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Wednesday, May 14, 2008

जब दो केन्द्र मिले…

आपमें से बहुतों को याद होंगे पुराने ज़माने के ट्राज़िस्टर जिनमें अक्सर तकनीकी गड़बड़ हो जाया करती थी। चलते-चलते रूक जाया करता था और जब धक्का लगाया जाता तो फिर चालू हो जाता। जब भी आवाज़ बन्द हो जाती कहा जाता एक थप्पड़ मार दो आवाज़ निकलेगी और मार खाकर आवाज़ निकलती भी।

कभी-कभी यूँ भी हो जाता कि एक स्टेशन से आवाज़ आने के बजाय पास के दूसरे स्टेशन से आवाज़ आनी शुरू हो जाती और कभी दो स्टेशन एक साथ बोलने लगते तो कभी एक के बाद एक।

आज एक ऐसा ही सीन याद आ रहा है जो मैनें एक हिन्दी फ़िल्म में देखा था जिसमें संजीव कुमार थे और नायिका शायद मौसमी चटर्जी थी।

होता यूँ है कि पति-पत्नी में झगड़ा हो जाता है तो पति संजीव कुमार कहते है कि पत्नी के बिना भी घर चल सकता है। कौन सी बड़ी बात है घर के काम करना। फिर गुस्से में ट्रांज़िस्टर चालू करते है और सुनाई देने लगता है महिला संसार कार्यक्रम जिसमें एक महिला आलू की सब्जी बनाना बता रही है। संजीव कुमार सोचते है मैं भी यह सुन कर सब्जी बनाऊंगा और शुरू हो जाते है।

तभी आवाज़ बन्द हो जाती है और धक्का देने पर दूसरा स्टेशन आता है जहाँ एक अवकाश प्राप्त फ़ौजी भाई अच्छे स्वास्थ्य के लिए योगासन बता रहे है। फिर दोनों केन्द्र मिल जाते है और संजीव कुमार कुछ इस तरह से काम करते है -

महिला - पहले आलूओं को धोइए
फ़ौजी भाई - फिर लंबी-लंबी सांसे लीजिए
अब आलूओं का छिलका निकल गया है अब इसके टुकड़े करने के लिए
दोनों हाथ ऊपर उठाइए नज़रे सीधी रख सामने देखिए
अब कढाही में तेल गरम करने के लिए रखिए
फिर धीरे-धीरे अपना बायां पैर ऊपर उठाइए और एक पैर पर खड़े हो जाइए
अब इन लम्बे टुकड़ों को धीरे-धीरे कढाही में छोड़िए
इसके लिए हाथों को नीचे ले आइए ताकि सुविधा रहे
अब जब तक टुकड़े गहरे लाल न तले जाए
ऐसे ही खड़े रहिए
अब टुकड़ों को पलटने के लिए
धीरे-धीरे अपना पैर ज़मीन पर ले आइए
करछी से धीरे से टुकड़ों को पलटाइए
और गहरी साँसे लीजिए, ऐसा तीन बार कीजिए
जिससे आलू पूरे लाल तले जाएगें
अब अगले आसन के लिए तैयार हो जाइए
सारा मसाला कढाही में मिला दीजिए
अगले आसन से पहले थोड़ा विश्राम करें
फिर नमक मिर्च डाल कर दो मिनट भूनिए और गरमा गरम सब्जी तैयार

और इसी के साथ रेडियोनामा का 250वाँ और अपना 90वाँ चिट्ठा समाप्त कर मैं बढ रही हूँ शतक की ओर

happy blogging and enjoy आलू की सब्जी…

Wednesday, April 2, 2008

जब विविध भारती ने हमें अप्रैल फ़ूल बनाया

अरे नहीं ! हम सखि-सहेली की बात नहीं कर रहे। हमें तो अप्रैल फ़ूल बनाया गया मन चाहे गीत कार्यक्रम से।

बात पुरानी है। शायद चार-पाँच साल हो गए। उस पहली अप्रैल को मन चाहे गीत शायद रेणु (बंसल) जी प्रस्तुत कर रहीं थीं।

हुआ यूं कि डेढ बजे जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ रेणु जी ने कहना शुरू किया कि आज पहली अप्रैल है। आज के दिन एक-दूसरे को मूर्ख बना कर मज़ाक किया जाता है। वैसे तो ये पाश्चात्य संस्कृति है पर हमारे देश में भी इस अवसर पर बड़े-बड़े आयोजन होते रहे है, वग़ैरह वग़ैरह…

फिर आगे कहा कि अगर आपके जीवन में भी कोई ऐसा मज़ेदार अनुभव है तो हमें बताइए। फोन लाइन खुली है और नंबर है … आप सबके अनुभवों की रिकार्डिंग हम कल प्रस्तुत करेंगे।

जाने क्या जादू था इन बातों में कि हमने गंभीरता से लिया और लगे नंबर डायल करने लगे।

हर दो-तीन गानों के बाद नंबर बताया जाता और कहा जाता कि अभी रिकार्डिंग चल रही और आप भी फोन कर अपने अनुभव बताइए। हम फोन करते गए पर फोन था कि लग ही नहीं रहा था। इसी तरह एक घण्टा बीत गया।

यक़ीन मानिए इस एक घण्टे के दौरान हमें थोड़ा सा भी शक नहीं हुआ क्योंकि इस सूचना के साथ कार्यक्रम बहुत ही सामान्य चल रहा था। कार्यक्रम की समाप्ति पर कहा गया कि आपका फोन तो लगा ही नहीं होगा और यह सुनने पर ही हमें समझ में आया कि हम तो … बन गए।

कल तीन बजे इन लोगों ने भी कोशिश की। सखि-सहेली कार्यक्रम जैसे ही शुरू हुआ, शुरू हो गया इन लोगों का नाटक। दोनों एक दूसरे को कांचन जी और कमलेश जी कह कर संबोधित कर रहे थे। कहने लगे धूप में से आकर ठंडा पानी पी लिया और गला ख़राब हो गया। भौंडी सी आवाज़ निकालने की कोशिश किए जा रहे थे।

अब कौन समझाए इन लोगों को… अरे भई ! तीन साल से सुनते आ रहे है चीं चीं। अब तो एक चीं दूसरी चीं से अलग साफ़ पहचानी जाती है। एक मिनट में वो पकड़ी गई जिसे कांचन जी कहा जा रहा था और पहला गाना शुरू होते-होते पूरी पोल-पट्टी खुल गई।

शहनाज़ (अख़तरी) जी आप तो कभी ऐसी कोशिश (हिमाक़त) कीजिए ही मत। आप कुछ भी खा पी लें, रहेगी तो शहनाज़ की शहनाज़ ही।

रही बात कांचन (प्रकाश संगीत) जी और कमलेश (पाठक) जी की तो, वो दोनों तो ऐसे ग़ायब है जैसे -- के सिर से -- (हमें उम्मीद है आप सब मुहावरा जानते है)

और इन दोनों के लिए हम एक मशहूर शायर की ये एक पंक्ति ही कहेंगे -

साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

शायर का नाम युनूस जी बता देंगे और अब हम समाप्त कर रहे है अपना पचहत्तरवाँ चिट्ठा।

Friday, January 4, 2008

कभी-कभी अपने आप पर भी हँसना चाहिए

कल विविध भारती पर जुबली झंकार में विशेष मन चाहे गीत सुने जिसमें श्रोताओं ने ऐसे गीतों की फ़रमाइश की जो उनके जीवन में ख़ास महत्व रखते है।

मेरे लिए तो पूरा मन चाहे गीत कार्यक्रम ख़ास महत्व रखता है और मेरे कार्यालय के लोगों के अनुसार ये कार्यक्रम मेरे जीवन में बहुत ही ख़ास है। कैसे ? बता रही हूं -

कार्यालय मे चाय का समय 2:30 है। मुझे हमेशा से ही कार्यालय में रेडियो सुनने की आदत है। पहले मेरे पास ट्रांज़िस्टर था। मन चाहे गीत सुनने के बाद मैं चाय पीने जाती थी। आजकल सेल फोन पर ही एफ़ एम आ जाने से फोन से ही विविध भारती सुनती हूं मगर आदत के अनुसार गाने सुन कर ही चाय पीने जाती हूं।

चाय के समय गपशप होती है। चुटकियां ली जाती है। मज़ाक के दौर चलते है। जब मुझे निशाना बनाया जाता है तो बात कुछ यूं चलती है -

कहते है पुराने ज़माने में जब किसी का आख़िरी समय आ जाता था और सांसे अटक जाती थी तब बच्चों के बारे मे कुछ सच या झूठ बता दिया जाता था जैसे बेटी की शादी तय हो गई है, लड़के सब साथ मिलकर रहेंगें वग़ैरह वग़ैरह या नाती-पोतों को दिखाया जाता या संदूक, पेटी सिरहाने रख कर बताया जाता कि तुम्हारी ज़िन्दगी भर की कमाई सुरक्षित है। इससे आराम से दम निकलता था।

जब अन्नपूर्णा का अंतिम समय आएगा तब न बच्चों के बारे में झूठ बोलने की ज़रूरत न नाती-पोतों को दिखाने की ज़रूरत और न ही जायदाद की पोटली सिरहाने रखने की ज़रूरत, बस रेडियो सिरहाने रख दो, उसमें से जैसे ही मन चाहे गीत बजने लगेंगे अन्नपूर्णा की आखें धीरे-धीरे बंद हो जाएगी और आत्मा शरीर से निकल कर सीधे स्वर्ग में पहुंच जाएगी।

Wednesday, December 12, 2007

तब्बस्सुम की क्लास

अजी नही ! हम किसी तब्बस्सुम टीचर की बात नहीं कर रहे है। हम तो आपको एक चुटकुला बताने जा रहे है जिसे रेडियो पर तब्बस्सुम से सुना था।

चुटकुला उस दौर का है जब रेडियो तो देश के कोने - कोने में गूंज रहा था पर टेलीविजन अभी नया ही था और देश के दूरदराज के लोग इससे परिचित नहीं हुए थे।

चुटकुला कुछ ऐसा है -

एक छोटे से शहर में एक स्कूल में एक क्लास में छोटे से बच्चे ने अपने टीचर से पूछा -

रेडियो और टेलीविजन में क्या फर्क है ?

टीचर ने सोचा कि बच्चे को अच्छी तरह समझाना चाहिए इसीलिए उन्होनें उदाहरण दे कर बताना चाहा और कहने लगे -

देखो बेटा अगर मैं और तुम्हारी ताई भीतर कमरे में झगडा कर रहे हो और बाहर तुम्हे सुनाई दे तो वह रेडियो है और अगर हम झगड़ते हुए बाहर आ जाए और तुम हमें झगड़ते देखो तो वह टेलीविजन है।

Friday, November 30, 2007

चलिए मुस्कुराइए !

आज मैं अपना पच्चीसवां चिट्ठा लिख रही हूं। पच्चीस अंक से समारोह की सुगन्ध आती है। चलिए मैं भी आप को शादी के समारोह में ले चलती हूं जहां मैं एक महिला के साथ बतिया रही थी। महिला पेशे से अध्यापक है। तभी वहां एक लड़की आई और उसने हमें नमस्कार किया। इस महिला ने बिना नमस्कार का जवाब दिए सीधे एक सवाल दागा

प्रीति, प्रिफाइनल्स कब है ?

मुझे गुस्सा आया कि क्या ऐसे पूछना है। अरे भई वो शादी-ब्याह में आई है। उसे थोड़ा मस्ती करने दो। यहां भी क्या परीक्षा का तनाव।
तभी मुझे याद आया बहुत दिन पहले किसी पत्रिका में पढा गया एक रोचक लेख जिसमें यह बताया गया था कि हम जिस पेशे से जुड़े होते है उसकी झलक हमारे व्यवहार में मिलती है। इसके लिए बहुत से उदाहरण दिए गए थे जिनमें से मुझे एक उदाहरण बहुत पसन्द आया जिसे यहां मैं प्रस्तुत कर रही हूं -

एक बार एक रेडियो एनाउन्सर के नन्हे-मुन्ने का जन्मदिन था। समारोह में बहुत धूम-धाम रही। अगले दिन कार्यालय में एक अधिकारी ने कहा -

हम कल ज़रा व्यस्त हो गए थे और समारोह में आ नहीं सकें। कैसा रहा ?
एनाउन्सर ने कहा - बढिया रहा, सर !
अधिकारी ने पूछा - कौन- कौन आए थे ।
एनाउन्सर ने कहना शुरू किया -
बाराबंकी बदायूं से - खुशबू पिंकी बेबी
पी के ग्राम पोस्ट छत्तरा छत्तीसगढ से - पप्पू वीनू नन्दिनी
अटूट गांव ज़िला खंडवा रायपुर से - नीना इंगले उषा इंगले विनोद इंगले और इंगले परिवार के सभी सदस्य
भाटापारा तेवरका राजनन्द गांव से ज्ञानेश्वरी परमेश्वरी माहेश्वरी
टाटा नगर से - राजू देवेन्द्र अमित दीपक
बड़काकाना से ------------
----------- से -------------
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Saturday, November 17, 2007

एक मीठी सी तबस्सुम

आज मैं अपना बीसवा चिट्ठा लिख रही हूं और रेडियोनामा में चिट्ठों की सूची से पता चलता है कि ये पचहत्तरवां चिट्ठा है। बीस यानी दो दशक और ७५ यानी प्लैटिनम जुबली, तो मैनें सोचा आज माहौल थोड़ा खुशनुमा रखा जाए।

ख़ुशनुमा माहौल की बात हो और वो भी रेडियो के लिए तो तबस्सुम की बात न हो ये तो हो ही नहीं सकता।

तबस्सुम - यथा नाम तथा गुण। उर्दू में तबस्सुम का मतलब होता है मुस्कान। जब भी टेलीविजन पर तबस्सुम को देखा मोहक मुस्कान के साथ देखा। जब भी रेडियो पर तबस्सुम की खनकती आवाज़ सुनी माहौल ख़ुशनुमा हो गया।

चुटकुलों से ही कार्यक्रम को रोचक बना लेना तबस्सुम की ही कलाकारी है। तभी तो उन्हें चुटकुलों की महारानी कहा गया।

हर विषय पर तबस्सुम ने चुटकुला सुनाया। चाहे बच्चे हो, बुज़ुर्ग हो, स्कूल का माहौल हो, शादी का माहौल या फिर जंगल का शिकारी ही क्यों न हो, यहां तक कि तबस्सुम ने खुद अपने आप पर भी चुटकुले सुनाए। एक ऐसा ही चुटकुला यहां प्रस्तुत है -

एक बार तबस्सुम को विविध भारती पर एक कार्यक्रम देने जाना था। कार्यक्रम लाइव था यानि सीधा प्रसारण होना था।

उनके ड्राइवर ने अचानक छुट्टि ले ली। तबस्सुम को गाड़ी चलाना नहीं आता था तो उन्होनें टैक्सी में जाने का फैसला लिया।

उनके पति ने सलाह दी कि वो टेलिविजन पर भी कार्यक्रम देती है जिससे लोग उन्हें पहचानते है इसीलिए उन्हें बुर्का पहन कर जाना चाहिए।

बुर्के में तबस्सुम घर से निकलीं और थोड़ा आगे बढ कर वहां खड़ी एक टैक्सी के ड्राइवर से कहा कि रेडियो स्टेशन तक छोड़ दे। टैक्सीवाले ने कहा कि नहीं अब मैं कोई सवारी नहीं बैठाता, इस समय मैं काम नहीं करता क्योंकि अब थोड़ी ही देर में रेडियो से तबस्सुम का चुटकुलों का कार्यक्रम आने वाला है। मैं अब वही सुनूंगा।

तबस्सुम को बड़ी ख़ुशी हुई। मन में सोचा कि ये मेरा कितना बड़ा फैन है। मेरा कार्यक्रम सुनने के लिए ये तो काम-धंधा भी छोड़ देता है। वो ये तो नहीं कह सकतीं थीं कि जब तक तुम मुझे रेडियो स्टेशन तक नहीं ले जाओगे कार्यक्रम तो शुरू ही नहीं होगा, तो उन्होनें फिर एक बार अनुरोध किया लेकिन टैक्सी वाला नहीं माना।

फिर तबस्सुम ने अपनी पर्स से एक बड़ा नोट निकाला और टैक्सीवाले की ओर बढाया। टैक्सी वाले ने झट से नोट लपक लिया और कहा -

आओ बहनजी बैठो, मारो गोली तबस्सुम वबस्सुम और उसके प्रोग्राम को।

Friday, October 12, 2007

अब क्यों न थोड़ा सा हंस लिया जाए

रेडियोनामा पर मेरे चिट्ठों की संख्या ने दो अंकों में प्रवेश किया है। आज मैं अपना दसवां चिट्ठा लिख रही हूं। इस मौके पर मैनें सोचा कि क्यों न थोड़ा सा खुश हो लिया जाए, हंसा जाए, मुस्कुराया जाए।

तो चलिए हम आपको एक चुटकुला सुनाते है। ओफ़्फ़फ़फ़ो ! सुनाते नहीं लिखते है। यह चुटकुला भी रेडियो से ही संबंधित है -

चुटकुला कुछ यूं है -

एक किसान के खेत में फसल खूब अच्छी हुई। फसल लेकर वह शहर गया बेचने। आमदनी भी खूब हुई सो किसान ने शहर में खरीददारी भी की।

बहुत सी चीज़े खरीदी। एक ट्रांसिसटर भी खरीदा। दुकानदार ने बजा कर बताया। किसान इतना खुश हुआ कि रेडियो के प्रोग्राम सुनते हुए ही गांव पहुंचा। सबको दिखाया, सुनाया।

लगातार बजते-बजते बैटरी डाउन हो गई। आवाज़ पहले कम हुई फिर बन्द हो गई। अब किसान को तो कुछ मालूम नहीं। मालूम होगा भी कैसे ? उसने दुकानदार को कुछ कहने का मौका ही कहां दिया ? वह तो ट्रांसिसटर की आवाज़ आनी शुरू होते ही खुशी से झूमने लगा था।

अब वह परेशान कि आवाज़ आनी बन्द हो गई। फिर उसे गुस्सा आ गया और उसने ज़ोर से ट्रांसिसटर को पटक दिया। पटकते ही ट्रांसिसटर टूट गया और मशीनरी, बैटरी बाहर निकल आए जिसको देख कर उसने कहा -

गाने वाले तो भाग गए पर बाजे-गाजे यहीं छोड़ गए।

क्यों आया न मज़ा। अरे भई यह चुटकुला ओरिजिनल मेरा नहीं है। मैनें भी यह चुटकुला रेडियो से ही सुना।

रेडियो सिलोन के प्रायोजित कार्यक्रम मराठा दरबार की महकती बातें कार्यक्रम में यह चुटकुला तबस्सुम ने सुनाया था जिसका विज्ञापन अमीन सयानी करते थे -

मराठा दरबार अगरबत्ती तीन अलग-अलग खुशबुओं में - ताज़े गुलाबों की खुशबू वाली मराठा गुलाब अगरबत्ती, मोगरे की सुगन्ध वाली मराठा मोगरा अगरबत्ती और केवड़े की महक वाली मराठा केवड़ा अगरबत्ती।

यहां देखिए गुलाब, मोगरा और केवड़े के लिए अलग-अलग और सही शब्द चुने गए।


और इसी खुशबू के साथ मैं ले रही हूं अल्पविराम। आपसे भेंट होगी नवरात्रि के बाद। आप सबको -

ईद और दशहरा मुबारक !

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