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Friday, July 8, 2016

ताने-बाने लोकेंद्र शर्मा की जिंदगी के- ग्‍यारहवीं कड़ी।


तकनीकी समस्‍याओं के चलते 'तााने-बाने' की कड़ी समय पर नहीं आ सके। हमें खेद है। आज पेश है दसवीं कड़ी।



नेशनल स्टेडियम से लौटन के बाद कई दिनों तक बाल दिवस की यादों से मन प्रफुल्लित रहा. चाचा नेहरू को इतने नज़दीक से देखा, अपने-आप में मेरे लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. इतने बड़े आदमी, देश के राजा और कितने सरल, कितना प्यार करते हैं बच्चों को और हैं भी कितने सुंदर. गोरे-चिट्टे, ऐसे कि देखते ही श्रद्धा उमड़े. किताब में चाचा नेहरू पर जो पाठ है, वो ग़लत थोड़े ही है. पाठ में एक जगह लिखा था कि अगर चाचा नेहरू को किसी बात पर ग़ुस्सा आ रहा हो और उनके सामने कोई बच्चा लाकर खड़ा कर दिया जाए, तो उनका ग़ुस्सा काफ़ूर हो जाता है.


दो-तीन दिन तक दिमाग़ ऐसी ही बातों में रचा-बसा रहा. फिर एक दिन अचानक ख़याल आया कि अगर चाचा नेहरू  भारत के सब बच्चों के चाचा हैं, तो अपने भतीजों की मदद भी तो कर सकते हैं. मुझे अपने स्कूल की याद आई. कैसा खंडहर जैसा है. चाचा नेहरू क्या हमारे स्कूल के लिए एक नई इमारत नहीं बनवा सकते? लेकिन उन्हें स्कूल की दशा का कहां पता होगा. कोई बताएगा, तभी तो वो जान पाएंगे. मन ही मन मैंने तय किया कि चाचा नेहरू को यह जानकारी मैं दूंगा. मैं उन्हें बताऊंगा कि हमारे स्कूल की कितनी ख़स्ता हालत है और प्रार्थना करुंगा कि वे हमारे लिए एक नया स्कूल बनवा दें. मन में बात आई तो एक अजब सा उत्साह जागा. उसी रात मैंने चाचा नेहरू के नाम हिंदी में एक चिट्ठी लिखी. अंतर्देशीय पत्र पर लिखी गई इस चिट्ठी में अपना और अपने स्कूल का नाम साफ़-साफ़ अंग्रेजी के केपिटल अक्षरों में लिखा. अपनी तरफ़ से चुन-चुन कर दर्द और पीड़ा भरे शब्दों का प्रयोग किया और चाचा नेहरू से प्रार्थना की, कि मोरी गेट स्कूल के ग़रीब बच्चों के भविष्य का ख़याल करके हमारे लिए एक नया स्कूल बनवा दें.


अंतर्देशीय पत्र पर हमने चाचा नेहरू का पता लिखा, ‘पंडित जवाहरलाल नेहरू, भारत के प्रधानमंत्री, नई दिल्ली.’ अगले दिन स्कूल जाते हुए रास्ते में, अपनी चिट्ठी को लेटरबॉक्स के हवाले कर दिया. मन बहुत हल्का और प्रसन्न था. स्कूल को नई इमारत मिलेगी, इसमें मुझे कोई शक नहीं था. अपने-आप पर थोड़ा गर्व भी था कि नई इमारत मेरे कारण बनेगी.


मामाजी का घर छूटने के बाद रेडियो सुनना कम हो गया था. घर में तो रेडियो था ही नहीं. मकान मालिक चाचाजी (श्रीकृष्ण गुप्त) के घर में, ऊपर एक रेडियो रखा था, जिसमें कभी-कभी गाने सुनाई देते थे. चाचीजी का नाम था लक्ष्मी. चाचाजी उन्हें दिनभर ‘लशमी...लशमी’ कहकर पुकारा करते. उनके छोटे-छोटे बच्चे भी उनकी नकल करते और अपनी मां को इसी तरह पुकारने के चक्कर में तुतला कर बोलते, “लम्मी...लम्मी”. चाचीजी दर्मियाने क़द और गदराये बदन की सांवली औरत थीं. उनका गोल चेहरा बहुत सलोना था. बात भी ख़ूब प्यार से करतीं. मेरा उनके घर में उठना-बैठना होने लगा. मेरे कहने पर वो रविवार को रेडियो में बच्चों का कार्यक्रम लगा देतीं और मैं रेडियो से कान लगाए सुनता. रेडियो के बगल वाले आले में चाचाजी की कई सारी किताबें कतार में रखीं थीं. इनमें अधिकतर हिंदी के उपन्यास और कहानी संग्रह थे. कुछ रूसी और अंग्रेजी उपन्यासों के हिंदी अनुवाद भी थे. कभी-कभा मैं उनमें से कोई किताब उठाकर पढ़ने के लिए ले जाता. रेडियो पर बच्चों के प्रोग्राम में जो दीदी और भैया थे, उनकी बातें सुनकर मुझे फिर लगने लगा, जैसे वो मुझ ही से मुख़ातिब होकर बात करते हैं. उनसे मिलने की इच्छा फिर बलवती होने लगी.


हिमाचल रेस्टोरेंट में जो आदमी दूध सप्लाई करता था, उससे बाउजी ने एक लीटर दूध, घर के लिए भी लेना शुरू किया. चूंकि वो रेस्टोरेंट के लिए ढेरों दूध सप्लाई करता था, इसलिए बाउजी से एक लीटर के वो बहुत कम दाम लेता था. मेरी यह ड्यूटी थी कि स्कूल के बाद मैं चांदनी चौक जाता और ढक्कनदार बाल्टीनुमा बर्तन में दूध लेकर वापस घर लौटता. चांदनी चौक जाता तो सरोज बहन, मंजू बहन और अरुण से भी मिलना हो जाता. अरुण से मैं कई बार रेडियो स्टेशन जाने की अपनी इच्छा जता चुका था. अरुण भी दीदी और भैया से मिलने का बहुत इच्छुक था. एक दिन मामाजी से मैंने इस बात का ज़िक्र किया. तब अरुण वहीं खड़ा था, उसने तुरंत मेरी बात का समर्थन किया और कहा, “हां भाई, हमें भी जाना है रेडियो स्टेशन. हम और दादा दोनों चले जाएंगे. आप बस परमिशन दे दो.” एक पल तो मामाजी चुप रहे, फिर मुस्कुरा कर बोले, “ठीक है चले जाना.” आख़िर मामाजी अपने इकलौते लाडले बेटे की इच्छा कैसे न पूरी करते. अरुण एकदम उत्साह में आ गया, “थैंक यू भाई, थैंक यू भाई” कहकर उसने अपने पिता जी का शुक्रिया अदा किया. यहां एक बात बता दूं कि मामाजी को उनके सब बच्चे ‘भाई’ कहकर संबोधित करते थे. ये संबोधन कब और कैसे शुरू हुआ, इसका इतिहास मुझे नहीं मालूम, लेकिन किसी संबोधन के बारे में कोई राय रखने का मुझे भी क्या अधिकार था. मैं तो ख़ुद अपनी मां को ‘भाभी’ कहता था. अरुण ने मुझसे कहा, “आप भी फूफाजी से पूछ लीजिए.” फूफाजी मतलब बाउजी. अरुण और बेबी बाउजी को फूफाजी कहते थे और उनकी देखा-देखी रेस्टोरेंट के सारे कर्मचारी और बैरे भी उन्हें फूफाजी कहने लगे थे. रेस्टोरेंट में ‘फूफाजी’ संबोधन इतना अधिक सुनाई देने का परिणाम ये हुआ कि आने वाले रोजमर्रा के कुछ ग्राहक भी बाउजी को फूफाजी कहने लगे और यूं हिमाचल रेस्टोरेंट में बाउजी ‘जगत फूफाजी’ हो गए.


सन् 1956 के नवंबर महीने की 22 तारीख़ थी, जब मैं और अरुण रेडियो स्टेशन जाने के लिए घर से निकले. मामाजी ने कई सारी हिदायतें दी थीं. अरुण को कम मुझे ज़्यादा. क्योंकि मैं बड़ा था. चांदनी चौक में लालकिले की तरफ़ जाने पर एक तिराहा आता है, जिसका नाम है फव्वारा. यहां सचमुच में तब पानी का एक फव्वारा था. यहीं मशहूर शीशगंज गुरुद्वारा भी है, जिसके ठीक बगल में है चांदनी चौक का पुलिस स्टेशन. इस तिराहे पर तब दूसरी मशहूर जगह हुआ करती थी, मैजेस्टिक सिनेमाघर. इसी के सामने से फ़ोर-सीटर चलते थे, जो लोगों को दो आने प्रति सवारी की रेट से रीगल सिनेमा तक ले जाते थे. फ़ोर-सीटर यानी एक बड़ी मोटर साइकिल को जुगाड़ से बनाया गया चार सवारियों को ढोने वाला रिक्शा. अधिकतर ये फ़ोर-सीटर चलाने वाले सरदारजी होते थे. ऐसे ही एक फ़ोर-सीटर में बैठकर हम कनॉट प्लेस के रीगल सिनेमा तक पहुंचे. यहां से पार्लियामेंट स्ट्रीट शुरू होती थी, जो सीधी संसद भवन तक जाती थी. रीगल से संसद भवन के लिए सड़क पर तांगे चलते थे और वो भी दो आना प्रति सवारी लेते थे. तांगे में बैठकर हम रेडियो स्टेशन की तरफ़ चले. नवंबर का तीसरा सप्ताह था. सूरज जल्दी छुप चुका था और अंधेरा धीरे-धीरे गहरा रहा था. पार्लियामेंट स्ट्रीट के दोनों तरफ़ घने पेड़ों की क़तारें थीं. सड़क पर इतना सन्नाटा था कि तांगा खींचते हुए घोड़े की टापें दूर तक सुनी जा सकती थीं. कुछ ही देर बाद रेडियो स्टेशन की लाल-पीली भव्य इमारत पेड़ों के पीछे से झांकती दिखाई दी और हम तांगे से ठीक इसके सामने उतर गए. सड़कों पर लैम्प पोस्ट जल चुके थे. रेडियो स्टेशन के गेट पर लगे हंडे भी रोशनी दे रहे थे और ऐसे में हमने गेट की तरफ़ क़दम बढ़ाए. अंदर जाने से पहले ही एक बंदूकधारी गार्ड ने हमें रोका, “कहां जाना है?” मुझे लगा रेडियो स्टेशन का गार्ड है, इसलिए इसे प्रभावित करने के लिए अंग्रेजी में बात करनी चाहिए. ढेर सारा आत्मविश्वास समेटकर शाम के झुटपुटे में मैंने गार्ड से कहा, “गुड मॉर्निंग”. सुनकर गार्ड मुस्कुराया. फिर पूछा, “क्या काम है?” अरुण बेचारा चुपचाप सहमा सा मेरे साथ खड़ा था. बातचीत का मोर्चा मैंने संभाला हुआ था. कहा, “हमें दीदी और भैया से मिलना है.” गार्ड की कुछ समझ में नहीं आया, पूछा, “दीदी-भैया कौन?” मुझे गार्ड पर लगभग तरस सा आ गया. इतने मशहूर दीदी-भैया को ये नहीं जानता, कितना नादान है. उसे बताया,
“वो जो बच्चों के प्रोग्राम में आते हैं ना, वही दीदी और भैया”. गार्ड ने हमें समझाया, “लेकिन अब तो ऑफिस बंद हो चुका है, सबलोग घर चले गए हैं”. फिर बरामदे की तरफ़ इशारा करके हमें एक कमरे के दरवाज़े पर लटकते ताले को दिखाया, “वो देखो, ताला लगा हुआ है उनके कमरे में.” मुझे लगा, गार्ड हमें बच्चा समझकर टाल रहा है, ऑफिस कैसे बंद हो सकता है. रेडियो खोलकर देखो, रात को देर तक चलता रहता है, लेकिन हमारे सारे तर्क बेकार गए. गार्ड ने हमारी एक नहीं सुनी और कहा, “कभी दिन के बख़त आना. तब मिलेंगे सारे लोग. अभी अंदर नहीं जा सकते.”

मैं और अरुण दोनों बहुत बुरी तरह निराश हुए. मरी चाल से हमने वापस रीगल सिनेमा की तरफ़ चलना शुरू किया. आकाशवाणी दिल्ली की इमारत के प्रथम-दर्शन का दिन 22 नवंबर 1956, मेरे स्मृति-इतिहास में आज भी ज्यों का त्यों दर्ज है.


                                    ***



स्कूल में मेरा और दर्शन का दोस्ताना ख़ासा गहरा हो गया था. उसका ख़याल था कि मेरी हिंदी बहुत अच्छी है और मेरा विचार था कि वो गणित में बहुत अच्छा है. जब भी ज़रूरत पड़ती हम इन विषयों में एक-दूसरे की सहायता करते. कक्षा के दूसरे लड़के भी अब मेरे साथ व्यवहार में सहज हो चुके थे. शोर और शरारतों में अब मैं भी उनके जैसा हो गया था.


ऐसा ही एक शोर भरा दिन था. मास्टरजी आए नहीं थे और क्लास में एक-दूसरे पर काग़ज़ के हवाई जहाज फेंके जा रहे थे. तभी चपरासी ने आकर ऐलान किया, “लोकेन्दर शरमा कौन है? हेडमाटसाब बुला रए हैं”. क्लास तो चपरासी के प्रवेश करते ही ख़ामोश हो गई थी. अपना नाम सुनकर मैं भी घबरा गया. क्या कारण हो सकता है? क्यों बुलवाया है मुझे? धड़कते हुए दिल के साथ मैं चपरासी के साथ खरबंदा साहब के ऑफ़िस की तरफ़ चला.


चिक उठाकर अंदर प्रवेश करते ही हेडमास्टर साहब के सामने बैठे दो पुलिस वर्दीधारी दिखाई दिए. मेरी घबराहट और बढ़ गई. जाकर नमस्ते किया और तभी मेरी नज़र सामने टेबल पर खुले पड़े, अंतर्देशी पत्र पर पड़ी. ये वही पत्र था, जिसे कुछ दिन पहले मैंने चाचा नेहरू के नाम पोस्ट किया था. हेडमास्टर साहब ने पूछा, “ये चिट्ठी तुमने लिखी थी?” मैंने ‘हां’ तो किया, लेकिन सामने पुलिस वालों को बैठा देखकर घबराहट इतनी बढ़ी कि लगा रो पड़ूंगा. हेडमास्टर साहब ने कहा, “क्यों लिखी थी?” अब तक मेरी आंखें भर आईं थीं. पुलिस को देखकर बहुत डर लग रहा था. मैंने चुपचाप सिर झुका लिया. हेडमास्टर साहब ने फिर कहा, “देखो, स्कूल की बिल्डिंग के बारे में सोचना तुम्हारा काम नहीं है. तुम्हारा काम पढ़ना है, पढ़ाई में ध्यान दो”. फिर सामने बैठे पुलिस इंस्पेक्टर से मुख़ातिब होकर बोले, “ये है जी बच्चा, आठवीं जमात का है”. इसके आगे उन्होंने अंग्रेजी में कुछ कहा. पुलिस वालों ने ऊपर से नीचे तक मुझे देखा, फिर एक ने कहा, “ठीक है हम चलते हैं”. कहकर पुलिस वाले खड़े हो गए. खड़े होते-होते मेज़ पर पड़े इनलैंड-लेटर को भी एक इंस्पेक्टर ने हाथ में समेट लिया. पुलिस वाले चिक उठाकर कमरे से बाहर चले गए. मैं वहीं खड़ा कांपता रहा.


हेडमास्टर साहब ने हौले से मुझसे कहा, “इधर आ बेटा”. उनकी आवाज़ की नरमी ने जैसे मुझे ढाढस बंधाया. मैंने सिर उठाकर देखा, वो इशारे से मुझे अपने पास बुला रहे थे. मैं पास पहुंचा, तो उन्होंने मुझे बाजू से पकड़कर अपने और नज़दीक किया, फिर भरे गले से कहा, “इसमें रोने की क्या बात है बच्चे”. कहते-कहते शायद उनकी भी आंखें छलक आई थीं. फिर जाने उन्हें क्या सूझा, मुझे दोनों हाथों से पकड़कर अपने सीने से लगा लिया. अब मैं पूरी तरह फूटकर रो पड़ा. खरबंदा साहब मेरी पीठ पर हौसले की थपकी दे रहे थे और मुझे पता था कि उनकी आंखें भी झरने लगीं थीं.


साठ बरस पुरानी इस घटना को, जब आज सन् 2016 में, मैं फिर अपनी क़लम से कुरेद रहा हूं, तो भारत की वर्तमान राजनैतिक चित्र का ध्यान आए बिना नहीं रहता. आज मेरा जीवन समय के उस दौर से गुज़र रहा है, जब देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेन्द्र मोदी आसीन हैं. दो साल पहले 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वे देश के प्रधानमंत्री नहीं, प्रधानसेवक हैं. असली मूल्यांकन तो वैसे समय और इतिहास ही करेगा, लेकिन ऐसी मान्यता बन गई है कि नरेन्द्र मोदी के रूप में भारत ने पहली बार एक सच्चा प्रधानमंत्री पाया है. मोदीजी शुरू से ही हर महीने के तीसरे रविवार को आकाशवाणी के द्वारा जनता से अपने मन की बात करते हैं. बात सचमुच उनके ‘मन’ की होती है, राजनीति से उसका कुछ लेना-देना नहीं होता. लेकिन मोदीजी केवल अपने मन की बात ही नहीं करते, लोगों के मन की भी सुनते हैं. देश के हर कोने से, उन्हें हज़ारों की तादाद में लोग पत्र लिखते हैं. मोदीजी उनमें से कुछ पत्रों को चुनकर उन का ज़िक्र भी करते हैं और अपने मन की बात करते हुए, उनका जवाब भी देते हैं. ऐसे ही एक प्रसारण में मैंने मोदीजी को एक छोटे बच्चे के पत्र का हवाला देते हुए सुना. उन्होंने बच्चे के सुझाव पर उसे धन्यवाद ही नहीं दिया, बच्चे की बताई हुई समस्या पर ग़ौर करने का वादा भी किया. उस दिन मोदीजी के मन की बात सुनते-सुनते, मुझे साठ बरस पुरानी उस घटना की याद हो आई, जब चाचा नेहरू को लिखी गई मेरी चिट्ठी के उत्तर में पुलिस मुझे ढूंढ़ती हुई स्कूल तक पहुंच गई थी.
 

चौदह बरस की उम्र में लिखी गई मेरी मासूम चिट्ठी में नेहरु-सरकार को जाने कौन सा ख़तरा दिखाई दिया था कि पुलिस को उसकी जांच करनी पड़ गई. केवल हेडमास्टर खरबंदा साहब ने मेरे सोच और साहस को पहचाना था. मेरी भोली-ईमानदार कोशिश का मान किया था. मेरे बाल-मन की पीड़ा को महसूस किया और मेरे आंसुओं के साथ अपनी व्यथा को भी जोड़ा. उनका मुझे गले लगाना और खुद भी रो पड़ना, मैं कभी नहीं भूलूंगा.  


                                    ***



चाचाजी (श्रीकृष्ण गुप्त) के घर में रखे रेडियो के ज़रिये बच्चों के प्रोग्राम वाले दीदी और भैया का बुलावा मुझे अक्सर ललचाता. एक दिन मैंने तय कर लिया कि अब और अधिक इंतज़ार नहीं करुंगा. किसी रविवार को बच्चों का प्रोग्राम शुरू होने से पहले ही रेडियो-स्टेशन पहुंच जाऊंगा. चाचाजी के पास एक साइकिल थी. कभी-कभी किसी काम के लिए मैं उनसे साइकिल मांग कर भी ले जाता था. हिम्मत करके मैंने चाचाजी से एक दिन सुबह-सुबह साइकिल मांग ली. वो रविवार का दिन था. चाचाजी को कहीं जाना नहीं था. इसलिए उन्होंने इजाज़त भी दे दी. साइकिल क्या हाथ में आई, जैसे मुझे पंख मिल गए. साइकिल दौड़ाता हुआ मैं सीधे रेडियो स्टेशन पहुंचा. इस बार गेट पर मुझे किसी ने नहीं रोका. मुझे पता था, सुबह नौ बजे बच्चों का कार्यक्रम शुरू होता है. बरामदे में बहुत सारे बच्चे जमा थे. मैं भी जाकर उनमें शामिल हो गया. थोड़ी देर बाद सब बच्चों को घेरकर स्टूडियो में ले जाया गया.


जीवन में पहली बार आकाशवाणी के स्टूडियो में प्रवेश किया. अन्दर पहुँचते ही सबसे पहले ठंडी हवा ने बदन को छुआ. दूसरे मुझे एक विशेष प्रकार की ख़ुशबू महसूस हुई. स्टूडियो की यह ख़ुशबू मैंने बाद में भी कई बार, बल्कि हर बार महसूस की, लेकिन इसका स्रोत कभी समझ में नहीं पाया. स्टूडियो में एक लंबे कॉरिडोर को पार करने के बाद, हमें ले जाकर एक बड़े से कमरे में, क़ालीन पर बैठा दिया गया. कमरे के दरवाज़े पर ‘सात’ नंबर लिखा हुआ देखा था. बाद में पता चला, ये स्टूडियो नंबर सात है. बच्चे अंग्रेजी के ’सी’ अक्षर के आकार का घेरा डालकर बैठे थे. एक तरफ़ दीदी थी. उनके सामने माइक्रोफ़ोन रखा था. मैंने स्टूडियो में चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, सामने एक खिड़की थी, जो पूरी तरह शीशे से ढंपी हुई थी. शीशे के उस पार कुछ लोग खड़े हुए दिखाई दिए. खिड़की के ऊपर एक हरी रोशनी जल रही थी. दीदी ने बताया कि जब हरी रोशनी बंद हो जाएगी और लाल रोशनी जलेगी, तब पहले दीदी बोलेंगी और उसके बाद सब बच्चे बोलेंगे ‘जयहिंद’. मैं समझ गया कि खिड़की के माथे पर लाल रोशनी जलते ही प्रोग्राम शुरू हो जाएगा. मैं पहले से जगह बनाकर घेरे में सबसे आगे माइक्रोफ़ोन के पास, दीदी के ठीक सामने बैठ गया था. दीदी का असली नाम क्या था, मुझे नहीं मालूम, लेकिन वो बच्चों के साथ बहुत घुल-मिल कर बतिया रहीं थीं. सबके साथ बहुत लाड़ से पेश आ रही थीं. चूंकि मैं सामने बैठा था, दीदी ने मुझसे कहा, “जब प्रोग्राम शुरू हो जाय, तब तुम पूछना, आज भैया क्यों नहीं आए?” मुझे रेडियो में बोलने का मौका मिल रहा है, इस बात से एकाएक मैंने गर्वित महसूस किया. तभी दीदी ने ‘शीशीई’ करते हुए अपने होठों पर उंगली रखकर सबको चुप रहने का संकेत किया. समय हो चुका था. सब खिड़की के माथे पर लगी हरी रोशनी की तरफ़ देख रहे थे. अचानक रोशनी हरी से लाल हुई और दीदी ने कहा, “बच्चो, जयहिंद”. बच्चों ने भी ख़ूब ज़ोर से ‘जयहिंद’ का नारा लगाया. कुछ देर तक दीदी ने बच्चों के स्वागत में कुछ कहा, फिर आज के प्रोग्राम में क्या-क्या सुनाया जाएगा, ये बताया और फिर मुझे हाथ से इशारा करके बोलने के लिए कहा. जो बोलना था, उसकी मन ही मन मैंने कई बार रिहर्सल कर ली थी. मैं बोला, “दीदी, आज भैया क्यों नहीं आए”. दीदी हंसी, लेकिन आगे कुछ कहतीं, इसके पहले ही पीछे से आवाज़ आई, “आया क्यों नहीं, मैं यहां बैठा हूं सबसे पीछे”. आवाज़ सुनी तो लगा कि जैसे किसी देवता की आवाज़ है. मैंने मुड़कर देखा. बच्चों की भीड़ में सबसे पीछे बैठे भैया पर नज़र पड़ी तो मुंह खुला का खुला रह गया. हाय राम, इत्ता सुंदर आदमी! गोरे-चिट्टे घुंघराले बाल वाले भैया, आवाज़ से ही नहीं, शकल से भी देवता जैसे लगे. कुछ देर दीदी और भैया की नोंक-झोंक हुई और उसके बाद भैया आकर माइक्रोफ़ोन के पास मेरे बगल में बैठ गए. जिन भैया और दीदी से मिलने का एक लंबे समय से सपना देख रहा था, आज वो पूरा हो गया. दोनों सामने एकदम मेरे पास बैठे थे.


कई दिनों, शायद कई बरसों बाद, जब मैं एनॉउन्सर की हैसियत से विविध भारती में काम करने लगा था, तब मैंने जाना कि दीदी का नाम था, श्रीमती कौशल्या माथुर और भैया के रूप में जिस देव पुरुष को मैंने देखा, उनका नाम था, पंडित विनोद शर्मा.


                                      ***


आज़ादी के बाद, विकासशील देशों की तुलना में, जिस गति से भारत का विकास हो रहा था, उसे देखते हुए कहा जाता था कि यदि भारत पूरा ज़ोर लगाकर दौड़े, तो भी दुनिया में अपनी जगह केवल खड़ा ही रह पाएगा. विज्ञान और तकनीक के सहारे विकसित देशों के विकास की गति रॉकेट जैसी थी, जबकि भारत बैलगाड़ी की चाल से बढ़ रहा था. 1945 में जब दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ, जर्मनी और जापान, तब बुरी तरह बर्बाद हो चुके थे. जर्मनी के दो टुकड़े कर दिए गए थे. पूरे जर्मनी में घर, कारख़ाने, सड़कें, परिवार और दिल सब टूटे हुए थे. नौजवान युद्ध में मारे जा चुके थे और देश में अधिकतर औरतें, बच्चे और बूढ़े ही बचे थे. इसके ठीक दो बरस बाद, 1947 में  भारत आज़ाद हुआ. भारत के भी दो टुकड़े बेशक हुए. बंटवारे और आबादी के तबादले ने लाखों लोगों की बलि भी ली, लेकिन जर्मनी और जापान जितना घायल हुए थे, उसके मुक़ाबले भारत के ज़ख्म बहुत छोटे थे. साथ ही अंग्रेजों के बनाए हुए बड़े-बड़े पुल, शानदार इमारतें, टेलीफ़ोन और रेलव लाइनें’ भारत में अपनी जगह सब सलामत थे. फिर भी विकास की दौड़ में जर्मनी और जापान ने कुछ ही बरसों में भारत को बहुत पीछे छोड़ दिया. एक बार अपने जर्मन मित्र मार्टिन से मैंने इसका कारण पूछा था. पूछा था कि भारत के पिछड़ जाने का क्या कारण हो सकता है. क्या हमें शुरूआती लीडरशिप ग़लत मिली या भारत के लोग हैं ही नाक़ाबिल. मार्टिन ने मुस्कुरा कर कहा था, “शायद आधी-आधी दोनों बातें सच हैं”. मैं नहीं जानता कि मार्टिन मज़ाक कर रहा था या उसकी बात में कोई गंभीरता थी, लेकिन सच तो यही है कि भारत उस गति से विकास नहीं कर पाया, जिस गति से करना चाहिए था. 1957 में लड़खड़ाती चाल से ही सही, दुनिया से गति मिलाने के इरादे से, भारत ने फ़ैसला किया कि यहां भी मुद्रा-प्रणाली को सरल और सहजग्राह्य बनाया जाए, उसे दाशमिक प्रणाली में परिवर्तित कर दिया जाए. अर्थात रुपए-आने-पैसे की जगह, रुपए और पैसे का प्रयोग शुरू हो. इस प्रणाली की शुरूआत के लिए सन् 1957 की पहली अप्रैल को चुना गया.


पहली अप्रेल से एक रुपये में चौसठ की जगह, सौ ‘नए-पैसे’ होंगे. लेकिन फिर एक रुपये में ‘आने’ कितने होंगे ? मेरे किशोर-मन को यह हिसाब कुछ समझ में नहीं आ रहा था. बाउजी ने बस यही बताया था कि अब एक रुपये में सौ नए-पैसे होंगे, लेकिन यह कोई नहीं बता रहा था कि पुराने-पैसे कितने होंगे. दाशमिक-प्रणाली अगर एक-दस-सौ-हज़ार... इस तरह चलती है और एक रुपये में सौ नए- पैसे होंगे, तो एक आना दस नए-पैसे का होना चाहिए था और एक रूपया दस नये-आने का.


पहली अप्रेल को हिमाचल रेस्टोरेंट के काउंटर पर मैंने नये सिक्कों का ढेर देखा. एक नया-पैसा, ताम्बे का चमकता हुआ नन्हा-मुन्ना सा गोल-मटोल सिक्का था (बाद में यह चोकौर और अल्युमिनियम का हो गया था). फिर दो और तीन पैसे के भी सिक्के थे, अल्युमिनियम के. पांच-पैसे का सिक्का भी  अल्युमिनियम का था, चौकोर अधन्ने जैसा. दस-पैसे का सिक्का, इकन्नी जैसा, लेकिन साइज़ में थोडा बड़ा था और पीतल का था. बाद में ये सिक्का भी पीतल की जगह अल्युमिनियम का हो गया था. बीस पैसे का सिक्का षट्कोण वाला था. फिर पचीस और पचास पैसे के सिक्के थे, चवन्नी और अठन्नी जैसे. एक रुपये का सिक्का, कल्दार से थोडा छोटा था और पांच रूपये का थोडा बड़ा.
             



सिक्के तो देख लिए, लेकिन इनका हिसाब समझने में कई दिन लगे, मुझे ही नहीं, और भी कई लोगों को. एक लम्बे समय तक, पुराने रेट की वजह से ‘इकन्नी’ की चीज़ छः नए-पैसों में और ‘दुअन्नी’ की बारह नए-पैसों में खरीदी जाती रही. धीरे-धीरे चीज़ों के दाम नए-पैसों के हिसाब से तय होने लगे और फिर धीरे धीरे ‘नया-पैसा’ पुराना होता गया, फिर लोगों ने उसे ‘नया’ कहना भी बंद कर दिया.

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Thursday, June 30, 2016

ताने-बाने लोकेंद्र शर्मा की जिंदगी के- दसवीं कड़ी।

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रेडियो के सामने बैठकर, रेडियो मैंने जीवन में पहली बार मामाजी के घर में सुना. रेडियोग्राम में रोज़ सुबह समाचार सुने जाते थे. मामाजी का आदेश था कि सब लोग अंग्रेजी के समाचार ज़रूर सुनें. 
इससे अंग्रेजी सुधरेगी, लेकिन सुधरती ख़ाक. मैं तो मेवाड़ी और हिंदी बोलते-बोलते दिल्ली आया था, अंग्रेजी बस उतनी ही आती थी, जितनी आठवी पास करने के लिए ज़रूरी थी. समाचार सुनता ज़रूर था, लेकिन समाचार बांचने वाले के नाम ‘मेल्विल डिमेलो’ के अलावा उसमें और कुछ पल्ले नहीं पड़ता. अंग्रेजी के बाद हिंदी समाचार आते थे. ये सुनना ज़रूर अच्छा लगता था, क्योकि थोड़ा बहुत समझ में भी आ जाता था. लेकिन जाने क्यों समाचार वाचक की आवाज़ सुन कर मुझे लगता कि समाचार बोलने वाला कोई आदमी नहीं है. ये तो रेडियो बोल रहा है. किसी आदमी की भी ऐसी आवाज़ होती है कहीं. लेकिन रोज़ सुनता था इसलिए, कुछ दिनों बाद मुझे समाचार पढ़ने वाले का नाम याद हो गया. नाम शुरू में ही बोला जाता था, ‘ये आकाशवाणी है, सुबह के सवा आठ बजे हैं, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए.’


रविवार के दिन सुबह नौ बजे बच्चों का कार्यक्रम आता था. मैं, अरुण, बेबी, अशोक, मुन्नी और साथ में सरोज और मंजू बहन भी मिलकर इस प्रोग्राम को सुनते. प्रोग्राम में एक दीदी और एक भैया होते थे. कुछ बच्चे भी उनके साथ होते. भैया और दीदी ऐसे बातें करते, जैसे वे अपने सामने बैठे बच्चों से ही नहीं, रेडियो सुनने वाले बच्चों से भी मुख़ातिब हैं. थोड़े ही दिनों में मुझे दीदी और भैया से मिलने की चाह होने लगी. रविवार की ही दोपहर को एक और कार्यक्रम आता था – ‘आपकी चिट्ठी मिली’. इसमें भी कोई आशा बहन और मित्तल साहब सुनने वालों की चिट्ठियों के जवाब देते थे. मुझे ये प्रोग्राम भी बहुत पसंद था. जाने क्यों लगता कि रेडियो में बैठे हुए लोग, मुझे अपने पास बुला रहे हैं. मैं अक्सर चक्कर में पड़ा रहता कि रेडियो में सुनाई देने के कारण आवाज़ ऐसी लगती है या सचमुच में इन लोगों की आवाज़ इतनी ही अच्छी है.


रेडियोग्राम एक ठिगनी आलमारी जैसा था, जिस के आधे हिस्से में रेडियो था और बाकी आधे में ग्रामोफ़ोन. ये ग्रामोफ़ोन भी निराले किस्म का था. एक तो यह कि बिजली से चलता था, इसलिए इसमें हैंडल घुमाकर चाबी भरने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. दूसरे इसमें एक साथ छह रिकॉर्ड लगाए जा सकते थे, जो एक के बाद एक, अपने-आप बजते चले जाते. अब तक मैं रेडियो से इतना प्रभावित हो चुका था कि अक्सर इच्छा होती, मैं भी रेडियो से बोलूं, लेकिन बोलने के लिए क्या करना चाहिए, इसकी कोई जानकारी नहीं थी. अपनी भड़ास मिटाने के लिए कई बार मैं रेडियोग्राम के पीछे छुपकर बैठ जाता और बाकी बच्चों को सामने पलंग पर बैठा देता, फिर जितनी देर में रेडियोग्राम, एक रिकॉर्ड बजाकर दूसरे को बजाने की  तैयारी करता, तब तक बीच में आये विराम के समय, मैं गाने की एनॉउन्समेंट करता. डांट-डपट कर जबरदस्ती पलंग पर बैठाए गए श्रोताओं को मेरी एनाउन्समेंट सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, सो वो खुसुर-पुसुर करते रहते, लेकिन डर के मारे बैठे रहते. गाने भी कुल मिलाकर दस-बारह ही थे, जिन्हें हर रोज़ सुना जाना भी किसे भाता.


मामाजी के घर में रहते हुए मुझे दिलचस्पी का एक और सामान मिला. सरोज बहन को ड्रॉइंग और पेंटिंग का शौक था. अक्सर वे किसी कैलेंडर या किताब के छोटे चित्र को बड़ा या बड़ी तस्वीर को छोटा करके बनाया करतीं. तस्वीर को ज्यों का त्यों दूसरे काग़ज़ पर नए सिरे से बनाने का उनका एक विशेष फॉर्मूला था. जिस पेंटिंग को दूसरे काग़ज़ पर बनाना होता, उसपर पहले एक-एक इंच की दूरी पर पेंसिल से पड़ी-लाइनें खींचती, फिर एक-एक इंच की दूरी पर खड़ी-लाइनें खींची जातीं. इस तरह पूरी पेंटिंग एक-एक इंच के वर्ग वाले ताने-बाने में बंट जाती. अब जिस काग़ज़ पर तस्वीर बनानी होती, उसपर भी उसी तरह की खड़ी और पड़ी लाइनें खींची जातीं और मूल तस्वीर के एक-एक वर्गइंच में सिमटी पेंटिंग की लकीरों को, दूसरे काग़ज़ के वर्गइंच में कॉपी किया जाता. इस तरह धीरे-धीरे करके पूरी तस्वीर नए काग़ज़ पर उतर आती. फिर तस्वीर की लकीरों को स्याही से गहरा किया जाता और पेंसिल से बने हुए ताने-बाने रबर से मिटा दिए जाते. इस काम के लिए ढेर सारे धैर्य और घनी एकाग्रता की ज़रूरत होती है. सरोज बहन घंटों तक तस्वीर में सिर झुकाए काम किया करतीं और मैं देखा करता. मुझे पेंटिंग में दिलचस्पी लेता देखकर, सरोज बहन ने मेरा उत्साह बढ़ाया. पहले उन्होंने तस्वीर और काग़ज़ पर मुझे लकीरें खींचने का काम सौंपा. फिर वर्गइंच के खानों में तस्वीर को कॉपी करना सिखाया. एक तो मुझे यह काम करते हुए बहुत मज़ा आ रहा था, दूसरे सरोज बहन का प्यार भरा व्यवहार मुझे उत्साहित कर रहा था. दोस्ती मेरी मंजू बहन के साथ भी हो गई थी, लेकिन मंजू बहन दोस्त जैसी थी, जबकि सरोज बहन के व्यवहार में मुझे ममता नज़र आती.

                  
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गर्मी की छुट्टियां खतम होने को थीं. बेबी, अरुण, मंजू बहन और सरोज बहन आदि सबको अपने-अपने स्कूल-कॉलेज जाने का समय आ रहा था. मुझे भी दिल्ली के किसी स्कूल में दाखिला लेना था, लेकिन उससे पहले ये ज़रूरी था कि बाउजी अपने परिवार के रहने का कहीं और बंदोबस्त करें. बाउजी ने कुछ मकान तलाश किए. एक-दो बार मैं भी उनके साथ मकान देखने गया. बल्लीमारान में एक घर देखा, पसंद नहीं आया. दूसरा लालकुआं में भी देखा, उसका किराया बहुत ज़्यादा था. किसी ने तेलीवाड़े में एक मकान की सूचना दी. मैं और बाउजी इसे भी देखने गए. चांदनी चौक से ट्राम में बैठकर फ़तेहपुरी, खारीबावली, लाहोरीगेट और कुतुबरोड होते हुए हम तेलीवाड़ा पहुंचे. कुछ अंदर जाकर एक पतली सी गली थी, जिसका नाम था, पनिहारी गली. गली साफ़-सुथरी लगी. गली वैसे तो सीधी चली गई थी, लेकिन एक जगह बायीं और भी मुड़ गई थी जौर एक चौक तक आकर बंद हो गई थी. इसी चौक में श्रीकृष्ण गुप्त का मकान था. मकान में प्रवेश करते ही पत्थर का एक चौरस दालान और दालान के तीन तरफ़ लंबे-लंबे कमरे थे. लगता था दालान के तीन तरफ कभी बरामदा था, जिसे तीन-तीन लकड़ी के दरवाजों से ढांप कर कमरों में बदला गया है. बीच का दरवाज़ा खोला और बंद किया जा सकता था, बाकी अगल-बगल के दो दरवाज़े दीवार का काम करते थे. चौक में सामने वाला बरामदेनुमा कमरा हमें दिखाया गया. अंदर का स्वरुप एक आयताकार जैसे कमरे का था और साथ में एक छोटा कमरा भी था, जिसकी ख़िड़की से मकान के पिछवाड़े वाली गली दिखाई देती थी. चौक के ऊपर लोहे का जाल था और इस जाल के ऊपर एक और जाल, जो असल में छत का हिस्सा था. मैं पहले भी बता चुका हूं कि दिल्ली में जाल वाले घरों का अधिक चलन है. मकान मालिक श्रीकृष्ण गुप्त ने बताया कि वे पत्रकार हैं और लिखने-पढ़ने वालों की कद्र करते हैं. किराया उन्होंने चालीस रुपए महीना बताया. बाउजी को रेस्टोरेंट से कुल एक सौ पच्चीस रुपए महीना वेतन मिलता था, इस हिसाब से चालीस रूपए बहुत भारी जान पड़े, लेकिन कोई और चारा नहीं था. दूसरे जो मकान देखे, वे पैंतालीस और पचास रुपये से कम किराए के नहीं थे. हालांकि तेलीवाड़ा, चांदनी चौक से दूर भी बहुत था, लेकिन बाउजी मकान ढूंढ़-ढूंढ़ कर थक चुके थे, सो उन्होंने इस मकान के लिए हामी भर दी.


अगले ही दिन भाभी और हम बच्चे, सामान के साथ एक तांगे में लदकर, अपने नए ठिकाने पर आ गए. सामान कुछ ज़्यादा तो था नहीं, चूल्हे-चौके के लिए बर्तनों तक का नए सिरे से इंतज़ाम करना था. एक तरह नए सिरे से गृहस्थी को जमाना था. यानी तेलीवाड़ा में बाउजी के लिए एक बार फिर, एक नए संघर्ष की शुरूआत हुई और शायद यहीं से उनके संघर्ष में मेरी भागीदारी भी जुड़ी.


आस-पास के स्कूलों में मेरे दाख़िले की कोशिशें की गई, पर नाकाम रही. मकान मालिक श्रीकृष्ण गुप्त ने मदद का हाथ बढ़ाया. उन्होंने बाउजी से कहा, घबराएं नहीं, दाख़िला हो जाएगा. हम बच्चों ने मकान मालिक को चाचाजी कहना शुरू कर दिया था. अगले ही दिन चाचाजी मुझे लेकर मोरीगेट के गवर्नमेंट हाईस्कूल में पहुंचे. वहां के असिस्टेंट हेडमास्टर सेठी साहब चाचाजी के मित्र थे. सेठी साहब ने आदर से बैठाया, चाचाजी के लिए चाय मंगवायी और मेरे दाख़िले का फॉर्म ख़ुद ही भर दिया, लेकिन एक बात पर उन्होंने अपनी राय दी. मैं भीलवाड़ा से आठवीं कक्षा पास करके आया था और सेठी साहब के अनुसार दिल्ली की पढ़ाई का स्तर ऊंचा था. अगर मैं नौंवी कक्षा में दाख़िला लेता, तो मेरा फ़ेल होना तय था. इसलिए उन्होंने सलाह दी कि मैं एकबार फिर आठवीं कक्षा में दाख़िल हो जाऊं, ताकि दिल्ली की पढ़ाई के क़ाबिल हो सकूं. सन् 1949 में भारत सरकार के आदेश ने मुझे पहली से सीधे तीसरी कक्षा में पहुंचाया था और अब आठवीं को मुझे दोबारा पढ़ना था. यानी नफ़ा-नुकसान बराबर हो गया.

मेरा दाखिला होते-होते भीलवाड़ा के स्कूल ‘महिला आश्रम’ की यानी भाभी की छुट्टियाँ ख़तम हो गईं. यह ज़रूरी था कि नौकरी की खातिर, भाभी अब भीलवाड़ा लौट जाए, लेकिन दिल्ली में भी गृहस्थी जमानी थी, इसलिए भाभी को एक महीने और छुट्टियां बढ़ानी पड़ीं, लेकिन जब वो महीना भी ख़तम हुआ तो भाभी का भीलवाड़ा लौट जाना ज़रूरी हो गया. नौकरी छोड़ कर दिल्ली में उनका रहना संभव नहीं था, क्योकि केवल बाबूजी के वेतन पर गृहस्थी का गुज़ारा नामुमकिन था. वैसे भी भीलवाड़ा वाला मकान अभी छोड़ा नहीं गया था. असल में घर-गृहस्थी का काफ़ी सामान वहां जमा था. सो दो बरस के फुन्नू को लेकर एक दिन भाभी भीलवाड़ा लौट गईं. भाभी के चले जाने के बाद, रसोई और घर की ज़िम्मेदारी मुन्नी पर आ गई और अब उसे स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ सुबह-शाम सबके लिए खाना बनाने की ड्यूटी भी निभानी पड़ती. जाते जाते भाभी कह गई थीं कि कुछ ही दिनों में वे वापस लौट आएंगी. लौट आने के उनके इस वादे का अर्थ ठीक से समझने की तब मेरी उम्र नहीं हुई थी. यह अर्थ तो मैंने बाद में ही जाना, जब कुछ महीनो बाद वे वापस लौटीं, अपने अगले प्रसव के लिए. लेकिन इसकी चर्चा बाद में.

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मोरीगेट का गवर्नमेंट हाईस्कूल, एक नहीं दो स्कूल थे, जो दो अलग-अलग शिफ़्टों में चलते थे. पहला स्कूल सुबह सात बजे शुरू होता और बारह बजे ख़तम हो जाता. इसके हेडमास्टर, अध्यापक और चपरासी सबकी छुट्टी हो जाती. फिर साढ़े बारह बजे से दूसरा स्कूल शुरू होता, जो साढ़े पांच बजे तक चलता. मुझे दूसरी शिफ़्ट में दाख़िल किया गया था. हमारा स्कूल दिल्ली के चारों तरफ़ बनी पत्थर की दीवार के एक तोपख़ाने में था. शाहजहां के ज़माने में बनी इस दीवार में कई दरवाज़े थे. दिल्ली दरवाज़ा, तुर्कमान दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, लाहोरी दरवाज़ा, मोरी दरवाज़ा और कश्मीरी दरवाज़ा. शायद हमारे स्कूल की इमारत जैसे तोपख़ाने, हर दरवाज़े के साथ रहे होंगे, लेकिन अब दीवार के कुछ ही टुकड़े बचे थे. अन्य दरवाज़े तो अब भी अपनी-अपनी जगह खड़े थे, लेकिन मोरी दरवाज़े का केवल नाम ही रह गया था. लोगों का कहना था कि 1957 के ग़दर में ये दरवाज़ा अंग्रेजों की तोपों का शिकार हो गया. जो भी हो अब उस दरवाज़े की जगह केवल समतल ज़मीन थी, लेकिन मोरी दरवाज़े का खंडहर तोपख़ाना अभी भी बचा हुआ था और इस समय हमारे स्कूल के काम आ रहा था.


स्कूल के बाहर शरणार्थियों की घनी बस्ती थी. दोनों ओर दूकानें थीं और दूकानदारों ने बल्लियों के सहारे त्रिपाल और कनातें लगाकर सड़क का काफ़ी हिस्सा घेरा हुआ था. दूकानों के ऊपर लकड़ी और ईंटों की दीवारों से बनाए गए कच्चे-पक्के कमरे थे, जो शरणार्थियों के घर बने हुए थे. स्कूल के गेट से बाहर निकलते ही दाएं-बाएं दोनों तरफ़ खोमचे वालों की कतारें नज़र आती. स्कूल की दूसरी शिफ़्ट शुरू होने से पहले और आधी छुट्टी के समय खोमचे वालों की हलचल बढ़ जाती. एक चूरन वाला था, जो चूरन की पुड़िया में जादुई चिंगारी सी भड़काकर ग्राहक को देता. चिंगारी का जादू देखने के लिए बच्चों की भीड़, उसके खोमचे को घेरे रहती. एक मोटा सिंधी कढ़ाही में पापड़ तल-तल कर बेचता था. मैं कई बार उसे हसरत से देखता और अचरज करता कि कढ़ाही में उसने पापड़ तो छोटा ही डाला था, लेकिन उबलते हुए तेल में पहुंचते ही पापड़ का आकार दोगुना हो गया. बहुत दिनों बाद पता चला था कि चावल के पापड़ का यही हाल होता है. एक उबले हुए चने बेचने वाला भी था, जो बराबर पुकार लगाए जाता, “गरमा-गर्रम मस्सालेदार”. इस चने वाले की पुकार सुनकर मुझे भीलवाड़ा में महाराणा टॉकिज़ के सामने बैठे, मूंगफली वाले की पुकार, ‘गर्रमा-गर्रम. मीठीई-मीठीई’ याद आ जाती. लेकिन इन सब खोमचे वालों को मैं सिर्फ देखकर ही तसल्ली ही कर सकता था, कभी कुछ ख़रीदकर खाने जैसी मेरी औक़ात नहीं थी.


स्कूल के भीतर का दृश्य भी मज़ेदार था. फाटक में प्रवेश करते ही एक बड़ा मैदान सामने दिखाई देता और इसके चारों तरफ़ पत्थर की खंडहरनुमा बैरकें नज़र आतीं. सामने बाएं कोने में सीढ़ियां थीं, जो पहली मंज़िल तक जाती थीं, जहां बरामदे के पीछे कमरे थे. इन कमरों में अलग-अलग कक्षाएं लगा करतीं. बरामदे और कमरों का फ़र्श मिट्टी के उबड़-खाबड़ आंगन जैसा था और इसी में छात्रों की आड़ी-तिरछी बेंचें और डगमग करते डेस्क रखे थे. कक्षाओं में अपेक्षाकृत अंधेरा रहता था, जिसे दूर करने के लिए छत पर लटका बिजली का एक बल्ब हमेशा जला करता. एक पीरियड ख़तम होने के बाद दूसरे पीरियड के लिए नए मास्टरजी आते और आते ही उन्हें सबसे पहले अपनी डगमगाती कुर्सी को इधर-उधर खिसका कर, उसके लिए समतल ज़मीन तलाश करनी पड़ती. ज़्यादातर अध्यापक पंजाबी थे और उनकी भाषा भी पंजाबी और ऊर्दू से भीगी हुई थी. इस कारण कई बार कोई-कोई बात मेरी समझ में भी नहीं आती. गणित पढ़ाने वाले मास्टरजी जब ब्लैकबोर्ड पर सवाल समझाते, तो गुणा को ‘ज़रब’, ऋण को ‘घटा’, धन को ‘जमा’ और विभाजक को ‘भाग’ कहते और मुझे ख़ाक समझ में नहीं आता. गणित वाले मास्टरजी ने एक दिन मेरी तरफ़ इशारा करके कहा, “तू नवां है ना, चल ब्लैकबोर्ड पर ये सवाल कर.” अपनी सीट से उठकर ब्लैकबोर्ड तक जाते-जाते मैंने सोचा, गणित की ऊर्दू शब्दावली मुझे आती नहीं और यदि मैं भीलवाड़ा में सीखी गई हिंदी शब्दावली का प्रयोग करूंगा, तो यहां किसी को समझ में आएगा नहीं. सो चॉक हाथ में लेकर ब्लैकबोर्ड पर लिखने से पहले मैंने तय किया कि मैं अंग्रेजी की शब्दावली का इस्तेमाल करूंगा, ताकि सबको समझ में आ सके और मैंने यही किया. लेकिन ज्यों ही मेरे मुंह से ‘प्लस’, ‘माइनस’ और ‘इक्वलटू’ जैसे शब्द निकले, पीछे से दनदनाता हुआ मास्टरजी का झापड़ माथे पर पड़ा. मैं कुछ समझूं, इसके पहले ही वे चिल्लाए, “अंग्रेजदा पुत्तर. आठवीं जमात में इंग्लिश बोलेगा?” सिर के पीछे पड़ी मार और अपमान के कारण रोना सा आने लगा, लेकिन सफ़ाई में क्या कहूं, ये समझ नहीं पाया. मास्टरजी ने मुझे सफ़ाई का मौका भी नहीं दिया. डांटकर कहा, “चल जाके बैठ अपणी जगां.”



मास्टरजी ने जो किया, उनके लिए वो आम बात थी, लेकिन मेरे साथ जो हुआ, वो मेरे लिए सहज नहीं था. सारी क्लास के सामने अपमानित किए जाने पर मुझमें क्रोध और पीड़ा एक साथ जागे. मुझे पता था कि अब मुझे क्लास के दूसरे लड़कों का अपमान भी सहना है. अधिकतर छात्र शरणार्थी परिवारों के पंजाबी और सिंधी बच्चे थे. कई बच्चे उम्र में मुझसे बड़े और लंबे-चौड़े भी थे. शुरू-शुरू में, वैसे भी मुझे उनकी पंजाबीनुमा हिंदी ठीक से समझ नहीं आती थी, जिसके कारण मेरा ख़ूब मज़ाक उड़ाया जाता. जब मास्टरजी क्लास में नहीं होते, तब लड़कों की दबंगई और बढ़ जाती. बड़ी उम्र का ना लड़का, बलविंदर जब भी मेरे पास से गुज़रता, गाल पर चिकोटी काटकर, ‘क्यों बे चिकणे’ कहता जाता. क़रीब महीना भर बीत जाने के बावज़ूद मेरी मिनी-रैगिंग जारी थी और ये अभी कितने दिनों तक और चलती रहेगी, इसका कुछ अंदाज़ा भी नहीं था. अब तो दिन में कई-कई बार क्लास के अलग-अलग कोनों से ‘अंग्रेजदा पुत्तर’ भी सुनाई देता और मुझे रोना सा आने लगता.


जब कई दिनों तक मेरे साथ रैगिंग चलती रही, तो एक दिन जाने मुझे कैसा ताव आया कि मैं झटके से उठा, तेज़ी से क्लास के बाहर आया, बरामदा पार किया और सीधा चिक का परदा उठाकर हेडमास्टर जी के ऑफ़िस में जा घुसा. हेडमास्टर जी रामचंद खरबंदा साहब कोई फ़ाइल देख रहे थे, अचानक मुझे सामने देखकर, उन्होंने अपना सिर उठाया. मैंने बिना किसी डर या संकोच के गीली आंखों और भरे गले से एकाएक कहना शुरू किया, “क्या यही है आपका अनुशासन? यही सिखाया जाता है आपके स्कूल में? मैं नया हूं, मुझे पंजाबी नहीं आती, तो ये क्या मेरा अपराध है? सारे लड़के मिलकर मुझे सुबह से शाम तक चिढ़ाते हैं. किससे शिकायत करूं? कहां जाऊं?” मैं आगे कुछ बोलूं, इससे पहले ही किसी का हाथ मेरे कंधे पर पड़ा. मैंने मुड़कर देखा, वही गणित वाले मास्टरजी थे. जाने कब चिक उठाकर वे कमरे में चले आए थे और चुपचाप खड़े मेरी बात सुन रहे थे. बोले, “कोण चिड़ान्दा है तुझे, चल दस्स मैनू”. हेडमास्टर साहब  ने भी कहा, “हां, सोढ़ी साहब, देखो ज़रा क्या मामला है.”
सोढ़ी साहब बाजू से मुझे पकड़कर तेज़ी से क्लासरूम की तरफ़ चले. चिक उठाने से पहले उन्होंने कोने में पड़ी बेंत उठा ली थी. क्लास में पहुंचते ही लगभग मुझे आगे धकेलते हुए उन्होंने कहा, “बता कौण ए? किसने छेड़ा ए? किसने मज़ाक उड़ाया?”  मैं सकते में खड़ा रहा. डरी-डरी आंखों से मास्टरजी की तरफ़ देखता रहा. किसी लड़के की तरफ़ इशारा करने की हिम्मत ही नहीं हुई. क्लास में भी अजब सन्नाटा था. मास्टरजी ने मेरी तरफ़ से ध्यान हटाया और सामने बैठे लड़के की डेस्क पर बेंत फटकारी और पूछा, “तू बता, कौण छेड़दा है इसनू?” सहमा हुआ लड़का चुपचाप खड़ा हो गया, बोला कुछ नहीं. मास्टरजी ने सड़ाक से एक बेंत उसे जड़ दी. फिर पीछे की क़तार में बैठे हुए बड़ी उम्र के बलविंदर से पूछा, “ओए तू बोल, तूने छेड़ा?” खड़े होकर उसने भी इनकार में सिर हिलाया और जवाब में मास्टरजी की बेंत खाई. इसके बाद तो मास्टरजी को जैसे दौरा ही पड़ गया. जिसपर नज़र पड़ी, उसे दनादन बेंत रसीद करने लगे. साथ ही उनका चिल्लाना भी जारी था, “मां-बाप तुमको इधर सकूल में भेजते हैं पढण वास्ते और यहां आकर दादागीरी करते हो... इतना लुट-पिट कर आए हो पार्टीशन में, लेकिन दमाग सीधा नहीं हुआ ... मरोगे सारे... मेरे हत्तों मरोगे... पढ़ना एक लफ़ज नहीं और हरामखोरी में अव्वल... कोई नया आएगा क्लास में, तो उसके साथ गुंडागर्दी करोगे... सकूल को क्या समझा है, अपणे बाप का हुजरा?” मास्टरजी की जबान और बेंत दोनों चल रहे थे. मार खाते हुए लड़के ‘हाय-हाय माड्डाला... मैं मर गया... माश्टरजी’ कर करके चिल्ला रहे थे, लेकिन मास्टरजी के क्रोध पर उनके रोने का कोई असर नहीं हो रहा था. मैं पीछे खड़ा हुआ थर-थर कांपने लगा. मार खाते और हाय-हाय करते लड़कों को देखकर मुझे रोना आ गया. मास्टरजी ने एक लड़के पर बेंत उठाई, लेकिन इससे पहले कि वो किसी पर बरसती, बेंत को पीछे से मैंने पकड़ लिया. मास्टरजी ने मुड़कर मुझे देखा, फिर मेरे आंसू भरे चेहरे को देखकर, एकाएक हाथ नीचे कर लिया. मैंने रोते-रोते हाथ जोड़कर उनसे कहा, “मत मारिए, बहुत हो गया. माफ़ कर दीजिए इनको.” मास्टरजी पहले हैरान हुए, फिर धीरे से आकर कुर्सी पर बैठ गए, मुझे बाजू से पकड़कर अपनी तरफ़ खींचा और दूसरे हाथ से मेरे आंसू पोंछते हुए कहा, “ओए तू क्यों रोता है? ये ससुरे तो हैंई इसी काबल हैं. तू अपना दिल क्यों ख़राब करता है. शाबाश, चुप हो जा.” फिर एकाएक मास्टरजी ने क्लास की तरफ़ देखते हुए कहा, “देखो नमूनो, ओए शरम करो, तुम इसके साथ कैसा सलूक करते हो और इसके दिल में तुम्हारे लिए कितना रहम है. संभल जाओ, पढ़ाई में त्यान लगाओ, इस लफंडबाजी में कुछ नहीं रखा. सीखो कुछ.” फिर मेरी तरफ़ देखकर आवाज़ में थोड़ा लाड़ भरते हुए मास्टरजी ने पूछा, “नांव क्या है तेरा?” मैं एकबार फिर सहम गया. मेरा संस्कृत जैसा नाम सुनकर कहीं मास्टरजी फिर से मुझे किसी का ‘पुत्तर’ न घोषित कर दें. मैंने डरते-डरते अपना नाम बताया. मास्टरजी ने पता नहीं समझा या नहीं, पर मुस्कराए और कहा, “जा बैठ जा अपनी जगा, अगर कोई भी तुझे कुछ बोले, तो हेडमाटसाबजी के पास जाने की ज़रूअत नईं, मेरे को बोलना. मैं हड्डियां तोड़ दूंगा इनकी. जा श्याबाश, बैठ जा.”


इस घटना के बाद लड़के मुझसे डरने से लगे. एक-दो शायद इज़्जत भी करने लगे. क्लास में दो भाई थे, दर्शन और प्राण. दोनों मेरे दोस्त हो गए. ये दोनों भी तेलीवाड़े में ही रहते थे, हमारे घर की खिड़की से जो पिछवाड़े की गली दिखाई देती थी, उसी में. स्कूल आने-जाने के लिए मेरा और उनका साथ हो गया. दर्शन, प्राण से छोटा था, उम्र में भी और कद-काठी में भी, लेकिन पढ़ने में ख़ासा तेज़ था. उसकी लिखावट बहुत सुंदर थी. कई दिनों बाद मुझे पता चला, उसका पूरा नाम सुदर्शन तलवार है, लेकिन घर और स्कूल में सब उसे दर्शन ही कहकर बुलाते थे. चूंकि पड़ोसी थे, हमारा एक-दूसरे के घरों में आना-जाना होने लगा. दर्शन के माता-पिता और बड़े भाई मुझे बहुत प्यार करते थे. दर्शन भी मेरे घर में वैसा ही आदर पाता था. भाभी, मुन्नी, अशोक सब दर्शन को बहुत पसंद करते थे. जिस मोहल्ले में दर्शन और प्राण का घर था, उसमें लगभग सभी घर पंजाबी शरणार्थियों के थे. स्कूल के कुछ और लड़के भी यहीं रहते थे. इनमे एक थोडा अमीर सा दिखाई देने वाला लड़का भी था - अमर. पूरा नाम था अमरनाथ पसरीचा. धीरे-धीरे मेरी सभी से दोस्ती हो गई. उनके संपर्क में, मैं पंजाबी समझने और थोड़ी-थोड़ी बोलने भी लगा.


नवंबर के साथ ही दिल्ली की हवा में ठंडक शुरू हो गई थी. स्कूल की ड्रेस ख़ाकी निकर और सफ़ेद क़मीज थी, जिसकी वजह से आते-जाते टांगों में झुरझुरी होती. एक दिन मास्टरजी ने बताया कि चौदह नवंबर को बाल-दिवस है. उस दिन सब बच्चों को नेशनल स्टेडियम जाना है, जहां देशभर से आए हुए बच्चे चाचा नेहरू का जन्मदिन मनाएंगे. हमारी कोर्स की किताब में चाचा नेहरू पर एक निबंध था, उसी में मैंने पढ़ा था कि चाचा नेहरू बच्चों को बहुत प्यार करते हैं, इसीलिए उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है. मैं इस बात से बहुत उत्साहित हो गया कि चौदह नवंबर को मैं चाचा नेहरू को देख पाऊंगा. स्कूल की तरफ़ से सब बच्चों को बस में बैठाकर इंडिया गेट के पास, नेशनल स्टेडियम ले जाया गया. अंदर प्रवेश करने के लिए हर बच्चे को एक पास दिया गया था. मैं पास हाथ में लिए गेट की तरफ़ बढ़ता रहा, लेकिन किसी ने पास चैक ही नहीं किया. मैंने पहली बार नेशनल स्टेडियम और इंडिया गेट को देखा था. अंदर पहुंचने पर पता चला कि नेशनल स्टेडियम, एक गोल मैदान को घेरकर चारों तरफ़ बनाई गई ढ़ेर सारी सीढ़ियों का नाम था. सीढ़ियों पर हज़ारों की तादाद में बच्चे बैठे थे. हम भी जाकर एक सीढ़ी पर बैठ गए. गोलाकार सीढ़ियों में ही बायीं ओर एक मंच बनाया गया था. मंच पर गांधी टोपी पहने हुए ढेर सारे लोग दिखाई दे रहे थे. मैं हैरान सा अभी नेशनल स्टेडियम को निहारने में ही लगा था कि अचानक बच्चों में शोर मचा. मैंने देखा मंच पर गोरे-चिट्टे चाचा नेहरू आकर सब बच्चों को आकर हाथ हिला रहे थे. किसी ने चाचा नेहरू ज़िंदाबाद का नारा शुरू किया और स्टेडियम बार-बार इस नारे से गूंजने लगा. कुछ देर बाद मंच पर से सैकड़ों की तादाद में सफ़ेद कबूतर उड़ाए गए. बच्चों ने तालियां बजाई. फिर चाचा नेहरू ने भाषण दिया. उन्होंने बस इतना ही कहा, प्यारे बच्चो, जयहिंद कुछ बच्चों ने तालियां बजाईं और कुछ ने जयहिंद का नारा दोहराया. फिर चाचा नेहरू एक खुली जीप में सवार हुए और जीप ने धीमी चाल से स्टेडियम का चक्कर लगाया. जहां से भी चाचा नेहरू की जीप गुज़रती, बच्चे तालियां बजाते और जय-जयकार करते. सफ़ेद शेरवानी और सफ़ेद टोपी में गोरे-चिट्टे चाचा नेहरू मुझे बहुत सुंदर लग रहे थे. वे जीप में खड़े हुए थे और हाथ हिला-हिला कर बच्चों का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे. ज्यों-ज्यों उनकी जीप हमारे समीप आ रही थी, मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी. कुछ अजीब सा रोमांचकारी अनुभव था. जीप हमारे सामने से गुज़री तो मैंने भी ख़ूब तालियां बजाई. स्टेडियम का चक्कर पूरा करके, कुछ देर बाद चाचा नेहरू चले गए और बाल दिवस का मेला पूरा हो गया.
लौटने के लिए वापस बस में बैठने से पहले सब बच्चों को एक-एक पैकेट दिया गया. पैकेट में एक समोसा और दो लड्डू थे.

Wednesday, June 22, 2016

ताने-बाने लोकेंद्र शर्मा की जिंदगी के- नौवीं कड़ी।

रेडियोनामा पर लोकेंद्र जी का लिखा सब कुछ पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए 


उन्नीसवीं सदी के मध्य काल में ऐतिहासिक नगर चित्तौड़गढ़ के पास भांडपी नामक गांव था, जहां 
पंडित धुलीरामजी उपाध्याय रहते थे. इनके चार बेटे थे. नंदरामजी, रामरतनजी, लक्ष्मणजी और शोकिशनजी. लक्ष्मणजी के तीन बेटे थे - गौरीशंकरजी, मोहनलालजी और कजोड़ीमलजी.

गौरीशंकरजी मेरे दादाजी थे. दादी का नाम था, नोजबाई. मेरे पिताजी (बाउजी) अभी बच्चे ही थे कि दादाजी का स्वर्गवास हो गया. दादी (जिन्हें हम भाबा कहते थे), साड़ास में रहती थी. मैंने साड़ास को ही अपने पैतृक गांव के रूप में जाना.

दादाजी के भाई पंडित मोहनलालजी के तीन बेटे थे – मदनलालजी, चंदनलालजी और मुरलीधरजी. दादाजी के दूसरे भाई कजोड़ीमलजी के दो बेटे थे – भैरूलालजी और विष्णुदत्तजी. ये पांच बाउजी के चचेरे भाई थे. बाउजी अपने पिता पंडित गौरीशंकरजी के अकेले बेटे थे और उनकी एक ही सगी बहन थी चंद्रप्रभा देवी, जिन्हें हम बुआजी कहते थे. पंडित गौरीशंकरजी उदयपुर रियासत के कोतवाल थे. बुआजी की शादी का ज़िक्र करते समय मैं बता चुका हूं कि दादाजी पंडित गौरीशंकर जी को जाने कैसे अपने अंत का पूर्वाभास हो गया था, इसलिए अपने सामने ही उन्होंने बेटी (हमारी बुआजी) की शादी चार बरस की उम्र में ही करवा दी थी और बेटे (हमारे बाउजी) का रिश्ता भी उसी समय बरुंदनी की धापूबाई के साथ तय करवा दिया था. दादाजी के गुज़र जाने के कुछ बरस बाद बाउजी का भी बरुंदनी की धापूबाई के साथ विवाह हो गया. यह उस दौर की बात है, जब किसी एक घर का दामाद सारे गांव का दामाद माना जाता था और किसी एक घर की लड़की सारे गांव की बेटी होती थी. धापूबाई के सगे भाई तो एक ही थे, पुरुषोत्तमलालजी, लेकिन परम्परानुसार बाउजी पूरी बरुंदनी के दामाद थे.

बाउजी जब थोड़े बड़े हुए, थोड़ा पढ़-लिख गए, कुछ गांव-शहरों में घूम लिए, तब जाने क्यों उन्हें अपनी पत्नी धापूबाई का नाम कुछ अच्छा नहीं लगा और उन्होंने अपनी पत्नी का नया नाम रखा, प्रेमलता. मुझे याद है अपनी पहली पत्नी के बारे में बाउजी जब भी हमसे बात करते, उन्हें ‘तुम्हारी पहली मां’ कहकर संबोधित करते. हमारी पहली माँ, प्रेमलता को जीवन में बाउजी कभी नहीं भूल पाए. उनके लिए बाउजी के मन में अगाध प्रेम था और उनके इस प्रेम की आलोचना का मैंने स्वयं को कभी अधिकारी नहीं माना, बल्कि पहली पत्नी के प्रति बाउजी का अनुराग, मुझे अक्सर स्तुतियोग्य लगा. जो लोग प्रेम को, केवल देह से जोड़ने की संकीर्ण मनोवृत्ति में जीते हैं, उन्हें मेरी बात ज़रा मुश्किल से ही समझ में आएगी. मुझे लगता है, जो लोग बिस्तर के दायरे से बाहर के प्रेम की कल्पना नहीं कर सकते, वो बड़े अभागे होते हैं. जीवन भर जिसे वो प्रेम समझते हैं, वो देहसीमा से बंधा कर्त्तव्य होता है, आत्मा को छू भी नहीं पाता. ऐसे कुछ देहजीवी मेरे परिवार के पल्ले भी पड़े हैं. जिनके प्रेम की परिभाषा पर, क्रोध से अधिक, मुझे दया आती है. बाउजी ने दूसरी शादी की, नया घर-संसार बसाया, गृहस्थ बने, लेकिन इस बात के कारण, अगर कोई यह कहे कि अपनी पहली पत्नी याद करना उनके लिए पाप है, तो ऐसे सोच को मैं बीमार मानसिकता के अतिरिक्त और क्या कहूं. अलौकिक प्रेम तो अंतर्मन का मंदिर है और मंदिर में हो रही पूजा से, कोई आहत कैसे हो सकता है.

बाउजी ने मेरी जन्मदायिनी माँ पर कभी हाथ उठाना तो दूर, उनसे कभी ऊँचे सुर में भी बात नहीं की. जीवन भर वे पति और पिता के कर्तव्य से रत्ती भर भी नहीं डिगे. घोर आर्थिक-संकट के समय भी उन्होंने संघर्ष को ईश्वर का उपहार माना और हमें भी यही मानना सिखाया. आदर्श की बाउजी ने कोरी बातें ही नहीं की, अपने जीवन को आदर्श का पर्याय बना कर दिखाया. कभी-कभी सोचता हूँ, तपस्वी  जंगलों में ही नहीं, घरों में भी रहते हैं.

अपनी पहली पत्नी से बाउजी को कोई संतान नहीं मिल पाई थी. अगर होती, तो वो हमारे लिए सौतेला भाई या बहन होती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पहले प्रसव के दौरान ही प्रेमलता जी और उनके नवजात दोनों का देहांत हो गया था.

दुनिया की दूसरी जंगी लड़ाई शुरू होने से पहले बाउजी दिल्ली के जिस मोहल्ले में रहते थे, उसका नाम था फ़राशख़ाना. फ़राशख़ाने की एक गली में पांच मंज़िला इमारत थी, जिसकी चौथी मंज़िल पर पंडित दयानंद जोशी का घर था. बाउजी इन्हीं के यहां किरायेदार थे. जोशी जी रेलवे में काम करते थे. बाउजी की पहली पत्नी प्रेमलता जी के देहांत को कई बरस हो चुके थे और लोग उनसे दूसरा विवाह करने का इसरार कर रहे थे. पंडित दयानंद जोशी और उनकी पत्नी बाउजी को पुत्रवत मानते थे और उनका भी विचार था कि बाउजी को विवाह करके गृहस्थी बसा लेनी चाहिए. इसी बीच मथुरा की होली वाली गली के निवासी चंद्रभानजी के घर से रिश्ता आया. रिश्ता आया कहना शायद ठीक नहीं, असल में, लड़की पसंद करने के लिए एक तस्वीर भेजी गई थी.
                                       




                             

तस्वीर पसंद आई, तो रिश्ते की बात आगे बढ़ी और लड़की वालों ने अपने परिवार के सबसे समझदार आदमी रेवतीभानजी को लड़का देखने के लिए फ़राशख़ाने भेजा. रेवतीभानजी ने बाउजी को देखा, जांचा-परखा और पंडित दयानंद जोशी से बात पक्की कर ली. जाते समय अपने घरवालों को दिखाने के लिए वे बाउजी की तस्वीर साथ लेते गए.

                                                

इसके कुछ ही दिनों बाद बाउजी (पंडित हरिबल्लभ शर्मा) और भाभी (श्रीमती शांता देवी) पति-पत्नी बन गए. दूल्हे के माता-पिता का दायित्व श्री और श्रीमती दयानंद जोशी ने निभाया. दुल्हन विदा होकर उन्हीं के घर में आई और उन्हीं के घर में बाउजी की नई गृहस्थी का आरंभ हुआ.

घर चौथी मंज़िल पर था और आंगन की जगह बहुत बड़ा आयताकार जाल बिछा था. जाल से नीचे झाँकने पर तीन और जाल दिखाई देते थे. पुरानी दिल्ली के अधिकांश मकानों की बनावट ऐसी ही है. हर मंज़िल पर लोहे का जाल और जाल के चारों तरफ़ कमरों की कतारें. इस मकान में भी जाल के तीन तरफ़ कमरों की कतारें थीं और चौथी तरफ़ नीचे उतरती हुई सीढ़ियां. सीढ़ियों के सामने वाले कमरों में बाउजी की गृहस्थी थी और बाकी दो हिस्सों में, आमने-सामने बरामदे और बरामदे के पीछे वाले कमरे पंडित दयानंद जोशी के पास थे.

हमारी मां, शांता देवी और बाउजी की आयु में बारह वर्ष का अंतर था. मां का बचपन मथुरा की होली वाली गली में बीता था. इसी गली में पंडित चंद्रभानजी रहते थे जिनकी दो संतानें थीं. एक हमारी मां शांता देवी और दूसरे मामा गोपालजी. हमारे नाना चंद्रभान जी के दो भाई थे – बड़े भाई सूरजभान जी और छोटे भाई प्रतापभानजी. प्रतापभान जी की अपनी कोई संतान नहीं थी. सूरजभान जी के तीन बेटे थे, उदयभान, रेवतीभान और मोतीभान और एक बेटी भी थी राधिका. लेकिन राधिका देवी का 1950 में देहांत हो गया और चचेरी ही सही, भाभी के रूप में भाइयो के बीच एक ही बहन बची. रेवतीभान मामाजी इस कुटुंब में सबसे अधिक पढ़े-लिखे और संपन्न थे, शायद इसीलिए रिश्ता पक्का करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं को सौपी गई थी. चूंकि रिश्ता तय करने में भूमिका निभाई थी, इसीलिए रेवतीभान जी अपनी बहन के सुख-दुःख की खबर भी लेते रहते थे.

दिल्ली के फ़राशखाने में अपनी नई गृहस्थी आरम्भ किए जाते समय, बाउजी दरियागंज में जवाहरात की एक दूकान में काम करते थे. इसके मालिक थे एक मिर्ज़ासाहब. मिर्ज़ासाहब क़रीब-क़रीब एक तिहाई दरियागंज के मालिक थे. उन के पास इस इलाक़े में कई दूकानें और मकान थे, जिनके किराएदारों से हर महीने किराया-वसूली का काम भी बाउजी के ज़िम्मे था. मिर्ज़ासाहब के कुछ रिश्तेदार इस बात से नाख़ुश भी थे कि ख़ुद मुसलमान होकर मिर्ज़ासाहब एक हिंदू पर इतना ऐतबार करते हैं. यहां तक कि ज़ेवरात की दूकान भी उसके सुपूर्द की हुई है और हज़ारों रुपए का किराया वसूल करने का काम भी उसी को सौंपा हुआ है. सुनकर मिर्ज़ासाहब हंसते और कहते, “मुसलमान का मतलब क्या है? जिसका ईमान मुसल्सल हो, वोही ना? इस ऐतबार से जिसको तुम हिंदू कहते हो, उससे बेहतर मुसलमान मुझे दिखा दो, तो मैं उसे रख लूंगा.” मिर्ज़ासाहब बाउजी को बेटे की तरह प्यार करते थे. बाउजी भी बचपन से पितृहीन रहे थे, शायद इसलिए हर बुज़ुर्ग में अपने पिता की छवि देखते और बेटे जैसा प्यार पाने में कामयाब हो जाते. इधर मिर्ज़ासाहब और उधर पंडित दयानंदजी जोशी, दोनों बाउजी को पुत्रवत मानते थे.

सन् 1943 में दूसरा विश्व युद्ध जवानी पर था और धरती के एक बड़े भू-भाग पर हिटलर की फ़ौजें तोप-गोले बरसा रही थी. उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का शासन था. अगर ब्रिटिश फ़ौजें हार जाती, तो फिर भारत, ब्रिटेन की जगह जर्मनी का ग़ुलाम हो जाता. युद्ध का अंत क्या होगा और इतिहास कौन सी करवट लेगा, यह कोई नहीं जानता था, फिर भी राजधानी होने के कारण दिल्ली में एक अजीब भय का वातावरण छाया हुआ था. लोग अक्सर बातें करते कि हिटलर एक न एक दिन दिल्ली पर ज़रूर बम बरसाएगा. बाउजी की नई गृहस्थी अभी आरंभ हुई ही थी. सन् 40 में मुन्नी का और 42 में मेरा जन्म हो चुका था. बाउजी के मन में विचार आया कि अगर अंत होना ही है, तो जीवन के आख़िरी दिन अपने घर-गांव और अपने लोगों के बीच बिताने चाहिए. इसी सोच के कारण एक दिन उन्होंने दिल्ली छोड़कर भीलवाड़ा जाना तय कर लिया. शायद तब मेरी आयु लगभग एक वर्ष की रही होगी, जब हम भीलवाड़ा के भोपालगंज में आकर बसे और यहीं मेरी चेतना ने जागना और संसार को देखना शुरू किया.

हमारे भीलवाड़ा आने के लगभग दो बरस बाद ही हिटलर की हार हो गई और विश्वयुद्ध समाप्त हो गया. युद्ध में जीत या हार किसी की भी हो, तबाही दोनों ही पक्षों को झेलनी पड़ती है. मित्रराष्ट्रों की जीत बेशक हुई थी, लेकिन युद्ध के ज़ख्मों ने उन्हें भी बुरी तरह घायल कर दिया था. जीत का सेहरा भले ही चर्चिल के सिर पर भी बांधा गया, लेकिन युद्ध से थका-हारा ब्रिटेन भीतर से खोखला हो चुका था. युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों ने गांधी जी के साथ एक मौखिक समझौता किया था कि यदि ब्रिटिश सरकार की जीत हुई, तो भारत को आज़ादी दे दी जाएगी, लेकिन इसे पाने के लिए गांधी जी को हिन्दुस्तान के नौजवानों से ये कहना पड़ेगा कि वे अधिक से अधिक संख्या में ब्रिटिश फ़ौजों में भर्ती हों और हिटलर के ख़िलाफ़ लड़ें. 1945 में जब विश्वयुद्ध समाप्त हो गया, तब गांधी जी ने अंग्रेज़ों को उनका वादा याद कराया और इस तरह भारत को आज़ादी देने की प्रक्रिया शुरू हुई. सच पूछिए तो युद्ध के कारण अंग्रेज़ ख़ुद इतना कमजोर हो चुका था कि भारत के बोझ को उठाने की उसमें ताब नहीं थी. कुछ इतिहासकारों का तो यह भी कहना है कि भारत ने आज़ादी ली नहीं, अंग्रेज़ भारत से अपनी जान छुड़ा कर भाग गया.

जो भी हो सन् 47 में भारत आज़ाद हुआ और साथ ही बंटवारे के दंगों का खूनी नाच भी शुरू हुआ. भीलवाड़ा में बाउजी की ‘एच बल्लभ एंड कंपनी’ ने नाम और दाम कमाने शुरू किए ही थे कि शर्णार्थियों की आमद से कंपीटीशन बढ़ा और व्यापार की लगाम बाउजी के हाथ से फिसलने लगी. इसके बाद परिवार भी बढ़ा और बाउजी का संघर्ष भी. पिछले ग्यारह-बारह बरस में साबुन, दूध, अभ्रक, खेती का सामान, यूरिया-खाद, साइकिलें, सीमेंट की चद्दरें और ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड - व्यापार के जाने कितने मोर्चों पर हारने के बाद बाउजी ने एक बरस खेती करते हुए झोपड़ी में भी बिताया. जहां से एक दिन वे थके-हारे-टूटे, बीमार बदन के साथ वापस लौटे. उन दिनों बाउजी बिस्तर पर पड़े जाने क्या सोचा करते. शुक्लाजी के इस मकान में केवल दो ही कमरे थे और बाउजी को आराम मिल सके, ऐसी सुविधा भी नहीं थी. घासीरामजी ताऊजी ने दो-तीन मकान छोड़कर एक दूसरे मकान का इंतज़ाम किया, जिसमें कमरे भी तीन थे और किराया भी कम था. हमलोग अब इस नए मकान में चले गए. बगल के कमरे में एक दक्षिण भारतीय रेड्डी साहब रहते थे. उसके आगे एक नौजवान बीडीओ साहब अपनी नई नवेली दुल्हन के साथ बसे हुए थे. यह मकान प्रताप टॉकिज के इतना नज़दीक था कि रात को जब हम छत पर सोते, तो कभी-कभार सिनेमा घर से छनकर आते फ़िल्म के संवाद और गाने भी सुनाई दे जाते.

बाउजी थोड़ा चलने-फिरने तो लगे थे, लेकिन बहुत बुझे-बुझे रहते. उनके तन-मन की हालत देखकर भाभी की आंखें बार-बार छलक आतीं. सीधे-सच्चे और ईमानदार होने की ऐसी सज़ा क्यों मिली बाउजी को. क्या ऊपर वाले के दरबार में सचमुच कोई न्याय नहीं है? बुआजी भी उदयपुर में थीं. भाभी अपना दु:ख किसके साथ बांटती. एक दिन कुछ सोचकर, सबके सो जाने के बाद चुपके से, रात को लालटेन की रोशनी में, भाभी ने दिल्ली निवासी अपने चचेरे भाई रेवतीभानजी शर्मा को एक खूब लंबी चिट्ठी लिखी. जिसमें अपना सारा दु:ख-दर्द बयान कर दिया. चिट्ठी का जवाब तार से आया. तार में रेवतीभान मामाजी ने लिखा था कि बाउजी वापस दिल्ली आ जाएं. तार पढ़कर बाउजी काफ़ी सोच में पड़ गए. एक दो दिन ही और बीते होंगे कि रेवतीभान मामाजी का भेजा हुआ एक मनीआर्डर मिला, जिसके साथ यह संदेश भी लिखा था, ‘यह दिल्ली आने का रेल किराया है. अब बिना बिलंब किए बाउजी को दिल्ली आ जाना चाहिए.’ काफी सोच विचार के बाद बाउजी ने भी यही उचित समझा कि रेवतीभानजी के सुझाव को स्वीकार कर लिया जाए.

ग्यारह-बारह बरस पहले, जाने क्या-क्या सोचकर बाउजी दिल्ली से भीलवाड़ा आए थे और अब हालात ऐसे बने कि वापस दिल्ली जाने को लाचार थे.

बाउजी दिल्ली चले गए. बुआजी उदयपुर में थीं और अशोक भी उन्हीं के पास था. मुन्नी भाभी के साथ फुन्नू को गोद में लिए स्कूल चली जाती और पीछे से मैं हर प्रकार की बदतमीज़ी करने के लिए आज़ाद हो जाता. घर में पुराने वक्तों की एक साइकिल पड़ी थी, जिसे गिरते-पड़ते मैंने थोड़ा-बहुत चलाना सीख लिया था. साइकिल चलाने में मुझे बहुत मज़ा आता था. कानों के पास से फर्र-फर्र करके हवा पीछे दौडती, तो जादू सा लगता. किसी न किसी बहाने साइकिल लेकर मैं आवारागर्दी करने निकल पड़ता. चेतू को घर में अकेला बंद करके बाहर चले जाने की बात पर, स्कूल से आने के बाद भाभी खूब चिल्लाती, दुखी होती और मेरे ढीठपने से हारकर रोने बैठ जाती, लेकिन मेरे स्वभाव पर इसका कोई असर नहीं पड़ता था. आज सोचता हूं तो लगता है, जितनी नाफ़रमानी और बदतमीज़ी मां के साथ मैंने की, घर में शायद ही किसी और ने की हो.

घर के सामने पहली मंज़िल पर एक संपन्न परिवार रहता था. घर की बड़ी-बड़ी खिड़कियों के पीछे मैंने गोटे-किनारी के चमचमाते कपड़ों में ख़ूब सजी-संवरी औरतें देखी थीं. रात को इसी घर से खूब ज़ोर से  रेडियो बजने की आवाज़ आती. कभी गाने सुनाई देते और कभी-कभी ऐसा लगता जैसे किसी फ़िल्म के साउंड ट्रैक जैसी ड्रामाई आवाज़ें आ रही हैं. यह तो मैंने कई बरस बाद जाना कि भीलवाडा के उस घर जो आवाज़े मैंने सुनी, वो फिल्म की नहीं रेडियो-नाटक की होती थीं, जो आकाशवाणी जयपुर से प्रसारित होते थे. लेकिन तब मुझे कहाँ पता था कि रेडियो-नाटक किस बला का नाम है.

जाने कहां मैंने विलायती ओपेरा के गाने सुन लिए थे और सोचता था की ऐसा रोना-पीटना तो मैं भी मचा सकता हूँ. एक दिन भाभी, मुन्नी, चेतू और फुन्नू के सामने ओपेरा जैसा ‘आआआआआ...’ करके मैंने अपने अंग्रेज़ी गायन का रौब जमाने की कोशिश की. ऊंचे सुर में चिंचिंयाती मेरी आवाज़ मोहल्ले में दूर तक सुनाई दी और तभी सामने के घर से दौड़ती हुई, दो औरतें हमारे घर में घुस आईं. उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. पूछा, “हाय राम क्या हो गया?” तब तक मैं तो चुप हो चुका था, लेकिन भाभी उनके आने का कारण समझकर हंसी के मारे लुढ़की जा रही थीं. औरतें भी छाती पर हाथ रखकर धम से बैठ गईं और पूछा, “कौन? ये मुन्ना आवाजें निकाल रहा था?” फिर मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, “क्यों रे ऐसी आवाज़ें निकालता है? हमारा तो कलेजा मुंह को आ गया. लगा, पता नहीं क्या अनहोनी हो गई.”
मैं मुस्कुराते हुए झेपने का नाटक कर रहा था. गोटे-किनारी वाली उन औरतों को अपने नज़दीक देख कर दिल में गुदगुदी भी हो रही थी. उधर भाभी की हंसी नहीं रुक रही थी. मुन्नी और चेतू भी खी-खी कर हंसे जा रहे थे. फिर वो औरतें भी हंसने लगीं.

अशोक बुआजी के पास उदयपुर में था, लेकिन उसका भी अकेले वहां मन नहीं लगता था. एक बार मैंने उदयपुर जाने की ज़िद की. लड़-झगड़ कर भाभी से टिकट के पैसे लिए और जाकर ट्रेन में बैठ गया. बुआजी और अशोक दोनों मुझे आया देखकर चौंक गए. बुआजी ने सबसे पहले ये पूछा, “अकेला आया है?” अब तक मैं चालाकियां सीख चुका था, इसलिए कहा, “हां, आपकी याद आ रही थी, सो मिलने आ गया”. भोली बुआजी ख़ुश हो गई और लाड़ से घर के भीतर ले गई. अगले दिन बुआजी तो अपनी ट्रेनिंग के लिए मेडिकल सेंटर चली गईं और अशोक ने मुझे उदयपुर दिखाने की योजना बनाई.

दिन भर इधर-उधर घूमते हुए हमने महाराणाजी का महल, सहेलियों की बाड़ी, पिछोला झील और झील के बीच में बने हुए जगमंदिर, जगनिवास और जाने क्या-क्या देख डाला. अशोक मेरे आने से बहुत उत्साहित था, लेकिन दो-चार दिन बाद ही मुझे वापस लौटना था. जाते-जाते मैं अशोक को बता गया कि इस बार गर्मी की छुट्टियों में हम सब दिल्ली जाने वाले हैं.

मेरे भीलवाड़ा वापस लौटने के कुछ ही दिनों बाद गर्मी की छुट्टियों के कारण स्कूल बंद हो गए और भाभी को भी दो महीने की फ़ुर्सत हो गई. अब जैसा कि सोचा हुआ था, हमने दिल्ली के लिए बिस्तर-पेटी बांधने शुरू किए. ये तैयारी चल ही रही थी कि एक दिन आधी रात को अशोक उदयपुर से भाग कर चला आया. हम सब दिल्ली चले जाएं और वो अकेला उदयपुर में सज़ा काटे, ये कैसे हो सकता था. पहले तो भाभी ने उसे ख़ूब भला-बुरा कहा, फिर जैसा कि वो करती थीं, चुप होकर बैठ गईं. 1956 के जून का तीसरा हफ्ता शुरू हुआ और हम दिल्ली जाने के लिए ट्रेन में सवार हो गए. उन दिनों ट्रेनों में ऐसा भीड़-भड़क्का नहीं होता था. आराम से हम अजमेर पहुंचे. गाड़ी अजमेर तक ही जाती थी. अब हमें इसे छोड़कर दूसरी ट्रेन में सवार होना था. उतरकर हम दिल्ली जाने वाली गाड़ी के प्लेटफॉर्म पर पहुंचे और उसमें सवार हुए. भीड़-भाड़ इस गाड़ी में भी नहीं थी. ट्रेन का इतना लंबा सफ़र जीवन में मैं पहली बार कर रहा था. दिल्ली के बारे में कितनी सारी बातें सुन रखी थी. सारी बातें एक-एक करके याद आ रही थी. भीतर जिज्ञासा के बादल घुमड़ रहे थे. सुना था, दिल्ली में रहने वालों का रंग गोरा हो जाता है. रोमांच के कारण रात को देर तक नींद नहीं आई. मैं खिड़की से बाहर झांकता हुआ, अंधेरी रात में चांद को ट्रेन के साथ-साथ दौड़ते हुए देखता रहा. 16 जून 1956 की सुबह लगभग आठ बजे हमारी गाड़ी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के छोटी लाइन वाले प्लेटफॉर्म पर पहुंची. भाभी के बड़े चचेरे भाई उदयभानजी के बेटे किशन हमें लेने स्टेशन आए थे. उन्हीं के साथ हम सामान उठाकर बाहर आए और तांगे में बैठकर चांदनी चौक पहुंचे.

चांदनी चौक पुरानी दिल्ली का ऐतिहासिक बाज़ार है. जितना ऐतिहासिक है उतना ही मशहूर भी. चांदनी चौक के ठीक मध्य में कभी एक घंटाघर होता था, लेकिन कुछ बरस पहले ढह गया था. फिर भी इस चौराहे का नाम घंटाघर बना हुआ था. घंटाघर चौराहे पर सामने टाउन हॉल नाम की भव्य इमारत थी - अंग्रेज़ों के ज़माने की. अब टाउन हॉल में दिल्ली कॉर्पोरेशन का दफ़्तर था. चौराहे से बायीं तरफ़ मुड़ने पर सड़क सीधे लालकिले तक जाती है और दायीं तरफ़ मुड़ कर फ़तहपुरी मस्जिद तक पहुंचती है. सामने की तरफ़ एक पतली सड़क थी, जिसका नाम था ‘नईसड़क’. ये किताबों, ख़ास तौर पर स्कूल-कॉलेज के कोर्स की किताबों का सबसे बड़ा बाज़ार है. बायीं तरफ़ मुड़ते ही एक ग़ली सी थी - कटरा नील. इसके आगे तीन-चार इमारत पार करते ही हिमाचल रेस्टोरेंट का बोर्ड नज़र आ गया. रेवतीभान मामाजी इसी रेस्टोरेंट के मालिक थे. सीढ़ियां चढ़ते ही सामने रेस्टोरेंट का कांच वाला दरवाज़ा दिखाई दिया. रेस्टोरेंट के बाहर से ही रेलिंगदार सीढ़ियां करवट सी ले कर, ऊपर मामाजी के घर तक चली गयी थीं. रेस्टोरेंट पहली और घर तीसरी मंज़िल पर था.

मामाजी ने बाउजी को भीलवाड़ा से बुलवाकर हिमाचल रेस्टोरेंट में मैनेजर के रूप में नियुक्त कर दिया था. सुबह-सुबह बाउजी खारीबावली  जाते और रेस्टोरेंट के लिए ढेर सारी तरकारियाँ ख़रीदकर लाते. वैसे तो खारीबावली राशन और मसालों के थोक व्यापार का बाज़ार था, लेकिन सुबह-सुबह सड़क के दोनों तरफ़ सब्ज़ीवालों का पटरी-बाज़ार लगता था. सब्ज़ियां एक झल्लीवाले की मदद से रेस्टोरेंट तक पहुंचाई जातीं. दिल्ली की भाषा में झल्ली का मतलब है, बड़ी सी टोकरी. बाउजी का एक स्थाई झल्लीवाला था. बाउजी जहां-जहां से सब्ज़ियां ख़रीदते, झल्लीवाला उनके पीछे-पीछे अपनी टोकरी लेकर चलता और सब्ज़ियाँ उसमें भरता जाता. सब्ज़ियां रेस्टोरेंट तक पहुंचाने के कुछ देर बाद, नहा-धो कर बाउजी काउंटर पर बैठ जाते और रेस्टोरेंट में सुबह के चाय-नाश्ते के लिए ग्राहकों की आमद शुरू हो जाती.

मामाजी का घर बहुत बड़ा नहीं था. बस एक आयताकार बड़ा सा कमरा, एक छोटा कमरा और दोनों को जोड़ती हुई एक छत. छोटे कमरे के सामने रसोई, स्नानघर और संडास था. जीवन में पहलीबार फ्लश वाला संडास मैंने यहीं देखा. छत के एक किनारे पर लोहे की रेलिंग थी, जिससे झांकने पर नीचे चांदनी चौक का बाज़ार दिखाई देता था. सड़क के दोनों तरफ़ पेड़ों की कतारें थी ओर इन्हीं कतारों की बगल में बिछी पटरी पर ट्रामें चलती थी. लोगों को सामने से हटाने के लिए टनटन करती, आगे बढ़ती ट्राम मुझे बहुत आकर्षक लगती. मैं देर तक ट्रामों को आते-जाते देखा करता. मामाजी के बड़े कमरे में दो पलंग थे, जिनकी बगल में ठिगने क़द की अलमारी जैसा एक रेडियोग्राम रखा था. इसे देख कर मुझे भीलवाड़ा  वाला ग्रामोफोन याद आता. कमरे में दूसरी ओर एक पूजा का कोना था. इसी कोने में किसी दाढ़ी वाले साधु की विशाल तस्वीर लगी हुई थी. मामाजी रोज़ इस तस्वीर के आगे बैठकर ध्यान लगाते थे. मुझे ये तस्वीर कुछ-कुछ रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसी लगती थी, लेकिन बाद में बताया गया कि ये महर्षि अरविंद हैं. मामाजी श्रीअरविंद को बहुत मानते थे. यहां तक कि उन्होंने अपनी लड़कियों की तालीम भी पांडीचेरी के श्रीअरविंद आश्रम में करवाई थी. उनकी दो बेटियां विनोद और अंजना तो इस समय भी आश्रम में ही रह रही थीं. दिल्ली में मामाजी के जिन बच्चों से मेरा सामना हुआ, उनमें सबसे बड़ी थी सरोज बहन, फिर मंजू बहन, इसके बाद उनका भाई अरुण और सबसे छोटी अर्चना, जिसे सब बेबी कहते थे. सरोज बहन और मंजू बहन भी कुछ समय श्रीअरविंद आश्रम में बिता चुकी थीं. मामीजी (श्रीमती कृष्णा देवी) भारी बदन की, बेहद शांत और ख़ूब प्यार करने वाली महिला थीं. घर में नानीजी भी थीं, जो एक तरह से घर की मालकिन थीं और सब पर हुकुम चलाया करतीं. रसोईघर वे ही संभालती थीं और इसमें कोई शक नहीं, खाना बहुत अच्छा बनाती थीं. नानीजी रेवतीभान मामाजी की सगी मां नहीं थीं. असल में वो उनकी चाची थीं. चाचा प्रतापभानजी के देहांत के बाद नि:संतान चाची को मामाजी ने अपने पास बुलवा लिया था और उन्हें पूरी तरह से मां का दर्जा दिया हुआ था. नानीजी रोज़ सुबह चार बजे उठकर पैदल-पैदल जमुनाजी नहाने जातीं और लौटने पर सीधे रसोई संभालने में जुट जातीं.

मामाजी को जानवर पालने का भी ख़ूब शौक था. सुना है कि पहले एक तोता रखा था. एक बंदर भी पाला था और जिन दिनों हम चांदनी चौक के इस घर में पहुंचे, एक एप्सो नस्ल का कुत्ता पाला हुआ था. उसका नाम सोनी था. सोनी से सब लोग प्यार करते थे और वो था भी खिलौने जैसा. पहले दिन तो वो हमें देख कर खूब भौंका, लेकिन अगले दिन से पुचकारने पर पूंछ हिलाने लगा. अरुण और बेबी रोज़ शाम सोनी को घुमाने के लिए कंपनीबाग जाते थे. अब मैंने भी उनके साथ जाना शुरू कर दिया. सोनी को घुमाने से ज्यादा मज़ा मुझे आता था, कंपनीबाग के उन झूलों में, जिनपर झोंटे लेना मैं कभी नहीं भूलता.

हरा-भरा कंपनीबाग़, कारपोरेशन की इमारत के पीछे दूर तक फैला हुआ था. जहां इसका फैलाव ख़तम होता था, वहां एक चौड़ी सड़क थी और सड़क के उस पार था, पुरानी दिल्ली का रेल्वेस्टेशन. स्टेशन की भव्य इमारत दूर से ही दिखाई दे जाती थी. सड़क के कम्पनीबाग़ वाले किनारे पर ही थी, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी. शाम को अक्सर मैं अरुण के साथ लाइब्रेरी जाया करता. किताबों से अटी ढेरों आलमारियों के गलियारे मुझे खासे रहस्यमय जान पड़ते. तब यह पता नहीं था कि आने बरसों में ये गलियारे मेरे पठन-पाठन की दिशा निर्धारित करने वाले थे. हिंदी कथा साहित्य की अंगुली मैंने यहीं थामी. अन्य देसी और विदेशी भाषाओं के अनूदित कथा साहित्य से भी मेरा परिचय यहीं हुआ. उन दिनों की एक और घटना मुझे याद है, जिसने कई दिनों तक मुझे मुदित रखा. लाइब्रेरी में बाल-साहित्य का एक नया कक्ष खुला था. मैं और अरुण इसी कक्ष की नयी मेज़-कुर्सी पर आसीन होकर, किताबों को उलट-पुलट रहे थे कि तभी दरवाज़े के बाहर कुछ हलचल हुई. हमने देखा, खादी के कुरते-पाजामे में सजे एक चश्माधारी महाशय ने कक्ष में प्रवेश किया. साथ में और भी कई लोग थे. आगे-पीछे कैमरेवालों का दल भी था. महाशय ने कक्ष को मुआइने के अंदाज़ में देखा, फिर हमारी मेज़ के पास आकर खड़े हो गए. कैमरेवालों की कई फ्लेश-लाइटें चमक उठीं. फोटो खींचे जा रहे हैं, यह जान कर मैंने अपना हाथ ठोड़ी पर रख कर पोज़ बना लिया. पास खड़े अरुण ने भी मुस्करा कर कैमरे की तरफ देखा, लेकिन फ्लेश की चौंध में उसकी आँखें बंद हो गई.
         
ये सज्जन कौन थे, क्या करने आये थे और फोटो क्यो खींचे गए थे, ये सारी बातें हमें अगले दिन ‘नवभारत टाइम्स’ के मुखपृष्ठ ने बताई, जहां हमारा फोटो छपा था. तस्वीर के साथ समाचार भी था कि भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री श्री बी वी केसकर ने, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के नए बाल-कक्ष का उदघाटन किया. तब मंत्रीजी के साथ फोटो खींचे जाने से ज्यादा ख़ुशी इस बात की हुई थी कि मेरा फोटो अखबार में छपा. ख़ुशी का कारण मेरी यह जानकारी थी कि अखबार में तो फोटो केवल बड़े लोगों के ही छपते हैं.

इस घटना के बाद मुझे यकीन होता हुआ सा लगा कि अब मेरे ‘बड़ा आदमी’ होने में ज्यादा देर नहीं है. 

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