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Saturday, October 8, 2011

रेडियो की स्मृति

रेडियो की स्मृति
ब्रजेश कानूनगो
गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह


कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आँखें


बृजेश कानूनगो
25 सितम्बर 1957 देवास, मध्य प्रदेश मे जन्म । रसायन विज्ञान तथा हिन्दी साहित्य मे स्नातकोत्तर।
देश की प्रतिष्ठित पत्र –पत्रिकाओँ मेँ वर्ष 1976 से बाल कथाएँ ,बालगीत, वैचारिक पत्र, व्यंग्य लेख ,कविताएँ, कहानियाँ ,लघुकथाएँ प्रकाशित।
वर्ष 1995 मे व्यंग्यसंग्रह-पुन: पधारेँ, 1999 मे कविता पुस्तिका-धूल और धुएँ के परदे मेँ, 2003 मे बाल कथाओँ की पुस्तक- फूल शुभकामनाओँ के तथा 2007 मेँ बाल गीतोँ की पुस्तिका- चाँद की सेहत प्रकाशित।
स्टेट बैक आफ इन्दौर मे 33 वर्ष सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति। बैककर्मियोँ की साहित्यिक संस्था-प्राची के माध्यम से अनेक साहित्यिक गतिविधियोँ का संचालन। तंगबस्तियोँ के गरीब बच्चोँ के लिए चलाए जाने वाले व्यक्तित्व विकास शिविरोँ मे सक्रिय सहयोग।

503, गोयल रिजेंसी,
कनाड़िया रोड़, इन्दौर-18,
मो. नं. 09893944294

न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौधरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का सन्देश
आजाद हिन्द फौज का कोई सिपाही

स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में कैद है
देवकीनन्दन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर
मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह

स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं
फसलों के बचाव के तरीके
माइक्रोफोन को सुनाकर चला आता है कविता
अपने समय का महत्वपूर्ण कवि
सारंगी रोती रहती है अकेली
कोई नही पोंछ्ता उसके आँसू

याद आता है रेडियो
सुनसान देवालय की तरह
मुख्य मन्दिर मे प्रवेश पाना
जब सम्भव नही होता आसानी से
और तब आता है याद
जब मारा गया हो बडा आदमी

वित्त मंत्री देश का भविष्य
निश्चित करने वाले हों संसद के सामनें
परिणाम निकलने वाला हो दान किए अधिकारों की संख्या का
धुएँ के बवंडर के बीच बिछ गईं हों लाशें
फैंकी जाने वाली हो क्रिकेट के घमासान में फैसलेवाली अंतिम गेन्द
और निकल जाए प्राण टेलीविजन के
सूख जाए तारों में दौडता हुआ रक्त
तब आता है याद
कबाड में पडा बैटरी से चलनेवाला
पुराना रेडियो

याद आती है जैसे वर्षों पुरानी स्मृति
जब युवा पिता
इमरती से भरा दौना लिए
दफ्तर से घर लौटते थे।

Sunday, June 26, 2011

..आखिरकार सपना बन गया हकीकत!

मित्रों, इन दिनों रेडियोनामा पर हम शुभ्रा शर्मा जी के संस्मरण प्रकाशित कर रहे हैं। इस श्रंखला की अब तक जितनी भी कड़ियाँ प्रकाशित हुई है उन्हें आप सुधी पाठकों ने बहुत सराहा और प्रोत्साहन दिया। इस कड़ी में हम आज आपके लिए एक और मशहूर समाचार वाचिका क्लेयर नाग के संस्मरण प्रकाशित कर रहे हैं। यह आलेख हमें जागरण-याहू .कॉम से मिला है। हम चाहते हैं कि रेडियो से जुड़ी सारी जानकारियाँ और समाचार वाचकों के संस्मरण हम यहाँ एकत्रित कर सकें।

..आखिरकार सपना बन गया हकीकत!
नई दिल्ली। रांची के दूर-दराज के एक आदिवासी कस्बे की रहने वाली और वहीं पली-बढ़ी क्लेयर नाग के लिए देश की राजधानी को अपना बसेरा बनाना और आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग में समाचार वाचिका बन करोड़ों लोगों को दुनियाभर में पल-पल घटित हो रही घटनाओं की जानकारी देने का माध्यम बनना, किसी सपने के सच हो जाने जैसा था।

आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग में 27 बरस सेवाएं देने के बाद पिछले साल मार्च में सेवानिवृत्त हुईं क्लेयर बचपन से ही लीक से हटकर कुछ करना चाहती थीं। पिता की प्रेरणा से अखबार पढ़ना शुरू किया और धीरे-धीरे देश-दुनियाभर की खबरों में रुचि जग उठी। राजनीति शास्त्र में एम.ए. क्लेयर शादी के बाद 1980 में दिल्ली आई। उस समय तक उन्होंने आकाशवाणी भवन में कदम तक नहीं रखा था। एक दिन समाचार पत्र में छपे आकाशवाणी के विज्ञापन को देख उनके मन में आस जगी और तुरत-फुरत आवेदन कर डाला। लिखित परीक्षा, स्वर परीक्षा और साक्षात्कार की सीढि़यां एक-एक कर के पार होती चली गई और एक दिन क्लेयर ने खुद को आकाशवाणी के समाचार कक्ष में पाया।

क्लेयर बताती है कि उन दिनों आकाशवाणी में देवकीनंदन पांडे, विनोद कश्यप, रामानुज प्रसाद सिंह, जयनारायण शर्मा, मनोजकुमार मिश्र, अशोक वाजपेयी, राजेंद्र अग्रवाल जैसे मंजे हुए समाचार वाचक थे। मुझे विद्वानों के बीच काम करने और उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। शुरू-शुरू में मुझे कुछ संकोच हुआ लेकिन मेरे आत्मविश्वास ने मुझे टिकाए रखा।

वे बताती है कि उन दिनों माइक पर आने का मौका सहजता से नहीं मिलता था। उनका चयन समाचार वाचक एवं अनुवादक पद पर हुआ था। बीते दिनों को याद करते हुए क्लेयर कहती हैं कि उन दिनों अनुवाद खूब कराते थे और पूरी तरह मंजने के बाद ही माइक पर आने का मौका मिल पाता था। क्लेयर के लिए यह काम एकदम नया था और उस पर देवकीनंदन पांडे, विनोद कश्यप, अशोक वाजपेयी जैसे दिग्गजों की उपस्थिति। शुरू-शुरू में उन्हे कुछ परेशानी हुई लेकिन वरिष्ठों के मार्गदर्शन की बदौलत धीरे-धीरे सब सहज होता चला गया।

क्लेयर ने आकाशवाणी पर खबरे पढ़ने की शुरूआत 'धीमी गति के समाचार' वाले बुलेटिन से की। करीब साल भर बाद उन्हे पहली बार पांच मिनट का बुलेटिन पढ़ने का मौका मिला। पहले दिन के समाचार वाचन के अनुभव के बारे में पूछने पर क्लेयर ने बताया कि समाचार बुलेटिन समाप्त होते ही उद्घोषक उनसे मिलने आए और उन्हे बहुत सराहा। उसके बाद क्लेयर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे लोग आवाज पहचानने लगे। रांची के लोग तो बहुत ही खुश हुए। उन्हे लगता है कि समाचार प्रभाग में अस्सी के दशक के माहौल में और अब में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। बुलेटिनों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है और उसी हिसाब से काम भी पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। टाइपराइटरों की जगह कंप्यूटर ने ले ली है। इससे संपादन अपेक्षाकृत आसान हो गया है। वे कहती हैं कि जब उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी तो उस समय लगता था कि हम पर बड़ों का साया है। उनसे जितना सीखेंगे अच्छा होगा, लेकिन कंप्यूटर युग में जीने वाले आजकल के बच्चों को लगता है कि जिन चीजों की उन्हे जानकारी है, बड़े उनके बारे में नहीं जानते। इसलिए बड़ों की बाते गंभीरता से सुनना, उनका सम्मान करना और उनसे सीखने की कोशिश करना जैसी बाते अब पुरानी पड़ गई है। आकाशवाणी श्रव्य माध्यम है। श्रोता एक-एक शब्द सुनकर आत्मसात करते है इसलिए सभी को अपना काम जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। उनका मानना है कि नए लोगों में समय की पाबंदी की भी कमी है, जबकि आकाशवाणी में एक-एक क्षण कीमती होता है।

क्लेयर आकाशवाणी में बिताए अपने दिनों को याद कर कहती है कि उन्होंने पूरी ईमानदारी और निष्ठा से काम किया और बदले में आकाशवाणी ने भी उन्हे बहुत कुछ दिया।

Friday, March 18, 2011

AIR की ऊर्दू सर्विस पर मजाक !

आज दिनांक 17.03.2010 को ऑल इण्डिया रेडियो की ऊर्दू सर्विस पर श्रोताओ को अच्छा बेवकूफ़ बनाया गया। फोन इन प्रोग्राम - आपकी पसन्द में श्रोताओं की पसन्द के गीत सुनाने की जगह कई गीतों के तो मात्र मुखड़े ही सुना दिये, कुछेक के एक पैरा सुनाए। पूरे गीत तो एक भी नहीं!

भला यह क्या बात हुई कि आप ज्यादा श्रोताओं के फोन सुनवाने के नाम पर ऐसा मजाक करें, भई थोड़ी कम कॉल्स भी रिसीव की जा सकती थी। गाना सुनते समय जैसे ही मूड बनने लगता है और नईम अख्तर साहब बीच गाने को रोक कर बीच में बोलने लगते कि अब अगली फरमाईश सुनवाते हैं। भई कम से कम एक पसन्द तो ढ़ंग से सुनवा देते।

Sunday, August 16, 2009

उदयपुर की ट्रेन चली गई क्या?

सभी रेडियो प्रेमियों ने इस नाटक को कई बार सुना होगा, परन्तु मैं इस नाटक को सुन नहीं पाया क्यों कि मैं रेडियो पर सिर्फ सुबह भूले बिसरे गीत और संगीत सरिता ही सुन पाता हूँ। कल यूनुसजी ने मेल भेजी कि एक मजेदार चीज मिली है इंटरनेट पर, फटाफट सुनिये। अब बड़ी मजेदार बात हुई, लिंक खुलता ही नहीं ! दोनों ने आधे घंटे तक दिमाग खपाया तब कहीं जाकर ये नाटक सुना जा सका।

हमने भी इसे फटाफट रेडियोनामा के पाठकों के लिये लगाने का निश्चय किया ताकि जो श्रोता इसे आई इसे सुनकर आनन्द ले सकें।

तो प्रस्तुत है रेडियो नाटक "उदयपुर की ट्रेन"

skit-udaipur ki train
duration-20 mts aprx.
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Wednesday, July 29, 2009

विविध भारती के श्रोताओं के लिये खुश खबरी

सबसे पहले सुप्रसिद्ध अभिनेत्री लीला नायडू के निधन पर हार्दिक श्रद्धान्जली..

कुछ दिनों पहले संगीत सरिता में एक कार्यक्रम आया था जिसमें एक राग की दूसरे राग की परछाई के बारे में बारे में बताया जाता था, इस कार्यक्रम के बाद हिन्दुस्तानी शैली और कर्नाटक शैली में समानताओं और रूद्र वीणा जैसे कई कार्यक्रम आये पर वैसा आनन्द नहीं मिल पाया जैसा छाया राग वाले कार्यक्रम में पाया था।

आज सुबह एक बार फिर वि.भा. ने खुश कर दिया क्यों कि आज से सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार स्व. मदनमोहन जी द्वारा संगीतबद्ध गीतों में शास्त्रीय संगीत पर चर्चा की गई, आज पहली ही कड़ी में मेरा पसंदीदा गीत दुखियारे नैना ढूंढे पिया को निशदिन करे पुकार सुनाया... जो कि राग गौड़ सारंग में ढला हुआ है। सच इस गीत को सुबह सुबह सुनकर आनन्द आ गया, कई घंटों तक खुमारी बनी रही।

आपने यह गीत सुना कि नहीं? अगर नहीं तो आईये हमने कुछ दिनों पहले ही महफिल पर इस गीत को सुनाया था..

दुखियारे नैना ढंढे पिया को: मदनमोहन जी द्वारा संगीतबद्ध सुन्दर गीत


आप मित्रों से अनुरोध है कि अगर किसी के पास इस कार्यक्रम को रिकॉर्ड करने की सुविधा हो तो इसे रिकॉर्ड करे ताकि हम इसे बाद में रेडियोनामा पर और मित्रों को भी सुना सके।

धन्यवाद

Monday, December 29, 2008

भूले बिसरे गीत या जाने पहचाने गीत?

रेडियोनामा में कई महीनों बाद लिख रहा हूँ।
पिछले कई महीनों से देख (आइ मीन सुन रहा हूँ) रहा हूँ भूले बिसरे गीत कार्यक्रम में जो गाने सुनवाये जा रहे हैं, वे भूले बिसरे ना होकर जाने जाने पहचाने होते हैं। अभी परसों ही अनाउंसर महोदय ने चुन चुन जाने पहचाने गीत सुनाये, मसलन राजहठ फिल्म का आये बहार बन कर लुभा कर चले गये.... अब यह गीत किस संगीत प्रेमी के लिये अन्जाना होगा।
अनाउंसर महोदय ने साथ में बताया भी कि ये सारे गाने अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे।
महोदय जो गाने अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे वे तो हम कहीं भी सुन लेंगे/लेते हैं। कम से कम भूले बिसरे गीतों के कार्यक्रम में तो वास्तव में भूले बिसरे या वे गीत सुनायें जो मधुर तो थे परन्तु ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुए
एक और भी शिकायत है जो मैं रेडियोनामा के जन्म के समय से करना चाह रहा हूँ पर मैं आलस का मारा आज तक कर नहीं पाया, इस कार्यक्रम के अन्त में बरसों से स्व. के एल सहगल के गीत ही सुनाये जाते हैं। यहाँ तक कि किसी अन्य कलाकार के विशेष अंक में भी, जैसे सुरैया स्पेशल के दिन भी अन्तिम गाना तो सहगल साहब का ही रहा, सुरैया का नहीं।
भई क्या भूले बिसरे गीत सिर्फ सहगल साहब के होते हैं? कम से कम इस कार्यक्रम को नियमित सुनने वाले के लिये तो सहगल साहब के गीत दुर्लभ या अन्जाने हो ही नहीं सकते। फिर क्यों जबरन इस प्रणाली को चालू रखा हुआ है, अन्य गायकों के दुर्लभ गीत भी सुनवाये जा सकते हैं, जैसे सुप्रसिद्ध निर्देशक राज खोसला के गाये हुए गीत!!!! हां जी राज खोसला ने गीत भी गाये हैं; और तो और राजकपूर ने भी!
स्व. मदन मोहन का गाया हुआ गीत माई री मैं कासे कहूं, नूरजहां, मास्टर मदन के गीत... आदि जैसे गीत क्यों सुनवाये नहीं जाते। सहगल साहब के गीत को ही अन्तिम स्थान पर क्यों? उन्हें अगले क्रम में भी रखा जा सकता है, और निचले/अन्तिम क्रम में कोई और गीत भी सुनाये जा सकते हैं।
आप क्या कहते हैं रेडियोप्रेमी दोस्तों?

Sunday, April 6, 2008

गीत पहचानो पहेली-२

गीत पहेली के पिछले अंक में यूनुस भाई और टैली हेल्पर वाले भाई साहब गीत पहचान नहीं पाये.. परन्तु ओर्कुट के राकेशजी और पीयूष भाई ने गीत पहचान लिया। वह उड़न खटोला फिल्म के शीर्षक गीत मेरा सलाम लेजा.. की अंतिम पंक्ति ही थी, पंक्ति के पूरे होते ही दिलीप कुमार का उड़न खटोला दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है, अगर पहेली में दिये गीत को ध्यान से सुना जाये तो साफ पता चल जाता है। इस वीडियो को देखिए और इस बहुत ही मधुर गीत का आनन्द लीजिये। ( पहेली में दी गई लाइने 3.17 मिनिट पर आयेगी)

लीजिये प्रस्तुत है पहेली का दूसरा अंक जिसमें हिन्दी पाँच सुप्रसिद्ध गीतों का मुखड़े की धुन ( सिर्फ संगीत) दी है उस धुन से गीत को पहचानना है।
पाँच में से दो तीन तो बहुत ही आसान है देखते हैं कौन कौन पहचान पाता है? :)

Friday, April 4, 2008

गीत पहचानो पहेली

लीजिये मित्रों आज बड़े दिनों के बाद एक पहेली.. यह एक सुप्रसिद्ध गीत का एक अंश है, इसे पहचानिये कि यह किस फिल्म का गीत है और कौनसा?
चलिये एक क्लू दे देते हैं, यह दिलीप कुमार की एक फिल्म का गीत है।

Wednesday, December 19, 2007

यह विविध भारती सेवा भी कमाल की चीज़ है.......

मैं कल सुबह रेडियो सुन रहा था। उस पर एक प्रोग्राम चल रहा था जिस में एक डाक्टर साहब नवजात शिशुओं की सेहत के बारे में बातें कर रहे थे। बीच बीच में उन की पसंद के फिल्मी गीत बज रहे थे। वे इतनी अच्छी तरह से सब कुछ समझा रहे थे कि उन की कही काम की बातें एक निरक्षर बंदे के भी दिल में उतर गई होंगी।

Read More.. मीडिया डाक्टर

Thursday, November 22, 2007

चित्र पहेली

लीजिये चित्र पहेली का एक और अंक हाजिर है, मैं यहाँ तीन चित्र दे रहा हूँ, उन्हें पहचानिये। मुझे नहीं लगता कि कोई हिन्ट देने की जरूरत होगी।












चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: चित्र-पहेली, रेडियोनामा, radio, radionama, radionamaa, photo-quiz,

Saturday, November 3, 2007

अमीन सयानी के साथ स्टार जयमाला.....

दोस्तो,
हमारी - आपकी सबकी पसंदीदा " विविध-भारती " अपनी स्वर्ण जयंती मना रही है । 50 वीं वर्षगांठ के अवसर पर विविध-भारती ने जो पिटारा हमारे सामने खोला है तो उससे एक से एक मोती रत्न आदि निकलते ही जारहे हैं..........पूरा आलेख यहाँ पढ़ें और इन्टरव्यू सुनें

Tuesday, October 9, 2007

सुनिये विविध भारती की स्वर्ण जयंति पर लताजी का ममता सिंह द्वारा लिया गया साक्षात्कार

A telephonic interview of Lata Mangeshaker by Radio Sakhi mamta Singh

विविध भारती की स्वर्ण जयंती पर हम सबने टीवी पर कई विशेष कार्यक्रम देखे हैं और कई किस्मत वालों ने रेडियो पर पूरा कार्यक्रम सुना भी है। यूनुस भाई ने रेडियो के जाने माने लोगों के फोटो भी रेडियोनामा पर हमें दिखाए हैं। इस सुअवसर पर रेडियो सखी ममतासिंह ने स्वर साम्राज्ञी, स्वर कोकिला लता मंगेशकर का एक टेलिफोनिक साक्षात्कार किया था। उस साक्षात्कार को आज मैं आप सबके लिये पेश कर रहा हूँ।

आधे घंटे के इस इंटरव्‍यू की फाइल बहुत बड़ी थी तो मैने सोचा इसका वजन कम कर दिया जाये, और किया भी; परन्तु मजा नहीं आया तो फाइल को काट कर दो भागों में किया ताकि इस्निप पर आसानी से जोड़ा जा सके और सुनने वालों को परेशानी हो। फिर भी इस साक्षात्कार का पूरा मजा लेने के लिये जिन मित्रों की नेट की स्पीड कम हो वे प्ले के बटन पर क्लिक करने के बाद पॉज कर दीजिये ताकि पूरा लोड हो जाये और सुनते समय अटके नहीं।

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Friday, September 14, 2007

रेडियो के दीवाने एक बच्चे की कहानी

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

लगभग आज से चौबीस- पच्चीस साल पहले की बात होगी तब एक छोटा बच्चा अपने घर से स्कूल जाने के लिये निकलता है। स्कूल का समय है सुबह सात बजे से बारह बजे तक का सो सात वजे से पहले नहा धो कर स्कूल जाने के लिये घर से चल पड़ा है।

स्कूल भी बहुत दूर है घर से स्कूल के पास पहुँचले पहुँचते रेडियो पर बजते भजनों की आवाज कानों में पड़ती है, हे राम नाम रस भीनी रे चदरिया झीनी रे झीनी......... गायक शायद अनूप जलोटा या उनके पिताजी पुरुषोत्तम दास जलोटा रहे होंगे। भजन की मधुरता में खो कर स्कूल जाने की बजाय वह बच्चा वापस घर की और भागता है।

घर में घुसते ही बच्चे के माता पिता पूछते हैं क्या हुआ स्कूल क्यों नहीं गए अब तक? तो वह बच्चा अपने पिताजी को हाँफते हुए कहता है पापाजी आप जल्दी से रेडियो चालू कीजिये आकाशवाणी जयपुर जोधपुर पर बहुत अच्छा भजन आ रहा है, पिताजी रेडियो चालू करने की बजाय बच्चे को एक तमाचा लगा देते हैं, इतनी बात कहने के लिये तुम स्कूल से भाग कर आये हो। बच्चा रुआंसा हो जाता है और वापस स्कूल जाता है, स्कूल देर पहुँचने पर एक बार और पिटाई होती है।

पिताजी रेडियो चालू करने की बजाय बच्चे को एक तमाचा लगा देते हैं, इतनी बात कहने के लिये तुम स्कूल से भाग कर आये हो। बच्चा रुआंसा हो जाता है और वापस स्कूल जाता है, स्कूल देर पहुँचने पर एक बार और पिटाई होती है।

खैर बच्चा कौन था ....आप समझ ही गये हैं, जी हाँ वह रेडियो और संगीत का दीवाना बच्चा मैं ही था।

स्कूल से बारह बजे छुट्टी होती । स्कूल से वापस आने पर एक बजे फिर से रेडियो शुरु होता जो तब तक चलता तब तक पापाजी घर नहीं आ जाते। फिर पापाजी आ कर समाचार सुनते। फिर देर रात तक पुराने गाने। बरसों तक यह सिलसिला चलता रहा।

फिर अचानक एक दिन दूरदर्शन आ गया कुछ सालों तक तो रेडियो से दूर होते गये, पर दिन में तो रेडियो फिर भी चलता ही था, क्यों कि उन दिनों टीवी शाम को चालू होता था, और कृषि दर्शन जैसे ना समझ में आने वाले कार्यक्रम भी हम मजे से देखते थे;पर उसमें एक बहुत बड़ी कमी थी कि जब टीवी देखते तब दूसरा कोई काम नहीं कर सकते थे, जब कि रेडियो कभी भी कहीं भी और कुछ भी करते समय सुन सकते थे... यहाँ तक कि होमवर्क करते समय भी। कई बार तो भूले बिसरे गीत ( भू. बि. गीत- कार्यक्रम नहीं सचमुच के भूले बिसरे गीत) सुनते सुनते ही नींद आ जाती और बाद में मम्मीजी रेडियो को बन्द करती।

यूनूस भाई ने एक दिन बात बात में कही और कुछ शुरुआती तकलीफों के बाद आखिरकार रेडियो नामा शुरु हुआ और अफलातूनजी, संजय पटेल जी, लावण्या जी, और यूनूस भाई ने अपने अपने संस्मरण हमें बता तो बचपन की वे सारी बातें मुझे भी याद आ गई।

रेडियो मेरी जिन्दगी से आज भी जुड़ा हुआ है, आल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस तो अब साफ सुनाई नहीं देती परन्तु विविध भारती से आनन्द तो आज भी उठा ही रहा हूं मैं। सुबह उठते ही सबसे पहले रेडियो चालू होता है।

बाकी बातें और कभी ..

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