हवामहल का नाम आते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। लगता है जब हवामहल की बात होगी तो कुछ मज़ेदार बातें होगी।
हवामहल की अधिकतर झलकियों का विषय रहा पति-पत्नी की नोंक-झोंक। कभी-कभी तो ऐसी भी बातें हुई जो सत्य से परे है जैसे मरने के बाद अपनी शोक सभा देखना, चाँद के लोगों का ज़मीं के लोगों से मिलने आना वग़ैरह वग़ैरह…
मगर कभी-कभार हवामहल का एक अलग ही रूप देखने को मिला। जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते है वैसे ही है यह दो रूप पर सिक्के के जिस ओर मूल्य लिखा होता है वहीं अधिकतर देखा जाता है उसी तरह हवामहल का भी रोचक पहलू ही देखा गया।
सिक्के के दूसरे पहलू में जिस तरह महत्वपूर्ण मुद्रा अंकित होती है पर जिसकी ओर देखने की आवश्यकता महसूस नहीं होती और कभी-कभार ही नज़र चली जाती है उसी तरह हवामहल का यह पहलू है जिसमें साहित्यिक रचनाओं का नाट्य रूपान्तर प्रस्तुत किया जाता है।
सबसे पहला नाम उभर कर आता है शरतचन्द्र के मूल बंगला उपन्यास का हिन्दी नाट्य रूपान्तर - परिणीता। रविन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास को भी इसी तरह "नौका डूबी" शीर्षक से प्रस्तुत किया गया। बाद में हवामहल की प्रकृति के अनुरूप इस विषय को आधुनिक रूप में भी प्रस्तुत किया गया जिसमें दुल्हनें नहीं केवल उनकी चप्पलें बदलती है।
साहित्य से चुनी हुई कहानियों का भी नाट्य रूपान्तर किया गया जैसे रविन्द्रनाथ टैगोर की कहानी जीवित या मृत, प्रेमचन्द की कहानी पूस की रात।
भारतीय साहित्य ही नहीं विदेशी साहित्य को भी शामिल किया गया। प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कहानी "द लास्ट लीफ़". इसके अलावा एकाध झलकी मैनें ऐसी भी सुनी थी जो मूल रूसी कहानी के अंग्रेज़ी अनुवाद से किया गया हिन्दी नाट्य रूपान्तर था जिसके नाम मुझे याद नहीं आ रहे।
विदेशी साहित्य में सबसे अच्छे लगते थे ओ हेनरी की कहानियों के हिन्दी नाट्य रूपान्तर जिसमें सबसे अच्छी लगी - साबुन की टिकिया।
हालांकि हवामहल की लोकप्रिय झलकियों की जब भी चर्चा होती है उसमें इनमें से किसी का भी नाम नहीं होता क्योंकि हवामहल को हमेशा से ही एक विशेष नज़रिए से ही देखा गया है जिसमें सिर्फ़ हँसी है, गंभीरता नहीं है। इसीलिए हवामहल हमेशा हवामहल ही रहा और यह ध्यान ही नहीं रहा कि हवामहल के नीचे ज़मीन भी है।
सबसे नए तीन पन्ने :
Showing posts with label हवामहल. Show all posts
Showing posts with label हवामहल. Show all posts
Thursday, May 1, 2008
Monday, February 18, 2008
स्वयंवर
इतिहास हमेशा से ही फ़िल्मकारों, साहित्यकारों का प्रिय विषय रहा है। मुग़ले आज़म से लेकर जोधा अकबर तक हर दौर में फ़िल्मकारों ने इतिहास से विषय लिए है। कितने ही उपन्यासों, कहानियों, नाटकों और कविताओं का विषय ऐतिहासिक घटनाएं और पात्र रहे है।
इसी तरह टेलिविजन और रेडियो में भी इतिहास से विषय लिए गए है। और क्यों न लिए जाए ? इतिहास में सब कुछ होता है - युद्ध की विभीषिका, प्रेम प्रसंग, गीत-संगीत का पूरा अवसर, राजनीति-कूटनीति और समाज के लिए किए जाने वाले कल्याणकारी कार्य।
इन दिनों टेलिविजन पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में एक ही ऐतिहासिक धारावाहिक है - स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला पृथ्वीराज चौहान। आजकल ये संयोगिता के स्वयंवर की ओर बढ रहा है।
ऐसे में मुझे याद आ रही है हवामहल में बहुत समय पहले सुनी गई झलकी - स्वयंवर। इस झलकी में जयचन्द के दिल्ली से रिश्तों के साथ स्वयंवर की झलक थी। किस तरह पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति को द्वारपाल की जगह रखा देखकर सभी आमंत्रित राजा उपहास करते है और फिर एक-एक कर राजाओं के पास से गुज़रती हुई संयोगिता उस मूर्ति के गले में वरमाला डालती है फिर पृथ्वीराज चौहान सामने आ कर उसे हर ले जाते है।
छोटी सी झलकी में पूरे विषय को अच्छी तरह संपादित किया गया था। शायद संयोगिता की सखि का नाम चन्द्रिका बताया गया था जबकि धारावाहिक में वैशाली बताया जा रहा है, खैर… इतिहास की इतनी जानकारी तो हमें नहीं है।
और हां, हवामहल कार्यक्रम के स्वभाव के अनुरूप एक ऐसी ही हास्य झलकी भी प्रसारित हुई थी जिसमें आधुनिक लड़की स्वयंवर रचाती है।
बात इतिहास की करें तो हमारी जानकारी में हवामहल में प्रसारित होने वाली यह एक ही झलकी है जो ऐतिहासिक विषय पर है। इसके लेखक, प्रस्तुतकर्ता और कलाकारों के नाम हमें याद नहीं आ रहे है।
इसी तरह टेलिविजन और रेडियो में भी इतिहास से विषय लिए गए है। और क्यों न लिए जाए ? इतिहास में सब कुछ होता है - युद्ध की विभीषिका, प्रेम प्रसंग, गीत-संगीत का पूरा अवसर, राजनीति-कूटनीति और समाज के लिए किए जाने वाले कल्याणकारी कार्य।
इन दिनों टेलिविजन पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों में एक ही ऐतिहासिक धारावाहिक है - स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला पृथ्वीराज चौहान। आजकल ये संयोगिता के स्वयंवर की ओर बढ रहा है।
ऐसे में मुझे याद आ रही है हवामहल में बहुत समय पहले सुनी गई झलकी - स्वयंवर। इस झलकी में जयचन्द के दिल्ली से रिश्तों के साथ स्वयंवर की झलक थी। किस तरह पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति को द्वारपाल की जगह रखा देखकर सभी आमंत्रित राजा उपहास करते है और फिर एक-एक कर राजाओं के पास से गुज़रती हुई संयोगिता उस मूर्ति के गले में वरमाला डालती है फिर पृथ्वीराज चौहान सामने आ कर उसे हर ले जाते है।
छोटी सी झलकी में पूरे विषय को अच्छी तरह संपादित किया गया था। शायद संयोगिता की सखि का नाम चन्द्रिका बताया गया था जबकि धारावाहिक में वैशाली बताया जा रहा है, खैर… इतिहास की इतनी जानकारी तो हमें नहीं है।
और हां, हवामहल कार्यक्रम के स्वभाव के अनुरूप एक ऐसी ही हास्य झलकी भी प्रसारित हुई थी जिसमें आधुनिक लड़की स्वयंवर रचाती है।
बात इतिहास की करें तो हमारी जानकारी में हवामहल में प्रसारित होने वाली यह एक ही झलकी है जो ऐतिहासिक विषय पर है। इसके लेखक, प्रस्तुतकर्ता और कलाकारों के नाम हमें याद नहीं आ रहे है।
Wednesday, January 16, 2008
रेस की घोड़ी
रेडियोनामा के ब्लोग पर ऐसा शीर्षक पढ कर ही समझ में आ जाता है कि बात चल रही है हवामहल की। आपमें से बहुतों को याद भी आ गई होगी दिलीप सिंह की लिखी झलकी - रेस की घोड़ी
वैसे तो दिलीप सिंह ने हवामहल के लिए और भी झलकियां लिखी लेकिन मेरे लिए तराज़ू के एक पलड़े में सारी झलकियां है और दूसरे पलड़े में है रेस की घोड़ी
विषय की अगर बात करें तो इसका विषय सभी के लिए नहीं है। ऐसे विषय आमतौर पर वयस्कों के लिए होते है लेकिन लेखक का कमाल है कि यह परिवार के साथ बैठ कर सुनने का विषय बन गया है।
यह वयस्कों का विषय है - पति, पत्नी और वो
पति है रामलाल, पत्नी है कमला और वो है रीटा। क्या चयन है नामों का, लगता है साधारण जनता के नाम है। पूरी झलकी में ये तीनों ही है जिसमें से बड़ा हिस्सा पति-पत्नी की नोक-झोंक है जो हवामहल की ख़ास पहचान है।
रविवार की शाम है पति घर से बाहर जाना चाहता है प्रेमिका से मिलने पर अकेले बाहर निकलने का बहाना नहीं सूझ रहा और इसी उलझन में वह पता नहीं क्या-क्या बोल रहा है जो बातें तो बेवकूफ़ी की है पर अच्छा हास्य का माहौल बनाती है -
पत्नी - आजकल अख़बार में ऐसी ख़बरें (परलोक सिधारने की ख़बरें) कम आती है
पति - आजकल गर्मिया है न लोग शहर में है नहीं पहाड़ों पर गए है इसीलिए
पूरी झलकी में हास्य बना रहा पर शालीनता रही। जैसे -
पत्नी को शक होने लगता है तो पति उसे समझाता है कि शक करना बुरी आदत है तब पत्नी कहती है कि वह शक करने पर मजबूर हो जाती है -
पत्नी - तुम मुझे अपने साथ पार्टियों में क्यों नहीं ले जाते
पति - (मन में कह रहा है) तुम को साथ ले कर जाना तो ऐसे है जैसे पुलिस को साथ लेकर चोरी करने जाना।
फिर पत्नी को विश्वास तो हो जाता है कि पति के कोट पर लगा निशान लिपिस्टिक का नहीं रेस के टिकट देने वाली के सिंदूर का है जो उसने शगुन के तौर पर रेस जीतने के लिए लगाया, कोट पर पड़ा लम्बा बाल घोड़ी की दुम का है और जेब से निकला नंबर फोन नंबर नहीं बल्कि उस मैदान की लंबाई है जहां रेस होती है तभी आ धमकती है रीटा।
दरवाज़े पर ठेठ भारतीयपन देखिए -
रीटा - वो तुम्हारा पति है, वो तो मेरा ब्वाय फ़्रेंड है
पत्नी - ब्वाय फ़्रेंड की बच्ची, (और रीटा के बाल हाथ में आ जाते है)
और पत्नी का कहना - वो आई थी तुम्हारी रेस की घोड़ी रीटा और पति का कहना - अब कभी नहीं खेलूंगा ऐसी रेस।
इस विषय पर कई कहानियां लिखी गई, फ़िल्में बनी लेकिन कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा रहा जो परिवार के साथ बैठ कर आनन्द लेने से रोकता रहा पर इस झलकी में वो बात नहीं रही। तभी तो हवामहल कार्यक्रम ख़ास है और ख़ास है विविध भारती।
वैसे तो दिलीप सिंह ने हवामहल के लिए और भी झलकियां लिखी लेकिन मेरे लिए तराज़ू के एक पलड़े में सारी झलकियां है और दूसरे पलड़े में है रेस की घोड़ी
विषय की अगर बात करें तो इसका विषय सभी के लिए नहीं है। ऐसे विषय आमतौर पर वयस्कों के लिए होते है लेकिन लेखक का कमाल है कि यह परिवार के साथ बैठ कर सुनने का विषय बन गया है।
यह वयस्कों का विषय है - पति, पत्नी और वो
पति है रामलाल, पत्नी है कमला और वो है रीटा। क्या चयन है नामों का, लगता है साधारण जनता के नाम है। पूरी झलकी में ये तीनों ही है जिसमें से बड़ा हिस्सा पति-पत्नी की नोक-झोंक है जो हवामहल की ख़ास पहचान है।
रविवार की शाम है पति घर से बाहर जाना चाहता है प्रेमिका से मिलने पर अकेले बाहर निकलने का बहाना नहीं सूझ रहा और इसी उलझन में वह पता नहीं क्या-क्या बोल रहा है जो बातें तो बेवकूफ़ी की है पर अच्छा हास्य का माहौल बनाती है -
पत्नी - आजकल अख़बार में ऐसी ख़बरें (परलोक सिधारने की ख़बरें) कम आती है
पति - आजकल गर्मिया है न लोग शहर में है नहीं पहाड़ों पर गए है इसीलिए
पूरी झलकी में हास्य बना रहा पर शालीनता रही। जैसे -
पत्नी को शक होने लगता है तो पति उसे समझाता है कि शक करना बुरी आदत है तब पत्नी कहती है कि वह शक करने पर मजबूर हो जाती है -
पत्नी - तुम मुझे अपने साथ पार्टियों में क्यों नहीं ले जाते
पति - (मन में कह रहा है) तुम को साथ ले कर जाना तो ऐसे है जैसे पुलिस को साथ लेकर चोरी करने जाना।
फिर पत्नी को विश्वास तो हो जाता है कि पति के कोट पर लगा निशान लिपिस्टिक का नहीं रेस के टिकट देने वाली के सिंदूर का है जो उसने शगुन के तौर पर रेस जीतने के लिए लगाया, कोट पर पड़ा लम्बा बाल घोड़ी की दुम का है और जेब से निकला नंबर फोन नंबर नहीं बल्कि उस मैदान की लंबाई है जहां रेस होती है तभी आ धमकती है रीटा।
दरवाज़े पर ठेठ भारतीयपन देखिए -
रीटा - वो तुम्हारा पति है, वो तो मेरा ब्वाय फ़्रेंड है
पत्नी - ब्वाय फ़्रेंड की बच्ची, (और रीटा के बाल हाथ में आ जाते है)
और पत्नी का कहना - वो आई थी तुम्हारी रेस की घोड़ी रीटा और पति का कहना - अब कभी नहीं खेलूंगा ऐसी रेस।
इस विषय पर कई कहानियां लिखी गई, फ़िल्में बनी लेकिन कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा रहा जो परिवार के साथ बैठ कर आनन्द लेने से रोकता रहा पर इस झलकी में वो बात नहीं रही। तभी तो हवामहल कार्यक्रम ख़ास है और ख़ास है विविध भारती।
Wednesday, December 19, 2007
हवा महल की हवाई बातें
हवामहल की कुछ झलकियों को छोड़ कर सभी में मनोरंजन है जो आपको गुदगुदाता है। कुछ झलकियां ऐसी भी है जहां ऐसे संवाद है जिन पर विश्वास करना आसान नहीं है, विषय भी कुछ ऐसे ही है लेकिन मनोरंजन भरपूर है।
एक ऐसी ही झलकी मुझे याद आ रही है। याद आने का कारण मौसम है। सर्दी के इस मौसम में देश के कुछ भागों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। ऐसे में मुझे याद आ रही है झलकी - करामाती कोट
इस झलकी के लेखक, निर्माता और कलाकारों के नाम मुझे याद नहीं और ना ही पूरी झलकी याद है, बस झलकी की कुछ मज़ेदार झलकियां याद है जो इस तरह है -
सर्दियों के मौसम में बजट कम होने के कारण पति ने अपनी पत्नी रामकली के लिए चोर बाज़ार से एक कोट खरीदा। सीधी-सादी घरेलू पत्नी उस कोट को पहनने के बाद अंग्रेज़ों की तरह अंग्रेज़ी बोलने लगी।
पति को लगा कि शायद दिमाग़ पर कुछ असर हुआ है, जांचने के लिए नाम पूछा तो उसने बताया - रोमिंग कैलिंग यानि नाम तो उसने सही बताया पर बताया ठेठ अंग्रेज़ी में। अब परेशान पति डाक्टर बुला लाया।
डाक्टर को लगा कोट ज्यादा गरम है इसी से शायद दिमाग़ पर गर्मी चढ गई, शायद मियादी बुख़ार हो। कोट उतारा गया। वह सीधी-सादी घरेलू पत्नी बन गई। कुछ देर बाद सर्दी बहुत लगने लगी तो फिर से कोट पहना दिया। फिर वो बदल गई। उसने डाक्टर से कहा -
come on Doc Let's dance
डाक्टर बेचारा भाग खड़ा हुआ। अब पति और परेशान, कहने लगा -
लौट आ मेरी रामकली, लौट आ
पता नहीं मेरी अच्छी भली देशी रामकली को क्या हो गया।
इस बीच एक दो पड़ोसी भी आ गए। रामकली ने उनके कुछ भेद खोल दिए वो भी भाग गए। अब पति करें तो क्या करें।
फिर पति को समझ में आया कि गड़बड़ कोट में है जिसे पहनते ही रामकली बदल जाती है। उसे लगा यह किसी अंग्रेज़ का कोट है जिसमें उस अंग्रेज़ की आत्मा है। जो भी उस कोट को पहनता है उसमें वह आत्मा आ जाती है।
उसने यह बात पत्नी से बताई कि कोट पहन कर वह कैसे बदल जाती है तो पत्नी ने कहा कि कोट को फेंक दो, इस पर पति ने कहा नहीं, इसे फेकेंगें नहीं क्योंकि पप्पू अंग्रेज़ी में कमज़ोर है।
अगले किसी और चिट्ठे में किसी और झलकी की कुछ और हवाई बातें…
एक ऐसी ही झलकी मुझे याद आ रही है। याद आने का कारण मौसम है। सर्दी के इस मौसम में देश के कुछ भागों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। ऐसे में मुझे याद आ रही है झलकी - करामाती कोट
इस झलकी के लेखक, निर्माता और कलाकारों के नाम मुझे याद नहीं और ना ही पूरी झलकी याद है, बस झलकी की कुछ मज़ेदार झलकियां याद है जो इस तरह है -
सर्दियों के मौसम में बजट कम होने के कारण पति ने अपनी पत्नी रामकली के लिए चोर बाज़ार से एक कोट खरीदा। सीधी-सादी घरेलू पत्नी उस कोट को पहनने के बाद अंग्रेज़ों की तरह अंग्रेज़ी बोलने लगी।
पति को लगा कि शायद दिमाग़ पर कुछ असर हुआ है, जांचने के लिए नाम पूछा तो उसने बताया - रोमिंग कैलिंग यानि नाम तो उसने सही बताया पर बताया ठेठ अंग्रेज़ी में। अब परेशान पति डाक्टर बुला लाया।
डाक्टर को लगा कोट ज्यादा गरम है इसी से शायद दिमाग़ पर गर्मी चढ गई, शायद मियादी बुख़ार हो। कोट उतारा गया। वह सीधी-सादी घरेलू पत्नी बन गई। कुछ देर बाद सर्दी बहुत लगने लगी तो फिर से कोट पहना दिया। फिर वो बदल गई। उसने डाक्टर से कहा -
come on Doc Let's dance
डाक्टर बेचारा भाग खड़ा हुआ। अब पति और परेशान, कहने लगा -
लौट आ मेरी रामकली, लौट आ
पता नहीं मेरी अच्छी भली देशी रामकली को क्या हो गया।
इस बीच एक दो पड़ोसी भी आ गए। रामकली ने उनके कुछ भेद खोल दिए वो भी भाग गए। अब पति करें तो क्या करें।
फिर पति को समझ में आया कि गड़बड़ कोट में है जिसे पहनते ही रामकली बदल जाती है। उसे लगा यह किसी अंग्रेज़ का कोट है जिसमें उस अंग्रेज़ की आत्मा है। जो भी उस कोट को पहनता है उसमें वह आत्मा आ जाती है।
उसने यह बात पत्नी से बताई कि कोट पहन कर वह कैसे बदल जाती है तो पत्नी ने कहा कि कोट को फेंक दो, इस पर पति ने कहा नहीं, इसे फेकेंगें नहीं क्योंकि पप्पू अंग्रेज़ी में कमज़ोर है।
अगले किसी और चिट्ठे में किसी और झलकी की कुछ और हवाई बातें…
Thursday, November 15, 2007
हवा महल के झरोखे
हवा महल हमारे देश के उन चुनिंदा स्थलों में से एक है जिसे देशी विदेशी पर्यटक पसन्द करते है। हवा महल में झरोखे ही झरोखे है इसीलिए यह अनोखा महल है जहां सिर्फ़ खिड़कियां है। खिड़कियों का मतलब होता है ताज़ा हवा के झोकें।
वैसे हवा महल के बारे में (राजस्थान में जयपुर स्थित वो हवामहल नहीं जिसकी हमने अभी चर्चा की) एक कहावत भी है हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में - हवाई क़िले बनाना और डू नाट बिल्ड कैसेल इन द एयर
हमें ये तो पता नहीं कि विविध भारती के कार्यक्रम हवामहल का नाम इस महल से संबंधित है या कहावतों से। हमें तो रेडियोनामा के चिट्ठों से इतनी ही जानकारी मिली है कि हवामहल विविध भारती के शुरूवाती कार्यक्रमों में से एक है और ये नाम पंडित नरेन्द्र शर्मा ने दिया है।
हवामहल के झरोखों की तरह ही इस कार्यक्रम से जुड़े कुछ नाम है जिनकी सृजनशीलता न सिर्फ़ ताज़े हवा के झोकें है बल्कि माहौल को भी ख़ुशनुमा बनाते है।
सबसे पहले हम चर्चा करेंगें इसके निर्माता-निर्देशकों की। हास्य झलकियों के लिए पहला नाम है गंगाप्रसाद माथुर और उनकी सहायिका कुमारी परवीन (शायद नाम लिखने में ग़लती हो रही हो)
हास्य के अलावा सामाजिक समस्याओं पर आधारित नाटकों में पहला नाम रहा चिरंजीव का।
इसके अलावा साहित्य के कथा उपन्यास से भी नाट्य रूपान्तर किए गए जैसे शरतचन्द्र , रविन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द की रचनाएं - परिणीता, नौका डूबी, जीवित या मृत, पूस की रात।
कुछ धारावाहिक के रूप में - मुंशी इतवारी लाल , म्यूज़िक मास्टर भोलाशंकर भी प्रसारित हुए।
इन्हें श्रोताओं तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम किया दीनानाथ जी, जयदेव शर्मा कमल, सत्येन्द्र शरत, चन्द्रप्रभा भटनागर
अब उन लेखकों की चर्चा जिनकी लेखनी ने इस कार्यक्रम में जान डाल दी। उल्लेखनीय नाम - के पी सक्सेना, दिलीप सिंह, सोमनाथ नागर और हैद्राबाद आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी और लेखक अज़हर अफ़सर
कलाकारों की बात करने से पहले एक बात बता दूं कि अधिकतर झलकियों में पति-पत्नी में नोंक-झोक होती थी जिसमें झगड़ालू पत्नी का सबसे अच्छा स्वर रहा - मंजू मिश्रा
अब उन झलकियों के नाम जो वर्षों से श्रोताओं के दिलों पर राज कर रही है - रेस की घोड़ी (दिलीप सिंह), टपकते सितारें (सोमनाथ नागर), ज़मीं के लोग, आसमान की सैर, मरने के बाद, करौंदे की चटनी, उदयपुर की ट्रेन और भी बहुत से नाम…
वैसे हवा महल के बारे में (राजस्थान में जयपुर स्थित वो हवामहल नहीं जिसकी हमने अभी चर्चा की) एक कहावत भी है हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में - हवाई क़िले बनाना और डू नाट बिल्ड कैसेल इन द एयर
हमें ये तो पता नहीं कि विविध भारती के कार्यक्रम हवामहल का नाम इस महल से संबंधित है या कहावतों से। हमें तो रेडियोनामा के चिट्ठों से इतनी ही जानकारी मिली है कि हवामहल विविध भारती के शुरूवाती कार्यक्रमों में से एक है और ये नाम पंडित नरेन्द्र शर्मा ने दिया है।
हवामहल के झरोखों की तरह ही इस कार्यक्रम से जुड़े कुछ नाम है जिनकी सृजनशीलता न सिर्फ़ ताज़े हवा के झोकें है बल्कि माहौल को भी ख़ुशनुमा बनाते है।
सबसे पहले हम चर्चा करेंगें इसके निर्माता-निर्देशकों की। हास्य झलकियों के लिए पहला नाम है गंगाप्रसाद माथुर और उनकी सहायिका कुमारी परवीन (शायद नाम लिखने में ग़लती हो रही हो)
हास्य के अलावा सामाजिक समस्याओं पर आधारित नाटकों में पहला नाम रहा चिरंजीव का।
इसके अलावा साहित्य के कथा उपन्यास से भी नाट्य रूपान्तर किए गए जैसे शरतचन्द्र , रविन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द की रचनाएं - परिणीता, नौका डूबी, जीवित या मृत, पूस की रात।
कुछ धारावाहिक के रूप में - मुंशी इतवारी लाल , म्यूज़िक मास्टर भोलाशंकर भी प्रसारित हुए।
इन्हें श्रोताओं तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम किया दीनानाथ जी, जयदेव शर्मा कमल, सत्येन्द्र शरत, चन्द्रप्रभा भटनागर
अब उन लेखकों की चर्चा जिनकी लेखनी ने इस कार्यक्रम में जान डाल दी। उल्लेखनीय नाम - के पी सक्सेना, दिलीप सिंह, सोमनाथ नागर और हैद्राबाद आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी और लेखक अज़हर अफ़सर
कलाकारों की बात करने से पहले एक बात बता दूं कि अधिकतर झलकियों में पति-पत्नी में नोंक-झोक होती थी जिसमें झगड़ालू पत्नी का सबसे अच्छा स्वर रहा - मंजू मिश्रा
अब उन झलकियों के नाम जो वर्षों से श्रोताओं के दिलों पर राज कर रही है - रेस की घोड़ी (दिलीप सिंह), टपकते सितारें (सोमनाथ नागर), ज़मीं के लोग, आसमान की सैर, मरने के बाद, करौंदे की चटनी, उदयपुर की ट्रेन और भी बहुत से नाम…
Friday, September 21, 2007
रात के राही - एक अनूठा प्रयोग
हवा महल - नाम सुनते ही चेहरे पर एक मुस्कान फैल जाती है। हास्य झलकियों का एक ऐसा कार्यक्रम जिसे सुन कर मुस्कुराने, हंसने और कहकहे लगाने पर आप मजबूर हो जाते है।
मैं बात कर रही हूं उस समय की जब हवा महल रात में सवा नौ से साढे नौ तक प्रसारित होता था। यानि रोज़ 15 मिनट का समय हंसने के लिए आरक्षित था।
ऐसी ही एक रात उदघोषणा हुई - प्रस्तुत है झलकी रात के राही और शुरू हो गई झलकी - प्लेटफार्म की आवाज़े, रेल की आवाज़ । चलती गाड़ी में एक पुरूष ने प्रवेश किया । लड़की डिब्बे में अकेली थी ।
सहयात्री की तरह बातों का सिलसिला चल निकला । पुरूष ने बताया कि वह कर्नल था । लड़की ने कहा की उसे बहादूर लोग अच्छे लगते है ।
कुछ समय बात लड़की ब्लैकमेल करने लगी । कहा कि जो कुछ उसके पास है सभी दे दें । वर्ना वह चेन खींचेगीं और उस पर छेड़ने और ज्यादती का आरोप लगाएगी। पुरूष न माना और उसने चेन खींच दी ।
पुलिस आई । मामला बना । सभी कहने लगे कर्नल हो कर उसने ग़लत काम किया । पुरूष ने कहा कि उसका ओवरकोट उतारो । तभी लड़की बोली की रेल में भी वह उसे कभी पानी पिलाने और कभी खिड़की बन्द करने के लिए कहता रहा ।
जब ओवरकोट उतारा गया तो सभी आवाक । उसकी तो दोनों बाहें कटी हुई थी । लड़की भागने लगी तो उसे पकड़ लिया गया ।
रहस्य और रोमांच से भरपूर इस झलकी ने पूरे 15 मिनट श्रोताओं को बांधे रखा । श्रोता भूल गए कि यह झलकी हवा महल के स्वाद के अनुसार नहीं है क्योंकि हवा महल का तो काम है हवा में महल बनाना, न कि अपराधियों का पर्दाफ़ाश करना ।
यह शायद अपने तरह की अकेली झलकी थी जो हवामहल में प्रसारित हुई थी । दो-तीन बार इसका प्रसारण मैनें सुना । जब भी सुना बहुत अच्छा लगा । एक विशेष समय में कुछ अलग, कुछ अच्छा, कुछ अनूठा लगा ।
आज ये याद नहीं कि इसके लेखक, प्रस्तुतकर्ता और कलाकार कौन थे । लेकिन झलकी आज भी दिमाग़ में ताज़ा है ।
मैं बात कर रही हूं उस समय की जब हवा महल रात में सवा नौ से साढे नौ तक प्रसारित होता था। यानि रोज़ 15 मिनट का समय हंसने के लिए आरक्षित था।
ऐसी ही एक रात उदघोषणा हुई - प्रस्तुत है झलकी रात के राही और शुरू हो गई झलकी - प्लेटफार्म की आवाज़े, रेल की आवाज़ । चलती गाड़ी में एक पुरूष ने प्रवेश किया । लड़की डिब्बे में अकेली थी ।
सहयात्री की तरह बातों का सिलसिला चल निकला । पुरूष ने बताया कि वह कर्नल था । लड़की ने कहा की उसे बहादूर लोग अच्छे लगते है ।
कुछ समय बात लड़की ब्लैकमेल करने लगी । कहा कि जो कुछ उसके पास है सभी दे दें । वर्ना वह चेन खींचेगीं और उस पर छेड़ने और ज्यादती का आरोप लगाएगी। पुरूष न माना और उसने चेन खींच दी ।
पुलिस आई । मामला बना । सभी कहने लगे कर्नल हो कर उसने ग़लत काम किया । पुरूष ने कहा कि उसका ओवरकोट उतारो । तभी लड़की बोली की रेल में भी वह उसे कभी पानी पिलाने और कभी खिड़की बन्द करने के लिए कहता रहा ।
जब ओवरकोट उतारा गया तो सभी आवाक । उसकी तो दोनों बाहें कटी हुई थी । लड़की भागने लगी तो उसे पकड़ लिया गया ।
रहस्य और रोमांच से भरपूर इस झलकी ने पूरे 15 मिनट श्रोताओं को बांधे रखा । श्रोता भूल गए कि यह झलकी हवा महल के स्वाद के अनुसार नहीं है क्योंकि हवा महल का तो काम है हवा में महल बनाना, न कि अपराधियों का पर्दाफ़ाश करना ।
यह शायद अपने तरह की अकेली झलकी थी जो हवामहल में प्रसारित हुई थी । दो-तीन बार इसका प्रसारण मैनें सुना । जब भी सुना बहुत अच्छा लगा । एक विशेष समय में कुछ अलग, कुछ अच्छा, कुछ अनूठा लगा ।
आज ये याद नहीं कि इसके लेखक, प्रस्तुतकर्ता और कलाकार कौन थे । लेकिन झलकी आज भी दिमाग़ में ताज़ा है ।
Subscribe to:
Posts (Atom)
