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Thursday, June 30, 2016

ताने-बाने लोकेंद्र शर्मा की जिंदगी के- दसवीं कड़ी।

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रेडियो के सामने बैठकर, रेडियो मैंने जीवन में पहली बार मामाजी के घर में सुना. रेडियोग्राम में रोज़ सुबह समाचार सुने जाते थे. मामाजी का आदेश था कि सब लोग अंग्रेजी के समाचार ज़रूर सुनें. 
इससे अंग्रेजी सुधरेगी, लेकिन सुधरती ख़ाक. मैं तो मेवाड़ी और हिंदी बोलते-बोलते दिल्ली आया था, अंग्रेजी बस उतनी ही आती थी, जितनी आठवी पास करने के लिए ज़रूरी थी. समाचार सुनता ज़रूर था, लेकिन समाचार बांचने वाले के नाम ‘मेल्विल डिमेलो’ के अलावा उसमें और कुछ पल्ले नहीं पड़ता. अंग्रेजी के बाद हिंदी समाचार आते थे. ये सुनना ज़रूर अच्छा लगता था, क्योकि थोड़ा बहुत समझ में भी आ जाता था. लेकिन जाने क्यों समाचार वाचक की आवाज़ सुन कर मुझे लगता कि समाचार बोलने वाला कोई आदमी नहीं है. ये तो रेडियो बोल रहा है. किसी आदमी की भी ऐसी आवाज़ होती है कहीं. लेकिन रोज़ सुनता था इसलिए, कुछ दिनों बाद मुझे समाचार पढ़ने वाले का नाम याद हो गया. नाम शुरू में ही बोला जाता था, ‘ये आकाशवाणी है, सुबह के सवा आठ बजे हैं, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए.’


रविवार के दिन सुबह नौ बजे बच्चों का कार्यक्रम आता था. मैं, अरुण, बेबी, अशोक, मुन्नी और साथ में सरोज और मंजू बहन भी मिलकर इस प्रोग्राम को सुनते. प्रोग्राम में एक दीदी और एक भैया होते थे. कुछ बच्चे भी उनके साथ होते. भैया और दीदी ऐसे बातें करते, जैसे वे अपने सामने बैठे बच्चों से ही नहीं, रेडियो सुनने वाले बच्चों से भी मुख़ातिब हैं. थोड़े ही दिनों में मुझे दीदी और भैया से मिलने की चाह होने लगी. रविवार की ही दोपहर को एक और कार्यक्रम आता था – ‘आपकी चिट्ठी मिली’. इसमें भी कोई आशा बहन और मित्तल साहब सुनने वालों की चिट्ठियों के जवाब देते थे. मुझे ये प्रोग्राम भी बहुत पसंद था. जाने क्यों लगता कि रेडियो में बैठे हुए लोग, मुझे अपने पास बुला रहे हैं. मैं अक्सर चक्कर में पड़ा रहता कि रेडियो में सुनाई देने के कारण आवाज़ ऐसी लगती है या सचमुच में इन लोगों की आवाज़ इतनी ही अच्छी है.


रेडियोग्राम एक ठिगनी आलमारी जैसा था, जिस के आधे हिस्से में रेडियो था और बाकी आधे में ग्रामोफ़ोन. ये ग्रामोफ़ोन भी निराले किस्म का था. एक तो यह कि बिजली से चलता था, इसलिए इसमें हैंडल घुमाकर चाबी भरने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. दूसरे इसमें एक साथ छह रिकॉर्ड लगाए जा सकते थे, जो एक के बाद एक, अपने-आप बजते चले जाते. अब तक मैं रेडियो से इतना प्रभावित हो चुका था कि अक्सर इच्छा होती, मैं भी रेडियो से बोलूं, लेकिन बोलने के लिए क्या करना चाहिए, इसकी कोई जानकारी नहीं थी. अपनी भड़ास मिटाने के लिए कई बार मैं रेडियोग्राम के पीछे छुपकर बैठ जाता और बाकी बच्चों को सामने पलंग पर बैठा देता, फिर जितनी देर में रेडियोग्राम, एक रिकॉर्ड बजाकर दूसरे को बजाने की  तैयारी करता, तब तक बीच में आये विराम के समय, मैं गाने की एनॉउन्समेंट करता. डांट-डपट कर जबरदस्ती पलंग पर बैठाए गए श्रोताओं को मेरी एनाउन्समेंट सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, सो वो खुसुर-पुसुर करते रहते, लेकिन डर के मारे बैठे रहते. गाने भी कुल मिलाकर दस-बारह ही थे, जिन्हें हर रोज़ सुना जाना भी किसे भाता.


मामाजी के घर में रहते हुए मुझे दिलचस्पी का एक और सामान मिला. सरोज बहन को ड्रॉइंग और पेंटिंग का शौक था. अक्सर वे किसी कैलेंडर या किताब के छोटे चित्र को बड़ा या बड़ी तस्वीर को छोटा करके बनाया करतीं. तस्वीर को ज्यों का त्यों दूसरे काग़ज़ पर नए सिरे से बनाने का उनका एक विशेष फॉर्मूला था. जिस पेंटिंग को दूसरे काग़ज़ पर बनाना होता, उसपर पहले एक-एक इंच की दूरी पर पेंसिल से पड़ी-लाइनें खींचती, फिर एक-एक इंच की दूरी पर खड़ी-लाइनें खींची जातीं. इस तरह पूरी पेंटिंग एक-एक इंच के वर्ग वाले ताने-बाने में बंट जाती. अब जिस काग़ज़ पर तस्वीर बनानी होती, उसपर भी उसी तरह की खड़ी और पड़ी लाइनें खींची जातीं और मूल तस्वीर के एक-एक वर्गइंच में सिमटी पेंटिंग की लकीरों को, दूसरे काग़ज़ के वर्गइंच में कॉपी किया जाता. इस तरह धीरे-धीरे करके पूरी तस्वीर नए काग़ज़ पर उतर आती. फिर तस्वीर की लकीरों को स्याही से गहरा किया जाता और पेंसिल से बने हुए ताने-बाने रबर से मिटा दिए जाते. इस काम के लिए ढेर सारे धैर्य और घनी एकाग्रता की ज़रूरत होती है. सरोज बहन घंटों तक तस्वीर में सिर झुकाए काम किया करतीं और मैं देखा करता. मुझे पेंटिंग में दिलचस्पी लेता देखकर, सरोज बहन ने मेरा उत्साह बढ़ाया. पहले उन्होंने तस्वीर और काग़ज़ पर मुझे लकीरें खींचने का काम सौंपा. फिर वर्गइंच के खानों में तस्वीर को कॉपी करना सिखाया. एक तो मुझे यह काम करते हुए बहुत मज़ा आ रहा था, दूसरे सरोज बहन का प्यार भरा व्यवहार मुझे उत्साहित कर रहा था. दोस्ती मेरी मंजू बहन के साथ भी हो गई थी, लेकिन मंजू बहन दोस्त जैसी थी, जबकि सरोज बहन के व्यवहार में मुझे ममता नज़र आती.

                  
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गर्मी की छुट्टियां खतम होने को थीं. बेबी, अरुण, मंजू बहन और सरोज बहन आदि सबको अपने-अपने स्कूल-कॉलेज जाने का समय आ रहा था. मुझे भी दिल्ली के किसी स्कूल में दाखिला लेना था, लेकिन उससे पहले ये ज़रूरी था कि बाउजी अपने परिवार के रहने का कहीं और बंदोबस्त करें. बाउजी ने कुछ मकान तलाश किए. एक-दो बार मैं भी उनके साथ मकान देखने गया. बल्लीमारान में एक घर देखा, पसंद नहीं आया. दूसरा लालकुआं में भी देखा, उसका किराया बहुत ज़्यादा था. किसी ने तेलीवाड़े में एक मकान की सूचना दी. मैं और बाउजी इसे भी देखने गए. चांदनी चौक से ट्राम में बैठकर फ़तेहपुरी, खारीबावली, लाहोरीगेट और कुतुबरोड होते हुए हम तेलीवाड़ा पहुंचे. कुछ अंदर जाकर एक पतली सी गली थी, जिसका नाम था, पनिहारी गली. गली साफ़-सुथरी लगी. गली वैसे तो सीधी चली गई थी, लेकिन एक जगह बायीं और भी मुड़ गई थी जौर एक चौक तक आकर बंद हो गई थी. इसी चौक में श्रीकृष्ण गुप्त का मकान था. मकान में प्रवेश करते ही पत्थर का एक चौरस दालान और दालान के तीन तरफ़ लंबे-लंबे कमरे थे. लगता था दालान के तीन तरफ कभी बरामदा था, जिसे तीन-तीन लकड़ी के दरवाजों से ढांप कर कमरों में बदला गया है. बीच का दरवाज़ा खोला और बंद किया जा सकता था, बाकी अगल-बगल के दो दरवाज़े दीवार का काम करते थे. चौक में सामने वाला बरामदेनुमा कमरा हमें दिखाया गया. अंदर का स्वरुप एक आयताकार जैसे कमरे का था और साथ में एक छोटा कमरा भी था, जिसकी ख़िड़की से मकान के पिछवाड़े वाली गली दिखाई देती थी. चौक के ऊपर लोहे का जाल था और इस जाल के ऊपर एक और जाल, जो असल में छत का हिस्सा था. मैं पहले भी बता चुका हूं कि दिल्ली में जाल वाले घरों का अधिक चलन है. मकान मालिक श्रीकृष्ण गुप्त ने बताया कि वे पत्रकार हैं और लिखने-पढ़ने वालों की कद्र करते हैं. किराया उन्होंने चालीस रुपए महीना बताया. बाउजी को रेस्टोरेंट से कुल एक सौ पच्चीस रुपए महीना वेतन मिलता था, इस हिसाब से चालीस रूपए बहुत भारी जान पड़े, लेकिन कोई और चारा नहीं था. दूसरे जो मकान देखे, वे पैंतालीस और पचास रुपये से कम किराए के नहीं थे. हालांकि तेलीवाड़ा, चांदनी चौक से दूर भी बहुत था, लेकिन बाउजी मकान ढूंढ़-ढूंढ़ कर थक चुके थे, सो उन्होंने इस मकान के लिए हामी भर दी.


अगले ही दिन भाभी और हम बच्चे, सामान के साथ एक तांगे में लदकर, अपने नए ठिकाने पर आ गए. सामान कुछ ज़्यादा तो था नहीं, चूल्हे-चौके के लिए बर्तनों तक का नए सिरे से इंतज़ाम करना था. एक तरह नए सिरे से गृहस्थी को जमाना था. यानी तेलीवाड़ा में बाउजी के लिए एक बार फिर, एक नए संघर्ष की शुरूआत हुई और शायद यहीं से उनके संघर्ष में मेरी भागीदारी भी जुड़ी.


आस-पास के स्कूलों में मेरे दाख़िले की कोशिशें की गई, पर नाकाम रही. मकान मालिक श्रीकृष्ण गुप्त ने मदद का हाथ बढ़ाया. उन्होंने बाउजी से कहा, घबराएं नहीं, दाख़िला हो जाएगा. हम बच्चों ने मकान मालिक को चाचाजी कहना शुरू कर दिया था. अगले ही दिन चाचाजी मुझे लेकर मोरीगेट के गवर्नमेंट हाईस्कूल में पहुंचे. वहां के असिस्टेंट हेडमास्टर सेठी साहब चाचाजी के मित्र थे. सेठी साहब ने आदर से बैठाया, चाचाजी के लिए चाय मंगवायी और मेरे दाख़िले का फॉर्म ख़ुद ही भर दिया, लेकिन एक बात पर उन्होंने अपनी राय दी. मैं भीलवाड़ा से आठवीं कक्षा पास करके आया था और सेठी साहब के अनुसार दिल्ली की पढ़ाई का स्तर ऊंचा था. अगर मैं नौंवी कक्षा में दाख़िला लेता, तो मेरा फ़ेल होना तय था. इसलिए उन्होंने सलाह दी कि मैं एकबार फिर आठवीं कक्षा में दाख़िल हो जाऊं, ताकि दिल्ली की पढ़ाई के क़ाबिल हो सकूं. सन् 1949 में भारत सरकार के आदेश ने मुझे पहली से सीधे तीसरी कक्षा में पहुंचाया था और अब आठवीं को मुझे दोबारा पढ़ना था. यानी नफ़ा-नुकसान बराबर हो गया.

मेरा दाखिला होते-होते भीलवाड़ा के स्कूल ‘महिला आश्रम’ की यानी भाभी की छुट्टियाँ ख़तम हो गईं. यह ज़रूरी था कि नौकरी की खातिर, भाभी अब भीलवाड़ा लौट जाए, लेकिन दिल्ली में भी गृहस्थी जमानी थी, इसलिए भाभी को एक महीने और छुट्टियां बढ़ानी पड़ीं, लेकिन जब वो महीना भी ख़तम हुआ तो भाभी का भीलवाड़ा लौट जाना ज़रूरी हो गया. नौकरी छोड़ कर दिल्ली में उनका रहना संभव नहीं था, क्योकि केवल बाबूजी के वेतन पर गृहस्थी का गुज़ारा नामुमकिन था. वैसे भी भीलवाड़ा वाला मकान अभी छोड़ा नहीं गया था. असल में घर-गृहस्थी का काफ़ी सामान वहां जमा था. सो दो बरस के फुन्नू को लेकर एक दिन भाभी भीलवाड़ा लौट गईं. भाभी के चले जाने के बाद, रसोई और घर की ज़िम्मेदारी मुन्नी पर आ गई और अब उसे स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ सुबह-शाम सबके लिए खाना बनाने की ड्यूटी भी निभानी पड़ती. जाते जाते भाभी कह गई थीं कि कुछ ही दिनों में वे वापस लौट आएंगी. लौट आने के उनके इस वादे का अर्थ ठीक से समझने की तब मेरी उम्र नहीं हुई थी. यह अर्थ तो मैंने बाद में ही जाना, जब कुछ महीनो बाद वे वापस लौटीं, अपने अगले प्रसव के लिए. लेकिन इसकी चर्चा बाद में.

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मोरीगेट का गवर्नमेंट हाईस्कूल, एक नहीं दो स्कूल थे, जो दो अलग-अलग शिफ़्टों में चलते थे. पहला स्कूल सुबह सात बजे शुरू होता और बारह बजे ख़तम हो जाता. इसके हेडमास्टर, अध्यापक और चपरासी सबकी छुट्टी हो जाती. फिर साढ़े बारह बजे से दूसरा स्कूल शुरू होता, जो साढ़े पांच बजे तक चलता. मुझे दूसरी शिफ़्ट में दाख़िल किया गया था. हमारा स्कूल दिल्ली के चारों तरफ़ बनी पत्थर की दीवार के एक तोपख़ाने में था. शाहजहां के ज़माने में बनी इस दीवार में कई दरवाज़े थे. दिल्ली दरवाज़ा, तुर्कमान दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, लाहोरी दरवाज़ा, मोरी दरवाज़ा और कश्मीरी दरवाज़ा. शायद हमारे स्कूल की इमारत जैसे तोपख़ाने, हर दरवाज़े के साथ रहे होंगे, लेकिन अब दीवार के कुछ ही टुकड़े बचे थे. अन्य दरवाज़े तो अब भी अपनी-अपनी जगह खड़े थे, लेकिन मोरी दरवाज़े का केवल नाम ही रह गया था. लोगों का कहना था कि 1957 के ग़दर में ये दरवाज़ा अंग्रेजों की तोपों का शिकार हो गया. जो भी हो अब उस दरवाज़े की जगह केवल समतल ज़मीन थी, लेकिन मोरी दरवाज़े का खंडहर तोपख़ाना अभी भी बचा हुआ था और इस समय हमारे स्कूल के काम आ रहा था.


स्कूल के बाहर शरणार्थियों की घनी बस्ती थी. दोनों ओर दूकानें थीं और दूकानदारों ने बल्लियों के सहारे त्रिपाल और कनातें लगाकर सड़क का काफ़ी हिस्सा घेरा हुआ था. दूकानों के ऊपर लकड़ी और ईंटों की दीवारों से बनाए गए कच्चे-पक्के कमरे थे, जो शरणार्थियों के घर बने हुए थे. स्कूल के गेट से बाहर निकलते ही दाएं-बाएं दोनों तरफ़ खोमचे वालों की कतारें नज़र आती. स्कूल की दूसरी शिफ़्ट शुरू होने से पहले और आधी छुट्टी के समय खोमचे वालों की हलचल बढ़ जाती. एक चूरन वाला था, जो चूरन की पुड़िया में जादुई चिंगारी सी भड़काकर ग्राहक को देता. चिंगारी का जादू देखने के लिए बच्चों की भीड़, उसके खोमचे को घेरे रहती. एक मोटा सिंधी कढ़ाही में पापड़ तल-तल कर बेचता था. मैं कई बार उसे हसरत से देखता और अचरज करता कि कढ़ाही में उसने पापड़ तो छोटा ही डाला था, लेकिन उबलते हुए तेल में पहुंचते ही पापड़ का आकार दोगुना हो गया. बहुत दिनों बाद पता चला था कि चावल के पापड़ का यही हाल होता है. एक उबले हुए चने बेचने वाला भी था, जो बराबर पुकार लगाए जाता, “गरमा-गर्रम मस्सालेदार”. इस चने वाले की पुकार सुनकर मुझे भीलवाड़ा में महाराणा टॉकिज़ के सामने बैठे, मूंगफली वाले की पुकार, ‘गर्रमा-गर्रम. मीठीई-मीठीई’ याद आ जाती. लेकिन इन सब खोमचे वालों को मैं सिर्फ देखकर ही तसल्ली ही कर सकता था, कभी कुछ ख़रीदकर खाने जैसी मेरी औक़ात नहीं थी.


स्कूल के भीतर का दृश्य भी मज़ेदार था. फाटक में प्रवेश करते ही एक बड़ा मैदान सामने दिखाई देता और इसके चारों तरफ़ पत्थर की खंडहरनुमा बैरकें नज़र आतीं. सामने बाएं कोने में सीढ़ियां थीं, जो पहली मंज़िल तक जाती थीं, जहां बरामदे के पीछे कमरे थे. इन कमरों में अलग-अलग कक्षाएं लगा करतीं. बरामदे और कमरों का फ़र्श मिट्टी के उबड़-खाबड़ आंगन जैसा था और इसी में छात्रों की आड़ी-तिरछी बेंचें और डगमग करते डेस्क रखे थे. कक्षाओं में अपेक्षाकृत अंधेरा रहता था, जिसे दूर करने के लिए छत पर लटका बिजली का एक बल्ब हमेशा जला करता. एक पीरियड ख़तम होने के बाद दूसरे पीरियड के लिए नए मास्टरजी आते और आते ही उन्हें सबसे पहले अपनी डगमगाती कुर्सी को इधर-उधर खिसका कर, उसके लिए समतल ज़मीन तलाश करनी पड़ती. ज़्यादातर अध्यापक पंजाबी थे और उनकी भाषा भी पंजाबी और ऊर्दू से भीगी हुई थी. इस कारण कई बार कोई-कोई बात मेरी समझ में भी नहीं आती. गणित पढ़ाने वाले मास्टरजी जब ब्लैकबोर्ड पर सवाल समझाते, तो गुणा को ‘ज़रब’, ऋण को ‘घटा’, धन को ‘जमा’ और विभाजक को ‘भाग’ कहते और मुझे ख़ाक समझ में नहीं आता. गणित वाले मास्टरजी ने एक दिन मेरी तरफ़ इशारा करके कहा, “तू नवां है ना, चल ब्लैकबोर्ड पर ये सवाल कर.” अपनी सीट से उठकर ब्लैकबोर्ड तक जाते-जाते मैंने सोचा, गणित की ऊर्दू शब्दावली मुझे आती नहीं और यदि मैं भीलवाड़ा में सीखी गई हिंदी शब्दावली का प्रयोग करूंगा, तो यहां किसी को समझ में आएगा नहीं. सो चॉक हाथ में लेकर ब्लैकबोर्ड पर लिखने से पहले मैंने तय किया कि मैं अंग्रेजी की शब्दावली का इस्तेमाल करूंगा, ताकि सबको समझ में आ सके और मैंने यही किया. लेकिन ज्यों ही मेरे मुंह से ‘प्लस’, ‘माइनस’ और ‘इक्वलटू’ जैसे शब्द निकले, पीछे से दनदनाता हुआ मास्टरजी का झापड़ माथे पर पड़ा. मैं कुछ समझूं, इसके पहले ही वे चिल्लाए, “अंग्रेजदा पुत्तर. आठवीं जमात में इंग्लिश बोलेगा?” सिर के पीछे पड़ी मार और अपमान के कारण रोना सा आने लगा, लेकिन सफ़ाई में क्या कहूं, ये समझ नहीं पाया. मास्टरजी ने मुझे सफ़ाई का मौका भी नहीं दिया. डांटकर कहा, “चल जाके बैठ अपणी जगां.”



मास्टरजी ने जो किया, उनके लिए वो आम बात थी, लेकिन मेरे साथ जो हुआ, वो मेरे लिए सहज नहीं था. सारी क्लास के सामने अपमानित किए जाने पर मुझमें क्रोध और पीड़ा एक साथ जागे. मुझे पता था कि अब मुझे क्लास के दूसरे लड़कों का अपमान भी सहना है. अधिकतर छात्र शरणार्थी परिवारों के पंजाबी और सिंधी बच्चे थे. कई बच्चे उम्र में मुझसे बड़े और लंबे-चौड़े भी थे. शुरू-शुरू में, वैसे भी मुझे उनकी पंजाबीनुमा हिंदी ठीक से समझ नहीं आती थी, जिसके कारण मेरा ख़ूब मज़ाक उड़ाया जाता. जब मास्टरजी क्लास में नहीं होते, तब लड़कों की दबंगई और बढ़ जाती. बड़ी उम्र का ना लड़का, बलविंदर जब भी मेरे पास से गुज़रता, गाल पर चिकोटी काटकर, ‘क्यों बे चिकणे’ कहता जाता. क़रीब महीना भर बीत जाने के बावज़ूद मेरी मिनी-रैगिंग जारी थी और ये अभी कितने दिनों तक और चलती रहेगी, इसका कुछ अंदाज़ा भी नहीं था. अब तो दिन में कई-कई बार क्लास के अलग-अलग कोनों से ‘अंग्रेजदा पुत्तर’ भी सुनाई देता और मुझे रोना सा आने लगता.


जब कई दिनों तक मेरे साथ रैगिंग चलती रही, तो एक दिन जाने मुझे कैसा ताव आया कि मैं झटके से उठा, तेज़ी से क्लास के बाहर आया, बरामदा पार किया और सीधा चिक का परदा उठाकर हेडमास्टर जी के ऑफ़िस में जा घुसा. हेडमास्टर जी रामचंद खरबंदा साहब कोई फ़ाइल देख रहे थे, अचानक मुझे सामने देखकर, उन्होंने अपना सिर उठाया. मैंने बिना किसी डर या संकोच के गीली आंखों और भरे गले से एकाएक कहना शुरू किया, “क्या यही है आपका अनुशासन? यही सिखाया जाता है आपके स्कूल में? मैं नया हूं, मुझे पंजाबी नहीं आती, तो ये क्या मेरा अपराध है? सारे लड़के मिलकर मुझे सुबह से शाम तक चिढ़ाते हैं. किससे शिकायत करूं? कहां जाऊं?” मैं आगे कुछ बोलूं, इससे पहले ही किसी का हाथ मेरे कंधे पर पड़ा. मैंने मुड़कर देखा, वही गणित वाले मास्टरजी थे. जाने कब चिक उठाकर वे कमरे में चले आए थे और चुपचाप खड़े मेरी बात सुन रहे थे. बोले, “कोण चिड़ान्दा है तुझे, चल दस्स मैनू”. हेडमास्टर साहब  ने भी कहा, “हां, सोढ़ी साहब, देखो ज़रा क्या मामला है.”
सोढ़ी साहब बाजू से मुझे पकड़कर तेज़ी से क्लासरूम की तरफ़ चले. चिक उठाने से पहले उन्होंने कोने में पड़ी बेंत उठा ली थी. क्लास में पहुंचते ही लगभग मुझे आगे धकेलते हुए उन्होंने कहा, “बता कौण ए? किसने छेड़ा ए? किसने मज़ाक उड़ाया?”  मैं सकते में खड़ा रहा. डरी-डरी आंखों से मास्टरजी की तरफ़ देखता रहा. किसी लड़के की तरफ़ इशारा करने की हिम्मत ही नहीं हुई. क्लास में भी अजब सन्नाटा था. मास्टरजी ने मेरी तरफ़ से ध्यान हटाया और सामने बैठे लड़के की डेस्क पर बेंत फटकारी और पूछा, “तू बता, कौण छेड़दा है इसनू?” सहमा हुआ लड़का चुपचाप खड़ा हो गया, बोला कुछ नहीं. मास्टरजी ने सड़ाक से एक बेंत उसे जड़ दी. फिर पीछे की क़तार में बैठे हुए बड़ी उम्र के बलविंदर से पूछा, “ओए तू बोल, तूने छेड़ा?” खड़े होकर उसने भी इनकार में सिर हिलाया और जवाब में मास्टरजी की बेंत खाई. इसके बाद तो मास्टरजी को जैसे दौरा ही पड़ गया. जिसपर नज़र पड़ी, उसे दनादन बेंत रसीद करने लगे. साथ ही उनका चिल्लाना भी जारी था, “मां-बाप तुमको इधर सकूल में भेजते हैं पढण वास्ते और यहां आकर दादागीरी करते हो... इतना लुट-पिट कर आए हो पार्टीशन में, लेकिन दमाग सीधा नहीं हुआ ... मरोगे सारे... मेरे हत्तों मरोगे... पढ़ना एक लफ़ज नहीं और हरामखोरी में अव्वल... कोई नया आएगा क्लास में, तो उसके साथ गुंडागर्दी करोगे... सकूल को क्या समझा है, अपणे बाप का हुजरा?” मास्टरजी की जबान और बेंत दोनों चल रहे थे. मार खाते हुए लड़के ‘हाय-हाय माड्डाला... मैं मर गया... माश्टरजी’ कर करके चिल्ला रहे थे, लेकिन मास्टरजी के क्रोध पर उनके रोने का कोई असर नहीं हो रहा था. मैं पीछे खड़ा हुआ थर-थर कांपने लगा. मार खाते और हाय-हाय करते लड़कों को देखकर मुझे रोना आ गया. मास्टरजी ने एक लड़के पर बेंत उठाई, लेकिन इससे पहले कि वो किसी पर बरसती, बेंत को पीछे से मैंने पकड़ लिया. मास्टरजी ने मुड़कर मुझे देखा, फिर मेरे आंसू भरे चेहरे को देखकर, एकाएक हाथ नीचे कर लिया. मैंने रोते-रोते हाथ जोड़कर उनसे कहा, “मत मारिए, बहुत हो गया. माफ़ कर दीजिए इनको.” मास्टरजी पहले हैरान हुए, फिर धीरे से आकर कुर्सी पर बैठ गए, मुझे बाजू से पकड़कर अपनी तरफ़ खींचा और दूसरे हाथ से मेरे आंसू पोंछते हुए कहा, “ओए तू क्यों रोता है? ये ससुरे तो हैंई इसी काबल हैं. तू अपना दिल क्यों ख़राब करता है. शाबाश, चुप हो जा.” फिर एकाएक मास्टरजी ने क्लास की तरफ़ देखते हुए कहा, “देखो नमूनो, ओए शरम करो, तुम इसके साथ कैसा सलूक करते हो और इसके दिल में तुम्हारे लिए कितना रहम है. संभल जाओ, पढ़ाई में त्यान लगाओ, इस लफंडबाजी में कुछ नहीं रखा. सीखो कुछ.” फिर मेरी तरफ़ देखकर आवाज़ में थोड़ा लाड़ भरते हुए मास्टरजी ने पूछा, “नांव क्या है तेरा?” मैं एकबार फिर सहम गया. मेरा संस्कृत जैसा नाम सुनकर कहीं मास्टरजी फिर से मुझे किसी का ‘पुत्तर’ न घोषित कर दें. मैंने डरते-डरते अपना नाम बताया. मास्टरजी ने पता नहीं समझा या नहीं, पर मुस्कराए और कहा, “जा बैठ जा अपनी जगा, अगर कोई भी तुझे कुछ बोले, तो हेडमाटसाबजी के पास जाने की ज़रूअत नईं, मेरे को बोलना. मैं हड्डियां तोड़ दूंगा इनकी. जा श्याबाश, बैठ जा.”


इस घटना के बाद लड़के मुझसे डरने से लगे. एक-दो शायद इज़्जत भी करने लगे. क्लास में दो भाई थे, दर्शन और प्राण. दोनों मेरे दोस्त हो गए. ये दोनों भी तेलीवाड़े में ही रहते थे, हमारे घर की खिड़की से जो पिछवाड़े की गली दिखाई देती थी, उसी में. स्कूल आने-जाने के लिए मेरा और उनका साथ हो गया. दर्शन, प्राण से छोटा था, उम्र में भी और कद-काठी में भी, लेकिन पढ़ने में ख़ासा तेज़ था. उसकी लिखावट बहुत सुंदर थी. कई दिनों बाद मुझे पता चला, उसका पूरा नाम सुदर्शन तलवार है, लेकिन घर और स्कूल में सब उसे दर्शन ही कहकर बुलाते थे. चूंकि पड़ोसी थे, हमारा एक-दूसरे के घरों में आना-जाना होने लगा. दर्शन के माता-पिता और बड़े भाई मुझे बहुत प्यार करते थे. दर्शन भी मेरे घर में वैसा ही आदर पाता था. भाभी, मुन्नी, अशोक सब दर्शन को बहुत पसंद करते थे. जिस मोहल्ले में दर्शन और प्राण का घर था, उसमें लगभग सभी घर पंजाबी शरणार्थियों के थे. स्कूल के कुछ और लड़के भी यहीं रहते थे. इनमे एक थोडा अमीर सा दिखाई देने वाला लड़का भी था - अमर. पूरा नाम था अमरनाथ पसरीचा. धीरे-धीरे मेरी सभी से दोस्ती हो गई. उनके संपर्क में, मैं पंजाबी समझने और थोड़ी-थोड़ी बोलने भी लगा.


नवंबर के साथ ही दिल्ली की हवा में ठंडक शुरू हो गई थी. स्कूल की ड्रेस ख़ाकी निकर और सफ़ेद क़मीज थी, जिसकी वजह से आते-जाते टांगों में झुरझुरी होती. एक दिन मास्टरजी ने बताया कि चौदह नवंबर को बाल-दिवस है. उस दिन सब बच्चों को नेशनल स्टेडियम जाना है, जहां देशभर से आए हुए बच्चे चाचा नेहरू का जन्मदिन मनाएंगे. हमारी कोर्स की किताब में चाचा नेहरू पर एक निबंध था, उसी में मैंने पढ़ा था कि चाचा नेहरू बच्चों को बहुत प्यार करते हैं, इसीलिए उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. मैं इस बात से बहुत उत्साहित हो गया कि चौदह नवंबर को मैं चाचा नेहरू को देख पाऊंगा. स्कूल की तरफ़ से सब बच्चों को बस में बैठाकर इंडिया गेट के पास, नेशनल स्टेडियम ले जाया गया. अंदर प्रवेश करने के लिए हर बच्चे को एक पास दिया गया था. मैं पास हाथ में लिए गेट की तरफ़ बढ़ता रहा, लेकिन किसी ने पास चैक ही नहीं किया. मैंने पहली बार नेशनल स्टेडियम और इंडिया गेट को देखा था. अंदर पहुंचने पर पता चला कि नेशनल स्टेडियम, एक गोल मैदान को घेरकर चारों तरफ़ बनाई गई ढ़ेर सारी सीढ़ियों का नाम था. सीढ़ियों पर हज़ारों की तादाद में बच्चे बैठे थे. हम भी जाकर एक सीढ़ी पर बैठ गए. गोलाकार सीढ़ियों में ही बायीं ओर एक मंच बनाया गया था. मंच पर गांधी टोपी पहने हुए ढेर सारे लोग दिखाई दे रहे थे. मैं हैरान सा अभी नेशनल स्टेडियम को निहारने में ही लगा था कि अचानक बच्चों में शोर मचा. मैंने देखा मंच पर गोरे-चिट्टे चाचा नेहरू आकर सब बच्चों को आकर हाथ हिला रहे थे. किसी ने चाचा नेहरू ज़िंदाबाद का नारा शुरू किया और स्टेडियम बार-बार इस नारे से गूंजने लगा. कुछ देर बाद मंच पर से सैकड़ों की तादाद में सफ़ेद कबूतर उड़ाए गए. बच्चों ने तालियां बजाई. फिर चाचा नेहरू ने भाषण दिया. उन्होंने बस इतना ही कहा, प्यारे बच्चो, जयहिंद कुछ बच्चों ने तालियां बजाईं और कुछ ने जयहिंद का नारा दोहराया. फिर चाचा नेहरू एक खुली जीप में सवार हुए और जीप ने धीमी चाल से स्टेडियम का चक्कर लगाया. जहां से भी चाचा नेहरू की जीप गुज़रती, बच्चे तालियां बजाते और जय-जयकार करते. सफ़ेद शेरवानी और सफ़ेद टोपी में गोरे-चिट्टे चाचा नेहरू मुझे बहुत सुंदर लग रहे थे. वे जीप में खड़े हुए थे और हाथ हिला-हिला कर बच्चों का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे. ज्यों-ज्यों उनकी जीप हमारे समीप आ रही थी, मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी. कुछ अजीब सा रोमांचकारी अनुभव था. जीप हमारे सामने से गुज़री तो मैंने भी ख़ूब तालियां बजाई. स्टेडियम का चक्कर पूरा करके, कुछ देर बाद चाचा नेहरू चले गए और बाल दिवस का मेला पूरा हो गया.
लौटने के लिए वापस बस में बैठने से पहले सब बच्चों को एक-एक पैकेट दिया गया. पैकेट में एक समोसा और दो लड्डू थे.

Saturday, June 25, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग ३२ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)

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सेकंड ईयर के इम्तेहानों में मेरी हालत बहुत अच्छी नहीं थी क्योंकि साल की शुरुआत में तो दो गायें भी संभालता था, खेतों की ज़मीनें भी देखने गया, पज़ेशन लेने गया, नाटक भी किये और फिर मेरे साथ के बाकी लोगों को तो सिर्फ सेकंड ईयर आर्ट्स के पेपर देने थे, मगर मुझे एक साथ आर्ट्स के सेकंड ईयर और फर्स्ट ईयर के सारे पेपर्स देने थे. जब इम्तहानों का टाइमटेबल आया तो ये देखकर मुझे पसीना आ गया कि एक दिन सुबह फर्स्ट ईयर फिलॉसफी का पेपर था और शाम को सेकण्ड ईयर इक्नोमिक्स का. मैं भागा हुआ फिलॉसफी के गुरुदेव जोशी जी के पास पहुंचा और उन्हें बताया, गुरुदेव टाइमटेबल तो ऐसा आया है क्या करू? उन्होंने बहुत शान्ति के साथ समझाया “महेंदर..... घबराने की बिलकुल ज़रूरत नहीं है. इससे क्या फर्क पड़ता है कि एक दिन में आपको दो अलग अलग सब्जेक्ट्स के सवालों के जवाब देने होंगे ? आप पढाई तो पहले से कर रहे हैं, जब आप फिलॉसफी का पेपर देने बैठेंगे तब आपका दिमाग छांट छांटकर उस पेपर में आये सवालों के जवाब ही लिखेगा और जब इक्नोमिक्स का पेपर देंगे तो दिमाग अपने आप उस पेपर में आये सवालों के जवाब निकाल कर आपके सामने रख देगा.” गुरूजी से मिलकर थोड़ी शान्ति मिली लेकिन जब तक वो दोनों पेपर्स नहीं हो गए मुझे पूरी तरह से चैन नहीं मिला.

मन में ये डर भी था कि अगर कहीं किसी भी सब्जेक्ट में फेल हो गया, तो न जाने किस किस के ताने सुनने पड़ेंगे कि लो आर्ट्स ली थी, उसमे भी फेल हो गया. सबसे ज़्यादा फिक्र अपने उन नज़दीक के रिश्तेदारों के तानों की ही थी, जो खुद पढ़ नहीं पाए. भाई साहब तो डॉक्टर बन गए थे, उन्हें डॉक्टर बनने से वो रोक नहीं पाए. अब उनका निशाना मैं ही था. वो तो इंतज़ार कर रहे थे कि मैं फेल हो जाऊं और वो मेरे पिताजी और माँ को ताने सुना सकें. मैंने अपनी तरफ से पूरा जोर लगाया. मुझे मदद की तीन लोगों ने. इतिहास में डा. देवडा सर ने , फिलॉसफी में डा. शिवजी जोशी सर ने और इक्नोमिक्स में डा. एल एन गुप्ता सर ने. इन तीनों ने अपने घर के दरवाज़े, २४ घंटे के लिए मेरी खातिर खोल दिए और कहा “जब भी कुछ दिक्कत हो, बिना संकोच घर आओ और हमसे पूछो.” इतना सहारा मेरे लिए काफी था. मैं जुट गया इम्तेहानों में और ठीकठाक नम्बरों से पास हो गया.
इन्हीं दिनों भाई साहब ने पिताजी और माँ को कहा कि उन्हें कुछ दिन पीलवा जाकर, उनके पास रहना चाहिए. पिताजी ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके साथ जा सकता हूँ? मैंने उन्हें बताया कि मुझे कोई दिक्कत नहीं है जाने में, लेकिन उस छोटे से गाँव में सिवाय खाने और सोने के मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा और मेरी सारी छुट्टियाँ बेकार चली जायेंगी, जबकि मैं इम्तहानों के बाद की इन लंबी छुट्टियों का कुछ इस्तेमाल करना चाहता हूँ. मैं चाह रहा था कि एम् ए के बाद कुछ कॉम्पीटीशन दूं. उनकी तैयारी के लिए लायब्रेरी में बैठ कर कुछ पढाई करना ज़रूरी था. मैं चाहता था कि लायब्रेरी की ये स्टडी मैं शुरू कर दूं और दूसरे, मुझे लग रहा था कि इन छुट्टियों में एकाध ड्रामा भी कर लूं. फिर भी मैंने कहा कि मैं उनके साथ पीलवा जाऊंगा और कुछ दिन उनके साथ रहने के बाद बीकानेर लौट आऊँगा.

एक रोज सुबह हम लोग पीलवा के लिए रवाना हुए. वही रास्ता था. बीकानेर से बस से फलौदी, फलौदी से ट्रेन से लोहावट और लोहावट से फिर बस से पीलवा. तीन टुकड़ों में हुए इस सफर का मुझ पर और पिताजी पर तो कोई खास असर नहीं हुआ, मेरी बीमार माँ बहुत परेशान हो गईं, लेकिन जैसे ही हम लोग पीलवा पहुंचे, माँ ने भाई साहब को देखा, उनकी सारी थकान, सारी परेशानी दूर हो गयी. वो दिन मुझे आज भी याद है. मारवाड लोहावट तक मेरी माँ के चेहरे पर थकान और परेशानी के वो तास्सुर और उसके बाद पीलवा पहुँचने पर भाई साहब को देखकर उनका एकदम ताज़ादम हो जाना. मैंने शायद पहली बार माँ बेटे के बीच के इस रिलेशन को दिल से महसूस किया. मैंने सोचा, अरे अब तक मैंने इस रिलेशन को कभी गहराई से लिया ही नहीं था. मुझे सरदारशहर में रात-रातभर जागकर, मेरी देखभाल करती माँ का चेहरा याद आ गया. मुझे लगा, मैंने अपनी माँ को पहचाना ही नहीं है. या फिर हो सकता है, माँ बेटे के इस सम्बन्ध को ही मैं अब तक समझ नहीं पाया हूँ.
तीन चार दिन मैं पीलवा में रहा. माँ की तबियत काफी ठीक हो गयी थी. मैं वहाँ से बीकानेर आने को तैयार हो गया. सबने कहा, क्या करोगे बीकानेर जाकर, लेकिन मेरे लिए बीकानेर में दो ज़बरदस्त आकर्षण थे. मुझे कभी हॉस्टल में रहने का मौक़ा नहीं मिला था. हालांकि बहुत बंदिशें नहीं थीं मुझपर, लेकिन रहना हमेशा परिवार के साथ ही होता था. मैं चाहता था, कुछ दिन स्वछन्द होकर हॉस्टल लाइफ को जियूं और दूसरी चीज़ थी, स्टेज ड्रामा. छुट्टियाँ थीं और इन छुट्टियों में मैं खूब आराम से रिहर्सल पर जा सकता था और ड्रामा कर सकता था. मैंने पिताजी को साफ़ साफ़ ये सब बताया और उन्होंने बहुत खुले मन से मेरी बात को स्वीकार कर लिया. बस मेरी माँ को ये फ़िक्र थी कि मैं खाना ठीक से खाऊँगा या नहीं, तो मैंने उनसे वादा किया कि मैं ठीक से खाना खाऊंगा.
मैं बीकानेर के लिए रवाना होने लगा, तो भाई साहब ने चार चार किलो के दो डिब्बे मेरे साथ रवाना कर दिए . मैंने पूछा कि ये क्या हैं ? तो उन्होंने कहा , बहुत बढ़िया देसी घी है. खूब खाना और जब एक डिब्बा खतम हो जाए तो मुझे खबर कर देना, मैं दो डिब्बे और रवाना कर दूंगा. मैं वो डिब्बे लेकर बीकानेर आ गया.

अब लंच धन्नी भौजाई बना रही थीं. घी उनके सामने रख दिया गया. लेकिन जो लंच वो बनाती थीं, उसमे घी लगाने की बहुत गुंजाइश नहीं रहती थी. गेहूं के आटे की रोटी में कोई भला कितना घी लगायेगा? आखिर मैंने नाश्ता और रात का खाना अपने हाथ में ले लिया. नाश्ते में दो छोटी छोटी बाजरे की रोटियां बनाता था और उनमे करीब डेढ़ सौ ग्राम घी डालकर गुड और अचार के साथ खा लेता था. लंच जो भी धन्नी भौजाई बनाती थीं, वो खाता था और शाम को जो सब्जी बनाता था उसमे १०० ग्राम घी डाल लेता था. इस तरह कुल मिलाकर दिन भर में कम से कम पाव् भर घी खा लेता था. शाम को दो घंटे खेलने जाता था. वो सारा घी पच जाता था.  जैसे ही एक डिब्बा घी खतम होता था, मैं पीलवा समाचार करवा देता था और कुछ ही दिनों में, जब तक कि दूसरा डिब्बा खतम होता, दो डिब्बे घी के और आ जाया करते थे. कुछ महीनों बाद जब माँ पिताजी बीकानेर लौटे तो मेरी माँ घी की बात पर खूब हंसीं कि बच्चा पैदा करने के बाद जितना घी औरतों को खिलाया जाता है, उससे कहीं ज़्यादा घी महेंदर ने इन दो तीन महीनों में खा लिया था. फिर साथ ही नज़र न लग जाए इसके लिए थुथकारा डालना भी नहीं भूलती थी.
इसी बीच नेशनल थियेटर से बुलावा आया. मोडू सिंह जी ने कहलवाया कि नेशनल थियेटर एक ड्रामा करने जा रहा है और उसमे बीकानेर के सारे अच्छे आर्टिस्ट्स को शामिल करना चाहता है. इस ड्रामा को डायरेक्ट करेंगे, जयपुर के मशहूर डायरेक्टर एच सी सक्सेना जी, जो कि वैसे ए जी ऑफिस में काम करते हैं, मगर इन दिनों उनकी पोस्टिंग बीकानेर में है. लिहाजा मुझे, प्रदीप भटनागर को, एस डी चौहान को और हनुमान पारीक को बुलाया गया है. और भी कई कलाकार थे जो नेशनल थियेटर के थे लेकिन, जैसा कि मैंने पहले लिखा, हम चार लोग किसी एक ग्रुप के साथ बंधे हुए नहीं थे. आज की ज़ुबान में हम लोग फ्री लांसर थे.
मैं चौतीना कुआ पर बने नेशनल थियेटर के दफ्तर पहुंचा. शुरू से ही आदत थी, अगर चार बजे कहीं बुलाया जाए तो ३.५५ पर पहुंचना. मैं वक्त से ५ मिनट पहले पहुँच गया था. जैसे ही ५ मिनट गुज़रे, सही वक्त हुआ, एक पांच फुट के छोटे से आदमी ने न जाने कहाँ से निकल कर दहाड़ते हुए कहा “मैंने जो वक्त दिया था, वो हो गया. मुझे कोई भी लेट आने वाला नहीं चाहिए. अब जो आयें, मोडू सिंह जी, उन्हें वापस भेज दीजिए.”

हम समझ गए, यही हैं हमारे इस ड्रामा के डायरेक्टर एच सी सक्सेना जी. हमने उठकर उनके पाँव छुए. बहुत प्यार से उन्होंने आशीर्वाद दिया. मुझे लगा वाह, पटरी बैठ जायेगी इनके साथ, क्योंकि मेरे उसूलों वाले ही हैं, ये भी. थोड़ी देर में कुछ लोग आये, एच सी सक्सेना जी ने सबको वापस भेज दिया. मैं, प्रदीप भटनागर, हनुमान पारीक और एस डी चौहान एक दूसरे की तरफ देखते रहे और सोचते रहे कि अब क्या होगा? बीकानेर में तो लोगों को आदत ही है, देर से आने की.
कुछ और कलाकार आये. सक्सेना जी ने कहा, मुझे थोड़े कमज़ोर आर्टिस्ट्स चलेंगे, लेकिन ऐसे आर्टिस्ट्स चाहियें जो वक्त के पाबन्द हों.
रिहर्सल शुरू हुई. मेरी और हनुमान पारीक की रेडियो वाली आवाज़ थी, एकदम भारी और बुलंद . सक्सेना जी कहते “महेंद्र, हनुमान, अपनी आवाज़ का वोल्यूम ज़रा कम रखो यहाँ, बाकी लोगों की आवाज़ तुम्हारे बराबर की नहीं है. जब भी कभी जयपुर आओ, हम लोगों के साथ ड्रामा करो, तो अपने इस वोल्यूम का इस्तेमाल करना.” हम दोनों एक दूसरे की तरफ देखते, फिर अपनी आवाज़ थोड़ी कम कर लेते थे.
मेरे साथ जिस लड़की का रोल था, सक्सेना साहब खुद वो संवाद बोलते थे और हर बार कहते थे, ये रोल मेरी बेटी करेगी, जो जयपुर में है. अभी मैं प्रॉक्सी कर रहा हूँ.
रिहर्सल चलती रही. सक्सेना जी प्रॉक्सी करते रहे. पारीक जी नाम के एक सेठ जी, जो इस पूरे ड्रामा का खर्च उठा रहे थे, रोज रिहर्सल में आते थे. एक बहुत ही सुन्दर और सजे धजे तांगे पर वो आया करते थे. ये उनका पर्सनल तांगा था. तांगे का ड्राइवर भी खूब अच्छे साफ़ सुथरे कपडे पहने रहता था. पारीक सेठ जी के हाथ में हमेशा ५५५ सिगरेट का पैकेट और सोने की चेन से बंधा हुआ लाइटर रहता था. रिहर्सल के बाद एक दिन पारीक जी, सक्सेना साहब और मोडू सिंह जी शराब की महफ़िल जमा कर बैठ गए. सब कलाकारों को भी ड्रिंक्स ऑफर किये गए. मैं तो शराब से बहुत दूर था. मैंने साफ़ मना कर दिया. हमारे कुछ साथी ग्लास लेकर बैठ गए. बातें ड्रामा के मुत्तल्लिक ही चल रही थी, इसलये सक्सेना साहब ने मुझे कहा “बहुत अच्छी बात है महेंद्र कि तुम नहीं पीते हो, लेकिन बैठो कुछ देर हमारे साथ, कुछ सीखने को मिलेगा.” मेरे हरी ओम ग्रुप में कभी इस तरह का माहौल नहीं रहा कि हम लोगों में से कोई शराब की बोतल खोलकर बैठे. मुंजाल साहब और महावीर बाबू जैसे एक दो लोग थे, जो इस लाल परी का लुत्फ़ लेते थे, लेकिन उनके वो साथी अलग थे, जिनके साथ वो इस तरह की महफ़िलें जमाया करते थे. लिहाजा ये पहला मौक़ा था कि घर से बाहर मुझे किसी ऐसी महफ़िल में बैठने को कहा जा रहा था, जिसमे शराब के दौर चल रहे थे.

मैंने थोड़ा सोचा और मैं बैठ गया क्योंकि मेरे सामने बैठकर लोग शराब पियें,  मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं थी. शराब को लेकर कभी कोइ घृणा की भावना मैंने संस्कारों में नहीं पाई. मेरे पिताजी अक्सर शाम को खाने से पहले दो पैग लिया करते थे और कहते थे, ये इतनी बुरी चीज़ नहीं है, जितना लोग इसे बदनाम करते हैं. आप दो पैग लीजिए, आपको खाना स्वादिष्ट लगेगा. उसके बाद सोयेंगे तो नींद अच्छी आयेगी. एक लिमिट में रहकर अगर इसे पिया जाए तो ये एक दवा है. आप अगर एक हद से आगे बढ़ेंगे, तो अच्छी से अच्छी चीज़ भी बुरी बन जायेगी. खास तौर पर जो लोग इसे पीकर होश खोने का नाटक करते हैं, वो इसे ज़्यादा बदनाम करते हैं. एक दिन मैंने पिताजी से पूछा कि वो कब से शराब पी रहे हैं? उन्होंने जो जवाब दिया, उसने मुझे चौंका दिया. उन्होंने कहा “तुम्हें मालूम ही है कि मेरे पिताजी तो तभी गुजर गए थे, जब मैं दो साल का था. मैं अपने मामा जी के यहाँ रहकर बड़ा हुआ. मेरी माँ चार बच्चों की देखभाल करती थी. मेरे मामाजी की दो औलादें, मैं और मेरी एक मौसी के बेटे. हम चारों एक साथ ही रहते थे. बीकानेर में सर्दी तो अब भी ज़ोरदार पड़ती है, मगर उन दिनों सर्दी और भी ज़ोरदार पड़ा करती थी. हमारे घर में शराब के बड़े बड़े मर्तबान भरे रहा करते थे और हर मर्तबान के साथ एक छोटा सा ग्लास रखा रहता था. सर्दी के मौसम में मामाजी हम तीनों भाइयों को कहा करते थे ‘जाओ रे छोरों.....मर्तबान में से एक एक ग्लास दारू लेकर पी लो, सर्दी नहीं लगेगी. लेकिन खबरदार, अगर किसी ने एक ग्लास से ज़्यादा पी ली तो डंडे पड़ेंगे.’ हम सब मामा जी से बहुत डरते थे, इसलिए बस एक ग्लास मर्तबान में से लेकर पी लिया करते थे. कभी ये हिम्मत नहीं हुई कि उन्होंने जो हद बनाई, उस हद को हम पार करें और सच बात ये है कि मैं आज भी उसी हद से बंधा हुआ हूँ. दो पैग से ऊपर कभी नहीं पीता.”
मैंने पूछा “उस वक्त आपकी उम्र कितनी थी?”
वो हंसकर बोले “मुझे बहुत अच्छी तरह तो याद भी नहीं, लेकिन जो धुंधली धुंधली याद है, उसके मुताबिक पहली बार जब मैंने इसका स्वाद चखा था, तो मेरी उम्र ४ या ५ बरस रही होगी.”
मैंने ताज्जुब से कहा “क्या.....? आप ४-५ बरस की उम्र से शराब पी रहे हैं?”
“बिलकुल.”
“तब तो मैं बहुत लेट हो गया इस मामले में”

वो हंस कर बोले “तो आओ ना, ले आओ अपना ग्लास. मैं तो कई बार कहता हूँ तुम दोनों भाइयों से कि कोई तो साथ दो मेरा. राजा (भाई साहब का घर का नाम) तो मेडिकल में आने के बाद, फिर भी कभी कभी मेरे साथ बैठ जाता है, लेकिन तुम तो कभी इसे मुंह ही नहीं लगाते. अरे यार तुम तो कलाकार हो और सुना है, कलाकारों की कला निखरती है इस से.”
मैंने ठहाका लगाते हुए कहा “ हाँ आपने सही सुना है. मैं नहीं पीता क्योंकि मुझे अपनी कला के लिए इस नशे की ज़रूरत महसूस नहीं होती. मैं बिना पिए ही जब स्टेज पर जाता हूँ, तो मुझे एक अजीब तरह का नशा महसूस होता है. मैं चाहता हूँ कि ये स्टेज और स्टेज पर की जाने वाली एक्टिंग का नशा, इसी तरह बना रहे, कम ना हो.”
वो बोले “ठीक है, नहीं पीना बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर कभी पियो तो छुपाकर पीने की कोई ज़रूरत नहीं. जब पिता के पाँव का जूता बेटे के पाँव में आने लग जाए, तो दोनों के लिए अच्छा ये रहता है कि दोनों दोस्तों की तरह रहें. तो याद रखो कि शराब और सिगरेट बहुत खराब चीज़ें हैं, लेकिन अगर आप शराब या सिगरेट पियें तो मेरे सामने पियें, छुपाकर नहीं. अगर किसी और इंसान ने मुझे कभी आकर कहा कि उसने आपको सिगरेट या शराब पीते देखा है, तो यकीन मानो, मुझे बहुत अफ़सोस होगा और लगेगा कि आप लोगों की परवरिश में कुछ कमी रह गयी है.”
मैंने कहा “आप भरोसा रखिये, मैं कभी छुपाकर नहीं पियूंगा. जिस दिन इसे चखूंगा भी, तो आपको ज़रूर बताऊंगा.”
१९८७ तक मैंने कभी शराब को मुंह नहीं लगाया. मेरे पिताजी जब जब भी मेरे पास आकर रहते थे, अपने रूटीन के मुताबिक, रोजाना खाना खाने से पहले, दो पैग लिया करते थे और मुझसे पूछा करते थे “क्यों कलाकार...... तुमने पैग लगाना शुरू किया या नहीं?”

मेरा जवाब हमेशा यही होता था “जी नहीं, अभी तक तो शुरू नहीं किया है.”
अगस्त १९८७ में मेरा तबादला कोटा हुआ और जहां मुझे सी आई आई डी ए,कनाडा; आर आई डी सी, कनाडा; ए आई बी डी, मलेशिया और आल इंडिया रेडियो के मिलकर शुरू किये गए एक प्रोजेक्ट में काम करना था. हमारी कोऑर्डिनेटर थीं, कनाडा की मिस रॉबर्टा बोर्ग. मेरे दो साथी प्रोग्राम एक्सिक्यूटिव मानिक आर्य और आर पी मीणा और एक फ़ार्म रेडियो ऑफिसर गिरीश वर्मा इस प्रोजेक्ट में मेरे साथ थे. मीणा बियर का शौक़ीन था, मानिक और गिरीश के सब कुछ चलता था. बस मैं एक ऐसा था, जो कुछ भी नहीं पीता था. रॉबर्टा बोर्ग को हम सब लोग दीदी बुलाते थे. दीदी भी मेरे पिताजी की तरह, रोज शाम को बोतल खोल कर, खाना खाने से पहले, तीन चार पैग लिया करती थीं. जब कभी हम लोगों की कोई मीटिंग होती या दफ्तर में काम करने की बजाय, हम सब लोग चम्बल गेस्ट हाउस में, जहाँ दीदी और बाकी सारे विदेशी रुका करते थे, काम कर रहे होते, तो अक्सर काम के बाद व्हिस्की की बोतलें खुल जाया करती थीं. पीने के बाद सब लोग खूब घुल मिलकर गपशप किया करते थे. वो लोग देर तक शराब पीते थे और मैं कोका कोला की बॉटल लिए बैठा रहता. लेकिन कोका कोला भी आखिर कितना पिया जा सकता है? मुझे कभी कभी लगता कि मैं इन लोगों की कंपनी से बाहर हो रहा हूँ.
इसी बीच मुझे और दीदी को एक मीटिंग के लिए, कनैडियन हाई कमीशन से बुलावा आ गया. मैं और दीदी दिल्ली गए और होटल ताज पैलेस में रुक गए. अब दीदी ने मुझे कैनेडियन लोगों के अदब कायदे बताए, क्योंकि दूसरे दिन मीटिंग के बाद, हम दोनों को वहाँ डिनर के लिए भी बाकायदा बुलावा भेजा गया था. दीदी ने कहा कि डिनर में वाइन तो लेनी ही होगी वरना होस्ट बुरा मानेगा.
दूसरे दिन जब मीटिंग पूरी होते होते रात हो गयी थी. डिनर हमें वहीं हाई कमिश्नर के साथ लेना था. वाइन का एक ग्लास सबके साथ मुझे भी लेना पड़ा. डिनर के दौरान और भी तरह तरह की इम्पोर्टेड शराब परोसी गयी. पीने के लिए बस शराबें ही शराबें थीं. मैंने दीदी से इशारे से पूछा कि मैं पानी की जगह क्या पियूं? तो उन्होंने इशारे से व्हाइट वाइन की ओर इशारा किया. मैं दो तीन प्याले व्हाइट वाइन के पी गया. थोड़ी देर बाद सर हल्का सा घूमता हुआ सा लगा.
डिनर खत्म हुआ और हम लोग होटल ताज पैलेस में आ गए. दीदी ने पूछा कि पहली बार अल्कोहल लेकर कैसा लग रहा है? मैंने जवाब दिया कि हल्का हल्का सर चकरा रहा है. वो बोलीं, चेंज करके मेरे कमरे में आ जाओ, लगता है तुमने जितनी वाइन पी है, वो तुम्हारे वज़न के हिसाब से नाकाफी थी. मैं चेंज करके उनके रूम में चला गया. उन्होंने अपने फ्रिज से व्हिस्की की बोतल निकाली और दो पैग बना कर, एक मेरे सामने रख दिया. मैंने ग्लास उठाया और सिप करने लगा. वाइन का स्वाद मुझे बुरा नहीं लगा था मगर व्हिस्की का स्वाद मुझे कुछ खास पसंद नहीं आया. उधर दीदी को देखा तो बड़ा ताज्जुब हुआ कि वो व्हिस्की के हर सिप को, बहुत ही स्वाद ले लेकर पी रही हैं. व्हिस्की को इस तरह ऑन द रॉक्स(सिर्फ बर्फ डालकर, बिना पानी या सोढा मिलाए) इतना स्वाद लेकर चुस्कियां भरकर पीते हुए, तब तक मैंने किसी को नहीं देखा था. अब तो मेरा बेटा भी कई बार जब कोई बहुत खास शराब का पैग बनाकर मुझे देता है तो बताता है, डैडी..... ये शराब ऑन द रॉक्स ही पी जाती है. और हम दोनों बाप बेटे उस ड्रिंक का आनंद ऑन द रॉक्स ही लेते हैं. खैर ये तो अभी की बात है, जब गंगा में न जाने कितना पानी बह गया और मैंने न जाने कितने ड्रम व्हिस्की पी डाली. उस वक्त  मैंने दो पैग किसी तरह गले से उतारे और मैं अपने कमरे में आकर सो गया. ऐसी गहरी नींद आयी कि दूसरे दिन देर तक सोता रहा. अगले ही दिन वायुदूत की फ्लाइट पकड़कर हम लोग कोटा आ गए. इस बीच मुझे समाचार मिला कि मेरे पिताजी कोटा आ रहे हैं. तब तक मैं अकेला ही कोटा में रह रहा था क्योंकि मेरी पत्नी की पोस्टिंग सूरतगढ़ थी. मुझे आकाशवाणी कॉलोनी में जगह नहीं मिली थी, इसलिए रेलवे स्टेशन के करीब, कैप्टन अवस्थी के घर के पिछवाड़े में, एक कमरा और एक किचन किराए पर ले रखा था. मैं पिताजी को रेलवे स्टेशन से लेकर घर आया. शाम हो चुकी थी, खाना बनाने लगा. खाना बनाते बनाते मैंने पिताजी से कहा “जानते हैं, अभी मैं दिल्ली गया था. कैनेडियन हाई कमीशन में जो डिनर था, शराब उसका ज़रूरी हिस्सा था, इसलिए मुझे भी शराब पीनी पडी.”
वो बोले “ गुड...... इसमें इतना दुखी होने की क्या बात है? लाओ मेरे बैग में व्हिस्की की बोतल रखी है, आज बाप-बेटा जाम टकराते हैं.”
और उस शाम मैंने अपने पिताजी के साथ पहली बार ड्रिंक्स का आनंद लिया. १९८७ से लेकर १९९५ तक जब तक पिताजी ज़िंदा थे, हम जब भी साथ होते तो हफ्ते में दो तीन बार, मैं ड्रिंक्स में उनका साथ दिया करता था. कई देशों में घूमा,  फाइव और सेवन स्टार होटेल्स के बार में भी बैठा, इतने लोगों के साथ इतनी तरह के ड्रिंक्स लिए, लेकिन जो आनंद मुझे पिताजी के साथ घर में दरी पर या डायनिंग टेबल पर बैठकर, बिलकुल साधारण सी हिन्दुस्तानी व्हिस्की को पीकर आता था, वो आनंद उनके जाने के बाद कहीं नहीं मिला, कभी नहीं मिला.
माफी चाहता हूँ, मैं बहुत आगे बढ़ गया. ये तो बहुत बाद की बातें हैं मैं बात कर रहा था अपने कॉलेज के दिनों की. नेशनल थियेटर में रिहर्सल चल रही थे एक नाटक की. रिहर्सल के बाद, ड्रामा पर पैसा खर्च करने वाले पारीक जी, मोडू सिंह जी, डायरेक्टर सक्सेना साहब और कुछ कलाकार व्हिस्की पीने लगे और मैं उनके बीच हो रही ड्रामा की बातों से अपनी जानकारी बढाने लगा. 

बस इसीतरह रिहर्सल चलती रही.
कुल मिलाकर एक हफ्ता बचा था शो होने में और सक्सेना जी ने बताया कि उनकी बेटी रेखा आ रही है. अब कल से वो भी रिहर्सल में हिस्सा लेगी.
सभी लोग इंतज़ार कर रहे थे कि ड्रामा के सारे कैरेक्टर्स आ जाएँ और ड्रामा पूरी तरह से रिहर्स किया जा सके.
अगले ही दिन एक बहुत खूबसूरत लड़की, सक्सेना साहब के साथ आई. सक्सेना साहब ने सबसे उसका परिचय करवाया. सभी लोग बहुत सावधान होकर बैठ गए, जयपुर की एक खूबसूरत लड़की अब उनके साथ रिहर्सल जो करने वाली थी. जैसे ही उसका रोल आया, रेखा ने अपना डायलोग बोला.... और सक्सेना साहब जोर से चिल्लाये.
लड़की सहम गई. सक्सेना साहब बोले “किस तरह बोल रही हैं आप डायलॉग ? आपको यहाँ रोमांटिक होना है.”
लड़की खामोश खडी रही. सक्सेना साहब फिर चिल्लाये “रोमांस का अर्थ समझती हैं   ना?” 
रेखा बहोत सहमकर बोली “जी पापा.”
“तो ज़रा रोमांटिक हो कर बोलो ये डायलॉग.”

रेखा ने अपनी तरफ से थोड़ा रोमेंटिक होते हुए डायलॉग बोला. हम लोग रोजाना बिना रेखा के ही रिहर्सल कर रहे थे. उसकी प्रॉक्सी कभी सक्सेना साहब कर लेते थे और कभी कोई दूसरा आर्टिस्ट. अब आज एक तरफ तो एक दम एक नई लड़की आकर सामने खडी हो गयी थी और दूसरी ओर उसे डाँट भी पड रही थी. मैं बहुत हडबडा गया और जो डायलॉग हमेशा ठीक से बोलता था, सक्सेना साहब जिसकी तारीफ़ किया करते थे, आज वही डायलॉग कुछ इस तरह बोलने लगा मानो वो आगा हश्र कश्मीरी का कोई पारसी ड्रामा हो. मेरा डायलॉग सुनते ही सक्सेना साहब ठहाका लगा कर हंस पड़े. उन्हें लग गया कि मैं उनकी लड़की को देखकर नर्वस हो रहा हूँ. वो मेरे पास आये. रेखा का हाथ पकड़कर मेरे हाथ में दिया और बोले “महेंद्र, पारसी ड्रामा करना होगा तो मैं तुम्हें बताऊँगा. अभी तो ये तुम्हारी मोडर्न प्रेमिका है. इससे थोड़ा सॉफ्ट होकर बोलने की कोशिश करो. तुम को-एज्युकेशन में पढ़े हो?”
मैंने कहा “जी नहीं”
“अच्छा इसीलिये नहीं जानते हो कि रोमेंटिक होने का क्या अर्थ है?”
मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने अपने आपको सम्भाला और जितना हो सकता था, अच्छी तरह से डायलॉग बोला. एक दो बार रिहर्स करके मेरी डायलॉग डिलीवरी सही हो गयी.
सक्सेना साहब खुश हो गए और बोले “शाबाश...... बिलकुल इसी मूड को बना कर रखो...... इसी तरह तुम्हें पेश आना है अपनी प्रेमिका से.”
मैं बहुत असमंजस में था. बीकानेर एक छोटी सी जगह थी, जहां नाटकों की रिहर्सल के दौरान मर्दों को औरतों को छूने की भी इजाज़त नहीं रहती थी. बस रिहर्सल के आखिरी दिनों में डायरेक्टर ये समझा देता था कि औरत को किस  तरह से, कहाँ और कब, थोड़ी सी देर के लिए, अलामती तौर पर यानि प्रतीकात्मक रूप से छूना है.
एक दो दिन की रिहर्सल में सब कुछ ठीक हो गया. रेखा ने भी बिंदास होकर वो सीन करने शुरू कर दिए, जिनमे वो पहले दिन गडबडा रही थी. मेरी हिचकिचाहट भी काफी हद तक दूर हो चुकी थी. रिहर्सल में पूरा मज़ा आने लगा था.
इसी बीच सक्सेना साहब का बेटा अजय कार्तिक भी बीकानेर आ चुका था. अजय बहुत अच्छा आर्टिस्ट था, लेकिन उसकी एक ही कमजोरी थी और वो थी, उसकी आवाज़. सक्सेना साहब जैसे बुलंद आवाज़ इंसान के बेटे की आवाज़ बहुत ही फुसफुसी और कमज़ोर थी. वो जब बोलता था, तो पता ही नहीं लगता था कि वो मर्द है या औरत.
रिहर्सल पूरी हुई और नाटक के शो का दिन आ गया. शो बहुत अच्छा रहा. शो के बाद खाने और पीने का इंतज़ाम भी किया गया था, लेकिन सक्सेना साहब के बेटे अजय ने कहा “यार यहाँ इन बूढ़े लोगों के साथ बैठ कर क्या पियेंगे हम लोग? चलो कहीं और चलते हैं.” अब सवाल ये था कि कहाँ जाकर महफ़िल जमाई जाए. इधर पारीक सेठ जी ने बताया कि शिकार करके कुछ तीतर-बटेर मंगवाए गए हैं. नौजवान लोग अगर उनके साथ खाना नहीं खाना चाहते, तो हम में से एक आदमी नेशनल थियेटर चला जाए और खाना पैक करवा कर ले आये..

मैंने कहा, इन दिनों मैं घर में अकेला हूँ, आप लोग चाहें तो मेरे घर बैठकर खा पी सकते हैं. हनुमान पारीक, प्रदीप भटनागर, अजय कार्तिक और एक दो और नौजवान लोग, मेरे साथ मेरे घर आ गए. चौहान जी नेशनल थियेटर रुक गए ताकि खाने पीने का सामान वहाँ से लाया जा सके.
मेरे घर आकर हम लोग गपशप करने लगे. वक्त गुजर रहा था, लेकिन चौहान जी खाना लेकर नहीं आ ही नहीं रहे थे. सबके पेट में चूहे कूद रहे थे और सब व्हिस्की के लिए भी बहुत उतावले हो रहे थे. इंतज़ार करते करते एक घंटा गुजर गया. अजय बोला “यार अब भूख बर्दाश्त नहीं हो रही है.... कुछ करो.”
मैंने किचन में जाकर बिस्सा जी के मोटे भुजिया निकाले और पिताजी की अंदर रखी हुई व्हिस्की की एक बोतल निकाली. पैग बने और बिस्सा जी के मोटे भुजिया के साथ गले के नीचे उतरने लगे. आधा घंटा और गुजरा था कि छमछम करता पारीक जी का पर्सनल तांगा आकर घर के सामने खडा हुआ. मैंने दरवाजा खोला. देखा तांगे का ड्राइवर, चौहान जी का हाथ पकड़कर नीचे उतार रहा है. हम सबको फिक्र हुई कि आखिर चौहान जी को क्या हो गया है? वो बुरी तरह लडखडा रहे थे और तांगे के ड्राइवर से अपना हाथ छुडा रहे थे. कह रहे थे, “मैं नशे में नहीं हूँ...........देखो.... देखो महेंद्र जी...... देखो प्रदीप जी........आप...... आप भी .... देखो हनुमान जी..... मैं कहाँ नशे में हूँ..... ये देखो वन.......टू....थ्री....... और फ्रीज........... और इतना कहते ही धडाम से गिर पड़े. हम लोग उन्हें उठाकर अंदर लाये. पलंग पर लिटाया. ड्राइवर से पूछा कि क्या हो गया ये इन्हें? इतना नशा कैसे चढ गया? तो ड्राइवर ने पूरी बात बताई. उसने कहा “चौहान जी जब नेशनल थियेटर में आये, तो सक्सेना साब, हमारे पारीक साब और मोडू सिंह जी दारू पी रहे थे. सबने चौहान जी को कहा कि  खाना तैयार होने में थोड़ी देर है, तब तक एक दो पैग यहीं लगाकर चले जाओ, फिर वहाँ पी लेना और सब लोग खाना खा लेना. चौहान जी ने हाँ भर दी. मोडू सिंह जी ने एक ग्लास में पैग बनाकर चौहान जी को पूछा कि पानी कितना डालूँ? चौहान जी ने जवाब दिया “नहीं मैं पानी नहीं पीता”. मोडू सिंह जी भी नशे में तो थे ही, उन्हें चौहान जी की बात चुभ गयी. वो बोले “अच्छा चौहान जी, हम तो साले पानी ही पीते हैं....? जा रे छोरा..... अंदर बड़े वाली अलमारी में के के (राजस्थान की प्रसिद्ध शराब केसर कस्तूरी, जिसे राजपूतों में हर साल खरीदकर अंदर सहेजकर रख देने का रिवाज है, ताकि वो आगे आने वाली पीढ़ियों के काम आ सके) की बोतल पडी है, आज चौहान जी को शानदार दारू पिलाते हैं. लड़का एक बोतल निकालकर लाया जिसमे ४०-५० साल पुरानी शराब थी. मोडू सिंह जी ने एक बड़ा सा पैग बना कर चौहान जी को पूछा, “चौहान जी, केसर कस्तूरी में भी पानी नहीं?”
चौहान जी पता नहीं किस मूड में थे, बोले “नहीं हुकुम”
मोडू सिंह जी ने वो बड़ा सा पैग, चौहान जी को पकडा दिया. चौहान जी ने एक घूँट भरा....... अंदर तक आग की एक लकीर सी खिंच गयी लेकिन क्या कर सकते थे? पानी मिलाने से तो पहले ही इनकार कर चुके थे. किसी तरह एक पैग खतम किया. पुरानी केसर कस्तूरी फ़ौरन असर नहीं करती. इसलिए चौहान जी को कुछ खास पता नहीं लगा. मोडू सिंह जी को चौहान जी की बात इस क़दर लग गयी थी कि उन्होंने एक के बाद एक तीन चार पैग चौहान जी को पिला दिए. केसर कस्तूरी और वो भी ४०-५० साल पुरानी....... बस चौहान जी आधे घंटे में पूरी तरह उलट गए......पूरे अंटा गफील हो गए........ बड़ी मुश्किल से मैं इन्हें लेकर आया हूँ.  
सबने खाना खाया और सब मेरे घर पर ही पड़कर सो रहे. सुबह जब चौहान जी को ये सारा वाकया सुनाया गया तो उन्हें कुछ भी याद नहीं था. उसी दिन मैंने अपने मन में अहद किया , दारू नहीं पीनी, कभी नहीं पीनी, हालांकि मुझे पता नहीं था कि आने वाले २५ बरस में, ऐसा वक्त आएगा कि मैं अपने अहद पर टिका हुआ नहीं रह पाऊंगा .
तब से लेकर अब तक हम सभी कलाकार चौहान जी से जब भी मुलाक़ात होती है तो उन्हें एक बार तो ये पूछ कर छेड़ ही लेते हैं....... कैसे चौहान जी...... कैसे  वन टू थ्री ......... फ्रीज............ और हर बार वो खिसियाकर हंस पड़ते हैं.




Wednesday, June 22, 2016

ताने-बाने लोकेंद्र शर्मा की जिंदगी के- नौवीं कड़ी।

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उन्नीसवीं सदी के मध्य काल में ऐतिहासिक नगर चित्तौड़गढ़ के पास भांडपी नामक गांव था, जहां 
पंडित धुलीरामजी उपाध्याय रहते थे. इनके चार बेटे थे. नंदरामजी, रामरतनजी, लक्ष्मणजी और शोकिशनजी. लक्ष्मणजी के तीन बेटे थे - गौरीशंकरजी, मोहनलालजी और कजोड़ीमलजी.

गौरीशंकरजी मेरे दादाजी थे. दादी का नाम था, नोजबाई. मेरे पिताजी (बाउजी) अभी बच्चे ही थे कि दादाजी का स्वर्गवास हो गया. दादी (जिन्हें हम भाबा कहते थे), साड़ास में रहती थी. मैंने साड़ास को ही अपने पैतृक गांव के रूप में जाना.

दादाजी के भाई पंडित मोहनलालजी के तीन बेटे थे – मदनलालजी, चंदनलालजी और मुरलीधरजी. दादाजी के दूसरे भाई कजोड़ीमलजी के दो बेटे थे – भैरूलालजी और विष्णुदत्तजी. ये पांच बाउजी के चचेरे भाई थे. बाउजी अपने पिता पंडित गौरीशंकरजी के अकेले बेटे थे और उनकी एक ही सगी बहन थी चंद्रप्रभा देवी, जिन्हें हम बुआजी कहते थे. पंडित गौरीशंकरजी उदयपुर रियासत के कोतवाल थे. बुआजी की शादी का ज़िक्र करते समय मैं बता चुका हूं कि दादाजी पंडित गौरीशंकर जी को जाने कैसे अपने अंत का पूर्वाभास हो गया था, इसलिए अपने सामने ही उन्होंने बेटी (हमारी बुआजी) की शादी चार बरस की उम्र में ही करवा दी थी और बेटे (हमारे बाउजी) का रिश्ता भी उसी समय बरुंदनी की धापूबाई के साथ तय करवा दिया था. दादाजी के गुज़र जाने के कुछ बरस बाद बाउजी का भी बरुंदनी की धापूबाई के साथ विवाह हो गया. यह उस दौर की बात है, जब किसी एक घर का दामाद सारे गांव का दामाद माना जाता था और किसी एक घर की लड़की सारे गांव की बेटी होती थी. धापूबाई के सगे भाई तो एक ही थे, पुरुषोत्तमलालजी, लेकिन परम्परानुसार बाउजी पूरी बरुंदनी के दामाद थे.

बाउजी जब थोड़े बड़े हुए, थोड़ा पढ़-लिख गए, कुछ गांव-शहरों में घूम लिए, तब जाने क्यों उन्हें अपनी पत्नी धापूबाई का नाम कुछ अच्छा नहीं लगा और उन्होंने अपनी पत्नी का नया नाम रखा, प्रेमलता. मुझे याद है अपनी पहली पत्नी के बारे में बाउजी जब भी हमसे बात करते, उन्हें ‘तुम्हारी पहली मां’ कहकर संबोधित करते. हमारी पहली माँ, प्रेमलता को जीवन में बाउजी कभी नहीं भूल पाए. उनके लिए बाउजी के मन में अगाध प्रेम था और उनके इस प्रेम की आलोचना का मैंने स्वयं को कभी अधिकारी नहीं माना, बल्कि पहली पत्नी के प्रति बाउजी का अनुराग, मुझे अक्सर स्तुतियोग्य लगा. जो लोग प्रेम को, केवल देह से जोड़ने की संकीर्ण मनोवृत्ति में जीते हैं, उन्हें मेरी बात ज़रा मुश्किल से ही समझ में आएगी. मुझे लगता है, जो लोग बिस्तर के दायरे से बाहर के प्रेम की कल्पना नहीं कर सकते, वो बड़े अभागे होते हैं. जीवन भर जिसे वो प्रेम समझते हैं, वो देहसीमा से बंधा कर्त्तव्य होता है, आत्मा को छू भी नहीं पाता. ऐसे कुछ देहजीवी मेरे परिवार के पल्ले भी पड़े हैं. जिनके प्रेम की परिभाषा पर, क्रोध से अधिक, मुझे दया आती है. बाउजी ने दूसरी शादी की, नया घर-संसार बसाया, गृहस्थ बने, लेकिन इस बात के कारण, अगर कोई यह कहे कि अपनी पहली पत्नी याद करना उनके लिए पाप है, तो ऐसे सोच को मैं बीमार मानसिकता के अतिरिक्त और क्या कहूं. अलौकिक प्रेम तो अंतर्मन का मंदिर है और मंदिर में हो रही पूजा से, कोई आहत कैसे हो सकता है.

बाउजी ने मेरी जन्मदायिनी माँ पर कभी हाथ उठाना तो दूर, उनसे कभी ऊँचे सुर में भी बात नहीं की. जीवन भर वे पति और पिता के कर्तव्य से रत्ती भर भी नहीं डिगे. घोर आर्थिक-संकट के समय भी उन्होंने संघर्ष को ईश्वर का उपहार माना और हमें भी यही मानना सिखाया. आदर्श की बाउजी ने कोरी बातें ही नहीं की, अपने जीवन को आदर्श का पर्याय बना कर दिखाया. कभी-कभी सोचता हूँ, तपस्वी  जंगलों में ही नहीं, घरों में भी रहते हैं.

अपनी पहली पत्नी से बाउजी को कोई संतान नहीं मिल पाई थी. अगर होती, तो वो हमारे लिए सौतेला भाई या बहन होती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पहले प्रसव के दौरान ही प्रेमलता जी और उनके नवजात दोनों का देहांत हो गया था.

दुनिया की दूसरी जंगी लड़ाई शुरू होने से पहले बाउजी दिल्ली के जिस मोहल्ले में रहते थे, उसका नाम था फ़राशख़ाना. फ़राशख़ाने की एक गली में पांच मंज़िला इमारत थी, जिसकी चौथी मंज़िल पर पंडित दयानंद जोशी का घर था. बाउजी इन्हीं के यहां किरायेदार थे. जोशी जी रेलवे में काम करते थे. बाउजी की पहली पत्नी प्रेमलता जी के देहांत को कई बरस हो चुके थे और लोग उनसे दूसरा विवाह करने का इसरार कर रहे थे. पंडित दयानंद जोशी और उनकी पत्नी बाउजी को पुत्रवत मानते थे और उनका भी विचार था कि बाउजी को विवाह करके गृहस्थी बसा लेनी चाहिए. इसी बीच मथुरा की होली वाली गली के निवासी चंद्रभानजी के घर से रिश्ता आया. रिश्ता आया कहना शायद ठीक नहीं, असल में, लड़की पसंद करने के लिए एक तस्वीर भेजी गई थी.
                                       




                             

तस्वीर पसंद आई, तो रिश्ते की बात आगे बढ़ी और लड़की वालों ने अपने परिवार के सबसे समझदार आदमी रेवतीभानजी को लड़का देखने के लिए फ़राशख़ाने भेजा. रेवतीभानजी ने बाउजी को देखा, जांचा-परखा और पंडित दयानंद जोशी से बात पक्की कर ली. जाते समय अपने घरवालों को दिखाने के लिए वे बाउजी की तस्वीर साथ लेते गए.

                                                

इसके कुछ ही दिनों बाद बाउजी (पंडित हरिबल्लभ शर्मा) और भाभी (श्रीमती शांता देवी) पति-पत्नी बन गए. दूल्हे के माता-पिता का दायित्व श्री और श्रीमती दयानंद जोशी ने निभाया. दुल्हन विदा होकर उन्हीं के घर में आई और उन्हीं के घर में बाउजी की नई गृहस्थी का आरंभ हुआ.

घर चौथी मंज़िल पर था और आंगन की जगह बहुत बड़ा आयताकार जाल बिछा था. जाल से नीचे झाँकने पर तीन और जाल दिखाई देते थे. पुरानी दिल्ली के अधिकांश मकानों की बनावट ऐसी ही है. हर मंज़िल पर लोहे का जाल और जाल के चारों तरफ़ कमरों की कतारें. इस मकान में भी जाल के तीन तरफ़ कमरों की कतारें थीं और चौथी तरफ़ नीचे उतरती हुई सीढ़ियां. सीढ़ियों के सामने वाले कमरों में बाउजी की गृहस्थी थी और बाकी दो हिस्सों में, आमने-सामने बरामदे और बरामदे के पीछे वाले कमरे पंडित दयानंद जोशी के पास थे.

हमारी मां, शांता देवी और बाउजी की आयु में बारह वर्ष का अंतर था. मां का बचपन मथुरा की होली वाली गली में बीता था. इसी गली में पंडित चंद्रभानजी रहते थे जिनकी दो संतानें थीं. एक हमारी मां शांता देवी और दूसरे मामा गोपालजी. हमारे नाना चंद्रभान जी के दो भाई थे – बड़े भाई सूरजभान जी और छोटे भाई प्रतापभानजी. प्रतापभान जी की अपनी कोई संतान नहीं थी. सूरजभान जी के तीन बेटे थे, उदयभान, रेवतीभान और मोतीभान और एक बेटी भी थी राधिका. लेकिन राधिका देवी का 1950 में देहांत हो गया और चचेरी ही सही, भाभी के रूप में भाइयो के बीच एक ही बहन बची. रेवतीभान मामाजी इस कुटुंब में सबसे अधिक पढ़े-लिखे और संपन्न थे, शायद इसीलिए रिश्ता पक्का करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं को सौपी गई थी. चूंकि रिश्ता तय करने में भूमिका निभाई थी, इसीलिए रेवतीभान जी अपनी बहन के सुख-दुःख की खबर भी लेते रहते थे.

दिल्ली के फ़राशखाने में अपनी नई गृहस्थी आरम्भ किए जाते समय, बाउजी दरियागंज में जवाहरात की एक दूकान में काम करते थे. इसके मालिक थे एक मिर्ज़ासाहब. मिर्ज़ासाहब क़रीब-क़रीब एक तिहाई दरियागंज के मालिक थे. उन के पास इस इलाक़े में कई दूकानें और मकान थे, जिनके किराएदारों से हर महीने किराया-वसूली का काम भी बाउजी के ज़िम्मे था. मिर्ज़ासाहब के कुछ रिश्तेदार इस बात से नाख़ुश भी थे कि ख़ुद मुसलमान होकर मिर्ज़ासाहब एक हिंदू पर इतना ऐतबार करते हैं. यहां तक कि ज़ेवरात की दूकान भी उसके सुपूर्द की हुई है और हज़ारों रुपए का किराया वसूल करने का काम भी उसी को सौंपा हुआ है. सुनकर मिर्ज़ासाहब हंसते और कहते, “मुसलमान का मतलब क्या है? जिसका ईमान मुसल्सल हो, वोही ना? इस ऐतबार से जिसको तुम हिंदू कहते हो, उससे बेहतर मुसलमान मुझे दिखा दो, तो मैं उसे रख लूंगा.” मिर्ज़ासाहब बाउजी को बेटे की तरह प्यार करते थे. बाउजी भी बचपन से पितृहीन रहे थे, शायद इसलिए हर बुज़ुर्ग में अपने पिता की छवि देखते और बेटे जैसा प्यार पाने में कामयाब हो जाते. इधर मिर्ज़ासाहब और उधर पंडित दयानंदजी जोशी, दोनों बाउजी को पुत्रवत मानते थे.

सन् 1943 में दूसरा विश्व युद्ध जवानी पर था और धरती के एक बड़े भू-भाग पर हिटलर की फ़ौजें तोप-गोले बरसा रही थी. उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का शासन था. अगर ब्रिटिश फ़ौजें हार जाती, तो फिर भारत, ब्रिटेन की जगह जर्मनी का ग़ुलाम हो जाता. युद्ध का अंत क्या होगा और इतिहास कौन सी करवट लेगा, यह कोई नहीं जानता था, फिर भी राजधानी होने के कारण दिल्ली में एक अजीब भय का वातावरण छाया हुआ था. लोग अक्सर बातें करते कि हिटलर एक न एक दिन दिल्ली पर ज़रूर बम बरसाएगा. बाउजी की नई गृहस्थी अभी आरंभ हुई ही थी. सन् 40 में मुन्नी का और 42 में मेरा जन्म हो चुका था. बाउजी के मन में विचार आया कि अगर अंत होना ही है, तो जीवन के आख़िरी दिन अपने घर-गांव और अपने लोगों के बीच बिताने चाहिए. इसी सोच के कारण एक दिन उन्होंने दिल्ली छोड़कर भीलवाड़ा जाना तय कर लिया. शायद तब मेरी आयु लगभग एक वर्ष की रही होगी, जब हम भीलवाड़ा के भोपालगंज में आकर बसे और यहीं मेरी चेतना ने जागना और संसार को देखना शुरू किया.

हमारे भीलवाड़ा आने के लगभग दो बरस बाद ही हिटलर की हार हो गई और विश्वयुद्ध समाप्त हो गया. युद्ध में जीत या हार किसी की भी हो, तबाही दोनों ही पक्षों को झेलनी पड़ती है. मित्रराष्ट्रों की जीत बेशक हुई थी, लेकिन युद्ध के ज़ख्मों ने उन्हें भी बुरी तरह घायल कर दिया था. जीत का सेहरा भले ही चर्चिल के सिर पर भी बांधा गया, लेकिन युद्ध से थका-हारा ब्रिटेन भीतर से खोखला हो चुका था. युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों ने गांधी जी के साथ एक मौखिक समझौता किया था कि यदि ब्रिटिश सरकार की जीत हुई, तो भारत को आज़ादी दे दी जाएगी, लेकिन इसे पाने के लिए गांधी जी को हिन्दुस्तान के नौजवानों से ये कहना पड़ेगा कि वे अधिक से अधिक संख्या में ब्रिटिश फ़ौजों में भर्ती हों और हिटलर के ख़िलाफ़ लड़ें. 1945 में जब विश्वयुद्ध समाप्त हो गया, तब गांधी जी ने अंग्रेज़ों को उनका वादा याद कराया और इस तरह भारत को आज़ादी देने की प्रक्रिया शुरू हुई. सच पूछिए तो युद्ध के कारण अंग्रेज़ ख़ुद इतना कमजोर हो चुका था कि भारत के बोझ को उठाने की उसमें ताब नहीं थी. कुछ इतिहासकारों का तो यह भी कहना है कि भारत ने आज़ादी ली नहीं, अंग्रेज़ भारत से अपनी जान छुड़ा कर भाग गया.

जो भी हो सन् 47 में भारत आज़ाद हुआ और साथ ही बंटवारे के दंगों का खूनी नाच भी शुरू हुआ. भीलवाड़ा में बाउजी की ‘एच बल्लभ एंड कंपनी’ ने नाम और दाम कमाने शुरू किए ही थे कि शर्णार्थियों की आमद से कंपीटीशन बढ़ा और व्यापार की लगाम बाउजी के हाथ से फिसलने लगी. इसके बाद परिवार भी बढ़ा और बाउजी का संघर्ष भी. पिछले ग्यारह-बारह बरस में साबुन, दूध, अभ्रक, खेती का सामान, यूरिया-खाद, साइकिलें, सीमेंट की चद्दरें और ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड - व्यापार के जाने कितने मोर्चों पर हारने के बाद बाउजी ने एक बरस खेती करते हुए झोपड़ी में भी बिताया. जहां से एक दिन वे थके-हारे-टूटे, बीमार बदन के साथ वापस लौटे. उन दिनों बाउजी बिस्तर पर पड़े जाने क्या सोचा करते. शुक्लाजी के इस मकान में केवल दो ही कमरे थे और बाउजी को आराम मिल सके, ऐसी सुविधा भी नहीं थी. घासीरामजी ताऊजी ने दो-तीन मकान छोड़कर एक दूसरे मकान का इंतज़ाम किया, जिसमें कमरे भी तीन थे और किराया भी कम था. हमलोग अब इस नए मकान में चले गए. बगल के कमरे में एक दक्षिण भारतीय रेड्डी साहब रहते थे. उसके आगे एक नौजवान बीडीओ साहब अपनी नई नवेली दुल्हन के साथ बसे हुए थे. यह मकान प्रताप टॉकिज के इतना नज़दीक था कि रात को जब हम छत पर सोते, तो कभी-कभार सिनेमा घर से छनकर आते फ़िल्म के संवाद और गाने भी सुनाई दे जाते.

बाउजी थोड़ा चलने-फिरने तो लगे थे, लेकिन बहुत बुझे-बुझे रहते. उनके तन-मन की हालत देखकर भाभी की आंखें बार-बार छलक आतीं. सीधे-सच्चे और ईमानदार होने की ऐसी सज़ा क्यों मिली बाउजी को. क्या ऊपर वाले के दरबार में सचमुच कोई न्याय नहीं है? बुआजी भी उदयपुर में थीं. भाभी अपना दु:ख किसके साथ बांटती. एक दिन कुछ सोचकर, सबके सो जाने के बाद चुपके से, रात को लालटेन की रोशनी में, भाभी ने दिल्ली निवासी अपने चचेरे भाई रेवतीभानजी शर्मा को एक खूब लंबी चिट्ठी लिखी. जिसमें अपना सारा दु:ख-दर्द बयान कर दिया. चिट्ठी का जवाब तार से आया. तार में रेवतीभान मामाजी ने लिखा था कि बाउजी वापस दिल्ली आ जाएं. तार पढ़कर बाउजी काफ़ी सोच में पड़ गए. एक दो दिन ही और बीते होंगे कि रेवतीभान मामाजी का भेजा हुआ एक मनीआर्डर मिला, जिसके साथ यह संदेश भी लिखा था, ‘यह दिल्ली आने का रेल किराया है. अब बिना बिलंब किए बाउजी को दिल्ली आ जाना चाहिए.’ काफी सोच विचार के बाद बाउजी ने भी यही उचित समझा कि रेवतीभानजी के सुझाव को स्वीकार कर लिया जाए.

ग्यारह-बारह बरस पहले, जाने क्या-क्या सोचकर बाउजी दिल्ली से भीलवाड़ा आए थे और अब हालात ऐसे बने कि वापस दिल्ली जाने को लाचार थे.

बाउजी दिल्ली चले गए. बुआजी उदयपुर में थीं और अशोक भी उन्हीं के पास था. मुन्नी भाभी के साथ फुन्नू को गोद में लिए स्कूल चली जाती और पीछे से मैं हर प्रकार की बदतमीज़ी करने के लिए आज़ाद हो जाता. घर में पुराने वक्तों की एक साइकिल पड़ी थी, जिसे गिरते-पड़ते मैंने थोड़ा-बहुत चलाना सीख लिया था. साइकिल चलाने में मुझे बहुत मज़ा आता था. कानों के पास से फर्र-फर्र करके हवा पीछे दौडती, तो जादू सा लगता. किसी न किसी बहाने साइकिल लेकर मैं आवारागर्दी करने निकल पड़ता. चेतू को घर में अकेला बंद करके बाहर चले जाने की बात पर, स्कूल से आने के बाद भाभी खूब चिल्लाती, दुखी होती और मेरे ढीठपने से हारकर रोने बैठ जाती, लेकिन मेरे स्वभाव पर इसका कोई असर नहीं पड़ता था. आज सोचता हूं तो लगता है, जितनी नाफ़रमानी और बदतमीज़ी मां के साथ मैंने की, घर में शायद ही किसी और ने की हो.

घर के सामने पहली मंज़िल पर एक संपन्न परिवार रहता था. घर की बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पीछे मैंने गोटे-किनारी के चमचमाते कपड़ों में ख़ूब सजी-संवरी औरतें देखी थीं. रात को इसी घर से खूब ज़ोर से  रेडियो बजने की आवाज़ आती. कभी गाने सुनाई देते और कभी-कभी ऐसा लगता जैसे किसी फ़िल्म के साउंड ट्रैक जैसी ड्रामाई आवाज़ें आ रही हैं. यह तो मैंने कई बरस बाद जाना कि भीलवाडा के उस घर जो आवाज़े मैंने सुनी, वो फिल्म की नहीं रेडियो-नाटक की होती थीं, जो आकाशवाणी जयपुर से प्रसारित होते थे. लेकिन तब मुझे कहाँ पता था कि रेडियो-नाटक किस बला का नाम है.

जाने कहां मैंने विलायती ओपेरा के गाने सुन लिए थे और सोचता था की ऐसा रोना-पीटना तो मैं भी मचा सकता हूँ. एक दिन भाभी, मुन्नी, चेतू और फुन्नू के सामने ओपेरा जैसा ‘आआआआआ...’ करके मैंने अपने अंग्रेज़ी गायन का रौब जमाने की कोशिश की. ऊंचे सुर में चिंचिंयाती मेरी आवाज़ मोहल्ले में दूर तक सुनाई दी और तभी सामने के घर से दौड़ती हुई, दो औरतें हमारे घर में घुस आईं. उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. पूछा, “हाय राम क्या हो गया?” तब तक मैं तो चुप हो चुका था, लेकिन भाभी उनके आने का कारण समझकर हंसी के मारे लुढ़की जा रही थीं. औरतें भी छाती पर हाथ रखकर धम से बैठ गईं और पूछा, “कौन? ये मुन्ना आवाजें निकाल रहा था?” फिर मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, “क्यों रे ऐसी आवाज़ें निकालता है? हमारा तो कलेजा मुंह को आ गया. लगा, पता नहीं क्या अनहोनी हो गई.”
मैं मुस्कुराते हुए झेपने का नाटक कर रहा था. गोटे-किनारी वाली उन औरतों को अपने नज़दीक देख कर दिल में गुदगुदी भी हो रही थी. उधर भाभी की हंसी नहीं रुक रही थी. मुन्नी और चेतू भी खी-खी कर हंसे जा रहे थे. फिर वो औरतें भी हंसने लगीं.

अशोक बुआजी के पास उदयपुर में था, लेकिन उसका भी अकेले वहां मन नहीं लगता था. एक बार मैंने उदयपुर जाने की ज़िद की. लड़-झगड़ कर भाभी से टिकट के पैसे लिए और जाकर ट्रेन में बैठ गया. बुआजी और अशोक दोनों मुझे आया देखकर चौंक गए. बुआजी ने सबसे पहले ये पूछा, “अकेला आया है?” अब तक मैं चालाकियां सीख चुका था, इसलिए कहा, “हां, आपकी याद आ रही थी, सो मिलने आ गया”. भोली बुआजी ख़ुश हो गई और लाड़ से घर के भीतर ले गई. अगले दिन बुआजी तो अपनी ट्रेनिंग के लिए मेडिकल सेंटर चली गईं और अशोक ने मुझे उदयपुर दिखाने की योजना बनाई.

दिन भर इधर-उधर घूमते हुए हमने महाराणाजी का महल, सहेलियों की बाड़ी, पिछोला झील और झील के बीच में बने हुए जगमंदिर, जगनिवास और जाने क्या-क्या देख डाला. अशोक मेरे आने से बहुत उत्साहित था, लेकिन दो-चार दिन बाद ही मुझे वापस लौटना था. जाते-जाते मैं अशोक को बता गया कि इस बार गर्मी की छुट्टियों में हम सब दिल्ली जाने वाले हैं.

मेरे भीलवाड़ा वापस लौटने के कुछ ही दिनों बाद गर्मी की छुट्टियों के कारण स्कूल बंद हो गए और भाभी को भी दो महीने की फ़ुर्सत हो गई. अब जैसा कि सोचा हुआ था, हमने दिल्ली के लिए बिस्तर-पेटी बांधने शुरू किए. ये तैयारी चल ही रही थी कि एक दिन आधी रात को अशोक उदयपुर से भाग कर चला आया. हम सब दिल्ली चले जाएं और वो अकेला उदयपुर में सज़ा काटे, ये कैसे हो सकता था. पहले तो भाभी ने उसे ख़ूब भला-बुरा कहा, फिर जैसा कि वो करती थीं, चुप होकर बैठ गईं. 1956 के जून का तीसरा हफ्ता शुरू हुआ और हम दिल्ली जाने के लिए ट्रेन में सवार हो गए. उन दिनों ट्रेनों में ऐसा भीड़-भड़क्का नहीं होता था. आराम से हम अजमेर पहुंचे. गाड़ी अजमेर तक ही जाती थी. अब हमें इसे छोड़कर दूसरी ट्रेन में सवार होना था. उतरकर हम दिल्ली जाने वाली गाड़ी के प्लेटफॉर्म पर पहुंचे और उसमें सवार हुए. भीड़-भाड़ इस गाड़ी में भी नहीं थी. ट्रेन का इतना लंबा सफ़र जीवन में मैं पहली बार कर रहा था. दिल्ली के बारे में कितनी सारी बातें सुन रखी थी. सारी बातें एक-एक करके याद आ रही थी. भीतर जिज्ञासा के बादल घुमड़ रहे थे. सुना था, दिल्ली में रहने वालों का रंग गोरा हो जाता है. रोमांच के कारण रात को देर तक नींद नहीं आई. मैं खिड़की से बाहर झांकता हुआ, अंधेरी रात में चांद को ट्रेन के साथ-साथ दौड़ते हुए देखता रहा. 16 जून 1956 की सुबह लगभग आठ बजे हमारी गाड़ी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के छोटी लाइन वाले प्लेटफॉर्म पर पहुंची. भाभी के बड़े चचेरे भाई उदयभानजी के बेटे किशन हमें लेने स्टेशन आए थे. उन्हीं के साथ हम सामान उठाकर बाहर आए और तांगे में बैठकर चांदनी चौक पहुंचे.

चांदनी चौक पुरानी दिल्ली का ऐतिहासिक बाज़ार है. जितना ऐतिहासिक है उतना ही मशहूर भी. चांदनी चौक के ठीक मध्य में कभी एक घंटाघर होता था, लेकिन कुछ बरस पहले ढह गया था. फिर भी इस चौराहे का नाम घंटाघर बना हुआ था. घंटाघर चौराहे पर सामने टाउन हॉल नाम की भव्य इमारत थी - अंग्रेज़ों के ज़माने की. अब टाउन हॉल में दिल्ली कॉर्पोरेशन का दफ़्तर था. चौराहे से बायीं तरफ़ मुड़ने पर सड़क सीधे लालकिले तक जाती है और दायीं तरफ़ मुड़ कर फ़तहपुरी मस्जिद तक पहुंचती है. सामने की तरफ़ एक पतली सड़क थी, जिसका नाम था ‘नईसड़क’. ये किताबों, ख़ास तौर पर स्कूल-कॉलेज के कोर्स की किताबों का सबसे बड़ा बाज़ार है. बायीं तरफ़ मुड़ते ही एक ग़ली सी थी - कटरा नील. इसके आगे तीन-चार इमारत पार करते ही हिमाचल रेस्टोरेंट का बोर्ड नज़र आ गया. रेवतीभान मामाजी इसी रेस्टोरेंट के मालिक थे. सीढ़ियां चढ़ते ही सामने रेस्टोरेंट का कांच वाला दरवाज़ा दिखाई दिया. रेस्टोरेंट के बाहर से ही रेलिंगदार सीढ़ियां करवट सी ले कर, ऊपर मामाजी के घर तक चली गयी थीं. रेस्टोरेंट पहली और घर तीसरी मंज़िल पर था.

मामाजी ने बाउजी को भीलवाड़ा से बुलवाकर हिमाचल रेस्टोरेंट में मैनेजर के रूप में नियुक्त कर दिया था. सुबह-सुबह बाउजी खारीबावली  जाते और रेस्टोरेंट के लिए ढेर सारी तरकारियाँ ख़रीदकर लाते. वैसे तो खारीबावली राशन और मसालों के थोक व्यापार का बाज़ार था, लेकिन सुबह-सुबह सड़क के दोनों तरफ़ सब्ज़ीवालों का पटरी-बाज़ार लगता था. सब्ज़ियां एक झल्लीवाले की मदद से रेस्टोरेंट तक पहुंचाई जातीं. दिल्ली की भाषा में झल्ली का मतलब है, बड़ी सी टोकरी. बाउजी का एक स्थाई झल्लीवाला था. बाउजी जहां-जहां से सब्ज़ियां ख़रीदते, झल्लीवाला उनके पीछे-पीछे अपनी टोकरी लेकर चलता और सब्ज़ियाँ उसमें भरता जाता. सब्ज़ियां रेस्टोरेंट तक पहुंचाने के कुछ देर बाद, नहा-धो कर बाउजी काउंटर पर बैठ जाते और रेस्टोरेंट में सुबह के चाय-नाश्ते के लिए ग्राहकों की आमद शुरू हो जाती.

मामाजी का घर बहुत बड़ा नहीं था. बस एक आयताकार बड़ा सा कमरा, एक छोटा कमरा और दोनों को जोड़ती हुई एक छत. छोटे कमरे के सामने रसोई, स्नानघर और संडास था. जीवन में पहलीबार फ्लश वाला संडास मैंने यहीं देखा. छत के एक किनारे पर लोहे की रेलिंग थी, जिससे झांकने पर नीचे चांदनी चौक का बाज़ार दिखाई देता था. सड़क के दोनों तरफ़ पेड़ों की कतारें थी ओर इन्हीं कतारों की बगल में बिछी पटरी पर ट्रामें चलती थी. लोगों को सामने से हटाने के लिए टनटन करती, आगे बढ़ती ट्राम मुझे बहुत आकर्षक लगती. मैं देर तक ट्रामों को आते-जाते देखा करता. मामाजी के बड़े कमरे में दो पलंग थे, जिनकी बगल में ठिगने क़द की अलमारी जैसा एक रेडियोग्राम रखा था. इसे देख कर मुझे भीलवाड़ा  वाला ग्रामोफोन याद आता. कमरे में दूसरी ओर एक पूजा का कोना था. इसी कोने में किसी दाढ़ी वाले साधु की विशाल तस्वीर लगी हुई थी. मामाजी रोज़ इस तस्वीर के आगे बैठकर ध्यान लगाते थे. मुझे ये तस्वीर कुछ-कुछ रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसी लगती थी, लेकिन बाद में बताया गया कि ये महर्षि अरविंद हैं. मामाजी श्रीअरविंद को बहुत मानते थे. यहां तक कि उन्होंने अपनी लड़कियों की तालीम भी पांडीचेरी के श्रीअरविंद आश्रम में करवाई थी. उनकी दो बेटियां विनोद और अंजना तो इस समय भी आश्रम में ही रह रही थीं. दिल्ली में मामाजी के जिन बच्चों से मेरा सामना हुआ, उनमें सबसे बड़ी थी सरोज बहन, फिर मंजू बहन, इसके बाद उनका भाई अरुण और सबसे छोटी अर्चना, जिसे सब बेबी कहते थे. सरोज बहन और मंजू बहन भी कुछ समय श्रीअरविंद आश्रम में बिता चुकी थीं. मामीजी (श्रीमती कृष्णा देवी) भारी बदन की, बेहद शांत और ख़ूब प्यार करने वाली महिला थीं. घर में नानीजी भी थीं, जो एक तरह से घर की मालकिन थीं और सब पर हुकुम चलाया करतीं. रसोईघर वे ही संभालती थीं और इसमें कोई शक नहीं, खाना बहुत अच्छा बनाती थीं. नानीजी रेवतीभान मामाजी की सगी मां नहीं थीं. असल में वो उनकी चाची थीं. चाचा प्रतापभानजी के देहांत के बाद नि:संतान चाची को मामाजी ने अपने पास बुलवा लिया था और उन्हें पूरी तरह से मां का दर्जा दिया हुआ था. नानीजी रोज़ सुबह चार बजे उठकर पैदल-पैदल जमुनाजी नहाने जातीं और लौटने पर सीधे रसोई संभालने में जुट जातीं.

मामाजी को जानवर पालने का भी ख़ूब शौक था. सुना है कि पहले एक तोता रखा था. एक बंदर भी पाला था और जिन दिनों हम चांदनी चौक के इस घर में पहुंचे, एक एप्सो नस्ल का कुत्ता पाला हुआ था. उसका नाम सोनी था. सोनी से सब लोग प्यार करते थे और वो था भी खिलौने जैसा. पहले दिन तो वो हमें देख कर खूब भौंका, लेकिन अगले दिन से पुचकारने पर पूंछ हिलाने लगा. अरुण और बेबी रोज़ शाम सोनी को घुमाने के लिए कंपनीबाग जाते थे. अब मैंने भी उनके साथ जाना शुरू कर दिया. सोनी को घुमाने से ज्यादा मज़ा मुझे आता था, कंपनीबाग के उन झूलों में, जिनपर झोंटे लेना मैं कभी नहीं भूलता.

हरा-भरा कंपनीबाग़, कारपोरेशन की इमारत के पीछे दूर तक फैला हुआ था. जहां इसका फैलाव ख़तम होता था, वहां एक चौड़ी सड़क थी और सड़क के उस पार था, पुरानी दिल्ली का रेल्वेस्टेशन. स्टेशन की भव्य इमारत दूर से ही दिखाई दे जाती थी. सड़क के कम्पनीबाग़ वाले किनारे पर ही थी, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी. शाम को अक्सर मैं अरुण के साथ लाइब्रेरी जाया करता. किताबों से अटी ढेरों आलमारियों के गलियारे मुझे खासे रहस्यमय जान पड़ते. तब यह पता नहीं था कि आने बरसों में ये गलियारे मेरे पठन-पाठन की दिशा निर्धारित करने वाले थे. हिंदी कथा साहित्य की अंगुली मैंने यहीं थामी. अन्य देसी और विदेशी भाषाओं के अनूदित कथा साहित्य से भी मेरा परिचय यहीं हुआ. उन दिनों की एक और घटना मुझे याद है, जिसने कई दिनों तक मुझे मुदित रखा. लाइब्रेरी में बाल-साहित्य का एक नया कक्ष खुला था. मैं और अरुण इसी कक्ष की नयी मेज़-कुर्सी पर आसीन होकर, किताबों को उलट-पुलट रहे थे कि तभी दरवाज़े के बाहर कुछ हलचल हुई. हमने देखा, खादी के कुरते-पाजामे में सजे एक चश्माधारी महाशय ने कक्ष में प्रवेश किया. साथ में और भी कई लोग थे. आगे-पीछे कैमरेवालों का दल भी था. महाशय ने कक्ष को मुआइने के अंदाज़ में देखा, फिर हमारी मेज़ के पास आकर खड़े हो गए. कैमरेवालों की कई फ्लेश-लाइटें चमक उठीं. फोटो खींचे जा रहे हैं, यह जान कर मैंने अपना हाथ ठोड़ी पर रख कर पोज़ बना लिया. पास खड़े अरुण ने भी मुस्करा कर कैमरे की तरफ देखा, लेकिन फ्लेश की चौंध में उसकी आँखें बंद हो गई.
         
ये सज्जन कौन थे, क्या करने आये थे और फोटो क्यो खींचे गए थे, ये सारी बातें हमें अगले दिन ‘नवभारत टाइम्स’ के मुखपृष्ठ ने बताई, जहां हमारा फोटो छपा था. तस्वीर के साथ समाचार भी था कि भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री श्री बी वी केसकर ने, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के नए बाल-कक्ष का उदघाटन किया. तब मंत्रीजी के साथ फोटो खींचे जाने से ज्यादा ख़ुशी इस बात की हुई थी कि मेरा फोटो अखबार में छपा. ख़ुशी का कारण मेरी यह जानकारी थी कि अखबार में तो फोटो केवल बड़े लोगों के ही छपते हैं.

इस घटना के बाद मुझे यकीन होता हुआ सा लगा कि अब मेरे ‘बड़ा आदमी’ होने में ज्यादा देर नहीं है. 

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