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Saturday, August 16, 2008

साझ और आवाझ तथा साझ पहेली सबसे पहेले

आदरणिय पाठक गण,

इस ब्लोग पर अन्नपूर्णाजी ने कई बार साझ और आवाझ कार्यक्रम का जिक्र किया जिस पर मैंनें तथा कई पाठक लोगने अपने प्रतिभव दिये । पर आज एक बात कार्यक्रम के इस नाम को सबसे पहेले किस रेडियो चेनलने अपने कार्यक्रम के लिये चूना यह बात आज इस पोस्टमें बताऊँगा ।
आपको याद होगा कि 1966 में स्व. सुबोध मुकर्जी के निर्देषनमें स्व. नौशादजी के संगीत के साथ फिल्म साझ और आवाझ आयी थी । उस समय विविध भारती पर रात्री 10.30 पर सिर्फ़ 5 मिनीट का सिर्फ़ एक धून का कार्यक्रम नूपूर चलता था । करीब इस फिल्म की रिलीझ के बाद इसी नाम से (शायद) दो पहर दो बज कर 15 मिनीट पर 15 मिनीट का कार्यक्रम ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस (उस जमाने में बोला जाता था-ऑल इंडिया रेडियो का उर्दू प्रोग्राम) ने फिल्मी धून और सम्बंधीत गानों का कार्यक्रम शुरू किया । बादमें यही नाम से कार्यक्रम विविध भारती सेवाने शुरू किया जो शुरूमें शास्त्रीय वाद्य संगीत और उसी राग वाले शास्त्रीय कंठ्य संगीत पर आधारित हुआ करता था, जो बादमें संगीत सरिता की शुरूआत के बाद फिल्मी धूनों और फिल्मी गानों का हो गया, जो पहेले दो पहर को 11.45 पर था जो बादमें बंध किया गया था । फ़िर कोई एक समय रात्री 9 से 9.15 पर होता था । इसी दौरान रेडियो श्रीलंका से भी 1969 या 1970में वहाँ की आज की उद्दघोषिका श्रीमती ज्योति परमार के पिता स्व. दलवीर सिंह परमार साहब (जो श्री मनोहर महाजन साहब के साथ ही वहाँ सेवा नियूक्त हुए थे)ने शुरू किया था । उर्दू सर्विस पर यह कार्यक्रम आज पाक्षिक रूपमें शायद दूसरे और चौथे सोमवार को जारी है और मेरे सुनने में विविध भारती के सिने पहेली कार्यक्रम की शुरूआत के कुछ: साल पहेले से माह के पहेले और तीसरे रविवार दोपहर तीन से साढे तीन बजे तक साझ पहेली कार्यक्रम आता है जिसमें सिने पहेली की शुरूआत तक मैं नियमीत रूपसे हिस्सा लेता था । बादमें उनके ट्रांसमिसन की तक़लीफ के कारण और सिने पहेली के समय टकराव के कारण मेरा वह सुनना छूट गया था जो उस समय एस एम सफ़ी प्रस्तूत करते थे पर आज उनके प्रसारण के सुधार और डी टी एच से उपलब्धी के कारण मैं साझ पहेली का श्रोता फ़िरसे बना हूँ । हाँ, एक बात जरूर है कि श्री एस एम सफ़ी साहब एल्पीझ, ईपीझ और 78 आरपीएम से भी पूराने गानों की और कभी कभी पूरानी धूने भी बजाते थे । उनकी अवेजीमें कभी यह कार्यक्रम अनवार अंजूम प्रस्तूत करते थे । उनका एक अलग अन्दाझ था । वे लोग साझ और कालाकार के नाम बताते थे और गाने की और फिल्म की पहचान पूछी जाती थी । आज के दिनों यह कार्यक्रम फूला पंडिता प्रस्तूत करती है पर ज्यादा तर वे साझ और वादक कालाकार के नाम बताती नहीं है पर मेरे जैसे धून सुनने के अनुभवी श्रोता पहचान जाते है । ब्रियान सिलाझ की पियानो पर बजायी पूराने गानो की नयी धूनों का बोलबाला है और पूराने गानों की पूरानी धूनों में सिर्फ़ और सिर्फ़ मास्टर इब्राहीम की क्लेरीनेट पर बजाई धूनों का बोलबाला है, जो मोनो रेकोर्डिंगमें है, जिसकी वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ यही है कि मास्टर इब्राहीम की इन 78 आर पी एम वाली रेकोर्ड्झ को प्रकाशन कम्पनीने सीडी पर पुन: प्रकाशित किया है । मैंनें इस ब्लोग पर जब मास्टर इब्राहीम की गंगा जमूना की धून नैन लड गई है प्रस्तूत कि थी, वह साझ पहेली के इसी उर्दू चेनल के प्रसारण से ली थी और उसमें शुरूमें जो उद्दघोषणा सुनाई पड़ी थी, वह आवाझ फूला पंडिता की ही है पर ताज्जूब यह है कि किसी पाठक ने इस बारेंमें कोई जिज्ञासा प्रगट नहीं की ।
पियुष महेता ।
सुरत-395001.

Tuesday, January 15, 2008

साझ और आवाझ

आज जब त्रिवेणी कार्यक्रम के बारेमें श्री अफलातूनजी की पोर्ट पढ़ रहा था तब रात्री ११ बज कर ५ मिनिट होने वाले थे और इस पोस्ट का अन्तिम भाग जो साझ और आवाझ से सम्बंधित था उसमें उन्होंने जो साझ और कलाकारों का जिक्र किया है उनमें से एक जिन्होंने मूझे धून बजानेवालों में से सबसे पहेले आकर्षित किया था वैसे कलाकार श्री एनोक डेनिएल्स साहब की पियानो एकोर्डिय्न पर बजाई हुई धून जो ज्नकी इ. स. १९६६ की लोन्ग प्ले रेकोर्ड्में से है , फिल्म आयी मिलन की बेला के गीत मैं प्यार का दिवाना श्री राजेन्द्र त्रिपाठी साहब कार्यक्रम विवरण के बाद बजा रहे थे । हा~ यह बात जरूर थी की इस धून के बारेमें कुछ भी बताया नहीं गया और स्वाभाविक है कि सिर्फ़ धूनों के शुरू के आधे हिस्से ही हर हमेश बजते है । और एक कभी कभी ही श्री कमल शर्माजीने अपनी बारीमें सिर्फ़ पियानो बादक ब्रियान सिलास का नाम ही बताया है । यह बात और है कि मैं इस बारेमें अपने बचपनसे ही शोखीन रहा हू~ इस लिये ध्होन सुनते ही साझ और कलाकार मेरे दिमागमें याद आ ही जाते है, और इसी तरह आज भी आ गये । श्री युनूसजी, उनकी घरकी और दफ़तर की साथी श्रीमती ममताजी, श्री कमल शर्माजी, श्री अशोक सोनावणेजी, श्री रेणू बन्सलजी, श्रीमती निम्मी मिश्राजी, श्री महेन्द्र मोदी साहब तथा विविध भारती के अभी बंध हो गये फोन इन कार्यक्रम के नियमीत श्रोतावर्ग तथा रेडियो श्रीलंकाकी श्रीमती पद्दमिनी परेराजी तथा श्रीमती ज्योति परमारजी सब मेरे इस फिल्मी धूनो के शौक़ से पूरे वाकिफ़ है । इस लिये श्री अफलातूनजी से मेरा विनम्र निवेदन है और साथमें इस ब्लोग के युनूसजी को छोड़ और पाठक-गणसे निवेदन है की इस तरह की छुट-मूट की धूनों की प्रस्तूती के अलावा एक फिल्मी धूनोका नियमित कार्यक्रम जो इन माहितीयो~ के साथ प्रस्तूत करने के लिये विविध भारतीको बार बार पत्र्रवलिमें पत्र लिखें । मैं कई बार लिखं चूका हू~ और श्री महेन्द्र मोदी सागब को दो तीन बार रूबरू भी कह चूका हू~ । रेडियो श्रीलंकासे हर शनिवार रात्री करीब ८.३० पर साझ और आवाझ होता है, जो भी एक समय वे लोग बंध करने वाले थे , तभी संयोगसे उस समयकी इस कार्यक्रमकी प्रस्तूतकर्ता श्रीमती पद्दमिनीजी से मेरी इस कार्यक्रमके मेरे शोक़से सुनने के बारेमें मेरी बात हुई, और वहा~ यह कार्यक्रम भूत्पूर्व होते होते बग गया ।
पियुष महेता ।

Wednesday, November 14, 2007

, गुन्जन, नुपूर, साझ और आवाझ

आदरणीय श्रीमती अन्नपूर्णाजी,
जैसे लोग फिल्मी गीतो को याद रख़ते है , ठीक उसी तरह मैं फिल्मी धूनों को याद रख़ता हूँ । और मनमें ही मनमें लोग जिस तराह गानों के वाद्यवृंद के साथ शब्दावलि मन में याद रख़के गुनगुनाते है, ठीक उसी तरह मेरे दिमागमें उन धूनो का उस धून में मेलोडी पार्ट का एक या कभी कभी दो मुख्य साझ पर बजा हुआ हिस्सा और गीतोके वाद्यवृंद के हिसाब से धूनमे बजाया गये हिस्से वाली पर कभी थोडी सी अलग सी और मुल गीत की संगीत रचना की सरगम को कहीं साझो का फेर-बदल करके की गयी प्रस्तूती यह सब एक बार कोई धून मैं सुन लेता हूँ, तो मेरे दिमागमें काफी़ हद तक रेकोर्ड हो जाता है । और वही धून बादमें जब फिर सुननेमें आती है, और उस धून के बजाने वाले की माहिती एक बार रेडियो पर सुननी या रेकोर्ड या सीडी पर पढीं होती है, तब मेरे मनमें वह माहिती धूनको सुनते ही आ जाती है । मेरे अपने पास भी धूनो का तगडा संग्रह है, जो केसेट्स में है और जिसमें कई अलभ्य भी है जो रेडियो से भी इकठ्ठी की है उनको धीरे धीरे एमपी३ में तबदील कर रहा हूँ । अगर पाठको के रस का विषय रहा तो इनमें से कोई कोई इस ब्लोग पर प्रस्तूत अपनी सुविधा अनुसार करूँगा । आपने जो किस्मत फिल्म के लाखो है यहाँ दिल वाले की धून को याद किया है वह एक समय हवाईन गिटार पर शायद दिपानकर सेनगुप्ता की बजाई आती थी पर बादमें वही धून माऊथ ओरगन पर एक एच. एम. वी. की एल.पी. में श्री शैकत मुकरजीने बजाई । फिल्म लव इन टोकीयो के गीत सायोनारा की धून विविध भारती से नहीं पर रेडियो श्री लंकासे सोलोवोक्स पर श्री केरशी मिस्त्री और प्यानो-एकोर्डियन ( जो हकिकतमें एकोर्डियन ही होता है) पर स्व. श्री गुडी़ सिरवाईने युगल बंदीमें प्रस्तूत की थी । इस धूनमें ताल वाध्यो के सिवा पूरी धून बीच वाले संगीत के साथ इन दो कलाकारोने ही बजाई है । विविध भारती और रेडियो श्री लंका दोनो केन्द्रोके बहोत से लोग युनूसजी और रेडियो सखी ममताजी सहीत मेरे इस पागलपन से भली-भांती परिचीत है । मैनें धून आधारित कार्यक्रम को फिरसे शुरू करने के लिये कई बार लिखा है और इन दोनों सहीत और श्री महेन्द्र मोदी साहबको उनके कार्यालयमें भी कई बार बातें की है । आप सभी को पत्रावलिमें ई मेईल करे ऐसा मेरा आग्रह भरा अनुरोध है । फिल्म प्रेम पर्बत के गीत ये दिल और उनकी निगाहो के साये की धून मैनें सितार पर नहीं पर एक धून शहनाई पर कन्हैयालाल की (वाद्यवृन्द संयोजन श्री ऎनिक डेनियेल्स) और दूसरी पियानो पर श्री केरशी मिस्त्री की बजाई हुई सुनी है और दोनो की दोनो मेरे संग्रहमें है । करीब अगस्त २००२ के बाद साझ और आवाझ जो हर शुक्रवार के दिन ७.४५ से ८.०० बजे तक होता था जो बादमें उन लोगोने बंध करके जिज्ञासा उसी समय पर फिरसे शुरू किया है, और फिल्मी धूनो को अभी करीब शाम ६.०८ पर कोई भी उदघोषणा बिना प्रस्यूत किया जा रहा है । करीब ६ से ७ मिनिट की समय-पुर्ति के रूपमें, जिसमें ज्यादा तर प्रथम धून पूरी बजती है । सबसे पहेले गुन्जन कार्यक्रम करीब ११.३० या ११.४५ पर होती थी, जिस जमानेमें १०.१५ पर रसवंती पूराने गानों का आता था और १२.३० पर विविध भारती की दूसरी सभा समाप्त होती थी । बादमें १०.१५ और रात्री ९.१० पर गुन्जन शुरू होने पर साझ और आवाझ सिर्फ़ एक ही राग वाली शास्त्रीय वाद्य और कंठ संगीत का कार्यक्रम बना था जो संगीत सरिता शुरू होने तक चला था । और संगीत सरिता शुरु होने पर गुन्जन बंध कर साझ और आवाझ को शुरूमें उसी समय फिल्मी गीतो और उनकी धूनो का बनाया गया था । अगर किसी पाठक को इस बारेंमें वोईस चेटिन्गमें भी बात करनी हो तो स्वागत है । एक बार युनूसजीने अपने कार्यालयमें मुझसे विविध भारती की लायब्रेरीमें सालों से नहीं बजी ७८ आरापीएम और ईपीझ की लिस्ट मांगी थी जो सालों से इस चेनल पर एक लम्बे अरसे से नहीं प्रस्तूत हुई, तब मैनेम एक लम्बी लिस्ट वहाँ की वहाँ अपने दिमागी याददास्स्त पर लिख़ कर दी थी । पर हाय विविध भारती लायब्रेरी का रख़ रखाव ! वे ज्यादा कुछ नहीं कर सके । इस बारेमें रेडियो श्री लंका की लायब्रेरी का रख रखाव का मेरा अनुभव बहोत बहोत सुंदर रहा । वहाँ से मेरी याद दिलाई कई धूनो और गीतो जो अरसे से नहीं बजे हो श्रीमती पद्मिनी परेरा (जो भारतीय नहीं पर श्रीलंकन ही है फिर भी) बजाती ही है ।
पियुष महेता।

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