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Wednesday, August 31, 2011

कथा लकीर के फ़कीरों की-न्‍यूज़-रूम ये शुभ्रा शर्मा कड़ी सात।

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपनी यादें हमारे साथ बांट रही हैं। ये है इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी। इस अंक में वे बात रही हैं कुछ 'लकीर के फ़कीरों' के बारे में। इस श्रृंखला के बाक़ी लेख यहां पढ़े जा सकते हैं।

अगस्त के महीने में न सिर्फ हम इतिहास को याद कर रहे थे, बल्कि इतिहास को बनते भी देख रहे थे. अन्ना के आन्दोलन का अंततः क्या हश्र होगा यह अभी से कहना कठिन है, लेकिन दिल्ली में रामलीला मैदान और इंडिया गेट पर जिस तरह के जन-पारावार को उमड़ते देखा, और देश के कोने-कोने से उसे जिस तरह का समर्थन मिलने की ख़बरें पढ़ी-सुनीं उससे इतना तो तय हो गया कि हम क्षेत्र-भाषा-जाति-वर्ग के कितने ही टुकड़ों में बँटे हुए क्यों न हों ......सबके सब भारतीय हैं....जब चाहें एक सुदृढ़ दीवार बनकर खड़े हो सकते हैं.

अपने मिनी भारत की यानी हमारे हिंदी न्यूज़ रूम की भी कुछ ऐसी ही कैफियत है. आपस में उलझते रहते हैं,cartoon-vulture-nasty-review-hurtful-writer एक-दूसरे की टांग खींचते रहते हैं, महीनों तक बोलचाल भी बंद हो जाती  है...लेकिन जब कभी अंग्रेज़ी न्यूज़ रूम का कोई व्यक्ति हमारे किसी सदस्य पर हावी होने की या उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता है...तब देखिये हमें. सुमित्रानंदन पन्त जी के शब्दों में कहूं तो ..."लोहे की दीवार गरजती" सामने आ खड़ी होती है. और अंग्रेज़ी न्यूज़ रूम ही क्यों, कभी-कभी हमारे अपने न्यूज़ रूम में कोई ऐसे अधिकारी आ जाते हैं, जो हमारी एकता को ललकार देते हैं.

एक ऐसे ही अधिकारी आये थे, जो थे तो ए एन ई (एसिस्टेंट न्यूज़ एडिटर) ही, लेकिन हमें सुधारने का बीड़ा उठा चुके थे. हममें से कोई भी जब न्यूज़ रूम में प्रविष्ट होता तो उनकी निगाहें घड़ी की तरफ उठ जाती थीं. शायद लेखा-जोखा रखते थे कि कौन कितने बजे आया और कितने बजे गया, दफ्तर के समय में से कितना समय व्यर्थ गंवाया.

राष्ट्र भाषा समिति की सिफारिश पर समाचार कक्ष में हिंदी में काम-काज को बढ़ावा देने के लिए हिंदी पूल की व्यवस्था शुरू हुई. समिति के सदस्यों को आमंत्रित किया गया था ताकि उसका विधिवत उद्घाटन कराया जा सके. कार्यक्रम साढ़े तीन बजे से था. हमारे अधिकारी जी बढ़िया कोट-पैंट पहनकर आये थे. वैसे उनकी ड्यूटी दिन शिफ्ट में थी, जो ३ बजे समाप्त हो जाती है. लेकिन वे अपने कोट की जेब में हाथ डाले, इधर-उधर घूमते हुए तैयारियों का जायज़ा ले रहे थे. तभी उनके घर से फ़ोन आया. शायद वे घर पर कहना भूल गये थे कि देर से पहुंचेंगे. बहरहाल, हमने सुना वे पत्नी से कह रहे थे - "समझती नहीं हो, हम अभी कैसे आ सकते हैं. इतना बड़ा कार्यक्रम है. हम अधिकारी हैं, हमें ही सब प्रबंध देखना है."

इसी के बाद हमने आधिकारिक तौर पर उनका नाम "अधिकारी जी" रख दिया था. उनकी अधिकारिता के अलग-अलग क़िस्से अलग-अलग लोगों से सुने जा सकते हैं. मेरे साथ जो हुआ, वो मैं आपको सुनाये देती हूँ. कोई टेस्ट मैच चल रहा था...शायद भारत और इंग्लैंड के बीच. अंग्रेज़ी का आइटम उन्होंने मुझे अनुवाद के लिए दिया. उसमें लिखा था आज मैच के "पैन- अल्टीमेट" दिन अमुक टीम ने इतने रन बनाये. मैंने अनुवाद करते हुए लिख दिया कि आज मैच के चौथे दिन....

अधिकारी जी बिगड़ गये. बोले - "यह चौथा दिन कहाँ से आ गया?"

मैंने कहा- यह ख़बर रोज़ जा रही है. आज चौथा दिन है.

कहने लगे - इस ख़बर में यह बात कहाँ लिखी है ?

मैंने चिढ़कर कहा - यहाँ तो पैन-अल्टीमेट लिखा है, तो क्या अंतिम दिन के पहले दिन लिखूं?

बोले - और नहीं तो क्या? यह तो लिखना ही पड़ेगा.

मैंने समझाने की कोशिश की कि महराज टेस्ट मैच ५ दिन का होता है और पैन-अल्टीमेट चौथा दिन ही है.

कहने लगे - वाह, क्या चार या छः दिन का नहीं हो सकता?

मैंने कहा कि अगर होता तो साफ लिखा होता कि चार दिन के इस टेस्ट-मैच में या छः दिन के मैच में....

लेकिन उन्हें नहीं मानना था नहीं माने.

इसी तरह के एक और अधिकारी से साबका पड़ा एक बार. उस दिन मेरी वाचन की ड्यूटी थी. रिहर्स कर रही थी. एक ख़बर पर नज़र पड़ी तो ठिठक गयी. लगा, कहीं कुछ गड़बड़ है. ख़बर ज़रा ध्यान से पढ़ी. कुछ ऐसा हुआ था कि एक मोटर नौका एर्णाकुलम से लक्ष-द्वीप के लिए रवाना हुई थी लेकिन उसका तट से संपर्क टूट गया था. इसके बाद के वाक्य से मैं चौंक गयी थी. लिखा था- हमारे कलकत्ता (हाँ, तब तक कलकत्ता ही था, कोलकाता नहीं हुआ था) संवाददाता ने बताया है कि .....

मैंने संपादक से कहा - एर्णाकुलम से नाव चली... लक्ष द्वीप जा रही थी...इसके बारे में भला कलकत्ता संवाददाता क्यों बोल रहा है?

संपादक महोदय ने पहले तो मेरी आपत्ति पर ही आपत्ति व्यक्त की. बोले- आपके साथ यही मुश्किल है, हर बात में तर्क करने लगती हैं.

लेकिन जब मैंने भारत के मानचित्र पर तीनों स्थान दिखाकर फिर अपनी आपत्ति दोहरायी तो बोले - अरे भाई, कलकत्ता संवाददाता छुट्टी मनाने वहां गया होगा. आपको इससे क्या मतलब? आप बाकी आइटम देखिये.

बात कुछ हज़म नहीं हुई वाले अंदाज़ में मैंने उनसे उस आइटम की अंग्रेज़ी कॉपी मांगी और तब तक मांगती रही, जब तक उन्होंने उसे ढूंढकर मेरे हवाले नहीं कर दिया. पता है, उसमें क्या लिखा था? जी हाँ, बिलकुल ठीक समझे आप. जल्दबाज़ी या गफ़लत में कालीकट का कलकत्ता हो गया था.

एक और अधिकारी थे, जिन्हें तमाम घरेलू बुलेटिनों से ज़्यादा फ़िक्र सुबह ०८५० के विदेश प्रसारण सेवा के बुलेटिन की थी. आम तौर पर ड्यूटी पर आते ही लोग सबसे पहले आठ बजे का बुलेटिन ध्यान से देखते-पढ़ते हैं. लेकिन इन सज्जन की तो बात ही कुछ और थी. आठ बजे का बुलेटिन किनारे धर देते और पूरे मनोयोग से ०८५० का बुलेटिन देखते. फिर पूछते किसने बनाया, किसने पढ़ा और ख़ुदा न खास्ता अगर दोनों में से कोई उनके सामने पड़ जाता तो ख़ैर नहीं थी. विदेश प्रसारण के बुलेटिन कैसे होने चाहिए- कैसे नहीं, इस पर अच्छा-ख़ासा भाषण सुनना पड़ता.

पहले अक्सर इस बुलेटिन पर कैजुअल संपादक और वाचक की ड्यूटी लगती थी लेकिन उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि केवल रेगुलर लोग ही यह बुलेटिन बनायेंगे और पढेंगे. उन दिनों मैं ज़्यादातर सुबह की शिफ्ट में ड्यूटी किया करती थी. सो हफ्ते में कम से कम तीन-चार दिन यह सौभाग्य मुझे प्राप्त होने लगा - पहले तो "सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बुलेटिन" बनाने या पढ़ने का और उसके बाद अधिकारी महोदय की लेक्चर क्लास अटेंड करने का. मुझे याद है एक बार जब मैं लगातार तीसरे दिन यह ड्यूटी कर रही थी, तब मेरे सहयोगी जोगिन्दर शर्मा मेरी मेज़ के पास आये, पानी छिड़का, लाल फूलों की माला चढ़ायी और अगरबत्ती जलाकर बोले - "लो, अब यह बलि का बकरा तैयार है".

Friday, August 26, 2011

छत्‍तीसगढ़ में रेडि‍यो श्रोता दि‍वस परंपरा....आवाज़ और फरमाइशकर्ताओं का मि‍लन समारोह

रेडियो के गुज़रे ज़माने के साथ जो लोग जुड़े हुए हैं, उनको आज भी कोई नया साधन उस रूप में नहीं लुभा पाता है जैसा रेडियो। आज भी पुराने श्रोताओं को सीलोन या विविध भारती पर बजने वाले पुराने हर कार्यक्रम जुबानी याद हैं और ये श्रोता ही हैं जिनके पत्र और फोन प्रस्तुतकर्ताओं की ऊर्जा बनते हैं। हर कार्यक्रम को इस तरह तन्मय होकर सुनते हैं आज भी हमारे श्रोता बंधु कि एक गलती पर ड्यूटी रूम की घंटियां घनघना उठती हैं और एक अच्छे कार्यक्रम की प्रस्तुति पत्रों से सराबोर कर देती है पूरे उस केन्द्र को। ऐसा प्रतीत होता है कि पोस्ट ऑफिस का कारोबार तो अब इन श्रोताओं की बदौलत ही चल रहा है।

छत्तीसगढ़ में 5 आकाशवाणी केन्द्र और 4 प्राइवेट एफ.एम.बैण्ड स्टेशन हैं। नए एफ.एम. केन्द्रों में 3 रायपुर और एक
बिलासपुर का केन्द्र है जिसको सुनने वाला युवा वर्ग एक सीमित श्रोता वर्ग है। लेकिन रायपुर, जगदलपुर, अंबिकापु
र मीडियम वेव और बिलासपुर व रायगढ़ प्रसारभारती के एफ.एम. केन्द्र के श्रोता पूरे छत्तीसगढ़ में अपनी आवाज पहुचाते हैं। यहाँ के अनेक रेडियो श्रोता संघ मिलकर या अलग अलग स्मारिकाएँ भी छपवाते है, श्रोता दिवस भी मनाते हैं और केन्द्रों में पहुंचकर अपने उद्घोषकों से मिलकर अपने उद्गार भी व्यक्त करते हैं।


20 अगस्त की तारीख पिछले 4 सालों से श्रोताओं
द्वारा श्रोता दिवस के रूप में मनाई जा रही है। संरक्षक अशोक बजाज जी राजनीति से जुड़े हुए हैं और उनके नेतृत्व में 3 बार ये आयोजन रायपुर में ही संपन्न हुए हैं, पिछले वर्ष सीलोन के पुराने उद्घोषकों का एक बड़ा समूह इन लोगों ने यहां बुलवाया था जिसमें विजयलक्ष्मी जी, मनोहर महाजन जी, रिपुसूदन जी और फिल्म गीतकोश के हरमिन्दर सिंह जी आदि थे।
भाटापारा के श्रोताओं ने हमेशा से अपने शहर का नाम देश के हर बड़े रेडियो स्टेशन तक पहुंचाया है। झुमरीतलैया के किसी बाद किसी गांव का नाम याद आता है तो वो है भटापारा। छत्तीसगढ़ के दो बड़े शहरो राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर के बीच स्थित है भाटापारा। यहां के श्रोता दोनों ही केन्द्रों को बहुत मन लगाकर सुनते हैं और पत्रों की बौछार भी दिल खोलकर करते हैं। प्रसिद्ध श्रोता बचकामल का नाम जुड़ा है भाटापारा के साथ बल्कि ये भी कहा जा सकता है कि बचकामल जी के नाम से जाना जाता है भटापारा और इसीलिये उनके सम्मान में इस साल का श्रोता दिवस भाटापारा में मनाया गया।

भाटापारा में 20 अगस्त 2011 को श्रोता दिवस के अवसर पर आयोजित रेडियो श्रोता सम्मेलन में अपार भीड़ उमड़ी प्रदेश के कोने कोने से रेडियो श्रोताओं ने इस सम्मलेन में भाग लिया, बड़ी संख्या में सभी केन्द्रों के एनाउंसर व कुछ कार्यक्रम
अधिशासी भी उपस्थित हुए। इस अवसर पर वरिष्ठ रेडियो श्रोता बचकामल का विशेष रूप से सम्मान किया गया, इसके आलावा प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गायक शेख हुसैन तथा गायिका रीना वैष्णव भी सम्मानित हुए। श्रोताओं और प्रस्तुकर्ताओं का रिश्ता आवाज़ और पत्रों का रिश्ता होता है लेकिन इस प्रकार आमने सामने मिलकर दोनों एक दूसरे की भावनाओं से किस तरह जुड़ जाते हैं ये केवल ऐसे आयोजनों में ही देखने को मिलता है। नई पीढ़ी के युवाओं में रेडियो को लोकप्रिय बनाने की दिशा में इस प्रकार के सम्मेलन अत्यंत ही उपयोगी सिद्ध हों






आलेख - संज्ञा टंडन,
बि‍लासपुर, 9827150507
संज्ञा का ब्लॉग : सीजी स्वर/CG Swar
रायपुर आकाशवाणी की पहली भुगतान पेय कलाकार, रेडि‍यो नाटक कलाकार, रायपुर में युववाणी कंपीयर और 1991 से बि‍लासपुर में आकस्‍ि‍मक उदद्यघोषक। अपने संस्‍थान लि‍बरा मीडि‍या के माध्‍यम से रेडि‍यो के लि‍ये प्रायोजि‍त कार्यक्रमों के र्नि‍माण मे सक्रि‍य। छ.ग. के वि‍भि‍न्‍न केन्‍द्रों से प्रसारण होता रहता है।

फोटो: ग्राम चौपाल से साभार
अन्य कड़ियाँ:
रेडियो से संस्कृति में विकृति नहीं आती --- अशोक बजाज

Wednesday, August 17, 2011

'प्रसारण-भवन का इतिहास'- न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा (छठी कड़ी का संशोधित रूप)

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। पिछली कड़ी में शुभ्रा जी ने आकाशवाणी के इतिहास का एक महत्‍वपूर्ण पन्ना था। लेकिन उन्‍हें बाद में लगा कि कुछ अनकहा रह गया। इसलिए उन्‍होंने इसमें कुछ और हिस्‍सा जोड़ा है। इसलिए हम इस कड़ी को revive करके प्रस्‍तुत कर रहे हैं। शुभ्रा जी की पूरी श्रृंखला यहां क्लिक करके पढ़ी जा सकती है।

फेसबुक पर रेडियोनामा और श्रोता बिरादरी समूह इन दिनों इतिहास के समंदर में गोते लगा रहे हैं. दो बड़े अवसर तब आये जब ३१ जुलाई को रफ़ी साहब को और ४ अगस्त को किशोर दा को ज़ोर-शोर से याद किया गया. कुछ पुराने रेडियो सेटों की चर्चा हुई.  प्रसारण के इतिहास के कुछ सुनहरे पलों का भी ज़िक्र हुआ.

वैसे भी हम भारतीयों के लिए अगस्त का महीना विशेष महत्त्व रखता है. सन बयालीस के "भारत छोड़ो" आन्दोलन और १५ अगस्त सन सैंतालिस के नेहरु जी के "ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी" उद्बोधन की याद दिलाने वाला महीना है यह. तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं भी अपने पाठकों के लिए इतिहास  के समंदर से एक मोती चुनकर लेती चलूँ.

अलग-अलग राज्यों के शौकिया रेडियो प्रसारणों को छोड़ दें तो अखिल भारतीय स्तर पर इंडियन स्टेट img036_thumb3 ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के दिल्ली केंद्र से प्रसारण की विधिवत शुरुआत १ जनवरी १९३६ से हुई. १९ जनवरी को पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित हुआ और उसी वर्ष ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रखा गया.

शुरू-शुरू में ये प्रसारण १८, अलीपुर रोड पर स्थित एक कोठी से किये जाते थे. यह कोठी प्रसारण के उद्देश्य से तो बनी नहीं थी इसलिए इसमें ध्वनि नियंत्रण यानी साउण्ड-प्रूफिंग की व्यवस्था करना टेढ़ी खीर थी. हंसराज लूथरा साहब ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जब कभी किसी विशिष्ट व्यक्ति को रिकॉर्ड करना होता था, तब बाहर सड़क पर दो लोगों को खड़ा किया जाता, जो वहां से गुजरने वाली गाड़ियों से कुछ देर रुकने या कम से कम हॉर्न न बजाने का अनुरोध करते थे. बाद में साउण्ड-प्रूफिंग की कामचलाऊ व्यवस्था की गयी. अलीपुर रोड की यह कोठी सात साल तक दिल्ली केंद्र के तौर पर काम करती रही, जब तक कि संसद मार्ग स्थित प्रसारण भवन बनकर तैयार नहीं हो गया.

प्रसारण भवन की परिकल्पना और उसके निर्माण का श्रेय भारत के पहले प्रसारण नियंत्रक लियोनेल फ़ील्डन को जाता है. उनका कहना था कि प्रसारण भवन का डिज़ाइन कुछ ऐसा होना चाहिए कि स्थापत्य से ही उसके काम काज का आभास मिल सके. अगर आप साथ दिये चित्र को ध्यान से देखें तो पायेंगे कि वह आपको ग्रामोफोन रिकॉर्ड और स्पूल टेप की याद दिलाता है. रिकॉर्ड और टेप की तरह इस भवन का डिज़ाइन भी गोल चक्रों को केंद्र में रखकर किया गया है. सामने से देखने पर भवन के तीन चक्र नज़र आते हैं, जिन्हें ध्यान से देखें तो ऐसा लगता है जैसे टेप मशीन पर चढ़ा हुआ स्पूल टेप हो. प्रसारण भवन के बीचोबीच एक लम्बा ऊंचा गुम्बदनुमा चक्र है और दोनों सिरों पर कुछ छोटे दो चक्र हैं. तीनों को आपस में जोड़ते लम्बे गलियारे हैं, जिनके पीछे बने कमरों में कला, संस्कृति, साहित्य और संगीत की एक से एक दिग्गज हस्तियों को भरपूर मान-सम्मान और प्रोत्साहन मिला. पीछे की ओर एक चौथा चक्र भी है, जो संसद मार्ग से नज़र नहीं आता. प्रारंभ में हिंदी और अंग्रेज़ी के न्यूज़ रूम यहीं हुआ करते थे.

इस प्रसारण भवन का उद्घाटन ६ फरवरी १९४३ को हुआ. विश्व युद्ध का ज़माना था, इसलिए जल्दी-जल्दी में, लम्बे-चौड़े समारोह के बिना ही दिल्ली केंद्र यहाँ स्थानांतरित कर दिया गया. वर्ष २००३ में प्रसारण भवन की हीरक जयंती के अवसर पर एक स्मारिका प्रकाशित की गयी थी, जिसमें रेडियो से जुड़े बहुत सारे लोगों ने इस भवन के विषय में अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं. उनमें से कुछ मैं यहाँ आपके लिए चुरा लायी हूँ.

कमलेश्वर :

यह मात्र एक खूबसूरत इमारत नहीं, बल्कि सन १९४३ से लेकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सन १९४७ में जीती गयी आज़ादी के संघर्षपूर्ण इतिहास का तथा भारतीय लोकतंत्र की स्थापना व इस देश के संवैधानिक मान-मूल्यों का सबसे बड़ा अभिलेखागार और संग्रहालय भी है. यही वह इमारत है, जिसमें भारत की विविधतावादी समन्वित संस्कृति के स्वर, महान लोगों की आवाजें और शब्द सुरक्षित हैं. मैं जहाँ तक जानता हूँ, इसके आधार पर कह सकता हूँ कि संस्कृति, कलाओं और विचार का ऐसा अभिलेखागार दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है.

प्रो. गोपीचंद नारंग :

पार्लियामेंट स्ट्रीट पर ऑल इंडिया रेडियो की जगमगाती इमारत हम नौजवानों के दिलों की धडकनों में शामिल थी. आते-जाते मेरी निगाहें रह-रह कर इसकी तरफ उठती थीं. इसके दूधिया बरामदे और हरे-भरे लॉन अजीब बहार रखते थे.......इमारत के रखरखाव और सफाई सुथराई के अपने क़ायदे थे, जिनकी निहायत सख्ती से पाबंदी की जाती थी. ...पचास-पचपन साल की यादें और पुरानी बातों का एक रेला है जो काफिला-दर काफिला उम्दा चला आता है. कहाँ तक ज़िक्र किया जाये और क्या लिखा जाये.

       कुछ हवा तेज़ थी, खुली थी किताब

       एक पिछला वरक़ पलट आया.

भीष्म साहनी :

शाम का वक़्त रहा होगा जब मैंने पहली बार इसे देखा. यह बिल्डिंग अपने फैलाव के बावजूद मुझे बड़ी नाज़ुक सी नज़र आयी थी. इसमें अपनी एकविशेष कमनीयता थी, एक तरह का इकहरापन, कुछ-कुछ खिलौने जैसा हल्का-फुल्का. इमारत तो बहुत सी ज़मीन को घेरे हुए थी पर उसके निर्माण में एक छरहरापन सा था, जो आँखों को बंधता था. उस वक़्त शाम के साये उतर रहे थे, इस कारण भी उसकी छवि और भी प्रभावशाली लग रही थी.

रेवती सरन शर्मा :

क्या नाज़ुक सपने सी इमारत थी..... ऐसी हलकी-फुल्की, न आयताकार न चौकोर, न भव्य न ठोस, न किसी की देखी न किसी की सोची, गोलाकार भी और गोलाकार नहीं भी. लेखकों, गायकों और कल्पना में खोये लोगों के लिए ऐसी ही इमारत होनी चाहिए, जो किसी बड़े पक्षी के उड़कर आये पंख की तरह हौले से आकर धरती पर टिक जाए - बिना बोझ का, बिना जब्र का एहसास दिलाये.

तो इस परों सी उड़कर आयी और धरती पर हौले से टिक गयी इमारत में प्रवेश करते हुए मन में कैसे-कैसे ख्याल आते थे, आपको क्या बताऊँ. कुछ-कुछ "आज कल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे" वाली कैफियत होती थी. बीच वाले गुम्बद में प्रविष्ट होते ही सामने दीवार पर किम्वदंतियों सरीखे स्वामी हरिदास और तानसेन के पत्थर पर उत्कीर्ण चित्र जहाँ संगीत को ईश्वर की आराधना का माध्यम बनाने वालों की याद दिलाते; वहीँ पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर, भातखंडे जी, बड़े ग़ुलाम अली खान और फ़य्याज़ खान साहेब की आवक्ष प्रतिमाएं उसे जन-जन तक पहुँचने वालों का गुणगान करती नज़र आतीं.

बायीं ओर स्टूडियोज़ का प्रवेश द्वार है, जहाँ से अंदर जाते हुए मैं हमेशा ठिठक जाती थी और सोचने लगती थी कि अब तक न जाने कितनी विभूतियों ने इन्हीं स्टूडियोज़ में बैठकर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करायी होंगी. देश की स्वतंत्रता की कितनी ढेर सारी खुशियों और देश के विभाजन के कैसे असहनीय दुःख को यहाँ से अभिव्यक्ति मिली होगी. साहित्य और संगीत के न जाने कितने दिग्गज इन्हीं गलियारों से होकर गुज़रे होंगे, हँसे-बोले होंगे, और उनकी आवाज़ यहाँ से हवा के पंख लगाकर सीधी लाखों करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दिलों तक पहुंची होगी. इतिहास की कितनी सारी घटनाओं का मूक साक्षी होगा यह.

अगर यह हमसे बातें कर सकता तो कितना कुछ कहता, कौन -कौन सी घटनाएँ सुनाता.... शायद ३ जून १९४७ की उस परिचर्चा का विवरण सुनाता, जब लॉर्ड माउन्टबेटन,जवाहर लाल नेहरु, मोहम्मद अली जिन्ना और बलदेव सिंह ने पहली बार पार्टीशन का कड़वा सच देश की जनता के सामने रखा था.

या फिर ३० जनवरी १९४८ की उस काली रात का हाल सुनाता जब नेहरु जी ने रुंधे गले से कहा था - हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है और चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा है.

या निरंतर आगे बढ़ते इस देश की तमाम सफलताओं को एक-एक कर गिनवाता ....१९७१ की विजय का उल्लास, पोखरण परमाणु परीक्षण, एशियाई खेलों का सफल आयोजन और अंतरिक्ष से आती राकेश शर्मा की आवाज़ - यहाँ से तो मैं बस यही कह सकता हूँ कि "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसतां हमारा" .....

बचपन से इस प्रसारण भवन में आती-जाती रही हूँ, पिछले २६ वर्षों से तो हर रोज़ ही आना हुआ है, लेकिन पहली बार गंगा में डुबकी लगाते समय जो क्षण भर के लिए साँस रुक जाने जैसी अनुभूति होती है, कुछ वैसा ही मेरे साथ प्रसारण भवन में प्रवेश करते समय भी होता है. अंदर आते ही कभी स्वामी हरिदास तो कभी बड़े ग़ुलाम अली खान साहब की तरफ आँखें घूम जाती हैं और तब अपना आप बहुत छोटा, बड़ा तुच्छ महसूस होता है. मैं जानबूझ कर स्टूडियो के प्रवेश द्वार पर लिखा गांधीजी का वह सन्देश पढ़ने लगती हूँ, जिसमें उन्होंने कहा था कि

"मैं यह नहीं चाहता कि मेरे घर के सारे दरवाज़े-खिड़कियाँ बंद कर दी जायें. मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियाँ यहाँ हवा की तरह खुलकर आयें-जायें. लेकिन ऐसा भी न हो कि वे हवायें मेरे पैरों को मेरी ही ज़मीन से उखाड़ दें".

इतने लम्बे समय तक इतिहास के साक्षी रहे प्रसारण भवन में अब कुछ कार्यालय और कुछ रेकॉर्डिंग स्टूडियो ही शेष रह गये हैं. प्रसारण का लगभग पूरा काम-काज इस भवन के ठीक पीछे बने नये प्रसारण भवन या न्यू ब्रॉडकास्टिंग हाउस से होने लगा है.लाखों रूपये की लागत से बनी यह इमारत भी शानदार है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन मेरे लिए इस इमारत के साथ वह तिलिस्म जुड़ा हुआ नहीं है, जो मेरे बी एच यानी पुराने प्रसारण भवन के साथ जुड़ा था, जिसमें पैर धरते ही मेरा सर अचानक, अनायास गर्व से ऊंचा हो जाता था.

Saturday, August 13, 2011

रेडियो और रेशम की डोरी

सुजॉय चैटर्जी पेशे से इंजीनियर हैं। लेकिन संगीत का एक बड़ा ख़ज़ाना है इनके पास और संगीत पर लिखने sujoy की ऊर्जा भी। सुजॉय अलग अलग ग्रुप्‍स पर विविध भारती के विशेष कार्यक्रमों को transcript करते रहे हैं। ये इतना मुश्किल और श्रमसाध्‍य काम है कि उन्‍हें हमेशा मन ही मन सलाम करता रहा हूं। आज सुजॉय रेडियोनामा पर अपनी पहली पोस्‍ट लेकर आ रहे हैं। उम्‍मीद है कि रेडियोनामा और सुजॉय का साथ लंबा और सुंदर रहेगा। सुजॉय का ज्‍यादातर काम आप 'आवाज़' पर पढ़ सकते हैं। 

सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्‍कार! आज रक्षाबंधन है। भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मनाता यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियाँ लेकर आये, यह हमारी शुभकामना है। आप सभी को इस पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ। आज के इस शनिवार विशेषांक में मैं अपने ही जीवन के का अनुभव आप सभी के साथ बाँटने जा रहा हूँ जो शायद आज के दिन के लिए बहुत सटीक है।

किसी नें ठीक ही कहा है कि कुछ रिश्तों को नाम नहीं दिया जा सकता। ये रिश्ते न तो ख़ून के रिश्ते हैं, न ही दोस्ती के, और न ही प्रेम-संबंध के। ये रिश्ते बस यूं ही बन जाया करते हैं। मेरा भी एक ऐसा ही रिश्ता बना है रेडियो की तीन उद्‍घोषिकाओं के साथ, जिनकी आवाज़ें मैं करीब २७-२८ सालों से सुनता चला आ रहा हूँ, पर जिनसे मिलने का मौका अभी पिछले वर्ष ही हुआ। इस रिश्ते की शुरुआत शायद तब हुई जब मैं बस चार साल का था। मेरी माँ स्कूल टीचर हुआ करती थीं जिस वजह से मैं और मेरा बड़ा भाई दोपहर को घर पर अकेले ही होते थे। ८० के दशक के उन शुरुआती सालों में मनोरंजन का एकमात्र ज़रिया रेडियो ही हुआ करता था। हम लोग गुवाहाटी में रहते थे जहाँ के स्थानीय रेडियो स्टेशन से दोपहर के समय १२:३० से २:१० बजे तक 'सैनिक भाइयों का कार्यक्रम' प्रसारित होता था (औत अब भी होता है)। इसके अन्तर्गत फ़िल्मी गीतों पर आधारित अलग अलग तरह के कार्यक्रम पेश होते थे, और इन्हें पेश करने वाले थे तीन महिलाएँ जो अपना नाम अपने सैनिक भाइयों को रेखा बहन, सीमा बहन और मीता बहन बताया करतीं। इस कार्यक्रम को निरन्तर सुनते हुए उनकी आवाज़ें इतनी जानी-पहचानी से बनती चली गईं कि वो आवाज़ें कब मेरे जीवन का हिस्सा बन गईं पता ही नहीं चला। व्यक्तिगत रूप से उन्हें न मिलने के बावजूद ऐसा लगता कि जैसे उनको मैं पहचानता हूँ। जिस दिन उनमें से एक छुट्टी पर होतीं तो दिल जैसे थोड़ा उदास हो जाता। और इस तरह से उन्हें सुनते रहने का सिलसिला जारी रहा, दिन, महीने, साल गुज़रते चले गए। रविवार को और किसी भी छुट्टी के दिन दोपहर के वक़्त रेडियो सुनना नहीं भूलते।

फिर एक दिन शुरु हुआ पत्र लिखने का सिलसिला। हिम्मत जुटा कर मैंने उस कार्यक्रम में पत्र लिखा, 3885-Raksha2 कार्यक्रमों के लिए सुझाव दिए, कुछ चीज़ों की आलोचना भी की। पर मेरा पत्र कभी कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया। कारण एक ही था, मैं सनिक नहीं था और वह केवल सैनिक भाइयों का कार्यक्रम था। मुझे अफ़सोस तो हुआ पर ज़्यादा बुरा नहीं लगा। पर मन ही मन तरसता रहा कि काश कभी उनके मुख से मेरा नाम सुनने को मिल जाता रेडियो पर। पर वह दिन कभी नहीं आया। फिर टेलीविज़न भी आ गया, पर रेडियो मेरी ज़िंदगी में अपनी जगह पर कायम रहा, और रेखा-सीमा-मीता बहनों की आवाज़ें भी। फिर मैं स्कूल और कॉलेज की दहलीज़ पार कर एक दिन इंजिनीयर बन गया। पत्र लिखने का सिलसिला भी वैसा चलता रहा, और जवाब न पाने का सिलसिला भी। लेकिन एक शाम ऐसी आई जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। एक दिन मेरे घर के फ़ोन पर कॉल आई। लाइन के दूसरी तरफ़ महिला बिना अपना नाम बताए मुझे इंजिनीयरिंग्‍ में प्रथम आने की बधाई देने लगीं। धन्यवाद देते हुए फिर जब मैंने उनसे उनका नाम पूछा तो बोलीं, "मैं सीमा बहन बोल रही हूँ"। एक पल के लिए तो जैसे मेरी सांस रुक गई। समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलूँ। दरसल प्रथम आने पर मेरा नाम और जगह का नाम अख़्बार में छपा था। और क्योंकि मैं अपने पत्रों में अपना फ़ोन नंबर लिख दिया करता था, वहीं से उनको मेरे बारे में पता चल गया। मैं तो यही समझता था कि वो लोग शायद ही मेरे पत्रों को पढ़ती होंगी, पर सीमा बहन नें मुझे फ़ोन पर बताया कि वो लोग मेरे हर पत्र को बड़े ध्यान से पढ़ते थे और अफ़सोस भी करते थे कि चाहते हुए भी मेरे पत्र कार्यक्रम में वो शामिल नहीं कर सकते। फ़ोन पर ये सब बातें सुन कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। ऐसा लगा कि जैसे पिछले १८ वर्ष की मेरी साधना का फल मुझे मिल गया हो।

उस दिन के बाद मैंने कई बार सोचा कि रेडियो स्टेशन जाकर तीनों बहनों से मिलूँ, पर संकोच वश ऐसा न कर सका। फिर मैं गुवाहाटी छोड़ उच्च शिक्षा और नौकरी के लिए बाहर चला गया। कई साल बाद जब मैं गुवाहाटी लौटा और डरते डरते रेडियो ऑन किया कि कहीं रेखा, सीमा और मीता बहनें सेवा से निवृत्त न हो गई हों। पर ऐसा नहीं था। रेडियो पर उन बहनों की आवाज़ें बिल्कुल उसी तरह सुनने को मिली और एक अजीब सी ख़ुशी महसूस हुई। अभी पिछले वर्ष दुर्गा पूजा के दौरान मैं गुवाहाटी गया और इस बार मैंने ठान लिया कि रेडियो स्टेशन जाकर उनसे मिल कर ही आना है। थोड़े संकोच के साथ जब मैं 'सैन्य कार्यक्रम' के बोर्ड वाले स्टाफ़ रूम में उपस्थित हुआ और अपना परिचय दिया तो वहाँ बैठीं सीमा और मीता बहन चौंक उठीं। सीमा बहन नें तो 'प्रोग्राम एग्ज़ेक्युटिव' को बुलाकर मेरी प्रशंसा की, और इस कार्यक्रम के प्रति मेरी वफ़ादारी और कीमती सुझावों के बारे में बताया। किसी श्रोता से मिल कर उद्‍घोषक को कितनी ख़ुशी मिल सकती है, उसका अंदाज़ा मुझे पहली बार हुआ। उनकी आँखों में वही चमक मैंने देखी जो चमक शायद मेरी आँखों में भी उस दिन आई होगी जिस दिन सीमा बहन नें पहली बार मुझे फ़ोन किया था। उस दिन सीमा बहन मुझे अपने साथ अपने घर ले गईं, अपने पति से मिलवाया और मेरा अतिथि-सत्कार किया। रेखा बहन कुछ वर्ष पहले और मीता बहन पिछले वर्ष रिटायर हो गईं। मीता बहन के रिटायरमेण्ट पर जब मैंने उनको शुभकामना स्वरूप ग्रीटिंग्‍ कार्ड भेजा तो उसे पाकर उनकी आँखें भर आई थीं, ऐसा उन्होंने मुझे फ़ोन करके बताया था। और सीमा बहन अभी हाल ही में ३१ जुलाई को रिटायर हो चुकी हैं। इस तरह से रेखा, सीमा और मीता बहनों की आवाज़ें तो रेडियो से ग़ायब हो गईं, लेकिन उनकी गूंज आज भी मुझे सुनाई देती है अपने दिल में और शायद हमेशा सुनाई देती रहेंगी। मैं दिल से इन तीनों बहनों की सलमती की दुआ करता हूँ। उद्‍घोषक-श्रोता का रिश्ता ही कह लीजिए या भाई-बहन का, यह मेरे जीवन का एक बहुत ही सुखद अनुभव रहा है जिसे मैं उम्र भर रेलिश करता रहूंगा। आज रक्षाबंधन पर मैं इन तीनों को ढेर सारी शुभकामनाएँ देता हूँ, और आपको सुनवाता हूँ यह सदाबहार राखी गीत सुमन कल्याणपुर की सुरीली आवाज़ में।

गीत - बहना नें भाई की कलाई से प्यार बांधा है (रेशम की डोरी)

Wednesday, August 10, 2011

प्रसारण भवन का इतिहास: 'न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा' कड़ी 6 (संशोधित)

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। पिछली कड़ी में रेडियो-जगत में चाय-पुराण की बातें की गयी थीं। चूंकि इन दिनों हम रेडियो के इतिहास में खूब ग़ोते लगा रहे हैं इसलिए शुभ्रा जी ने इस बार आकाशवाणी के इतिहास का एक महत्‍वपूर्ण पन्‍ना पेश किया है। शुभ्रा जी की पूरी श्रृंखला यहां क्लिक करके पढ़ी जा सकती है।

फेसबुक पर रेडियोनामा और श्रोता बिरादरी समूह इन दिनों इतिहास के समंदर में गोते लगा रहे हैं. दो बड़े अवसर तब आये जब ३१ जुलाई को रफ़ी साहब को और ४ अगस्त को किशोर दा को ज़ोर-शोर से याद किया गया. कुछ पुराने रेडियो सेटों की चर्चा हुई.  प्रसारण के इतिहास के कुछ सुनहरे पलों का भी ज़िक्र हुआ.

वैसे भी हम भारतीयों के लिए अगस्त का महीना विशेष महत्त्व रखता है. सन बयालीस के "भारत छोड़ो" आन्दोलन और १५ अगस्त सन सैंतालिस के नेहरु जी के "ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी" उद्बोधन की याद दिलाने वाला महीना है यह. तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं भी अपने पाठकों के लिए इतिहास  के समंदर से एक मोती चुनकर लेती चलूँ.

अलग-अलग राज्यों के शौकिया रेडियो प्रसारणों को छोड़ दें तो अखिल भारतीय स्तर पर इंडियन स्टेट img036 ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के दिल्ली केंद्र से प्रसारण की विधिवत शुरुआत १ जनवरी १९३६ से हुई. १९ जनवरी को पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित हुआ और उसी वर्ष ब्रॉडकास्टिंग सर्विस का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रखा गया.

शुरू-शुरू में ये प्रसारण १८, अलीपुर रोड पर स्थित एक कोठी से किये जाते थे. यह कोठी प्रसारण के उद्देश्य से तो बनी नहीं थी इसलिए इसमें ध्वनि नियंत्रण यानी साउण्ड-प्रूफिंग की व्यवस्था करना टेढ़ी खीर थी. हंसराज लूथरा साहब ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जब कभी किसी विशिष्ट व्यक्ति को रिकॉर्ड करना होता था, तब बाहर सड़क पर दो लोगों को खड़ा किया जाता, जो वहां से गुजरने वाली गाड़ियों से कुछ देर रुकने या कम से कम हॉर्न न बजाने का अनुरोध करते थे. बाद में साउण्ड-प्रूफिंग की कामचलाऊ व्यवस्था की गयी. अलीपुर रोड की यह कोठी सात साल तक दिल्ली केंद्र के तौर पर काम करती रही, जब तक कि संसद मार्ग स्थित प्रसारण भवन बनकर तैयार नहीं हो गया.

प्रसारण भवन की परिकल्पना और उसके निर्माण का श्रेय भारत के पहले प्रसारण नियंत्रक लियोनेल फ़ील्डन को जाता है. उनका कहना था कि प्रसारण भवन का डिज़ाइन कुछ ऐसा होना चाहिए कि स्थापत्य से ही उसके काम काज का आभास मिल सके. अगर आप साथ दिये चित्र को ध्यान से देखें तो पायेंगे कि वह आपको ग्रामोफोन रिकॉर्ड और स्पूल टेप की याद दिलाता है. रिकॉर्ड और टेप की तरह इस भवन का डिज़ाइन भी गोल चक्रों को केंद्र में रखकर किया गया है. सामने से देखने पर भवन के तीन चक्र नज़र आते हैं, जिन्हें ध्यान से देखें तो ऐसा लगता है जैसे टेप मशीन पर चढ़ा हुआ स्पूल टेप हो. प्रसारण भवन के बीचोबीच एक लम्बा ऊंचा गुम्बदनुमा चक्र है और दोनों सिरों पर कुछ छोटे दो चक्र हैं. तीनों को आपस में जोड़ते लम्बे गलियारे हैं, जिनके पीछे बने कमरों में कला, संस्कृति, साहित्य और संगीत की एक से एक दिग्गज हस्तियों को भरपूर मान-सम्मान और प्रोत्साहन मिला. पीछे की ओर एक चौथा चक्र भी है, जो संसद मार्ग से नज़र नहीं आता. प्रारंभ में हिंदी और अंग्रेज़ी के न्यूज़ रूम यहीं हुआ करते थे.

इस प्रसारण भवन का उद्घाटन ६ फरवरी १९४३ को हुआ. विश्व युद्ध का ज़माना था, इसलिए जल्दी-जल्दी में, लम्बे-चौड़े समारोह के बिना ही दिल्ली केंद्र यहाँ स्थानांतरित कर दिया गया. वर्ष २००३ में प्रसारण भवन की हीरक जयंती के अवसर पर एक स्मारिका प्रकाशित की गयी थी, जिसमें रेडियो से जुड़े बहुत सारे लोगों ने इस भवन के विषय में अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं. उनमें से कुछ मैं यहाँ आपके लिए चुरा लायी हूँ.

कमलेश्वर :

यह मात्र एक खूबसूरत इमारत नहीं, बल्कि सन १९४३ से लेकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सन १९४७ में जीती गयी आज़ादी के संघर्षपूर्ण इतिहास का तथा भारतीय लोकतंत्र की स्थापना व इस देश के संवैधानिक मान-मूल्यों का सबसे बड़ा अभिलेखागार और संग्रहालय भी है. यही वह इमारत है, जिसमें भारत की विविधतावादी समन्वित संस्कृति के स्वर, महान लोगों की आवाजें और शब्द सुरक्षित हैं. मैं जहाँ तक जानता हूँ, इसके आधार पर कह सकता हूँ कि संस्कृति, कलाओं और विचार का ऐसा अभिलेखागार दुनिया के किसी और देश के पास नहीं है.

प्रो. गोपीचंद नारंग :

पार्लियामेंट स्ट्रीट पर ऑल इंडिया रेडियो की जगमगाती इमारत हम नौजवानों के दिलों की धडकनों में शामिल थी. आते-जाते मेरी निगाहें रह-रह कर इसकी तरफ उठती थीं. इसके दूधिया बरामदे और हरे-भरे लॉन अजीब बहार रखते थे.......इमारत के रखरखाव और सफाई सुथराई के अपने क़ायदे थे, जिनकी निहायत सख्ती से पाबंदी की जाती थी. ...पचास-पचपन साल की यादें और पुरानी बातों का एक रेला है जो काफिला-दर काफिला उम्दा चला आता है. कहाँ तक ज़िक्र किया जाये और क्या लिखा जाये.

       कुछ हवा तेज़ थी, खुली थी किताब

       एक पिछला वरक़ पलट आया.

भीष्म साहनी :

शाम का वक़्त रहा होगा जब मैंने पहली बार इसे देखा. यह बिल्डिंग अपने फैलाव के बावजूद मुझे बड़ी नाज़ुक सी नज़र आयी थी. इसमें अपनी एकविशेष कमनीयता थी, एक तरह का इकहरापन, कुछ-कुछ खिलौने जैसा हल्का-फुल्का. इमारत तो बहुत सी ज़मीन को घेरे हुए थी पर उसके निर्माण में एक छरहरापन सा था, जो आँखों को बंधता था. उस वक़्त शाम के साये उतर रहे थे, इस कारण भी उसकी छवि और भी प्रभावशाली लग रही थी.

रेवती सरन शर्मा :

क्या नाज़ुक सपने सी इमारत थी..... ऐसी हलकी-फुल्की, न आयताकार न चौकोर, न भव्य न ठोस, न किसी की देखी न किसी की सोची, गोलाकार भी और गोलाकार नहीं भी. लेखकों, गायकों और कल्पना में खोये लोगों के लिए ऐसी ही इमारत होनी चाहिए, जो किसी बड़े पक्षी के उड़कर आये पंख की तरह हौले से आकर धरती पर टिक जाए - बिना बोझ का, बिना जब्र का एहसास दिलाये.


तो इस परों सी उड़कर आयी और धरती पर हौले से टिक गयी इमारत में प्रवेश करते हुए मन में कैसे-कैसे ख्याल आते थे, आपको क्या बताऊँ. कुछ-कुछ "आज कल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे" वाली कैफियत होती थी. बीच वाले गुम्बद में प्रविष्ट होते ही सामने दीवार पर किम्वदंतियों सरीखे स्वामी हरिदास और तानसेन के पत्थर पर उत्कीर्ण चित्र जहाँ संगीत को ईश्वर की आराधना का माध्यम बनाने वालों की याद दिलाते; वहीँ पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर, भातखंडे जी, बड़े ग़ुलाम अली खान और फ़य्याज़ खान साहेब की आवक्ष प्रतिमाएं उसे जन-जन तक पहुँचने वालों का गुणगान करती नज़र आतीं.

बायीं ओर स्टूडियोज़ का प्रवेश द्वार है, जहाँ से अंदर जाते हुए मैं हमेशा ठिठक जाती थी और सोचने लगती थी कि अब तक न जाने कितनी विभूतियों ने इन्हीं स्टूडियोज़ में बैठकर अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करायी होंगी. देश की स्वतंत्रता की कितनी ढेर सारी खुशियों और देश के विभाजन के कैसे असहनीय दुःख को यहाँ से अभिव्यक्ति मिली होगी. साहित्य और संगीत के न जाने कितने दिग्गज इन्हीं गलियारों से होकर गुज़रे होंगे, हँसे-बोले होंगे, और उनकी आवाज़ यहाँ से हवा के पंख लगाकर सीधी लाखों करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दिलों तक पहुंची होगी. इतिहास की कितनी सारी घटनाओं का मूक साक्षी होगा यह.

अगर यह हमसे बातें कर सकता तो कितना कुछ कहता, कौन -कौन सी घटनाएँ सुनाता.... शायद ३ जून १९४७ की उस परिचर्चा का विवरण सुनाता, जब लॉर्ड माउन्टबेटन,जवाहर लाल नेहरु, मोहम्मद अली जिन्ना और बलदेव सिंह ने पहली बार पार्टीशन का कड़वा सच देश की जनता के सामने रखा था.

या फिर ३० जनवरी १९४८ की उस काली रात का हाल सुनाता जब नेहरु जी ने रुंधे गले से कहा था - हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है और चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा है.

या निरंतर आगे बढ़ते इस देश की तमाम सफलताओं को एक-एक कर गिनवाता ....१९७१ की विजय का उल्लास, पोखरण परमाणु परीक्षण, एशियाई खेलों का सफल आयोजन और अंतरिक्ष से आती राकेश शर्मा की आवाज़ - यहाँ से तो मैं बस यही कह सकता हूँ कि "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसतां हमारा" .....

बचपन से इस प्रसारण भवन में आती-जाती रही हूँ, पिछले २६ वर्षों से तो हर रोज़ ही आना हुआ है, लेकिन पहली बार गंगा में डुबकी लगाते समय जो क्षण भर के लिए साँस रुक जाने जैसी अनुभूति होती है, कुछ वैसा ही मेरे साथ प्रसारण भवन में प्रवेश करते समय भी होता है. अंदर आते ही कभी स्वामी हरिदास तो कभी बड़े ग़ुलाम अली खान साहब की तरफ आँखें घूम जाती हैं और तब अपना आप बहुत छोटा, बड़ा तुच्छ महसूस होता है. मैं जानबूझ कर स्टूडियो के प्रवेश द्वार पर लिखा गांधीजी का वह सन्देश पढ़ने लगती हूँ, जिसमें उन्होंने कहा था कि

"मैं यह नहीं चाहता कि मेरे घर के सारे दरवाज़े-खिड़कियाँ बंद कर दी जायें. मैं चाहता हूँ कि सभी देशों की संस्कृतियाँ यहाँ हवा की तरह खुलकर आयें-जायें. लेकिन ऐसा भी न हो कि वे हवायें मेरे पैरों को मेरी ही ज़मीन से उखाड़ दें".

इतने लम्बे समय तक इतिहास के साक्षी रहे प्रसारण भवन में अब कुछ कार्यालय और कुछ रेकॉर्डिंग स्टूडियो ही शेष रह गये हैं. प्रसारण का लगभग पूरा काम-काज इस भवन के ठीक पीछे बने नये प्रसारण भवन या न्यू ब्रॉडकास्टिंग हाउस से होने लगा है.लाखों रूपये की लागत से बनी यह इमारत भी शानदार है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन मेरे लिए इस इमारत के साथ वह तिलिस्म जुड़ा हुआ नहीं है, जो मेरे बी एच यानी पुराने प्रसारण भवन के साथ जुड़ा था, जिसमें पैर धरते ही मेरा सर अचानक, अनायास गर्व से ऊंचा हो जाता था.

Tuesday, August 2, 2011

आज़ादी की लड़ाई और निजी रेडियो स्‍टेशन

जुलाई-अगस्‍त के महीने रेडियो की दुनिया के लिहाज से बेहद महत्‍वपूर्ण रहा है। 23 जुलाई 1927 को भारत में रेडियो प्रसारण की शुरूआत हुई थी। दरअसल भारत में 1927 में एक साथ कई प्राईवेट रेडियो क्‍लब शुरू हो चुके थे। अंग्रेज़ सरकार ने भारत में रेडियो प्रसारण की संस्‍था को ‘इंडियन स्‍टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेस’ का नाम दिया था। जिसे पहले श्रम मंत्रालय के अधीन रखा गया था और बाद में इसके लिए अलग से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय बना दिया गया था।

आज़ादी के दीवानों के लिए रेडियो की असली हलचल दूसरे विश्‍व-युद्ध के बाद से शुरू होती है। यहां एक बात स्‍पष्‍ट कर देना ज़रूरी है कि रेडियो प्रसारण की शुरूआत ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की भलाई के उद्देश्‍य से कतई नहीं की थी। उन्‍हें शुरूआत से ही रेडियो प्रोपोगंडा फैलाने और अपनी महानता को महिमा-मंडित करने का बेहद सशक्‍त माध्‍यम लगा था। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने भारत के अलग अलग शहरों में रेडियो स्‍टेशन शुरू करने का फैसला किया था। ताकि ये ख़बरें फैलाई जा सकें कि ब्रिटिश भारतीयों का कितना भला चाहते हैं। आज़ादी के दीवानों की कोशिशों की ख़बरें रेडियो से लगातार नदारद रहती थीं। क्‍योंकि अंग्रेज़ों को लगता था कि इससे भारतीय जनता का गुस्‍सा भड़केगा और उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

बहरहाल दूसरे विश्‍व युद्ध की शुरूआत के बाद ब्रिटिश-सरकार ने एक तानाशाही भरा फैसला किया और सभीउषा मेहता रेडियो-लाइसेन्‍स रद्द कर दिये गए। इसका मतलब भारत में एक भी रेडियो स्‍टेशन नहीं चलाया जा सकता था। ब्रिटिशों का आदेश ये था कि सारे लाइसेन्‍स रद्द कर दिए गए हैं और ट्रान्‍समीटरों को सरकार के पास जमा कर दिया जाए। मुंबई के एक पारसी व्‍यक्ति नारीमन प्रिंटर उस समय भायखला के बॉम्‍बे टेक्‍निकल इंस्‍टीट्यूट के प्रिंसिपल थे। वे रेडियो इंजीनियरिंग के जानकार थे। उन्‍होंने जैसे ही ट्रान्‍समीटर ज़ब्‍त होने की ख़बर सुनी तो अपने ट्रांस्‍मीटर को बचाने का जुगाड़ लगाया। उन्‍होंने उसे पूरा खोल लिया और पुरज़े-पुरज़े अलग करके अलग-अलग जगहों पर छिपा दिये।

द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान ही भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। महात्‍मा गांधी ने आज़ादी की आखिरी लड़ाई के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल छेड़ा। सारा देश गांधीजी के पीछे आज़ादी के लिए आखिरी बड़ी कोशिश करने चल पड़ा। 9 अगस्‍त 1942 को गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रेस पर पाबंदी तो लगनी ही थी, सो वो भी लग गयी। कॉन्‍ग्रेस के नेताओं के अनुरोध पर नारीमन प्रिंटर ने ट्रान्‍समीटर के पुर्जे जमा किये और रेडियो-प्रसारण के लिए उन्‍हें तैयार कर दिया। रिकॉर्ड्स बताते हैं कि तब मुंबई के मशहूर ‘शिकागो रेडियो’ के मालिक नानक मोटवानी से माइक्रोफोन जुटाया गया। और सुप्रसिद्ध चौपाटी इलाक़े की ‘सी-व्‍यू‘ नामक इमारत से 27 अगस्‍त 1942 से भारतीय राष्‍ट्रीय कॉन्‍ग्रेस का रेडियो प्रसारण शुरू हो गया। कॉन्‍ग्रेस की ओर से पहला प्रसारण प्रसिद्ध गांधीवादी नेता उषा मेहता ने किया। अपने पहले प्रसारण में उन्‍होंने कहा—41.78 मीटर पर एक अनजान जगह से ये नेशनल कॉन्‍ग्रेस का रेडियो है।

यहां आपको बता दिया जाए कि इसी रेडियो स्‍टेशन से महात्‍मा गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन का संदेश प्रसारित किया गया। मेरठ में तीन सौ सैनिकों के मारे जाने की ख़बर भी इस रेडियो स्‍टेशन ने प्रसारित की। ये सभी ख़बरें वो थीं, जिन्‍हें ब्रिटिश सरकार ने अपने प्रसारणों में सेन्‍सर कर दिया था। नारीमन जी ने इस रेडियो-ट्रान्‍समीटर को इतना पोर्टेबल बनाया था कि रोज़ाना इसके प्रसारण की जगह बदल दी जाती थी, ताकि अंग्रेज़ अधिकारी उसे पकड़ ना सकें। इस खुफिया रेडियो को डा. राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन सहित कई प्रमुख नेताओं ने सहयोग दिया। रेडियो पर महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख नेताओं के रिकार्ड किए गए संदेश बजाए जाते थे। तीन माह तक प्रसारण के बाद अंतत: अंग्रेज सरकार ने उषा मेहता और उनके सहयोगियों को पकड़ा लिया और उन्हें जेल की सजा दी गई। सीक्रेट कांग्रेस रेडियो चलाने के कारण उन्हें चार साल की जेल हुई। जेल में उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बाद में उषा मेहता को सन 1946 में रिहा किया गया।

कॉन्‍ग्रेस के इस गुप्‍त रेडियो के बारे में एक दिलचस्‍प बात ये है कि इसका पहला ट्रांसमीटर 10 किलोवाट का था जिसे शीघ्र ही नरीमन प्रिंटर ने और पुरज़े जोडकर सौ किलोवाट का कर दिया। अंग्रेज़ पुलिस की नज़र से बचने के लिए ट्रांसमीटर को तीन महीने के भीतर ही सात अलग अलग स्थानों पर ले जाया गया। और प्रसारणों को अंजाम दिया गया। 12 नवंबर 1942 को नारीमन प्रिंटर और उषा मेहता दोनों को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया और नेशनल कॉन्‍ग्रेस रेडियो समाप्‍त हो गया। वैसे आपको बता दें कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आज़ाद हिंद फौज’ भी अपना रेडियो स्‍टेशन चलाती थी। सन 1942 में ‘आज़ाद हिंद फौज’ ने अपना रेडियो-स्‍टेशन शुरू कर दिया था। इसे पहले जर्मनी से चलाया गया। उसके बाद सिंगापुर और रंगून से भी ‘आज़ाद हिंद रेडियो’ के ज़रिए भारतीय जनता के लिए समाचार प्रसारित किये जाते रहे।

‘आज़ाद हिंद रेडियो’ का कई मायनों में बड़ा महत्‍व रहा है। नवंबर 1941 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी के रेडियो स्‍टेशन से भारतीयों के नाम अपने संदेश का प्रसारण किया और उसमें कहा—‘तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्‍हें आज़ादी दूंगा’। ये नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अमर-कथन बन गया। आपको बता दें कि महान क्रांतिकारी कप्‍तान राम सिंह ठाकुर आज़ाद हिंद फौज के संस्‍थापक सदस्‍य थे। आज़ाद हिंद फौज के ज्‍यादातर गानों की धुन उन्‍हीं ने तैयार की। वो आज़ाद हिंद फौज के रेडियो के सिंगापुर और रंगून स्‍टेशनों में संगीत निर्देशक भी रहे। कहते हैं कि भारत के राष्‍ट्रगान की धुन उन्‍हीं ने तैयार की थी। आजा़द हिंद फौज के कौमी-तरोन ‘कदम कदम बढ़ाए जा’ और संपूर्ण राष्‍ट्र गान ‘शुभ सुख चैन की बरखा-बरसे भारत भाग्य है जागा’.की धुन उन्‍हीं की है। जी हां इसी गीत के अंशों को राष्‍ट्र गान का रूप दिया गया है।

15 अगस्त 1947 के दिन पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने और ऐतिहासिक लाल किले पर राष्ट्रीय झंडा फहराने लगे तो उनके आग्रह पर राम सिंह ठाकुर ने आईएनए आर्केस्ट्रा के कलाकारों के साथ आज़ाद हिंद फौज के कौमी तराने की धुन सुनाई। उसकी ये पंक्तियां आज भी जोश पैदा कर देती हैं—‘शेर-ए-हिन्द आगे बढ़, मरने से फिर कभी ना डर, उड़ाके दुश्मनों का सर, जोशे-वतन बढ़ाये जा, कदम कदम बढ़ाये जा’।

capt_ramsingh_thakur02871सन 1945 में खींची गयी तस्‍वीर। जिसमें कप्‍तान रामसिंह ठाकुर राष्‍ट्रगान बजा रहे हैं। और महात्‍मा गांधी सुन रहे हैं।


चूंकि पाक्षिक बुधवारीय श्रृंखला 'अग्रज पीढ़ी' की पोस्‍ट का ज़रूरी हिस्‍सा होता है एक ऑडियो। इसलिए परंपरा को निभाते हुए प्रसंगवश हम आपको सुनवा रहे हैं वो क़ौमी-तराना जो आज़ाद हिंद फौज के रेडियो से अकसर बजा करता था। इसे सुनकर बहुत रोमांच होता है। आपको बता दें कि स्‍वर कलकत्‍ता यूथ कॉयर का है।

क़दम-क़दम बढ़ाए जा
क़दम-क़दम बढ़ाए जा
खुशी के गीत गाए जा
यह जिंदगी है कौम की
तू कौम पे लुटाए जा।
तू शेरे हिन्द आगे बढ़
मरने से फिर भी तू न डर
उड़ा के दुश्मनों का सर
जोशे-वतन बढ़ाए जा।
क़दम-क़दम...
तेरी हिम्मत बढ़ती रहे
खुदा तेरी सुनता रहे
जो सामने तेरे अड़े
तो खाक में मिलाए जा।
क़दम-क़दम...
चलो देहली पुकार के
क़ौमी निशाँ सँभाल के
लाल किले पे गाड़ के
लहराए जा, लहराए जा।
क़दम-क़दम...


गीत एवं संगीत रामसिंह ठाकुर

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