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Thursday, November 25, 2010

ये ख़ामोशी श्रोताओं का सरासर अपमान है.





दो दिन सूने सूने निकल गये. ऐसा संगीत मैं सुनता नहीं जो सिवा धक-धक के कुछ और न बजाता हो.
आकाशवाणी के कर्मचारियों ने अपनी मांगों को मनवाने के लिये स्टुडियोज़ और उनमें चलने वाली मशीन को ख़ामोश कर दिया. उनकी ज़रूरतों और मांगों को लेकर मेरे मन में कोई विरोध नहीं लेकिन जो प्रसारणकर्मी हरदम अपने ट्रांसमिशन्स में श्रोताओं को अपनी ताक़त बताते हों वह दावा इन दो दिनों में निहायत असत्य और छद्म भरा महसूस हुआ. मेरे दफ़्तर और घर में कुछ जमा चार रेडियो सेट्स हैं और सुबह काम शुरू होने से लेकर शाम तक विविध भारती या क्षेत्रीय प्रसारण जारी रहता है. रेडियो के चलते कभी घड़ी पर नज़र डालने की ज़रूरत नहीं पड़ती और काम कभी बोझिल प्रतीत नहीं होता.आकाशवाणी दुनिया जहान की हलचलों से हमें बाख़बर भी करता जाता है...समाचार सुना देता है...स्कोर बता देता है. दु:ख तो इस बात का है कि इसी हड़ताल के दौरान बिहार चुनाव के परिणाम भी आने वाले थे और इसी दौरान आकाशवाणी ने गूँगा बनकर अपने सबसे बड़े श्रोता नेटवर्क को निराश ही नहीं किया गँवाया भी. काम निपटाते हुए रेडियो एक अच्छा साथी बन जुगलबंदी करता रहता है. टीवी पर भी परिणाम देखे जा सकते थे लेकिन इसके लिये बस उसी पर नज़र गड़ाए रखना ज़रूरी होता.


बहरहाल जिनको हड़ताल करना थी उन्होंने की. उनके अपने तक़ाज़े हैं और अपना सोच.लेकिन यह बात बार बार मन में ख़लिश पैदा करती रही कि देश की सर्वोच्च और विश्वसनीय प्रसारण सेवा ने एकदम काम ठप्प कर दिया.अपनी बात को मनवाने का कोई न कोई गाँधीवादी तरीक़ा भी हो सकता था. जैसे विविध भारती के उदघोषक तय सकते थे कि हम फ़रमाइशें नहीं पढ़ेंगे या विज्ञापनों का प्रसारण शेड्यूल क्रमानुसार नहीं चलने देंगे.. दर-असल बीते बीस सालों में आकाशवाणी जैसी शीर्षस्थ संस्था निहायत रस्मी तौर पर सक्रिय है. वहाँ काम करने वाले लोगों में अब जज़्बे की निहायत कमी आ गई है. प्रायवेट रेडियो चैनल्स पर मौजूद ग्लैमर भी आकाशवाणी में काम करने वाले कर्मियों की आँख की किरकिरी बनता जा रहा है. केन्द्रीय सरकार के मातहत काम करने वाले आकाशवाणी केन्द्रों के पास बड़े बड़े भूखण्ड और भवन हैं; जहाँ मानव संसाधन की कमी का सवाल ही नहीं उठता.इसके मुक़ाबिल एफ़.एम चैनल्स हज़ार – दो हज़ार वर्गफ़ीट के दफ़्तर में दस-बारह लोगों की टीम लेकर शानदार कार्यक्रम रच देते हैं और लाखों के विज्ञापन कबाड़ कर मोटा मुनाफ़ा भी अपनी कम्पनी को देते हैं.प्रसारण,भाषा लेखन,तकनीक और मार्केटिंग को लेकर एफ़.एम.चैनल्स के पास अपनी छोटी सी लेकिन जुझारू टीम होती है जबकि आकाशवाणी का ये आलम है कि यदि कोई रचनाशीलकर्मी एक अच्छा कार्यक्रम बनाना चाहता है तो उसे कहा जाता है जाइये आप ही शहर में घूम कर प्रायोजक ढूंढ़ लाइये.अब बताइये ऐसी कार्य-संस्कृति में कोई कैसे काम कर सकता है या गुणवत्तापरक कार्यक्रम रच सकता है. ये सारी बातें अपनी जगह एकदम ठीक हैं लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि प्रसारण के शिखर संस्थान के कर्मचारियों का ये अड़ियल रूख़ जायज़ नहीं.

इस बार की हड़ताल प्रसार भारती और सरकार के हुक़्मरानों के लिये भी ख़तरे की घंटी है. उन्हें समझना होगा कि इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिये उनके पास क्या वैकल्पित इंतज़ाम हैं. आकाशवाणी की हड़ताल ने श्रोताओं के स्नेह को ज़मीन पर ला पटका है.स्व-हित और सुख के इस अभियान में बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय का नारा थोड़ा बेसुरा लग रहा है.

Tuesday, November 23, 2010

प्रसार भारती की आकाशवाणी और दूर दर्शन सेवा करीब करीब सम्पूर्ण ठप !

आज प्रसार भारती की रेडियो सेवा आकाशवाणी के सभी चेनल्स सुबह शुरू तो हुई पर बादमें पूरानी फिल्मो के गीतो और संगीत सरीता जैसे क्लासीक कार्यक्रम सुनने वाले काफ़ी श्रोताओनें चित्रलोक के समाप्ती के नियत समय पश्चाद्द किसी समय रेडियो ओन करने गये तो रेडियो सिग्नल्स गायब थे । रेडियो यानि सिर्फ एफ एम, इस प्रकार का अर्थ निकालने वाली नयी पिठी के मोबाईल धारक श्रोता लोगोने इधर उधर फ्रिक्वंसीझ ट्यून करके जन लिया की सिर्फ़ आकाशवाणी ही ठप हुई है और निजी चेनल्स अपना प्रसारण जारि रख़े हुए है । पर जो श्रोता निजी चेनल्स के करीब एक ही प्रकार के प्रसारण से उब गये है और विविध भारती के करीब हर घंटे पर बदले स्वरूप के कार्यक्रम को पसंद करते है वे निराश हो गये और इनमें से कुछ श्रोताओनें मूझे भी फोन करके पूछा की विविध भारती क्यों रूक गई । पूराने रेडियो श्रोता लोगों में से जिन के पास उपग्रहीय रिसीवर्स है जो डीटीएच (बिना शुल्क सेवा) या अन्य निज़ी उपग्रह प्रसारण नेटवर्क के पेय चेनल्स के साथ प्राप्त करते है वे रेडियो के बारेमें निराश हुए । पर विविध भारती की लधू तरंग कम्प संख्या, 9.87 मेगा हट्झ जो मुम्बई से विविघ भारती के उपग्रह प्रसारण को बेन्गलोर में प्राप्त करके भूमीगत प्रसारित कर रही है, वहाँ से बेन्गलोर के किसी स्थानिय स्टूडियो से बजने वाला दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत सुबह तो सुननेमें आया था, फिर कौन कोशिश करें ! दूर दर्शन किसी तरह पूराने कार्यक्रमो को दिख़ा रहा था । और वह भी नेशनल हिन्दी, गुजराती, डी डी भारती, डी डी इन्डीया, सभी सिर्फ़ सेटेलाईट द्वारा पर स्थानिय रिले-केन्द्रो तो बिलकूल ही बंध रहे । आज हमें भी एक बात समझनी चाहीए कि सरकार का यही उपक्रम है कि सभी कोर्पोरेसन्स को डिस-इनवेस्मेन्ट्स द्वारा निज़ी हाथोमें थमा देना । प्रसार भारती अटका है तो अभी तक एक ही कारण है सरकार चलाने वाली पार्टी का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रचार । पर बड़े उद्योग-गृहो कि इतनी पहोंच बढती दिख़ रही है कि प्रसार भारती का भी निज़ी-करण करवा सके तो आश्चर्य की बात नहीं होगी । और आज के निज़ी रेडियो-चेनल्स के प्रसारन को दुनते हुए अगर ऐसा हुआ तो सुनने वालों के क्या हालात होगे वह कल्पना भी डरावनी लगती है । और शायद आज कार्यरत कर्मचारी, अधिकारी भी शायद अपने आपको पेन्सन या अतिरीक्तता जैसी बातों को ले कर अपने आप को असुरक्षित महेसूस करेंगे । सरकारों का एक और उपक्रम आजकल चल रहा है, कि जब हडताल जोर पर होती है, तब बातचीत के लिये बूलावा कर्मचारी संगठनो को भेज़ कर आम जनता की सहानूभूती अपनी और करने की कोशिश करती है पर वह सिर्फ कर्मचारी आन्दोलनो की लडाई के टेम्पो को ठंडा कर देने की कोशीश ही होती है । सरकारओ को अपनी ही बढाई हुई महेंगाई सिर्फ कुछ भी नहीं करके तगडे वेतन पाने वाले सांसदो के सम्बंधमें ही नज़रमें आती है । जब की उसी के हिसाबसे थोडे कम बढे कर्मचारीयों वेतनो ज़्यादा लगते है तो, भरती, बढती पर अंकुश लगा कर रोजाना कर्मचारीयों द्वारा या कोंट्राक्ट द्वारा काम निकलवाने की निती बनायी जाती है । नीचे आकाशवाणी सुरत के सभी वर्ग के कर्मचारीयों द्वारा सामुहीक रूपसे चलाये जाने वाल्रे काम रोको आंदोलन अंतर्गत किये गये दिख़ावो की दो तसवीरें देख़ीये ।



पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Tuesday, September 7, 2010

इन्दौर के मालवा हाउस के माइक्रोफ़ोन से दूर चला गया वह संतोष-स्वर


सर्व-विदित है कि आकाशवाणी के सुनहरे दौर को रचने के लिये तकनीक से ज़्यादा उन लोगों का अवदान है जो इसे अपना घर समझ कर कार्यरत रहे और अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा को इस आदरणीय प्रतिष्ठान के लिये झोंकते रहे . आज फ़िज़ाँ और कार्य-संस्कृति बदल चुकी है लेकिन किसी ज़माने में आकाशवाणी में चुन कर आने वाले अधिकारी और कलाकार निसंदेह अभिनय,आवाज़,साहित्य,कविता,रंगमंच,संगीत जैसी बहुविध कलाओं से जीवंत तादात्म रखते थे. मालवा हाउस से भी तैतीस बरस की सुदीर्घ पारी खेल कर एक ऐसी ही शख़्सियत ने 6 अगस्त को विदा ले ली . संतोष जोशी शायद आकाशवाणी इन्दौर की लगभग अंतिम चिर-परिचित और ईमानदार आवाज़ है जिसने इस जानी-मानी प्रसारण संस्था के लिये अपना सर्वस्व दे डाला.

संतोष जोशी ने इस मुलाक़ात में बताया कि आकाशवाणी और अग्रणी समाचार पत्र नईदुनिया मालवा-निमाड़ के ऐसे दो महाविद्यालय थे जिनसे मेरी और मेरे पहले की पीढ़ी ने शब्द और स्वर का सलीक़ा सीखा. संतोष जोशी ने बताया कि वे सन 1961 से बाल-सभा में भाग लेने पहली बार मालवा-हाउस आए थे जिसमें एक प्रस्तुति के लिये उन्हें १० रू. बतौर पारिश्रमिक मिले थे.1970 में उन्होंने मुम्बई जाने का मन बना लिया. वहाँ कुछ स्टेज शोज़ आदि मिलते रहे. वहीं एक कार्यक्रम में अभिनेता विनोद खन्ना ने उन्हें देखा और अपनी फ़िल्म इम्तेहान(निर्देशक:मदन सिन्हा) के लिये मिलने को कहा और फ़िल्म में एक अच्छा ख़ासा रोल दे डाला. इस फ़िल्म के डायलॉग बाबूराम इशारा ने लिखे थे. इशारा ने संतोष में छुपे अभिनेता को पहचाना और अपनी आगामी फ़िल्म बाज़ार बंद करो(प्रमुख भूमिका:अंजना मुमताज़) में मौक़ा दिया.फ़िल्म कुछ ख़ास नहीं कर पाई.

अपने प्रसारण कार्यक्रमों से जुड़ी ख़ास याद को रेडियोनामा के साथ बाँटते हुए संतोष जोशी ने बताया कि वह सुबह बहुत दु;खद थी जब सहज में ही अपने केन्द्र पहुँचा और गेट पर ही सिक्योरिटी ने बताया कि राजीव गाँधी का निधन हो गया है.ये ख़बर मेरे लिये बहुत शॉकिंग थी.मैंने अपने कार्यक्रम का टोन ताबड़तोब बदला और उसे एक गंभीर अंदाज़ में एनाउंस किया. इसी तरह अभिनेता अशोककुमार का इंटरव्यू यादगार था जिसमें उन्होंने बताया था कि एक फ़िल्म के सीन में देविका रानी को मंगल सूत्र पहनाना था.चूँकि देविका रानी उस ज़माने की एक बड़ी सेलिब्रिटी थीं सो मेरे हाथ काँप रहे थे और मैंने मंगलसूत्र उनके बालों में उलझा दिया.

सन 1977 में स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण संतोष जोशी इंदौर लौट आए और आकाशवाणी में बतौर प्रॉडक्शन असिस्टेंट जुड़ गये. अस्सी के दशक के मध्य तक मालवा हाउस की दीवारों से उसकी प्रतिष्ठा के पोपड़े झरने लगे थे लेकिन तब तक संतोष जोशी को रणजीत सतीश,स्वतंत्रकुमार ओझा,नरेन्द्र पण्डित ,वीरेन मुंशी,अविनाश सरमण्डल,कृष्णकांत दुबे, बी.एन.बोस जैसे समर्थ वरिष्ठ साथियों का अनुभव मिल चुका था. प्रशासकीय काम के रूटीन से दूर रहने उद्देश्य संतोष 1986 में उदघोषक बन गये. इस बीच उन्हें दक्षिण भारत के जाने माने निर्देशक के.एस.सेतुमाधवन के निर्देशन में बन रही फ़िल्म “ज़िन्दगी जीने के लिये” में अवसर मिला और वे जा पहुँचे चैन्नई.फ़िल्म में राकेश रोशन,राखी और टीना मुनीम की प्रमुख भूमिका था. संगीत राजेश रोशन ने रचा था. लेकिन मुम्बईया निर्माता ने तयशुदा शर्त के मुताबिक सेतुमाधवन को पैसा देने से इनकार कर दिया और फ़िल्म क़ानूनी विवादों में फ़ँस कर रिलीज़ ही नहीं हो पाई. संतोष जोशी मानते हैं कि ये फ़िल्म उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट हो सकती थी.मुम्बई के प्रवास के दौरान संतोष जोशी मनहर,पंकज और निर्मल उधास के स्टेज शो एंकर किया करते रहे. पंकज उधास उनके पुराने दिनों के साथी हैं और आज भी जब वे इन्दौर किसी ग़ज़ल कंसर्ट के लिये आते हैं तो संतोष जोशी को ज़रूर याद करते हैं.संतोष जोशी बताते हैं कि पंकज उधास के स्टेज शो में ही उन्होंने कविता कृष्णमूर्ति को प्रस्तुत किया था जो दिल्ली से क़िस्मत आज़माने फ़िल्म नगरी आईं थीं. इस पहले कार्यक्रम के लिये कविता को सौ रूपये दिये गये थे.

संतोष जोशी ने आकाशवाणी के नाटकों में बहुत उम्दा भागीदारी की.एक नाटक में तो उन्होंने एक बुढ़िया का स्वराभिनय कर श्रोताओं को चौंका ही दिया था. ई.एम.आर.सी. द्वारा निर्मित पुरस्कृत वृत्त-चित्र बाग की छपाई में संतोष का ही वॉइस ओवर था. संदीप श्रोत्रिय द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हुए नाटक में भी आवाज़ के इस उम्दा कलाकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.बढिया गिटार वादक रहे संतोष जोशी एक बेहतरीन अदाकार है और हास्य उनका बहुत दमदार इलाक़ा . आकाशवाणी इन्दौर से प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ठिठोली में उनके स्वर-अभिनय से सुनाए गये लतीफ़े आज भी गुदगुदाते हैं. संतोष जोशी ऐसे गुणी और समर्पित सेवी रहे हैं जिसने युव-वाणी,महिलाओं के कार्यक्रम,वार्ताओं से लेकर नाटकों के निर्देशन तक की कमान बखूबी सम्हाली. आकाशवाणी को उनके जैसा एक बहु-आयामी कलाकार ज़रूर मिला लेकिन अभिनय की दुनिया ने निश्चित रूप से एक बेजोड़ कलाकार गँवाया है. वे यदि इन्दौर वापस न आते तो मुम्बई में उनकी जगह आज सतीश शाह,जॉनी लीवर या राजपाल यादव से तो किसी हाल में कम न होती. बहरहाल संतोष जोशी एक “संतोषी मालवी आत्मा” हैं और जो कुछ मालवा-हाउस के लिये कर पाए उससे प्रसन्न. उम्मीद करें कि अब हिन्दी रंगकर्म और आवाज़ की दुनिया के नये खिलाड़ी उनके इल्म का फ़ायदा ले सकेंगे.

Friday, November 28, 2008

राष्ट्रीय शोक,आकाशवाणी और एफ़एम चैनल्स.

पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथप्रताप सिंह के निधन के कारण भारत सरकार ने राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है. आज सुबह आकाशवाणी का स्थानीय क्षेत्रीय चैनल ट्यून किया तो गीता-पाठ सुनाई दिया. विविध भारती पर भी पूरी संजीदगी थी. हाँ प्रसारण की शुरूआत में बजने वाली शहनाई की मंगल ध्वनि भी नहीं थी उसकी जगह बिना तबले की सारंगी से दिन शुरू हुआ. उदघोषक के स्वर में भी एक सहज गंभीरता थी. इधर विविध भारती को ट्यून करने में रोज़ ही ख़ासी मशक्क़त करनी पड़ती है क्योंकि हैवी ट्रांसमीटर्स से एफ़एम चैनल्स (मेरे शहर इन्दौर में रेडियो मिर्ची,माय एफ़एम,बिग एफ़एम. और एस.एफ़एम हैं) ऐसा अतिक्रमण कर बैठे हैं कि विविध भारती को वाक़ई ढूंढना ही पड़ता है. बहरहाल बरास्ता एफ़एम.चैनल्स जब विविध भारती तक पहुँचा तो लाज़मी है इन नये ज़माने के चैनल्स के प्रसारणों पर भी कान चला गया. जब से इन एफ़एम चैनल्स को पता पड़ा है कि विविध भारती के पास सुबह भक्ति संगीत के स्लॉट वंदनवार या रीजनल प्रसारण के वंदना को अधिकतम श्रोता मिलते हैं तो ये चैनल्स भी कोई सुबह पाँच बजे या साढ़े पाँच बजे भकितमय हो जाते हैं .शोक के पल में भक्ति संगीत भी किस क्वालिटी का हो ये देखने वाला इन नये-नकोरे चैनल्स पर कोई नहीं होता.कोई माता रानी के गीत बजा रहा है तो कोई विष्णु सहस्त्रनाम,कोई गायत्री मंत्र बजा रहा था तो कोई श्री गणेश अथर्वशीर्ष.यानी राष्ट्रीय शोक के समय में भक्ति संगीत भी किस मूड हो ये देखने की किसे फ़ुरसत है. सात बजे के बाद तो वही शोर मचाते रेडियो जॉकीज़ नमूदार हो गए,वही उनका खिलंदड़ अंदाज़ , वही वायब्रेंसी और एनर्जी लेवल बढ़ाती धमाल.रीजनल स्टेशन पर शुभलक्ष्मी,शंकर-शंभू,
और दीगर कई स्थानीय कलाकारों की आवाज़ों में निबध्द ऐसी रचनाएँ थीं जो संकेत दे रहीं थीं की ये राष्टीय शोक की बेला में बजने वाला भक्ति संगीत है.

एफ़एम चैनल्स के साथ प्रसार भारती क्या अपने अनुबंध में इन राष्ट्रीय महत्व के प्रसारणों के लिये कोई विशेष नियमों का खुलासा नहीं करती.जब चार-चार चैनल्स पर नये गीतों के तड़क भड़क वाले गीत बज रहे हों तब आकाशवाणी और विविध भारती का सोग भरा प्रसारण गुम हो जाता सा प्रतीत होता है.

याद है मुझे जब डाँ.ज़ाकिर हुसैन,फ़क़रूद्दीन अली अहमद,डॉ.शंकरदयाल शर्मा,इंदिरा गाँधी,राजीव गाँधी,जयप्रकाश नारायण,वी.वी.गिरि,ज्ञानी ज़ैलसिंह जैसी राष्ट्रीय हस्तियों के दिवंगत होने पर आकाशवाणी और दूरदशन के ह्र्दयस्पर्शी प्रसारणों से घर-परिवार में भी ऐसा वातावरण बन जाता था जैसे परिवार में ही कोई ग़मी हो गई हो. जसदेवसिंह,मैलविन डिमेलो,सुरजीत सेन और कमलेश्वरजी की खनकती आवाज़ों की वे सारी धीर-गंभीर कमेंट्री दिवंगत शख़्सियतों को हमारी आँखों के सामने ला खड़ा करती थी.
आज एन एफ़एम चैनल्स के पास टैक्नीक है,पैसा है,स्पॉंसरशिप्स है,एंडोर्समेंट्स हैं और है बेताहाशा शोर जो मनुष्य की समवेदना को की थाह नहीं ले पा रहा है.

Sunday, November 16, 2008

प्रचार के अभाव में दम तोड़ता रेडियो संगीत सम्मेलन


शास्त्रीय संगीत को जन जन में पहुँचाने का जो ख़ास काम आकाशवाणी ने किया है वह स्तुत्य है. इसी नेक मक़सद को विस्तृत करने के उद्देश्य से रेडियो संगीत सम्मेलन की शुरूआत की गई थी. तक़रीबन पचास बरसों से ये सिलसिला चल रहा है. इस आयोजन का फ़ॉरमेट बड़ा रचनात्मक रहा है. किया यूँ जाता रहा है कि पहले देश के विभिन्न शहरों में जहाँ आकाशवाणी केन्द्र मौजूद हैं ; संगीतप्रेमी श्रोताओं की उपस्थित में संगीत सभा आयोजित की जाती है. बाक़ायदा निमंत्रण पत्र छपवा कर रसिकों को भेजे जाते थे. तस्वीर के साथ कलाकारों का परिचय अख़बारों में प्रकाशित किया जाता. इसी मजमे की रेकॉर्डिंग कर लगभग महीने भर पहले रात ९.३० बजे और इन कुछ बरसों में रात १०.०० बजे इन सभाओं का प्रसारण रेडियो संगीत सम्मेलन के रूप आकाशवाणी के सभी केन्द्रों से राष्ट्रीय प्रसारण के रूप में किया जाता था.शास्त्रीय संगीत के इस अनुष्ठान की प्रतिष्ठा का ये आलम था का मैनें ख़ुद देश के नामचीन कलाकारों के परिचय ब्रोशर में यह उल्लेख देखा है कि आपने आकाशवाणी संगीत सम्मेलन में अब तक तीन बार प्रस्तुतियाँ दी हैं. गोया इस आयोजन में शिरक़त एक बड़ा काम माना जाता रहा है. इस लिहाज़ से भी रेडियो संगीत सम्मेलन का बड़ा नाम रहा है कि इसके ज़रिये देश के कई युवा कलाकारों को न केवल देशव्यापी पहचान मिली बल्कि देश के विभिन्न अंचलों में जाकर अपना विशिष्ट श्रोतावर्ग तैयार करने में भी मदद मिली है.और हाँ साथ ही दक्षिण के संगीत को उत्तर और उत्तर के संगीत को दक्षिण मे पहुँचाने का बहुत आदरणीय सेतु रहा है आकाशवानी संगीत सम्मेलन.

भारतरत्न पं.रविशंकर,भारतरत्न पं.भीमसेन जोशी,विदूषी गंगूबाई हंगल पं.ओंकारनाथ ठाकुर,विदूषी सिध्देश्वरी देवी,गिरजा देवी,निर्मला अरूण,परवीन सुल्ताना,किशोरी अमोणकर,प्रभा अत्रे,मल्लिकार्जुन मंसूर,कुमार गंधर्व,पं.जसराज,वसंतराव देशपांडे,जितेन्द्र अभिषेकी से लेकर शुभा मुदगल,राजन साजन मिश्र,छन्नुलाल मिश्र,हरिप्रसाद चौरसिया,शिवकुमार शर्मा, विश्वमोहन भट्ट जैसे एकाधिक और नामचीन कलाकारों की शिरक़त से आकाशवांणी संगीत सम्मेलन की शान का जलवा रहा है. कैसेट और सी.डी से परे पचास से अस्सी के शुरूआती दशक तक रेडियो ही ऐसे गुणी संगीतज्ञों को घर घर में मुफ़्त में पहुँचाने का जो काम आकशावाणी ने किया वह अदभुत है. मैंने ख़ुद अपने परिवारों में और मित्रों के यहाँ देर रात तक कई लोगों को रेडियो संगीत का समवेत श्रवण करते देखा है. लेकिन अब तो यह सुरीला अनुष्ठान दम तोड़ता और रस्म पूरी करता नज़र आ रहा है. ख़ुद अपने हाथों से इस राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के आयोजन के कर्ता धर्ताओं ने अपनी किरकिरी करवा रखी है.


लेकिन अब मामला गड़बड़ हो गया है.

-रेडियो संगीत सम्मेलन में सितारा कलाकार आने से झिझकते हैं.कारण दीगर आयोजनों से मिलने वाला अधिक पारिश्रमिक और फ़ाइव स्टार मेज़बानी.

-प्रचार प्रसार का अभाव.ख़ुद आकाशवाणी अपने कार्यक्रमों में रेडियो संगीत सम्मेलन का प्रचार नहीं कर रहा है. क्या एक सुरीला प्रोमो बना कर विविध भारती के कार्यक्रमों में प्रसारित नहीं करना चाहिये.प्रचारित किया जा रहा है कि विविध भारती देश का सबसे लोकप्रिय रेडियो चैनल है तो रेडियो संगीत सम्मेलन का प्रचार तो विविध भारती को करना ही चाहिये ही. ये इसलिये भी कि तमाम संगीतप्रेमी विविध भारती के श्रोता तो हैं ही.

-आकाशवाणी की अपनी अधूरी अधूरी सी वैबसाइट पर रेडियो संगीत सम्मेलन जैसे महत्वपूर्ण आयोजन की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

-प्रसार भारती तमाम एम.एम.चैनल्स को बाध्य कर सकता है कि वे शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से अपने चैनल्स पर आकाशवाणी संगीत सम्मेलन का प्रोमो बजाए.

-देश के समस्त समाचार पत्रों में आकाशवाणी संगीत सम्मेलन की विज्ञप्ति प्रसारित की जाए कि इस साल के आकर्षण फ़लाँ कलाकार हैं.

-बच्चों में शास्त्रीय संगीत को प्रचारित करने के लिये रेडियो संगीत सम्मेलन को स्कूल परिसरों में ले जाया जाए जहाँ अन्य संगीतप्रेमी भी निमंत्रित किये जाएँ.

-समाचार आज भी आकाशवाणी का सबसे सशक्त और विश्वसनीय प्रसारण है. उसमें उसी दिन प्रस्तुति देने वाले कलाकार का नाम दिया जाए कि आज रात रेडियो संगीत सम्मेलन में आप उस्ताद राशिद ख़ाँ या डॉ.बाळ मुरळीकृष्ण का शास्त्रीय गायन सुनेंगे.

-दूरदर्शन प्रसार भारती और आकाशवाणी की सहोदर संस्था है. उसके प्रसारणों में समय समय पर आकाशवाणी संगीत सम्मेलन का प्रोमो दिखाया जाए.या स्क्रीन पर चलने वाले स्ट्रिप पर रात को प्रसारित होने वाले कार्यक्रम का समय और कलाकार का नाम चलाया जाए.


हुज़ूर कोई कुछ करना चाहे तो अनेक है राहें.लेकिन नौकरशाहों के मकड़जाल में फ़ँसा तंत्र कुछ नया,रचनात्मक और श्रोता हित का करने का माहौल ही नहीं बनने देता. जब कार्यक्रम की लोकप्रियता में कमीं आती जाती है तो कलाकार भी उसमें रूचि क्यों लें.हो सकता है आकाशवाणी की अपनी विवशताएँ हों लेकिन मन में सुरीलेपन को संक्रामक बनाने वाली इस महान संस्था की कार्यशैली का सुनहरा दौर तो अब काल कवलित हो चुका है इसमें की शक नहीं

Saturday, July 19, 2008

अपने बागबाँ को तलाशता एक फलदार वृक्ष....

रेडियो सालों से हमारा साथी रहा है और मुझे विश्वास है कि जबतक इस दुनिया में सुनने वाले रहेंगे तब तक रेडियो की लोकप्रियता कभी कम नहीं होगी।

रेडियो के इसी विस्तृत मंच को अनेक लोगों तक पहुंचाने के लिए, कुछ उनकी सुनने कुछ अपनी कहने के लिए हमारे दो संगीत प्रेमी और रेडियो से जुड़े चिट्ठाकारों, यूनुस खान और सागर चन्द नाहर ने शुरुआत की थी उस चिट्ठे की जिसका नाम आज चिट्ठाकारों के बीच जाना पहचाना है - "रेडियोनामा"। कहने की जरूरत नहीं कि इस एक चिट्ठे ने रेडियोप्रेमी चिट्ठाकारों के बीच कितनी गहरी पैठ बनाई है.
आज रेडियोनामा के सदस्यों में एक और जहाँ रेडियो ब्राडकास्टिंग से जुड़े आवाजों के धनी उदघोषक जैसे यूनुस जी, संजय पटेल जी, इरफान जी हैं तो दूसरी और पीयूष जी जैसे वरिष्ठ श्रोता जो न जाने रेडियो से जुड़े कितने महान हस्तियों से अब तक मिल चुके हैं। इन सबसे इतर लावण्या जी को हम कैसे भूल सकते हैं जिनकी तो मानो बहन ही है हमारी आपकी विविध भारती. आख़िर विविध भारती के जनक स्व. पं. नरेन्द्र शर्मा उनके भी तो जनक हैं. हिन्दी चिट्ठाकार जगत के जाने कितने जाने पहचाने नाम आज रेडियोनामा के सहयोगी सदस्यों के रूप में इससे जुड़े हैं. सबने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है इस रेडियोनामा को सींचने में, इसे पुष्पित पल्लवित करने में. तभी तो दो जनों द्वारा रोपा गया यह पौधा आज इतना बड़ा हो चुका कि आप इसके 301वें फल को भी चख चुके।


जी हाँ दोस्तों अब तक हमारे सदस्यों द्वारा 301 पोस्ट रेडियोनामा पर डाले जा चुके हैं अर्थात त्रिशतकीय साझेदारी हो चुकी है और यह अभी भी अनवरत जारी रहेगी बशर्ते.........

मैं लगभग दो महीने से ब्लॉग जगत से लगभग अलग थलग रहा। कारण बहुत से हैं, एक मुख्य कारण यह भी था कि मेरा कंप्यूटर ख़राब पड़ा है और अब तक सर्विस सेंटर से आया नहीं है. पर इन अलगाव के दिनों में भी मैं कुछ ब्लॉग पढ़ता रहा और कुछ पर अपनी टिप्पणियाँ भी भेजता रहा. चूंकि मैं भी रेडियोनामा से जुड़ा हूँ तो उसकी खोज ख़बर लेना भी जरूरी था. यहीं मैंने एक बात नोटिस की जो आप सभी लोगों तक पहुँचाना चाह रहा हूँ. रेडियोनामा के सदस्य इसे कृपया अन्यथा नहीं लेंगे।

रेडियोनामा के हमारे चिट्ठाकार साथी आज के हिन्दी चिट्ठाकार जगत के जाने माने नाम हैं। ब्लॉग लेखन के जिन जिन क्षेत्रों से वो जुड़े हुए हैं उसमें काफी अच्छा और नियमित लिख रहे हैं और भरपूर वाहवाही भी वो पा रहे हैं. भगवान करे अपने काम में वो और ऊँचाई पर पहुँचें. अपने अपने चिट्ठों में कभी कभार उन्होंने रेडियो का भी जिक्र किया, जिसे देखकर हमारी तकनीकी टीम ने उन्हें रेडियोनामा से जुड़ने का न्योता दिया और वो जुड़ भी गए. एक दो अच्छी पोस्ट्स उन्होंने रेडियोनामा पर लगा भी दीं. बहुत सारी टिप्पणियाँ भी पा ली. इसके बाद वो रुखसत हुए ये कह कर कि अब जब शुरुआत हो गयी है तो नियमित आता रहूँगा. वो दिन और आज का दिन है, रेडियोनामा उनके आने के हर राह पर टकटकी लगाए खड़ा है इस आस में कि चलो इतने व्यस्त समय में कभी तो मेरे लिए भी वो समय निकाल ही लेंगे।

इस ब्लॉग जगत में कहा यह जाता है कि टिप्पणियाँ पोस्ट लिखने वाले के लिए टॉनिक का काम करती हैं, यूँ तो कोई यह भी कहते हैं कि कर्म करते जाओ फल की चिंता क्यूँ करते हो। पर क्या ये जरूरी नहीं कि कम से कम हम जिस ब्लॉग से जुड़े हैं उसमें अपना योगदान नहीं कर रहे तो एक आध टिप्पणी ही सरका दें. कुछ नहीं तो समीर जी की तरह ही सही. कभी तो आपका ध्यान पोस्ट में चल रहे चिंतन की ओर जायेगा और कुछ सार्थक टिप्पणियाँ भी आपकी लेखनी से निकल ही जायेंगी।

रेडियोनामा को आगे बढ़ाने में जितना हाथ अन्नपूर्णा जी का और पीयूष जी का है, मैं नहीं समझता कि और किसी का है। जब भी अन्नपूर्णा जी नें सौवीं, डेढ़ सौवीं या दो सौवीं पोस्ट लिखी तो हमने सिर्फ़ यह कह कर किनारा कर लिया कि आपसे ही रेडियोनामा रौशन है या आप लिखती रहिये. अरे वो तो लिखती ही रहेंगी, संजय पटेल जी की यदि 300 वीं पोस्ट नहीं आयी होती तो हम फिर एक बार उन्हें उसी तरह बधाई दे रहे होते, आख़िर तीन सौ एकवीं पोस्ट उन्हीं की तो है. क्या हम उन के पोस्ट पर टिप्पणी भी नहीं हर सकते, क्या हमें उनकी हौसला आफजायी नहीं करनी चाहिए।

हमारे जितने भी सदस्य हैं सभी के अपने अलग ब्लॉग हैं, पर अन्नपूर्णा जी और पीयूष जी के लिए तो अपना रेडियोनामा ही सब कुछ है. क्या वे इतने के हकदार नहीं हैं कि आप दो लफ्ज वहाँ नहीं कह सकें?

Wednesday, July 9, 2008

ये आकाशवाणी है ! अब आप देवकीनंदन पाण्डे से समाचार सुनिये



किसी ज़माने में रेडियो सेट से गूँजता ये स्वर घर-घर का जाना-पहचाना होता था। ये थे देवकीनंदन पाण्डे अपने ज़माने के जाने-माने समाचार वाचक। अपने जीवन काल में ही पाण्डेजी समाचार वाचन की एक संस्था बन गए थे। उनके समाचार पढ़ने का अंदाज़, उच्चारण की शुद्धता, स्वर की गंभीरता और गुरुता और प्रसंग अनुरूप उतार-चढ़ाव श्रोता को एक रोमांच की स्थिति में ले आता था। कानपुर में पैदा हुए देवकीनंदनजी के पिता शिवदत्त पाण्डे अपने क्षेत्र के जाने-माने डॉक्टर थे। बेहद रहम दिल और आधी रात को उठकर किसी भी मरीज़ के लिए मुफ़्त में इलाज करने को तत्पर। मूलरूप से पाण्डे परिवार कुमाऊँ का था। शायद यही वजह है कि पाण्डेजी के स्वर में एक पहाड़ी ख़नक सुनाई देती थी।

देवकीनंदन पाण्डेजी अपने स्कूली दिनों में कभी भी मेघावी छात्र नहीं रहे लेकिन वे कभी भी अपनी कक्षा में फेल नहीं हुए। घूमने-फिरने, नाटक करने और खेलकूद में उनकी गहन दिलचस्पी थी। पाठ्य पुस्तके उन्हें कभी भी रास नहीं आईं किंतु नाटक, उपन्यास, कहानियॉं, जीवन चरित्र और इतिहास की पुस्तकें उन्हें हमेशा से आकर्षित करती थीं। उनकी आरंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। अल्मोड़ा यानी हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं के ऊपर बसा नगर । पाण्डेजी के पिता पुस्तकों के अनन्य प्रेमी थे। इस वजह से घर में किताबों का अच्छा ख़ासा संकलन थाजिससे पाण्डेजी को पठन-पाठन में दिलचस्पी होने लगी।


कॉलेज के ज़माने में अंग्रेज़ी अध्यापक विशंभर दत्त भट्ट देवकीनंदन पाण्डे पर अगाध स्नेह रखते थे। उन्होंने पहले-पहल पाण्डेजी की आवाज़ की विशिष्टता को पहचाना और सराहा। उन्होंने अपने इस छात्र को उसकी प्रतिभा का आभास करवाया। भट्टजी पाण्डेजी को रंगमंच के लिये प्रोत्साहित करने लगे। अलमोड़ा में पाण्डेजी ने कई दर्ज़न नाटकों में हिस्सा लिया इससे उनके आत्मविश्वास में मज़बूती आई।

४० के दशक में अल्मोड़ा जैसी छोटी जगह में केवल दो रेडियो थे। एक स्कूल के अध्यापक जोशीजी के घर और दूसरा एक व्यापारी शाहजी के घर। युवा देवकीनंदन पाण्डे को दूसरे महायुद्ध के समाचारों को सुनकर बहुत रोमांच होता। वे प्रतिदिन सारा काम छोड़कर समाचार सुनने जाते। उन दिनों जर्मनी रेडियो के दो प्रसारकों लॉर्ड हो हो और डॉ. फ़ारूक़ी का बड़ा नाम था। दोनों लाजवाब प्रसारणकर्ता थे। उनकी आवाज़ हमेशा पाण्डेजी के दिलो-दिमाग़ में छाई रही। सन् १९४१ में बी.ए. करने के लिए पाण्डेजी इलाहबाद चले आए जहॉं का विश्वविद्यालय पूरे देश में विख्यात था। १९४३ में पाण्डेजी ने लख़नऊ में एक सरकारी नौकरी कर ली और केज्युअल आर्टिस्ट के रूप में एनाउंसर और ड्रामा आर्टिस्ट हेतु उनका चयन रेडियो लखनऊ पर हो गया। इस स्टेशन पर उर्दू प्रसारणकर्ताओं का बोलबाला था। पाण्डेजी हमेशा मानते रहे कि इस विशिष्ट भाषा के अध्ययन और सही उच्चारण की बारीकियों का अभ्यास उन्हें रेडियो लखनऊ से ही मिला।मुझे यह लिखने में कोई झिझक नहीं है कि देवकीनंदन पाण्डे जैसे प्रसारणकर्ताओं की वजह से ही हिंदी को आकाशवाणी जैसे अंग्रेज़ी परिवेश में मान मिलना प्रांरभ हुआ.

देश के आज़ाद होते ही आकाशवाणी पर समाचार बुलेटिनों का सिलसिला प्रारंभ हुआ। दिल्ली स्टेशन पर अच्छी आवाज़ें ढूंढ़ने की पहल हुई। देवकीनंदन पाण्डे ने डिस्क पर अपनी आवाज़ रेकार्ड करके भेजी। फ़रवरी १९४८ में समाचार वाचकों का चयन किया गया। उम्मीदवारों की संख्या थी तीन हज़ार और बिला शक देवकीनंदन पाण्डे का नाम सबसे ऊपर था। आकाशवाणी लखनऊ पर मिले उर्दू के अनुभव ने उन्हें हमेशा स्पष्ट समाचार वाचन में लाभ दिया। पाण्डेजी मानते थे कि निश्चित रूप से देश की भाषा हिन्दी है लेकिन वाचिक परंपरा में उर्दू के शब्दों के परहेज़ नहीं किया जाना चाहिए। हिन्दी-उर्दू की चाशनी सुनने वालों के कान में निश्चित ही रस घोलती है।

१९४८ में आकाशवाणी में हिन्दी समाचार प्रभाग की स्थापना हुई। इसमें आले हसन (जो कालांतर में बीबीसी उर्दू सेवा के विश्व विख्यात प्रसारणकर्ता माने गए) सुरेश अवस्थी, बृजेन्द्र, सईदा बानो और चॉंद कृष्ण कौल। लाज़मी था कि उस समय के समाचार वाचकों को हिन्दी-उर्दू दोनों आना ज़रूरी था। आले हसन का हिन्दी वाचन अद्भुत था। वे बहुत क़ाबिल अनाउंसर और न्यूज़ रीडर थे। शुरू में मूल समाचार अंग्रेज़ी में लिखे जाते थे जिसका अनुवाद वाचक को करना होता था। अशोक वाजपेयी, विनोद कश्यप और रामानुज प्रताप सिंह को भी अनुवाद करने के लिये मजबूर किया गया लेकिन काफ़ी जद्दोजहद के बाद उन्हें इस परेशानी से मुक्ति मिली और हिन्दी समाचार हिन्दी में ही लिखे जाने लगे। यहॉं ये भी उल्लेखनीय है कि मेल्विन डिमेलो और चक्रपाणी जैसे धुरंधर अंग्रेज़ी प्रसारणकर्ताओं से सामने जिन लोगों ने हिन्दी प्रसारण का लोहा मनवाया उसमे ंदेवकीनंदन पाण्डे की भूमिका को बिसराया नहीं जा सकता।

देवकीनंदन पाण्डे समाचार प्रसारण के समय घटनाक्रम से अपने आपको एकाकार कर लेते थे और यही वजह थी उनके पढ़ने का अंदाज़ करोड़ों श्रोताओं के दिल को छू जाता था। उनकी आवाज़ में एक जादुई स्पर्श था। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि पाण्डेजी के स्वर से रेडियो सेट थर्राने लगा है। आज जब टीवी चैनल्स की बाढ़ है और एफ़एम रेडियो स्टेशंस अपने अपने वाचाल प्रसारणों से जीवन को अतिक्रमित कर रहे हैं ऐसे में देवकीनंदन पाण्डे का स्मरण एक रूहानी एहसास से गुज़रना है। तकनीक के अभाव में सिर्फ़ आवाज़ के बूते पर अपने आपको पूरे देश में एक घरेलू नाम बन जाने का करिश्मा पाण्डेजी ने किया। सरदार पटेल, लियाक़त अली ख़ान, मौलाना आज़ाद, गोविन्द वल्लभ पंत, पं. जवाहरलाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण के निधन का समाचार पाण्डेजी के स्वर में ही पूरे देश में पहुँचा। संजय गॉंधी के आकस्मिक निधन का समाचार वाचन करने के लिये सेवानिवृत्त हो चुके पाण्डेजी को विशेष रूप से आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर आमंत्रित किया गया।


देवकीनंदन पाण्डे को वॉइस ऑफ़ अमेरिका जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रसारण संस्था से अपने यहॉं काम करने का ऑफ़र मिला लेकिन देश प्रेम ने उन्हें ऐसा करने से रोका। पाण्डेजी को अपनी शख़्सियत की लोकप्रियता का अंदाज़ उस दिन लगा जब श्रीमती इन्दिरा गॉंधी ने एक बार आकाशवाणी के स्टॉफ़ आर्टिस्टों को उनकी समस्या सुनने के लिये अपने निवास पर आमंत्रित किया। श्रीमती गॉंधी से जब पाण्डेजी का परिचय करवाया गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि "अच्छा तो आप हैं हमारे देश की न्यूज़ वॉइस'। पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल तो एक बार पाण्डेजी का नाम सुनकर उनसे गले लिपट गए थे।

नए समाचार वाचकों के बारे में पाण्डेजी का कहना था जो कुछ करो श्रद्धा, ईमानदारी और मेहनत से करो। हमेशा चाक-चौबन्द और समसामयिक घटनाक्रम की जानकारी रखो। जितना ़ज़्यादा सुनोगे और पढ़ोगे उतना अच्छा बोल सकोगे। किसी शैली की नकल कभी मत करो। कोई ग़लती बताए तो उसे सर झुकाकर स्वीकार करो और बताने वाले के प्रति अनुगृह का भाव रखो। निर्दोष और सोच समझकर पढ़ने की आदत डालो; आत्मविश्वास आता जाएगा और पहचान बनती जाएगी।

ऊँची क़द काठी के देवकीनंदन पाण्डे आज तो हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब भी रेडियो पर समाचार प्रसारणों की बात चलेगी तो उनका नाम इस विधा के शिखर के रूप में जाना जाता रहेगा।

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