
बीतते जा रहे २००९ ने जाते जाते संगीतप्रेमियों को आख़िर वह मनहूस ख़बर सुना ही दी है. एक ईमेल के ज़रिये वर्ल्डस्पेस सैटेलाइट रेडियो ने अपनी भारतीय अनुशंगी इकाई को बंद करने की घोषणा कर दी है. सैटेलाइट के ज़रिये वर्ल्डस्पेस ने जिस ख़ूबसूरती से सुरीलापन परोसा था वह बेजोड़ ही नहीं था रोमांचकारी भी था. भारतीय शास्त्रीय संगीत,ग़ज़ल,चित्रपट संगीत के अलावा गुजराती,बांग्ला,मराठी,पंजाबी और तमिल भाषाओं में इसके प्रसारणों ने एक लम्हा तो हमारी देसी प्रसारण संस्थाओं को घबराहट दे ही दी थी. बेहतरीन क्वालिटी का डिजीटल प्रसारण, फ़िज़ूल की उदघोषणाओं से परहेज़,और दुर्लभ रचनाओं का संकलन वर्ल्डस्पेस को अन्य रेडियो प्रसारणों से अलग करते थे. वर्ल्डस्पेस ने अपने आपको आर्थिक रूप से स्वतंत्र रखने के लिये इश्तेहारों के बजाय श्रोताओं के सदस्यता शुल्क पर ज़्यादा ऐतबार किया. उसे हाथों हाथ लिया भी गया लेकिन लगता है वैश्विक मंदी और एक जगह जाकर रूक सी गई उसकी सदस्यता ने उसके वजूद को मुश्किल में डाल ही दिया. वैसे वर्ल्डस्पेस के बंद होने की ख़बर पिछले एक बरस से आ रही थी लेकिन अब यह एक सचाई है कि वर्ल्डस्पेस बंद हो रहा है. इस ख़बर ने संगीत के उन श्रोताओं को निश्चित ही दु:खी कर दिया है जो जुनूनी कहे जा सकते हैं.
इसमें की शक़ नहीं कि संगीतप्रेमियों को सीडी,इंटरनेट और आकाशवाणी और विविध भारती का आसरा तो है ही और सुनने वाला तो कैसे भी अपनी प्यास बुझा ही लेगा लेकिन वर्ल्डस्पेस ने जिस उत्कष्टता से अपनी महफ़िलें सजाईं थीं वह अब शायद ही सुनने को मिले. कुमार गंधर्व,अमीर ख़ाँ,गिरिजा देवी,सिध्देश्वरी देवी,बेगम अख़्तर,प्रभा अत्रे पर किये गये कार्यक्रम तो श्रोताओं को भुलाए नहीं भुलेंगे.वर्ल्डस्पेस की सबसे बड़ी ख़ासियत यह रही कि उसने प्रसारणकर्ताओं की अपनी टीम एकदम नई आवाज़ों को शुमार किया और भाषा,कंटेट और प्रसारण क्वालिटी के ख़ालिस नया अंदाज़ गढ़ा. रागों की जानकारी देने और शास्त्रीय संगीत की ओर नये श्रोताओं को लाने के लिये राग-रागिनियों पर आधारित गीतों का प्रसारण किया. अपने उर्दू चैनल फ़लक पर शायरों के साथ तीन से चार घंटों के इंटरव्यू प्रसारित किये. इनमें मुनव्वर राना का इंटरव्यू तो अविस्मरणीय था. प्रसारणकर्ताओं की फ़ेहरिस्त में भी वर्ल्डस्पेस ने माणिक प्रेमचंद जैसे फ़िल्म संगीत के गूढ़ ज्ञाता को अपने साथ जोड़ा. वर्ल्डस्पेस पर सीएनएन और बीबीसी सुनना एक अदभुत अनुभव होता था. मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले को जिस तरह से बीबीसी के संवाददाताओं ने कवर किया था वह तो अपने आप में नायाब था ही लेकिन स्पष्ट आवाज़ के साथ बीबीसी को अपने घरों में बजते सुनना किसी करिश्मे से कम नहीं था वरना मीडियम वेव और शार्टवेव पर बीबीसी को खरखराहट के साथ सुनने में सारा मज़ा किरकिरा हो जाता है.
वर्ल्डस्पेस ने एक और ख़ास आदत से भारतीय श्रोताओं को रूबरू करवाया. और वह थी संगीत को पैसा देकर सुनने की आदत डालना.कई लोगों को याद होगा कि हम भारतीय लोग किसी ज़माने में रेडियो की लायसेंस फ़ीस भरने पोस्ट-ऑफ़िस जाया करते थे.धीर धीरे वह फ़ोकट का माल हो गया. वैसे भी हम संगीत और नाटक सुनने/देखने का काम मुफ़्त में करने के लिये कुख्यात हैं. वर्ल्डस्पेस ने उस मूर्खता को सुधारा. कभी भी कोई भी श्रोता बिना सदस्यता शुल्क दिये इस सैटेलाइट रेडियो के प्रसारण नहीं सुन सकता था. बहरहाल वर्ल्डस्पेस विदा हो रहे २००९ के साथ विदा ले रहा है लेकिन उसने सुननेवालों को जो सुकून,तसल्ली और परमानंद दिया है वह कई बरसों तक याद किया जाता रहेगा....
