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Tuesday, May 17, 2011
सुबह के गरिमामय प्रसारण को लगा धक्का - प्यार-मोहब्बत के गानों से केन्द्रीय सेवा की शुरूवात
Friday, August 8, 2008
प्रकाश किरण
आकाशवाणी हैदराबाद से प्रसारित होने वाले ऐसे ही कर्यक्रम का नाम है - प्रकाश किरण। इस कार्यक्रम की अवधि पाँच मिनट होती है। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ नागरिकों की वार्ताएँ प्रसारित होती है जिससे विषय के साथ-साथ उनके जीवन के अनुभव के आधार पर कार्यक्रम का स्तर बढ जाता है।
विषय बहुत व्यापक होते है पर जीवन की गहराई से जुड़े होते है जैसे मित्रता, शत्रुता, अहिंसा, कर्म, परोपकार आदि। पाँच मिनट के लिए इस एक विषय पर जब कोई उम्रदराज नागरिक लिखेगें तो स्वाभाविक है कि उनका अध्ययन उनका अनुभव सभी सिमट आएगा।
मित्रता विषय पर कृष्ण सुदामा की मित्रता से लेकर राम सुग्रीव विभीषण की मित्रता भी आ जाएगी। इन उदाहरणों द्वारा जीवन में मैत्री भावना का महत्व बताने के लिए कवियों की रचनाएँ भी उद्धृत की जाएगी जिससे पाँच मिनट में बहुत कुछ समझा और समझाया जाता है। इस तरह दिन की शुरूवात सकारात्मक होती है।
Monday, May 19, 2008
ख़ाका
हैदराबादी से मेरा मतलब है हैदराबादी तहज़ीब से जुड़े लोग जो पुराने शहर में ज्यादा नज़र आते है क्योंकि नए शहर में अन्य स्थानों से आकर बसे लोग होने से यह तहज़ीब कुछ कम होती जा रही है।
जहाँ तक आकाशवाणी हैदराबाद की बात करें तो वो पहले रेडियो दक्कन हुआ करता था। हैदराबाद की जो ख़ास उर्दू भाषा है उसे दक्खिनी उर्दू कहा जाता है जिसे महमूद ने फ़िल्मों में बहुत लोकप्रिय किया। हाँ के लिए हौ, ना के लिए नक्को, यहीं है के लिए यईंच है, बातें करना के लिए बाताँ करना जैसे शब्द और वाक्य।
रेडियो में तो अपनी संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते है। आकाशवाणी हैदराबाद में भी ऐसे कार्यक्रम है जो हैदराबादी संस्कृति दिखाते है। ढोलक के गीतों की चर्चा तो हम पहले ही कर चुके है आज हम बात करेंगें एक ऐसे कार्यक्रम की जिसे विविध भारती की भाषा में झलकी कहा जाता है।
पाँच मिनट से लेकर पन्द्रह मिनट तक प्रसारित होने वाली यह झलकियाँ वास्तव में नाटक ही होती है। आकाशवाणी हैदराबाद के उर्दू कार्यक्रमों में प्रसारित होने वाली इस तरह की झलकियों को ख़ाका कहा जाता है जो हैदराबादी उर्दू में होती है।
इन ख़ाकों के माध्यम से कई बार गंभीर मसलों पर भी संदेश दिए गए है जैसे शिक्षा, परिवार नियोजन आदि। कई ख़ाके ऐसे भी होते है जिनमें नोक-झोक भी होती है। हमारे समाज में दो तरह की नोक-झोक बहुत प्रचलित है एक तो पति-पत्नी या मियाँ-बीवी की और दूसरी सास-बहू की। ऐसी दो झलकियाँ मियाँ-बीवी और सास-बहू शीर्षक से हवामहल में भी प्रसारित हो चुकी है।
अगर इन ख़ाकों में हास्य हो तो मिज़ाहिया ख़ाका कहा जाता है यानि हास्य झलकी। इन ख़ाकों का प्रसारण पहले बहुत होता था - रात में नयरंग में, दोपहर में ख़वातीन (महिलाओं) के लिए कार्यक्रम में परन्तु आजकल जैसे-जैसे हमारी नई पीढी इस तहज़ीब से दूर होती जा रही है वैसे-वैसे इन ख़ाकों के प्रसारणों में कमी आती जा रही है क्योंकि आजकल न तो उस तरह से लिखने वाले रहे और न ही वैसे कलाकार और श्रोता भी तो ऐसे कार्यक्रमों के कम हो गए है।
Monday, March 24, 2008
मेरी पसंद
रेडियो तो मैं बचपन से सुनती रही पर बचपन में कभी रेडियो प्रोग्राम नहीं किया। मैंनें शुरूवात युववाणी से की।
आकाशवाणी हैदराबाद से मैनें जो पहला कार्यक्रम किया वो था - मेरी पसन्द। यह युववाणी का कार्यक्रम था जो आधे घण्टे का होता था। यह कार्यक्रम छाया गीत की तरह था।
इस कार्यक्रम के लिए पाँच-छ्ह फ़िल्मी गीत अपनी पसन्द के चुनने होते थे। इन गीतों की प्रस्तुति के लिए आलेख लिखना होता था। इसी आलेख को पढते हुए या यूँ कहिए कि श्रोताओं से कुछ कहते हुए एक के बाद एक अपनी पसन्द के गाने सुनवाने होते थे।
मेरी पसन्द के तो साठ-सत्तर के दशक के गीत है सो मैनें वही चुने। बहुत डूब कर अच्छा सा आलेख लिखा और कार्यक्रम की रिकार्डिंग भी हो गई फिर प्रसारण भी हो गया। इतना ही नहीं कार्यक्रम पसन्द भी किया गया लेकिन…
मेरी समझ में नहीं आया कि गीत बहुत लोकप्रिय थे, आलेख में भाव-विचार बहुत अच्छे थे, सबने कहा कि मैनें बोला भी अच्छा, आवाज़ भी अच्छी फिर कहाँ गड़बड़ हो गई ?
तभी कार्यक्रम अधिकारी अहमद जलीस साहब ने कहा - अए बीबी - हैदराबादी तहज़ीब में अए कह कर संबोधन किया जाता है और लड़की को बीबी कहते है। उन्होनें कहा -
अए बीबी ! अपनी पसन्द के गाने सुनवाए या अपनी अम्मी (माँ) की पसन्द के और अनुभाग में सभी खिलखिलाने लगे।
हुआ ये था कि पहला गीत मैनें लिया था फ़िल्म गाईड से -
काँटों से खींच के ये आँचल
तोड़ के बंधन बाँधी पायल
हद तो तब हो गई जब मैनें पचास के दशक की फ़िल्म गोदान का रफ़ी का गाया गीत भी शामिल कर लिया। अब मुझे क्या पता ? मैनें सोचा मेरी पसन्द कार्यक्रम है तो मेरी ही पसन्द के गीत सुनवाए जाने चाहिए।
बाद में समझ में आया कि अपनी पसन्द के साथ-साथ गीतों का चयन कार्यक्रम के अनुसार होना चाहिए। जबकि उसी समय रिकार्ड लाइब्रेरी में नई फ़िल्मों की गीतों के रिकार्ड ख़रीद कर रखे गए थे मुझे उन्हीं में से मेरी पसन्द के गाने चुनने चाहिए थे।
नए गानों को बजाने की शुरूवात आमतौर पर युववाणी से ही होती है बाद में सामान्य प्रसारण में फ़रमाइशी और ग़ैर फ़रमाइशी कार्यक्रमों में ये गीत बजने लगते है।
तो देखिए… कितना बड़ा फ़र्क है इस पार और उस पार में। बचपन से श्रोता की तरह रेडियो सुना पर ये समझ में नहीं आया था कि कार्यक्रम तैयार करने में किन-किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है। सुनना आसान है लेकिन प्रस्तुत करना बहुत कठिन।
Wednesday, February 13, 2008
नावेलों की दुनिया
आज एक ऐसे ही कार्यक्रम की मैं चर्चा कर रही हूं जो आकाशवाणी हैदराबाद केन्द्र का बहुत ही लोकप्रिय कार्यक्रम रहा है - नावेलों की दुनिया
इस कार्यक्रम की शुरूवात हुई अस्सी के दशक में। वर्ष 1981 में प्रेमचन्द के जन्मदिन पर कई कार्यक्रमों का आयोजन हिन्दी से जुड़े संस्थान कर रहे थे। तभी आकाशवाणी हैदराबाद केन्द्र से गोदान पढना शुरू किया गया। यह उर्दू विभाग द्वारा दैनिक उर्दू कार्यक्रम नयरंग में रात 9:30 बजे 10 मिनट के लिए पढा जाने लगा।
प्रेमचन्द शुरू में उर्दू में लिखा करते थे और गोदान उपन्यास उर्दू और हिन्दी दोनों में है। गोदान पढने के बाद तो जैसे ताँता लग गया। सप्ताह मे 5-6 दिन नियमित एक के बाद एक उपन्यास पढे जाने लगे।
कार्यक्रम उर्दू का होने से सभी उर्दू उपन्यास पढे गए। इनमें एक ओर तो जिलानी बानो का उपन्यास एवाने ग़ज़ल शामिल रहा तो दूसरी ओर इब्नोद वक़्त जैसे नावेल भी शामिल किए गए यहां तक कि मशहूर नावेल उमराव जान अदा भी पढा गया।
उर्दू और हिन्दी में सिर्फ़ लिपि का ही फ़र्क है इसीलिए उर्दू नहीं जानने वाले हिन्दी के श्रोता भी इन उपन्यासों का आनन्द लेने लगे।
हिन्दी कार्यक्रमों में केवल एक ही पुस्तक पढी गई - डिस्कवरी आँफ इंडिया का हिन्दी संस्करण।
उर्दू में युववाणी कार्यक्रम में भी नावेल पढे जाने लगे। इन नावेलों को पढने वाले थे उर्दू के उदघोषक और कार्यक्रम अधिकारी - मोहन सिन्हा, महजबीं रानी, शुजात अलि राशिद और ज़ाफर अलि खाँ
पहले इन नावेलों को सिर्फ़ पढा जाता था। बाद में हल्का सा नाट्य रूपान्तर किया जाने लगा यानि पढते-पढते जब संवाद आ जाते तब ये संवाद महिला और पुरूष की आवाज़ों में बोले जाने लगे। बाद में नाटकों की तरह डबिंग भी की जाने लगी। कुछ ख़ास दृश्यों में संगीत संयोजन भी किया जाने लगा। अब समय भी १० से १५ मिनट हो गया।
लगभग बीस साल तक चला ये सफ़र अब कुछ थम सा गया है। पिछले लगभग चार सालों से ये कार्यक्रम प्रसारित नहीं हो रहा है।
Monday, January 28, 2008
अक्स और आवाज़
जैसा कि नाम से ही समझा जा सकता है कि इस कार्यक्रम में अक्स और आवाज़ दोनों की चर्चा होती थी। 15 मिनट के इस कार्यक्रम में एक ही अक्स और एक ही आवाज़ के गीत सुनवाए जाते थे।
एक प्रसारण के बारे में बताऊं -
उदघोषणा हुई - आज के अक्स और आवाज़ कार्यक्रम में अक्स है रेखा का और आवाज़ है लता की। फिर तीन ऐसे गीत सुनवाए गए जो लता के गाए और रेखा पर फ़िल्माए गए थे जैसे घर फ़िल्म का गीत -
आजकल पांव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे
बोलो देखा कभी तुमने मुझे उड़ते हुए
कार्यक्रम की ख़ास बात ये थी कि एकल (सोलो) गीत बजा करते थे ताकि एक ही अक्स और आवाज़ का आनन्द लिया जा सकें।
कुछ कार्यक्रम बहुत अच्छे लगे जिनमें अक्स और आवाज़ की ये जोड़ियां थी -
शम्मी कपूर और रफ़ी, राज कपूर और मुकेश, राजेश खन्ना और किशोर कुमार।
लता के नई पुरानी अलग-अलग नायिकाओं के साथ ऐसे कई कार्यक्रम हुए जैसे - मुमताज़, माला सिन्हा, वैजयन्ती माला, मीना कुमारी, मधुबाला, हेमामालिनी…
गीतों के साथ दोनों ही कलाकारों के बारे में थोड़ी सी जानकारी भी दी जाती थी। लेकिन ये कार्यक्रम लम्बे समय तक नहीं चल पाया।
Wednesday, November 28, 2007
छोटी छोटी बातें
मंथन एक साप्ताहिक कार्यक्रम है जिसमें समसामयिक विषयों पर चर्चा होती है जैसे भारत ने खेल जगत की कौन सी प्रतियोगिता जीती या हारी। त्यौहार कैसे मनाए जा रहे है। बच्चों की शिक्षा का क्या हाल है। कुछ सामाजिक समस्याएं जैसे बाल मज़दूरी वग़ैरह वग़ैरह…
मेरी जानकारी में इस तरह का पहला कार्यक्रम है मंथन क्योंकि विविध भारती पर पहले शायद इस तरह के कार्यक्रम नहीं होते थे। परन्तु ऐसे कार्यक्रम क्षेत्रीय केन्द्र हैद्राबाद की विशेषता रही।
अन्य क्षेत्रीय केन्द्रों की तो मुझे जानकारी नहीं है लेकिन आकाशवाणी हैद्राबाद से ऐसे कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हुए। मंथन में तो तकनीकी सुविधा के कारण मुंबई में विविध भारती के स्टुडियो से देश के दूर दराज के कोने में बैठे श्रोता से किसी भी विषय पर फोन पर बात की जा सकती है और अलग-अलग क्षेत्रों के श्रोताओं की राय जान कर किसी विषय पर व्यापक चर्चा की जाती है।
लेकिन मैं जिन कार्यक्रमों की बात कर रही हूं वहां इस तरह की तकनीकी सुविधा नहीं थी। इसीलिए कार्यक्रम का स्वरूप भी अलग था। इन कार्यक्रमों में समसामयिक विषय या किसी समस्या पर श्रोताओं को जानकारी देने के लिए एक श्रृंखला प्रसारित की जाती थी।
इस श्रृंखला में कुछ ऐसे चरित्र होते थे जो समाज के विभिन्न वर्गों के आम आदमी का प्रतिनिधित्व करते थे। दस मिनट का नाटक होता था जिसमें नाटकीय अंदाज़ में ही श्रोताओं को जानकारी दे दी जाती थी।
अक्सर ये कार्यक्रम साप्ताहिक होते थे लेकिन सत्तर के दशक में हैद्राबाद केन्द्र के उर्दू कार्यक्रमों मे एक ऐसा ही कार्यक्रम रोज़ प्रसारित होता था जिसका शीर्षक था छोटी छोटी बातें। वाकई समसामयिक विषयों पर बहुत सी बातें ऐसी होती है जो छोटी-छोटी ही होती है पर हम उन पर ध्यान नहीं देते जिससे हम समाज में ठीक से रह नहीं पाते और कई समस्याओं से अनजान रह जाते है साथ ही दुनिया की खबर भी नहीं रख पाते।
इसमें मुख्य चार चरित्र थे - चांद मियां जो अनपढ और दुनिया से बेखबर थे। उनकी पत्नी फातिमा बी भी ऐसी ही महिला थी। पत्नी क भाई लाला भाई कम पढा लिखा कम जानकार पर हीरो टाईप था। उनके घर उनके एक पढे लिखे पड़ौसी महबूब भाई रोज़ आते और दुनियादारी की बाते बता जाते थे।
कभी-कभी कभार कुछ और चरित्र भी जुड़ जाते जैसे प्याज़ बेचने वाले भीखू भाई, जानी मियां और बी पाशा का बहुत सारे बच्चों का परिवार, फातिमा बी की बहन मुन्नी जो कभी गांव से आ जाती।
इसे लिखा था अहमद जलीस ने जो उर्दू कार्यक्रम अधिकारी थे और जिन्होनें चांद मियां की भूमिका की थी।
ऐसा ही साप्ताहिक कार्यक्रम तेलुगु भाषा में भी होता था। ऐसा ही एक साप्ताहिक कार्यक्रम हिन्दी में महिला संसार में कार्यक्रम अधिकारी डा दुर्गा लक्ष्मी प्रसन्ना ने शुरू किया था - मौसी से मुलाकात शीर्षक से। जिसमें दो ही चरित्र थे - एक लड़की और उसकी मौसी जिसमें लड़की की भूमिका मैनें की थी और मौसी की भूमिका करने के साथ इसे लिखा भी था हैद्राबाद की जानी मानी कवियित्री, लेखिका डा प्रतिभा गर्ग ने।
Wednesday, September 26, 2007
ढोलक के गीतों की दुनिया में लोगा खो गए मा
लोगा खो गए मा इंटरनेट की दुनिया में
लोगा खो गए मा
इधर देखी उधर देखी रेडियोनामा की गलियां
हाय लोगा मिल गए मा ढोलक के गीत के चिट्ठे पे
लोगा मिल गए मा
बहुत अच्छा लगा आप सब की टिप्पणियां पढ कर, अफ़लातून जी, सागर जी, ममता जी, ऊड़न तश्तरी जी और यूनूस जी। जवाब छोटा नहीं है इसलिए टिप्पणी न लिख कर अगला चिट्ठा लिख रही हूं।
बाज़ार फ़िल्म की शूटिंग अस्सी के दशक में हैदराबाद में हुई थी। फ़िल्म की पृष्ठभूमि हैदराबाद की है। विषय है शादी-ब्याह्। इस मौके के लिए एक ढोलक का गीत चुना गया। उस समय ये चर्चा थी कि ये गीत अर्जुमन नज़ीर या कनीज़ फातिमा ही गाएगें लेकिन बात बनी नहीं।
ये गीत गाया पैमिला चोपड़ा और साथियों ने। आर्केस्ट्रा का भी प्रयोग हुआ जबकि ये गीत ढोलक पर गाए जाते है और हारमोनियम का हल्का प्रयोग होता है। नतीजा ये हुआ कि गीत पारम्परिक नहीं बना। लाख कोशिशों के बावजूद भी बंबइया रंग साफ़ नज़र आया। फिर भी जिन लोगों ने ढोलक के गीत पहले नहीं सुने वे ये गीत सुन सकते है जिससे ये अंदाज़ा हो जाएगा कि ढोलक के गीत होते कैसे है। तो यूनूस जी विविध भारती में बाज़ार फ़िल्म के गीत तो है ही। पैमिला चोपड़ा और साथियों का ये गीत आप तुरन्त यहां सुना सकते है।
दूसरी बात कि विविध भारती के ही एक कार्यक्रम सखी-सहेली में एक दिन कांचन (प्रकाश संगीत) जी ने एक झलकी प्रस्तुत की थी जिससे एक ढोलक का गीत जुड़ा था। पूरा गीत तो मुझे याद नहीं है सिर्फ़ मुखड़े की एक पंक्ति और कुछ अंतरा याद है -
सुनो मुहल्ले वालों मेरी काली मुर्गी खो गई मा
मिर्ची का सालन घी के पराठे
काली मुर्गी खो गई मा
हो सकता है कि कांचन जी के पास कुछ गीत हो।
तीसरी बात, आप विविध भारती से सीधे आकाशवाणी हैद्राबाद संपर्क कर सकते है जिससे गीतों की मूल रिकार्डिंग आपको मिल जाएगी। हां एक बात और वहां इस समय एक कलाकार (तबला वादक) काम करते है - जावेद साहब जो कनीज़ फ़ातिमा के सुपुत्र है। उनके पास ज़रूर अपनी मां के गाए गीतों का संग्रह होगा और जिन्हें वे शायद सीधे देने के बजाए कार्यालय से देना पसंद करेंगें।
इन सब में यूनूस जी आपको तक्नीकी सुविधा बहुत रहेगी। तो बस इंतज़ार कर रहे है हम…
Monday, September 24, 2007
ढ़ोलक के गीत
जिस तरह राजस्थान के लोक गीत है, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि क्षेत्रों के लोक गीत है उसी तरह हैदराबाद के लोक गीत है। दूसरे प्रदेशों के लोक गीतों के भी कुछ नाम है ऐसे ही हैदराबाद के इन लोक गीतों को ढोलक के गीत कहा जाता है।
कौन सी ढोलक ? आमतौर पर प्रयोग में आने वाली दो साज़ों की ढोलक नहीं है ये। अण्डाकार ढोलक का ये एक ही साज़ है जिसके दोनों गोलाकार किनारों पर दोनों हाथों से इसे बजाया जाता है और डोरी से गले में भी लटकाया जाता है।
सिर्फ़ इसी साज़ पर ये गीत गाए जाते है। इन गीतों की ख़ास बात ये है कि केवल महिलाएं ही इन गीतों को गाती है। जी हां ! पुरूष ये गीत नहीं गाते। महिलाओं के इस समूह में छोटी लड़की से लेकर उम्रदराज महिलाएं भी शामिल है।
दूसरी ख़ास बात इन गीतों की ये है कि यह सिर्फ़ शादी-ब्याह के गीत ही है जबकि आमतौर पर लोक गीतों में सभी तरह के गीत शामिल होते है जैसे त्यौहारों, मुंडन, बेटे का जन्म आदि मौको पर गाए जाने वाले गीत।
और भी ख़ास बात ये है कि यह सिर्फ़ छेड़-छाड़ वाले गीत ही है। वर पक्ष (दूल्हें वाले) और वधू पक्ष (दुल्हन वाले) एक दूसरे को छेड़ते है।
गीत की शुरूवात होती है ढोलक की थाप से फिर सभी की तालियों के सुर शुरू होते है धीमे-धीमे शुरू हो कर तेज़ होने लगते है। फिर शुरू होता है गीत एक आवाज़ में, दो आवाज़ों में, कोरस में।
साठ और सत्तर के दशक में जिसे हम पचास के दशक के अंत से भी शुरू कर सकते है और लगभग अस्सी के दशक तक आकाशवाणी के हैदराबाद केन्द्र से सप्ताह में कम से कम एक बार इन गीतों ने धूम मचाई। बहुत ही ख़ास बात ये है कि कलाकार केवल दो ही रहे - एक श्रीमती अर्जुमन नज़ीर और दूसरी श्रीमती कनीज़ फ़ातिमा। दोनों का अपना-अपना समूह था।
एक गीत यूं है जो बहुत ही लोकप्रिय रहा -
चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा की चोटी काट लिया रे
उनकी अम्मा बोले ये क्या हुआ
उनकी सास बोले अच्छा हुआ
चार बैंगन हरे-हरे फूफी का चूहा ग़ज़ब किया
दुल्हन आपा का कान काट लिया रे
उनकी भैना बोले ये क्या हुआ
उनकी नन्दा बोले अच्छा हुआ
भैना - बहनें
नन्दा - ननदें
दुल्हन आपा - नई ब्याह्ता
यहां एक बात हम बता दें कि हैदराबाद में सब्जियों में बैंगन और फलों में केले का बहुत उपयोग होता है। उसी का यहां प्रयोग हुआ है। हरे बैंगन जो कच्चे होते है चूहे की तरह लगते है।
अन्य लोक गीतों की तरह ढोलक के गीतों के बारे में भी कहा जाता है कि ये गीत किसने लिखे, कब लिखे कोई नही जानता। सालों से हैदराबाद की तहज़ीब का एक हिस्सा है। शहर में होने वाली शादियों में ये गीत ज़रूर गूंजा करते। तभी तो रेडियो का भी ये एक महत्व्पूर्ण हिस्सा रहे।
उर्दू कार्यक्रमों में रात साढे नौ बजे से होने वाले नयरंग कार्यक्रम में हर मंगलवार को ये गीत बजते। उसके अलावा एकाध दिन और बजते। आलम ये था कि जिन घरों में उम्रदराज महिलाएं होती जैसे दादी, ताई वहां विविध भारती से हवा महल सुनने के बाद तुरन्त ट्यून बदली जाती और नयरंग कार्यक्रमों का ब्यौरा सुना जाता। अगर ढोलक के गीत शामिल न हो तो रेडियो तुरंत बंद हो जाता।
हालात ये कि रात में लगभग 10 बजे लगभग सुनसान सड़कों और गलियों में घरों की खिड़कियों से छन कर गूंजा करते ये गीत। एक और गीत प्रस्तुत है -
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा
दूल्हा आता बोलको मै मोटर मंगाई
अय्यो मा बन्डियों पर चढने के लोगा
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा
दूल्हा आता बोलको मैं चादर मंगाई
अय्यो मा बोरियो पर लोटने के लोगा
अय्यो मा दूल्हे के नाखतरे लोगा
बन्डियां - बैलगाड़ियां
माना जाता है कि कुछ गीत ऐसे भी है जिन्हें बाद में लिखा गाया या कुछ बोलों में फेर-बदल भी किया गया। एक ऐसा ही गीत है जिसमें ये कहा गया है कि बारात शहर में आई है। दूल्हें की मां चारमीनार के आस-पास की रौनक में खो गई है -
समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा
इधर देखी उधर देखी लाड़ बज़ार की गलियां
हाय समधन मिल गई मा चूड़ी वाले की दुकान पे
समधन खो गई मा चारमीनार की सड़क पे
समधन खो गई मा
इधर देखी उधर देखी चारकमान की गलियां
हाय समधन मिल गई मा फूल वाले की दुकान पे
अस्सी के दशक से इन गीतों का बजना रेडियो से कम होता गया और अब तो शायद ही कभी बजते है। इसके पीछे बड़ी बात ये है कि नई पीढी की लड़कियों ने इन गीतों को सीखा ही नहीं। सिखाने की कोशिश ज़रूर की गई।
क्या ही अच्छा हो अगर इन गीतों को आकाशवाणी हैदराबाद के संग्रहालय से निकाल कर इंटरनेट पर रखा जाएं ताकि गुम होती कला को रेडियोनामा आवाज़ दे सकें ।
