और बाढ़ के समाचार अनुवाद के लिए दिए गये. मैंने उन्हीं में अपना पूरा पांडित्य झोंक दिया -

"ब्रह्मपुत्र एवं उसकी अनुवर्ती नदियों के जल स्तर में अत्यंत तीव्रता से वृद्धि हो रही है. असम में अभूतपूर्व बाढ़ की परिस्थितयां उत्पन्न हो गयी हैं."

इसे लेकर मैं सीधे ब्रजराज तिवारी जी के पास पहुँच गयी, जो उस दिन पौने नौ के बुलेटिन के सुपरवाइज़र थे. उनसे कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं मिली बल्कि उन्होंने बड़े शांत भाव से मुझे सुभाष सेतिया जी के पास भेज दिया. सेतिया जी ने एक नज़र अनुवाद पर डाली, एक नज़र मुझ पर, और पूछा - कहाँ से आई हैं आप?

मैंने बड़े गर्व से बताया कि मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम ए और पी एच डी की है.

सेतिया जी ने चुन-चुन कर सजाये मेरे सारे शब्दों पर बांये हाथ से एक आड़ी रेखा खींची और ऊपर लिखा - "असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का पानी चढ़ने से बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है."

उस दिन प्रसारण का यह सबसे महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा कि रेडियो कम्युनिकेशन का माध्यम है, ज्ञान प्रदर्शन का नहीं. जब वही बात सीधे सादे शब्दों में कही जा सकती है, तो बेवजह बड़े बड़े शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाये? बनारस में पढ़ते समय, जिस संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रयोग बड़े मनोयोग से सीखा था, उसे भुलाने में काफी समय लगा लेकिन अब वही भाषा बोलती और लिखती हूँ, जो ज़्यादा से ज़्यादा लोग आसानी से समझ सकें.

सेतिया जी को मैं आज भी गुरु मानती हूँ क्योंकि अगर उस दिन उन्होंने "जल स्तर में वृद्धि" को काटकर "पानी चढ़ना" न सिखाया होता तो शायद मैं इतनी तेज़ी से आगे नहीं बढ़ पाती.

उन्होंने एक बात और सिखाई थी, जिसे मैंने आज तक पल्ले से बाँध रखा है. कहने लगे कि अगर अच्छा संपादक बनना है तो समाचारों को पूरी बेरहमी से काटना सीखो. अगर शब्दों का मोह करोगी तो बुलेटिन के साथ नाइंसाफी होगी.

सेतिया जी अवकाश ग्रहण कर चुके हैं, लेकिन सुपरवाइज़र के तौर पर अब भी ड्यूटी करते हैं. और रेडियो के नियमित श्रोता तो हैं ही. जब कभी किसी कार्यक्रम की प्रस्तुति, या किसी क्रिस्प हेडलाइन, या किसी बुलेटिन के सम्पादन पर उनसे शाबाशी मिलती है तो बड़ी अतोल ख़ुशी होती है.

किसी सरकारी नियम के तहत हमसे पहले के कुछ समाचारवाचक केवल वाचन का काम करते थे, जबकि कुछ लोग वाचन के साथ-साथ संपादन की दोहरी भूमिका निभाते थे. मेरे आने तक पहले वर्ग में केवल विनोद कश्यप जी और रामानुज जी रह गये थे, बाक़ी सभी लोग संपादन भी करते थे. इंदु जी और मनोज जी की कार्य शैली को निकट से जानने- समझने का मुझे अवसर नहीं मिला लेकिन और लोगों से मैंने बहुत कुछ सीखा.

जैसे कि कृष्ण कुमार भार्गव जी से सही उच्चारण जानने का आग्रह. भार्गव जी ने समाचार कक्ष में दो खूब मोटे मोटे रजिस्टर रखवा रखे थे - एक व्यक्तियों और दूसरा स्थानों के नाम के लिए. जब भी कोई नया नाम सामने आता, वे फ़ौरन उसे दर्ज कर देते थे. इसके अलावा उन्होंने पुस्तकालयों जैसा कैटलॉग भी बनाकर रखा था. छोटी-छोटी दराजों में कार्ड पिरोये हुए थे जिनमें बहुत सारे नामों के सही उच्चारण लिखकर रखे रहते थे. शुरू-शुरू में हम सभी लोग उसका बराबर उपयोग भी करते थे. बाद में भार्गव जी ने विश्व उच्चारण कोष नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित करवायी, जिसकी भूमिका पापा ने लिखी थी. इसमें उन्होंने देश-विदेश के बहुत सारे नामों के सही उच्चारण के साथ यह जानकारी भी दी है कि किसी विशेष भाषा समूह में किसी वर्ण का उच्चारण कैसे किया जाता है. फ़्रांस, चीन या मध्य यूरोप के सन्दर्भ में इन नियमों की जानकारी वाक़ई प्रसारणकर्ताओं के लिए बड़े काम की है.

भार्गव जी से मैंने एक और बात सीखी. काम करते हुए मेज़ को साफ सुथरा और व्यवस्थित रखना. सुबह आठ बजे का बुलेटिन बनाते समय उनसे किसी भी आईटम की अंग्रेज़ी कॉपी मांग लीजिये, फ़ौरन दे सकते थे. जबकि दूसरे कई संपादक ऐसी किसी माँग पर आइटम .......ढूंढते ही रह जाते थे.

रविंदर सभरवाल से मैंने बंचिंग सीखी, यानी बुलेटिन में कौन सा आइटम किस जगह लिया जाना चाहिए. पंद्रह ravider ji मिनट के बुलेटिन के तीन हिस्से या बंच होते हैं. आम तौर पर इनमें से पहले हिस्से में बड़ी हेडलाइन्स और राष्ट्रीय महत्त्व के समाचार, दूसरे में राज्यों, राजनीतिक दलों और विकास कार्यों के समाचार और तीसरे हिस्से में विदेश, खेल और पुरस्कार आदि लिए जाते हैं.

मुश्किल तब पेश आती है जब पहली या दूसरी हेडलाइन विदेश की हो. उसे पढ़वाने के बाद वापस देश लौटा जाये या विदेशों के ग़ैर-ज़रूरी आइटम पढ़वाए जायें? यह फ़ैसला करने की सलाहियत धीरे-धीरे, समय के साथ ही आती है और जब तक नहीं आती, तब तक किसी से पूछकर फ़ैसला करने में शर्म की कोई बात नहीं है. हाँ, किससे पूछना है, यह फ़ैसला ज़रूर थोड़ा सोच-समझ कर करना चाहिए. वरना ऐसा भी हो सकता है कि .......अंधेहि अंधे ठेलिया दून्येउ कूप पडंत.

बंचिंग के सिलसिले में एक बात याद आ रही है, बताती चलूँ. हमारे एक काफी वरिष्ठ सहयोगी ने एक दिन मुझे दिन में तीन बजे का बुलेटिन बनाकर दे दिया. वरिष्ठता के अभिमान में मेरे साथ स्टूडियो नहीं गये. पाँच मिनट के बुलेटिन में दो मुख्य समाचारों के बाद पाँच आइटम लगातार दुर्घटनाओं के थे. कहीं रेल पटरी से उतर गयी, कहीं ट्रैक्टर से भिड़ गयी और कहीं पटरी पार कर रहे लोगों को कुचल गयी. बुलेटिन रिहर्स करते हुए मुझे बहुत ही अटपटा लग रहा था, लिहाज़ा मैंने समाचारों को इस तरह जमा लिया कि एक दुर्घटना के बाद किसानों या आम नागरिकों के हित की कोई बात आ जाये और तब दूसरी दुर्घटना हो.

बुलेटिन पढ़ने के बाद जब मैं समाचार कक्ष में आयी तो उन्होंने मुझे फटकारा - हमने आपको बुलेटिन लगाकर दिया था. आपने क्रम क्यों बदला?

मैंने कहा - सर, ऐसा लग रहा था जैसे देश भर की गाड़ियों ने तय कर लिया था कि आज हम अपनी मनमानी करेंगी और आकाशवाणी के बुलेटिनों में छायी रहेंगी. इसलिए मैंने बीच-बीच में कुछ और समाचार ले लिए.

बड़े नाराज़ हुए .... आपको कुछ पता भी है हमने मैचिंग मिलाकर दिया था.

अब बताइये, मैं उनकी मैचिंग तोड़ने पर डांट कैसे नहीं खाती?

एक बात और कहना चाहूंगी. तमाम शिक्षण संस्थान और लम्बे-चौड़े डिग्री कोर्स जो बातें दो-तीन सालों में नहीं सिखा पाते, वह समाचार कक्ष में सिर्फ दूसरों की बातें सुनने से सीखा जा सकता है. मैं जब कैज़ुअल ड्यूटी करती थी, तब समाचार कक्ष के युवा तुर्क - राजेंद्र चुघ बुलेटिन पढ़कर लौटने के बाद अक्सर उसकी और संपादक दोनों की धज्जियाँ उड़ाते थे. पहले-पहल तो उनका रौद्र रूप देखकर मैं काफी सहम गयी थी. लेकिन बाद में देखा कि उनकी आपत्तियों में दम होता था. वे जो भी कहते थे, किसी व्यक्ति विशेष की आलोचना न होकर केवल बुलेटिन को बेहतर बनाने का प्रयास होता था. क्योंकि जिस व्यक्ति पर वे अभी-अभी इतना चिल्ला रहे थे, दस मिनट बाद उसी के साथ चाय पीते देखे जा सकते थे.

तनाव भरे माहौल को हल्का और ख़ुशगवार बनाना कोई हरी संधू से सीखे. बैठे- बैठे ऐसी फुलझड़ी छोड़ते हैं hari sandhu कि जिस पर निशाना साधा गया हो, वह भी दूसरों के साथ हँसे बिना नहीं रह पाता. हमारी एक नयी सहयोगी आयी थीं जो बहुत ही दुबली-पतली थीं. कुर्सी पर बैठी कुछ काम कर रही थीं.

संधू बंधू उनकी कुर्सी के पीछे खड़े होकर बोले -  शुभ्रा जी.

मैंने कहा - आहो जी.

आसमान की तरफ निगाहें उठाकर बोले - ख़ुदा दी शान ...

शेर के पहले मिसरे की तरह मैंने दोहराया - ख़ुदा दी शान..

उन्होंने सहयोगी की तरफ हाथ दिखाकर कहा- तिनके विच जान ....

सबके साथ वह सहयोगी भी हँस पडीं. इसी तरह ड्यूटी पूरी होने के बाद जब कोई सहयोगी जाने की बात करता है , तो संधुजी बड़ी गंभीरता से कहते हैं - अरे, चल दिये? दो- चार दिन तो रह लेते.

और अगर कोई दो-तीन बार जाने को कह कर भी रवाना नहीं होता, तो बड़े भोलेपन से पूछ लेते हैं - ते फेर त्वाडे लाई मंजी पवावां (तो फिर तुम्हारे लिए पलंग बिछवा दूं )? 

और जाने वाला बेचारा खिसियानी हँसी हँसता हुआ रवाना हो ही जाता है.

इससे पहली की कडियों को एक साथ पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए।

Monday, July 11, 2011

महिला और युवा वर्ग के कार्यक्रमों की साप्ताहिकी 10.7.11

पिछले लगभग दो दशको से ही विविध भारती पर महिलाओं के लिए अलग से कुछ कार्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं जिनमे से पहला नियमित कार्यक्रम सखि-सहेली सात वर्ष पहले ही शुरू हुआ। दोपहर बाद 3 बजे से 4 बजे तक सोमवार से शुक्रवार तक इसका प्रसारण होता हैं। सोमवार से गुरूवार तक हर दिन दो प्रस्तोता सखियाँ आपस में बतियाते हुए इस कार्यक्रम को आगे बढाती हैं। इस सप्ताह प्रस्तोता सखियाँ रही - रेणु (बंसल) जी, शेफाली (कपूर)जी, शहनाज (अख्तरी) जी, निम्मी (मिश्रा) जी और इस बार तीसरे प्रस्तोता की तरह प्रस्तुतकर्ता डा रेखा (वासुदेव) जी भी पधारी।

सामान्य बाते की गई और कुछ छोटी-मोटी सलाहे भी दी जैसे बारिश के मौसम में साफ़ सफाई रखे,खाने-पीने की देखभाल करे, पानी उबाल कर पिए, एक सलाह अच्छी रही कि पीने के पानी में फिटकरी चलाए जिससे थोड़ी देर बाद गंदगी नीचे जम जाएगी। एक खबर यह थी कि अन्टार्कटिका से आए एक पक्षी का ऑपरेशन कर उसमे से रेत निकाली गई, इसी पर पर चर्चा करते हुए बताया कि चरने वाले पशुओं के पेट में प्लास्टिक भी चला जाता हैं आगे इसी चर्चा से प्लास्टिक के उपयोग को कम करने की सलाह भी दी। पर्यावरण की सुरक्षा, शिक्षा का महत्त्व बताया और परीक्षा के परिणाम घोषित होने के इस समय को ध्यान में रखते हुए असफलता से घबराना नही बल्कि सफलता के लिए प्रयत्न करने चाहिए जैसी महत्त्व की बाते भी बताई गई, घर की सजावट पर भी चर्चा हुई। सखियों ने भी पत्रों के माध्यम से कुछ बाते लिख भेजी जैसे माँ का महत्त्व। सखियों की पसंद पर नए पुराने गीत सुनवाए गए जिनमे से कुछ फरमाइशी गीत मौसम के अनुसार थे।

सोमवार को श्रोता सखियों से प्राप्त पत्रों से कचौरी और दाल की मुठिया बनाना बताया गया। एक सखि ने पनीर से सम्बंधित विस्तृत जानकारी लिख भेजी। पुराने गीत सुनवाए - मिलन, आँखे, आप की परछाइयां, अनपढ़, फागुन, आया सावन झूम के फिल्म का शीर्षक गीत और सावन फिल्म का गीत - भीगा भीगा प्यार का समां बता दे तुझे जाना हैं कहाँ। मंगलवार को युवा सखियों के लिए अर्थ शास्त्र में बी ए विषय लेकर कैरिअर बनाने की जानकारी दी। युवा सखियों के लिए नई फिल्मे सिंग इज किंग, फरेब, रब ने बना दी जोडी के गीत सुनवाए, दिल तो पागल हैं और यह दिल आशिकाना हैं फिल्मो के शीर्षक गीत भी सुनवाए और गुरू फिल्म का गीत बरसों रे मेघा नन्ना रे भी शामिल था। इस तरह इस दिन का प्रसारण सिर्फ लड़कियां ही नही समूचे युवा वर्ग के लिए उपयोगी रहा। बुधवार को स्वास्थ्य और सौन्दर्य के लिए काजल, लिपिस्टिक के प्रयोग में सावधानी बरतने की सलाह दी। चेहरे के धब्बे आदि से सम्बंधित कुछ पुराने नुस्के थे। कुछ पुरानी फिल्मो जूनून, लैला मजनूं, आशा, दो रास्ते के गीत सुनवाए और यलगार फिल्म का यह गीत भी सुनवाया - आखिर तुम्हे आना हैं ज़रा देर लगेगी। गुरूवार को विशेष रहा, गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास आँख की किरकिरी का अगला अंश ममता (सिंह) जी ने पढ़ कर सुनाया। पिछले अंशो को भी संक्षिप्त में बताया ताकि निरन्तरता बनी रहे। सफल महिला की गाथा में प्रेमा पूरब के बारे में जानकारी दी जो बचपन में स्वास्थ्य के कारण सामान्य नही थी। फिर स्वाधीनता के संघर्ष में लगे सेनानियों को भोजन पहुंचाने का काम करने लगी और साथ सन्देश भी पहुंचाती थी। इसके बाद चालीस और पचास के दशक में महिला मजदूरों को गर्भवती होने पर काम से हटा दिया जाता था। तब इन मजदूर महिलाओं के साथ मिलकर खाना बना कर मजदूरो तक पहुंचाने का काम शुरू किया जिससे उन महिलाओं को अच्छी आय होने लगी। यह काम आज भी कई महिलाएं करती हैं। प्रेरणादायी रहा यह प्रसंग। यह जानकारी भरा आलेख और मंगलवार का करिअर सम्बन्धी आलेख उन्नति (वोरा) जी ने तैयार किया था। इस दिन नई फिल्म रावण का यह गीत भी सुनवाया जो कम ही सुनवाया जाता हैं - बहने दे मुझे बहने दे घनघोर घटा, इसके साथ कृष्णा कॉटेज, डर फिल्मो के गीत सुनवाए और यह लोकप्रिय गीत भी सुनवाया - हमको सिर्फ तुमसे प्यार हैं।

रेखा जी ने कहा कि कार्यक्रम सम्बंधित सुझाव भेजे जा सकते हैं, हमारा सुझाव हैं पत्र कुछ कम पढ़िए। इस सप्ताह भी पत्र अधिक ही रहे। श्रोता सखियाँ तो पत्र लिखती ही रहती हैं, बाते भी कुछ ख़ास नही रहती, वही सुनी-सुनाई बाते जिससे कार्यक्रम संतुलित नही लगता। हमारा अनुरोध हैं कि सिर्फ गुरूवार के बजाए चारो दिन उपन्यास वाचन रखिए जिससे संतुलन बना रहेगा।

शुक्रवार को यह फोन-इन-कार्यक्रम के रूप में हैलो सहेली शीर्षक से प्रसारित होता हैं। इसका उप शीर्षक अच्छा हैं -सखियों के दिल की जुबां - हैलो सहेली। वाकई लगता हैं सखियाँ दिल से बात करती हैं। इस बार कुल 9 फोन कॉल थे। सखियों से फोन पर बातचीत की निम्मी (मिश्रा) जी ने। दो फोन कॉल बहुत प्रेरणादायी रहे। एक सखि ने बताया कि वह अध्यापिका हैं, बच्चो को सभी विषय पढ़ाती हैं और साथ ही घर भी संभालती हैं, दूसरा कॉल ज्यादा अच्छा रहा, श्रोता सखि ने बताया कि उसने घर को सहयोग देने के लिए पढाई छोड़ दी थी पर अब कॉलेज की पढाई जारी रखे हैं, एक-दो गृहणियों ने बात की, एक-दो कामकाजी महिलाओं ने बात कि जो ब्यूटी पार्लर और सिलाई का काम करती हैं, एक-दो स्कूल की लड़कियों ने भी बात की जिसमे से एक ने सत्तर के दशक की फिल्म आराधना का यह गीत सुनने की फरमाइश की - कोरा कागज़ था जीवन मेरा, एक-दो ने बहुत ही कम बात की, एक ने अमर अकबर एंटोनी फिल्म की क़व्वाली सुननी चाही तो अच्छा लगा क्योंकि आजकल क़व्वालियों की फरमाइश कम ही आती हैं। एक सखि ने कहा कि उसका भाई उससे दूर हैं जिसे वह यह गीत समर्पित करना चाहती हैं - चन्दा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे पर शायद निम्मी जी ठीक से सुन नही पाई और तुरंत काजल फिल्म के गीत के बारे में कहा और सुनवाया भी वही गीत - मेरे भैया मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन। इस कार्यक्रम को माधुरी (केलकर) जी के सहयोग से प्रस्तुत किया गया, तकनीकी सहयोग स्वाति (भंडारकर) जी का रहा। अंत में बताया कि इस कार्यक्रम के लिए बुधवार को दिन में 11 बजे से फोनकॉल रिकार्ड किए जाते हैं जिसके लिए नंबर बताया 28692709 और मुम्बई का एस टी डी कोड 022

शनिवार को रात 7:45 पर 15 मिनट के लिए प्रसारित हुआ सामान्य ज्ञान का साप्ताहिक कार्यक्रम जिज्ञासा जिसका उपशीर्षक बढ़िया हैं - ज्ञान की रेडियो एक्टिव तरंग। यह कार्यक्रम सभी वर्ग के श्रोताओं के लिए रूचिकर और युवा वर्ग के लिए उपयोगी हैं। इस बार पहला स्तम्भ रहा स्पोर्ट्स पेवेलियन जिसमे भारतीय महिला हॉकी टीम के विश्व में शीर्ष 10 में आने की खबर दी साथ ही हाल ही में हुए विम्बलडन की भी जानकारी दी। दूसरा स्तम्भ रहा - फिटनेस मंत्रा जिसमे एक शोध अध्ययन की जानकारी देते हुए बताया कि नींद सेहत के लिए बहुत जरूरी हैं। तीसरा और अंतिम स्तम्भ रहा - टाइम मशीन - समय यात्री जिसमे जाने-माने निर्देशक मणिकौल पर जानाकारी दी। पिछले दिनों उनका निधन हुआ। बताया कि उन्होंने लीक से हट कर फिल्मे बनाई - आषाढ़ का एक दिन जो जाने माने हिन्दी लेखक मोहन राकेश के नाटक पर आधारित हैं, उसकी रोटी, दुविधा जिसके दुबारा पहेली नाम से अमोल पालेकर द्वारा बनाने की भी जानकारी दी। हम यहाँ एक और बात बता देते हैं कि उसकी रोटी भी मोहन राकेश की कहानी पर आधारित हैं। इस तरह इस बार भी यह कार्यक्रम दूर-दराज के श्रोताओं के लिए अधिक उपयोगी और शहरी श्रोताओं से कुछ दूर ही लगा। मुझे लगता हैं अगर प्रश्न पूछे जाए और श्रोताओं से उत्तर देने के लिए कहा जाए तो शायद शहरी युवा इससे जुड़े। शोध, आलेख और स्वर युनूस (खान) जी का रहा। सम्पादन किया पी के ए नायर जी ने और इसे प्रस्तुत किया विजय दीपक छिब्बर जी ने।

चलते-चलते हम आपको बता दे कि यह सभी कार्यक्रम हमने हैदराबाद में एफ़ एम चैनल पर 102.8 MHz पर सुने।

Saturday, July 9, 2011

मेरी ज़िंदगी का नमक... रेडियो

आकाशवाणी इन्दौर के वरिष्ठ प्रसारणकर्ता नरहरि पटेल की यादें

रेडियोनामा के बदले स्वरूप को जारी रखते हुए कोशिश है कि रेडियो से जुड़े लोगों की उस पूरी जमात से संवाद बने जो किसी न किसी रूप में प्रसारण-विधा से जुड़े रहे हैं, चाहे वे एनाउंसर्स हों,प्रोड्यूसर,समाचार वाचक, कमेंट्रेटर्स, अभियंता, गायक, संगीतकार या वे तमाम लोग जो अतिथि कलाकार के रूप में आकाशवाणी केन्द्रों में आते रहे और महत्वपूर्ण प्रसारणों का हिस्सा बने रहे।

इसी सिलसिले में आज रेडियोनामा पर नमूदार हो रहे हैं आकाशवाणी इन्दौर के सुपरिचित स्वर नरहरि पटेल। नरहरिजी की शख़्सियत अपने में बहुतेरी विधाओं को समेटे हुए है जिसमें कवि, रंगकर्मी, रेडियो प्रसारणकर्ता, लेखक और मालवा का लोक संस्कृतिकर्म शामिल है। नरहरिजी इप्टा से जुड़े रहे हैं और आकाशवाणी इन्दौर जिसे मालवा हाउस के रूप में भी जाना जाता है उसकी स्थापना के समय से उनका आत्मीय राब्ता रहा है। आइये आज रेडियोनामा रूबरू होते हैं नरहरि पटेल की रेडियो यादों के साथ...


आज जब रेडियोनामा के ज़रिये आपसे रूबरू हूँ तो ज़िंदगी के वे तमाम ख़ूबसूरत पल याद आ जाते हैं जो मैंने आकाशवाणी इन्दौर में यानि मालवा हाउस की दीवारों के बीच गुज़ारे हैं। हर पल शब्द और स्वर से गूँजते मालवा हाउस के दरो-दीवार मध्यप्रदेश में प्रसारण की पुरातन परम्परा के दस्तावेज़ हैं। आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है जैसे एक बार फिर मैं मालवा हाउस के स्टुडियो के माइक्रोफ़ोन के सामने आ खड़ा हुआ हूँ।

म.प्र.की सांस्कृतिक और व्यावसायिक राजधानी इन्दौर में आकाशवाणी का केन्द्र शुरू हुआ २२ मई १९५५ के दिन। पहले यह परिसर ग्वालियर हाउस कहलाता था लेकिन इसमें
आकाशवाणी इन्दौर की शुरूआत होते ही इसे नाम दिया गया मालवा हाउस। वही मालवा हाउस जिसे इलाचंद्र जोशी,कर्तारसिंह दुग्गल,प्रभागचंद्र शर्मा,शरद जोशी,रमेश बक्षी,वीरेन्द्र मिश्र,उस्ताद अमीर ख़ाँ,पं.कुमार गंधर्व, उस्ताद रज्जब अली ख़ाँ जैसे कलावंतों के सुकर्म,विचार और चिंतन का स्पर्श मिला।

आकाशवाणी में प्रवेश की कहानी बड़ी रोचक है। मैं उन दिनों इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ रहा था। वही संस्थान जिसमें विख्यात पार्श्व गायक किशोर कुमार, आकाशवाणी के पूर्व निदेशक अमृतराव शिंदे "अमन' और जाने-माने पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक भी पढ़े। रतलाम ज़िले की छोटी सी रियासत सैलाना से मैट्रिक पास करने के बाद मैं इन्दौर चला आया। घर में कविता,संगीत, साहित्य और रंगकर्म का ख़ासा माहौल था और मैं विद्यार्थी के रूप में अपने स्कूल के नाटकों और संगीत प्रस्तुतियों में हमेशा अगुआ रहता॥ यहाँ भी जिस मोहल्ले में आकर रुका वहाँ जानेमाने संगीतकारों के कुनबों की रिहाइश थी जिसमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय हैं उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब।

बहरहाल,एक दिन शाम को मैं इन्दौर के एक भोजनालय में पहुँचा। आधा खाना खा चुका तब ही पास की टेबल पर भोजन करने वाले दो शख़्स कला साहित्य विषय पर बतिया रहे थे। उन्हें सुनने के लिए मैंने अपने भोजन की ऱफ़्तार धीमी कर दी। जैसे ही उन्होंने भोजन ख़त्म किया मै भी हाथ धोने के लिए खड़ा हुआ और उनमें से एक से परिचय पूछ बैठा ? सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी उस शख़्स ने कहा मुझे श्याम परमार कहते हैं। यहॉं आकाशवाणी केन्द्र शुरू करने आया हुआ हूँ। उन्होंने मेरे बारे में जानकारी लेना शुरू की और जैसे ही मैंने उन्हें बताया कि मैं क्रिश्‍चियन कॉलेज में पढ़ रहा हूँ और नाटक, कविता तथा लोक संगीत में रूचि रखता हूँ तो श्यामजी गदगद हो गए और यक़ीन मानिये बिना हाथ धोए उन्होंने मुझे बाहों में भरकर कहा अरे भाई आप जैसे लोगों को ही तो ढूँढ रहा हूँ मैं। कल ही मालवा हाउस आ जाओ। इस वाक़ये से मैं यह बताना चाहता हूँ ये थी आकाशवाणी की पुरातन कार्य-संस्कृति जिसमें काम करने वाले लोग अपने संस्थान के काम को अपना काम समझते थे।

दूसरे दिन मैं हरे-भरे वृक्ष कुंजों से भरे परिसर वाले मालवा हाउस में था। स्टूडियो बन रहा था। श्याम परमार एक छोटे से कमरे में बैठे थे। वे मुझे उन दिनों निर्माणाधीन स्टुडियो में लेकर गये और हाथ में दे दी एक छोटी सी स्क्रिप्ट.बमुश्किल चार या पॉंच डायलॉग्स मैंने पढ़े होंगे और स्टूडियो में श्यामजी की आवाज़ गूँजी, उन्होंने कहा बस ! हो गया। वे मुझे अपनी टेबल तक ले गए और अपनी एक पुरानी कॉपी में से एक पन्ना फाड़कर मुझे कहा कि इस काग़ज़ पर स्वर परीक्षण के लिए एक चार पंक्ति का आवेदन लिख दीजिये क्योंकि तब तक मालवा हाउस में विधिवत कॉन्ट्रेक्ट फ़ॉर्म भी छपकर नहीं आये थे। कुछ दिनों बाद मुझे आकाशवाणी इन्दौर से पहला अनुबंध पत्र मिला। आधे घंटे का एक नाटक था जिसका पारिश्रमिक मुझे मिला पन्द्रह रुपये। सच कहूँ आज भी वे पन्द्रह रुपये बहुत अनमोल ख़ज़ाने की तरह याद आते हैं। बाद में मुझे मराठी की जानी-मानी अभिनेत्री सुमन धर्माधिकारी के साथ एक घंटे के लाइव प्रसारण का मौक़ा मिला। ये नाटक उज्जैन के राजा भृतहरि और उनकी रानी पिंगला पर एकाग्र था। तब मालवा हाउस तक रेकॉर्डिंग की मशीने नहीं पहुँची थीं सो सुमन ताई और हमने इस नाटक को लाइव किया। मालवा हाउस से ही ओम शिवपुरी, सुधा शर्मा(बाद में शिवपुरी) राजीव वर्मा, नंदलाल शर्मा, अशोक अवस्थी जैसे कई उन कलाकारों की आवाज़ रेकॉर्ड हुई जो बाद में फ़िल्म और टीवी के सुपरिचित चेहरे बने। मेरा सौभाग्य की कहीं न कहीं मैं इन कलाकारों के साथ काम कर पाया।
जारी...
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Wednesday, July 6, 2011

आकाशवाणी की 'सिग्‍नेचर-ट्यून' की कहानी


रेडियोनामा पर हर दूसरे बुधवार मशहूर समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा की श्रृंखला चल रही है 'न्यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा'। हर दूसरे बुधवार मैं 'अग्रज पीढ़ी' नामक एक ऑडियो-श्रंखला लिख रहा हूं। जिसका मक़सद रेडियो में अपना अमूल्‍य योगदान करने वाले पुरानी पीढ़ी के लोगों को याद करना। चूंकि ऑडियो-श्रृंखला है, इसलिए ध्‍वनि जरूर होती है इसमें। चाहे इंटरव्‍यू हो या गीत या संकेत-ध्‍वनि। इस बार आकाशवाणी की संकेत-ध्‍वनि की दास्‍तान।

तब कितनी सुहानी होती थी हर भोर। वो भोर जिसका आग़ाज़ रेडियो पर ‘संकेत ध्वनि’ के साथ होता था।
आकाशवाणी की ‘संकेत-ध्‍वनि’। हर सुबह का एक ख़ास गूंजता हुआ आरंभ बरसों-बरस तक होता रहा। तब ये आवाज़ अनगिनत घरों में गूंजा करती थी। तब वॉल्‍व वाले बड़े-बड़े रेडियो-सेट होते थे। और हां, तब के रेडियो की लोकप्रियता आज के टी.वी. से कहीं ज़्यादा थी। दुनिया रेडियो को एक जादुई और आकर्षक माध्‍यम मानती थी।

आज हो सकता है कि रेडियो सुनने वाले घरों की तादाद कम हो गयी हो। पर आकाशवाणी की संकेत-ध्‍वनि कायम है। इसके बाद होता है ‘वंदे मातरम्’ और ‘मंगल-ध्‍वनि’। सचमुच अनमोल है वो आवाज़। अफ़सोस कि आकाशवाणी के जो केंद्र अब चौबीस घंटे चलते हैं, यानी जहां अलग से सुबह, दोपहर या शाम की सभाएं नहीं होतीं, वहां से ये ‘सिग्‍नेचर-ट्यून’ नहीं बजाई जाती। क्‍योंकि अब वहां प्रसारण कभी बंद नहीं होता, अबाध रूप से जारी रहता है। विविध-भारती ऐसे स्‍टेशनों में से एक है। आज कई लोगों के मोबाइल पर इसे ‘रिंग-टोन’ के रूप में सुनता हूं तो आश्‍चर्य‍मिश्रित हर्ष होता है। लेकिन क्‍या कभी आपने सोचा कि आकाशवाणी की संकेत ध्‍वनि का क्‍या इतिहास है।

आम धारणा ये है कि इस संकेत-ध्‍वनि को पंडित रविशंकर या फिर पंडित वी.जी.जोग ने बनाया। लेकिन येkaufmann सच नहीं है। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि ठाकुर बलवंत सिंह ने सन 1936 में आकाशवाणी की इस संकेत धुन को बनाया था। ये भी सच नहीं है। तो फिर सच क्‍या है। दरअसल आकाशवाणी की इस अनमोल, कलाजयी, अनूठी और असाधारण ‘सिग्‍नेचर-ट्यून’ को बनाया था चेकोस्‍लोवाकिया में जन्‍मे कंपोज़र वॉल्‍टर कॉफमैन ने। तीस के दशक में वॉल्‍टर कॉफमैन मुंबई आकाशवाणी के वेस्‍टर्न म्‍यूजिक डिपार्टमेन्‍ट में कंपोज़र का काम कर रहे थे। उसी दौरान उन्‍होंने ये ट्यून बनाई थी। इस धुन में आपको तानपूरा, वायलिन और वायोला सुनाई देता है। संगीत के कुछ विद्वान तो ये भी कहते हैं कि इस धुन में ब्रह्मांड में गूंजते ओंकार-नाद का सा स्‍वर है। और ये बात सही भी लगती है। तो चलिए इसे सुना जाए। और आनंदलोक की सैर की जाए।

आपको ये भी बता दें कि असल में वॉल्‍टर कॉफमैन पश्चिमी क्‍लासिकी संगीत की एक बड़ी हस्‍ती थे। उनके एक ‘सोनाटा’ में ये धुन शामिल थी। बाद में इसे काटकर आकाशवाणी की संकेत-ध्‍वनि बना दिया गया। कहते हैं कि कॉफमैन ने बाद में इसमें थोड़ा बदलाव भी किया था। अपनी खोज-बीन में मुझे ये भी पता चला कि इस धुन में वायलिन मेहली मेहता ने बजाया था, जो विश्‍व-प्रसिद्ध ऑकेस्‍ट्रा कंडक्‍टर ज़ूबिन मेहता के पिता थे।

वॉल्‍टर काफमैन का जन्‍म एक अप्रैल 1907 को कार्लोवी-वैरी, बोहेमिया, चेकोस्‍लोवाकिया में हुआ था। वो ना केवल कंपोज़र, कंडक्‍टर और संगीत-शास्‍त्री थे बल्कि संगीत-शिक्षक भी रहे। संगीत की शुरूआती तालीम उन्‍होंने कार्लोवी-वैरी के Staatsrealgymnasium में ली। 1926 में उन्‍होंने बर्लिन के Staatlich Hochschule für Musik से मैट्रिक किया। ग्रैजुएशन के बाद उन्‍होंने प्राग यूनिवर्सिटी में संगीत की अपनी पढ़ाई जारी रखी। हालांकि उन्‍होंने उस दौर में संगीत में शोध की तैयारी पूरी कर ली थी। पर राजनीतिक उथल-पुथल ने उनका ये सपना पूरा नहीं होने दिया।

1927 से 1933 तक काफमैन बर्लिन, कार्लोवी-वैरी, एगर और बोहेमिया में ओपेरा कंपोज़ करते रहे। उसके बाद सन 1935 से 1946 तक ग्‍यारह साल उन्‍होंने भारत में बिताए। भारत में शुरूआती दो साल वो मुंबई की एक फिल्‍म-कंपनी में संगीतकार रहे। इस दौरान उन्‍होंने बॉम्‍बे चैम्‍बर म्‍यूजिक सोसाइटी में बतौर म्‍यूजिक-डायरेक्‍टर भी काम किया। इसके बाद 1937 से लेकर 1946 तक वॉल्‍टर काफमैन ऑल इंडिया रेडियो बंबई में डायरेक्‍टर ऑफ म्‍यूजिक बन गए। आखिरी दो साल उन्‍होंने मुंबई के सोफ़ाया कॉलेज में भी पढ़ाया। सन 46 में वो इंग्‍लैन्‍ड चले गए। और बी.बी.सी. लंदन में गेस्‍ट-कंडक्‍टर बन गए। इसके बाद सन 1947 में हैलिफैक्‍स कन्‍ज़रवेट्री ऑफ़ म्‍यूजिक नोवा स्‍कॉशिया कनाडा में वो पियानो विभाग के हेड बन गए । आगे के साल उन्‍होंने अलग अलग संस्‍थानों में पढ़ाते हुए बिताए। सन 1957 में काफमैन स्‍थाई रूप से अमेरिका चले आए। और इंडियाना यूनिवर्सिटी ब्‍लूमिंगटन में संगीत के प्रोफेसर बन गए।

भारत में काफमैन ने अपना ज्यादातर वक्‍त भारतीय संगीत पद्धति का अध्‍ययन करने में बिताए। भारतीय शास्‍त्रीय संगीत का असर उन पर काफी गहरा था। पूर्वी और पश्चिमी शैलियों के मिश्रण से उन्‍होंने एक नई शैली रची। वो ख़ासतौर पर ओपेरा और पश्चिमी ऑर्केस्‍ट्रल म्‍यूजिक की जानी मानी हस्‍ती थे। भारत में रहते हुए उन्‍होंने संगीत पर काफी लिखा। उनकी पुस्‍तक ‘रागाज़ ऑफ नार्थ इंडिया’ भारतीय शास्‍त्रीय संगीत पर एक बेहद महत्‍वपूर्ण किताब मानी जाती है।

तो कितनी दिलचस्‍प है आकाशवाणी की सिग्‍नेचर-ट्यून की ये कहानी। इस मायने में तो और भी...कि इसे एक भारतीय संगीतज्ञ ने नहीं बनाया, लेकिन इसकी विलक्षणता, दिव्‍यता और भारतीयता पर भला कोई कैसे सवाल उठा सकता है। कितनी कितनी संस्‍कृतियों, कितने व्‍यक्तित्‍वों...कलाकारों, तकनीशियनों, लेखकों सबसे मिलकर समृद्ध हुआ है हमारा रेडियो।

(लखनऊ से छपने वाले जन-संदेश टाइम्‍स में प्रकाशित)

Saturday, July 2, 2011

रेडियो की यादें--वेंकटाद्रि ब्रह्मान्‍डम की कलम से

वेंकटाद्रि ब्रह्मान्‍डम हैदराबाद में रहते हैं और वर्चुअल-दुनिया के हमारे मित्र हैं।
रेडियो और संगीत से उनका जुड़ाव ही इस मित्रता का सूत्र है। वो विविध-भारती और रेडियो सीलोन के पक्‍के श्रोता हैं। वेंकट एक चलते-फिरते एनसाइक्‍लोपीडिया हैं।
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उनके पास पुराने गीतों का एक ज़बर्दस्‍त संग्रह है, जिसे वो अपने पास महदूद करके नहीं रखते। बल्कि खुले मन से सबके साथ शेयर करते हैं। फेसबुक पर पुराने गानों की उनकी पोस्‍टें बेहद लोकप्रिय हैं।

वेकंट आंध्रप्रदेश के तेनाली में पैदा हुए। तेनाली और हैदराबाद में पढ़े। आंध्र यूनिवर्सिटी विशाखापट्टनम से उन्‍होंने मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और XLRI जमशेदपुर से MBA किया। कई मशहूर कॉरपोरेट कंपनियों में शीर्ष पदों पर काम कर चुके वेंकट बेहद सादा और सरल व्‍यक्ति हैं। रिटायर होने के बाद वे पुराने संगीत और ख़ासतौर पर मोहम्‍मद रफ़ी के गीतों के साथ अपना वक्‍त बिताते हैं। रफ़ी के बड़े भक्‍तों में वेंकट जी का नाम सबसे ऊपर आएगा। वेंकट ने बताया कि उनकी बेटी और उनकी पत्‍नी भी पुरानी फिल्‍मों के संगीत की शौकीन हैं।

ये संक्षिप्‍त-आलेख वेंकट जी ने हमारे अनुरोध पर लिखा है। चूंकि वेंकट हिंदी में नहीं लिखते इसलिए उनके लिखे को मूल रूप में आप तक पहुंचाया जा रहा है। इसके साथ ही रेडियोनामा पर अंग्रेज़ी पोस्‍टों का सिलसिला भी शुरू हो रहा है। वेंकट के इस आलेख पर अपनी राय ज़रूर दीजिएगा। अगर आप भी अपनी यादें या रेडियो के किसी मुद्दे पर लिखना चाहते हैं तो संपर्क कीजिएगा।

I am a man of mid-fifties. I am from a place called Tenali in Guntur District of Andhra Pradesh!! Ours is a traditional Brahmin family and all our family members are keen connoisseurs of fine art such as music, literature, etc.

In late fifities and the whole of sixties and seventies, there used to be a happiness in shortage!!! Especially in entertainment media!!! In stark contrast, today, there is utter chaos and agony in the plethora of mushrooming entertainment media!!!

For me, the late fifties, the whole of sixties and seventies were the Platinum Era of music and also the Golden Era of the Radio!! If I recall hard, I remember it is the year 1959 that induced me to Radio. I was just about 5 years then!! My father and elder brother used to switch on Radio and keep it switched on continuously!! But, it was I who used to get to hear it mostly, sometimes from near and sometimes from far, while playing, reading, etc.!!!

Actually, during the forties, fifties and sixties, Radio played a pivotal role in exposing the tasteful musical ears of the South Indians to the innumerable gems of songs from Hindi films and also to their many talented singers and Music Directors!!! Please notice that I did not mention ‘Lyricists’ as we never understood anything much in the Hindi/Urdu lyrics those days!! I can say we used to enjoy any great song immensely only based on its musical value: a) Tune of the song, b) Singing of the singer and c) The musical preludes and interludes!!! In fact, though I can now understand lyrics, I still hold the view that I love all the old beauties 95% only for their musical value!!! For me, great lyrics make a difference of only 5 to 10%!! Well, that is a separate subject to discuss!!

So, there is no denying the fact that Radio played a significant role in popularizing Hindi songs and thereby Hindi Films among the non-Hindi-knowing public of South India!!!

Coming back to my encounter with Radio since 1959 or so, I must say that those days, Radio Ceylon used to rule the roost, as far as old Hindi songs were concerned!! It was a pity Akashavani did not enjoy this leadership throughout the forties and fifties! Even the newly and rather lately launched Vividhbharati could establish itself only by mid-sixties!!! In Radio Ceylon, there used to be a program from morning 7.30 AM to 8 AM consisting of old songs of that period!!! Then from 8 AM, there used to be a program of new songs of that period!!! Well, I used to treasure both the ‘old songs’ and ‘new songs’ of that period as both were of almost the same excellence!!! You know what I mean!! In Radio Ceylon, there used to be programs such as ‘Ek Hi Film Se’ and the flagship program used to be ‘Hamesha Jawan Geet’ that was aired from 10 PM to 11 PM on Sundays!!! Those were the golden days!!

Radio Ceylon had some top-notch announcers such as Manohar Mahajan!!!

When I try to recall some of the very first songs that I got to hear on Radio, I remember the likes of the title song of Dil Deke Dekho, Tadpaoge Tadpaalo from Film: Barkha, Main Rikhawala from Choti Behan, Dheere Dheere Chal Chand Gagan Mein from Love Marriage, Bole Yeh Dil Ka Ishara from Santan, Tumhe Yaad Hoga Kabhi Ham Mile Thhe from Satta Bazaar, Ajab Hai Dastaan Teri Ae Zindagi from Shararat, Khoya Khoya Chand from Kala Bazar, title song of Chaudhvi Ka Chand, Zinagi Bhar Nahi Bhoolegi Woh Barsat Ki Raat from Barsaat Ki Raat, etc.

I need to thank Radio form the bottom of my heart for one very important thing, ie. Introducing me to Mohammed Rafi!! Well, when I was so very young, I used to love the singers and their voices, but never even knew their names!! To be honest, it was Lata Mangeshkar’s voice that made a first impact on me!!! I used to wonder how any girl/woman can have such a sweet and such a shrill voice!! But, Mohammed Rafi Saheb gradually grew upon me over 3-4 years from 1959. It is a different matter he is still growing upon me more and more even today!!!

I distinctly remember one Rafi song of 1964 from Film: Cha Cha Cha on Radio!!! It is : “Subha Na Aayi Sham Na Aayi”!! Whenever that song used to start on Radio, I used to run from wherever I was and used to keep my ear touched to Radio and enjoy it!!! I used to be in heavens listening to the ups and downs (of pitch and scale) of that song in Rafi Saheb’s expressive, modulated voice!! Similarly, I used to do the same for ‘Jo Wada Kiya Woh Nibhana Padega’ and some songs of Tere Ghar Ke Samne-1963, etc.

And years progressed, platinum era of hindi film music ended with mid-seventies, lots of noises, sounds have become part of music, Besura voices started getting preference over sur-baddh voices!!! So, I thought Vividhbharati too would decline over years and keep pace with the decline of music, in general! But, fortunately for genuine music lovers like me, that did not happen!!! Vividhabharati continued to be the flag bearer of old Hindi film songs!! And it, by and large, continues so even today!!

And I steadfastly continue listening to Radio in the form of Vividhbahrati!! My day starts with the morning Tere Sur Aur Mere Geet and Bhoole Bisre Geet!!! I am also happy that even until today, Vividhbharati has some great announcers comparable to those of 50’s and 60’s of Radio Ceylon!! In the form of Kamal Sharma, Yunus Khan, Ashok Sunavane, Nimmi Misra, Renu Bansal, Mamta Singh, Kanchan Prakash Sanghi, etc.

Lastly, I recall what my late mother used to say about Radio!! She used to say the pleasure of listening to songs on Radio comes from the surprise factor of not knowing which song comes next!!! On your CD player or MP3 player, you do not get that pleasure!!!

Long live Radio and long live Vividhbharati (with the same quality, of course)!!!

Friday, July 1, 2011

विविध भारती के नाटक - साप्ताहिकी 26.6.11

हर दिन विविध भारती से रेडियो नाटक के विविध रूपों - नाटक, नाटिका, प्रहसन और झलकियों का प्रसारण हुआ। कलेवर के साथ विषय में भी विविधता रही। कुछ पुरानी ऎसी समस्याएँ भी रही जो आज भी समाज में हैं जैसे घरेलु नौकर की समस्या तो कुछ आज के मुद्दों का भी उल्लेख हुआ जैसे कन्या भ्रूण को नष्ट करना और सुविधाओं के दुरूपयोग पर भी सन्देश दिए गए। साथ ही मनोरंजन तो हुआ ही एकाध बार कमजोरियां भी नजर आई।

रात 8 बजे पुराना लोकप्रिय दैनिक कार्यक्रम हवामहल अपनी चिरपरिचित गुदगुदाती धुन के साथ 15 मिनट के लिए प्रसारित हुआ। इसमें झलकी ऐसा भी होता हैं सुन कर समझ में नही आया कि इसका उद्येश्य धर्म के प्रति आस्था जगाना हैं या अंध विश्वास बढ़ाना हैं। लखनऊ केंद्र की इस प्रस्तुति में पत्नी देवी माँ की पूजा करती हैं और बच्चो को भोजन के लिए बुलाती हैं, पति को इन बातो पर विश्वास नही। तभी उनका मुन्ना छत से नीचे गिरता हैं पर केले के ठेले पर गिरने के कारण बच जाता हैं। मुन्ने के बचने को ईश्वर का आशीर्वाद बताया जाता हैं। लेखक हैं के एल यादव और निर्देशिका चंद्रप्रभा भटनागर। एक झलकी मनोरंजन के लिए प्रस्तुत की गई - झगड़े की जड़। नोक-झोंक हैं, पति को समाचार सुनना हैं और पत्नी को गाने। पत्नी अपनी सहायता के लिए मौसेरे भाई को बुला लेती हैं जो पक्का गाना गाता हैं, पति इससे तंग आकर एक शायर साहब को बुला लेते हैं जो जोर-जोर से शेर सुनाते हैं। जाहिर हैं सब तंग आ जाते हैं अंत में पत्नी समाचार सुनती हैं जिसमे बताया जाता हैं कि महिला सशक्तिकरण के लिए जो पुरूष महिला को तंग करेगा उसे सजा होगी, पति गाने सुनने का फैसला कर लेता हैं। ज्यादा मजा नही आया पर थोड़ा नयापन रहा। भोपाल केंद्र की इस प्रस्तुति को निर्देशित किया अजुमुद्दीन ने और लेखक हैं संतोष श्रीवास्तव। दिल्ली केंद्र द्वारा प्रस्तुत झलकी मिल गया नौकर में समस्या भी रही मनोरंजन भी। मैनेजर साहब नए आए हैं, पास-पड़ोस में जान-पहचान के लिए पार्टी रखी हैं। पार्टी में नौकर को एक युगल लालच देकर अपने घर ले जाने के लिए खींच रहे। महानगरो में घरेलु नौकर न मिल पाने की समस्या की यह हद हैं। इसीसे नौकरो के भी ठाठ हैं। समय पर नौकर नही पहुंचा तो वह खुद ही सर्व करने लगे। मेहमानों ने उन्हें नौकर समझ लिया। बाद में बना-ठना नौकर आया तो सबने उसे मैनेजर समझा। वी एम आनंद लेखक हैं और निर्देशक हैं कमल दत्त। अगले ही दिन दिल्ली केंद्र की दूसरी प्रस्तुति रही - सस्ता बाजार। इसमे आधुनिक मशीनी युग की हास्य झलक दिखाने की कोशिश की गई। पति की लाई हर चीज पत्नी को महंगी लगती हैं। एक बार पति ऐसे बाजार में जाता हैं जहां सब सस्ता हैं इसीसे बहुत सी चीजे खरीद लेता हैं। बाद में सपना देखता हैं कि उसे गिरफ्तार किया गया हैं और आधुनिक मशीनी युग में यह देखा जा रहा हैं कि उसने कितना वजन उठाया हैं, उसका वजन कितना हैं और ऊंचाई क्या हैं वगैरह... ममता गुप्ता की लिखी इस झलकी में बात कुछ स्पष्ट नही हुई। निर्देशक हैं विजय दीपक छिब्बर।

मूल हिन्दी रचनाओं के अलावा मराठी भाषा से भी एक रचना प्रस्तुत हुई। यह झलकी - चोरों को आना चाहिए, आमंत्रित श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत की गई थी। मूल मराठी लेखक हैं वसंत सबनीस जिसका हिन्दी रेडियो नाट्य रूपांतर किया वसंत देव ने। गहनों का बीमा करवाया जाता हैं और पति यह सोचता हैं कि गहने चोरी होने पर आज की सोने की कीमत से बीमे की रक़म का भुगतान होगा, इस तरह अच्छा लाभ मिलेगा। चोरो की प्रतीक्षा करता हैं और एक दिन चोर आते भी हैं पर नक़द रक़म पूछते हैं, जब वह गहने ले जाने की बात कहता हैं तब चोरो को लगता हैं कि गहने नकली हैं और वे बिना कुछ लिए चले जाते हैं। इसके कलाकार हैं - एस वी माखीजा, अरूण माथुर, एम एल गौड़, मंजू भाटिया। निर्देशक हैं गंगा प्रसाद माथुर और सहायिका कुमारी परवीज।

सरकारी सुविधाओं का दुरूपयोग करने वालो को सन्देश देती एक नाटिका भी अच्छी रही - इलाज। पत्नी चाहती हैं कि उसकी बीमार सहेली का इलाज पति सेना के अस्पताल में अपनी पत्नी बता कर करवा ले। मना करने पर भी वह नही मानती और कहती हैं दूर पोस्टिंग हैं, कोई पहचानेगा नही। पति उस सहेली को इलाज के लिए ले जाता हैं। बाद में सहेली के निधन की सूचना मिलती हैं। पत्नी वहां पहुंचती हैं पर इस मामले के कारण अब वह उसकी पत्नी की तरह नही जानी जाती। वहां पति के साथी उसका दूसरा विवाह कराने की तैयारी करते हैं। सगाई के दिन पता चलता हैं कि उसे सबक सिखाने के लिए यह नाटक किया गया। उचित तरीके से उस शहर में सहेली का इलाज करवाया गया जिससे वह ठीक हो गई और उसी की सगाई हैं। विविध भारती की बेहतरीन प्रस्तुति। लेखिका वीणा शर्मा और निर्देशक लोकेन्द्र शर्मा।

पटना केंद्र द्वारा प्रस्तुत प्रहसन सुना - चाँद का टुकड़ा। मजेदार रहा। बिना लड़की देखे, बिना तस्वीर देखे, केवल अपने दोस्त से तारीफ़ सुन शादी कर ली। उसे जीवन में सरप्राइज का बहुत शौक हैं। पहली बार पत्नी को देख कर तारीफ़ में कहा चाँद का टुकड़ा और वह रोने लगी और बताया कि उसने गाँव में लाइब्रेरी में पढ़ा हैं कि चाँद पर बहुत गड्ढे हैं यानि वह बदसूरत हैं। इस तरह उसे बदसूरत कहा गया। बाद में कविता के चाँद से स्थिति ठीक हुई। लेखिका हैं पुष्पा चोपड़ा और निर्देशक सत्य सहगल।

शनिवार और रविवार को दोपहर 3:30 बजे आधे घंटे के लिए प्रसारित हुआ कार्यक्रम नाट्य तरंग। शनिवार को अजीमुद्दीन का लिखा नाटक सुना - अंधा मोड़। तनाव में आत्म ह्त्या करने पहुंचे दोनों एक दूसरे से अपनी व्यथा कहते हैं। लड़की सौतेली माँ से तंग हैं। प्रेम विवाह करती हैं पर वहां भी अपनापन नही मिलता यहाँ तक कि पति का व्यवहार भी बदल जाता हैं। यहीं, लड़कियों की इस स्थिति के साथ ही कन्या भ्रूण को नष्ट करने का भी उल्लेख हुआ। पुरूष अपनी कहानी बताता हैं कि शराब की लत से सब कुछ बर्बाद कर चुका। अंत में बहन ने नई जिन्दगी शुरू करने के लिए रूपए दिए जिसे भी वह घुड़दौड़ में हार गया। अब दोनों मिलकर एक नई जिन्दगी शुरू करने का निर्णय लेते हैं। राकेश ढौनढीयाल के निर्देशन में भोपाल केंद्र की अच्छी रही प्रस्तुति।

रविवार को प्रसिद्ध हिन्दी लेखक कमलेश्वर की कहानी राजा निरबंसिया का अभय कुमार सिंह द्वारा किया गया रेडिओ नाट्य रूपांतर सुनवाया गया जिसके निर्देशक हैं विजय दीपक छिब्बर। पहले भी बहुत बार सुनवाया जा चुका हैं और हम साप्ताहिकी में लिख भी चुके हैं। नारी आज के दौर में अपना सतित्व सिद्ध नही कर पाती लेकिन पति को अहसास हो सकता हैं। अच्छा तो हैं पर बहुत बार सुन चुके हैं, साहित्य से कुछ और प्रेरणादायी रचनाएं सुनना चाहते हैं। प्रस्तुति दिल्ली केंद्र की रही।

चलते-चलते हम आपको बता दे कि यह सभी कार्यक्रम हमने हैदराबाद में एफ़ एम चैनल पर 102.8 MHz पर सुने।

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