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Saturday, October 22, 2011

चुनौतीपूर्ण होता है शोक-कार्यक्रमों को पेश करना

जगजीत सिंह के अवसान कि खबर ने एक बड़ा झटका दिया संगीत-संसार को.

मीडिया को कितना निस्संग और निर्मम होना पड़ता है इसकी एक बानगी आज आपको दी जाए.

जब भी कोई उम्र-दराज़ फ़िल्मी हस्ती अस्पताल पहुँचती है तो रेडियो और टीवी वाले आपातकालीन तैयारियां कर लेते हैं. ताकि वो सबसे पहले श्रद्धांजलि प्रस्तुत कर सकें. ये बात आपको इसलिए बता रहा हूँ क्यूंकि जगजीत गए तो किसी को इसका अंदेशा तक नहीं था. इससे पहले जब शम्मी कपूर अस्पताल में भर्ती किये गए तो भी किसी ने सोचा नहीं था कि वो हमें छोड़ कर चले जायेंगे. दरअसल शम्मी जी नियमित अस्पताल में भर्ती होते थे और डायलिसिस वगैरह करवाके लौट आते थे. अचानक सितम्बर कि एक सुबह उनकी विदाई का संदेसा आ गया.

रेडियो और टीवी कि दुनिया में आजकल इतनी प्रतियोगिता है कि सबसे पहले और सबसे आगे रहने की तमन्ना में हमें जाने क्या क्या करना पड़ता है. इसमें कुछ बातें निस्संगता और निर्ममता लग सकती हैं. मुद्दा ये है कि जब किसी फ़िल्मी हस्ती कि दुनिया से विदाई होती है और आप रेडियो पर सबसे पहले कोई कार्यक्रम सुनते हैं तो शायद आपके मन में ये नहीं आता होगा कि इसके लिए जो संसाधन हैं वो पहले से जुटाकर रखे गए होंगे. त्वरित प्रस्तुति होते हुए भी इसकी तैयारियां करके रखी होंगी. गाने, जानकारियाँ, इंटरव्यू और संवाद पहले से जमा कर लिए गए होंगे. लेकिन जैसे ही आपको ये बात पता चलती है कि हम रेडियो वालों को अमूमन पहले से मानसिक रूप से तैयारी करके रखनी पड़ती है, तो निश्चित है कि ये बात आपको बहुत नागवार गुजरेगी. पर ये दुनिया ऐसी ही है. हमें सचमुच इतना निर्मम होना पड़ता है.

जगजीत के जाने के बाद मुझे अचानक विविध भारती के लिए श्रद्धांजलि कार्यक्रम पेश करना पडा. यकीन मानिए एक तो अपने प्रिय कलाकार के दुनिया से चले जाने का सदमा और ऊपर से आनन फानन देश के सबसे बड़े रेडियो चैनल पर कार्यक्रम प्रस्तुत करना.....ये बेहद कठिन था. या सच है कि ये हमारा पेशा है, हमें इसकी आदत होती है. लेकिन लाख आदत हो जाए. लाख आप खुद को संभाल लें, पर जिस कलाकार से आपकी जिंदगी की इतनी सारी यादें, इतने सारे रेफेरेंस जुड़े हों. उसकी आवाज़ सुनकर ही सारा धीरज टूट जाता है. केवल आधे घंटे कि उस पेशकश के लिए मैंने ना तो इंटरव्यू ढूंढे,  ना ज्यादा जानकारियाँ जमा कीं...इस कार्यक्रम को जज्बाती बनाकर पेश किया. अपने मन कि सच्ची बातें कीं. जो नियमित सुनते हैं उन्होंने महसूस किया कि मेरी आवाज़ काँप रही है. स्टूडियो के कुछ साथियों के गले रुंधे थे....आंखे भीगी थी, यहाँ तक कि एक सहयोगी जब फिल्म और संगीत कि दुनिया की जानी मानी हस्तियों को फोन पर रिकॉर्ड कर रही थीं तो वो रो पड़ीं. श्रद्धांजलि के कार्यक्रमों में समकालीन कलाकारों से बातें करना भी एक चुनौती होती है. क्यूंकि अमूमन किसी का मन नहीं होता उस वक्त बातें करने का. पर हमें सवाल कर करके बातें निकलवानी पड़ती हैं. संस्मरण निकलवाने पड़ते हैं. ये सब उस श्रोता के लिए किया जाता है, जो ऐसे मौकों पर हमसे उम्मीद लगाए रहता है. यकीन मानिए ये अपने आपमें बहुत चुनौतीपूर्ण कार्यक्रम होते हैं.

परदे के पीछे कि ये सच्चाइयां दर्शकों या श्रोताओं तक नहीं पहुँचती. लेकिन इससे प्रदर्शनकारी कलाओं से जुड़े लोगों के जीवन और काम कि मुश्किलों का अंदाजा ज़रूर लगाया जा सकता है. हम जब कार्यक्रम पेश कर रहे होते हैं तो ज़्यादातर अच्छा यही माना जाता है कि हमारे निजी एहसास सामने ना आयें. पर फिर भी आवाज़ और चेहरे झूठ तो नहीं बोल सकते ना. आवाजों की दुनिया में मन की भावनाएं उजागर हो ही जातीं हैं. रेडियो कि दुनिया में कितनी कितनी मिसालें हैं, चुनौतीपूर्ण खबरें देने की. जैसे जब महात्मा गांधी की ह्त्या हो गयी तो रेडियो पर उसकी खबर मेलविल डी-मेलो ने पढ़ी थी. उन्होंने जिस तरह इस खबर को पढ़ते हुए पॉज़ लिया था, वो रेडियो की दुनिया का सबसे सूझ-बूझ भरा पॉज़ बन गया था. वो ज़माना तेज़ी से सूचनायें पहुँचने का नहीं था. इसलिए लोग रेडियो पर निर्भर रहते थे. रेडियो ने ये खबर पंहुंचाई और पूरा देश स्तब्ध रह गया. यही विनम्रता और संवेदनशीलता पिछले कुछ दशकों में कुछ और मशहूर हस्तियों के निधन पर भी देखी गयी।

शोक या दुःख से भरे पलों के कार्यक्रम पेश करने का पाना एक तरीका है. एक अनुशासन है. रेडियो-प्रोफेशनल इसे मानें या ना मानें पर अलिखित रूप से श्रोता भी उम्‍मीद तो यही करते हैं कि जैसा धक्‍का या दुख उन्‍हें पहुंचा है—उनके पसंदीदा रेडियो-प्रस्‍तुतकर्ताओं को भी पहुंचा होगा। पर अगर रेडियो-प्रजेन्‍टर अपने ही रंग में रंगा नज़र आए—तो सुनने वाले स्‍तब्‍ध रह जाते हैं।
देखा जाता है कि आज के नए ज़माने के रेडियो चैनल ऐसे लम्हों में भी संयमित नहीं होते. एक खास किस्म का शोर, एक खास किस्म कि आक्रामकता के साथ ये चैनल कार्यक्रम पेश करते हैं, ज़ाहिर है कि इस आक्रामकता में दुखी होने की गुंजाइश नहीं होती. अगर थोड़ी बहुत गुंजाइश निकाल भी ली जाए तो भी उसके लिए ज़्यादा वक्त नहीं दिया जा सकता. यही कारण है कि ऐसे मौक़ों पर कई मशहूर चैनल भी अपेक्षा के अनुरूप बर्ताव करते नहीं पाए जाते। वो जिस धूम-धड़ाके के लिए जाने-जाते हैं—उससे पार नहीं हो पाते। बाज़ार के दबाव उन्‍हें ज़्यादा देर अफ़सोस के रंग में रहने नहीं देते। इसलिए उनका मनाया अफ़सोस भी किसी त्यौहार या मार्केटिंग की तरह लगता है।

जगजीत सिंह की विदाई के बहाने आपने अपने शहर के रेडियो-चैनलों का असली रंग देखा होगा। जब भी कोई बड़ा कलाकार दुनिया से विदा हो, तब किसी भी चैनल के सरोकारों और उसकी गंभीरता का असली रंग आप आसानी से पहचान सकते हैं। अगर आप एक जागरूक श्रोता हैं तो आपको ये फर्क आईने की तरह साफ़ नज़र आएगा।

(जनसंदेश लखनऊ में बुधवार 19 अक्‍तूबर को प्रकाशित)

Thursday, October 20, 2011

रेडियो - आशिक भगवान काका

भगवान काका लालकृष्ण आडवाणी के उलट थे । उनकी पैदाइश भी सिन्ध प्रान्त की थी । बँटवारे की फ़िरकावाराना हिन्सा और दर्द को उन्होंने साम्प्रदायिकता विरोध को अपना आजीवन मिशन बनाकर जज़्ब किया था।

१९९२ - ९३ में जब जब देश भर में साम्प्रदायिक हिन्सा में हजारों निर्दोष लोग मारे गए तब महाराष्ट्र का भिवण्डी इस आग से बचा रहा। भिवण्डी साम्प्रदायिकता के लिहाज से अतिसंवेदनशील माना जाता है । साम्प्रदायिक हिन्सा का भिवण्डी का इतिहास भी था फिर भी भिवण्डी में आग नहीं भड़की यह अचरज की बात थी । भिवण्डी में सत्तर के दशक में हुए भयंकर दंगों के बाद जो मोहल्ला समितियाँ गठित हुईं उन्हें इस अचरज का पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए । यह समितियाँ पुलिस की पहल पर बनीं शान्ति समितियाँ नहीं हैं , भगवान काका जैसे शान्ति सैनिकों और जनता की पहल पर बनीं थीं । इनकी बैठक अमन के दिनों में भी नियमित होती हैं ।बनारस के सद्भाव अभियान के तालिमी शिबिरों में भगवान काका के सवाल होते थे - 'दूसरों' के मोहल्ले की चाय की दुकानों पर बैठते हो या नहीं ? उनके परचे और इश्तेहार पढ़ पाते हो ? ' चिट्ठेकार नीरज दीवान की तरह उर्दू लिपि पढ़ना जानने वाले तरुण कम ही मिलते थे।

आगे यहाँ पढ़ें " रेडियो आशिक- भगवान काका"

Saturday, October 8, 2011

रेडियो की स्मृति

रेडियो की स्मृति
ब्रजेश कानूनगो
गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह


कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें


बृजेश कानूनगो
25 सितम्बर 1957 देवास, मध्य प्रदेश मे जन्म । रसायन विज्ञान तथा हिन्दी साहित्य मे स्नातकोत्तर।
देश की प्रतिष्ठित पत्र –पत्रिकाओँ मेँ वर्ष 1976 से बाल कथाएँ ,बालगीत, वैचारिक पत्र, व्यंग्य लेख ,कविताएँ, कहानियाँ ,लघुकथाएँ प्रकाशित।
वर्ष 1995 मे व्यंग्यसंग्रह-पुन: पधारेँ, 1999 मे कविता पुस्तिका-धूल और धुएँ के परदे मेँ, 2003 मे बाल कथाओँ की पुस्तक- फूल शुभकामनाओँ के तथा 2007 मेँ बाल गीतोँ की पुस्तिका- चाँद की सेहत प्रकाशित।
स्टेट बैक आफ इन्दौर मे 33 वर्ष सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति। बैककर्मियोँ की साहित्यिक संस्था-प्राची के माध्यम से अनेक साहित्यिक गतिविधियोँ का संचालन। तंगबस्तियोँ के गरीब बच्चोँ के लिए चलाए जाने वाले व्यक्तित्व विकास शिविरोँ मे सक्रिय सहयोग।

503, गोयल रिजेंसी,
कनाड़िया रोड़, इन्दौर-18,
मो. नं. 09893944294

न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश
आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही

स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में कैद है
देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर
मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह

स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं
फसलों के बचाव के तरीके
माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता
अपने समय का महत्वपूर्ण कवि
सारंगी रोती रहती है अकेली
कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू

याद आता है रेडियो
सुनसान देवालय की तरह
मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना
जब सम्भव नही होता आसानी से
और तब आता है याद
जब मारा गया हो बडा आदमी

वित्त मंत्री देश का भविष्य
निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें
परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का
धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें
फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेन्द
और निकल जाए प्राण टेलीविजन के
सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त
तब आता है याद
कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला
पुराना रेडियो

याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति
जब युवा पिता
इमरती से भरा दौना लिए
दफ्तर से घर लौटते थे।

Wednesday, October 5, 2011

पी.सी.चैटर्जी का एक दिलचस्‍प किस्‍सा: न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा, कड़ी 8

मशहूर समाचार वाचिका शुभ्रा शर्मा रेडियोनामा पर अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। पिछले कुछ हफ्तों से छुट्टियां मनाने गईं शुभ्रा जी अब फिर इस श्रृंखला को आगे बढ़ा रही हैं। आठवीं कड़ी में वो बातें कर रही हैं मशहूर प्रसारणकर्ता पी.सी.चैटर्जी की। आपको बता दें कि उनकी दो मशहूर पुस्‍तकें आई हैं। एक है broadcasting in india जो भारत में प्रसारण के इतिहास पर लिखी गयी एक बेहद सटीक और महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक है। उनकी दूसरी पुस्‍तक आत्‍मकथात्‍मक है The Adventure in Indian Broadcasting; A Philosopher's Autobiography. जिसका जिक्र शुभ्रा जी इस संस्‍मरण में कर रही हैं। ये पुस्‍तक आप यहां से प्राप्‍त कर सकते हैं। शुभ्रा जी के बाक़ी लेख पढ़ने के लिए चटका लगायें यहां।


समाचार कक्ष से अपनी यादों की पिछली कड़ियाँ पढ़ रही थी,तो सोचा ऐसा क्यों हुआ कि वहां सिर्फ मेरी यादें हैं? क्या मुझसे पहले...बहुत पहले से.....समाचार तैयार नहीं होते थे, प्रसारित नहीं होते थे? कौन थे वह लोग जिन्होंने इस प्रसारण की शुरुआत की, इसके नियम-क़ायदे बनाये और एक अनवरत परम्परा की नींव रखी?

समाचार सेवा प्रभाग के पुस्तकालय में जिस अलमारी में इस विषय की पुस्तकें रखी जाती थीं, उसे खोलने पर पाया कि देश की जनसंख्या की ही तरह वहां भी पुस्तकों की संख्या में अप्रत्याशित किन्तु अपार वृद्धि हुई है. हो सकता है कि मैं इसे प्रसारण के इतिहास के प्रति जागरूकता और सही दिशा में उठा क़दम मानकर खुश हो लेती मगर इस गुब्बारे से हवा निकल गयी, जब पता चला कि अधिकतर पुस्तकें ऐतिहासिक दस्तावेज़ न होकर मात्र पत्रकारिता के विविध संस्थानों की परीक्षा पास करने के उद्देश्य से जुटायी गयी हैं. लेकिन कहावत है न कि - "जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ" - सो मैं भी लगी रही....देर तक उस पोथी-समुद्र में डूबती-उतराती रही और आख़िरकार एक मोती ढूंढ लायी.

आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री पी सी चैटर्जी ने एक आत्मकथात्मक पुस्तक लिखी थी .... यह तो मुझे मालूम था, लेकिन अपने करियर की शुरुआत उन्होंने समाचार कक्ष से की थी......यह ज्ञात नहीं था. बहरहाल मैंने वह पुस्तक इशु करायी और छुट्टियों के दौरान पढ़ने के लिए अपने साथ ले गयी. और फिर, जैसा कि आम तौर पर होता है, आने-जाने, मिलने-मिलाने और देखने-दिखाने के बीच पुस्तक पढ़ने का मौक़ा हाथ नहीं लगा. दिल्ली लौटने के बाद ही उसे पढ़ पायी. कुछ हिस्से बड़े रोचक लगे.....ख़ास तौर पर शुरुआती दौर के न्यूज़ रूम का वर्णन.... तो सोचा क्यों न उस समय की कुछ बातें रेडियोनामा के अपने पाठकों के साथ शेयर करूँ.

यह घटना १९४३ की है. चैटर्जी साहब के पिता लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में पढ़ाते थे. बाद में वाइस प्रिंसिपल img037 और प्रिंसिपल भी बने. ख़ुद चटर्जी साहब ने भी वहीँ से दर्शन शास्त्र में एम ए किया था. वायु सेना के लिए चयन हो गया था लेकिन विमानों की कमी के कारण बुलावा नहीं आ रहा था. ख़ाली बैठे क्या करें....यही सोचते हुए दिल्ली में अपने एक मित्र तोतो गुप्ता को पत्र लिखा कि कोई नौकरी ध्यान में हो तो बताना. मित्र ने फ़ौरन जवाब दिया कि ऑल इंडिया रेडियो में भर्ती चल रही है. आवेदन भेज दो. चैटर्जी साहब को यह तक पता नहीं था कि किस पद के लिए भर्ती हो रही है....बस एक सादे काग़ज़ पर अपनी योग्यता लिखकर, एकाध प्रमाण-पत्रों के साथ डायरेक्टर न्यूज़ को भेज दी. जल्दी ही बुलावा भी आ गया और वे दिल्ली आ गये.

दिल्ली में वे विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार राय बहादुर निशिकांत सेन के यहाँ ठहरे. रजिस्ट्रार के बंगले से अलीपुर रोड के एक बंगले से चल रहे ऑल इंडिया रेडियो तक का रास्ता साइकिल से नापते हुए जब वे न्यूज़ रूम में दाख़िल हुए तब उनके मित्र तोतो गुप्ता ने उन्हें सीनियर असिस्टेंट न्यूज़ एडिटर श्री ए एन भनोट से मिलवाया, जो डायरेक्टर के बाद दूसरे सबसे बड़े अधिकारी थे. श्री भनोट ने उनसे कहा कि इंतजार करें. डायरेक्टर श्री चार्ल्स बार्न्स उन्हें बुलाएँगे.

चैटर्जी साहब शाम तक इंतजार करते रहे. पूरे दिन किसी ने उनसे कोई बात नहीं की. सभी लोग अपने काम में व्यस्त थे. संपादक आते-जाते रहे. स्टेनो को ख़बरें लिखवाते रहे. बुलेटिन प्रसारित होते रहे. आखिरकार शाम के करीब छः बजे श्री बार्न्स ने उन्हें बुलवा भेजा. चैटर्जी साहब ने लिखा है कि वे लगभग चालीस मिनट बार्न्स साहब के कमरे में रहे मगर उन्हें बैठने को नहीं कहा गया. बार्न्स साहब ने उन्हें वापस श्री भनोट के पास भेज दिया. भनोट जी ने उन्हें अलग-अलग दिन अलग-अलग शिफ्ट में ड्यूटी दी ताकि वे सभी शिफ्ट्स का कामकाज समझ सकें.

चैटर्जी साहब ने लिखा है कि उन दिनों अंग्रेज़ी में चार महत्त्वपूर्ण बुलेटिन प्रसारित होते थे. सवेरे आठ बजे, दोपहर डेढ़ बजे, शाम छः बजे और रात नौ बजे. सवेरे और रात के बुलेटिन १५-१५ मिनट के होते थे और दिन तथा शाम के बुलेटिन १०-१० मिनट के. अंग्रेज़ी के बुलेटिनों के ठीक बाद हिन्दुस्तानी के बुलेटिन प्रसारित किये जाते थे. चैटर्जी साहब ने इस बात को ख़ास तौर पर रेखांकित किया है कि ये बुलेटिन हिंदी या उर्दू में न होकर हिन्दुस्तानी में होते थे, यानी उस भाषा में जो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को आसानी से समझ में आ सके. इसके बाद विभिन्न भारतीय भाषाओँ के १०-१० मिनट के बुलेटिन होते थे.

इन बुलेटिनों के संपादन का काम कुछ इस तरह बाँटा जाता था कि अंग्रेज़ी के लिए दो संपादक होते थे, जिनमें से एक ए एन ई और एक सब-एडिटर होता था. हिन्दुस्तानी के लिए ए एन ई या कोई अनुभवी सब होता था. भाषायी बुलेटिन दूसरे सब-एडिटर सँभालते थे. अंग्रेज़ी का बुलेटिन जैसे-जैसे बनता जाता था...उसकी कॉपी हिन्दुस्तानी और अन्य भाषायी एडिटरों के पास पहुँचती रहती थी. वही उनकी मास्टर कॉपी होती थी.

वैसे रॉयटर्स की ख़बरें टेलीप्रिंटर से आती रहती थीं और यू एन आई से भी दिन में ५-६ बार ख़बरों के टेक्स भेजे जाते थे. इनके अलावा लड़ाई की ख़बरों का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण स्रोत था बी बी सी. चैटर्जी साहब ने लिखा है कि बी बी सी से ख़बरें आती थीं, तब संपादक और स्टेनो हेडफ़ोन लगाकर बैठ जाते थे और यथाशक्ति, यथासंभव सभी समाचारों को नोट करने का प्रयास करते थे. अधिकारी उसी बुलेटिन को अच्छा समझते थे जो भाषा-शैली की दृष्टि से बी बी सी के सबसे निकट होता था.

भनोट साहब ने उन्हें यह सब देखने और सीखने को कहा था. सो, काफी समय तक देखने के बाद चैटर्जी साहब ने ए एन ई से काम माँगा. बड़े मनोयोग से ख़बर की प्रसारण-योग्य कॉपी बनायी लेकिन देखा कि ए एन ई ने उसे एक तरफ फेंक दिया. बेचारे मन मसोस कर रह गये. क्या करते. लेकिन जल्दी ही उन्हें अपनी योग्यता साबित करने का मौक़ा मिला.

तब तक ऑल इंडिया रेडियो का कार्यालय अलीपुर रोड से संसद मार्ग वाले प्रसारण भवन में स्थानांतरित हो गया था. इस वजह से काफी अव्यवस्था फैली हुई थी. उनके मित्र तो गुप्ता ने छुट्टी की अर्जी दी थी कि उनकी पत्नी किसी भी समय बच्चे को जन्म देने वाली थीं. लेकिन उनकी अर्जी कहीं इधर-उधर पड़ी रह गयी और उस पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. एक दिन सुबह ड्यूटी पर आने के बाद चैटर्जी साहब को पता लगा कि गुप्ता जी नहीं आएंगे और उन्हें सवेरे आठ बजे का बुलेटिन अकेले ही बनाना होगा. डायरेक्टर चार्ल्स बार्न्स पूरा बुलेटिन फोन पर पढ़वाकर सुनते थे. उस दिन भी सुना और प्रसारण की अनुमति दे दी.

कोई दस बजे भनोट साहब आये. चैटर्जी साहब ने उन्हें बताया कि गुप्ताजी नहीं आ सके. भनोट साहब का चेहरा फक्क पड़ गया. चिल्ला पड़े - तो फिर बुलेटिन किसने बनाया?

चैटर्जी साहब ने शांत भाव से कहा - मैंने.

भनोट बिगड़े - मुझे ख़बर क्यों नहीं की?

चैटर्जी साहब ने कहा - चिंता की कोई बात नहीं है. मैंने बार्न्स साहब को पढ़कर सुना दिया था और उनकी मंज़ूरी ले ली थी.

इसके बाद दोनों अधिकारियों के बीच जो भी सलाह-मशविरा हुआ हो उसका तो पता नहीं, लेकिन उस दिन से चैटर्जी साहब को अकेले बुलेटिन की ज़िम्मेदारी सौंपी जाने लगी.

चैटर्जी साहब की पुस्तक में यह प्रसंग पढ़ने के बाद से मैं बराबर सोच रही हूँ कि १९४३ के न्यूज़रूम से आज २०११ के न्यूज़रूम तक क्या और कितना परिवर्तन हुआ है. यह तो स्पष्ट है कि बुलेटिनों की संख्या बढ़ी है, उनकी अवधि बढ़ी है, तकनीकी प्रगति के कारण अब हम दूर दराज़ के संवाददाताओं की आवाजें सीधे बुलेटिनों में शामिल कर पाते हैं. लेकिन क्या आज भी न्यूज़रूम में पहली बार प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपने आप को डायरेक्टर चार्ल्स बार्न्स  के सामने खड़ा हुआ नहीं पाता, क्या उसके मेहनत से किये गये काम को उठाकर एक तरफ नहीं फेंक दिया जाता और सबसे बड़ी बात यह कि क्या कोई उसे धैर्य के साथ उसका काम समझाता है?  

Monday, October 3, 2011

जन्मदिन मुबारक हो विविध भारती

आज विविध भारती के जन्मदिवस विविध भारती और उनके सभी अनांऊसर्स और श्रोताओं को हार्दिक बधाई। इस अवसर पर पर हमने पाठकों और श्रोता बिरादरी ग्रुप पर मित्रों से अनुरोध किया था कि वे अपनी रेडियो से जुड़ी यादें हमें भेजें। तो नेहा शर्मा जी, राजश्री शर्माजी और अखिलेन्द्र प्रताप जी यादव ने अपनी यादें हमें लेख कर भेजी है तो हम सहर्ष उन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

Rajshree Sharma
रेडियो की बात करते ही बचपन की याद आ जाती है ,और बचपन के साथ बरसाती पानी सी हहराती यादें बादलों भरे आसमान में बिजली सी कौंध जाती हैं |ढेरों खट्टी मीठी ,चुलबुली यादें इस मन को वापस वहीं बाबुल के आँगन में खींच ले जाती है | पापा उस समय पचमढ़ी में पोस्टेड थे बेहतरीन ब्रिटिशकाल का बंगला मिला था | भाईजी सबसे बड़े थे और बेहद ज़हीन पर शरारती | हम बहनों पर उनका बड़ा रूआब था | गाने सुनने के बेहद शौक़ीन | उन्होंने ही हम बहनों को रेडियो के चस्के के साथ उसकी तमीज़दारी से भी वाकिफ कराया | पापा के घर में ना होने परऊँचे सुर में गाने सुनने का बड़ा शौक |

उस समय पचमढ़ी का मौसम काफी खुशनुमा हुआ करता था |स्कूलों की छुट्टियाँ भी भारी बरसात के कारण गर्मियों की नहीं बरसात की हुआ करती थी| ऐसे ही भारी बरसात के दिन माँ खाना बना रही थी ,पापा के ऑफिस में होने का फायदा जोर -२ सेरेदियो सुन कर उठाया जा रहा था| गाना बज रहा था "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम" हम दो छोटी बहने आगे कमरे में खिड्की की चौखट पर चढ़े हुए रेडियो के साथ खूब झूम झूम कर गुनगुना रहे थे पीछे के आँगन में बड़ी बहने झूले पर रेडियो के साथ सुर मिला रही थीं | माँ के एक बार मना करने पर मस्ती में हमने ध्यान नहीं दिया, और दुबारा माँ ने टोका तो भाईजी ने बढ़ावा दिया "गाओ गाओ कितना अ
च्छा गा रही हो" तारीफ से फूल कर हम दोनों ने बिना सुर लय ताल के चिल्ला -२ कर गाना शुरू कर दिया , फिर थोड़ी देर बाद पीछे जब बहनों को डांट पड़ी तो भाईजी ने उनका हौसला भी ऐसे ही बढ़ाया| २-४ बार कहना नहीं सुनने पर सप्तम सुर में गाने वाली हम बहनों की जो खिचाई और धुलाई हुई उससे दरअसल में हमारे "नैन रिमझिम रिमझिम" बरसने लगे और भाईजी शरारतसे मुस्कुराने लगे | अब जब भी ये गीत कहीं बजता है तो उन मासूम दिनों को याद करके आँखे भीग जाती हैं और ओठों पर मुस्कराहट आ जाती है

Akhilendra Pratap Singh
आज विविध भारती ने अपने 54 साल पुरे कर लिए और साथ ही साथ मेरी रेडियो भी इसकी आधी उम्र यानि 27वें साल के सफ़र में है. यह रेडियो 1984 में पापा को उनकी शादी में मिली थी. होश सभॉंलने से पहले पता नहीं घर कौन
कितना रेडियो सुनता था और न ही ये पता करने की कोशिश की, लेकिन जब होश सभॅांला तो घर में आकाशवाणी और बीबीसी हिंदी की आवाजों को सुनते पाया । पापा और चाचा जी को संगीत सुनने का कोई खास लगाव नहीं है वे लोग मुख्यत समाचारों और परिचर्चाओं को ही सुना करते थे . शाम के समय अक्सर चाचा जी "युववाणी " सुना करते थे। शुरू-शुरू में इस कार्यक्रम के गाने आकर्षित करने लगे ...थोड़ा बड़े हुए तो क्रिकेट का शौक बड़ा तो रेडियो पर क्रिकेट
कमेन्ट्री सुने जाने लगी...धीरे-धीरे रेडियो प्रेम बढने लगा. .तब आकाशवाणी वाराणसी और गोरखपुर खूब सुने जाते थे ।

एक दिन शोर्ट वेब पर बीबीसी हिंदी ट्यून करते समय एक आवाज़ सुनाई दी " मंथन है आपके विचारों का दर्पण " जिसे युनुस खान अपने चिर- परिचित जोशीले अंदाज़ में पेश कर रहे थे ...थोड़ी देर में ही पता चल गया की यही "देश की सुरीली धड़कन विविध भारती है.".. (इससे पहले विविध भारती के बारे में इतना सुना था की कि यह एक ऐसा रेडियो चैनल है जिस पर हरदम गाने बजते हैं लेकिन कभी ट्युन करने का प्रयास नहीं किया था.) फिर उस दिन से विविध भारती की आवाजें घर में गूँजने लगी....।
कुछ ही दिनों में ममता सिंह , रेनू बंसल , निम्मी मिश्रा , कमलेश पटक, लोकेन्द्र शर्मा ,कमल शर्मा, अशोक सोनावने , युनुस खान ,अमरकांत आदि सभी लोंगो की आवाजों ने मुझे विविध भारती का दीवाना बना दिया.. मैं और दीदी स्कूल से लौटकर पहले सखी सहेली और पिटारा सुनते ।. और रात में समाचार सध्‍ंया के बाद कहकशा , गुलदस्‍ता छायागीत सुनते ।
सुबह में त्रिवेणी , चित्रलोक , और आज के फनकार विशेष रूप सुन जाते थे ...। इन सब कार्यक्रमों के मध्य युनुस खान के साथ मंथन , जिज्ञासा , और यूथ एक्सप्रेस जैसे ज्ञानवर्धक कार्यक्रम विविध भारती के लिए एक अलग पहचान
कायम किये. जिसमे मनोरंजन के साथ साथ ज्ञान भी खूब बटोरे गये .। लोकेन्द्र शर्मा जी द्वारा पिटारा में प्रस्तुत किया जाने वाला कार्यक्रम " बाईस्कोप की बातें " की प्रंशसा के लिए कोई शब्द ही नहीं है मेरे पास ..।

हवामहल कभी कभार ही सुन पाने को मिलता क्योंकि ये पढाई के साथ -साथ बीबीसी हिंदी का भी वक्त होता था ! गत वर्ष ही अमृतसर के डीएवी कालेज द्वारा आयोजित एक रेडियो वर्कशॉप में संदीप सर की मदद से मेरी मुलाक़ात युनुस खान जी और ममता दीदी से हुई, और इसी वर्ष फरवरी में जब मुंबई गया तो विविध भारती स्टूडियो भी गया,शनिवार का दिन होने के कारण सिर्फ ममता दीदी से ही मुलाकात हो पाई ..उनके साथ चित्रलोक और समस के बहाने , वीबीएस के तराने दो कार्यक्रमों लाइव देखा. वाकई ये दोनों दिन मेरी जिन्दगी के सबसे खुबसूरत हैं !!

विविध भारती की इस 54वीं जयंती पर विविध भारती के सभी उद्घोषको को ढेर सारी शुभकामनाएं...
रेडियो प्रेमी
अखिलेन्द्र प्रताप यादव

गृह-नगर - आजमगढ़
(वर्तमान में लखनऊ में रहकर के पढाई कर रह रहा हूँ )
मोबाइल
:-8127842382
e-mail- akhilendra44@gmail.com

नेहा शर्मा
मेरे सपनों की दुनिया- विविध भारती
मुझे याद भी नहीं कि कब से मैं विविध भारती सुनती चली आई हूँ..शायद बहुत छोटी थी तभी ये आदत लग गई थी...और जब से विविध भारती और उसके प्रोग्राम के नाम याद रहने लगे...तब से ही कुछ नाम भी जाने पहचाने लगने लगे...ऐसे ही जाने पहचाने दो नाम थे...कमल शर्मा और युनुस खान...

शायद ये विविध भारती का प्यार ही था जो मुझे वोइसिंग की दुनिया से लगाव हुआ और मैं वोइस आर्टिस्ट भी बन गई..और १६ मई को मुझे एक सुनहरा मौका मिला...विविध भारती जाने का...बस सुबह से ही अपने सपनों की दुनिया में जाने की ख़ुशी संभाले नहीं संभल रही थी...मैं अपने बड़े भाई के साथ जाने वाली थी...उनकी पहचान युनुस भाई (हाँ...युनुस जी को अब तो इस नाम से पुकारा ही जा सकता है..) से इन्टरनेट पर हुई थी....घर से विविध भारती कुछ ४५ मिनट की दूरी पर है..जब घर से निकले तो रास्ते में ही हल्की बूंदाबांदी ने मानो मेरे सपने के सच होने की ख़ुशी में मेरे मन के भावों को बयां किया...ऑटो से हाथ बाहर निकालकर बूंदों को हाथ में लेकर मैंने भी ईश्वर का धन्यवाद किया...

हम विविध भारती पहुंचे...युनुस भाई से पहली बार मिलकर भी कोई औपचारिकता की बातें नहीं हुईं वो कुछ इस तरह से मिले जैसे कोई पुराना दोस्त अचानक मिल जाता है और बस अपने दोस्त के ताज़ा हालचाल पूछ लेता है...कोई औपचारिकता नहीं...?...आश्चर्य तो हुआ...पर जब उनमे अपनी आवाज़ से लोगों को अपना बनाने की ताकत है तो फिर सामने बैठे व्यक्तियों की तो बात ही क्या...

जब हम पहुंचे तब विविध भारती में एक प्रोग्राम लाइव चल रहा था...सखी सहेली...ये प्रोग्राम मेरा बहुत ही फेवरेट हुआ करता था...ऐसा लगता था मानो किसी सहेली से ही बातें हो रही हों..साथ ही इस पर चलने वाला पिटारा और हवा महल भी मेरे पसंदीदा कार्यक्रमों से एक हैं...

खैर उनसे बातें चल ही रही थी की एक शख्स उनसे मिलने पहुंचे और युनुस भाई ने उनका परिचय करवाया कि, "ये कमल जी हैं..." कमलजी भी उन बातों में शामिल हो गए...हंसी- मज़ाक का कुछ ऐसा दौर चला कि ऐसा लगा ही नहीं की हम यहाँ पहली बार आये हैं और इन सभी से पहली बार मिले हैं....(वैसे रेडिओ के जरिये हम तो कई बार इनसे मिल चुके थे...)...कमल जी ने मेरा मार्गदर्शन भी किया कि मुझे विविध भारती के लिए किन- किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए...उनसे बातें करके अच्छा लगा....

वैसे सच कहूँ तो ज्यादातर बातें युनुस भाई, कमलजी और मेरे भाई आलोक भैया के बीच ही चल रही थी....मैं तो यहाँ भी एक श्रोता की भूमिका में ही थी....लेकिन सुनकर भी कितना कुछ सीखा जा सकता है ये बातें उस दिन मुझे समझ में आई....दरअसल जब बातें ही इतनी खुबसूरत चल रही हों तो उन्हें बीच में रोकना तो सब से बड़ा गुनाह है....और उनको देखकर कुछ ऐसा लग रहा था..जैसे वो कोई बिछड़े दोस्त हों और कई अरसों बाद मिल गए हों...और जितनी बातें एक-दूसरे से कर सकें...कर लेना चाहते हों...मुझे याद है कुछ २-३ घंटे हमने वहां बिताये...फिर भी लग रहा था जैसे अभी तो आये हैं...

वो दिन कुछ अनोखा था....एक तोहफे की तरह...जो मुझे अचानक से मिल गया था....इस तरह से कभी विविध भारती में जाकर युनुस भाई और कमल जी से मिलने का मौका मिलेगा...सोचा न था....
नेहा शर्मा का ब्लॉग

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