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Wednesday, November 23, 2011

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन-2 :महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला


रेडियोनामा पर महेंद्र मोदी अपने संस्‍मरणों की पाक्षिक श्रृंखला लिख रहे हैं--'कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन'। इस श्रृंखला में राजस्‍थान से शुरू होकर देश के अलग अलग शहरों तक पहुंची उनकी रेडियो-जिंदगी की यादें आप पढ़ रहे हैं। दूसरी कड़ी।


उस ज़माने में राजस्थान में कहने को पांच रेडियो स्टेशन हुआ करते थे जिनमें से एक अजमेर में सिर्फ ट्रांसमीटर लगा हुआ था, जो पूरे वक्त जयपुर से जुड़ा रहता था. मुख्य स्टेशन जयपुर था और बाकी स्टेशन यानी जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर केन्द्रीय समाचार दिल्ली से रिले करते थे, प्रादेशिक समाचार जयपुर से, कुछ प्रोग्राम के टेप्स जयपुर से आते थे उन्हें प्रसारित करते थे और कुछ प्रोग्राम जिनमें ज़्यादातर फ़िल्मी गाने बजाये जाते थे, अपने अपने स्टूडियो से प्रसारित करते थे. मुझे इस से कोई मतलब नहीं था कि कौन सा प्रोग्राम कहीं और से रिले किया जाता है और कौन सा बीकानेर के स्टूडियो से प्रसारित होता है, मैं तो अपने मालिये ( छत पर बने कमरे ) में बैठा अपने उस छोटे से रेडियो को कानों से लगाए हर वक्त रेडियो सुनने में मगन रहता था. जब भी संगीत का कोई प्रोग्राम आता तो मैं बैंजो निकालकर उसके साथ संगत करने लगता...... उस वक्त मुझे इस बात का ज़रा भी आभास नहीं था कि खेल खेल में की गयी ये संगत आगे जाकर हर उस स्टेशन पर मेरे साथियों के बीच मुझे एक अलग स्थान दिलवाएगी जिस जिस स्टेशन पर मेरी पोस्टिंग होगी. हर बुधवार और शुक्रवार को रात में नाटक आया करता था जिसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकता था. रविवार को दिन में पन्द्रह मिनट की झलकी आती थी और महीने में एक बार रात में नाटकों का अखिल भारतीय कार्यक्रम. ये सभी कार्यक्रम मेरे सात रुपये के उस नन्हें से रेडियो ने बरसों तक मुझे सुनवाए.


उन दिनों जयपुर केंद्र से नाटकों में जो आवाजें सुनाई देती थीं उनमें प्रमुख थीं- श्री नन्द लाल शर्मा, श्री घनश्याम शर्मा, श्री गणपत लाल डांगी, श्री देवेन्द्र मल्होत्रा, श्री गोरधन असरानी (आगे चलकर फिल्‍मों के प्रसिद्ध कलाकार बने असरानी), श्रीमती माया इसरानी, श्री सुलतान सिंह, श्रीमती लता गुप्ता . इन सब कलाकारों के इतने नाटक मैंने सुने कि सबकी अलग अलग तस्वीरें मेरे जेहन में बन गईं. वो तस्वीरें इस क़दर पक्की हो गईं कि 22-23 बरस बाद सन १९८५ में जब मैं नाटकों के अखिल भारतीय कार्यक्रम के एक नाटक में भाग लेने के लिए इलाहाबाद से दिल्ली आया और नन्द लाल जी को पहली बार देखा तो मैं मानने को ही तैयार नहीं हुआ कि मेरे सामने खड़े सज्जन नन्द लाल जी हैं क्योंकि मेरे तसव्वुर के नन्द लाल जी तो लंबे चौड़े बहुत स्मार्ट से नौजवान थे मगर जो सज्जन मेरे सामने स्टूडियो में खड़े थे वो तो छोटे से कद के, मोटे शीशे का चश्मा लगाए अधेड उम्र के थे. उस दिन मेरे दिल-ओ-दिमाग में बनी एक शानदार तस्वीर चकनाचूर हो गयी थी मगर फिर सोचा, कितना बड़ा है ये कलाकार जिसने अपने अभिनय से मेरे जेहन में इतनी कद्दावर तस्वीर उकेर दी. मैं उनके कदमों में झुक गया था, श्रद्धा से सराबोर. खैर ये बात आगे चलकर पूरी करूँगा. तो........ इन सभी कलाकारों के नाटक सुनते सुनते पता नहीं कब नाटक का एक बीज मेरे भीतर भी फूट पड़ा. कहते हैं आप चाहकर भी किसी को कलाकार बना नहीं सकते.... कला का बीज तो हर कलाकार में जन्म से ही होता है......जब भी उसे सही वातावरण मिलता है वो बीज अंकुरित होने लगता है……नाटक करने की कितनी क्षमता मुझमें रही है इसका आकलन तो मैं खुद नहीं कर सकता मगर नाटक करने का शौक़ मुझे बचपन में उस वक्त से रहा है जब मुझे पता भी नहीं था कि जो मैं कर रहा हूँ उसे नाटक कहते हैं.


मुझे याद आ रही है ऐसी ही एक घटना...... बात उस वक्त की है जब मेरी उम्र थी लगभग चार साल. मेरी एक रिश्ते की मौसी जी उज्जैन से आए हुई थीं. वो, मेरी माँ और मेरी मामी जी बैठी हुईं बातें कर रही थीं और मैं जो कि अपनी मौसी जी के बहुत मुंह लगा हुआ था, वहाँ खूब शैतानियां कर रहा था. सभी लोगों ने मुझे शैतानियाँ न करने के लिए कहा लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं हुआ  और मैंने अपनी मस्ती चालू रखी. जब सब लोग तंग हो गए तो मेरी मौसी जी ने आख़िरी हथियार का उपयोग किया. वो बोलीं “ देख महेन्द्र, अब भी तू नहीं मानेगा तो मुझे तेरी शिकायत जीजा जी (मेरे पिताजी) से करनी होगी.” लेकिन मैं शैतानी करने से फिर भी बाज़ नहीं आया क्योंकि मैं मान ही नहीं सकता था कि मेरी इतनी प्यारी मौसी जी मेरी शिकायत पिताजी से कर सकती हैं. जब मैं किसी भी तरह काबू में नहीं आया तो मौसी जी उठीं और अंदर की तरफ जिधर के कमरे में पिताजी बैठे हुए थे चली गईं. दो मिनट बाद लौटकर आईं और बोलीं “ महेन्द्र , जा तुझे जीजा जी बुला रहे हैं.” मुझे अंदाजा हो गया कि वो मुझे बेवकूफ बना रही हैं, उन्होंने मेरी शिकायत हरगिज़ नहीं की है. मैं उठा.... अंदर आँगन के चार चक्कर लगाए और रोता हुआ वापस उस कमरे में आ गया जहां मौसी जी वगैरह बैठे थे. मैं सिर्फ नकली रोना चाह रहा था मगर न जाने कैसे नकली रोते रोते सचमुच मेरी आँखों में आंसू आ गए. मौसी जी घबराईं.... बोलीं “ अरे क्या हुआ? क्यों रो रहे हो?” मैं रोते रोते बोला “ पहले तो मेरी शिकायत पिताजी से करके डांट पड़वा दी और अब पूछ रही हैं क्यों रो रहे हो?” उन्होंने मुझे गोद में लिया और बोलीं “लेकिन बेटा न तो मैं उनके पास गयी और न ही तुम्हारी शिकायत की . मैं तो वैसे ही आँगन में चक्कर लगा कर आ गई थी.” मेरी आँखें तो अब भी आंसुओं से भरी हुई थी मगर मुझे जोर सी हंसी आ गयी और  मैंने कहा “ तो मैं कौन सा उनके पास गया था? मैं भी आँगन में चक्कर लगाकर लौट आया था.” इस पर वो बोलीं “ अरे राम...... फिर ये इतने बड़े बड़े आंसू? ये कैसे आ गए तुम्हारी आँखों में ?” इसका मेरे पास भी कोई जवाब नहीं था ....... क्योंकि मुझे खुद पता नहीं लगा कि रोने का अभिनय करते करते कब मेरी आँखों में सचमुच के आंसू आ गए. शायद ये मेरी ज़िंदगी का पहला मौक़ा था जब मैंने सफलतापूर्वक नाटक किया था. उस वक्त मेरी उम्र महज़ चार साल थी, मुझे कहाँ समझ थी कि जो मैंने किया, उसे नाटक कहते हैं और आगे जाकर ये नाटक मुझे ज़िंदगी के कितने कितने रंग दिखायेगा?

Wednesday, November 16, 2011

सुबह आठ और रात पौने नौ बजे का बुलेटिन-न्‍यूज़ रूम से शुभ्रा शर्मा: दसवीं कड़ी

रेडियोनामा पर जानी मानी समाचार वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने दिलचस्‍प पाक्षिक संस्‍मरण लिख रही हैं। उनके सारे लेख आप यहां चटका लगाकर पढ़ सकते हैं।


एक समय था जब स्कूल-कॉलेज या ऑफिस जाने वालों के लिए आकाशवाणी का सवेरे आठ बजे का बुलेटिन घर से रवाना होने की पहली घंटी के समान होता था. जिसको जब भी रवाना होना होता था, वह आठ बजे के बुलेटिन को मीन टाइम बनाकर, उसके इर्द गिर्द अपने चाय - नाश्ते का क्रम बता देता था. मसलन मेरी स्कूल बस लगभग पौने नौ बजे आती थी तो मैं घर वालों को आगाह कर देती थी कि मैं बुलेटिन के साथ नहाने जाऊंगी और उसके फ़ौरन बाद नाश्ता करूंगी. मेरे पापा चाय - काफी नहीं पीते थे. तो उनके लिए भी मेरे साथ ही दूध का गिलास तैयार कर दिया जाता क्योंकि वे दूध काफी ठंडा करके पीते थे. पापा हिंदी और अंग्रेज़ी के दोनों बुलेटिन अहिंसा की तरह "परम धर्म" मानकर सुनते थे और उसके बाद स्नान - ध्यान में लग जाते थे. बुलेटिन शुरू होने के समय से घर की घड़ियाँ मिलायी जाती थीं. घड़ी का समय बिलकुल सही है, यह बताने के लिए बस इतना ही कहना काफी होता था कि "रेडियो टाइम" से  मिली है. आगे तर्क की कोई गुंजाईश ही नहीं रह जाती थी.

यह बहुत ख़ुशी की बात है कि तमाम अच्छे - बुरे परिवर्तनों के बीच आकाशवाणी की यह परंपरा आज तक क़ायम है. आठ बजे का बुलेटिन अब भी ठीक आठ बजे प्रसारित होता है .... न एक सेकण्ड पहले, न एक सेकण्ड बाद. पहले इसकी ज़िम्मेदारी दिल्ली केंद्र के तकनीकी सहायकों की होती थी.... अब स्वचालित यंत्रों की है. ठीक समय पर स्टूडियो की लाल बत्ती जल जाती है और शुरू हो जाता है समाचारों का सिलसिला.

आज से कोई २४-२५ वर्ष पहले सुबह आठ बजे और रात पौने नौ बजे के बुलेटिन इतने अधिक महत्त्वपूर्ण माने जाते थे कि नये वाचकों को कई-कई बरस तक पढ़ने को नहीं मिलते थे. किसी को १३ तो किसी को १७ बरस तक इंतज़ार करना पड़ा.

इस बारे में वरिष्ठ समाचार वाचक हरी संधू एक मज़ेदार क़िस्सा सुनाते हैं. बताते हैं कि उन्हें न्यूज़ रूम में hari sandhu_thumb[16] आये कई साल हो गये थे लेकिन तब भी रात पौने नौ का बुलेटिन पढ़ने को नहीं मिला था. संधू जी को पान खाने का शौक़ है. कई बार दुकान से पान बँधवा कर ले आते हैं. एक दिन न्यूज़ रूम में शाम सात बजे के आस-पास चाय का दौर चला. चूँकि अगले बुलेटिन में अभी काफी देर थी, सो संधू जी ने सोचा - तब तक पान जमाया जाये.

पान का दोना निकाला ही था कि इंदु वाही सामने आ गयीं. इंदु जी ने कहा - पान तो हम भी खायेंगे.

संधू जी ने दोना उनके आगे बढ़ा दिया.

इंदु जी ने उसमें से दो पान निकाले और मुंह में रख लिए. दोना वापस संधू जी के पास आ गया.

इंदु जी ने सिद्धहस्त पान खाने वालों की तरह पान मुंह में घुला तो लिया, लेकिन जैसे ही उसका कुछ अंश भीतर गया.....सर पकड़ कर बैठ गयीं.

नाराज़ होकर बोलीं- संधू, इसमें क्या है ?

संधू जी बोले - पान.

इंदु जी बोलीं- हाँ हाँ, पान तो है लेकिन इसके अंदर क्या है?

संधू जी ने निहायत मासूम अंदाज़ में गिनाना शुरू किया - चूना, कत्था, सुपारी, ख़ुशबू और तम्बाखू .....

तम्बाखू भी था?.....कहती हुई इंदु जी बाहर भागीं.

पान थूकने, कुल्ले करने और ठंडा पानी पीने के बाद भी जब उनकी तबियत नहीं संभली, तब आखिरकार पौने नौ का बुलेटिन उनकी जगह संधू जी को पढ़ना पड़ा.

संधू जी कहते हैं कि उन्होंने जान बूझ कर इंदु जी को तम्बाखू वाला पान नहीं दिया था. उधर, इंदु जी कहती थीं कि पान देने से पहले उन्हें बताना चाहिए था कि उसमें तम्बाखू पड़ा हुआ है. मेरे न्यूज़ रूम में आने के बाद तक दोनों के बीच यह बहस जारी थी.

दूसरी तरफ थीं एक कैजुअल समाचार-वाचिका, जो मेरे लगभग दो वर्ष बाद के पैनल में चुनकर आयी थीं. जिस दिन उनकी न्यूज़ रूम में पहली ड्यूटी लगी, संयोग से मैं भी ड्यूटी पर थी. शायद किसी ने उन्हें मुझसे बात करने और काम समझने की सलाह दी होगी. वे मेरे पास आकर बैठीं. लेकिन मैंने देखा कि उनकी

दिलचस्पी काम समझने में कम और यह समझने में ज़्यादा थी कि न्यूज़ रूम का असली कर्ता-धर्ता कौन है. जब मैंने उनके तिरछे सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया तो उन्होंने सीधे-सीधे पूछ लिया - वाचकों का ड्यूटी चार्ट कौन बनाता है?

मैंने उन्हें बताया कि विनोद कश्यप जी सबसे सीनियर समाचार वाचिका हैं और वे ही वाचन का चार्ट बनाती हैं.

इस पर उन्होंने पूछा कि विनोद जी कब और कहाँ मिलेंगी.

मैंने उन्हें ले जाकर विनोद जी से मिलवा दिया.

उन्होंने नमस्कार किया और कहा - मैं पौने नौ का बुलेटिन पढ़ने आयी हूँ.

मैं और विनोद जी, दोनों अवाक........ बस उनका चेहरा ही देखते रह गये.

फिर विनोद जी ने अपनी गुरु गंभीर आवाज़ में कहा - तो फिर कबसे पढ़ना चाहेंगी?

इसके पहले कि वे कोई और ज़बरदस्त बयान देतीं, मैं उन्हें कोहनी से पकड़ कर विनोद जी के आगे से हटा ले गयी.

अब सुनिए मेरा हाल.... मुझे न्यूज़ रूम में दाख़िल हुए लगभग दो वर्ष हुए थे. जुलाई १९८७ से मैंने आकाशवाणी में ड्यूटी शुरू की थी और यह बात होगी मई १९८९ की. ज़ाहिर है तब तक मैंने न तो सवेरे आठ बजे का कोई बुलेटिन पढ़ा था और न रात पौने नौ का. बल्कि छोटे-मोटे बुलेटिन बनाने या पढ़ने की ज़िम्मेदारी निभाते हुए भी अक्सर लोग-बाग मुझे छेड़ते रहते थे कि - मैडम अब बस एक- दो महीने की बात है. प्रोबेशन पीरियड किसी तरह शांति से बीत जाने दो.   

पिछली किसी कड़ी में मैंने ज़िक्र किया है कि उन दिनों ड्यूटी लगाने से पहले प्रशासन के लोग फोन कर, हमारी सुविधा पूछ लिया करते थे. ऐसे ही एक दिन प्रशासन से गिलानी जी का फोन आया. उन्होंने पहले तो मेरी उपलब्धता पूछी और फिर मुझे बताया कि इस बार वे मेरी ड्यूटी आठ बजे के बुलेटिन के संपादन पर लगा रहे हैं.

मैं बुरी तरह घबड़ा गयी. पहला तर्क तो मुझे यही सूझा कि भाई, जिस व्यक्ति को आप बुलेटिन पढ़ने के योग्य नहीं समझते हैं, उसे संपादन की ज़िम्मेदारी कैसे सौंप सकते हैं?

लेकिन इस तर्क को गिलानी जी ने नकार दिया. बोले - यह सोचिये कि कितने लोग होंगे, जिन्होंने पढ़ने से भी पहले बुलेटिन बनाया होगा?

मैंने तरकश से दूसरा तीर निकाला. कहा - मैं अभी अपने को इस योग्य नहीं समझती.

गिलानी जी ने मेरा यह तीर भी काट दिया. कहने लगे - आप ख़ुद जो चाहे समझें... लेकिन अफसरों ने काफी सोच समझ कर ये फ़ैसला किया है. और आज नहीं तो कल, जब आपको संपादन करना ही है तो आज ही क्यों नहीं कर लेतीं.

मैं और कोई तर्क नहीं दे पायी. मुझे बुलेटिन बनाना ही पड़ा..... और वह भी पढ़ने से पहले.

बहुत सारी यादें उमड़ घुमड़ कर आती जा रही हैं. पहला बुलेटिन बनाना.....पढ़ना....महानिदेशक की बैठक में जाना....आलोचना सुनना..... और बेहतर काम करने का संकल्प लेना और भरसक उस संकल्प को पूरा करना.

आज की हमारी-आपकी बातचीत शुरू हुई थी बुलेटिन के ठीक समय से प्रसारण को लेकर तो चलते- चलते इसी सन्दर्भ में एक क़िस्सा सुनाती चलूँ. हुआ यों कि उस दिन भी मेरी आठ बजे का बुलेटिन बनाने की ड्यूटी थी. बुलेटिन की ख़बरें तो तैयार थीं, मगर यह अंदाज़ नहीं लग रहा था कि हेडलाइन्स क्या होंगी और उनका क्रम क्या होगा. हमारे बुलेटिन का समय पास आता जा रहा था. सिर्फ दो मिनट रह गये थे जब हेडलाइन्स हमारे पास पहुंची. इतना समय नहीं था कि उनका अनुवाद कराया जा सके. मैं अंग्रेज़ी  हेडलाइन्स ही हाथ में लेकर स्टूडियो की तरफ दौड़ी. सोचा था.... ख़बरों के पहले वाक्य हेडलाइन्स के तौर पर पढ़वा दूँगी. लेकिन उसके लिए उन सभी ख़बरों का मेरे हाथ में होना ज़रूरी था. इसलिए दौड़ते-दौड़ते भी ख़बरें छांटती जा रही थी. कमरे के बाहर पैर रखा ही था कि धड़ाम से गिरी.

समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों वाला अंश पढ़ने के लिए राजेंद्र चुघ मेरे पीछे आ रहे थे. मुझे गिरते देखा तो एकदम चिल्ला पड़े - अरे रे.... क्या करती हो.

उन्हें देख कर मेरी जान में जान आयी. मैंने कहा- मुझे छोड़ो...  हेडलाइन्स लेकर भागो. मैं आ रही हूँ.

चुघ साहब वाक़ई मेरे हाथ से हेडलाइन्स लेकर बगटूट भागे.

मैं जब तक लंगड़ाती हुई स्टूडियो में पहुंची, वे मुख्य वाचक से हेडलाइन्स पढ़वा चुके थे.

उन्होंने मुझे इशारा किया कि तुम बैठ जाओ .... मैं बुलेटिन पढ़वा देता हूँ.

लेकिन मैंने उन्हें इशारा किया कि मैं अब ठीक हूँ. कर लूंगी.

बुलेटिन के बाद मुझे 'झाँसी की रानी' और 'राणा सांगा' जैसी उपाधियों से नवाज़ा गया. कुछ लोग मेरे गिरने के स्थल पर मरने वाली चींटियों को गिनने भी गये. ड्यूटी के बाद मैं गाड़ी चलाकर घर भी आ गयी.

शाम को मेरे डिब्बे जैसे फूले पैर के एक्स-रे से पता चला कि उसकी एक कोई बेचारी मुन्नी-सी हड्डी टूट गयी है. अब दर्द के बावजूद हंसने की मेरी बारी थी.

Wednesday, November 9, 2011

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन-1 :महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला

रेडियो की दुनिया में महेंद्र मोदी का नाम किसी के लिए अनजान नहीं है। हिंदी रेडियो नाटकों में उन्‍होंने अपना महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। हमारे लंबे इसरार के बाद आखिरकार मोदी जी रेडियोनामा के लिए अपने संस्‍मरणों की श्रृंखला शुरू करने जा रहे हैं। राजस्‍थान के बीकानेर से विविध-भारती मुंबई तक की इस लंबी यात्रा में रेडियो के अनगिनत दिलचस्‍प किस्‍से पिरोये जायेंगे। खट्टी-मीठी यादें आपसे बांटी जायेंगी। इन दिनों मोदी जी राजस्‍थान की लंबी यात्रा पर हैं इसके बावजूद उन्‍होंने समय निकालकर श्रृंखला का आग़ाज किया है। उम्‍मीद है कि आप सभी इस श्रृंखला का गर्मजोशी से स्‍वागत करेंगे। ये बता दें कि हर दूसरे बुधवार मोदी जी के संस्‍मरण होंगे और हर दूसरे बुधवार शुभ्रा जी के संस्‍मरण। इस तरह बुधवार रेडियोनामा पर 'संस्‍मरण-वार' होगा।
स्कूल से घर लौटकर बस्ता रखा और मुंह हाथ धोकर खाना खाने बैठा ही था कि दरवाज़े की सांकल बजी. सोचा, लाय ( आग ) modiji बरसती ऐसी दुपहरी में कौन होगा भला? घर में और कोई था नहीं उस वक्त, भाई साहब अपने किसी सहपाठी के यहाँ गए हुए थे, पिताजी अपने दफ्तर और माँ मौसीजी के घर. उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा पसीने से सराबोर मेरा दोस्त हरि अपनी साइकिल को सामने के पेड़ की हल्की सी छाया में खड़ी कर दरवाज़ा खुलने की राह देख रहा है. दरवाज़ा खुलते ही वो चिलचिलाती धूप को भागकर पार करते हुए घर के अंदर घुस गया. बीकानेर की गर्मी के तेवर उन दिनों कुछ ज्यादा ही तेज हुआ करते थे. ए. सी. तो बहुत दूर की चीज़ थी, कूलर भी नहीं होते थे उन दिनों. पचास में से किसी एक घर में पंखा होता था और बाकी लोग खस की टट्टियाँ खिड़कियों पर लगाकर उस से छनकर यदा कदा आती हवा से ही गुज़ारा किया करते थे. नींद की मीठी मीठी झपकियों के बीच बार बार हाथ के पंखे को झलना बहुत अखरता था और भगवान पर बड़ा गुस्सा आता था कि वो गर्मी के मौसम में खूब तेज हवा क्यों नहीं चलाये रखता? मगर हवा जो बंद होती थी तो कुछ इस तरह बंद होती थी कि पेड़ का पत्ता तक नहीं हिलता था और मुझे याद है कि घर में बिजली लगने से पहले कई बार मेरी माँ रात रात भर बैठ कर हम लोगों को पंखा झलती रहती थीं. जब कई कई दिन इसी तरह गुजर जाते तो सब लोग भगवान से अरदास(प्रार्थना) करते “हे भगवान और कुछ नहीं तो आंधी ही भेज दे.”

भगवान को भी पश्चिमी राजस्थान की इस धोरों (रेत के टीलों) की धरती पर बसे हर तरह के अभाव झेलते लोगों पर थोड़ी दया आ जाती और इधर उधर से कोई आवाज़ आ जाती “अरे काली पीली आंधी आ रही है रे ......” और सब लोग उठ खड़े होते थे काली पीली आंधी को देखने के लिए. क्षितिज पर उभरता एक छोटा सा काला पीला धब्बा थोड़ी ही देर में रेत का समंदर बनकर पूरे आकाश को ढंक लेता था . हर ओर बस रेत ही रेत .... सड़क की बत्तियाँ जला दी जाती थीं क्योंकि इस काली पीली आंधी की परत इतनी मोटी होती थी कि सूर्य देवता की तेज किरणें भी उस परत को भेद नहीं पाती थीं. हर तरफ मिचमिचाती आँखें और सर पर रुमाल या गमछा लपेटे लोग.....और हाँ हर आँख रेत से कडकडाती हुई और हर मुंह रेत से भरा हुआ. ये आंधी लगातार कई कई दिनों तक चलती रहती थी. इसी रेत की आंधी के बीच सोना, इसी रेत के बीच उठना, इसी के बीच नहाना धोना और इसी के बीच खाना पीना....सुबह सोकर उठते तो देखते कि जिस करवट सोये थे उस करवट पर शरीर के साथ साथ रेत का एक छोटा सा टीला बन गया है और पूरा मुंह रेत से भरा हुआ है. आँखों को बहुत देर तक खोल नहीं पाते थे क्योंकि आँख की पलकें रेत से भरी हुई होती थीं. मगर ये रेत की काली पीली आंधी अपने साथ एक ऐसी सौगात लेकर आती थी जिसकी वजह से इतनी तकलीफों के बावजूद ये आंधी हमें बुरी नहीं लगती थी. ये सौगात थी .... गर्मी से राहत. जितने दिन ये आंधी चलती रहती थी ज़ाहिर है, हवा भी चलती रहती थी और हवा चलने का मतलब गर्मी से ज़बरदस्त राहत. मैं जल्दी से हरि को ड्राइंग रूम में ले गया जहां पंखा लगा हुआ था,एक खिड़की में खस की टट्टी लगी हुई थी और रेडियो पर धीमी धीमी आवाज़ में अल्लाह जिलाई बाई का गाया लोक गीत बज रहा था “थांने पंखियो झलाऊँ सारी रैन जी म्हारा मीठा मारू ..........” वो गाना तो नहीं पर फिलहाल अल्‍लाह जिलाई बाई को यहां सुनिए



बीकानेर में रेडियो स्टेशन सन १९६२ में खुल गया था.घर में रेडियो तभी आ गया था मगर रेडियो उन दिनों ड्राइंग रूम की शोभा हुआ करता था. सब लोग उसके चारों तरफ बैठकर ज़ाहिर है,घर के बड़ों की पसंद के प्रोग्राम सुना करते थे.रेडियो पर प्रोग्राम भी DSC01344 चलते रहते थे और गपशप भी. कभी ताऊजी या मामा जी आ जाते थी या पिताजी के मित्रों की मंडली जम जाती थी तो हम बच्चों को वहाँ से हटना पड़ता था. शायद बड़ों को लगता था कि चाहे हम बच्चे पास न बैठे हों गाने तो दूर तक भी सुनाई देते ही थे इसलिए उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं लगता था कि रेडियो सुनने के हमारे अधिकार को वो हमसे छीन रहे हैं क्योंकि बाकी लोगों के लिए रेडियो फ़िल्मी गाने सुनने का साधन मात्र था. दो बातें थीं जो मुझे बहुत परेशान करती थीं. दरअसल मेरे पास एक बैंजो था जो भाई साहब के छठी कक्षा में अव्वल आने पर पिताजी ने उन्हें बतौर ईनाम दिलवाया था, उन्होंने तो दो चार दिन उसे बजाने की कोशिश कर के रख दिया था मगर मुझे वो बहुत आकर्षित करता था, एक दिन भाई साहब से डरते डरते पूछा “आप तो इसे बजाते नहीं हैं, क्या....... मैं........ इसे बजाने की कोशिश करूँ?” वो बोले “हाँ मुझसे तो नहीं बज रहा है ये, तुम कोशिश करके देख लो “. मैं रेडियो के पास बैठकर गानों के साथ साथ बैंजो पर सुर मिलाने की कोशिश करता था. जब लोग आस पास बैठे होते तो मेरी ये साधना नहीं हो सकती थी क्योंकि इस काम में एकाग्रता की ज़रूरत होती थी और भीड़ में मैं एकाग्रचित्त नहीं हो पता था. मेरी दूसरी परेशानी ये थी कि मुझे फ़िल्मी गाने सुनने में जितना आनंद आता था, उस से कहीं ज्यादा आनंद रेडियो नाटक सुनने में आता था, जब भी रेडियो पर नाटक सुनने का मौक़ा मिलता था मेरी कल्पना के सारे दरवाज़े खुल जाते थे और मैं दूसरी ही दुनिया में पहुँच जाता था......मगर दुर्भाग्य से घर में न जाने क्यों और किसी को भी रेडियो नाटक सुनने में कोई रुचि नहीं थी. इसलिए अगर कभी मैं रेडियो पर कोई नाटक लगा कर सुनने की कोशिश करता तो कोई न कोई स्टेशन बदल देता और मुझे नाटक की उस खूबसूरत दुनिया से बाहर आना पड़ता. ये दोनों ही समस्याएँ ऐसी थीं जिसका एक ही हल था कि मेरे पास अपना एक अलग रेडियो हो जिसपर मैं जब चाहूँ अकेला बैठकर नाटक सुन सकूं और जब चाहूँ, उस पर संगीत चलाकर उसके साथ बैंजो बजा सकूं. लेकिन........ जब बीस-तीस घरों में से किसी एक घर में रेडियो हो तो मुझ जैसे सातवीं आठवी कक्षा के छात्र के पास एक अलग रेडियो हो, ये शायद सपने में ही संभव था.
हरि घर के अंदर आया और आते ही बड़े उत्साह के साथ बोला “एक चीज़ लाया हूँ, तू देखेगा तो खुश हो जाएगा.” मैंने कहा “अरे भायला (दोस्त), इतनी गर्मी में आया है, पहले पानी तो पी ले, मेरे साथ दो निवाले रोटी के खा ले फिर देख लूँगा कि तू क्या लाया है.” दरअसल हरि डाक टिकिट इकट्ठे करता था इसलिए मैंने सोचा शायद कोई अच्छा डाक टिकिट लाया होगा दिखाने, जिसमें मुझे कोई खास रुचि नहीं थी. मगर उसने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया और बोला “दो तार के टुकड़े लेकर आ, फिर दिखाता हूँ तुझे कि मैं क्या लाया हूँ”. अब मुझे लगा कि शायद बात वो नहीं है जो मैं समझ रहा था. मैं उठा और दो तार के टुकड़े लेकर आ गया. अब हरि ने अपनी जेब से काले रंग का एक हैडफोन निकाला जो किसी फोन का एक हिस्सा लग रहा था, उसके पीछे की तरफ दो स्क्रू से निकले हुए थे. तार के दोनों टुकड़े उन स्क्रूज पर लपेटे गए. एक तार को एरियल के तौर पर ऊंचा टांग दिया गया और दूसरे तार के टुकड़े का एक सिरा हरि ने मेरे मुंह में डाल दिया. उस हैडफोन में कुछ कम्पन्न सी होने लगी तो हरि ने उसे मेरे कान से लगा दिया. उसमें बहुत ही साफ़ साफ़ आवाज़ में गाने आ रहे थे. हरि बोला “घर में बिजली न हो, तब भी आकाशवाणी, बीकानेर इसमें जब तक स्टेशन चालू रहे सुना जा सकता है. प्रभु रेडियो पर पांच रुपये में हैडफोन मिलता है और उसमें दो रुपये का एक क्रिस्टल लगवाना पड़ता है.”

उसी शाम अपनी गुल्लक को तोड़ा तो देखा उसमें आठ रुपये चार आने जमा थे. अपने उस बैंक को खाली करते हुए मुझे ज़रा भी अफ़सोस नहीं हुआ क्यों कि मुझे लगा, इसके बाद मेरी दुनिया बदल जाने वाली थी. मैंने प्रभु रेडियो से हैडफोन खरीद कर उसमें क्रिस्टल लगवाया और घर आकर अपने कमरे में उसे अच्छी तरह स्थापित कर दिया.... मेरा कमरा ऊपर की मंजिल पर था... एरियल के तार को खिडकी में से निकाल कर सबसे ऊपर लगी लाइट के छोटे से पोल से बाँध दिया. अब मेरे पास मेरा खुद का व्यक्तिगत रेडियो था. अब मैं जब चाहूँ, संगीत के साथ बैंजो बजा सकता था और अब मुझे रेडियो नाटक सुननेसे कोई नहीं रोक सकता था.



( क्रमश: )

Monday, November 7, 2011

जल्‍द आ रही है महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की एक श्रृंखला: 'कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन'

रेडियोनामा पर हमने हमेशा रेडियो से जुड़ी यादों को संजोने पर ज़ोर दिया है। modiji
हालांकि हम धीरे-धीरे रेडियो-विमर्श पर भी फोकस करने का प्रयास कर रहे हैं। नियमित संस्‍मरणों की श्रृंखला में हर बुधवार मशहूर न्‍यूज़रीडर शुभ्रा शर्मा अपने संस्‍मरण लिख रही हैं। जिसका नाम है--'न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा'। शुभ्रा जी की श्रृंखला को देश-विदेश में काफी पसंद किया जा रहा है।

इस दौरान हमारा दूसरा प्रयास है रेडियो से जुड़े बहुत पुराने दौर के मशहूर लोगों के इंटरव्‍यू का। हालांकि ये सिलसिला फिलहाल अनियमित है।


रेडियोनामा को और आगे बढ़ाने और नया आयाम देने की दिशा में आज हम ऐलान करने जा रहे हैं विविध भारती में सहायक केंद्र निदेशक रहे और रेडियो की दुनिया में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान देने वाले श्री महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला का।


मोदी जी ख़ासतौर पर रेडियो-नाटकों की दुनिया के एक महत्‍वपूर्ण हस्‍ताक्षर रहे हैं। अभी हाल ही में उन्‍होंने रेडियो में अपनी लंबी और कामयाब पारी खत्‍म की है। हमें याद है कि रेडियोनामा ब्‍लॉग की शुरूआत से ही इससे मोदी जी का प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष जुड़ाव रहा है। अब रेडियोनामा पर मोदी जी अपने संस्‍मरणों की लंबी श्रृंखला लेकर आ रहे हैं। इस श्रृंखला का नाम है--'कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन'।

तय ये पाया गया है कि श्रृंखला हर दूसरे बुधवार को प्रस्‍तुत हो। इस तरह रेडियोनामा पर हर बुधवार सजीला हो जायेगा।
एक बुधवार आप शुभ्रा जी को पढ़ेंगे। उसके अगले बुधवार को मोदी जी को। यानी संस्‍मरणों की जुगलबंदी।

उम्‍मीद है कि हमारा ये प्रयास आपको पसंद आयेगा।
सच तो ये है कि हम भी इस श्रृंखला को लेकर काफी उत्‍साहित और बेक़रार हैं।
इसके अलावा रेडियो की एक और मशहूर हस्‍ती श्री लोकेंद्र शर्मा से भी हमने अपनी यादें लिखने का अनुरोध किया है।
उनके लिखे का भी हमें इंतज़ार रहेगा।

तो मिलते हैं इसी बुधवार यानी नौ नवंबर 2011 को।

Thursday, November 3, 2011

'वरना गत्‍ता उठाकर फेंक देते': न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा: नौंवी कड़ी

रेडियोनामा पर जानी-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा अपने बेहद दिलचस्‍प संस्‍मरण लिख रही हैं। इस श्रृंखला का नाम है न्‍यूज़-रूम से शुभ्रा शर्मा। ये है इस श्रृंखला की नौंवी कड़ी। शुभ्रा जी के सारे लेख आप यहां चटका लगाकर पढ़ सकते हैं।


पुरानी दिल्ली की अलीपुर रोड की कोठी में न्यूज़ रूम की शुरुआत और फिर वहां से नयी दिल्ली के संसद मार्ग स्थित प्रसारण भवन में आने का क़िस्सा मैंने आपको पिछली कड़ी में आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक श्री पी सी चैटर्जी की ज़ुबानी सुनाया. संसद मार्ग पर प्रसारण भवन की भव्य इमारत के बारे में कुछ ख़ास लोगों, जैसे भीष्म साहनी, गोपीचंद नारंग और रेवती सरन शर्मा की राय से भी मैं आप को परिचित करा चुकी हूँ. आज न्यूज़ रूम के अंदर के कुछ ऐसे लोगों से आपको मिलवाती हूँ, जो दिन-रात समाचारों की दुनिया से जुड़े रहने के बावजूद कभी बाहरी लोगों के सामने नहीं आये. अपने काम की बदौलत न्यूज़ रूम में मिसाल बने..... लेकिन बाहरी दुनिया उनका नाम तक नहीं जान सकी. ऐसे ही एक युगपुरुष थे - नरिंदर सिंह बेदी जी.

मैं जब पहले-पहल हिंदी न्यूज़ रूम में आयी थी और यहाँ का कामकाज सीखने की कोशिश कर रही थी.....उन दिनों मेरे सीनियर्स अक्सर एक जुमला मेरी तरफ उछाला करते थे - " ख़ैर मनाओ कि तुम्हारा यह अनुवाद बेदी साहब के हाथ में नहीं जा रहा है, वरना सीधे गत्ता उठाकर बाहर फेंक देते."

( न्यूज़ रूम में हम ख़बरों को टाइप करवाकर और गत्ते पर लगाकर रखते हैं ताकि न्यूज़रीडर के पढ़ने के समय काग़ज़ की आवाज़ न हो.)

इस तरह शुरूआती दिनों में ही मैं इतना तो समझ गयी थी कि हो न हो बेदी साहब हिंदी न्यूज़ रूम की कोई तोप चीज़ थे. फिर धीरे-धीरे, अलग-अलग लोगों के मुंह से सुनकर जाना कि बेहद बुद्धिमान और समर्पित व्यक्ति थे. अनुवाद और संपादन में ख़ुद तो सिद्ध-हस्त थे ही, बहुत सारे दूसरे लोगों को सिखाने में भी उनका बहुत बड़ा योगदान था. मूर्खता और मूर्ख....दोनों को ही बर्दाश्त नहीं कर पाते थे इसीलिए गत्ते फेंकने की घटनायें होती रहती थीं. लेकिन जिसने उनके गत्ते फेंकने को एक चुनौती की तरह स्वीकार किया और अपने को बेहतर बनाने की कोशिश की...वह ज़रूर आगे बढ़ा.

बेदी साहब का जन्म २४ सितम्बर १९२२ को हुआ था. बी ए करने के बाद कई जगह नौकरी के लिए आवेदन भेजे. मौसम विभाग, वन विभाग और आल इंडिया रेडियो में चयन भी हो गया. कहाँ नौकरी करें, यह चुनने की अब उनकी बारी थी. रेडियो नयी, उभरती विधा थी. उन दिनों इसके साथ ज़बरदस्त ग्लैमर जुड़ा हुआ था. कुछ सार्थक करने का संतोष भी था. लिहाज़ा उन्होंने रेडियो की नौकरी स्वीकार कर ली. दिसंबर १९४४ में वे न्यूज़ रूम में आये. उन दिनों अंग्रेज़ी और हिन्दुस्तानी के बुलेटिन प्रसारित होते थे. हिन्दुस्तानी के बुलेटिन देवनागरी में नहीं बल्कि फ़ारसी लिपि में तैयार किये जाते थे. लाहौर से लेकर दिल्ली तक स्कूली पढ़ाई का माध्यम उर्दू भाषा थी. बेदी साहब को हिन्दुस्तानी के बुलेटिन बनाने का ज़िम्मा सौंपा गया तो उर्दू की पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इसमें कोई दिक्क़त पेश नहीं आयी.

दिक्क़त तब हुई, जब १९५१ के आस-पास सरकारी नीति के तहत हिन्दुस्तानी बुलेटिन समाप्त कर उनकी जगह हिंदी और उर्दू के अलग-अलग बुलेटिन शुरू किये गये. बेदी साहब को हिंदी लिपि का बिलकुल ज्ञान नहीं था. उनकी इस दिक्क़त को समझते हुए उन्हें जी एन आर यानी अंग्रेज़ी न्यूज़ रूम में भेज दिया गया. लेकिन बेदी साहब इस तरह हार मानकर बैठ जाने वाले व्यक्ति तो थे नहीं. इसलिए लगभग तीस साल की उम्र में और छः साल की नौकरी के बाद उन्होंने क ख ग से शुरुआत कर हिंदी सीखी और प्रभाकर की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया. और फिर हिंदी में पढ़े-लिखे लोगों को हिंदी में अनुवाद की बारीकियां समझायीं.

बेदी साहब ने १९४४ से १९८० तक आकाशवाणी में काम किया. अपने इस पूरे कार्यकाल के दौरान वे दिल्ली में ही रहे. कभी जी एन आर तो कभी एच एन आर में. उनके बिना दिल्ली के न्यूज़ रूम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. यह ज़रूर था कि जब कभी आकाशवाणी के किसी नये केंद्र से समाचारों का प्रसारण शुरू होता था तो डमी बुलेटिन बनाने और लोगों में कार्य संस्कृति विकसित करने का ज़िम्मा उन्हीं को सौंपा जाता था. जयपुर और जालंधर केन्द्रों से समाचारों का प्रसारण उन्हीं की देख रेख में शुरू हुआ था.

पूर्व समाचारवाचक कृष्ण कुमार भार्गव बता रहे थे कि बेदी साहब अगर ग़लती करने पर डांट पिलाते थे...तो अच्छा काम करने पर तारीफ करने में भी पीछे नहीं रहते थे. एक बार बुलेटिन पढ़ते-पढ़ते भार्गव जी को लगा कि समाचार कुछ कम पड़ सकते हैं. जैसेकि अगर सामान्य गति से पढ़ते रहने पर तीस पंक्तियों की आवश्यकता थी तो वहां केवल बीस पंक्तियाँ ही उपलब्ध थीं. मौक़े की नज़ाकत को भांपते हुए भार्गव जी ने पढ़ने की गति कम किये बिना, दो पंक्तियों और दो समाचारों के बीच का अंतराल थोड़ा-थोड़ा बढ़ाना शुरू कर दिया और सुनने वालों को यह बिलकुल महसूस नहीं हो सका कि बुलेटिन में पंक्तियाँ कम थीं या पढ़ने की गति धीमी थी. बुलेटिन के बाद बेदी साहब ने धीमे से कहा - "गुड". उनके उस एक शब्द को भार्गव जी आज तक अपना सबसे बड़ा प्रशस्ति-पत्र, सबसे बड़ा मेडल मानते हैं.

बेदी साहब के परिवार के लोग कहते हैं कि उन्होंने शायद ही कभी किसी त्यौहार पर पूरे दिन उनका साथ पाया हो. हर होली, दीवाली, दशहरे पर वे सबसे पहले अपनी ड्यूटी लगाते थे. उसके पीछे शायद यह भावना काम करती थी कि अगर वे ख़ुद ड्यूटी नहीं करेंगे तो दूसरों को ड्यूटी पर आने के लिए कैसे कहेंगे. पत्नी और बच्चे उनकी सारी दुनिया थे ..... लेकिन काम का महत्व उनसे भी कहीं अधिक था.

एक बात और .... जिस बात को सही समझते थे, उसके लिए अड़ जाते थे. यहाँ तक कि नौकरी छूट जाने तक की परवाह नहीं करते थे. एडमंड हिलेरी और तेन्ज़िंग नोर्के ने २९ मई १९५३ को दुनिया की सबसे ऊंची छोटी एवरेस्ट पर चढ़ने में कामयाबी हासिल की. ख़बर न्यूज़ रूम में आ चुकी थी लेकिन अधिकारी चाहते थे कि यह ख़बर सबसे पहले साढ़े आठ बजे के अंग्रेज़ी बुलेटिन में प्रसारित हो. इधर बेदी साहब का मन था कि सवा आठ बजे हिंदी के बुलेटिन में यह ब्रेकिंग न्यूज़ दें. बार-बार अनुरोध के बावजूद अधिकारीगण राज़ी नहीं हुए. समाचार पर २०३० तक प्रतिबन्ध लगा था...लगा ही रहा. बेदी साहब ने अपने समाचारवाचक से मंत्रणा की और बुलेटिन को साढ़े आठ से.... ज़रा आगे तक खींच दिया. प्रतिबन्ध की अवधि समाप्त हो गयी और "मुख्य समाचार एक बार फिर कहकर" समाचारवाचक ने एवरेस्ट विजय का समाचार सुना दिया.

बेदी साहब को शायरी का शौक़ था. ख़ुद भी लिखते थे.

ये रही नरिंदर सिंह बेदी "सुख़न" की शायरी ---

ज़ोर-ओ-जफ़ा को क्या करूँ... नाज़-ओ-अदा को क्या करूँ

इश्क़ है ख़ुद मेरा सिला, अहद-ओ-वफ़ा को क्या करूँ?

उसकी हयात जाँविदा... मेरी हयात चंद रोज़

वो भी तो ख़ुदनवाज़ है... ऐसे ख़ुदा को क्या करूँ?

आज तो हुस्न को भी ख़ुद... मेरी निगह की तलाश है

जलवे ही बेनक़ाब हैं... रस्म-ए-हया को क्या करूँ?

रूह में इक तड़प भी है... ज़हन में कुछ सवाल भी

सजदे को सर न झुक सका, दस्त-ए-दुआ को क्या करूँ?

काविश-ए-फ़न में सबको है... नाम-ओ-नमूद की हवस

मौत के बाद जो मिले... ऐसी बक़ा को क्या करूँ???

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जी का रोग निराला है... जब ये किसू को होले है

तारों के संग जागे है... अश्कों के संग सोले है .

बाद-ए-सबा दीवानी है... गुलशन-गुलशन डोले है

किस जलवे को ढूँढे है... घूँघट-घूँघट खोले है.

ओस बड़ी दीवानी है...दश्त में मोती रोले है

चाँद बड़ा सौदाई है ...दूध में हीरे घोले है.

दिल अपना मस्ताना है, रहबर-रहज़न क्या जाने

जो भी ढब से बात करे... साथ उसी के होले है.

इस तिफ्लों के मेले में... खेल-खिलौने बिकते हैं

आंसू कौन ख़रीदेगा... क्यों पलकों पर तोले है?

ये तो "सुख़न" दीवाना है... इसकी बातें कौन सुने

'फ़ैज़-ओ-फ़िराक़' की महफ़िल में 'मीर' की बोली बोले है.

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मोल-तोल के शहर में आकर हम क्या नफ़ा कमा बैठे

क़िस्मत ने दो आँखें दी थीं... उनको भी धुंधला बैठे.

जब से सफ़र पे निकला हूँ, धूप ने साथ निभाया है

रुका तो साये बन गये साथी, चला तो हाथ छुड़ाया है.

अब तो अपने यार भी हमको किश्तों-किश्तों मिलते हैं

सालिम मिलने वाले जाने किस आकाश पे जा बैठे.

ये तो जहाँ भी जाता है बस उलटी-सीधी कहता है

आज "सुख़न" के आते-आते हम तो बज़्म उठा बैठे.

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ये नया दौर है इस दौर के पैग़ाम समझ

घर उजड़ जाने को ख़ुश-आइए-अय्याम समझ.

ख़ुदफ़रोशी का अगर तुझ में सलीका ही नहीं

छोड़ काऊस.. उसे ज़हमत-ए-नाकाम समझ.

इन फ़िज़ाओं में मयस्सर है किसे उम्र-ए-दराज़

जो भी साँस आये उसे ज़ीस्त का इनाम समझ.

अहदे-जम्हूर, दयानत, नयी रख्शंदा सदी

सब बड़ी बातों को अलफ़ाज़ का इबहाम समझ.

ज़हर-आलूद धुआं हो तो उसे अब्र न जान

शोरिश-ए-ज़हल को मत धर्म का अहकाम समझ

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