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Saturday, May 26, 2012

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन- 9 : महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला

मशहूर रेडियो शख्सियत महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला की नौंवी कड़ी।


कितनी छोटी होती है इंसान की ज़िंदगी ? शुरू में उसे इस बात का अहसास नहीं होता. बचपन में हर बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है और इस बात में फख्र महसूस करता है कि वो बड़ा हो गया है. वो जब ४-५ साल का होता है, तब भी माँ बाप के सामने तरह तरह से सिद्ध करने की कोशिश करता है कि वो बड़ा हो गया है. जब प्राइमरी क्लासेज़ में आता है तब भी उसे लगता है , अब वो एल के जी या यू के जी में नहीं है, बड़ा हो गया है......फिर जब छठी सातवीं में आता है तो उसे लगता है कि अब तो उसकी गिनती बडों में होनी ही चाहिए..... यानि वो तब तक बडा होने के लिए जी जान से कोशिश करता है जब तक कि वास्तव में बड़ा नहीं हो जाता. जब सब ये मान लेते हैं कि वो बड़ा हो गया है और हर बात में टोकने लगते है, ऐसा मत करो, वैसा मत करो..... अब तुम बड़े हो गए हो.... तब उसके पांव के नीचे से ज़मीन खिसकने लगती है और वो अपने बचपन को मिस करने लगता है.....बचपन को मिस करने का ये सिलसिला जीवन भर चलता है, ये बात अलग है कि जैसे जैसे बूढा होता जाता है..... बचपन के साथ साथ जवानी के दिनों को भी मिस करने लगता है.... एक बात आपने महसूस की है या नहीं, मैं नहीं जानता, बचपन में समय की गति बहुत धीमी होती है शायद इसीलिये बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है... मगर धीरे धीरे समय की गति बढ़ने लगती है और फिर वो बढ़ती ही जाती है.


आप ज़रा याद करके देखिये २० साल पहले घटी कोई घटना आपको काफी दूर लगती होगी मगर १० साल पहले की कोई और घटना उससे आधी दूरी पर महसूस नहीं होगी बल्कि आधी से बहुत कम दूरी पर लगेगी और ५ साल पहले की घटना तो ऐसा लगेगा कि कल ही घटी हो. यानि समय की गति समान नहीं रहती ..... जैसे जैसे ज़िंदगी में आगे बढते हैं, समय की गति भी बढ़ती जाती है. जब वो अंतिम दिन आता है, जब उसे इस दुनिया को छोड़कर जाना होता है तब उसे लगता है अरे...... ज़िंदगी तो इतनी जल्दी गुज़र गयी.... मैं तो इसे ठीक से जी भी नहीं पाया..... मुझे थोड़ा सा समय काश मिल सके....मगर उसे जाना होता है तो जाना ही होता है.......ऐसे में वो लोग बहुत सुखी रहते हैं जो भगवान में, धर्म में, धार्मिक मान्यताओं में, पुनर्जन्म में गहरा विश्वास रखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है....ये शरीर छोड़कर मुझे तो बस दूसरे शरीर में जाना है......मैं पूजा करूँगा, धर्म कर्म करूँगा तो ईश्वर मुझे किसी अच्छे घर में जन्म देंगे. दान-धर्म करूँगा तो मेरा अगला जन्म सुधर जाएगा ..... वगैरह वगैरह, मगर हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसने वाले इंसान इन सब बातों पर विश्वास नहीं कर सकते. जीवन के इस दर्शन की शुरुआत उसी वक्त हो जाती है जब बच्चा बहुत छोटा होता है. वो अपने आस पास जो कुछ होता है उसे देखता है और ईश्वर, धर्म, समाज, स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म, पूजा –पाठ इन सबके बारे में उसके विचार बनने लगते हैं. मैंने बचपन से देखा कि मेरे पिताजी बहुत मन से दुर्गा की पूजा किया करते थे.....उनसे मेरे भाई साहब ने और मैंने भी ये संस्कार लिए मगर मेरे पिताजी कभी भी पंडितों की पोंगापंथी को स्वीकार नहीं करते थे......स्वर्ग, नर्क, धर्म, कर्म, इन सबको वो विज्ञान की कसौटी पर कसकर फेल कर चुके थे..... मैं भी इन सब बातों पर कभी विश्वास नहीं कर पाया. मेरे पिताजी ने कालांतर में जब मेरी माँ की मृत्यु हुई तो पूजा पाठ करना बिल्कुल बंद कर दिया. हालांकि पूजा-पाठ में मेरा बहुत विश्वास कभी नहीं रहा मगर जब उन्होंने पूजा-पाठ करना छोड़ा तो उनके साथ ही साथ मैंने भी पूजा-पाठ को तिलांजलि दे दी. मेरे भाई साहब आज भी नियमित रूप से पूजा करते हैं मगर जब भी उनसे इस बारे में बात होती है तो वो कहते हैं यार... इतने सालों का एक रूटीन बना हुआ है उसे तोड़ने का मन नहीं करता, इसके अलावा और कोई बात नहीं है........स्कूल में पढता था, घर में हर तरह के त्यौहार मनाये जाते थे.... मगर मेरे पिताजी उन त्योहारों के सामाजिक पक्ष पर ही ज़ोर देते थे...... धार्मिक पक्ष को हंसी में उड़ा देते थे.... नतीजा ये हुआ कि मेरे दिमाग़ में भी धीरे धीरे बैठने लगा कि ईश्वर कुछ नहीं होता...... ईश्वर की रचना लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए की और उसके नाम पर अपना पेट भरते हैं. और ९वीं १०वीं कक्षा में पहुँचते पहुँचते पूरी तरह नास्तिक हो गया


......इसी समय में मैंने एक तरफ जहां सुकरात, प्लेटो, हैरेक्लिटस जैसे ग्रीक दार्शनिकों को पढ़ना शुरू किया, वहीं सांख्य, बौद्ध, जैन, योग, चार्वाक, मीमांसा, न्याय आदि भारतीय दर्शनों को पढ़ना शुरू किया. इन सबका विवरण देना यहाँ मौजूं नहीं होगा, बस इतना कहूँगा कि सबसे ज़्यादा अपने आपको तर्क पर आधारित कहने वाला न्याय दर्शन भी मुझे कोई रास्ता नहीं दिखा सका और मैं पूरी तरह से नास्तिक हो गया ऐसे में मैंने नीत्शे को पढ़ा तो लगा शायद जो नीत्शे की सोच है वो सच्चाई के ज़्यादा करीब है..... मैं आज भी नास्तिक हूँ .... और मरते दम तक रहूँगा . हालांकि मैं जानता हूँ कि नास्तिक होना कितना तकलीफदेह है? आप के सामने कोई भगवान नहीं हैं, आपको बचाने कोई देवी देवता नहीं आयेंगे और आपके मरने के बाद आपका अस्तित्व मात्र आपके बाद की एक पीढ़ी तक घर में टंगी हुई एक तस्वीर तक सीमित हो जाएगा... वो भी अगर आपकी औलाद लायक हुई तो वरना वो आपकी नहीं, सिर्फ अपनी औलादों की तस्वीरों से अपने घर को सजाना पसंद करेंगे. यानि आपके इस दुनिया से जाने के बाद सब खत्म. आप ने चाहे कैसे भी कर्म किये हों, मृत्यु के पश्चात आपको उनका कोई लाभ नहीं होने वाला है... और आप इस विश्वास के साथ नहीं मर सकते कि ये तो सिर्फ शरीर का बदलना ही है.... मैं फिर से दूसरे जन्म में इस धरती पर आऊँगा..... बहुत डरावना लगता है न ये सोचकर कि मेरी मृत्यु के बाद मेरा कोई वजूद इस दुनिया में नहीं रहेगा.... मैं हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाऊँगा. मगर क्या कर सकते हैं? आपने अपने जीवन का जो दर्शन तय किया है...वो आपकी सोच की जड़ों में इस तरह बैठ चुका होता है कि आप बहोत चाहकर भी नहीं बदल सकते. मेरे रेडियो के कई कार्यक्रमों में मेरी इस विचारधारा का असर साफ़ दिखा भी है और... इस विषय पर अपने साथियों और अफसरों से इस विषय में टकराव भी हुए हैं... मेरा मानना है कि धर्म और ईमान दो अलग अलग चीज़ें हैं. आप धर्म को न मानकर भी ईमानदार हो सकते हैं मगर ईमानदार हुए बिना धार्मिक होने का कोई मायने नहीं है बल्कि ईमान के बिना धर्म का कोई अस्तित्व ही नहीं हो सकता.

स्कूल में इस विषय पर कभी कोई बात होना बिल्कुल संभव नहीं था. अगर किसी अध्यापक से जीवन, दुनिया, ईश्वर, इन विषयों पर बात करने की कोशिश करते तो वो डांटकर बिठा देते और हंसी उड़ाते कि पढाई तो होती नहीं जीवन को समझने की कोशिश कर रहे हैं.......गणित के हमारे एक अध्यापक थे डी पी मित्तल साहब. बड़े ही लहीम शहीम इंसान. हाथ में हर वक्त एक डंडा. बहुत ही कड़क अध्यापक माने जाते थे. क्लास में हम दो तीन लड़के ऐसे थे जो गणित के पीरियड में दुनिया भर की बातें करने को तैयार रहते थे सिवाय गणित के...... मित्तल साहब ने एक दिन हम दोनों तीनों लड़कों को एक उपाधि दे डाली. उन्होंने कहा... राजा महाराजाओं की सवारी जब चलती है, तो उसमें कुछ बेहद खूबसूरत और सजे धजे घोड़े भी चलते हैं. इन्हें कोतल घोड़े कहा जाता है.... ये और किसी काम के नहीं होते... इनकी सवारी नहीं की जा सकती, इन पर सामान नहीं ढोया जा सकता, ये युद्ध में भी काम नहीं आते. इन्हें तो बस सजा धजाकर रखिये... ये सिर्फ देखने में ही खूबसूरत लगते हैं. आप तीनों मेरे कोतल घोड़े हो.......संगीत और नाटक जैसी विधाओं में हर बार ढेरों तालियां और वाहवाही बटोरने वाले इंसान को कोतल घोड़े की ये उपाधि कैसी लगी होगी, आप समझ सकते हैं. लगा गणित विषय को छोड़ दूं मगर फिर क्या करूँगा? ये समझ नहीं आ रहा था.....ये मेरे जीवन का शायद बहुत कठिन वक्त था.....दिल कर रहा था पढाई छोड़ दूं और कुछ ऐसा काम करूँ जिस में संगीत हो मगर संगीत के आम कलाकारों की जो स्थिति देखता था, उसमें मैं अपने आपको फिट नहीं पाता था. इधर भाई साहब मेडिकल कॉलेज में पहुँच गए थे और घर में सब लोग उन्हें डॉक्टर कहकर पुकारने लगे थे.......आस पास के सभी लोगों की निगाहें अब मुझपर थीं कि मैं क्या लाइन पकडता हूँ..... मेरे ताऊजी के एक लड़के ने तो मेरी माँ से एक दिन कह भी दिया “काकी, राजा (मेरे भाई साहब का घर का नाम) तो खैर मेडिकल कॉलेज में दाखिल हो गया है तो डॉक्टर बन ही जाएगा लेकिन महेन्द्र किसी दिन कुछ बनेगा तब देखेंगे....... देखना... ये हमारी ही तरह रहेगा” ये बात कुछ समय बाद मुझे मेरी माँ ने उस वक्त बताई जब मैं रेडियो नाटक के उस ऑडिशन में पास हुआ जिसमें ३५० लोग बैठे थे और सिर्फ ३ लोग पास हुए थे.......बहुत खुश हुईं थीं वो और मुझे कहा था “लोग चाहे कुछ भी कहें तुम ज़रूर इस लाइन में अपना नाम कमाओगे. ज़रूरी थोड़े ही है कि सब लोग पढाई में ही नाम कमाएँ.” वैसे मैं आपको बता दूं कि हायर सेकेंडरी में मेरे ५५% अंक बने थे. मुझे इन्जीनियरिंग में सिविल ब्रांच मिल रही थी  जो मुझे कतई पसंद नहीं थी.

अब सवाल ये था कि आखिर हायर सेकेंडरी के बाद क्या करूँ मैं? संगीत के पीछे मैं पागल था. मैं चाहता था कि संगीत की शिक्षा लूं मगर मेरा दुर्भाग्य देखिये, उस ज़माने में बीकानेर में लड़कों के कॉलेज में संगीत नहीं था. संगीत सिर्फ और सिर्फ लड़कियों का विषय मन जाता था. अमर चंद जी जैसे कुछ कलाकार थे जो संगीत जानते थे मगर सिखाने में उनकी कोई रुचि नहीं थी. एक दिन मेरा दिमाग पता नहीं कैसे खराब हुआ, मैंने साईकिल उठाई और चल पड़ा महारानी सुदर्शना गर्ल्स कॉलेज की ओर. लड़कियों की कॉलेज में १६-१७ साल के लड़के को अंदर कौन घुसने दे? बाहर खड़े चौकीदार की बहुत मिन्नतें कीं कि बस एक बार मुझे प्रिंसिपल साहिबा से मिला दें. मैं इधर उधर देखूँगा भी नहीं. मैंने यहाँ तक कहा कि वो चाहें तो मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दें ताकि मैं किसी लड़की की तरफ न देख सकूं. आखिर उसे दया आई और वो मुझे प्रिंसिपल के कमरे में ले गया और डरते डरते कहा कि मैडम जी ये लड़का आपसे मिलने की बहुत जिद कर रहा था. उन्होंने जलती हुई नज़रों से मुझे देखा और बोलीं “ पुलिस को बुलाऊँ? जानते हो लड़कियों की कॉलेज के अंदर आना तो दूर आस पास चक्कर लगाना भी जुर्म है और तुम्हें अंदर बंद किया जा सकता है.” मैं घबराया मगर किसी तरह अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए टूटे फूटे शब्दों में कहा “ मैडम मैं संगीत पढ़ना चाहता हूँ और संगीत आपकी कॉलेज के अलावा किसी भी दूसरे कॉलेज में नहीं है.”

     “क्या मतलब? क्या तुम्हें लगता है कि तुम यहाँ संगीत पढ़ सकते हो?”

     “मेरी आपसे रिक्वेस्ट है कि चाहे आप मुझे क्लास में मत आने दीजिए मगर इम्तेहान देने के लिए नाम को एडमिशन दे दीजिए क्योंकि लड़के प्रायवेट इम्तेहान भी नहीं दे सकते.”

      उन्होंने संगीत की लेक्चरर को अपने कमरे में बुलाया और कहा “ये लड़का बड़ी जिद कर रहा है कि इसे संगीत विषय के साथ बी ए करना है इसलिए इसे हम यहाँ एडमिशन दे दें.”

     वो लेक्चरर मुस्कुराईं और बोलीं... “ ये कैसे संभव है?”

     मैंने कहा “मैडम कोई रास्ता निकालिए न.....संगीत मेरा जीवन है..... अगर आप लोगों ने मना कर दिया तो मुझसे मेरा जीवन छीन जाएगा.”

     संगीत की मैडम बहुत मुलायमियत के साथ बोलीं.... “ अच्छा बेटे तुम संगीत संगीत कर रहे हो, क्या तुमने संगीत किसी से सीखा है?”

     मैंने कहा “जी नहीं मैडम.”

     वो बोलीं “अच्छा तुम संगीत में क्या कर सकते हो?”

     मैं उस वक्त तक बैंजो, हारमोनियम, बांसुरी बहुत अच्छी तरह बजाने लगा था और सितार, सारंगी और सरोद टूटा फूटा बजाने लगा था. मैं बोला.... आप मुझे संगीत रूम में ले चलिए.... जो कुछ में थोड़ा बहुत कर सकता हूँ आपको उसकी बानगी दिखाता हूँ.” मुझे म्यूजिक रूम में ले जाया गया. साथ में बहुत से लैक्चरर्स का काफिला हो गया था, तमाशा देखने. मुझे एक बार तो लगा... मुझे फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा है और ये सारे तमाशबीन मुझे फांसी पर चढाये जाने का तमाशा देखने जा रहे हैं.

     हम लोग म्यूजिक रूम में बैठे. मैंने डरते डरते हारमोनियम उठा लिया और मैडम से कहा आप किस सुर से गाएंगी? और क्या गाएंगी? मैं आपके साथ अलग अलग साज़ पर संगत करने की कोशिश करूँगा. उन्होंने बताया कि वो पांचवें काले से गाएंगी और दरबारी गाएंगी. मेरा भाग्य, मुझे एक सितार भी वहाँ मिल गया जो दरबारी के  सुरों में मिला हुआ था औरउनके सुर की बांसुरी भी मिल गयी. अब उन्होंने गाना शुरू किया... मैंने बारी बारी से उनके साथ हारमोनियम, बांसुरी और सितार बजाये. वो लगभग १५ मिनट गाती रहीं और मैं फुर्ती से बदल बदल कर साज़ उनके साथ बजाता रहा...१५ मिनट बाद जब वो रुकीं तो उनकी आँखें भरी हुई थीं... उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरा और बोली” शानाश बेटा शाबाश तुमने ये सब कहाँ सीखा? “ मैं बोला “बस रेडियो के साथ बजा बजा कर, लेकिन मैडम अगर आप बुरा न मानें तो एक चीज़ मैं भी सुनना चाहता हूँ”

     वो बोली “हाँ हाँ ज़रूर, मगर क्या सुनाना चाहते हो?”

     मैंने कहा “ये मैं नहीं आप तय करेंगी”.

     उन्होंने अचरज से पूछा “क्या मतलब?”

     मैंने कहा “ जी मैडम अब हारमोनियम आप उठाइये और कोई भी राग जो आप चाहें छेडिए. मैं उसी राग में गाऊंगा, थोडा बहुत आलाप लूँगा, ख़याल तो शायद मैं नहीं जानता रहूँगा मगर तराना भी गाऊंगा और तानें भी लूँगा.”

     उन्होंने राग ललित छेड़ा और मैं उसमें खो गया.......गाता गया गाता गया.....आँखें बंद करके गाता ही चला गया..... होश तब आया जब मैडम ने हारमोनियम बजाना रोका और पूरा म्यूजिक रूम तालियों की गडगडाहट से गूँज उठा.... मैंने अपनी आँखें खोलीं..... मुझे कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था......तब महसूस हुआ... कि मेरी आँखें आंसुओं से सराबोर थीं.

      म्यूजिक की मैडम और प्रिंसिपल मैडम दोनों ने कहा “हम बहुत प्रभावित हैं तुमसे मगर बेटा, हमारी भी कुछ मजबूरियाँ है, हम कुछ नहीं कर सकते.......हाँ हमारे यहाँ जब भी कोई संगीत का प्रोग्राम होगा हम चाहेंगे तुम ज़रूर आओ.

     मैं वहाँ किसी प्रोग्राम का निमंत्रण लेने नहीं गया था........मैंने उन्हें धन्यवाद कहा, उन दोनों के पैर छुए और अपनी साईकिल उठाकर धीरे धीरे कॉलेज के गेट से बाहर निकल गया, इस अहद के साथ कि अब मैं कभी नहीं गाऊंगा......... मैंने संगीत को अपने जीवन से खुरच खुरच कर निकाल फेंका.....अब भी वो खुरचन रह रह कर बहुत दुःख देती है जब उसमें बड़ी गहरी टीस उठती है.

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Thursday, May 3, 2012

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन- 8 : महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला

रेडियोनामा पर जानी-मानी रेडियो-शख्सियत महेंद्र मोदी रेडियोनामा पर अपनी जीवन-यात्रा के बारे में बता रहे हैं। तो आज सातवीं कड़ी में पढिए कुछ और यादें।



अब मैं सादुल स्कूल में पढ़ रहा था. मेरा बैंजो वादन भी चल रहा था. स्कूल में मैं पढाई के लिए कम और अपने बैंजो वादन के लिए ज़्यादा जाना जाने लगा था. पढाई से इतर गतिविधियों में मेरे भाई साहब भी बहुत सक्रिय थे मगर चूंकि वो पढाकू किस्म के रहे, उनका क्षेत्र रहा डिबेट, शतरंज और राजनीति. उन दिनों स्कूल कॉलेज में आज की तरह के चुनाव नहीं होते थे न चुनाव लड़ना सिर्फ गुण्डे बदमाशों का ही काम हुआ करता था. मेरे भाई साहब छोटे कद के हैं, चश्मा छठी-सातवीं कक्षा में ही लग गया था. क्लास में अव्वल आया करते थे. सभी अध्यापकों के अत्यंत प्रिय छात्र. श्री ओम प्रकाश जी केवलिया हम सब के अत्यंत प्रिय अध्यापक थे.....मगर केवलिया साहब के सबसे प्रिय छात्र थे मेरे बड़े भाई श्री राजेन्द्र मोदी. केवलिया साहेब ने उन्हें नाम दिया था “छोटा गांधी”. क्लास में अव्वल आने पर उन्होंने मेरे भाई साहब को एक बहुत ही सुन्दर पुस्तक ईनाम में दी थी “बन्दा बैरागी”. किस प्रकार बन्दा बैरागी देश के लिए शहीद होते है, इस पर पद्य में ये इतनी शानदार किताब थी कि इसकी कुछ पंक्तियाँ मुझे आज भी याद हैं.केवलिया साहब की प्रेरणा से ही भाई साहब स्कूल के प्रधानमंत्री पद के लिए खड़े हुए और बहुत अच्छे अंतर से अपने प्रतिद्वंद्वी सूर्य प्रकाश को मात दी.आदरणीय गुरुदेव ओम प्रकाश जी केवलिया का निधन अभी कुछ ही साल पहले हुआ है.इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ कि हम दोनों भाइयों पर केवलिया साहब का अत्यंत स्नेह रहा, हाँ ये बात और है कि दोनों पर उनके इस अप्रतिम स्नेह के कारण अलग अलग थे. भाई साहब पर उनके स्नेह का कारण उनका पढ़ाई में बहुत अच्छा होना था और मुझ पर उनका स्नेह मेरी स्टेज की गतिविधियों के कारण. हम दोनों भाई आज भी कभी साथ बैठते हैं तो केवलिया साहब को ज़रूर याद करते हैं. एक बात और बताऊँ? उनके सुपुत्र श्री गौतम केवलिया आज भी मेरी फेसबुक के दोस्तों की सूची में मौजूद हैं.

मेरा संगीत प्रेम ज़ोरों पर था. मैं बैंजो तो बजाता ही था, जब भी मौक़ा मिलता, कोशिश करता कि किसी दूसरे साज़ पर भी हाथ आज़माऊँ. मेरे ताऊ जी लोकदेवता राम देव जी के बहुत बड़े भक्त थे. पश्चिमी राजस्थान में रामदेव जी की बहुत मान्यता है. भाद्रपद में भक्तों के जत्थे के जत्थे बीकानेर से एक सौ बीस मील यानि लगभग पौने दो सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा करके आज भी जोधपुर ज़िले के रामदेवरा नामक स्थान पर पहुँचते हैं जहां बाबा रामदेव का मंदिर बना हुआ है और एक बहुत गहरी बावली बनी हुई है. इस राम देवरा को बीकानेर और आस पास के क्षेत्रों में रूणीचा कहा जाता है और बावली को हमारे यहाँ बावड़ी कहते हैं. हर साल दो बार इस जगह मेला भरता है जहां दूर दूर से यात्री आकर इस बावडी में स्नान करते हैं और बाबा के दर्शन करते हैं. अरे ...... इस जगह की एक खास बात तो मैंने आपको बताई ही नहीं. जानते हैं जब आप बाबा रामदेव जी के मंदिर में प्रवेश करते हैं तो मंदिर के अंदर एक मज़ार बना हुआ पाते हैं. सभी लोग इसी मज़ार की पूजा करते हैं और सुबह शाम मज़ार की आरती भी उतारी जाती है. इस मंदिर में जितने हिन्दू तीर्थ करने आते हैं उतने ही मुस्लिम ज़ियारत करने आते हैं. हिदू इन्हें पुकारते हैं “रामदेव बाबा” और मुसलमान इन्हें कहते हैं “राम सा पीर”. आज तो ज़माना बदल चुका है, किसी मंदिर में कोई भी जा सकता है मगर इस मंदिर में कभी भी ऊंच-नीच, छोटे बड़े का भेद-भाव नहीं किया गया और हमेशा से ही हर धर्म, हर जाति के लिए इस मंदिर के द्वार खुले रहे हैं.ये बात कहाँ तक सच है कहा नहीं जा सकता, मगर लोग ऐसा कहते हैं कि यहाँ बहुत बड़े बड़े पर्चे यानि चमत्कार होते थे....बावडी की रचना कुछ इस तरह की है कि ऊपर लोहे का एक जंगला लगा हुआ है, और एक तरफ से सीढियां अंदर तक गयी हुई हैं. कहा जाता है कि जब कोई चमत्कार होना होता था तो उस व्यक्ति को बाबा रामदेव पुकारते थे और वो व्यक्ति भागता हुआ उस बावडी की तरफ जाता था, बावडी के जंगले का दरवाज़ा खुल जता था और वो व्यक्ति उस बावडी में कूद जाता था. कुछ ही पलों बाद वो सीढियां चढ़कर बाहर आता था पूरी तरह स्वस्थ होकर. कहा जाता है के हर साल इस मेले के दौरान इस तरह के कई पर्चे यानि चमत्कार होते थे और कई लोगों की आखें ठीक हो जाती थीं, कई लोगों को हाथ पैर मिल जाते थे और कई लोगों का कोढ़ ठीक हो जाता था. विज्ञान के युग में इस तरह की बातों पर विश्वास होना तो आसान नहीं है मगर बाबा रामदेव में पूरे राजस्थान और गुजरात की अत्यंत श्रद्धा है ये मानना ही पडेगा. मेरे मुम्बई आने पर एक बार संगीतकार आनंद जी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि बाबा में उनकी ही नहीं स्वर्गीय कल्याण जी की भी बहुत श्रद्धा थी.

इन्हीं बाबा रामदेव जी के परम भक्त थे मेरे ताऊ जी . हर महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उनके घर एक बड़ा आयोजन हुआ करता था जिसे जम्मा कहा जाता था. पास के ही एक गाँव सुजानदेसर के मंदिर के (जहां ताऊ जी रोज पैदल फेरी देने जाया करते थे ), पांच-सात पुजारी शाम से पहले ही आकर इकट्ठे हो जाया करते थे. ढेर सारी गुड़ की लापसी या चावल और चने की दाल बनती थी और हम सब लोग मिलकर गुड़ की उस लापसी या चावल और दाल के स्वाद का आनंद उठाया करते थे. उसके बाद घर के बाहर बनी हुई एक बड़ी सी चौकी पर जाजम बिछाकर सब लोग बैठ जाते थे. एक थैली में से मजीरे जिन्हें हम छमछमा कहते थे सब बच्चों के हाथ में दे दिए जाते थे, बड़े मजीरों की जोड़ी, ढोलक और खडताल पुजारियों के सुपुर्द कर दी जाती थीं और उसी वक्त ताऊ जी अंदर से निकालकर लाते थे वो चीज़ जो मुझे इस जम्मे में सबसे ज़्यादा आकर्षित करती थी. वो था एक पुराना हारमोनियम, जिसे सिर्फ और सिर्फ जम्मे के दिन ही ओरे (बिल्कुल अंदर के कमरे) में से निकला जाता था. मैं बेमन से छमछमे बजाता रहता था मगर मेरी निगाह हारमोनियम पर अटकी रहती थी. मैं बैंजो तो बजाता ही था इसलिए हारमोनियम बजाना मेरे लिए बहुत मुश्किल नहीं था मगर फिर भी जो चीज़ हमारी पहुँच में नहीं होती वो हमें ज़्यादा आकर्षित करती है. रात भर में कई बार जम्मा देने वाले पुजारियों के लिए चाय बनती और बार बार वो चिलम भी सुलगाते. ऐसे में मुझे मौक़ा मिल जाता हारमोनियम बजाने का. हारमोनियम बजाने वाले पुजारी जी चिलम सुलगाने लगते और कोई भजन शुरू हो जाता तो मैं आँखों ही आँखों में ताऊ जी से पूछता कि हारमोनियम मैं संभाल लूं? और वो आँखों ही आँखों में हामी भर देते थे और इस तरह मैं हारमोनियम संभाल लिया करता था. एक दो भजन तक मैं हारमोनियम बजाता रहता, फिर तो पुजारी जी को सौंपना ही पड़ता. ये जम्मा रात भर चलता था. सुबह सुबह सभी पुजारी वापस सुजानदेसर लौट जाया करते.... घर के सब लोग रात भर जागने के कारण अक्सर दूसरे दिन आराम करते मगर मेरे लिए वो दिन आराम करने का नहीं होता था क्योंकि उसके बाद तो वो हारमोनियम फिर से ओरे में रखा जाना होता था.... वही एक दिन होता था जब मैं पूरी आजादी के साथ हारमोनियम बजा सकता था. इस प्रकार हारमोनियम पर भी मेरा हाथ थोड़ा साफ़ होने लगा था. लेकिन ये सब तभी हो पाता था जब छुट्टियों में ताऊजी परिवार सहित बीकानेर में रहते थे.

उन दिनों सेवानिवृत्ति की उम्र ५८ वर्ष थी. अचानक राजस्थान सरकार ने सेवानिवृत्ति की उम्र घटा कर ५५ वर्ष कर दी. हजारों लोग जो ५५ और ५८ के बीच के थे..... एक साथ घर भेज दिए गए. इन हजारों लोगों में मेरे ताऊजी भी शामिल थे. अब उन्हें बीकानेर लौटना ही था.ताऊ जी के तीन बड़े बेटे पहले से ही बीकानेर में रहने लगे थे, अब ताऊजी, ताई जी, गणेश भाई साहब, विमला, रतन, निर्मला और मग्घा को लेकर बीकानेर आ गए थे. विमला, निर्मला और मग्घा का दाखिला महिला मंडल स्कूल में और रतन का दाखिला सादुल स्कूल में करवा दिया गया मगर ताऊजी के आमदनी के स्रोत बहुत सीमित हो गए थे.बहुत सिद्धांतवादी रहे वो जीवनभर. उन्होंने कभी भी ट्यूशन व्यवस्था को बढ़ावा नहीं दिया. बोर्ड से उनके पास इम्तहानों की कॉपियां आया करती थीं जो सेवानिवृत्ति के बाद भी चालू रह सकती थी मगर नौकरी के आखिरी दिनों में पदमपुर में अपनी ही एक औलाद के हाथों वो कुछ इस तरह छले गए कि उनके हाथ से आमदनी का ये स्रोत हमेशा के लिए छिन गया. अब उन्होंने एल एल बी की अपनी डिग्री को झाड़ पोंछकर निकाला और वकालत शुरू कर दी. बड़े ही जीवट के इंसान थे वो. बहुत सी भाषाओं पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी. वो संस्कृत, पालि और प्राकृत के भी बहुत अच्छे विद्वान थे और उनका हस्तलेख ऐसा सुन्दर था कि उसके सामने छपे हुए शब्द भी फीके लगते थे. शाम के वक्त मैं देखता वो पालि और प्राकृत भाषाओं के हस्तलिखित ग्रंथों की अपने हाथ से हूबहू वैसी ही प्रतियां बनाया करते थे.......उन्होंने मुझे बताया कि बीकानेर में अगर चंद नाहटा जी की पांडुलिपियों की एक लायब्रेरी है. वो उस लायब्रेरी में मौजूद ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ बनाकर रख रहे हैं ताकि शोधकर्ताओं को मूल पांडुलिपियों को छूना न पड़े.

ताऊजी जब छुट्टियों में बीकानेर आते थे तो रतन, निर्मला और मग्घा तीनों अक्सर या तो मेरे घर रहते थे या फिर मैं उनके घर मगर रतन तो हर हाल में मेरे साथ ही रहता था. उन दिनों पता नहीं कैसे बीकानेर में मच्छर नाम की कोई चीज़ नहीं हुआ करती थी. गर्मी में मैं और रतन अपने मालिये (छत पर बना कमरा) की छत जिसे तिप्पड कहते हैं उसपर सोया करते थे.........रात को जब हम दोनों अपने बिस्तर उठाये तिप्पड पर पहुँचते, चारों तरफ बिल्कुल शान्ति होती तो कई बार उस शान्ति को चीरती हुई एक सुरीली आवाज़ हमारे कानों से टकरा जाती और हम एक साथ या तो चिल्ला पड़ते “जगदीश जी”....... या फिर और भी ज़ोर से चिल्ला पड़ते  “सोहनी बाई”. और बिस्तर तिप्पड पर जैसे तैसे फेंककर नीचे उतरते, एक दरवाज़े पर ताला लगाते और चल पड़ते शब्दभेदी बाण की तरह उस आवाज़ की दिशा में और सचमुच हम कभी रास्ता नहीं भूलते थे.........और जा पहुँचते थे अपने लक्ष्य तक.

उन दिनों जोधपुर के एक कलाकार थे मोहनदास निम्बार्क जो जगह जगह घूम घूमकर रामदेव जी की कथा किया करते थे. अच्छा गाते थे मोहनदास जी मगर हमें जो चीज़ उनके गाने में चुम्बक की तरह खींचती थी वो थी उनके साथ बजने वाले क्लेरियोनेट की मधुर आवाज़. हम लोग जिस दिन पहली बार ये कथा सुनने पहुंचे तो देखा.... दरम्याने कद का दुबला सा एक इंसान आखें बंद किये बड़ी तन्मयता से क्लेरिओनेट जैसे मुश्किल साज़ पर कुछ इस तरह अंगुलियां घुमा रहा है, जैसे कोई कुशल तैराक बड़े सुकून से किसी स्वीमिंग पूल में तैर रहा हो. मैं और रतन मंत्रमुग्ध क्लेरिओनेट की उस मधुर आवाज़ को सुनते रहे. थोड़ी देर में कलाकार ने आँखे खोलीं. हम सबसे आगे बैठे हुए थे. आँखें खोलते ही उनकी नज़र हमारे मंत्रमुग्ध चेहरों पर पड़ी.... वो मुस्कुरा पड़े. हम जैसे निहाल हो गए........ सुबह चार बजे तक हम वो कथा सुनते रहे. जब कथा समाप्त हुई तो क्लेरिओनेट के वो सुरीले कलाकार उठकर हमारे पास आये क्योंकि वो समझ गए थे कि हम उन्हें सुनने के लिए ही बैठे थे. अब हमारा परिचय हुआ. उन्होंने बताया कि उनका नाम जगदीश है और वो एक बैंड में काम करते हैं....... हमारे पास तो अपना परिचय देने के लिए था ही क्या? सिवा इसके कि हम दोनों एक अच्छे घर के बच्चे हैं और पढ़ाई कर रहे हैं. बस उस दिन से जब भी जगदीश जी की क्लेरिओनेट की मधुर तान हमारे कानों में पड़ती थी हम भागे चले जाते थे उन्हें सुनने के लिए और अक्सर उनसे बात होती थी. ये दोस्ती जो मेरे छात्र जीवन में शुरू हुई वो तब तक चलती रही जब तक जगदीश जी परिस्थितियों से जूझते हुए क्लेरिओनेट जैसे मुश्किल साज़ को अपनी साँसों की भेंट चढाते रहे..... आखिरकार उसी क्लेरिओनेट ने बड़ी बेरहमी से उनकी साँसों को लील लिया जिसपर तैरती हुई उनकी अंगुलियां उस बेजान क्लेरिओनेट को साक्षात् सरस्वती में बदल देती थीं.......मगर अफ़सोस.....मैं उनके लिए बहुत कुछ करना चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया.


मैंने जब आकाशवाणी ज्वाइन किया ....और १९७७ में बीकानेर ट्रान्सफर होकर आया तो बहुत कोशिश की कि जगदीश जी को किसी तरह स्टाफ आर्टिस्ट के तौर पर ले लिया जाए मगर मैं कुछ नहीं कर पाया क्योंकि तब तक वो बहुत कमज़ोर हो गए थे और विभाग की अपनी कुछ सरकारी किस्म की मजबूरियाँ थीं. आप शायद जानते होंगे कि इस तरह के साज़ बजाने वालों के फेफड़ों पर बहुत ज़ोर पड़ता है....उनके लिए ज़रूरी है कि वो अच्छा और संतुलित खाना खाएं वरना टी बी के कीटाणु तो हर वक्त वातावरण में रहते हैं, जैसे ही शरीर की शक्ति कम हुई वो तुरंत उस शरीर को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं. आज टी बी का इलाज बहुत आसान है, बहुत मुश्किल तब भी नहीं था मगर अच्छा खाना उस वक्त भी इलाज की पहली शर्त थी और आज भी है........आखिर वो सुरीला कलाकार अपने उस साज़ की ही भेंट चढ गया जिसे वो अपनी ज़िंदगी से ज्यादा प्यार करता था. मुझे आज भी याद है, जैसी कि मेरी आदत थी कि मैं हर साज़ को बजाने की कोशिश किया करता था, छात्र जीवन में, एकाध बार मैंने जगदीश जी से क्लेरिओनेट लेकर बजाने की कोशिश की तो उन्होंने क्लेरिओनेट देने से मना तो नहीं किया लेकिन वो बोले..... “नहीं महेन्द्र जी ....आपके लिए और बहुत साज़ हैं..... आप कुछ और बजाइए.... ये साज़ ज़िंदगी का साज़ नहीं.... मौत का साज़ है”. उस वक्त मैं कुछ नहीं समझा था कि जगदीश जी ने ऐसा क्यों कहा मगर थोड़ा बड़ा हुआ तो बहुत से फूँक का साज़ बजाने वाले कलाकारों का हश्र देखा तो उनकी बात समझ में आई.

दूसरी आवाज़ जिसे सुनकर मैं और रतन खुशी से चिल्ला पड़ते थे......वो थी सोहनी बाई की आवाज़. दुबली पतली काया. चेहरे पर हल्का सा घूंघट और हाथ में तम्बूरा लिए हुए बड़ी सादगी से तान खींचती हुई सोहनी बाई.......हम लोग आवाज़ की सीध में भागते हुए जा पहुँचते थे उस जागरण में जहां सोहनी बाई गा रही होती थीं..... लगता था मीरा फिर से अवतार लेकर आ गयी हों इस धरती पर. सच बताऊँ मेरे जीवन में तीन लोगों में मुझे मीरा के दर्शन हुए हैं. जुथिका रॉय जी, सोहनी बाई और श्रीमती महादेवी वर्मा. महादेवी जी के साथ अपने अनुभव मैं तब लिखूंगा जब कि आकाशवाणी इलाहाबाद की बातें लिखूंगा........ सोहनी बाई की आवाज़ में कोई खास हरकत या गायकी नहीं थी, बहुत ही सीधा सीधा गाती थीं वो मगर दो चीज़ें ऐसी थीं जो उनके गाने को खास बना देती थीं. एक उनकी आवाज़ में ग़ज़ब का मिठास था और दूसरा समर्पण..... वो सिर्फ लोक भजन गाती थीं और उनका भजन सुनकर ऐसा लगता था कि ईश्वर के प्रति वो इस क़दर समर्पित हो गयी हैं कि स्वयं उनकी आत्मा परमात्मा का हिस्सा हो गयी हैं. मेरे कानों में आज भी उनका वो भजन गूँज रहा है “म्हाने अबके बचा ले म्हारी माय बटाऊ आयो लेवाने.....”  सीधा सीधा शब्दार्थ लें तो एक बेटी अपनी माँ से कह रही है कि हे माँ तेरा दामाद मुझे लेने आ गया है तू मुझे इस बार बचा ले...... मगर दरअसल ये माँ, दामाद और बेटी, ये सब तो प्रतीक हैं. मृत्यु के आगमन पर इस दुनिया से जाती हुई आत्मा वेदना से तडपती है और कहती है... कोई तो मुझे मृत्यु से बचा ले.

मैं और रतन सोहनी बाई के भजन सुनने बैठते तो कब सुबह हो जाती हमें पता ही नहीं चलता. इसके बरसों बाद १९७७ में जब मैं उदयपुर से ट्रान्सफर होकर बीकानेर आया और सबसे पहली बार सोहनी बाई को रिकॉर्ड किया तो मुझे लगा मेरा जीवन धन्य हो गया...... न कोई आलेख, न कोई कागज़ का टुकड़ा, न कोई लंबा चौड़ा लवाज़मा. बस हाथ में एक तम्बूरा और एक ढोलक.... कभी कभी दयाल पंवार जैसे कोई कलाकार हारमोनियम लेकर बैठ गए तो ठीक नहीं तो किसी साज़ की मांग नहीं.....  हर भजन के आखिर में या तो आता था “कहे कबीर सुनो भाई साधो....” या फिर “मीरा के प्रभु गिरधर नागर.......” अब ये पूछने की तो गुंजाइश ही नहीं रहती कि ये किसका भजन है. एक बार मैंने पूछा “बाई आपको इतने भजन याद कैसे रहते हैं? ये जो आपने अभी गाया वो मीरा का भजन था?” वो बड़ी सरलता से बोलीं.... “हुकुम.... मीरा बाई रो ई है (हुकुम मीरा बाई का ही है.)मैंने कहा “लेकिन कभी सुना नहीं ये भजन. वो थोड़ा घबरा गईं और बोलीं “अन्दाता म्हनै कीं ठा नईं है (अन्नदाता मुझे कुछ भी पता नहीं है) अब मैं चकराया. मैंने फिर भी मुलायमियत से कहा “बाई कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप खुद भजन लिख लेती हैं और मीरा बाई और कबीर दास जी के नाम से गा देती हैं ....घूंघट की ओट से वो हलके से मुस्कुराईं और बोलीं “म्हारी काईं औकात सा ? मैं तो साफ़ अनपढ़ हूँ.म्हने दसतक करना ई कोनी आवै. हूँ काईं लिख्सूं ? (मेरी क्या औकात साब? मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूँ. मुझे तो दस्तखत करने भी नहीं आते. मैं भला क्या लिख सकती हूँ?) मैंने कहा “सच सच बताइये कि फिर आखिर बात क्या है?” तो वो हाथ जोड़कर बोलीं  “भगवान री सौगन म्ह्नै कीं ठा नईं है. हूँ तंदूरो नईं उठाऊँ जद तईं म्हनै कीं पतों नईं रैवे कि मैं काईं गासूं पण तंदूरो उठाता ईं बा मावडी या बो बाबो जाणै हिवडेमें काईं उपजावै के आप ऊं आप जिको म्हारै मूंडै मैं आवै हूँ गा दूं.... (जब तक मैं तंबूरा नहीं उठाती हूँ, मुझे कुछ पता नहीं होता कि मैं क्या गाऊंगी मगर बस तम्बूरा हाथ में लेते ही या तो वो माँ(मीरा) या वो बाबा(कबीर) हिवडे में उतर के जो कुछ उसमें उपजा देते हैं, मैं गाती चली जाती हूँ......) हुकुम जिकी चीज नै हूँ समझूं ई नईं बा म्हारी कियां हूँ सकै? बा या तो बीं मावडी री हू सकै या फेर बीं बाबै री (हुकुम जिस चीज़ को मैं समझ ही नहीं सकती वो चीज़ मेरी कैसे हो सकती है? वो या तो उस माँ मीरा बाई की हो सकती है या फिर उस बाबा कबीर दास की). उनकी आवाज़ से लगा उनकी आँखें छलछला आई हैं. मुझे लगा इस विषय में और कुछ कहना उनका दिल दुखाना होगा. वैसे भी मीरा बाई तो राजस्थान की धरती पर पैदा हुईं थीं मगर देश के हर हिस्से में मीरा बाई के भजन लोक कलाकारों द्वारा अलग अलग रूप में गाये जाते रहे हैं...... कौन कह सकता है कि कौन कौन से भजन उनके खुद के रचे हुए हैं और कौन कौन से भजन महज़ उनके ऊपर घनघोर आस्था रखने वाले लोक कलाकारों के हृदयों ने रच दिए हों. मैंने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और.....मुझे लगा, मुझे आज मीरा बाई के दर्शन हुए हैं.



आज वो सोहनी बाई हमारे बीच नहीं हैं.... राजस्थान के बाकी केन्द्रों पर तो उनकी शायद ही कोई रिकॉर्डिंग होगी, पता नहीं आकाशवाणी बीकानेर पर भी उनके भजनों के कितने टेप्स इरेज़ कर, उनपर कमर्शियल रिकॉर्ड कर लिए गए होंगे क्योंकि अब तो आकाशवाणी के हर केन्द्र पर पैसा कमाने पर ही ज़ोर दिया जाता है ना? आकाशवाणी कभी कला और कलाकारों का अवश्य ही पोषक रहा है मगर पिछले काफी समय से ज़्यादातर इस पर अधकचरे अफसर ही काबिज रहे हैं, जिन्हें न कला की समझ होती है और न ही अफसरी की तमीज़ वरना डेढ़ डेढ़ घंटे तक के मेरे पचासों ऐसे नाटक एक ही दिन में श्याम प्रभू एरेज़ नहीं करवा देते जिन्हें तैयार करने में कोटा के ३०-४० कलाकारों ने एक एक महीने का वक्त दिया था . खैर...... ये कहानी फिर सही.........

हां...... अब भी जब कभी बीकानेर जाता हूँ और इत्तेफाक से रतन भी श्री गंगानगर से आया हुआ होता है, हम दोनों छत पर जाकर लेटते हैं तो दिल करता है, काश एक बार फिर जगदीश जी की क्लेरिओनेट की मधुर आवाज़ या फिर सोहनी बाई की ह्रदय के अंदर तक उतर जाने वाली तान सुनाई दे जाए........... मगर बीछवाल औद्योगिक क्षेत्र में बने हमारे नए घर की छत पर पूरी रात या तो कारखानों की खर्र खट खर्र खट सुनाई देती है या फिर पास ही बने लालगढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ा कोई डीज़ल इंजन बीच बीच में चीख पड़ता है.

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