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Thursday, November 29, 2007

आईये रिफत सरोश के संस्‍मरणों के सहारे चलें रेडियो के पुराने दिनों में

लावण्या जी आज लाईं हैं रिफत सरोश के संस्मरणलेकिन उनकी पोस् को पेश करने से पहले मैं कुछ कहने की गुस्ताखी़ कर रहा हूंजो लोग रिफत साहब को नहीं जानते ये बातें उनके लिएरिफत सरोश रेडियो की एक जानी मानी हस्ती रहे हैंशायरी और उर्दू ड्रामे में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा हैरिफत रेडियो के उन लोगों में से एक रहे हैं जिनमें कार्यक्रमों को लेकर रचनात्मकता और दूरदर्शिता थीउनकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैंविविध भारती के आरंभिक दिनों में रिफत सरोश ने भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया थापुराने लोगों से सुन सुनकर जितना जान पाया हूं उसके मुताबिक रिफत साहब उन दिनों आकाशवाणी मुंबई में थे जब विविध भारती को दिल्ली से मुंबई लाया गया थाअब ये नया प्रसंग गया ना, जी हां विविध भारती का आरंभ तीन अक्तूबर 57 को दिल्ली में हुआफिर थोड़े दिनों बाद विविध भारती को मुंबई लाया गया फिर दिल्ली और फिर अंतत: मुंबई ले आया गयाख़ैर इस संस्मरण को पढ़कर आप अगले भागों का इंतज़ार ज़रूर करेंगेरेडियो में काम कर रहे मेरे जैसे बहुत बहुत बाद के लोगों के लिए इसमें बसे हैं पुराने लोगों के किस्से जो आज भी स्टूडियो के गलियारों में गूंजते हैं । ----युनुस

चलिये जनाब 'रिफअत सरोश " साहब ने ...अपने सँस्मरणात्मक लेख मेँ ..क्या क्या यादेँ बाँटीँ हैँ उन्से आज मुखातिब हुआ जाये ...

इप्टा = माने इन्डियन पीपल्स थियेटर के पहले का स्वरुप क्या था ? जी हाँ इसका पूर्वरुप था " कल्चरल स्क्वाड " जो वह " बाँये बाजू " का कलचरल विँग था !यानी नृत्य,सँगीत, और नाटकोँ के जरीये साम्राज्यित पर चोट की जाती थी कुचली हुई जनता को सिर उठाने, अपना हक मनवाने और आज़ादी की जँग मेँ आगे बढने के लिये उसी से तैयार किया जाता था.
ये मैँ नहीँ कह रही हूँ - इसे लिखा है, जनाब 'रिफअत सरोश " साहब ने ...अपने सँस्मरणात्मक लेख मेँ ..
वे आगे लिखते हैँ कि, " एक ज़माने तक, नाच - गानोँ के प्रोग्रामोँ मेँ हिस्सा लेना तो दरकिनार,मेरे नज़दीक ऐसे प्रोग्राम देखना भी एक तरह से ऐब था.लेकिन १९४५ ई. मेँबम्बई पहुँच कर मेरी अखलाकियात ( नैतिकता )की रस्सी कुछ ढीली हो गई थी उर मैँ इस तरह के प्रोग्राम कि जिसमे अश्लील्ता न हो !
उन दिनोँ की बात है, कि बँबई के कावसजी जहाँगीर होल मेँ "कलचरल स्क्वाड " का एक प्रोग्राम हुआ , जिसकी सूचना मुझे, अपने एक दोस्त प्रेमधवन से मिली जो शायर तो हैँ ही, डाँसर भी हैँ.
हाल खचाखच भरा हुआ था. परदे के पीछे से एनाउन्सर की आवाज़ और वाक्योँ मेँ साहित्यिक पुट तथा बातसे असर पैदा करने का सलीका था सुननेवालोँ पर १ मानो प्रोग्राम की बागडोर उस आवाज़ से बँधी थी ! मालूम हुआ कि ऐसे प्रोग्राम का सँचालन कर रहे थे नरेन्द्र जी अपने विशेष रोचक अन्दाज मेँ !
जब "कल्चरल स्क्वाड " पर उस समय की सरकार ने पाबँदी ला दी थी तो उसकी जगह इप्टा ने ले ली !
इप्टा और उसकी सरगर्मियोँ और कामयाबियोँ से थियेटर की दुनिया खूब वाकिफ थी.बँबई मेँ इस के पौधे को अपनी कला से सीँचनेवाले थे नरेन्द्र जी के कई साथी, जिनमेँ प्रमुख हैँ ख्वाजा अहमद अब्बास ( जिन्होँने आ के सुपर स्टार अमिताभ को अपनी फिल्म "सात हिन्दुस्तानी " मेम पहली बार फिल्म मेँ काम करने का मौका दिया था ) ( ये टिप्पणी - लावण्या की है ) बलराज साहनी, प्रेम धवन और उनके बाद शैलेन्द्र, हबीब तनवरी, मनी रबाडी, और शौकत व कैफी आज़मी इत्यादि.
अवामी ज़िन्दगी से नरेन्द्र जी की कुर्बत देखकर मेरे दिल मेँ उनकी इज्जत पहले ही दिन से पैदा हो गयी थी.
फिर कुछ दिन बाद जब मैँ आल इन्डिया रेडियो मेँ मुलाजिम हुआ तो मालूम हुआ कि किसी मतभेद की वजह से हिन्दी के लेखक और कवि आल इन्डिया रेडियो के कार्यक्रमोँ मेँ भाग ही न लेते थे - ले दे कर एक गोपाल सिँह नेपाली थे , जो
कभी कभी कविता पाठ करने आ जाते थे. कोई और प्रसिध्ध साहित्यकार इधर का रुख न करता था हाँ डा. मोतीचन्द्र ( जो प्रिन्स ओफ वेल्स म्युझियम के प्रमुख , कर्ता धर्ता थे ) और रणछोड लाल ज्ञानी जरुर आते थे.
और फिर देश स्वतँत्र हुआ. भाषा सम्बधी आकाशवाणी की नीति मेँ परिवर्तन आया. अब हम रेडियोवाले, हिन्दी लेखकोँ और कवियोँ की खोज करने लगे.
नीलकँठ तिवारी, रतन लाल जोशी, सरस्वती कुमार दीपक, सत्यकाम विध्यालँकार, वीरेन्द्र कुमार जैन, किशोरी रमन टँदन, डा. सशि शेखर नैथानी,सी. एल्. प्रभात, के. सी. शर्मा भिक्खु, भीष्म साहनी, - हिन्दी के अच्छे खासे लोग रेडियो के प्रोग्रामोँ मेम हिस्सा लेने लगे.
उन्हीँ दिनोँ हम लोगोँने पँ. नरेद्र शर्मा को भी आमादा किया कि वे हमारे प्रोग्रामोँ मेँ रुचि लेँ - वे फिल्मोँ के लिये लिखते थे.
एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, " "कवि और कलाकार" - उसमेँ सँगीत निर्देशक अनिल बिस्वास, अस. डी. बर्मन, नौशाद और सैलेश मुखर्जी ने गीतोँ और गज़लोँ की धुनेँ बनाईँ शकील, साहिर और डा.क्टर सफ्दर "आह" के अलावा नरेन्द्र जी के एक अनूठे गीत की धुन अनिल बिस्वास ने बनाई थी, जिसे लता मँगेशकर ने गाया था - " युग की सँध्या कृषक वधु सी,
किसला पँथ निहार रही "
पहले यह गीत कवि ने स्वयम्` पढा, फिर उसे गायिका ने गाया. उन दिनोँ आम चलते हुए गीतोँ का रिवाज़ हो गया था. और गज़ल के चमकते -दमकते लफ्ज़ोँ को गीतोँ मेँ पिरो कर अनगिनत फिल्मी गीत लिखे जा रहे थे. ऐसे माहौल मेँ नरेन्द्र जी का ये गीत सभी को अच्छा लगा , जिसमेँ , साहित्य के रँग के साथ भारत भूमि की सुगँध भी बसी हुई थी. और फिर हमारे हिन्दी विभाग के कार्यक्रमोँ मेँ नरेन्द्र जी स्वेच्छा से , आने जाने लगे.
एक बार नरेन्द्र जी ने, एक रुपक लिखा - " चाँद मेरा साथी " उन्होण्ने चाँद के बारे मेँ अपनी कई कवितायेँ जो विभिन्न मूड की थीँ, को रुपक की लडी मेँ इस प्रकार पिरोई थी कि मनिष्य की मनोस्थिति सामने आ जाती थी. वह सूत्र रुपक की जान था. मुझे रुपक रचने का यह विचित्र ढँग बहुत पसँद आया और आगे का प्रयोग किया.
मैँ, बम्बई रेडियो पर हिन्दी विभाग मेँ स्टाफ आर्टिस्ट था अब्दुल गनी फारुकी प्रोग्राम असिस्टेँट !
( ( क्रमश: ~~ अगले हिस्से मेँ पढिये किस तरह आकाशवाणी मेँ "विविधभारती " का एक स्वतँत्र इकाई के स्वरुप मेँ जनम हुआ ~~ )
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Lavni :~~

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