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Sunday, March 27, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा मन – भाग २१ – महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला


ज़िंदगी का वो वक्त बड़ा अजीब सा होता है जब इंसान १५-१६ बरस की वय में पहुंचता है. बड़े उसे कहते हैं अमां मियाँ जाओ बच्चों के साथ खेलो, अभी तो बच्चे हो अभी तो दाढ़ी मूंछ भी ठीक से फूटी नहीं है...... बच्चे अपने पाले में से पहले ही निकाल चुके होते हैं. इधर स्कूल में अध्यापक बोर्ड की परीक्षा का नाम लेकर डराते हैं उधर घर में कोई न कोई अच्छा करियर चुनने का दबाव बढ़ने लगता है. आजकल तो गली गली में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खुल गए हैं साठ के दशक में पूरे राजस्थान में दो इंजीनियरिंग और चार मेडिकल कॉलेज हुआ करते थे. आज तो हर प्राइवेट कॉलेज एम् बी ए का पाठ्यक्रम शुरू किये बैठा है उस वक्त पूरे राजस्थान में शायद एक भी कॉलेज में एम् बी ए नहीं था. शायद इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कि मैंने तो उस वक्त तक एम् बी ए का नाम भी नहीं सुना था. ये तो हर माता पिता जानते थे कि इतने कम कॉलेजों में सबके बच्चों का दाखिला होना तो मुमकिन नहीं है मगर हर माँ बाप की जी तोड़ कोशिश तो यही रहती थी कि किसी और का नंबर आये चाहे ना आये, उनके बच्चे का तो नंबर आना ही चाहिए. ये ‘चाहिए’ वाला भाव बच्चों पर भयंकर दबाव डालता था. मुसीबत इतनी ही नहीं थी, यही वो उम्र होती है जब कि शरीर में हार्मोन्स में कुछ बदलाव आते हैं, दाढ़ी मूंछ फूटने लगती है. आज की पीढ़ी शायद इसे नहीं समझ पायेगी कि ये हलकी हलकी उगती दाढ़ी मूंछे भी हमारे ज़माने में एक अजीब सा काम्प्लेक्स पैदा करते थे मन में. एक अरसे तक मैंने अपने माता पिता के सामने शेव नहीं बनाई. नहाने के लिए बाथरूम में घुसता था तो वहीँ एक रेज़र और ब्लेड का पैकेट छुपाये रखता था. शेविंग क्रीम की जगह नहाने वाली साबुन के झागों से  ही काम चल जाता था. ब्लेड्स न तो आज के स्तर की होती थी और न ही आज की कीमत की. आज की पीढ़ी दोनों की तुलना करना चाहे तो बता दूं, आज एक अच्छी ब्लेड लगभग १२० रुपये की आती है. उस वक्त १० भारत ब्लेड का एक पैकेट एक आने का आता था. यानि एक रुपये के १६ पैकेट या १६० ब्लेड्स.

हालांकि मेरे घर का माहौल ऐसा था कि बच्चों पर कोई दबाव नहीं डाला जाता था था लेकिन भाई साहब का दाखिला मेडिकल कॉलेज में हो चुका था इसलिए मुझपर एक तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव तो था ही कि मुझे कुछ करके दिखाना है. लिहाजा कुछ दिनों के लिए मैंने खेल, संगीत, नाटक सब कुछ छोड़ दिया और पढाई में जुट गया. लेकिन थोड़े दिन की पढाई से क्या होने वाला था? कुल मिलाकर ५५% अंक आये. राजस्थान के दो इंजीनियरिंग कॉलेजों में से तो इन अंकों से कहीं एडमीशन होने का सवाल ही नहीं था. राजस्थान के बाहर के कॉलेजों में फॉर्म भरे गए. एक कॉलेज ने सिविल इंजीनियरिंग के डिग्री कोर्स में एडमिशन दिया. उन दिनों सिविल इंजीनियरिंग लोगों की आख़िरी पसंद थी. सिविल इंजीनियर्स में भयंकर बेरोजगारी भी थी. मेरी रूचि मैकेनिकल इंजीनियरिंग में थी. मुझे ये भी लगा कि अगर मैंने सिविल शाखा को चुन लिया तो मेरा संगीत, मेरा ड्रामा सब ईंट पत्थरों के नीचे दफ्न हो जायेंगे.. एक और बात मुझे परेशान कर रही थी कि पिताजी रिटायर होने वाले थे, भाई साहेब के नौकरी में आते आते ही उन्हें रिटायर होना था. ऐसे में अगर मैं कहीं बाहर रहकर पढूं तो उसका खर्च कहाँ से आएगा? घर का पूरा खर्च और मेरे बाहर रहकर पढ़ने का खर्च भाई साहब के कन्धों पर आएगा और अगर उससे गुज़ारा नहीं होता है तो पिताजी को कर्ज़ लेना पडेगा. लिहाजा मैंने तय किया कि नहीं, मैं कुछ भी करूँगा मगर सिविल इन्जीनियरिंग नहीं करूँगा. इसी समय मेरे दोस्त ब्रजराज सिंह के बड़े भाई शिवराज सिंह जी मेरे घर आये. वो पोलिटेक्निक कॉलेज में पढ़ाते थे. उन्होंने आकर मेरे पिताजी से कहा  “हमारी कॉलेज में कई सीट्स खाली पडी हैं, जो मार्क्स महेंद्र के हैं उनके आधार पर आराम से उसका एडमिशन मेरे यहाँ हो सकता है.” ब्रजराज सिंह और मैं राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर नौ में कक्षा चार से कक्षा नौ तक साथ ही पढ़े थे, उनका घर हमारे घर के सामने की तरफ था. मेरे पिताजी ने जवाब दिया “देखो शिवराज, मैं बच्चों पर ज़बरदस्ती कुछ लादने के पक्ष में नहीं हूँ, अगर वो पोलिटेक्निक में एडमिशन लेना चाहे तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है लेकिन मैं उसपर ज़बरदस्ती नहीं कर सकता.” शिवराज सिंह जी ने मुझसे बात की तो मैंने उनके यहाँ एडमिशन लेने से इनकार कर दिया.
अब सवाल ये था कि मैं आखिर करूं क्या? घर के सब लोगों का मानना था कि अगर मैं फर्स्ट ईयर टी डी सी में बायो ग्रुप ले लूं तो सिर्फ गणित की जगह मुझे बायोलॉजी पढ़ना पडेगा, बाकी दोनों विषय भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र तो मैं नौवीं से पढता ही आ रहा था. एक साल की पढाई के बाद, पी एम् टी देकर मैं मेडिकल कॉलेज में एडमिशन ले सकूंगा और मैं भी भाई साहब की तरह डॉक्टर बन जाऊंगा. सबसे पहला फायदा तो ये होगा कि मुझे पढ़ने के लिए कहीं बाहर नहीं जाना पडेगा. दूसरा फायदा ये होगा कि भाई साहब की किताबें मेरे काम आ जायेंगी और भाई साहब पढाई में मेरी मदद भी कर सकेंगे.
मेरा मन अभी भी संगीत में अटका हुआ था. मैं चाहता था कि मैं संगीत के क्षेत्र में पढाई करूं मगर समस्या ये थी कि उन दिनों लडकियां इंजीनियरिंग में नहीं जाती थीं और लड़कों के लिए बीकानेर में किसी भी कॉलेज में संगीत पढ़ने की व्यवस्था नहीं थी. इस श्रृखला के नौवें एपिसोड मैं मैंने विस्तार से वर्णन किया है कि संगीत की पढाई करने के लिए किस प्रकार दुःसाहस करके मैं लड़कियों के कॉलेज में एडमिशन लेने जा पहुंचा था और वहाँ की प्रिंसीपल और लेक्चरर ने मेरे प्रति सहानुभूति तो प्रकट की लेकिन मुझे एडमिशन नहीं दे पाईं. बहुत सोच विचार के बाद मैंने सबकी राय मानकर कॉलेज में बायो ग्रुप लेने का निर्णय लिया. अब गणित की जगह मुझे जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान विषय पढ़ने थे. डूंगर कॉलेज में एडमिशन लिया और कक्षाएं लगने लगीं. मुझे जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान पढ़ने में ज़रा भी अच्छा नहीं लगता था खास तौर पर मेंढक का डिसेक्शन करना मुझे कभी रुचिकर नहीं लगा.
जीवन बहुत नीरस हो चला था. मुझे लग रहा था कि शायद मैं जीवन में कुछ नहीं कर पाऊंगा. आस पास के लोग जले पर नमक छिडकने के लिए कहीं क्लर्क की कोई वैकेंसी की सूचना लाकर देते थे तो कभी पिताजी को समझाते थे कि मुझे एस टी सी करवा दें या फिर पटवारी की ट्रेनिंग दिलवा दें ताकि आने वाले जीवन में दो रोटी तो कमा कर खा सकूं. पिताजी सुनते सबकी थे मगर मुझसे कुछ नहीं कहते थे. मन ही मन मुझे आभास हो रहा था कि उन्हें भी ये चिंता सता रही है कि मेरा भविष्य क्या होगा? और शायद वो मुझसे नाराज़ भी हैं, इसी बीच एक  ऐसी छोटी सी घटना हुई जिसने मेरे दिमाग से इस गलतफहमी को निकाल दिया कि पिताजी मुझसे नाराज़ हैं. हुआ ये कि एक दिन ब्रजराज सिंह के पिताजी नारायण सिंह जी आकर मेरे पिताजी के पास बैठे. मुझे उनके लिए चाय पानी लेकर जाना ही था. जैसे ही मैं बैठक में पहुंचा, नारायण सिंह जी बोले “ लीजिए ये आ गए आपके लाडले कँवर साब, मोदीजी..... आपका ये बेटा और मेरा ब्रजराज, ये दोनों तो बिलकुल निकम्मे ही हैं. खा खा कर सांड हो रहे हैं और करने को कुछ नहीं. पढाई वढ़ाई इनके बस की बात नहीं है, इन दोनों को मैं अपने गाँव ले जाता हूँ....... खेत में काम करवाऊंगा तो सारी हीरोगिरी भूल जायेंगे.”
मैं चाय के ट्रे लिए खडा सब सुन रहा था. मुझपर मानो किसी ने घडों पानी डाल दिया. मेरी समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं ? इस तरह से, इन कटु शब्दों में अपनी आलोचना मैंने कभी किसी के मुंह से नहीं सुनी थी. हालांकि अभी इस से दो तीन दिन पहले ही ताऊ जी के एक बेटे यानि मेरे एक भाई साहब ने मेरी माँ से कहा था “ काकी,  राजा(भाई साहब का घर का नाम) तो खैर पढ़ने में अच्छा निकल गया, डॉक्टर बन ही जाएगा लेकिन महेंदर कुछ बनेगा तब जानेंगे हम लोग तो, देखना वो हम लोगों जैसा ही रहेगा.” और आज नारायण सिंह जी मेरे पीछे हाथ धोकर पड गए हैं........  मैं असमंजस में वहाँ खडा हुआ ही था कि मैंने पिताजी की गुस्से से तमतमाती हुई आवाज़ सुनी और मैंने देखा वो अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए थे. उनका चेहरा गुस्से से लाल था. वो हाथ जोड़े हुए बोले “ माफ करें नारायण सिंह जी, आप अपने बेटे को सांड कहें या ऊँट मुझे इस से कोई मतलब नहीं है लेकिन खबरदार अगर मेरे बेटे के बारे में आगे एक शब्द भी बोला तो......... आपको शायद पता नहीं कि इसका इंजीनियरिंग कॉलेज में आराम से एडमिशन हो रहा था और आपके बड़े कँवर साहब अपने कॉलेज में दाखिला देने के लिए मेरे घर आये थे, लेकिन मैं अपने बच्चों को बच्चे समझ कर व्यवहार करता हूँ आपकी तरह गुलाम समझ कर नहीं. मैं क्या जानता नहीं कि आपने किस तरह ब्रजराज को अलवर से ये कहकर बुलाया कि शिवराज की शादी है और उस बेचारे दसवीं में पढ़ रहे बच्चे की बन्दूक की नोक पर शादी कर दी........... आप क्या समझते हैं? आपके ये बच्चे आपको माफ कर देंगे.....? आप गलतफहमी में हैं, एक दिन आएगा जब ये बच्चे आपसे इतनी नफरत करेंगे कि आपका बुढापा नर्क बन जाएगा. अब आपके लिए बेहतर ये होगा कि आप यहाँ से उठकर चले जाएँ और आइन्दा कभी मेरे घर की तरफ का रुख न करे.”
मैं अवाक् रह गया. मैंने पिताजी को इस तरह किसी से भी बोलते हुए नहीं सुना था. नारायण सिंह जी गुस्से से मुंह मुंह में बडबडाते हुए उठे और घर से बाहर निकल गए. मैं पिताजी के सामने खडा था, मैंने कहा “सॉरी”
उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर बिठाया और कहा “सॉरी क्यों कह रहे हो? ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए. देखो हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता. इस दुनिया में और भी बहुत काम हैं करने के लिए. तुम्हें जो भी फील्ड पसंद है, तुम उसे चुनो, मुझे कोई दिक्कत नहीं है. ये दो रोटी कमाकर खाने की बात करने वाले भूल जाते हैं कि पेट भरने को दो रोटी तो कुत्ते को भी मिल ही जाती है, मैं तो चाहता हूँ कि तुम जो भी फील्ड चुनो उसमे कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हें जानें.”
इस घटना ने मुझे बहुत सहारा दिया. मेरे मन में पल रहा एक तरह का काम्प्लेक्स मेरे दिनाग से निकल गया कि मेरे पिताजी की नज़र में मैं एक नाकारा इंसान हूँ और वो मुझसे नाराज़ है. मैं पढाई में जुट गया इस नीयत के साथ कि मैं पूरी ईमानदारी से पी एम् टी दूंगा और अगर चयन हो जाता है तो इन सब लोगों को डॉक्टर बनकर दिखाऊंगा. विधाता ऊपर कहीं सातवें आसमान पर बैठा मेरी बातें सुनकर ठहाका लगाकर हंस पड़ा था क्योंकि मेरे लिए उसने कुछ और ही योजनाएं बना रखी थीं.
इस घटना के कुछ ही दिन बाद एक रविवार को दिन में खाना खाकर बैठा अखबार देख रहा था कि किसी ने घर की कुंडी खटखटाई. मैंने दरवाजा खोला तो देखा सामने मेरा सहपाठी और दोस्त मोहन प्रकाश शर्मा खडा हुआ था. मैंने कहा “आओ” वो अंदर आते हुए बोला “तुम कपडे चेंज कर लो, ज़रा बाहर चलेंगे”
मैंने उसे बैठने को कहा और अंदर जाकर पांच मिनट में कपडे बदलकर आ गया. साइकिल की चाबी उठाते हुए कहा “लेकिन हम चल कहाँ रहे हैं और कितनी देर में लौटेंगे ये तो बताओ, ताकि मैं घर में बता सकूं.”
उसने मेरी बात का जवाब देने की बजाय उलटा सवाल किया “ तुमने रेडियो सुना?”
मैंने कहा “हाँ रेडियो तो हमेशा ही सुनता हूँ लेकिन तुम कहना क्या चाहते हो साफ़ साफ़ बताओ ना यार.”
“अच्छा.... तो तुम्हें मालूम नहीं है...... ऐसा है रेडियो पर  पिछले दो तीन दिन से एक अनाउंसमैंट हो रहा है कि आकाशवाणी में नाटकों का एक स्वर परीक्षण होने वाला है.....अब तक ये स्वर परीक्षण सिर्फ जयपुर में ही होता था, पहली बार बीकानेर में होने जा रहा है.”
मैं उसका मुंह देख रहा था....... और सोच रहा था, अरे मैं तो इतने बरसों से आकाशवाणी के नाटकों को बिला नागा सुनता आ रहा हूँ. नंदलाल जी, सुलतान सिंह जी, देवेन्द्र मल्होत्रा जी, ओम शिवपुरी जी, सुधा शिवपुरी जी, लता गुप्ता जी,  असरानी जी, माया जी, मदन शर्मा जी ....... सारे नाम तो जुबानी याद हैं मुझे. मैंने उससे कहा “तो तुम क्या चाहते हो”
वो बोला “देखो यार मेरे एक रिश्ते के मामा जी आकाशवाणी, बीकानेर में अफसर हैं, उनका नाम श्री सुरेन्द्र विजय शर्मा है. हम लोग उनके घर चलते हैं, मुझे इस स्वर परीक्षण का फॉर्म भरना है. मेरे मामाजी हैं तो कुछ तो काम आयेंगे ही. मैं मन ही मन सोच रहा था कि आज तक कभी सुना नहीं कि मोहन नाटक करता है या रेडियो पर नाटकों को सुनने का शौक़ीन है. ये अचानक उस पर नाटक के स्वर परीक्षण का भूत कैसे सवार हो गया. फिर मैंने सोचा , हो सकता है, ये भी नाटक का शौक़ीन हो. दरअसल हमारी कॉलेज की नयी नयी दोस्ती थी, स्कूल में तो हम लोग साथ थे नहीं, इसलिए एक दूसरे के बारे में ज़्यादा नहीं जानते थे. मैं चुपचाप तैयार होकर उसके साथ सायकिल उठा कर चल पड़ा.
रथखाने में मोहन के मामा जी रहते थे. हम दोनों ने जाकर अपनी अपनी सायकिलें खडी कीं और दरवाज़े पर लगी घंटी बजाई. दो ही मिनट बाद एक सुदर्शन व्यक्ति ने दरवाजा खोला. मोहन प्रणाम मामा जी कहते हुए उनके पावों में झुका तो मैंने भी उसका अनुसरण किया. आशीर्वाद देते हुए वो बोले “ आओ आओ मोहन अंदर आ जाओ.”
हम दोनों उनके ड्राइंग रूम में बैठ गए, इतने में मामी जी पानी के ग्लास लेकर आ गईं. हम दोनों ने उनके भी पाँव छुए और बैठ गए. मामाजी कुछ गुनगुना रहे थे जैसे कोई धुन बना रहे हों और मोहन तथा मैं चुपचाप बैठे हुए थे. अचानक मामाजी ने गुनगुनाना बंद किया और कहा “हाँ मोहन, घर में सब लोग ठीक हैं?”
“जी मामा जी, आप बहुत दिन से घर नहीं आये.........और..... मुझे एक काम भी था आपसे.”
“क्या करें बेटा आजकल काम बहुत है ऑफिस में. ऊपर से पहली बार यहाँ एक ऑडिशन भी होने वाला है नाटक का, तो उसकी तैयारी में लगे हुए हैं हम लोग... खैर उसे छोडो.... तुम बताओ, भाइयों की दुकान के सेठ जी के बेटे को हम कलाकारों से क्या काम पड गया?”
मोहन थोड़ा लड़ियाता हुआ सा बोला “ मामाजी मुझे भी नाटक का स्वर परीक्षण देना है.”
मामाजी हँसे “ देखो बेटा ये कोई आम परीक्षा नहीं होती जिसमे ३६ अंक लाकर पास हुआ जा सकता हो. ये एक प्रोफेशनल परीक्षा है. इसके लिए हमारे जयपुर के डिरेक्टर अपनी टीम के साथ आ रहे हैं.”
“लेकिन मुझे भी रेडियो आर्टिस्ट बनना है”
“अच्छा तुम कल ऑफिस में आकर फॉर्म भर दो.”
मैं अब तक खामोशी से दोनों की बातचीत सुन रहा था कि मामा जी ने मोहन से एक सवाल किया “अच्छा मोहन तुम रेडियो के नाटक सुनते हो?”
“जी कभी कभी”
“अच्छा नन्द लाल जी का नाम सुना है?”
अब मोहन चुप. मामाजी को लग गया कि मोहन नाटक सुनता वुनता कुछ नहीं, बस यूंही हांक दी है कि हाँ सुनता हूँ.”
पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया “ जी मैंने नंदलाल जी के कई नाटक सुने हैं” और मैंने एक के बाद एक उनके कई प्रसिद्ध नाटकों के नाम गिनवा दिए.
मामाजी ने आँखे बंद कर लीं. मैं जैसे ही चुप हुआ, बोले “बेटा बोलते जाओ...... बोलते जाओ”
मैं एक दम सकपका गया. मुझे लगा कि मैं बिना पूछे बीच में बोलने लगा, वो शायद उन्हें बुरा लगा. मैंने कहा “जी सॉरी मुझे बीच में नहीं बोलना चाहिए था.”
वो हंसकर बोले “अरे नहीं बेटा, मैं तो तुम्हारी आवाज़ का आनंद ले रहा था. बहुत दिनों बाद एक अच्छी आवाज़ सुनने को मिली है..... देखो बेटा अब सुनो ध्यान से मेरी बात.........”
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है? क्या मेरी आवाज़ अच्छी आवाजों की श्रेणी में आती है? आज तक तो किसी ने भी नहीं कही ये बात? मैं सहमा हुआ सा मामा जी की तरफ देख रहा था कि वो फिर बोले “ये मोहन फॉर्म भरे या न भरे, तुम्हें स्वर परीक्षण का फॉर्म ज़रूर भरना है.”
मैने कहा “जी”
मन ही मन मुझे लग रहा था कि मोहन को ज़रूर बुरा लगा होगा कि मैं बीच में बोल पड़ा और मामा जी की पूरी तवज्जो मेरी तरफ हो गयी. हम लोग प्रणाम कर वहाँ से चल पड़े. रास्ते में मैंने मोहन से माफी मांगते हुए कहा “यार माफ कर देना वो नंदलाल जी के बारे में बात करने लगे तो मुझसे चुप नहीं रहा गया क्योंकि वो मेरे सबसे प्रिय कलाकार हैं.”
मोहन भी बड़े दिलवाला निकला. बोला “ कोई बात नहीं यार, फॉर्म तो हम दोनों भरेंगे, देखते हैं कौन पास होता है कौन फेल.”
अगले ही दिन हम दोनों ने ऑडिशन के फॉर्म भरे. ऑफिस में कलाकारों की भीड़ लगी हुई थी. बीकानेर के इतिहास में पहली बार नाटक का ऑडिशन हो रहा था. उम्र की कोई पाबंदी थी नहीं, लिहाजा १७-१८ साल से लेकर ७० साल का हर कलाकार फॉर्म भर रहा था.
फॉर्म तो भर दिया लेकिन क्या तैयारी करनी है ये किससे पूछा जाय? क्योंकि जब ऑडिशन हो ही पहली बार रहा था तो कोई अनुभवी कलाकार कहाँ से आता? एक दिन मोहन ने मुझे बताया कि वो मामाजी के घर गया था और उनसे कुछ सीख कर आया है. मुझे उससे ये पूछना ठीक नहीं लगाकि उसने मामाजी से क्या सीखा? फिर भी मुझे अंदर ही अंदर अपने पर थोड़ा विश्वास था कि जिस तरह की एक्टिंग नंद्लाल जी करते हैं, मैं थोड़ी बहुत तो उसकी नक़ल कर ही सकता हूँ. दूसरे मुझे थोडा भरोसा था अपने उच्चारणों पर जो उस्ताद जी से उर्दू सीखने की वजह से और लोगों से बेहतर हो गए थे.
कुछ ही दिनों में ऑडिशन का कॉल लैटर आ गया. मेरा बहुत मन हुआ कि एक बार अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके सुनूं तो सही लेकिन बहुत हाथ पैर मारने पर भी इसकी कोई व्यवस्था नहीं हो सकी क्योंकि सिवाय रेडियो स्टेशन के टेप रिकॉर्डर कहाँ होते थे उन दिनों? आज की पीढ़ी को ये बात भी एक अजूबा ही लगेगी कि मुझे अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करने के लिए कोई साधन नहीं मिला लेकिन ज़रा सोचिये कहाँ से आता कोई साधन?कसेट रिकॉर्डर तो तब तक भारत में आया ही नहीं था.
बस १९६२ से सुने नाटकों और खास तौर पर नन्द लाल जी की थोड़ी बहुत नक़ल करने की कूव्वत के बल पर जा पहुंचा मैं ऑडिशन देने.
पहले मोहन का नंबर आया . वो अंदर गया और दो मिनट बाद बाहर आ गया. कलाकारों का हुजूम उमड़ा हुआ था. कोई कह रहा था ३०० लोग हैं तो कोई कह रहा था ५०० लोगों ने फॉर्म भरे हैं.चार पांच दिन तक चलने वाला था ऑडिशन.
मुझे भी एक ७-८ पेज की स्क्रिप्ट पकड़ा दी गयी थी जिसमे अलग अलग तरह के अलग अलग मूड के नाटक के ९-१० टुकड़े थे.
थोड़ी ही देर में मेरा बुलावा आ गया. मैं स्टूडियो में घुसा. एक अजीब सी सांय सांय की आवाज़ ने मेरा स्वागत किया. पहली बार महसूस किया कि सन्नाटे की भी अपनी एक ध्वनि होती है. मेरी कल्पना में ऑडिशन का जो स्वरुप था उसके अनुसार वहाँ ५-७ कलाकारों को होना चाहिए था जिनके साथ मुझे नाटक करना  था. लेकिन वहाँ तो ऐसा कुछ नहीं था. स्टूडियो के बीचोबीच दो माइक खड़े हुए थे. मैंने अंदर घुसते ही देखा उन में से एक के सामने मोहन के मामाजी खड़े हुए थे. मुझे देखते ही वो हलके से मुस्कुराए. मेरा तनाव थोड़ा कम हुआ. तभी एक बड़े से स्पीकर पर एक गंभीर आवाज़ गूंजी “अपने रोल नंबर बताइये और पहले पेज पर लिखे हुए शब्दों को पढ़िए......” मैं पढ़ गया. उर्दू की जो जानकारी थी वो काम आयी, सारे शब्द पढ़ गया. अब एक रोमांटिक पीस था, जिसमे मुझे पुरुष वाले डायलॉग बोलने थे और मामाजी स्त्री वाले डायलॉग बोल रहे थे. मुझे जैसा समझ में आया मैं बोलता चला गया. मुझे नहीं पता कि मैं क्या बोल रहा था कैसा बोल रहा था, लेकिन बीच बीच में मामाजी इशारे से मुझे शाबाशी दे रहे थे तो मेरा उत्साह बढ़ता जा रहा था और मैं खूब खुलकर एक्टिंग करने की कोशिश कर रहा था.........पेज पर पेज पूरे होते गए और फिर आया एक बहुत ही सीरियस पीस जिसमे एक पागल का चरित्र मुझे करना था जिस पर लोग बहुत ज़ुल्म करते हैं. न जाने कैसे अचानक मेरी आँखों के सामने सरदारशहर के कसाइयों के मोहल्ले में हलाल होते बकरों की चीख , कल्याण सिंह की आधी गर्दन कटी लाश और कुर्ती के फटने पर रंजू के गले से निकली चीख आ गयी और मुझे खुद पता नहीं, उन डायलॉग्स में मैं क्या कर गया कि जब वो पेज पूरा हुआ, मैंने देखा, मेरा चेहरा पूरा आंसुओं में डूबा हुआ था और मोहन के मामाजी मुझे ताज्जुब से घूरे जा रहे थे, मानो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि ये सब मैं कर रहा था.........थैंक्स कहा गया तो मैं बाहर आया और मामाजी ने आते आते हलके से मेरे कंधे को थपथपा दिया......... इस ऑडिशन के कई दिन बाद जब मैं उनसे मिला था तो वो बोले “महेंद्र, ऑडिशन वाले दिन मैं तो घबरा गया था, मुझे लगा तुम सचमुच पागल हो गए हो.”
मेरा ऑडिशन उस दिन के ऑडिशंस में सबसे लंबा चला था. मैं जैसे ही बाहर आया, एक हाथ मेरे कंधे पर पड़ा..... मैंने देखा एक लंबे से सज्जन मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुरा रहे हैं.... मैंने सवालिया निगाह से उनकी तरफ देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोले “मेरा नाम विश्वंभर नाथ तिलक है. मैं आकाशवाणी जयपुर में प्रोग्राम एक्सिक्यूटिव हूँ. अभी आप ही अंदर थे न?”
मैं मुंह बाए उन्हें देख रहा था...... जल्दी से बोला “जी सर”
“अरे आप हैं तो बहुत छोटे से लेकिन माशाल्लाह आपकी आवाज़ बहुत मैच्योर्ड आती है माइक पर”
मैं क्या कहता ? मैंने आज तक अपनी आवाज़ सुनी ही कहाँ थी?
मैंने बस इतना सा कहा “जी थैंक्स”
वो फिर प्यार से बोले “नाम क्या है आपका ?”
“जी महेंद्र मोदी”
“देखिये महेंद्र जी, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है. उस कमरे में हमारे डिरेक्टर मंजूरूल अमीन साहब बैठे हैं. उन्होंने आपके लिए एक सन्देश भिजवाया है.”
मैं तो जैसे सपना देख रहा था. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जयपुर स्टेशन के डिरेक्टर ने मेरे लिए कोई सन्देश भिजवाया है.....जी.... मेरे लिए .... जिसे नारायण सिंह जी ने बिलकुल नाकारा करार देकर सांड के नाम से पुकारा था.
मैंने कहा “जी फरमाएं”
“उन्होंने कहा है कि आप चाहें तो अनाउंसर की पोस्ट पर हम आपको लेना चाहेंगे” “जी.......जी........जी............”
मेरी कुच्छ समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं?
तभी वो बोले “ नहीं नहीं आप घबराइए मत....... आराम से सोच लीजिए.... अपने माता पिता से भी सलाह कर लीजिए, उसके बाद अगर आपका मन बनता हो तो जयपुर आकर ज्वाइन कर लीजिए. ये एक परमानेंट पोस्टिंग होगी, आप चाहेंगे तो हम आपका ट्रांसफर बीकानेर कर देंगे.”
मैंने कहा “जी मुझे तो ......... अभी पढाई करनी है, अभी तो सिर्फ हायर सैकेंडरी पास हूँ”
“देखिये हमारे लिए इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है क्योंकि इस पोस्ट के लिए ज़रूरी योग्यता सिर्फ दसवीं पास है....... फिर भी आप सोच लीजिए..... अगर आप चाहें तो अगले सोमवार के बाद कभी भी जयपुर आकर ड्यूटी ज्वाइन कर लीजिए.

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और बाहर आ गया. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब हो क्या रहा है ? एक तरफ मुझे किसी लायक नहीं समझा जा रहा और दूसरी तरफ मुझे आगे होकर हाथोंहाथ लिया जा रहा है. हालांकि उस वक्त मैंने उन्हें ज्वाइन करने से मना कर दिया था और घर आकर जब सबको बताया तो सबने यही कहा कि अभी नौकरी की क्या जल्दी है, अभी पढाई करो लेकिन कहाँ पता था मुझे और कहाँ पता था मेरे घर के लोगों को कि विधि ने मुझे बनाया ही इस काम के लिए है जिसे मैं अभी ठुकरा रहा हूँ और कहाँ पता था विश्वंभर नाथ जी को कि मैं फिर उनके सामने आऊँगा और वो नहीं पहचान पायेंगे कि ये सामने खडा अधेड वही लड़का है जिसे मैंने नौकरी ऑफर की थी.

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Sunday, March 20, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन –भाग २० महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृखला

१९६५ के युद्ध को जीत कर भी हम हार गए क्योंकि अब्दुलहमीद जैसे वीरों की बलि चढ़ाकर जो इलाके हमने जीते थे, वो सारे इलाके हमें छोड़ने पड़े और युद्ध की विभीषिका के परिणाम पूरे देश को भुगतने पड़े. अपने पहले के एक एपिसोड में मैंने ज़िक्र किया था कि गेहूं ढाई रुपये सेर हो गया था और हम लोग मजबूर थे पी एल ४८० संधि के तहत मिले अमेरिका के वो गेहूं खाने को जो लाल रंग के थे और जिनमे बदबू आती थी. हमारा कुत्ता भी उस गेहूं की बनी रोटी खाने को तैयार नहीं था.
अमेरिका जिस गेहूं को समंदर में डालने वाले था, दामन पसार कर उस गेहूं को हमने स्वीकार कर लिया और न जाने कैसे हमने उस गेहूं की बनी चमड़े जैसी रोटियों को खाया. कई बार जब भूख के मारे एक रोटी ज्यादा खा लेते थे तो रात को उल्टियां होने लगती थीं. ऐसे वक्त में उल्टी होते ही पेट फिर खाली हो जाता था और हम बच्चों को फिर से ज़बरदस्त भूख लग जाया करती थी. अक्सर ऐसे मौकों पर मैं और रतन, सोहन लाल बिस्सा जी की दुकान पर जा पहुँचते थे और  कड़के मोटे भुजिया खरीदकर लाते थे और खाते थे. मौठ के बने उन भुजियों की खासियत यही थी कि उन्हें खाते ही खूब ज़ोरदार प्यास लगती थी और जब पानी पीते थे तो पेट बहुत ज़बरदस्त भर जाता था.


वो लाल रंग के बदबूदार गेहू खाकर ज़िंदगी बस चलती जा रही थी. शिकायत करते भी तो किस से? सभी लोगों का वही हाल था. इसी दौरान मैं स्कूल में बेंजो बजाता था और साथ ही जब भी जहां भी मौक़ा मिलता था, नाटक भी किया करता था. नाटक करते करते मुझे महसूस हुआ कि मेरी भाषा ठीक नहीं है. खास तौर पर मुझे पता नहीं चलता था कि किस शब्द में किस जगह नुक्ता लगता है और किस जगह नहीं. वैसे भी ये एक अजीब सी विडम्बना है कि हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है मगर पूरे देश में एक भी ऐसा प्रदेश नहीं है जहां के लोग दावे के साथ कह सकते हों कि वो सही हिदी बोलते हैं. यू पी, बिहार में जो हिदी बोली जाती है उसमें स्त्रीलिंग-पुल्लिंग, एकवचन-बहुवचन की बहुत गलतियाँ होती हैं. इलाहाबाद के लोग बोलेंगे “मुझे बहुत गुस्सा आती है.” मैं जब इलाहाबाद में पोस्टेड था एक लड़की ने किसी बात पर यही वाक्य बोला तो मैंने उसे टोका, “तुम्हें गुस्सा आती है? मुझे तो गुस्सा आता है.” वो हडबडा कर बोली “ जी सर मैं लड़की हूँ तो मुझे गुस्सा आती है और आप पुरुष हैं तो आपको गुस्सा आता है” मैंने हँसते हुए कहा “ अच्छा तो तुम्हें रात को सपना भी आती होगी?” उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था और वो लड़की ही नहीं, सभी लोग इसी तरह बोलते हैं. वचन के मामले में भी वो लोग अक्सर गलती करते हैं. मेरे विविध भारती की एक साथी जो उस क्षेत्र की हैं, आज भी यही बोलती हैं  “आज घर में बहुत सारा आम आया था.” या फिर “कल शाम बाल धोया था.” “स” और “श” की त्रुटि भी यू पी बिहार दोनों प्रदेशो के आम लोग करते ही हैं. इलाहाबाद बनारस का एक बहुत ही आम वाक्य है “ क्या करें भैया, परेसान हो गए.”


अब आइये मेरे प्रदेश की ओर. वहाँ पानी नहीं होता पाणी होता है, खाना नहीं होता खाणा होता है, जाना नहीं होता जाणा होता है. इसी तरह वहाँ कोई नहीं बोलेगा “कितने बजे है?” अक्सर लोग बोलेंगे “कितनी बजी है?” “ह” का इस्तेमाल या तो होगा ही नहीं या फिर बहुत ज्यादा होगा. “मैं जा रहा हूँ.” को बोला जाएगा “मैं जा रआ हूँ” और राजस्थान के कुछ इलाकों में “शान्ति बाई की सासू जी आई हैं” को बोला जाएगा “हान्ति बाई की हाहू जी आई हैं.” राजस्थान में कुल दस बोलियां हैं. हर बोली बोलने वाला हिन्दी को अपने हिसाब से बोलता है. कई जगह “स” को “श” उच्चारित करते हैं लेकिन अधिकाँश इलाकों में “श” का नामोनिशान ही नहीं है. वहाँ “श” को बड़े इत्मीनान और आत्मविश्वास के साथ “स” बोला जाता है और चूंकि सभी लोग इस तरह बोलते हैं तो उन्हें इसमें कुछ गलत भी नहीं लगता. आज भी मेरे घर के लोग, मेरे रिश्तेदार संबंधी सभी इसी तरह की हिन्दी बोलते हैं. कुछ जातियों को छोड़कर राजस्थान के लोग इस कहावत पर विश्वास करते हैं “बाहर की पूरी से घर की आधी भली”. इसलिए अपने शहर को छोड़कर बाहर नहीं निकलते, बाहर के लोगों के संपर्क में नहीं आते. जब बाहर के संपर्क में नहीं आते तो उन्हें अपनी गलतियों का अहसास होने का सवाल ही नहीं उठता.


ये बात सिर्फ हमारे देश में ही नहीं है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी होते हुए भी पूरे देश में ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जहां के सब या अधिकाँश लोग सही हिन्दी बोलते हों. हमारे पड़ोसी देश की राष्ट्रभाषा उर्दू है लेकिन वहाँ भी न पंजाब में सही उर्दू बोली जाती है न सिंध में और बलोचिस्तान की तो बात ही छोड़ दीजिए. हकीकत ये है कि उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा है मगर पाकिस्तान की किसी भी जगह से अच्छी उर्दू लखनऊ में बोली जाती है. पाकिस्तान के दो दार्शनिक और विचारक जनाब तारिक फतह और जनाब हसन निसार तो खुले आम स्वीकार करते हैं कि उनके देश में उर्दू जनता पर थोपी गयी है, उर्दू वहाँ की आम जनता की भाषा ही नहीं है. वहाँ उर्दू इस क़दर थोपी गयी है कि पूरे पश्चिमी पंजाब में एक भी स्कूल ऐसा नहीं है जहां पंजाबी पढाई जाती है या जहां पढाई का माध्यम पंजाबी भाषा हो.


तो मैं जब स्टेज पर आने लगा तो मुझे लगा कि मुझे अपनी भाषा पर थोड़ा ध्यान देना चाहिए. अब सवाल ये उठा कि इसके लिए क्या किया जाए क्योंकि जो आस पास के लोग थे वो तो वही खाणा-पीणा, आणा-जाणा वाली ही हिन्दी बोलते थे. मुझे लगा कि अगर मैं थोड़ी बहुत उर्दू सीख लूं तो शायद मेरी भाषा थोड़ी सुधर जायेगी. मैंने पिताजी के सामने ये बात रखी तो उन्हें थोड़ा ताज्जुब हुआ. वो बोले “उर्दू सीखकर क्या हासिल होगा तुम्हें? वो तो गए ज़माने की भाषा है.” दरअसल देश नया नया आज़ाद हुआ था. आज़ादी से पहले मुग़लकाल से बीकानेर में दफ्तरों और अदालतों की भाषा उर्दू थी. आज़ादी मिलते ही हर ओर उर्दू को हटाकर उसके स्थान पर हिन्दी को अपनाने का आंदोलन ज़ोरों पर था. मैंने पिताजी को कहा “उर्दू सीखने से मुझे लगता है कि मेरी भाषा थोड़ी सुधरेगी, नाटक करने में भी मदद मिलेगी,ऐसा मुझे लगता है और फिर एक भाषा अतिरिक्त सीखने में हर्ज ही क्या है?” पिताजी जानते थे कि भाषाओं में मेरी थोड़ी रूचि है. बहुत बचपन में ही जब हम लोग गंगानगर जिले में रहे तो मैंने पंजाबी भी लिखना पढ़ना बोलना सीख लिया था. पिताजी ने कहा “ठीक है अगर तुम सीखना ही चाहते हो तो मैं इंतजाम कर देता हूँ.” उसी दिन शाम को वो एक बहुत ही बुज़ुर्ग से दाढी वाले सज्जन को घर लेकर आये और बोले “ ये तुम्हारे उर्दू के उस्ताद जी हैं.......और सही बात ये है कि तुम्हारे ही नहीं मेरे भी उस्ताद जी हैं. मुझे भी उर्दू इन्होने ही पढाई थी.”मैंने झुककर उनके पैर छुए, उन्होंने खूब दुआएं दीं. अगले ही दिन से उन्होंने मुझे उर्दू की तालीम देना शुरू कर दिया. मैंने उर्दू सीखने का निर्णय बस योंही ले लिया था, मुझे कहाँ पता था कि ये उर्दू मेरे जीवन में इतनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगी. इसी उर्दू की जानकारी के बल पर इलाहाबाद में हिदुस्तान और पाकिस्तान दोनों में बराबर मशहूर शायर राज़ इलाहाबादी साहब, नजीर बनारसी साहब और कितने ही उर्दू के विद्वानों की कुर्बत का सौभाग्य मिला, अपने रेडियो के पूरे कार्यकाल में हर जगह उर्दू प्रोग्राम के प्रेजेंटेशन का काम मुझे ही सौंपा गया, मैं चाहे किसी भी पोस्ट पर रहा, पूरे रेडियो जीवन में जहां भी रहा ग़ज़लों की स्टेज कंसर्ट्स को मैंने ही कंडक्ट किया और मुम्बई आने के बाद इसी उर्दू की वजह से “नूरजहा”, “जोहरामहल”, “अपनी खुशियाँ अपने गम”, “ये रिश्ता न टूटे”, “अजब मिर्ज़ा गज़ब मिर्ज़ा”, “ज़िदगीनामा” जैसे करीब २५ टी वी सीरियल्स में बहुत अच्छी और अहम भूमिकाएं निभाईं.


उर्दू की तालीम शुरू किये मुश्किल से डेढ़ महीना गुजरा था, मैं जोड़ जोड़कर छोटे छोटे शब्द पढ़ने लगा था कि मेरे बुज़ुर्ग उस्ताद जी को ऊपर से बुलावा आ गया. मुझे लगा शायद ठीक से उर्दू सीखना मेरे भाग्य में नहीं है लेकिन मैंने हार नहीं मानी. मैं जब तब एक आध घंटा उर्दू का कायदा लेकर बैठता रहा और जो कुछ उस्ताद जी सिखाकर गए थे, उसके बल पर धीरे धीरे घिसट घिसटकर थोड़ा थोड़ा आगे बढ़ता रहा और मेरी खुशनसीबी कि रेडियो में आने के बाद मुझे कमर भाई, जाहिद साहब जैसे साथियों का साथ मिला जिन्होंने मेरी उर्दू को और भी तराश दिया. इस तरह अपनी पढाई के साथ साथ मैं अपनी भाषा को सुधारने की कोशिश करता रहा. अभी कल ही मेरे स्कूल के सहपाठी और आकाशवाणी के साथी शशिकांत पांडे  ने मुझे व्हाट्सअप्प पर मैसेज किया “मैं तुम्हारी आत्मकथा पढ़ रहा हूँ. कहानी में दिलचस्पी बनी हुई है. बहुत अच्छा लग रहा है. एक बात और, साइंस का स्टूडेंट इतनी बढ़िया हिन्दी में कहानीकार बनेगा ये देखकर और भी अच्छा लगा. मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.”


उन दिनों में न तो पी एम् टी हुआ करता था न ही पी ई टी. हायर सैकेंडरी(कक्षा ग्यारह) के अंको के आधार पर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला होता था और प्रथम वर्ष टी डी सी (कक्षा बारह) के आधार पर मेडिकल कॉलेज में. मैं दसवीं कक्षा में आ चुका था गणित के साथ साइंस ली थी मैंने. यानि मुझे हायर सैकेंडरी के बाद इंजीनियरिंग में जाना था. काम ज़रा मुश्किल था क्योंकि संगीत में भी रूचि थी, नाटक में भी. इन सबसे ऊपर मेरी माँ बहुत बीमार रहने लगी थीं. मैं अक्सर उन्हें आँगन में खाट बिछाकर सुला दिया करता था और उनसे पूछ पूछ कर खाना बनाया करता था. घर में दो गायें थीं. आज की शहरी पीढ़ी शायद इसका अर्थ नहीं समझेगी कि घर में दो गाय होने का क्या अर्थ होता है. बहुत काम होता है गायों का. उनके लिए चारे का इंतजाम करना, उन्हें चारा खिलाना, ग्वार तैयार करके उन्हें देना. ग्वाला दूध निकालने आता था, उस वक्त उसे असिस्ट करना. फिर उस दूध को सम्भालना, दही ज़माना, बिलौना करके मक्खन निकालना और जिस दिन ग्वाला न आये खुद दूध निकालना. इस तरह कुल मिलाकर पूरा दिन कहाँ निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था. पढाई करने का बहुत ज़्यादा टाइम ही नहीं मिलता था बस थोड़ा बहुत पढकर ठीकठाक नंबरों से पास हो रहा था, सादुल स्कूल में आने के बाद से. दसवीं की परीक्षा बोर्ड की परीक्षा थी. मार्च में इम्तहान समाप्त हो गए थे. उन दिनों मेरे ताऊ जी की पोस्टिंग गंगानगर जिले के एक गाँव पदमपुर के हायर सैकेंडरी स्कूल में थी. उन्होंने पिताजी को पत्र लिखा, महेंद्र की छुट्टियाँ हो गयी हैं, कुछ दिन उसे यहाँ भेज दो. पिताजी ने मुझे बताया, ताऊ जी का पत्र आया है, तुम्हें बुलाया है जाओगे? घूमना कौन नहीं चाहेगा? और फिर वहाँ जाकर रतन, निर्मला, मग्घा, विमला सबके साथ खेलने कूदने का स्वर्णिम अवसर......... मैंने झट हामी भर दी.

पिताजी बोले “देखता हूँ, कोई साथ मिलता है तो...........”
मैंने झट से कहा “जी साथ की क्या ज़रूरत है? मैं अकेला चला जाऊंगा, मैं अब बड़ा हो गया हूँ.”
कुछ सैकंड तक पिताजी कुछ सोचते रहे फिर बोले “ठीक है...... मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है, अगर तुम सोचते हो कि तुम अकेले जा सकते हो तो चले जाओ. आते हुए तो उन लोगों के साथ ही आ जाना.”
मैंने कहा “जी”

ये मेरे जीवन की पहली ऐसी यात्रा होने वाली थी जो मैं अकेले करने वाला था. मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था. ये दुनिया का नियम ही है कि बचपन में हर इंसान को बड़ा होने की जल्दी लगी रहती है. मुझे अकेले जाने की इजाज़त मिल गई थी, यानि मुझे पहली बार बड़ा स्वीकार कर लिया गया था.
बहुत दिन से जब लोगों को धूप का चश्मा लगाए देखता था तो मेरा भी ऐसा चश्मा लगाकर घूमने का बहुत मन करता था लेकिन जब जब पिताजी को कहता, उनका जवाब होता “अभी बच्चे हो, अभी से काला चश्मा लगाने से आँखे खराब हो सकती हैं और तुम्हें मालूम है कि मुझे ये फैशन वैशन बिलकुल पसंद नहीं.” जी हाँ, उनका सिद्धांत था, अच्छा खाओ पियो कपडे साफ़ सुथरे पहनो लेकिन फैशन बिगड़े हुए बच्चे करते हैं. नतीजा ये कि उन दिनों संकरी मोरी की पैंट का फैशन बस चालू ही हुआ था. बच्चे बड़े सब छोटी मोरी की पैंट्स पहनते थे. भाई साहब मेडिकल कॉलेज में पहुँच गए थे और उनके कॉलेज में छोटी मोरी की पैंट पहनने की वैसे ही इजाज़त नहीं थी. ऐसे में पिताजी के सिद्धांतों के विरुद्ध भला मैं छोटी मोरी की पैंट पहनने की कैसे सोच सकता था? अब तक मुझे काला चश्मा खरीदने की भी इजाज़त नहीं मिली थी.
अब चूंकि मुझे पदमपुर के लिए रवाना होना था, पिताजी ने मुझे २५ रुपये दिए और कहा “६ रूपए ट्रेन का एक तरफ का  किराया है, एक रुपया बस का किराया. आने जाने के १४ रुपये लगेंगे. बाकी तुम अपने पास रखना वक्त ज़रूरत काम आयेंगे”
मैंने कहा “ठीक है जी”

अब बहुत दिन से दिल में दबी हुई धूप का चश्मा खरीदने की इच्छा सर उठाने लगी. मुझे लगा अगर पिताजी को पूछूँगा तो हो सकता है वो मना कर दें और मुझे टिकट ही तो चाहिए आने जाने के लिए. और क्या खर्च चाहिए? फिर जब पिताजी ने स्वयं मुझे ये रुपये दिए हैं तो मेरा पूरा अधिकार है इन्हें जैसे चाहूँ खर्च करूँ. लेकिन अगर उन्हें पता चल गया तो? और जब पदमपुर से लौटकर आऊँगा तो वो पूछेंगे, ये चश्मा कहाँ से आया तो क्या जवाब दूंगा? फिर मन का दूसरा हिस्सा जवाब देता एक महीना वहाँ रहना है, अभी क्या सोचना? जो होगा सो देखा जाएगा. इसी उधेड़ बुन में मै पंजाब ऑपटिक्स की तरफ कभी चार कदम आगे बढ़ा रहा था कभी पीछे लौट रहा था. आखिरकार मैं दुकान में घुस ही गया.  दुकानदार ने ५-७ तरह के चश्मे दिखाए. मैंने उनमें से एक चश्मा पसंद किया और   आठ रुपये देकर उसे खरीद लिया. मेरे जीवन में कई बातें एक साथ घटित हो रही थीं. मैं जीवन में पहली बार अकेले यात्रा करने जा रहा था, मेरे घरवालों ने मुझे पहली बार बड़ा मान लिया था और सबसे बड़ी और खतरनाक बात ये कि मैंने अपने माँ पिताजी से छुपाकर पहली बार कोई चीज़ खरीदी थी. दिल धक् धक् कर रहा था. मैं लौटकर घर आया और चश्मे को किताबों के पीछे छुपा दिया. दिल बार बार कह रहा था कि माँ पिताजी को चश्मे के बारे में बता दूं लेकिन दिमाग बार बार मुझे ऐसा करने से रोक रहा था. दो दिन बाद मुझे पदमपुर के लिए रवाना होना था. ये दो दिन इसी तरह सोच विचार में ही निकल गए. मुझे सोच में गुम देखकर एक दो बार माँ ने कहा भी “क्या बात है महेंदर...... इतना चुप चुप क्यों है? अगर पदमपुर जाने का  मन नहीं है तो मत जा.” मैं बात को टाल जाता. और आखिर वो दिन आ गया जब मुझे रवाना होना था. मैंने बैग में तीन चार जोड़े कपडे डाले, उनके बीच चश्मे को छुपाया और स्टेशन के लिए निकलने लगा तो पिताजी ने कहा “ रुको मैं छोड़ आता हूँ स्टेशन.” 

उन दिनों की यात्राएं आज की यात्राओं से बहुत भिन्न हुआ करती थीं. पूरी ट्रेन साधारण डिब्बों की ही होती थी. रेलवे में वैसे तीन श्रेणियाँ होती थीं प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय ए सी का तो खैर नामोनिशान भी नहीं था मगर रिज़र्वेशन नाम की भी की चीज़ नहीं होती थी और पहली, दूसरी श्रेणी के डिब्बे बहुत महत्त्वपूर्ण गाड़ियों में ही लगते थे. यानि पूरी ट्रेन तृतीय श्रेणी के साधारण डिब्बों की होती थीं. बस ऐन वक्त पर जाइए और जहां टिकने की जगह मिल जाए टिक जाइए. अगर ऊपर की बर्थ हथियानी है तो दो तीन घंटे पहले ट्रेन जब यार्ड में खडी हो तब वहाँ जाकर चादर बिछाकर उस पर लेट जाइए और वो बर्थ हो गई रिज़र्व लेकिन अगर कोई आप से तगड़ा आदमी आ गया तो हो सकता है आपकी दो तीन घंटे की मेहनत बेकार जाए और वो आपको कान पकड़ कर उस बर्थ से बेदखल कर दे. मुझे अपनी पहली यात्रा में ऐसे किसी झमेले में नहीं पडना था इसलिए मैं सीधा स्टेशन ही आ गया. पिताजी ने टिकट दिला कर मुझे एक डिब्बे में थोड़ी जगह देखकर बिठा दिया. डिब्बे में काफी भीड़ थी. सब फँस फंसाकर बैठे हुए थे किसी तरह. थोड़ी देर में गाड़ी रवाना हो गयी. पिताजी को प्रणाम कर उनसे विदा हुआ. थोड़ी देर में ट्रेन ने गति पकड़ ली. इस ट्रेन से मुझे रायसिंहनगर तक जाना था. ट्रेन रात नौ बजे रवाना हुई और सुबह चार बजे रायसिंहनगर पहुँचने वाली थी. चार बजे से सात बजे तक मुझे स्टेशन पर ही बैठना था और उसके बाद बाहर आकर पदमपुर के लिए बस पकडनी थी.


जैसे ही ट्रेन रवाना हुई मेरी आँखों के सामने वो नया चश्मा आ गया जो मैं बीकानेर से खरीदकर लाया था. मेरा मन हुआ कि एक बार लगाकर देखूं तो सही कि मैं कैसा दिखता हूँ? मैंने बैग में से बड़े जतन से चश्मा निकाला और बाथरूम की तरफ बढ़ गया. थर्ड क्लास के डिब्बे में वही एक जगह होती थी जहां आईना लगा रहता था. भीड़ को चीरता मैं किसी तरह बाथरूम तक पहुंचा. दरवाज़ा खोलकर उसमे दाखिल हुआ और जेब से चश्मा लगाकर् आईने में झांका. लगा बहुत अच्छा लग रहा हूँ काले रंग के चश्मे में. थोड़ी देर तक खुद को निहारकर खुद पर मुग्ध होता रहा कि किसी ने बाथरूम का दरवाजा खटखटाया. चश्मे को जेब में रखा और बाहर आ गया. अपनी जगह पर आकर देखा कि मेरे दोनों तरफ बैठे लोगों ने मेरी जगह को दोनों ओर से कुछ कुछ इंच हथिया लिया है. किसी तरह बची हुई जगह में मैं अडजस्ट हुआ लेकिन इस बीच कोई स्टेशन आया था और भीड़ इस क़दर बढ़ गयी थी कि बहुत कोशिश करने पर भी सीट के नीचे रखे अपने बैग को निकालकर उसमे अपना चश्मा नहीं रख सका. पैंट की जेब में रखने से उसके टूटने का डर था इसलिए उसे शर्ट की ऊपरवाली जेब में रखने के अलावा और कोई चारा नहीं था. यही किया. जेब में चश्मा रखकर मैं सिकुडकर बैठ गया और सोचा सोऊँगा नहीं ज़ागता रहूँगा. लेकिन वो उम्र ही ऐसी होती है कि नींद बहुत अच्छी आती है, ऊपर से ट्रेन हिल हिलकर झूले का काम करती है. थोड़ी देर में मेरी आँखे नींद से भारी हो गईं. मैंने एक हाथ अपने शर्ट के ऊपर की जेब पर रखा जिसमे मेरा चश्मा रखा हुआ था और पता नहीं कब बैठे बैठे ही मुझे गहरी नींद आ गयी. मैं सोता रहा....... सोता रहा...... सोता रहा. अचानक कानों में आवाज़ आई “रायसिंहनगर आ गया..........रायसिंहनगर” मैं हडबडाकर उठा. देखा वास्तव में गाड़ी रायसिंहनगर स्टेशन पर खडी है. मैंने जल्दी जल्दी अपना बैग निकाला और दरवाज़े की तरफ भागा. भीड़ को चीरते चीरते जैसे ही मैं स्टेशन पर उतरा गाड़ी रवाना हो गयी....... तभी एकदम से मुझे अपना चश्मा याद आया और मेरा दिल धक् से रह गया जब मैंने अपने शर्ट के ऊपर की जेब पर हाथ रखा. चश्मा वहाँ नहीं था. जल्दी जल्दी पैंट की जेबें भी चैक की कि शायद नींद में किसी और जेब में डाल लिया हो. लेकिन चश्मा नहीं था तो नहीं ही था. ट्रेन मेरे सामने चलती जा रही थी वही ट्रेन जिसमें या तो मेरा चश्मा गिर गया था या  आस पास बैठे किसी सज्जन ने मेरी जेब से निकाल लिया था और मैं स्टेशन पर खडा उस ट्रेन को सूनी नज़रों से देखता जा रहा था. मैंने वो चश्मा महज़ एक बार पहनकर अपने आप को आईने में देखा था. इस बात को ४८ साल हो गए. इस बीच में जाने कितने चश्मे खरीदे होंगे और पहने होंगे लेकिन जब भी कोई नया चश्मा लेकर पहली बार उसे लगाकर आईने के सामने खडा हुआ हूँ मुझे वो चश्मा ज़रूर याद आया है जिसे मैंने ट्रेन के बाथरूम में लगा कर देखा था. आखिरकार बरसों बाद ये घटना मेरे एक नाटक की विषयवस्तु बनी.


मुझे सात बजे बस मिली और मैं उदास मन से बस में आकर बैठ गया. दो घंटे बाद मैं पदमपुर में सबके बीच बैठा था, ताऊ जी, ताईजी रतन, विमला, निर्मला, मग्घा सब लोग बहुत खुश हुए लेकिन मैं अभी तक बहुत उदास था. सबने पूछा कि उदास क्यों हूँ? क्या जवाब देता? एक बार मन हुआ कि अपनी व्यथा सबको बता दूं लेकिन फिर सोचा, जो चीज़ मैंने सबसे छुपाकर खरीदी और वो मेरे पास रही भी नहीं तो उसके बारे में सबको बताने से क्या फायदा. और मैंने किसी को नहीं बताया अपनी उदासी का राज़.


एक महीने पदमपुर में रहा, रतन के साथ रोज नहर में नहाने जाता था. वहीं मैंने तैरना सीखा. नहर से नहा कर लौटते हुए हम दोनों ताज़ा बन रही रेवडियाँ लेकर आते थे और सब लोग मिलकर खाते थे. एक सिनेमाहाल था पदमपुर में. खूब फ़िल्में देखीं वहाँ....... कुल मिलाकर खूब मौज की हमने एक महीने तक लेकिन मैं उस एक महीने में एक मिनट के लिए भी अपने खोये हुए चश्मे को नहीं भूला. एक महीने बाद हम लोग बीकानेर आ गए. मैंने किसी के सामने अपने चश्मे का ज़िक्र नहीं किया लेकिन रह रह कर मुझे आत्मग्लानि होती थी कि मैंने ये बात अपने पिताजी से क्यों छुपाई? इस घटना के लगभग १५ साल बाद जब मैंने इसे आधार बनाकर नाटक लिखा तो सबसे पहले अपने पिताजी को सुनाया और उन्हें बताया कि मैंने इस तरह उनसे छुपाकर एक चश्मा खरीदा था और इस तरह वो गुम हो गया था. वो हँसते हुए बोले “ इतनी सी बात की तुम इतने बरसों से गाँठ बांधे बैठे हो?शायद इसीलिये कहते हैं कि कलाकारों की दुनिया ही अलग होती है.”

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Monday, March 14, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन – भाग १९ महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर केंद्रित श्रृंखला


१९६२ में इधर बीकानेर में आकाशवाणी का एक छोटा सा स्टेशन शुरू हुआ और उधर भारत और चीन के बीच युद्ध शुरू हो गया. हिन्दी चीनी बाई बाई कहते कहते चीनी भारत की सीमा के भीतर घुस आये. हम लोग आकाशवाणी से समाचार सुनते थे तो हर बार एक ही भाषा होती थी और एक ही समाचार. भारतीय सेनाएं बहुत वीरता के साथ चीनी सेनाओं से लड़ रही हैं. आज बहुत बहादुरी के साथ लड़ते हुए फलां मोर्चे पर हमारी सेना को पीछे हटना पडा, आज फलां मोर्चे पर पीछे हटना पड़ा. इन समाचारों से यही लग रहा था की हम हार रहे हैं और क्यों न हारते ? हमारे जवानों के पास थ्री नौट थ्री के अलावा कोई हथियार ही नहीं था. उधर रेडियो बीजिंग ( जो उस वक्त रेडियो पीकिंग कहलाता था) रेडियो पर ट्यून करते तो कई कहानिया सुनने को मिलती. क्या आप कल्पना कर सकते हैं, कि जब उनके देश का पड़ोसी देश से युद्ध चल रहा था वो युद्ध का नाम भी नहीं लेते थे. वो तो सुनाते थे कि किस प्रकार कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष माओत्से तुंग के भाषण को सुनकर एक किसान अपने खेत से दोगुनी फसल लेने में सफल हुआ और किस प्रकार माओत्से तुन्ग के दर्शन मात्र से एक नाई की ज़िंदगी बदल गयी. हम लोग ये किस्से सुन सुनकर सोचते थे कि ये माओत्से तुंग आखिर चीज़ क्या है ? हमारे बड़े उस वक्त चीनियों को गालियाँ देते थे और कहते थे “बकवास करते हैं ये लोग. चलो बी बी सी सुनते हैं.”

फिर बी बी सी लगाया जाता. वहाँ से पता लगता कि भारतीय सेनाएं सीमा पर भारी नुकसान उठा कर पीछे हट रही हैं और चीनी सेनाएं भारतीय सीमा के अंदर घुसती जा रही हैं. हर तरफ बस इन्ही बातों की चर्चा होती थी. बी बी सी के समाचारों के वक्त लोग रेडियो सुनने को तडपते थे और अक्सर हर मोहल्ले में यही होता था कि जिनके घर  में भी रेडियो है वो शाम को घर के बाहर दरियां बिछाकर एक मेज़ पर रेडियो रख देते  थे और समाचार लगा देते थे. आस पास के लोग दरियों पर बैठकर  कभी आकाशवाणी के, कभी रेडियो पीकिंग के तो कभी बी बी सी के समाचार सुनते थे. लेकिन आखिरकार निराश होकर ही उन्हें लौटना पड़ता क्योंकि बी बी सी यही बताता था कि भारतीय सेनाओं को अंततः पीछे हटना पड़ा. बचपन के दिन थे मगर फिर भी इतना तो हमें समझ आ ही जाता था कि लोग किसी भी समाचार से ज़्यादा बी बी सी के समाचारों पर भरोसा करते थे. बड़ी तेज़ी से हम हार रहे थे क्योंकि भारतीय सेनाओं के पास हथियार ही नहीं थे. नेहरु जी का मानना था कि हम तो विश्वगुरु हैं, पूरे विश्व को पंचशील के माध्यम से शान्ति का पाठ पढाने वाले. हमें हथियारों की क्या ज़रूरत है भला ? बहुत बरसों बाद जब जनरल करियप्पा की पुस्तक “द अनटोल्ड स्टोरी” पढ़ी तो उस वक्त के हालात का सही सही पता लगा कि नेहरु जी ने अपनी वैश्विक नेतागिरी को जमाने के लिए किस प्रकार देश के हितों की बलि चढ़ा दी. भारत वो युद्ध हार गया. दुनिया के कई देशों ने बीच बचाव किया तो चीन को युद्ध रोकना पड़ा मगर उस युद्ध की हार से, ये सच है कि पूरा देश स्तब्ध भी हो गया और एक अजीब सी कुंठा से ग्रस्त भी. हजारों वर्ग किलोमीटर भारतीय ज़मीन पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया.

१९६४ में नेहरु जी का स्वर्गवास हो गया. मैंने उनकी अंतिम यात्रा की कमेंट्री रेडियो पर सुनी. पूरा देश फूट फूटकर रोया और हकीकत है कि मैं भी सबके साथ रोया. पूरा देश हक्का बक्का था क्योंकि कोई सोच भी नहीं सकता था कि देश बिना नेहरु जी के चल सकता है. गुलजारी लाल नंदा कामचलाऊ प्रधान मंत्री बने और फिर देश को मिला एक ऐसा प्रधानमंत्री जो देखने में छोटे कद का ज़रूर था मगर दरअसल उसके कद के बराबर आज तक कोई नहीं पहुँच सका. उनका नाम था लाल बहादुर शास्त्री. बहुत छोटे से कद के लाल बहादुर शास्त्री जी की आवाज़ भी बहुत साधारण सी थी लेकिन गज़ब का चरित्र था उस इंसान का. उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही कहा...... “चाहे हमें दिन में एक वक्त रोटी खा कर गुज़ारा करना पड़े, चाहे हमें खाने को इतना भी नसीब न हो, हमें अपनी सेनाओं के लिए हथियार जुटाने होंगे ताकि कोई हमारी सीमाओं पर बुरी नज़र न डाल सके.”

और उन्होंने रेडियो पर घोषणा की कि वो हर सोमवार को सिर्फ एक बार खाना खायेंगे........... और पूरा देश धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्रीयता सब भुलाकर उनके साथ हो लिया. सोमवार मतलब व्रत. यहाँ तक कि कई रेस्तराओं ने सोमवार को शाम में अपना किचन ही बाद रखना शुरू कर दिया. जिद था, ये पूरे देश का कि अगर हमारी सेनाओं को हथियार चाहिए तो हम भूखे रहेंगे. किस हद तक ये जिद थी जानते हैं?
मैं १९८७ से १९९१ तक कोटा में था. हमारे रेडियो पर महिलाओं का कार्यक्रम होता था जिसमे स्टाफ से बाहर की महिलायें भी हिस्सा लेती थीं. एक संभ्रांत महिला थीं विदिशा श्रीवास्तव. उनके पति उमेश जी कभी कभी उन्हें लेने रेडियो स्टेशन आ जाते थे तो मुलाक़ात भी हो जाती थी. धीरे धीरे ये सम्बन्ध पारिवारिक संबंधों में बदल गए. महीने में एक दो बार या तो उमेश जी और विदिशा जी बच्चों के साथ हमारे घर आ जाते थे और या फिर हम दोनों उनके घर चले जाते थे. उमेश जी के पिताजी काफी बुज़ुर्ग इंसान थे मगर जवानों के बीच बैठना उन्हें पसंद था. कभी कभी वो हम लोगों के साथ बैठकर खाना भी खाया करते थे. एक दिन विदिशा जी ने फोन पर बताया कि उनके ससुर जी गिर पड़े हैं और उनकी टांग का फ्रेक्चर हो गया है..... हम लोग भागे हुए उन्हें देखने गए. उमेश जी ने उनके बिस्तर के पास एक कुर्सी रख दी. मैं गया प्रणाम किया और उनके पास बैठ गया.

मैंने पूछा “कैसे हैं पापा जी”
वो बोले “ठीक हूँ मोदी साहेब, अब जो हड्डी टूट गयी वो तो क्या जुडेगी?”
मैंने कहा “अरे ऐसा क्यों कह रहे हैं?”
तो वो हंसकर बोले “मोदी साहेब ९९ साल का हो गया हूँ, अब टूटी हड्डी को जुड़ने का वक्त ही कहाँ मिलेगा? वैसे एक बात कहूँ?
“जी.......”
“मैं......बस एक साल और जीना चाहता हूँ.”
“अभी आप बहुत जियेंगे पापा जी......”
तभी उन्होंने आवाज़ दी “उमेश एक पैग बना देना ज़रा”
आवाज़ आई “जी पापा”
फिर उन्होंने कहा “सुनो एक सिगरेट भी सुलगा देना”

मैं हैरान , परेशान कि १०० साल जीने की जिजीविषा रखने वाला, ९९ साल का एक इंसान कह रहा है “एक पैग बना देना..... एक सिगरेट सुलगा देना.......”
तभी उमेश जी पैग बना कर ले आये. उन्हें हाथ में पकडाया. उन्होंने हाथ में रखा और मुझसे बात करते रहे. अचानक उन्हें पता नहीं क्या सूझा. उन्होंने पूछा “उमेश ....आज कौन सा वार है ? ”
उमेश जी ने जवाब दिया “जी पापा...........आज सोमवार है”
और मैंने देखा......एक ही क्षण में पापा जी के चेहरे पर न जाने कितने रंग आये और कितने रंग चले गए....... एक बार तो उनका चेहरा देखकर लगा कि वो अभी ग्लास को दीवार के साथ दे मारेंगे. मगर फिर जैसे उन्होंने अपने आप पर कंट्रोल किया और ग्लास उमेश जी की तरफ बढ़ा दिया..... “उमेश, पैग बना कर देने से पहले ही बता देना चाहिए था ना कि आज सोमवार है.”
“जी पापा सॉरी........ लेकिन मैंने सुबह से चार बार बताया था कि........”
“अच्छा जाने दो.......कोई बात नहीं.”
मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था. उमेश जी ने ग्लास वापस लिया और टेबल पर रख दिया. पापा जी की आँखें गीली हो आई थीं. बहुत दुखी स्वर में वो बोले      “ मोदी साहब, पता नहीं कैसे मैं भूल गया कि आज सोमवार है, पूरे देश ने १९६५  में शास्त्री जी के साथ सोमवार को एक वक्त खाने की क़सम खाई थी, मैं भी तबसे हर सोमवार को व्रत करता हूँ. आप बताइये, व्रत के दिन क्या मैं शराब पियूँगा?”
और उस दिन जैसे उनकी जिजीविषा को ग्रहण लग गया. ९९ साल का कमज़ोर शरीर.......जो शायद १०० वर्ष पूरे करने की इच्छा के बल पर ही चल रहा था, साथ छोड़ने लगा.

१५ दिन बाद ही उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया.
इस तरह १९६५ में शास्त्री जी के साथ पूरा देश हो लिया था. जब भी वो रेडियो पर भाषण देते थे.... हर पानवाले, हर होटल, हर चायवाले के यहाँ उन्हें सुनने वालों की भीड़ लग जाती थी. उधर जब चीन के आकाओं ने देखा कि पूरा विश्व भारत के साथ हो गया है, उन्होंने पाकिस्तान के डिक्टेटर अयूब खान को भडकाना शुरू कर दिया. इधर पाकिस्तान के अंदरूनी हालात ठीक नहीं थे. अयूब खान के खिलाफ बगावत के स्वर उठने लगे थे. अयूब खान के सामने भारत के साथ युद्ध के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.

अगस्त १९६५ की एक सुबह पांच बजे बीकानेर शहर पूरा अँधेरे में डूब गया और सायरन की आवाजें सुनाई देने लगी. हम बच्चों सहित पूरा शहर जाग गया. हम कुछ समझ सकें उस से पहले ही हवाई जहाज़ों की आवाजें गूंजने लगीं और जोर जोर से भडाम भडाम की आवाजें गूंजने लगीं. लगा बहुत बड़ी दीवाली मनाई जा रही है. थोड़ी देर में दूसरा सायरन बजा और बिजली लौट आई.
दूसरे दिन सुबह ही समाचारों में सुना कि पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया है. उधर जब रेडियो पाकिस्तान की ख़बरें सुनीं तो उन्होंने दावा किया “ हिन्दुस्तान ने पाकिस्तान पर हमला कर दिया है और जवाबी हवाई हमले में कई और शहरों के साथ बीकानेर शहर और नाल हवाई अड्डे को नेस्तनाबूद कर दिया गया है.”
पाकिस्तान ने बम गिराए ज़रूर थे लेकिन वो एक भी बम बीकानेर या नाल हवाई अड्डे पर नहीं गिरा पाए थे. नाल बीकानेर से लगभग १५ किलोमीटर दूर फौजी हवाई अड्डा है जिसने ६५ और ७१ के भारत-पाकिस्तान दोनों युद्धों में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. दो दिन बाद मेरे एक दोस्त श्याम जी ने बताया कि नाल के आस पास खूब बम के टुकड़े बिखरे हुए हैं, अगर डर न लगे तो चलो,कुछ टुकड़े उठाकर लाएं........ एडवेंचर करना तो उस उम्र में सबको पसंद होता है...... मैं श्याम जी, बिरजू, रघु और दो तीन और दोस्त अपनी अपनी साइकिलें लेकर चल पड़े नाल की ओर और तीन घंटे बाद जब हम लौट कर आये तो हम सब के पास पाकिस्तानी बमों के दो दो, तीन तीन भारी भारी टुकड़े थे. आते ही सबसे पहला काम जो किया वो यही था कि उन टुकड़ों को घर में लाकर छुपा दिया ताकि किसी को पता ना लगे.........ये बम के टुकड़े सन १९९५ में जब हमने शेखों के मोहल्ले वाला अपना घर बेचा, तब तक संभाल कर रखे थे लेकिन जब घर की चाबियाँ लतीफ़ खान जी को सौंपी तो वो 
पाकिस्तान के झूठ के सबूत वहीं छूट गए.

आज की पीढ़ी तो शायद इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकती कि पूरा शहर, पूरा इलाका ब्लैक आउट में डूबे रहने का क्या अर्थ होता है, हमने इस ब्लैक आउट को पूरी शिद्दत के साथ झेला. पढ़ाई लिखाई सब चल रही थी, दिन में हम सब लोग स्कूल भी जाते थे मगर लौटते ही बस रेडियो से चिपक कर बैठ जाते. हर रोज ख़बरें आतीं कि आज भारत की सेना ५० किलोमीटर पाकिस्तान के अंदर घुस गयी और आज ६० किलोमीटर अंदर. उसी समय मेरा एक नाम से परिचय हुआ. वो नाम था आकाशवाणी जयपुर के श्री गणपत लाल डांगी का....... डांगी जी, मीना चौधरी या रंजना चौधरी के साथ मिलकर हर शाम एक प्रोग्राम करते थे “लड़ै सूरमा आज जी”.उस प्रोग्राम में वो उस दिन की भारतीय सेनाओं की उपलब्धियों को चुनकर उन्हें एक संगीत नाटक के रूप में प्रस्तुत करते थे. पूरे राजस्थान में उस समय शायद ही कोई रेडियो बंद रहता होगा जबकि उनका ये कार्यक्रम प्रसारित होता था. राजस्थानी में तैयार ये कार्यक्रम रेडियो कार्यक्रम की एक अनूठी मिसाल था. हर रोज उस दिन की ख़बरों को इकट्ठा करना उसके बाद उसे सफलतापूर्वक संगीत नाटक का रूप देना, अपने आप में एक पूरी टीम का काम था, जिसे डांगी जी अकेले किया करते थे. अनजाने में ही मैं उस दौरान उनका परम भक्त बन गया और १९८१ में जब आकाशवाणी सूरतगढ़ में था और फ़ौजी भाइयों के लिए एक स्टेज प्रोग्राम हम लोगों ने आयोजित किया और उसमे डांगी जी को जयपुर से बुलाया तो मैं श्रद्धापूर्वक उनके पैर पकड़ कर बैठा गया.
वो भौंचक्के रह गए. बोले “क्या बात है बेटा ? पैर तो छोडो”

मैं कुछ भी बोल नहीं पा रहा था क्योंकि बचपन से जिनका मैं भक्त था उन्हें अपने सामने देख कर मेरा गला रुंध गया था. बहुत कोशिश करके मैंने अपने आप को सम्भाला और बोला..... आपके “लड़ै सूरमा आज जी” का मैं घोर प्रंशसक हूँ. मुझे बताइये कि आप इतना मुश्किल प्रोग्राम वो भी रोज, कैसे कर लेते थे?
वो मुस्कुराए और बोले “ पैर छोड़ बेटा और सुन”
मैंने कहा “जी”
“मेरी उम्र कितनी होगी अब ?”
“जी सत्तर साल तो होगी”
“तूने देखा मैं थोड़ा लंगड़ा कर चल पाताहूँ.”
“जी”

“देख बेटा....... मेरा एक सिद्धांत है, जब कोई भी काम करो तो उसमे पूरी तरह खो जाओ और अपने आप को, यहाँ तक कि पूरी दुनिया को भूल जाओ. अब देख मुझसे ठीक से चला भी नहीं जाता लेकिन शाम को तू प्रोग्राम में देखना मैं नाचूँगा”
मैं उनकी शक्ल देखता रह गया और शाम को जब प्रोग्राम हुआ तो डांगी जी २५ बरस के इंसान की तरह नाचे. सेना के जवानों ने उन्हें कंधे पर उठा लिया....... मुझे उस दिन प्रसारण का एक नया ही गुर उन्होंने दिया जिसका इस्तेमाल मैंने अपने रेडियो के जीवन में कई बार किया.
तो युद्ध के दिनों में शाम होते ही पूरे शहर में ब्लैक आउट हो जाता था. हर खिड़की के कांच पर कार्बन पेपर चिपका दिया गया था ताकि अंदर की रोशनी बाहर ना निकल सके. इसके बावजूद अगर कहीं किसी छेद से ज़रा भी रोशनी रिस कर बाहर आती तो लोग चिल्लाने लगते. और तो और अगर सडक पर कोई इंसान बीडी भी सुलगा लेता तो उसकी रोशनी इतनी तेज नज़र आती कि शोर मच जाता और लोग उस बीडी को बुझवा कर ही दम लेते .

मेरे घर के सामने चौड़ी सड़क थी और उसके उस पार एक मास्टरनी जी रहती थीं, मिसेज़ सक्सेना. इस समय तक ट्रांजिस्टर आ चुके थे. मास्टरनी जी के पास भी एक ट्रांजिस्टर था. रेडियो चलाना उन दिनों मुश्किल था क्योंकि ब्लैक आउट में रेडियो की रोशनी भी ऐसी नज़र आती थी जैसे १०० वाट का बल्ब हो, इसलिए हम सब लोग शाम होने के बाद मास्टरनी जी के घर के बाहर की चौकी पर इकट्ठे हो जाते थे और उनके ट्रांजिस्टर पर समाचार सुनते थे. मास्टरनी जी भी मौके का फायदा उठाती थीं. हम बच्चों को कहती थी, समाचार सुनो और साथ साथ मेरे पैर दबाओ. हम लोग बारी बारी से उनके पैर दबाते रहते थे और साथ साथ ख़बरें सुनते रहते थे.  
कभी भी सायरन बज उठता था और हमारे ऊपर से उड़ते सेबरजेट की आवाज़े कानों में गूँज उठती थीं. पूरे मोहल्ले में ज़ेड आकार की ट्रेंचेज़ खोद ली गई थीं.
जैसे ही सायरन बजता हम सब लोग उन ट्रेंचेज़ में कान बंद करके एक विशेष पोजीशन में लेट जाते थे. हवाई जहाज़ आते थे, कभी हमारे आस पास बम गिराकर लौट जाते थे और कभी सीधे वहाँ से आगे निकल जाया करते थे. जब भी आस पास बम गिरते तो पूरी धरती हिल जाती थी.

एक बार पिताजी के दोस्त बहादुर राम चाचा जी आये हुए थे. वैसे तो हम लोग शाम होने से पहले ही खाना खा कर ब्लैक आउट और बम धमाकों के लिए तैयार हो जाते थे लेकिन उस रोज खाना खाने में देर हो गई थी. खाना लगा ही था कि सायरन बज गया . हम सब घर के अंदर ही थे. बस सबने एक एक कोना पकड़ा और कोनों में खड़े हो गए. तभी भडाम भुडूम बम गिरने लगे. मैं कोने में खडा हुआ था. मेरा पायजामा अपने आप हिलने लगा. मुझे समझ नहीं आया कि ये क्या हो रहा है? मैं जोर से चिल्लाया “मेरा पायजामा हिल रहा है....... मेरा पायजामा हिल रहा है.......”
दूसरे कोने में चाचा जी खड़े हुए थे. वो भाग कर मेरे पास आये और बोले “क्या हुआ महेंदर?”
मैंने कहा “अभी मेरा पायजामा हिल रहा था.” वो हँसे और बोले “देख गीला तो नहीं हुआ ना?”
मैंने घबराकर पायजामे को हाथ लगाया..... जान में जान आयी जब देखा कि वो गीला हरगिज़ नहीं हुआ था.
तभी क्लीयरेंस का सायरन बज गया और हम सब कोनों से निकलकर खाना खाने आ गए. उस दिन बहुत देर तक सब लोग मेरे पायजामे के हिलने पर हँसते रहे.
अब्दुल हमीद जैसे वीर पाकिस्तान के पैटन टैंक्स के कब्रिस्तान बनाए जा रहे थे और अपनी जान कुर्बान करके आगे बढ़ने के लिए अपने जिस्मों के पुल सेना को सौगात में दिए जा रहे थे. १० सितम्बर १९६५ को खेमकरण में अब्दुल हमीद ने पाकिस्तान के कई टैंकों को नेस्तनाबूद करके दुश्मन के हौसले पस्त कर दिए. इधर पाकिस्तान हर जगह जाकर रो रहा था कि हिन्दुस्तान ने उस पर हमला किया है और वो पूरे पाकिस्तान पर कब्ज़ा कर लेगा. विश्व बिरादरी ने जब पाकिस्तान का रोना सुना तो वो उसकी मदद के लिए तैयार हो गयी . हमारी फौजें इछोगिल नहर तक पहुँच गयी थी जो कि लाहौर से कुछ ही फासले पर थी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विल्सन ने अमेरिका के साथ मिलकर भारत पर दबाव डाला कि युद्ध को बंद किया जाए. २२ दिन के इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान के १९८० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था. शास्त्री जी युद्धविराम के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. यू एस एस आर( सोवियत संघ ) हालांकि मानता था कि ये युद्ध पाकिस्तान ने शुरू किया है लेकिन विश्व बिरादरी के सामने उसकी नहीं चली और उसने भी भारत पर युद्ध विराम के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया.

हिन्दुस्तान के छोटे छोटे विमान नेट अमेरिका से पाकिस्तान को मिले सेबर जेट विमानों को धूल चटा रहे थे, ज़मीन पर अब्दुल हमीद जैसे शहीद पाकिस्तान को नाकों चने चबवा रहे थे लेकिन इस सबके बावजूद शास्त्री जी को विश्व बिरादरी के दबाव में आकर युद्ध विराम स्वीकार करना पड़ा. ताशकंद में जनरल अयूब खान और शास्त्री जी के बीच शिखर वार्ता हुई और ११ जनवरी को सुबह सुबह हमने रेडियो पर सुना कि इस शिखर वार्ता में शास्त्री जी पाकिस्तान को जीते गए सारे इलाके वापस करने के लिए तैयार हो गए, लेकिन इन कागज़ात पर दस्तखत करने के तुरंत बाद ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वो अपनी उस जनता को मुंह दिखाने से पहले ही इस दुनिया से कूच कर गए जो उनके एक इशारे पर हर कुर्बानी देने को तैयार थी.
मुझे अच्छी तरह याद है.......मैं टायफाइड से पीड़ित बिस्तर पर पड़ा हुआ था. पूरा देश शास्त्री जी के लिए रो पड़ा था. अगर उस समय जीते गए इलाके वापस न किये जाते और जिस तरह कश्मीर में १९४८ की स्थिति को बनाए रखा गया है पंजाब, राजस्थान और शेष जीते गए इलाकों में भी १९६५ की स्थिति को स्वीकार कर लिया जाता तो शायद आज भारत पाकिस्तान के बीच कुछ और ही सम्बन्ध होते.



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