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Sunday, December 25, 2011

कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन-4: महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला




पांचवीं क्लास तक मैं जिस स्कूल में पढ़ा, उसका नाम था राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर ९ . बहुत ही साधारण सा स्कूल था,अंग्रेज़ी के ए बी सी डी अभी कोर्स में नहीं थे हालांकि सभी गुरु लोग अंग्रेज़ी का नाम लेकर डराया करते थे कि अभी ये हाल है तो अगले साल छठी में क्या करोगे जब अंग्रेज़ी पढनी पड़ेगी. टाट पट्टी पर बैठना होता था अपने बराबर के बच्चों के साथ भी और अपने से बड़े बड़े चूहों के साथ भी. फर्श पर बड़े बड़े गड्ढे थे और बड़ी बड़ी मूंछों वाले एक मास्टर जी जिनका नाम श्री किशन जी था, एक बड़ा सा डंडा हाथ में लेकर जब क्लास में अवतरित होते थे तो हम सब बच्चों के प्राण सूख जाते थे. कम से कम मुझे तो वो चूहे, वो गड्ढे, वो मूंछे और वो डंडा हर चीज़ बड़ी बड़ी सी लगती थी. घर में साळ(अंदर का कमरा जिसे आज की भाषा में बैडरूम कह सकते हैं ) और ओरा ( साळ के अंदर का कमरा जिसमें पूरे घर की संदूकें रहती थी, अनाज रहता था और वो सभी चीज़ें रहती थी जो रोज़मर्रा काम में आने वाली नहीं होती थीं ) मुझे बचपन में बहुत बड़े बड़े लगा करते थे लेकिन अभी कुछ दिन पहले जब मैं बीकानेर गया तो अपने पुराने मोहल्ले में जाकर उस घर को एक बार देखने को मन ललचा गया जिसमें मैंने आँखें खोली थीं .

फड बाज़ार का वो मोहल्ला जिसमें कभी हम खुलकर मारदडी(एक खेल जिसमें एक दूसरे को गेंद फेंक कर मारा जाता है) और सतोलिया(सात ठीकरी और एक गेंद से खेला जाने वाला एक खेल) खेला करते थे अब भीड़ भरे बाज़ार में बदल गया है. कार आधा किलोमीटर दूर हैड पोस्टऑफिस के पास खडी करके मैं किसी तरह पैदल पैदल अपने पुराने घर में पहुंचा जिसे हमने १९९५ में लतीफ़ खान जी को बेच दिया था और उन्होंने उस पूरे घर को दुकान में बदल दिया था. मैं अंदर पहुंचा तो वो साळ और ओरा मुझे बहुत ही छोटे छोटे लगे मुझे समझ नहीं आया कि बचपन के इतने बड़े बड़े साळ और ओरा आखिर सिकुड़ कर इतने छोटे कैसे हो गए? मुझे एक बार को लगा, नहीं ये वो घर नहीं है जिसमें मैं पैदा हुआ बड़ा हुआ. १०-११ बरस की छोटी सी उम्र में मैं रसोई में बैठकर खाना बनाया करता था और मेरी माँ आँगन में खाट पर लेटे लेटे मुझे खाना बनाना सिखाती रहती थीं क्योंकि वो बहुत बीमार रहने लगी थीं जब मैं छोटा सा ही था.ये इतना छोटा सा आँगन? नहीं ये वो घर नहीं हो सकता.मैं ऊपर अपने प्रिय मालिए में भी गया जिसमें बैठकर मै पढाई भी करता था और बैंजो पर रियाज़ भी करता था. अरे ये तो बहुत ही छोटा सा कमरा है जबकि मेरे ज़ेहन में ये एक अच्छा बड़ा सा कमरा था. तब मैंने महसूस किया कि बचपन में चूंकि हम छोटे होते हैं हमें हर चीज़ बड़ी बड़ी लगती है और जब बड़े हो जाते हैं तो सभी चीज़ें छोटी लगने लगती हैं . मुझे वो बग्घी (विक्टोरिया) भी बहुत विशाल लगती थी, बिलकुल किसी राजा के सिंहासन की तरह, जो मेरे बड़े मामा राम चंद्र जी होली के दिन अपने क़ाफिले में लेकर आया करते थे और हम दोनों भाइयों को उस पर बिठा कर ले जाया करते थे . बड़ा लंबा काफिला हुआ करता था . आगे एक बग्घी और उसके पीछे कई तांगे.उन दिनों बीकानेर में कार तो शायद महाराजा करनी सिंह जी के पास हुआ करती थी और कुछ बड़े वणिक पुत्रों के पास. आम आदमी की सवारी थी तांगा और जो लोग थोड़े समृद्ध होते थे वो बग्घी पर आया जाया करते थे.


ये तो जब मैं १९८३ में आकाशवाणी, मुम्बई में कार्यक्रम अधिशासी बनकर आया तो इन बग्घियों की जिन्हें यहाँ की भाषा में विक्टोरिया कहा जाता था की दुर्दशा देखी. ५० पैसे में इसकी सवारी की जा सकती थी. तो... होली के मौके पर उस बग्घी पर बड़े बड़े लाउड स्पीकर्स लगे रहते थे. मेरे मामा जी बहुत पढ़े लिखे नहीं थे ये मुझे उस वक्त पता लगा जब मैं काफी बड़ा हो गया. मैं तो उन्हें काफी विद्वान समझता था क्योंकि चाहे वो ज्यादा पढ़े लिखे न हों और एक सेठ के यहाँ मुनीम की नौकरी करते हों, मगर उनमें एक बहोत बड़ा गुण था. वो आशुकवि थे. खड़े खड़े किसी पर भी कविता कर देते थे और वो इतनी सटीक हुआ करती थी कि लोग दांतों तले अंगुली दबाने लगते. उनका गला भी इतना सुरीला था कि जब वो गाते तो लोग जस के तस खड़े रह जाते. एक बात और बताऊँ, हँसेंगे तो नहीं न....? वो मुझे प्यार से चीनिया (चीनी) पुकारते थे क्योंकि मैं बचपन में ज़रा गोल मटोल था और मेरी आँखें छोटी छोटी थीं. आप सोच रहे होंगे कि मैं यहाँ अपने मामाजी का बखान क्यों कर रहा हूँ, मगर उसका एक कारण है जो अभी आपको समझ में आ जाएगा. उन दिनों बीकानेर में होली का त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता था . होली से १५ दिन पहले लोग अपने चंग(बड़े बड़े डफ) निकाल लेते थे और हर गली कूचे में चंग और मजीरों के साथ कुछ सुरीली आवाजें गूंजने लगती थीं “हमैं रुत आई रे पपैया थारै बोलण री रुत आई रे............... ढमक ढमक टक ढमक ढमक .............” गीत बहुत से हुआ करते थे. लोग शराब या भंग पीकर अश्लील गीत भी गाया करते थे,ज़्यादातर के अर्थ भी मुझे समझ नहीं आते थे मगर चंग की ढमक ढमक और ऊंचे सुर में ली हुई टेर दिल के अंदर तक उतर जाती थी .


जैसे जैसे होली नज़दीक आती ये गीतों का रंग और गहरा होता जाता और पूरा बीकानेर शहर चंग, मजीरों और गीतों के सागर में डूबने लगता. आखिरकार होली खेलने का दिन आ जाता. यों तो बिना किसी जाति-धर्म के भेदभाव के सभी लोग फाग गाते और फाग खेलते मगर शहर के परकोटे के अंदर पुष्करणा ब्राह्मणों के दो समुदायों की होली दूर दूर से लोग देखने आते थे. चौक में दोनों ओर चंग, मजीरों, डोल्चियों, रंग से भरे बड़े बड़े टबों से सुसज्जित हर्षों और व्यासों के दो समूह जिन्हें बीकानेर की भाषा में गैर कहा जाता है और चौक के चारों ओर घरों की मुंडेरों पर औरतों के समूह के समूह. एक प्यार भरा संगीतमय युद्ध शुरू होता था जिसमें एक दूसरे पर रंग की बौछारें भी की जाती थीं और साथ ही स्नेह से सराबोर संगीतमय गालियों के तीर भी छोड़े जाते थे.हालांकि मैंने इस अद्भुत युद्ध के बारे में सिर्फ पढ़ा है या फिर सुना है, इसे साक्षात देखा नहीं पर अब भी दिल के किसी कोने में ये इच्छा है कि इसका साक्षी बनूँ, पता नहीं अब ये वैसा होता भी है या बाकी त्योहारों की तरह इसकी भी बस लोग तकमील ही पूरी करके रह जाते हैं.  हम लोगों के लिए भी ये दिन बहुत खास हुआ करता था. इस दिन मामाजी एक सजी धजी बग्घी पर लाउड स्पीकर्स लगाए, अपने पीछे पीछे तांगों का लंबा सा क़ाफ़िला लिए अपने बनाए हुए गीत गाते हुए हमारे घर आते थे और आवाज़ देते “चीनियाआआअ....” हम लोग दौडकर उनके पास पहुँच जाते.वो मुझे और भाई साहब को बग्घी में बिठाकर ले जाते थे. मैं जब उनके गीत सुनता था तो मुझे बहुत अच्छा लगता था और मैं सोचता था ... कैसे लिख लेते हैं ये इतने सुन्दर गीत?


मुझे नहीं पता था उस वक्त कि जीन्स क्या होते हैं और जीन्स के ज़रिये कोई गुण एक पीढ़ी अनजाने में ही दूसरी पीढ़ी को कैसे सौंप देती है? इसका थोड़ा एहसास हुआ जब मैं आकाशवाणी, बीकानेर में था, इस मास का गीत रिकॉर्ड करने की बीकानेर की बारी थी और कोई गीत नहीं मिल रहा था, हमारे कार्यक्रम अधिशासी स्वर्गीय महेंद्र भट्ट(ग्रेमी अवार्ड विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट के बड़े भाई) जो कि एक ही नाम होने के कारण मुझे मीता बुलाते थे, मुझसे बोले “मीता, एक गीत लिखोगे?”, मैंने कहा “जी मैं ?”  तो वो बोले “ हाँ, मुझे पता है तुम लिख लोगे”. मेरे पास कुछ जवाब था ही नहीं. मैंने कहा “जी कोशिश करता हूँ” .अपने साथी भाई चंचल हर्ष जी की मदद लेकर एक टूटा फूटा गीत लिखा था मैंने “ज़िंदगी अब है सज़ा जीना हुआ मुहाल है, मौत भी आती नहीं किस्मत का ये कमाल है”. एक समय में संगीतकार मदन मोहन के सहायक रहे स्वर्गीय डी. एस. रेड्डी ने धुन बनाई, स्वर्गीय दयाल पंवार( संगीतकार पंडित शिवराम के सहायक)ने रेड्डी जी के सहायक के तौर पर काम किया और स्वर्गीय बदरुद्दीन ने गाया इसे. इन सभी के साथ साथ स्वर्गीय जसकरण गोस्वामी (सितारवादक),स्वर्गीय मुंशी खान (सितारवादक)और स्वर्गीय इकरामुद्दीन खान(तानपूरावादक)के प्रति इस माध्यम से मेरी स्नेह्पूरित श्रद्धांजलि . जीन्स के ज़रिये ये गुण आगे बढते हैं इस पर विश्वास पक्का हुआ जब मेरे बेटे वैभव ने “जस्सी जैसा कोई नहीं”,“काजल”,“रिहाई”,”ये मेरी लाइफ है” वगैरह वगैरह बीसियों टी वी धारावाहिकों और “द्रोण”, “चल चला चल” और “नाइन्टी नाइन” जैसी फिल्मों में गाने लिखे. मगर इस सबके बीच मैं आज भी आकाशवाणी, इलाहाबाद के किसी ज़माने में मशहूर रहे गायक प्रणव कुमार मुखर्जी को नहीं भूल सकता जिन्होंने बात ही बात में मुझसे न जाने कितनी ग़ज़लें कहलवा लीं मगर अफ़सोस अब न प्रणव रहे और न ही ............ . खैर... उनकी कहानी फिर कभी.

Wednesday, December 7, 2011

कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन-3: महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला

देश के आज़ाद होने के कुछ ही साल बाद मेरा जन्म हुआ था. यानि मेरा और आज़ाद भारत का बचपन साथ साथ गुज़रा. तब तक मेरे पिताजी पुलिस की नौकरी छोड़ चुके थे. यों तो उनकी श्री गंगानगर की पोस्टिंग भी मुझे याद है जब हम आसकरण बहनोई जी और रामभंवरी बाई के साथ एक ही घर में रहते थे. घर में कुल तीन कमरे थे. एक में मैं, मेरे भाई साहब, मेरे पिताजी और माँ, हम चारों रहते थे और एक कमरे में जीजाजी और बाई अपनी पांच लड़कियों के साथ. तीसरा कमरा बैठक कहलाता था जिसे हम सब काम में लेते थे मगर  
मुझे उनकी जो पहली पोस्टिंग बहुत अच्छी तरह याद है वो है श्री गंगानगर जिले के चूनावढ गाँव की.

राजस्थान सरकार ने ग्रामीण उत्थान के लिए एक योजना शुरू की थी जिसके अंतर्गत गाँवों में एक दफ्तर खोला जाता था जिसे ग्राम सुधार केंद्र कहा जाता था. पिताजी चूनावढ के ग्राम सुधार केंद्र के प्रभारी थे. एक पुरानी मगर बड़ी सी मस्जिद में उनका दफ्तर था जो शायद पार्टीशन के वक्त उजड गयी थी और मस्जिद से लगे हुए एक छोटे से कच्चे घर में हम लोग रहा करते थे. घर और दफ्तर के बीच एक दरवाज़ा लगा हुआ था, यानि घर और दफ्तर एक ही था. पिताजी के दफ्तर में मेरी रुचि की तीन ऐसी चीज़ें मौजूद थीं जो अक्सर मुझे वहाँ खींच ले जाती थीं. रेडियो, ग्रामोफोन और कैमरा. कैमरा छूने की हमें इजाज़त नहीं थी हालांकि दिल बहुत करता था उसे छूने का, फोटो खींचने का मगर खैर हमारे लिए बाकी दोनों चीज़ों को छूने की इजाज़त भी कम नहीं थी. जूथिका रॉय, पहाड़ी सान्याल, जोहरा बाई अम्बालावाली, अमीर बाई कर्नाटकी, कुंदन लाल सहगल, पंकज मलिक, मास्टर गनी, ललिता बाई आदि के बहुत से रिकॉर्ड्स वहाँ मौजूद थे. संगीत से मेरा पहला परिचय था ये.  रेडियो से मेरी दोस्ती की शुरुआत भी यहीं हुई और कैमरा भी पहली बार मैंने यहीं देखा. मैं कहाँ जानता था उस वक्त कि ये तीनों ही मेरी ज़िंदगी के अटूट हिस्से बन जायेंगे.

उस गाँव में एक शानदार नहर थी जिसका पानी पीने से लेकर सिंचाई तक सब कामों के लिए था लेकिन ये नहर महीने में तीसों दिन चालू नहीं रहती थी इसलिए गाँव में जगह जगह पक्की डिग्गियां बनी हुई थीं जिनमें घरेलू ज़रूरतों के लिए पानी जमा कर लिया जाता था और लोग अपनी अपनी ज़रूरत का पानी रस्से और बाल्टी की मदद से निकाल लिया करते थे. और हाँ एक बात तो मैं बताना ही भूल गया, चूनावढ में बिजली नहीं थी. आप सोच रहे होंगे कि फिर रेडियो कैसे बजता था? आपका सोचना सही है, उस वक्त तक ट्रांजिस्टर का आविष्कार भी नहीं हुआ था.  कार में जो बैटरी लगती है, उस से थोड़ी छोटी EVEREADY की लाल रंग की एक बैटरी आया करती थी, जिसमें रेडियो का प्लग लगाया जाता था और लगभग १५ फीट लंबा जालीदार एरियल रेडियो से जोड़ दिया जाता था तब जाकर बजता था रेडियो . हर शाम मस्जिद यानि दफ्तर के आँगन में गाँव के लोग इकठ्ठे होते थे और उन्हें रेडियो पर समाचार, संगीत और खेती बाडी के कार्यक्रम सुनवाए जाते थे. बाकी वक्त वैसे तो वो रेडियो हमारी पहुँच में रहता था, हम जब चाहे उसे बजा सकते थे मगर सबसे बड़ी दिक्कत थी बैटरी, जो कि श्री गंगानगर से लानी पड़ती थी. हमें उस बैटरी को ६ महीने चलाना होता था, इसलिए रेडियो सुनने में बहुत कंजूसी बरतनी पड़ती थी. पूरे गाँव में उसी तरह का एक और रेडियो मौजूद था और वो था पिताजी के ही एक मित्र जोधा राम चाचाजी के घर में . कभी कभी हम वहाँ जाकर भी रेडियो सुनते थे मगर वहाँ दिक्कत ये होती थी कि चाचाजी सीलोन लगाते थे और उनका बेटा तुरंत विविध भारती की तरफ सुई घुमा देता था जो कि उन दिनों शुरू हुआ ही था फिर जैसे ही चाचाजी का बस चलता, वो फिर सीलोन लगा दिया करते थे . इस तरह दिन भर रेडियो की सुई, सीलोन और विविध भारती के बीच घूमती रहती थी.

ग्रामोफोन हालांकि बैटरी से नहीं चलता था, उसमें थोड़ी थोड़ी देर में चाबी भरनी पड़ती थी मगर आज से १५-२० साल पहले के रिकॉर्ड प्लेयर की तरह उसमें डायमंड की नीडल नहीं लगी होती थी. उसमें मैटल की सुई लगती थी और एक सुई से बस दो रिकॉर्ड ही बज पाते थे. हर दो रिकॉर्ड के बाद घिसी हुई सुई को हटा कर नई सुई लगानी पड़ती थी. यहाँ भी वहीं संकट था, सुइयां खत्म हो गईं तो जब तक पिताजी श्री गंगानगर जाकर सुई की डिब्बियां नहीं लायेंगे तब तक ग्रामोफोन बंद. बड़ी किफायतशारी से काम लेते हुए हम लोग बारी बारी से अपनी पसंद के गाने सुना करते थे. विविध भारती के अपने १२ बरस के कार्यकाल में जब भी मैं भूले बिसरे गीत सुना करता था, चूनावढ की ये तस्वीरें हर बार ज़िंदा होकर मेरे सामने आ खड़ी होती थीं और मैं आँखें बंद कर उसी वक्त में पहुँच जाता था. बीच के ४५-५० बरस एक लम्हे में न जाने कहाँ गायब हो जाते थे.चूनावढ के दिनों में मुझे जूथिका रॉय का गाया मीरा का भजन “घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे” बहुत पसंद था.





मुझे जब भी अकेले ग्रामोफोन बजाने का मौक़ा मिलता था, मैं ये भजन सुनता और रिकॉर्ड के साथ गुनगुनाया करता था. पता नहीं सुर में गाता था या बेसुरा मगर एक रोज मैं रिकॉर्ड चलाकर उसके साथ यही भजन गा रहा था कि पिताजी कमरे में घुसने लगे, मुझे गाते सुनकर वो दरवाज़े के बाहर ही रुक गए. रिकॉर्ड खत्म होने लगा तो वो अंदर आये.... मैं एकदम हडबडा गया... मेरी उम्र छह साल रही होगी उस वक्त. मुझे लगा अब शायद डांट पड़ेगी, मगर पिताजी ने बहुत प्यार से मुझे पूछा “तुम गा रहे थे?” मैंने डरते डरते हाँ में सर हिलाया. इस पर वो बोले “डर क्यों रहे हो? ये तो अच्छी बात है.” मेरी जान में जान आई. पिताजी थोडा बहुत हारमोनियम बजा लिया करते थे. कुछ ही दिन बाद उन्होंने एक हारमोनियम का इंतजाम किया और मुझे गाने का अभ्यास करवाने लगे.............मेरा गाने का ये सिलसिला कॉलेज में पहुंचा तब तक जारी रहा. आप पूछेंगे, “क्या उसके बाद ये सिलसिला रुक गया?” जी हाँ, उसके बाद मैंने गाना बंद कर दिया. क्यों बंद कर दिया मैंने गाना... इसका ज़िक्र मैं आगे चलकर करूँगा.


हाँ तो मैं बता रहा था कि जुथिका रॉय का गाया मीरा का भजन मुझे बहुत प्रिय था.... सही पूछिए तो उस Picture-1 006 वक्त मुझे ये लगता था कि जो कलाकार ये भजन गा रही हैं वही मीरा हैं. चार साल पहले की बात है. मैं विविध भारती का प्रमुख था. एक रोज यही भजन विविध भारती से प्रसारित हो रहा था..... मैं हमेशा की तरह आँखें बंद करके अपने बचपन में पहुँच गया, वही चूनावढ का कच्ची ईंटों का बना कमरा और उसमें बजता वही चाबी वाला ग्रामोफोन.थोड़ी देर में भजन तो ख़त्म हो गया मगर मैं दिन भर चूनावढ के उस कमरे से बाहर नहीं निकल पाया. ऑफिस में भी आँखें बंद किये उन्हीं बचपन की यादों में खोया था कि तभी फोन की घंटी बजी, मानो किसी ने झिन्झोड़कर मेरा सपना तोड़ दिया. मैंने थोडा सा झुंझलाकर फोन उठाया. उधर से किसी संभ्रांत महिला ने नमस्कार के साथ एक ऐसी बात कही कि मैं उछल पड़ा. वो बोलीं “ सर, एक बहुत पुरानी सिंगर कलकत्ता से आयी हुई हैं, पता नहीं आपने उनका नाम सुना है या नहीं मगर वो विविध भारती आना चाहती हैं और आप चाहें तो उन्हें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं.” मैंने कहा “विविध भारती में सभी कलाकारों का स्वागत है, मगर नाम तो बताइये उनका.” वो धीरे से बोलीं “ जूथिका रॉय.” मुझे उछलना ही था. खैर, अगले दिन उन्हें विविध भारती में आमंत्रित किया गया....वो जब मेरे सामने आईं तो मैं एक बार फिर चूनावढ के अपने उस कच्चे कमरे में पहुँच गया, अपने बचपन की उंगली थामे  ..... मगर इस बार मेरे साथ सिर्फ वो चाबी वाला ग्रामोफोन ही नहीं था... इस बार साक्षात् मीरा मेरे सामने बैठकर हारमोनियम हाथ में लिए गा रही थीं, “घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे ..........” और मेरी आँखों से दो आंसू टपक गए .

विविध भारती के स्‍टूडियो में जूथिका रॉय: एक वीडियो। यहां देखिए।

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