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Tuesday, April 10, 2018

कैक्टस के मोह में बिंधा एकमन भाग -55(महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)


हमारे उन महान डायरेक्टर साहब की बात करते करते मैं बहोत आगे बढ़ गया जिनके  लिए मैं मिस्टर मोदी था. बड़ी मशक्क़त के बाद मिस्टर मोदी से मोदी जी हुआ और फिर मोदी जी से न जाने कितने पापड बेलकर महेंद्र हुआ . हर इंसान इस दुनिया में अलग अलग फितरत लेकर आया है. डायरेक्टर साहब  शायद इसी फितरत के साथ इस दुनिया में आये थे कि वक़्त के साथ फ़ौरन अपने आपको, अपने बर्ताव को बदल लिया जाए. खैर उन्हें उनकी फितरत उन्हें मुबारक, लेकिन हमने पिछले एपिसोड में जहां बात ख़त्म की थी, अगर हम लोग वहाँ से आगे बढ़ेंगे तो सूरतगढ़ की बहोत सी बातें छूट जायेंगी. इसलिए आइये एक बार फिर कदम थोड़ा सा पीछे कीजिये और मेरे साथ चले चलिए सूरतगढ़.

यू पी एस सी से प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव की वकेंसीज़ निकली थी. हर तरफ उसी का शोर था. मैंने भी फॉर्म भर दिया था. मैंने खुद अपने आपका मुवाज़ना करने की कोशिश की तो मुझे महसूस हुआ कि मेरा सबसे मज़बूत पहलू है नाटक. पोस्ट्स जो थीं वो जनरल स्पोकन वर्ड्स की थीं या संगीत की. संगीत में रुचि तो रही मगर कभी बाकायदा सीख नहीं पाया. हाँ, जब जब भी नाटक करने माइक्रोफ़ोन के सामने खडा हुआ तो हर तरफ से मुझे तालियाँ मिलीं. कॉलेज के दिनों में और उसके बाद स्टेज भी किया था लेकिन रेडियो ज्वाइन करने के बाद स्टेज एक तरह से छूट सा गया था. रेडियो ड्रामा में मुझे अपने आप पर पूरा भरोसा था लेकिन स्टेज इतना नहीं किया था कि पूरे एतमाद के साथ कह सकूं कि स्टेज ड्रामा में मेरा स्पेशलाइजेशन है. मैंने एक योजना बनाई. उस वक़्त तक के उन सारे नाटकों की किताबें इकट्ठी कीं जो उपलब्ध हो सकती थीं. इसमें मेरी सबसे ज्यादा मदद की वागीश कुमार सिंह ने जो कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की पढाई पूरी कर चुका था और अब स्कूल की ही रेपेट्री में रहकर नाटक कर रहा था. करीब चार महीने बाद यू पी एस सी का इम्तहान होने वाला था. मैंने करीब पचास-साठ नाटक चुने और उन नाटकों को कई कई बार पढ़ते हुए अपने आपको यकीन दिलाया कि मैंने इन नाटकों में ये ये किरदार किये हैं. हर चरित्र को मैंने बिना स्टेज पर किये ही कुछ इस तरह जिया कि कुछ दिन बाद मुझे महसूस होने लगा कि मैंने सचमुच ये नाटक किये हैं और उनमे अमुक अमुक रोल किये हैं. तीन महीने बीतते बीतते हालत ये हो गयी थी कि अगर कोई मुझे नींद में भी पूछ लेता कि फलां नाटक में तुमने कौन सा रोल किया था, करके बताओ. तो मैं उस पूरे किरदार को नींद में रहते हुए भी पूरी तरह जी सकता था. आखिर के एक महीने में मैंने हर नाटक के पात्रों का बहोत सूक्ष्म तरीके से विश्लेषण करते हुए उनपर बड़े बड़े लेख लिख डाले. ये सारी तैयारी मेरे बहोत काम आई. एक कहावत है कि आप किसी झूठ को सौ बार बोलो तो खुद आपको भी सच लगने लगता है. मैं इसी कहावत को अपने जीवन में उतारकर एक एक्सपेरिमेंट करने जा रहा था.

यू पी एस सी के इंटरव्यू की तारीख आ गयी थी. मैं दिल्ली पहुंचा . पता चला कि बोर्ड में डायरेक्टर जनरल श्री अमृत राव शिंदे और नाटककार श्री लक्ष्मी नारायण लाल भी शामिल हैं. इन वेकेंसीज़ में नाटक की तो एक भी वेकेंसी थी नहीं इसलिए ये उम्मीद तो की नहीं जा सकती थी कि मेरा इंटरव्यू  स्वाभाविक तौर पर नाटक पर किया जाएगा. मुझे करना ये था कि मैं किसी तरह अपने इंटरव्यू को घुमा फिराकर नाटक की तरफ ले आऊँ और जो कुछ तैयारी मैंने की थी, उसे बोर्ड के सामने किसी तरह रख सकूं. मैं इंटरव्यू वाले कमरे में घुसा. सबसे पहले एक दो रस्मी सवाल पूछे गए. जाने कैसे धीरे धीरे इकोनॉमिक्स से रेडियो होते हुए इंटरव्यू रेडियो ड्रामा तक आ पहुंचा और इंटरव्यू शुरू होने के 3-4 मिनट के अन्दर ही स्टेज ड्रामा पर आ गया. अब मुझे इंटरव्यू में मज़ा आने लगा था. 45 मिनट के इंटरव्यू में मैंने बोर्ड को पूरा विश्वास दिला दिया कि मैंने स्टेज पर वो सभी नाटक किये हैं जिनके बारे में चर्चाएँ हुई थीं.

कुछ ही दिनों बाद दिल्ली से खबर मिली कि प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव के इंटरव्यू में पास हुए लोगों की मेनलिस्ट में तो मेरा नाम नहीं है मगर वेटिंग लिस्ट में मेरा पहला नंबर है. मुझे फिर भट्ट जी की कही बात याद आई, “ सुनो महेंद्र आजकल के ज़माने में असली लिस्ट वेटिंग लिस्ट नंबर एक से ही शुरू होती है. “ मैंने अपने अब तक के करियर पर निगाह डाली. मैं एनाउंसर के इम्तहान में भी वेटिंग नंबर एक पर था, ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव के इम्तहान में भी वेटिंग नंबर एक पर था और अब प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव के इम्तहान में भी अपनी उसी जगह पर अड़ा हुआ था. बस इस खबर के मिलने के कुछ ही दिन बाद हमारे डायरेक्टर साहब का ट्रान्सफर दिल्ली हो गया था.  

जब हमने डायरेक्टर साहब के दिल्ली ट्रान्सफर के बारे में सुना तो काफ़ी परेशान हुए थे क्योंकि अब तक जाहिरा तौर पर उनसे बहोत अच्छे ताल्लुकात बन चुके थे और दिन रात काम करने के बावजूद हमें दफ्तर से किसी तरह का कोई शिकवा नहीं था. उर्दू की एक कहावत है, बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुबहान अल्लाह. एक बार फिर ये कहावत हमें सही होती हुई नज़र आई . हुआ ये कि एक रोज़ खाना खाकर मैं दफ्तर लौटा तो डायरेक्टर साहब के कमरे के सामने भीड़ सी लगी हुई थी. मुझे कुछ समझ नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है? इधर उधर लोगों से पूछा तो लोगों ने हंस हंसकर जो वाकया सुनाया उस पर मुझे भी हंसी आये बिना नहीं रही.

हुआ ये कि डायरेक्टर साहब का ट्रान्सफर तो हो ही चुका था . वो इंतज़ार कर रहे थे कि कोई आकर उनसे चार्ज ले और वो उस गरीब और पिछड़े हुए से गांवनुमा कस्बे से पीछा छुडाकर देश की राजधानी दिल्ली में जाकर अपने नए सिंहासन पर बिराजें. उधर जिन साहब को इस कुर्सी पर बैठना था उनके लिए ये एक बहोत बड़ी कुर्सी थी. वो किसी छोटे से स्टेशन पर महज़ एक फ़ार्म रेडियो अफसर थे. आप अगर आकाशवाणी का मैन्युअल उठाकर देखें तो एक प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव की ड्यूटीज़ तीन पेज में दी हुई हैं जबकि एक फार्म रेडियो ऑफिसर की ड्यूटीज़ सिर्फ तीन लाइन्स में. ऐसे में कोई फार्म रेडियो ऑफिसर डायरेक्टर की कुर्सी तक पहुँचने का ख्वाब भी नहीं देख सकता था. उनका भाग्य कि वो एक ऐसे तबके के थे जिन्हें हर जगह तवज्जो दी जा रही थी. डायरेक्टर की कुछ पोस्ट्स निकली जो सिर्फ और सिर्फ उनके ही तबके के लोगों के लिए थीं. उन्होंने अप्लाई किया, बिना किसी बड़ी दिक्क़त के उसमे पास हो गए. जैसे ही उन्हें पास होने का समाचार मिला और सूरतगढ़ पोस्टिंग का ऑफर मिला, उन्होंने नक़्शे में सूरतगढ़ ढूंढा और आव देखा न ताव , सूरतगढ़ के लिए रवाना हो गए. सूरतगढ़ आकर उस गांवनुमा कस्बे को देखकर एक बार थोड़े घबराए लेकिन डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठने की कल्पना ने मानो उनके पंख लगा दिए. रेलवे स्टेशन के बाहर एक घटिया से ढाबे में उन्होंने अपना सामान रखा, नहाए धोये, खाना खाया और एक साइकिल रिक्शा लेकर आकाशवाणी जा पहुंचे.

उस वक़्त तक लंच टाइम हो चुका था और हमारे आउटगोइंग डायरेक्टर साहेब लंच के लिए जा चुके थे. मैदान खाली था. नए डायरेक्टर साहब दफ्तर में आये और आकर न किसी से बात की न किसी से कुछ पूछा, डायरेक्टर के कमरे में आकर उस कुर्सी पर बिराजमान हो गए जो कि डायरेक्टर के लिए तयशुदा थी. उन्होंने तो बेचारों ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि वो डायरेक्टर की इस कुर्सी पर बैठ सकते हैं. अब उनके पास इस पोस्ट का अपॉइंटमेंट लैटर भी था और कुर्सी भी खाली पडी थी. दफ्तर में जो लोग मौजूद थे , उन्होंने झाँक कर डायरेक्टर साहब के कमरे में देखा कि एक काला सा छोटे क़द का  इंसान डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठा हुआ फ़ोन पर बातें किये जा रहा है . सूरतगढ़ में उन दिनों फोन पर लॉक तो बहोत दूर की बात थी, डायल वाला फ़ोन भी नहीं था. फ़ोन उठाने पर उधर से ऑपेरटर पूछता था, नंबर पिलीज़ और तब आप जो नंबर बताते थे वो उस नंबर से जोड़ देता था.

हमारे नए डायरेक्टर साहेब उस कुर्सी का आनंद उठाते हुए फोन पर फोन किये जा रहे थे कि तभी आउटगोइंग डायरेक्टर साहब खाना खाकर लौटे. जैसे ही अपने कमरे में घुसने को हुए , देखा एक आदमी उनकी कुर्सी पर पसरा हुआ फ़ोन पर किसी से बड़े इत्मीनान से बातें कर रहा है. वो एकदम  चकराए कि ये क्या माजरा है? फ़ोन पर बात करते करते ही उस आदमी ने हाथ के इशारे से हमारे आउटगोइंग डायरेक्टर साहब को बैठने को कहा. वो बेचारे बैठ गए. थोड़ी देर गपियाने के बाद नए डायरेक्टर साहब ने फोन क्रेडिल पर पटका और वैसे ही पसरे पसरे कहा , “ हां बोलो, क्या बात है ?”

आउटगोइंग डायरेक्टर साहब को समझ नहीं आया कि क्या जवाब दे. उन्होंने सिर्फ इतना सा कहा, “ जी आप............?”

“देख नहीं रहे हो डायरेक्टर के कमरे में डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठा हूँ तो यकीनन डायरेक्टर ही हूँ. आप कौन हैं और क्या चाहिए आपको ?
“जी मैं भी डायरेक्टर ही हूँ. अब तक इस कुर्सी पर मैं ही बैठता था और मेरे ख़याल से जब तक मैं आपको चार्ज नहीं दे देता, मैं ही इस स्टेशन का डायरेक्टर हूँ.”

“देखो जी फालतू की बात तो करो मत ना मुझसे. ये मेरा अपॉइंटमेंट लैटर है. इसके मिलते ही मैं इस स्टेशन का डायरेक्टर हो लिया .”

आउटगोइंग डायरेक्टर साहब के चेहरे पर पसीना आ गया. वो उस इंसान को कैसे समझाते कि जब तक वो नए साहब को चार्ज नहीं देते वही डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठने के हक़दार थे. उन्होंने अपना पसीना पोंछा, बाहर खड़े चपरासी से कहा कि अकाउंटेंट को बुलाये. अकाउंटेंट आया, उसी वक़्त चार्ज हैन्डिंग ओवर टेकिंग ओवर हुआ और हमारे आउटगोइंग डायरेक्टर साहब अपने दो चार ज़रूरी कागज़ात उठाकर चुपचाप दफ्तर से निकल गए.

अब नए डायरेक्टर साहब ने फ़ौरन एक मीटिंग बुलाई जिसमे ड्यूटीरूम के स्टाफ को भी बुलाया गया. लिहाजा हम लोग भी उस मीटिंग में पहुंचे. उनके पहले प्रवचन से साफ़ हो गया कि जिस पोस्ट से उठाकर सरकारी नियमों ने उन्हें डायरेक्टर की कुर्सी पर बिठा दिया है उस पोस्ट का असर अभी कुछ रोज़ उनके जेहन से जा नहीं सकता. वो अब भी उसी तरह बात कर रहे थे मानो फार्म रेडियो ऑफिसर हों. उनके बोलने में कहीं भी एक डायरेक्टर की संजीदगी नहीं थी.

उन दिनों सूरतगढ़ में आकाशवाणी की कॉलोनी तो बन गयी थी मगर एक बेडरूम के फ्लैट्स ही बने थे. डायरेक्टर और दीगर अफसरों के लिए बड़े फ्लैट्स नहीं बने थे. हम लोग भी एक फ्लैट में आ गए थे और हमारी खुशकिस्मती कि हमारे सामने वाले फ्लैट में हमारे डायरेक्टर साहब अपना परिवार लेकर आ चुके थे. सिर्फ सात बच्चे थे उनके. तीन लडकियां, फिर एक लडका और फिर तीन लडकियां. कॉलोनी में सारी औरतें बातें करतीं की जब तीन लड़कियों के बाद एक लड़का हो चुका था, तो फिर ये तीन लडकियां पैदा करने की इन्हें क्या सूझी ? मगर खैर ये तो अपनी अपनी मर्जी है, कोई क्या कर सकता है.?

अब सवाल ये उठता था कि अपने सात बच्चों के साथ वो दो कमरों के इस घर में सोयें कैसे ? ख़ास तौर पर तब जबकि बड़ी लडकियां काफी बड़ी हो गयीं थीं. आखिरकार तय हुआ कि कुछ लोग दो पलंगों के ऊपर सोयेंगे और बाकी लोग उनके नीचे. यानी रात को अगर उनके घर कोई चला जाता तो लगता था, कोई घर न होकर चिड़ियाघर था, जिसमें चारों और कुछ लोग बिखरे रहते थे.

इधर पूरे दफ्तर का हाल खराब हो चुका था क्योंकि जहां पुराने डायरेक्टर साहब बहोत होशियार इंसान थे, नए डायरेक्टर साहब सरकारी नियमों की वजह से डायरेक्टर तो बन गए थे मगर उनमें डायरेक्टर वाली कोई काबलियत नहीं थी. न उन्हें रेडियो के हिसाब से बोलना आता था और ना ही किसी प्रोग्राम की कोई समझ उनमे थी. आकाशवाणी को वो आकाशवाडी बोलते थे और मीटिंग में ऐसी ऐसी बातें करते थे कि पूरे वक़त लोग एक दूसरे के सामने देखकर बस मुस्कुराते ही रहते थे. वो हमेशा मीटिंग में बोलते थे, “ मुझे आकाशवाडी में सुद्ध बोलने वाले ही चाहिए.”

हम लोग बस मुस्कुरा कर रह जाते. मुझसे जब सहन नहीं होता तो मैं बोल दिया करता था, “यस सर हम सुद्ध बोलने की ही कोसिस करते हैं.”

इसी बीच श्री गोकुल गोस्वामी प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव बनकर आ गए. इधर तीन एनाउंसर नए रिक्रूट होकर आ गए. श्री मोहम्मद सलीम बनारस से, श्री ओमकार नाथ मिश्र बिहार से और एक साहब श्री जय प्रकाश दुबे राजस्थान से ही . एक बहोत मज़ेदार बात हुई . एक रोज़ जब ऑफिस आया तो देखा कुछ सामान दफ्तर में रखा हुआ था. दो तीन सूटकेस और एक बेडिंग. उत्सुकता के साथ मैंने सामान पर नज़र डाली, उस पर कुछ कार्ड्स लगे हुए थे. मैंने कार्ड पढ़ा, जयप्रकाश दुबे, उद्घोषक, आकाशवाणी, सूरतगढ़. मुझे ताज्जुब हुआ. कौन साहब हैं ये? मैं ड्यूटीरूम में आया तो पांच फुट के एक साहब ने मेरा उसी ड्यूटीरूम में स्वागत किया जिसमे पिछले डेढ़ साल से मैं ड्यूटी कर रहा था. बोले, “मेरा नाम जय प्रकाश दुबे है मैं यहाँ एनाउंसर हूँ.”

मैं मुस्कुराया और बोला, “जी, आपका सामान बाहर देखा, उसपर कई चिप्पियाँ चिपकी हुई थीं आपके नाम की. लेकिन क्या आपने ज्वाइन कर लिया है?”

वो लापरवाही के साथ बोले, “ जी नहीं अभी ज्वाइन तो नहीं किया है लेकिन मेरे पास इस पोस्ट का ऑफर है.”

“ओह..... बहोत अच्छा, लेकिन पहले आप ज्वाइन कर लीजिये. चलिए मैं आपको ज्वाइन करवाता हूँ.”
“अच्छा, आप यहाँ क्लर्क व्लर्क होंगे.”

“हाँ कुछ भी समझ लीजिये. आइये.”

“मैं उन्हें दफ्तर में लेकर आया और अकाउंटेंट को बताया कि ये साहब एनाउंसर हैं, इन्हें ज्वाइन करवा लीजिये.”

वो ज्वाइन करने की फोर्मेलिटीज़ में लग गए और मैं अपने काम में लग गया. 
तीनों उद्घोषकों ने ज्वाइन कर लिया था. ओमकार नाथ मिश्र तम्बाकू का पान अपने मुंह में दबाये हुए अपना काम करते थे और आचार्य जी की तरह ठहाके लगाया करते थे, मोहम्मद सलीम राही, थोड़े संजीदा किस्म के इंसान थे और हमारे दुबे जी जो एनाउंसर की पोस्ट को शायद प्रधान मंत्री की पोस्ट से बस थोड़ी सी छोटी पोस्ट मानते थे, पूरे शहर में अपना परिचय दे देकर घूमते फिरते थे.

इधर मेरा बीकानेर का कोर्ट केस चल रहा था. हर पंद्रह बीस दिन में एक बार मुझे बीकानेर जाना होता था और मेरी ये यात्रा मेरे लिए बहोत तकलीफदेह होती थी क्योंकि कोर्ट में मैं एक मुल्ज़िम था, 179, 337 338 के साथ साथ attempt  to murder केस का. कोर्ट में जाते ही हर सीढ़ी पर कुछ रुपये चढाने होते थे और हर इंसान वहाँ मुझे अजीब सी नज़रों से देखता था. ऐसे में मेरा भरपूर साथ दिया बोहरा जी ने. वो सूरतगढ़ से बीकानेर तक मेरे साथ मेरी बन्दूक उठाकर चला करते थे और पूरे वक़्त मेरे साथ रहते थे. मुझे नहीं पता कि मैं उनके लिए क्या कर पाया लेकिन उन्होंने मेरे उस मुश्किल वक़्त में जिस तरह से साथ दिया , उसे में ताउम्र नहीं भूल सकता.

सब लोगों को ये तो पता चल चुका था कि मेरा सलेक्शन प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए हो चुका है. जाने ये लोगों के मन की जलन थी या मेरे बर्ताव में ही कोई कमी थी कि कई लोग मुझसे पंगा लेने को तैयार ही बैठे रहते थे. बीकानेर की मेरी मित्र मंडली ने इस बीच मेरे ऊपर कई उलटे सीधे कोर्ट केस दायर कर दिए थे. इधर मैं वो सारे केस लड़ रहा था उधर सूरतगढ़ के मेरे दफ्तर में ख़ास तौर पर कई इंजीनियर बिना किसी वजह से मुझसे पंगा ले रहे थे क्योंकि सब समझते थे कि कोई भी मुझसे झगड़ा करेगा तो गलती मेरी ही मानी जायेगी क्योंकि मेरे खिलाफ कई कोर्ट केस चल रहे हैं और मेरा ट्रान्सफर पनिशमेंट के तौर पर हुआ है.

एक इंजीनियर साहब थे श्री के...... माफ़ करें पूरे नाम नहीं लिखूंगा ऐसे लोगों के क्योंकि एक तो उन्हें पब्लिसिटी नहीं देना चाहता, दूसरे बहोत साल गुज़र गए इन बातों को, हो सकता है वो अपने पोतों पड़पोतों के साथ बैठ कर इस किताब को पढ़ें तो अपने आगे की पीढ़ियों के बीच नाहक उनकी इज्ज़त खराब हो जायेगी. एक दिन एक रिकॉर्डिंग के लिए बाहर गया था मैं. लौटा तब तक रात के १२ बज गए थे. आकाशवाणी का रिकॉर्डर और कुछ टेप्स मेरे पास थे, जिन्हें मैं घर नहीं ले जा सकता था. मैंने स्टूडियो का ताला खुलवाया और टेप रिकॉर्डर ड्यूटी रूम में रख दिया. टेप्स अपनी अलमारी में रखे क्योंकि अगले दिन मुझे उनसे प्रोग्राम बनाना था.  स्टूडियो बिल्डिंग पर एक सील लगा करती थी जिस पर कंट्रोल रूम के इंजीनियर्स दस्तखत किया करते थे. ज़ाहिर है की ड्यूटी रूम तक जाने के लिए मुझे उस सील को तोड़कर ही जाना था. बस इसी बात ने एक बतंगड़ का रूप  ले लिया. अगले दिन जब के..... महोदय ने देखा कि सील पर मेरे दस्तखत हैं तो वो जोर जोर से चिल्लाने लगे और स्टेशन इंजीनियर के पास जाकर शिकायत की कि मैंने रात को स्टूडियो बिल्डिंग की सील तोड़कर नियम के खिलाफ काम किया है क्योंकि स्टूडियो बिल्डिंग में सील लगाना और उसे तोड़ना सिर्फ इंजीनियर्स का हक होता है. स्टेशन इंजिनियर  विजय साहेब बहोत संजीदा और मुहज्ज़ब इंसान थे . उन्होंने के..... साहब को समझाया कि वो बात का बतंगड़ ना बनाएं, जो हुआ उसमे कुछ भी गलत नहीं हुआ लेकिन के..... साहब कुछ ज़्यादा ही जोश में थे. मैं अगले दिन डबिंग रूम में कुछ काम कर रहा था, वो आये और बोलने लगे, “आपने सील तोड़ने की हिम्मत कैसे की?” मैंने कहा, “ज़रा आप सोच कर देखिये कि उस वक़्त मैं और क्या कर सकता था?”

“मैं कुछ नहीं जानता, ये सिर्फ इन्जिनियर इंचार्ज ही कर सकता है और कान खोलकर सुन लीजिये, आप ब्लडी ड्यूटी ऑफिसर उसके अंडर में ही काम करते हैं.”

ये बात बिलकुल गलत थी. हम ड्यूटी ऑफिसर अपना काम करते थे और इन्जीनियेर्स अपना. कोई एक दूसरे के नीचे या ऊपर काम नहीं करते थे, बल्कि जो लोग रेडियो से जुड़े हुए रहे हैं वो मेरी बात की ताईद करेंगे कि जब भी कोई फैसला लेने का वक़्त आता था, ड्यूटी ऑफिसर को ही फैसला लेना होता था और इन्जीनियेर्स को उस फैसले के मुताबिक काम करना होता था. के.... साहब पर जाने उस वक़्त क्या भूत सवार था कि वो चिल्ला चिल्लाकर मुझे ज्ञान देने लगे. मैं थोड़ी देर उनकी बातें खामोशी से सुनता रहा. इससे उनका हौसला और बढ़ गया और वो मुझसे झगड़ा करने लगे. अब मैं अपने पर काबू नहीं कर सका. मैंने कहा, “दुबारा कहिये, जो आपने अभी कहा.” वो चिल्लाकर बोले, “ हाँ आप ड्यूटी ऑफिसर हमारे अंडर में काम करते हैं.”

बस इतना बहोत था मेरे सब्र को तोड़ने के लिए. मैंने उनकी कॉलर पकड़ी, तीन चार बार उनके सर को दीवार से टकरा दिया, खींचकर दो झापड़ उनके मुंह पर रसीद कर दिए और बोला, “ये ले अफसर के बच्चे, झाड अपनी अफसरी अब जहां भी झाड़नी हो.”

वो हक्के बक्के रह गए. अपने गालों को सहला रहे थे कि एक तकनीशियन ने डबिंग रूम के शीशे  से झाँक कर देखा और दो मिनट में पूरे ऑफिस में ये बात फैल गई थी कि मैंने के........ साहब की पिटाई कर दी है. लोगों ने उन्हे बहोत भरा कि वो मेरी शिकायत करें लेकिन उनकी हिम्मत नहीं हुई. इसी बीच ये बात घूमती घामती न जाने कैसे उनके घर तक पहुँच गई. उनकी बीवी ने उन्हें धिक्कारा कि वो मार खाकर आ गए. पूरे ऑफिस के लोगों में चर्चा हो रही थी कि वो मेरे हाथ से पिट गए, उसका असर उनपर इतना नहीं हुआ लेकिन जब उनकी बीवी ने उन्हें इसी बात के लिए धिक्कारा तो वो सहन नहीं कर पाए और मुझे मज़ा चखाने का मौक़ा ढूँढने लगे.

आकाशवाणी काफी दूर था, शहर से. सभी लोग शाम की ड्यूटी में पैदल आया करते थे ताकि रात में ऑफिस की कार से लौट सकें. दो तीन दिन बाद ही मेरी भी शाम की ड्यूटी थी और उनकी भी. तब तक हम लोग पूरी तरह से कॉलोनी में शिफ्ट नहीं हुए थे. जब मैं आकाशवाणी के पीछे के मैदान को पार कर रहा था, के..... साहब मेरे पास आ कर मुझे ललकारने लगे. मैंने कहा, “जाओ यार जितनी मार खा ली क्या वो काफी नहीं है?”

उन्हें शायद अपनी बीवी की धिक्कार याद आने लगी, वो मेरे ऊपर टूट पड़े, मैं उन्हें अपने ऊपर से हटाता रहा, लेकिन जब मुझे लगा कि वो इस तरह नहीं हटने वाले. मैंने अपने हाथ खोले और उनकी पिटाई करने लगा. वो बेचारे डेढ़ पसली के इंसान. बस मार खाने लगे और मैं उनकी जमकर पिटाई करने लगा. उनके मुंह से खून बहने लगा और खूब अच्छी तरह मार खाकर आखिरकार वो वहाँ से भाग लिए. जाकर स्टेशन इंजीनियर विजय साहब को अपनी चोटों के निशान दिखाए. विजय साहेब ने उनसे कहा कि चूंकि मारपीट ऑफिस से बाहर हुई है, उन्हें खुद पुलिस में रिपोर्ट करवानी चाहिए. वो पुलिस स्टेशन गए भी लेकिन बोहरा जी जैसे मेरे दोस्तों ने जाकर उनके कान में कहा कि अगर वो रिपोर्ट करेंगे तो बाहर उनकी खैरियत नहीं. अभी तो थोड़ी ही मार पडी है, अगर पुलिस का झमेला किया तो मार मारकर उनका भुरता बना दिया जाएगा. बुनियादी तौर पर डरपोक इंसान तो थे ही, बस बीवी के चढाने पर लड़ने आ गए थे, जब उन्होंने सुना कि और पिटाई होने के आसार बन रहे हैं तो हारकर वो वहाँ से लौट आए और थोड़े ही दिन बाद अपना ट्रान्सफर करवाकर भाग लिए.

एक और इंजिनीयर साहब थे श्री बी........ जो कण्ट्रोल रूम में ड्यूटी कर रहे थे. मैं ड्यूटीरूम में ड्यूटी कर रहा था. रेडियो पर जो भी प्रोग्राम चलता उसे सुनना मेरी ड्यूटी थी. दिन का वक़्त था. स्टूडियो से कोई प्रोग्राम चल रहा था कि अचानक वो रुक गया और मुझे किसी और भाषा के कुछ ऊटपटांग शब्द सुनाई दिए. मैंने कण्ट्रोल रूम में फोन किया कि भाई ये क्या हो रहा है? उधर से आवाज़ आई, जो हो रहा है, ठीक हो रहा है, आप अपना काम कीजिये. मैंने शान्ति से जवाब दिया कि भाई आपको बताकर कि ब्रॉडकास्ट में कुछ गड़बड़ हो रही है, मैं अपना काम ही कर रहा हूँ. उधर से आवाज़ आई, “यू शट योर ब्लडी माउथ”. मैंने उनसे कुछ भी गलत नहीं कहा था, बस जो गलती ब्रॉडकास्ट में हो रही थी, उस ओर इशारा भर किया था. मैंने सोचा, जाने दो घर से लड़कर आये होंगे. कुछ ही मिनट गुज़रे होंगे कि फिर स्टूडियो का प्रोग्राम रुक गया और कुछ सेकंड्स के लिए किसी अजनबी जुबान में कुछ शब्द रेडियो पर आये. अब मैं उठकर कण्ट्रोल रूम की तरफ भागा. वहाँ जाकर देखा कि बी........ साहब मशीनों के साथ कुछ छेड़ छाड़ कर रहे हैं. मैंने कहा, “रेडियो पर चलते प्रोग्राम के बीच ये क्या कर रहे हैं आप ?”

इस पर उन्हें गुस्सा आ गया. वो चिल्लाये, “बाहर निकलो यहाँ से. ये कंट्रोल रूम है, यहाँ तुम्हारे बाप का राज नहीं चलता.”

इतना सुनना था कि मैं अपना आपा खो बैठा. मैंने कण्ट्रोल रूम में हमेशा मौजूद रहने वाली दो पैच कॉर्ड्स उठाई और उन पर टूट पडा. पैच कॉर्ड्स हंटर की तरह उनपर बरस रही थीं, वो नीचे गिरे हुए मार खा रहे थे और गालियाँ निकाल रहे थे. कण्ट्रोल रूम में ही मौजूद टेक्नीशियन ने भागकर स्टेशन इंजीनियर श्री आर सी विजय को इत्तेला दी. वो भागे हुए आये, लेकिन वो आये तब तक बी....... साहब की अच्छी तरह ठुकाई हो चुकी थी. विजय साहब ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने कमरे में लेजाकर बोले, “ ये क्या करते हो महेंद्र तुम? आगे ही तुम्हारे ऊपर इतने कोर्ट केसेज़ चल रहे हैं, फिर नए बखेड़े क्यों खड़े कर रहे हो?”

            मैंने कहा, “ सर यहाँ हर इंसान सोचता है कि झगडा वो करेगा मुझसे और मारपीट भी कर लेगा लेकिन क्योंकि मुझ पर कोर्ट केस चल रहे हैं तो गलत मुझे ही माना जाएगा. अब मैंने इसकी परवाह करनी छोड़ दी है कि लोग क्या सोचते हैं. जो मुझसे पंगा लेगा मैं उसे ठीक कर दूंगा. जो होगा सो देखा जाएगा. दो चार कोर्ट केस और सही.”

चढ़ाने वालों ने बी........... साहब को भी चढ़ाया लेकिन उनकी हिम्मत नहीं हुई मेरे खिलाफ कुछ लिखकर देने की क्योंकि उन्हें पता था कि वो लिखकर दे देंगे तो मेरे खिलाफ दफ्तर की कार्यवाही तो शुरू हो जायेगी लेकिन दफ्तर के बाहर अगर उन्हें मार पड़ी तो उन्हें कौन बचाने आयेगा. के.......... साहब की दुर्गति वो देख ही चुके थे.

इस तरह मैं सीधा सादा इंसान अब घोषित बदमाश बनता जा रहा था. कई बार मैं बैठे बैठे सोचा करता, क्यों ये दुनिया किसी सीधे सादे इंसान को इतना दबाने की कोशिश करती है कि उसे ज़ुल्म के खिलाफ खड़े हो जाना पड़ता है. किसी भी इंसान के क्रिमिनल बनने की शायद यही प्रक्रिया होती है.

एक तरफ जहाँ मैं सूरतगढ़ में बहोत दिल लगाकर मेहनत कर रहा था. हमने एनाउंसर और ड्रामा कलाकारों के ऑडिशन किये जिनमे पास हुए लोगों को ट्रेनिंग देने की ज़िम्मेदारी भी मुझे सौंपी गई, दूसरी तरफ अब स्टाफ के लोग मुझसे छेड़खानी करने में डरने लगे थे क्योंकि दो तीन लोग मेरे हाथ से पिट चुके थे. अन्दर से मैं उतना ही सीधा सादा प्राणी था, जितना रेडियो ज्वाइन करने के वक़्त था, लेकिन वक़्त और हालात ने मुझे ऊपर से एक सख्तजान लड़ाका इंसान बना दिया था.

आकाशवाणी सूरतगढ़ में नाटक की शुरुआत नरेन्द्र आचार्य जी ने की एक धारावाहिक के साथ. इस धारावाहिक का नाम था “न नमक न मिर्च”. इसमें दो पात्र होते थे और दोनों ही पात्र आचार्य जी ने निश्चित कर दिए थे. पुरुष पात्र मैं हुआ करता था और स्त्री पात्र सुश्री सुनंदा ओहरी हुआ करती थीं. पहले कुछ एपिसोड संगरिया में रहने वाले मशहूर लेखक श्री गोविन्द शर्मा ने लिखे थे, उसके बाद कभी गोविन्द जी लिखते थे तो कभी खुद नरेन्द्र आचार्य जी. ये साप्ताहिक धारावाहिक श्रोताओं में बहोत पोपुलर हुआ.

मोहम्मद सलीम भी नाटक लिखा करते थे, मैं भी कुछ टूटा फूटा लिख लिया करता था, आचार्य जी तो नाटक के आदमी थे ही. कुल मिलाकर नाटक का अच्छा माहौल आकाशवाणी सूरतगढ़ में बनने लगा था. आये दिन हममे से कोई एक इंसान नाटक लिखकर लाता और फिर सब उसपर चर्चा करते. हर तरह से जब नाटक की तहरीर दुरुस्त हो जाती तो हम लोग उसे मिलकर प्रोड्यूस किया करते. हर इंसान हर काम करने को तैयार रहता. हम सब मिलकर काम कर रहे थे लेकिन हमारे ऊपर जो साहब बैठे थे, वो तो “आकासवाड़ी” और “सुद्ध” बोलने वाले इंसान थे. उन्हें इन सबसे कोई लेना देना नहीं था. हाँ हम जो काम करना चाहते, उसमे कोई टांग नहीं अड़ाते थे. यानी काम करने की पूरी आज़ादी हमें थी.

इस वक़्त तक हमारे डायरेक्टर साहब काम के मामले में तो जीरो थे, मगर थे पूरे ईमानदार. रोज़ साइकिल रिक्शा से बाज़ार जाकर सब्जी लाते थे. किसी सरकारी सहूलियत का बेजा इस्तेमाल नहीं करते थे. सूरतगढ़ में एयर फ़ोर्स का बहोत बड़ा स्टेशन था. सैनिकों के लिए आकाशवाणी की तरफ से भी प्रोग्राम किये जाते थे और वैसे भी डिफेन्स के अफसर अपने जवानों के लिए आये दिन कुछ ना कुछ आयोजन करते ही रहते थे. इन आयोजनों में बाकी चाहे कुछ हो न हो, दारू की नदियाँ तो बहती ही थीं. इन सारे प्रोग्राम्स में हमारे डायरेक्टर साहब को भी बुलाया जाता. बस वहाँ से शुरू हुआ हमारे डायरेक्टर साहब की ज़िंदगी का एक नया चैप्टर. वो इंसान जो कभी कभार एक दो पैग ले लिया करता था, अब एयर फ़ोर्स की पार्टियों में जा जाकर बेतहाशा पीने लगा. कई बार तो मैंने अपनी आँखों से देखा कि नशे में बुरी तरह धुत वो एयर फ़ोर्स के अफसरों के सामने कुच्छ भी अंट शंट बोले चले जा रहे हैं. जैसे ही दारू की ट्रे उनके सामने आई, उन्होंने फिर एक ग्लास उठा लिया. उसमे से एक घूँट भरकर पास की टेबल पर रखा तो अनिल राम जी ने उस ग्लास को पास की झाड़ियों में खाली कर दिया. डायरेक्टर साहब तो नशे में इतने डूबे हुए रहते थे कि उन्हें याद भी नहीं रह सकता था कि उन्होंने अभी तो उस ग्लास में से एक ही घूँट भरा था, सारी दारू कहाँ चली गयी ? वो तो फिर से दूसरा ग्लास उठाकर शुरू हो जाते थे. अनिल जी फिर अपनी वही कारस्तानी दोहराते थे. इस कहानी का अंत एक ही तरह से हुआ करता था. डायरेक्टर साहब होश खोकर उल्टियां करने लगते थे और उन्हें गाडी में डालकर मुश्किल से घर लाया जाता था.

लोगों ने डायरेक्टर साहब को कहना शुरू कर दिया था कि दफ्तर में दो दो गाड़ियां होते हुए वो सब्जी लेने रिक्शा में जाते हैं तो क्या ये अच्छा लगता है? ये उनकी शान के खिलाफ है. एक दो बार वो डरते डरते गाडी लेकर बाज़ार गए, देखा कुछ नहीं हुआ तो हौसला खुल गया. अब वो अपने पूरे परिवार के साथ आकाशवाणी की गाड़ियों का भरपूर ज़ाती इस्तेमाल करने लगे. एक ईमानदार अफसर धीरे धीरे एक करप्ट अफसर में तब्दील हो रहा था. आटे में नमक जितनी बेईमानी तो सभी जगह चल जाती है लेकिन हमारे साहब इससे बहोत आगे निकल रहे थे. मैंने इन्हीं के बारे में इस किताब में एक जगह लिखा है कि स्टाफ के रिक्रूटमेंट में इन साहब ने लाखों रुपये की घूस लेकर ऐसे लोगों को भर लिया जो उन कुर्सियों के कतई हक़दार नहीं थे. जाने लोग इतिहास से कोई सबक क्यों नहीं लेते ? इतिहास भरा पडा है ऐसे लोगों के कारनामों से और उसके बाद उनके अंजाम से. इस तरह के किरदार के लोगों को आखिरकार अपने किये हर ऐसे काम की भारी कीमत चुकानी पड़ती है और इन साहब को भी चुकानी पड़ी. जब दूरदर्शन जयपुर के डायरेक्टर थे, घूस के एक केस में पकड़े गए और रिटायरमेंट से कुछ ही दिन पहले सस्पैंड कर दिए गए.





Sunday, October 8, 2017

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग-३९ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)

रेडियोनामा पर महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला ‘कैक्‍टस के मोह में बिंधा एक मन’ पिछले कुछ समय ये स्‍थगित थी। इस रविवार से इसे फिर शुरू किया जा रहा है। हर रविवार इसके अंक प्रकाशित किये जायेंगे। 


पिछली सभी कडियां पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए। 




मैं रेडियो जाने लगा था. हालांकि आकाशवाणी, बीकानेर पर अभी नाटक की शुरुआत नहीं हुई थी लेकिन कभी कोई रूपक, कभी कोई संगीत रूपक कभी कोई और छोटा मोटा प्रोग्राम रिकॉर्ड होने लगा था. कभी वैसे ही प्रोग्राम हैड महेंद्र भट्ट साहब बुला लिया करते थे. वो मुझसे कहते थे कि मुझे रेडियो ही ज्वाइन करना चाहिए क्योंकि मेरी आवाज़ रेडियो के लिए ही बनी है. मन ही मन में मुझे भी यही लग रहा था लेकिन अपने पहले ही रूपक की रिकॉर्डिंग के वक़्त जिस तरह लोगों को जलते हुए देखा, मैं अब भी ज़रा पशोपेश में था कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि रेडियो में आकर पूरी ज़िंदगी मैं लोगों की जलन का ही शिकार होता रहूँ और माइक्रोफोन के सामने बोलने से दिल को जो तस्कीन मिलती है वो बाकी वक़्त के लड़ाई झगड़ों की भेंट चढ़ जाए.
वक़्त गुज़रता रहा. मेरी नीम हकीमी चल रही थी और एकाध ट्यूशन भी. इसी बीच एक रोज़ लक्ष्मी चन्द शर्मा जी ने घर आकर कहा कि भट्ट जी ने बुलाया है. मैं आकाशवाणी पहुंचा. भट्ट जी बहोत खुश होकर बोले “आओ आओ महेंद्र, मैं तुम्हें ही याद कर रहा था.”
मैंने कहा, “जी फरमाएं......... क्या हुकुम है मेरे लिए?”
“बताता हूँ..... बताता हूँ....... पहले ये बताओ जल्दी में तो नहीं हो न?”
“जी नहीं”
“ लंच का वक़्त हो रहा है, घर चलते हैं, वहीं आराम से बात होगी.”
“ जी जैसा आप ठीक समझें.”
दफ्तर के सामने ही उनका घर था. हम घर में घुसे तो मधु भाभी जी ने हमारा स्वागत किया. मैं इंतज़ार कर रहा था कि भट्ट साहब कब वो बात शुरू करते हैं जिसके लिए उन्होंने मुझे तलब किया है. भट्ट साहब के घर में एक बड़ा सा हॉल था जिसे वो ड्राइंग रूम के काम में भी लेते थे और एक तरफ डाइनिंग टेबल लगी हुई थी. हम दोनों हॉल में घुसे तो देखा एक दुबला सा लड़का एक किनारे बैठा हुआ गिटार बजा रहा है. भट्ट साहब ने मेरा परिचय करवाया “ये महेंद्र मोदी हैं, मेरे दोस्त. रेडियो के ड्रामा के कलाकार हैं और इनकी आवाज़ से मुझे ये लगता है कि ये जल्दी ही रेडियो में हमारे साथी बनने वाले हैं और महेंद्र, ये मेरा छोटा भाई है विश्व मोहन. गिटार सीख रहा है.” हम दोनों ने हाथ मिलाये. मुझे कहाँ पता था कि जिस दुबले पतले लड़के से मैं हाथ मिला रहा हूँ वो आने वाले वक़्त की भारी भरकम शख्सियत है , जिसे लोग एहतराम से पंडित विश्व मोहन भट्ट के नाम से जानेंगे, जिनका ईजाद किया मोहन वीणा पूरी दुनिया में मशहूर होगा और जिन्हें दो-दो बार ग्रैमी अवॉर्ड के साथ साथ न जाने दुनिया भर के कितने अवॉर्ड्स देकर ज़माना फख्र महसूस करेगा. विश्व मोहन जी मेरे हमउम्र हैं, लेकिन उस रोज़ चूंकि उनके बड़े भाई ने अपने दोस्त के तौर पर मेरा उनसे परिचय करवाया था, वो मुझे अब तक वही सम्मान और प्यार देते रहे हैं.


विश्वमोहन जी की बात चली है तो एक घटना याद आ गयी 1993-1994 की, पहले वो सुना देता हूँ. मैं आकाशवाणी, उदयपुर में पोस्टेड था. हमारे डायरेक्टर हुआ करते थे श्री रतन सिंह हरयाणवी. बहुत ही सज्जन और मुहज्ज़ब लेकिन बहुत निश्छल और सरल भी. अपनी सरलता और निश्छलता में कभी कभी कोई बात बिना किसी लाग लपेट के इतने सीधे शब्दों में कह जाते थे कि सुनने वाला हक्का बक्का रह जाता था. हुआ ये कि विश्व मोहन जी उदयपुर आये थे किसी प्रोग्राम के लिए. एक फाइव स्टार होटल में रुके हुए थे. कुछ कलाकार उनसे मिलने गए तो आकाशवाणी की बात चल पडी और उसी बातचीत के दौरान उन्हें पता लगा कि मेरी पोस्टिंग आकाशवाणी उदयपुर में है. उनका मन हुआ कि मुझसे मिला जाए. उन दिनों मोबाइल फोन तो आये नहीं थे. संपर्क का साधन महज़ लैंड लाइन के फोन ही हुआ करते थे. उन्होंने डायरेक्टरी उठाई, आकाशवाणी के डायरेक्टर का फोन नंबर देखा और अपने कमरे में लगे फोन से वो नम्बर घुमा दिया. डायरेक्टर साहब की पी ए शारदम्मा जी कहीं इधर उधर टहल रही थीं. घंटी बजी तो हरयाणवी साहब ने ही फोन उठाया और बोले, “हलो........”
विश्वमोहन जी बोले, “आकाशवाणी से बोल रहे हैं?”
“जी हाँ, फरमाइए आप कौन बोल रहे हैं?”
“ जी मेरा नाम विश्व मोहन भट्ट है.”
उन्हीं दिनों उन्हें ग्रैमी अवॉर्ड मिला था इसलिए हर तरफ उनकी नाम के चर्चे थे. ज़ाहिर है हरयाणवी साहब ने भी उनका नाम सुन ही रखा था. वो तुरंत बोले, “विश्व मोहन जी.... वो गिटार वाले?”
“ जी हाँ, गिटार वाला. मुझे ज़रा महेंद्र मोदी जी से बात करवा सकते हैं क्या? वो मेरे बड़े भाई  के दोस्त हैं.”
“ हाँ ज़रूर......... कैसे ? रिकॉर्डिंग करवाना चाहते हैं क्या?” अपनी सरलता में हरयाणवी साहब कह गए बिना ये सोचे कि इतना बड़ा कलाकार जिसके पीछे रिकॉर्डिंग के लिए दुनिया भर के स्टेशंस के लोग रिकॉर्डर लिए लिए घूमते हैं, क्या वो कलाकार आगे होकर ये कहना चाहेगा कि मुझे आपके स्टेशन पर रिकॉर्डिंग करवानी है? विश्वमोहन जी ने कोई जवाब नहीं दिया और फोन काट दिया. अब हरयाणवी साहब को लगा कि कुछ गड़बड़ हुई है. उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलवाया. मैं जैसे ही कमरे में घुसा कि बोले, “यार वो गिटार बजाते हैं ना विश्व मोहन भट्ट, उनका फोन आया था. तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे, फिर पता नहीं क्या हुआ कि अचानक फोन काट दिया.”
“अच्छा वो उदयपुर आये हुए हैं क्या? क्या कह रहे थे? कहाँ रुके हुए हैं ? पूरी बात बताइये ना?”
“यार ये सब तो पूछा नहीं मैंने. उन्होंने तो अचानक ही फोन काट दिया.”


मुझे लगा कि कुछ तो गड़बड़ हुई है. मैं हरयाणवी साहब की सरलता से अच्छी तरह  वाकिफ था. मैंने कहा, “सर आप पूरी बात बताइये. आपने उनसे क्या बोल दिया? विश्वमोहन जी बहोत सीधे सादे आदमी हैं, तुनक मिज़ाज बिलकुल नहीं. वैसे ही वो फोन नहीं काट सकते. आपके मुंह से कुछ ऐसा ज़रूर निकला होगा जो उन्हें बुरा लग गया.”
“ अरे यार मैंने ऐसा तो कुछ भी नहीं कहा. उन्होंने तुम्हारे बारे में पूछा और कहा कि तुम उनके बड़े भाई के दोस्त हो, मैंने कहा हाँ बात करवाता हूँ,फिर मैंने वैसे ही पूछ लिया........ क्या रिकॉर्डिंग करवाना चाहते हैं क्या ? और तो कुछ भी नहीं कहा मैंने. बस उन्होंने तो फोन काट दिया.”
मैंने अपने सर पर हाथ मारते हुए कहा, “आप भी कभी कभी कमाल ही कर देते हैं सर. अरे इतने मशहूर कलाकार. युवा पीढी तो उनके पीछे पागल है आज. लोग रिकॉर्डर लेकर उनके पीछे पीछे घूमते हैं कि वो उनके लिए थोड़ा सा कुछ बजा दें तो वो धन्य हो जाएँ और आप हैं कि उनसे पूछ रहे हैं कि रिकॉर्डिंग करवाना चाहते हैं क्या?बुरा नहीं मानेंगे तो क्या मानेंगे?”
“सॉरी यार मेरा ऐसा कोई मतलब नहीं था. मुझे तो लगा कि कोई कलाकार अगर आगे होकर फोन कर रहा है तो रिकॉर्डिंग ही करवानी होगी.”
“आपने बहोत गड़बड़ कर दी सर. उनके बड़े भाई महेंद्र भट्ट जी मेरे दोस्त थे. उस नाते वो मुझे बहोत इज्ज़त देते हैं. मैं पता करता हूँ कि कहाँ रुके हैं वो और फिर उनके पास जाता हूँ.”
“हाँ यार तुम देखो और यहाँ लाने की कोशिश करो. मैं माफी मांग लूंगा उनसे और हाँ उनकी एक रिकॉर्डिंग भी कर ही लेंगे.”
मैंने दोनों हाथ जोड़ते हुए उनसे कहा, “हाँ सर मैं जाता हूँ उनके पास लेकिन मैं हाथ जोड़ता हूँ आपको, बरायेमेहरबानी आप उनके सामने रिकॉर्डिंग का तो नाम भी मत लेना.”
“अच्छा अच्छा यार, मैं कुछ भी नहीं बोलूंगा.”
मैंने एक दो कलाकारों को फोन किया तो पता चल गया कि विश्व मोहन जी कहाँ रुके हुए हैं. मैंने फोन करके कहा, “हाज़िर होना चाहता हूँ आपके पास.”
 बहोत खुश होकर बोले, “हाँ हाँ ज़रूर आइये ना, मैंने तो आपसे मिलने के लिए ही आकाशवाणी फोन किया था लेकिन..........”
इतने अच्छे और सज्जन इंसान कि किसी की बुराई उनके मुंह से निकलती ही नहीं, कैसे कहें कि उनके साथ क्या हुआ? मैं उनकी दुविधा को भांप गया. फ़ौरन उनके लेकिन बोलते ही बोल पड़ा, “जी मुझे पता चल गया सब कुछ. मैं मआज़रत करता हूँ उस सबके लिए. बहरहाल मैं हाज़िर हो रहा हूँ अभी.”


मैं उनके होटल पहुंचा और उन्हें कहा, “हमारे डायरेक्टर साहब बहोत ही अच्छे इंसान हैं, बिलकुल निश्छल और निष्कपट, बिलकुल बच्चों की तरह. आप प्लीज़ बुरा मत मानिए उनकी बात का. आकाशवाणी चलिए.”
“आपसे मिलने के लिए ही मैंने तो फोन किया था. अब आपसे मुलाक़ात तो हो ही गयी. अब आकाशवाणी चलकर भला क्या करूंगा?”
“अगर आप नहीं चलेंगे तो हमारे डायरेक्टर साहब यही मानेंगे कि आपने उन्हें माफ़ नहीं किया है. तब वो खुद यहाँ आयेंगे आपसे माफी मांगने.”
“अरे नहीं नहीं महेंद्र जी, वो हमारे बुज़ुर्ग हैं, भला ये अच्छा लगेगा कि वो मुझसे माफी मांगने यहाँ आयें?”
“तो फिर तैयार हो जाइए और चलिए मेरे साथ. और हाँ आप जैसे कलाकार हमारे शहर में आयें और हमारे स्टेशन पर उनकी रिकॉर्डिंग हम ना कर पायें तो यहाँ रेडियो स्टेशन के होने का अर्थ ही क्या है?”

“ठीक है चलता हूँ मैं लेकिन माफ़ करें, मैं रिकॉर्डिंग नहीं करवाऊँगा.... आप खुद सोचिये, इतना सब होने के बाद क्या ये अच्छा लगेगा कि मैं वहाँ रिकॉर्डिंग करवाऊं?”
मैंने हँसते हुए कहा, “भट्ट साहब, आकाशवाणी उदयपुर के लिए रिकॉर्डिंग करवाने का आपका मन नहीं कर रहा तो मैं ज़बरदस्ती नहीं करूंगा लेकिन मैं आपका बहोत वक़्त से इंतज़ार कर रहा था. मैं अभी यहाँ कुछ वक़्त पहले आया हूँ और मैंने नाटक का प्रोडक्शन शुरू किया है. मेरी दिक्क़त ये है कि मेरे पास नाटकों में देने के लिए बैकग्राउंड म्यूज़िक की बहोत कमी है. मैं चाहता हूँ कि आप अपनी मोहन वीणा पर कुछ अच्छे अच्छे कट्स रिकॉर्ड करवा दें जिन्हें मैं नाटकों में काम ले सकूं.”
कोई और कलाकार होता तो इस तरह की दुर्घटना के बाद रिकॉर्डिंग के लिए कभी तैयार नहीं होता लेकिन विश्व मोहन भट्ट जी ने मुस्कुराकर फ़ौरन अपनी मोहन वीणा उठाई और मेरे साथ रवाना हो गए.

आकाशवाणी पहुंचे तो मैं उन्हें सीधे हरयाणवी साहब के कमरे में ले गया. हरयाणवी साहब ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और दोनों हाथ जोड़कर कुछ इस तरह माफी माँगी कि विश्वमोहन जी को कहना पड़ा, “सर क्या कर रहे हैं आप? मैं तो आपके बच्चों की तरह हूँ. इस तरह माफी मांगकर मुझे शर्मिन्दा ना करें.”
हम लोग काफी देर तक हरयाणवी साहब के कमरे में बैठे रहे. दुनिया जहान की बातें हुईं. हरयाणवी साहब से बात कर, विश्व मोहन जी के मन का सारा मैल धुल गया. उसके बाद तो उन्होंने बहोत मन से मेरे नाटकों के लिए बैकग्राउंड म्यूज़िक भी रिकॉर्ड करवाया और केंद्र के लिए शास्त्रीय संगीत भी.
तो........... वही विश्व मोहन भट्ट जी, हवाइन गिटार को एक नया रूप देकर हिदुस्तानी क्लासिकल का एक शानदार साज़ बना देने वाले, दो दो बार ग्रैमी अवॉर्ड जीतने वाले विश्वमोहन भट्ट जी, अपने बड़े भाई महेंद्र भट्ट जी के हॉल के एक कोने में गिटार लेकर बैठे थे, जब मैं उनके घर पहुंचा. भाभी जी ने टेबल पर खाना लगाया. मुझे भी भट्ट साहब के साथ खाना खाने बैठना ही पड़ा. अब भट्ट साहब ने बात शुरू की. बोले, “देखो महेंद्र, मैं परसों जयपुर से आया हूँ. हालांकि ये सब कुछ ऑफिशियल सीक्रेट है लेकिन फिर भी मैं तुम्हें बता रहा हूँ. जल्दी ही आकाशवाणी ट्रांसमीशन एक्जीक्यूटिव की वैकेंसीज़ निकाल रहा है. तुम इसके लिए ज़रूरी सारी शर्तें पूरी करते हो. अभी तय नहीं है कि खाली इंटरव्यू होगा या रिटन एग्जाम भी होगा लेकिन तुम अभी से रेडियो से जुड़ी जितनी भी जानकारियाँ हैं उन्हें इकट्ठा करना शुरू कर दो, कुछ अच्छा साहित्य पढ़ो और जनरल नॉलेज एवं करैंट अफेयर्स की स्टडी शुरू कर दो ताकि अगर रिटन एक्ज़ाम हो तब भी ठीक है और सिर्फ इंटरव्यू हो तब भी ठीक.”

मुझे लगा इसमें कहीं भाषा का, आवाज़ का या माइक्रोफोन का तो कोई ज़िक्र ही नहीं आया. ये कैसा इम्तहान होगा जिसमें मेरी आवाज़, मेरी भाषा का कोई रोल नहीं होगा? फिर मैं करूंगा क्या आखिर रेडियो स्टेशन में? मैं यही सब सोच रहा था कि भट्ट साहब मुस्कुराकर बोले, “मुझे पता है महेंद्र तुम क्या सोच रहे हो?”
“जी..........जी.........”
“तुमने नवतरंग प्रोग्राम किया था, उस रोज़ वहाँ एक साहब मिले थे ने तुम्हें तुलसियानी जी.”
“जी हां”
“ ये वही पोस्ट है. वो अनाउन्सर को सुपरवाइज़ करते हैं.”
“ लेकिन वो खुद तो माइक्रोफोन पर नहीं बोलते?”


“ बिलकुल सही कहा तुमने. वो माइक्रोफोन पर नहीं बोल सकते . सबसे पहली बात ये कि वो हिन्दीभाषी नहीं हैं. उनके पास आवाज़ तो हो सकती है , लेकिन ना भाषा है  और ना ही उच्चारण. रेडियो की भाषा में वो रेडियो पर हिन्दी में बोलने के लिए अप्रूव्ड नहीं हैं. तुम्हारे पास तो सब कुछ है, अच्छी आवाज़ भी, अच्छा तलफ्फुज भी और अच्छी भाषा भी.तुम तो ड्रामा के लिए अप्रूव्ड भी हो और जो इंसान ड्रामा में अप्रूव्ड होता है, रेडियो के किसी भी प्रोग्राम में बोल सकता है........तो तुम चाहे किसी भी कुर्सी पर बैठो तुम्हें रेडियो पर बोलने से कोई नहीं रोक सकता. बस एक ही दिक्क़त है.”
“ जी वो क्या?”


“ अनाउंसर्स समझते हैं कि रेडियो पर बोलना सिर्फ उनका अधिकार है, इसलिए तुम्हें हर क़दम पर अनाउंसर कौम की दुश्मनी झेलनी होगी. मेरा जितना तजुर्बा है उसकी बिना पर मैं कह सकता हूँ कि तुम ट्रांसफर होकर जहां जहां भी जाओगे, बहुत कम अनाउंसर मिलेंगे जिनके पास तुम्हारे जैसी आवाज़ होगी....... यानी हर जगह ही अनाउंसर तुम्हारे दुश्मन बन जायेंगे.”
“ सर आप मुझे जॉब दिलवा रहे हैं या डरा रहे हैं? ”
“ देखो डियर मैं तुम्हें कुछ हकीक़तें बता रहा हूँ रेडियो की.”
“ तो सर फिर मैं ट्रांसमीशन एक्जीक्यूटिव बनूँ ही क्यों? क्यों न मैं अनाउंसर के लिए ही कोशिश करूं?”


वो ज़ोर से ठहाका लगाते हुए बोले, “हाँ , मुझे पता था कि तुम यही कहोगे लेकिन तुम्हें मालूम है, जो अनाउंसर की पोस्ट पर लगता है वो उसी पोस्ट पर रिटायर हो जाता है जबकि आज जो हमारे डायरेक्टर जनरल दिल्ली में बैठते हैं और आकाशवाणी की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे हैं, उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी की शुरुआत ट्रांसमीशन एक्जीक्यूटिव की पोस्ट से ही की थी. मुझे पता है, तुम्हारे अन्दर इन दोनों पोस्ट्स पर सलेक्ट होने की काबलियत है और दोनों के लिए तुम्हें मौके भी मिलेंगे, अब ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम अनाउंसर बनकर ये आकाशवाणी बीकानेर है का राग अलापते अलापते पूरी ज़िंदगी गुज़ार दो या फिर दुश्मनियों की परवाह न करते हुए, ट्रांसमीशन एक्जीक्यूटिव की पोस्ट ज्वाइन कर नए नए चैलेंजेज को मंज़ूर करो. माइक पर बोलने की काबलियत को तो कोई तुमसे छीन नहीं सकता.”
“ जी अच्छा....... मैं अप्लाई करूंगा जैसे ही पोस्ट निकलती है.”
खाना हो चुका था. हम  लोग घर से बाहर निकले. मैंने भट्ट साहब को प्रणाम कहा और घर आ गया. स्टेट लायब्रेरी का बरसों से मेंबर था और क़रीब क़रीब रोज़ाना थोड़ी देर लायब्रेरी में जाकर बैठा करता था. अब मैंने वहाँ बैठने का अपना वक़्त थोड़ा बढ़ा दिया.
कुछ ही दिनों बाद ट्रांसमीशन एक्जीक्यूटिव की पोस्ट निकली. मैंने अप्लाई कर दिया. इधर यू पी एस सी की सिविल सर्विसेज की वैकेंसीज़ भी निकली, उसमे भी फॉर्म भर दिया. कुछ ही दिन बाद आकाशवाणी, जयपुर  ने अनाउन्सर की वैकेंसीज़ निकाली तो मैं सोच में पड़ गया कि फॉर्म भरूं या नहीं? 6-7 साल पहले जो पोस्ट मंजुरुल अमीन साहब और विश्वम्भर नाथ तिलक साहब ने प्लेट में रखकर ऑफर की थी और मैंने उसे स्वीकार नहीं किया था, क्या अब उसी पोस्ट के लिए मुझे अर्ज़ी देकर क्यू में खड़ा होना होगा ? 1974 में मेरा एम् ए हो गया था.तब से क़रीब एक साल गुज़र चुका था. हालांकि नीम हकीमी और ट्यूशन की बदौलत मैं अच्छा खासा कमा रहा था फिर भी था तो बेरोज़गार ही. मैं फिर जा पहुंचा महेंद्र भट्ट साहब के पास ये सलाह लेने कि अनाउंसर की पोस्ट के लिए फॉर्म भरूं या नहीं?


उन्होंने बड़ी शान्ति से मेरी बात सुनी और बोले, “ देखो महेंद्र, जो गुज़र चुका सो तो गुज़र चुका. तुमने अगर तब अनाउन्सर की पोस्ट पर ज्वाइन कर लिया होता तो आज तुम्हारी 6-7 साल की नौकरी हो चुकी होती लेकिन ये भी तो सोचो कि अगर किसी वजह से तुम नौकरी में आने के बाद पढाई न कर पाते तो हायर सैकेंडरी पास ही रह जाते. बीती बातों को छोडो. अभी तो जो भी वैकेंसीज़ सामने आये अप्लाई करते जाओ. सलेक्शन होने के बाद किस जगह ज्वाइन करना है, ये तय करना तो तुम्हारा हक़ होगा, उसे तुमसे कोई थोड़े ही छीन सकता है ?”
मैंने अनाउन्सर की पोस्ट के लिए अप्लाई कर दिया. कस्टम्स में इंस्पेक्टर की पोस्ट निकली, उसमें भी फॉर्म भर दिया, बैंक ऑफ इंडिया में क्लर्क की पोस्ट के लिए भी फॉर्म भर दिया और इन्वेस्टिगेटर की एक पोस्ट निकली वहाँ भी अप्लाई कर दिया यानी जहां भी जो भी पोस्ट थोड़ी ठीकठाक दिखाई देती, मैं अप्लाई करता चला गया.

बैंक ऑफ इंडिया के रिटन इम्तेहान में पास हो गया. इंटरव्यू दे दिया. इन्वेस्टिगेटर के इम्तहान को भी पास कर लिया. कस्टम्स का इम्तेहान भी दे दिया. इसी बीच सिविल सर्विसेज़ के प्रिलिम्नरी इम्तेहान की तारीख़ आ गई . इम्तेहान देने जयपुर जाना था. मैं जयपुर के लिए रवाना होने ही वाला था कि आकाशवाणी से ट्रांसमीशन एग्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए इंटरव्यू की तारीख़ भी आ गयी. इत्तेफाक कुछ ऐसा हुआ कि सिविल सर्विस का  पेपर उसी तारीख़ को था जिस दिन आकाशवाणी में मेरा इंटरव्यू था. अब मैं सोच में पड़ गया कि दोनों में से कौन सा इम्तेहान मैं दूं और कौन सा छोड़ूँ?


विधि के लेख भी बड़े निराले होते हैं. इंसान चाहे चाँद पर पहुंच जाए चाहे मंगल पर, लेकिन  वो विधि के लेख को नहीं पढ़ सकता. बड़े बड़े ज्योतिषी, बड़े बड़े भविष्य वक्ता, बड़े बड़े नजूमी हुए हैं. उन्होंने इंसान के भाग्य की लकीरों को पढने के बड़े बड़े दावे भी किये हैं मगर क्या सचमुच कोई सौ प्रतिशत पढ़ पाया है हाथ की लकीरों को?जी नहीं. मैं इधर पशोपेश से रूबरू था कि दो इम्तेहानों में से कौन सा दूं और कौन सा छोड़ूँ? मुझे कहाँ पता था कि तारीख का ये क्लैश बिला वजह ही नहीं हो रहा था . विधि इसी के बहाने मेरा आगे का रास्ता तय कर रही थी. मुझे कहाँ पता था कि ये क्लैश ही मेरे रेडियो में आने की वजह बनेगा.

मैंने तय किया कि मैं दोनों इम्तेहान देने की कोशिश करूंगा. सिविल सर्विस के इम्तेहान की तारीख़ तो तय थी लेकिन आकाशवाणी पर इन्टरव्यू तो एक दिन में खतम होने के बहोत कम इम्कान थे. तो....... क्यों न उसकी तारीख़ बदलवाने की जुगत की जाए? मैं जयपुर तीन चार दिन पहले ही पहुँच गया था. अपने दोस्त महेश श्रीमाली के साथ रुका था. अगले दिन सुबह ही सुबह आकाशवाणी जा पहुंचा. श्री के बी शर्मा, डॉक्टर जे के दोषी जैसे कुछ दोस्त लोग थे. जगत चाचा सत्य नारायण अमन जी भी वहीं थे. सबसे मिलकर अपनी दिक्क़त बयान की तो सबने कहा “डायरेक्टर श्री जे डी बवेजा थोड़े कड़क ज़रूर हैं मगर बहोत अच्छे इंसान हैं. तुम उनसे मिलकर अपनी दिक्क़त उन्हें बताओ वो इंटरव्यू की तारीख़ ज़रूर बदल देंगे क्योंकि इंटरव्यू चार पांच दिन तक चलने वाले हैं. उनसे मिलने के लिए तुम्हें उनके पी ए बालिन्द्रन से मिलना होगा. वो तुम्हें बताएँगे कि मुलाकात कितनी देर में हो सकती है ?”

मैं जा पहुंचा डायरेक्टर साहब के पी ए श्री बालिन्द्रन के कमरे में. वो फोन पर किसी से बात कर रहे थे. मैं इंतज़ार करने लगा कि वो फोन रखें तो मैं बात करूं. न उन्होंने फोन रखा न मुझे बैठने को कहा. मुझे बड़ा बुरा लग रहा था कि मैं उनकी छोटी सी टेबल के सामने खडा था और वो मलयालम में फोन पर किसी से बतियाये जा रहे थे. मैं कमरे के बाहर आकर खडा हो गया कि वो फोन पर अपनी बात ख़तम कर लें तो बात करूं. बाहर आकर देखा, पास वाले कमरे के बाहर डायरेक्टर श्री जे डी बवेजा के नाम की तख्ती लगी हुई थी. ओह..... तो ये है बवेजा साहब का कमरा. ऊपर एक लाल रंग का बल्ब जल रहा था जैसा कि स्टूडियो के बाहर जलता है, जब स्टूडियो लाइव होता है. तभी बालिन्द्रन साहब की बात ख़तम हुई, मैं उनके कमरे में घुसा, उन्होंने मेरी तरफ नज़र भी नहीं डाली और एक फ़ाइल उठाकर बाहर की तरफ चल पड़े. मैं ज़रा जोर से बोला, “सुनिए सुनिए मिस्टर बालिन्द्रन......”
 मगर वो रुके नहीं चलते चलते ही बोले, “वेट..... डायरेक्टर साहब के पास जा रहा हूँ. यू वेट हियर.” मैं देखता रह गया और वो डायरेक्टर साहब के कमरे में घुस गए. आधे घंटे बाद वो वहाँ से अपने कमरे में आये.
मैंने कहा, “मुझे डायरेक्टर साहब से पांच मिनट के लिए मिलना है.”
वो तुनक कर बोले, “सॉरी..... वो बिजी हैं.”
“कितनी देर में हो सकती है मुलाक़ात ?”
“मैं अभी कुछ नहीं बता सकता. वो बहोत बिजी हैं.”
“अच्छा मैं इंतज़ार करूंगा.”

“जैसी आपकी मर्जी. लेकिन क्यों मिलना है आपको? क्या काम है उनसे?”
मैंने उन्हें बताया कि जिस दिन मेरा यहाँ इंटरव्यू है उसी दिन मेरा एक और इम्तहान है, मुझे इंटरव्यू की तारीख़ बदलवानी है. उन्होंने फिर एक फ़ाइल उठाई और “वेट हियर” कहते हुए डायरेक्टर साहब के कमरे में घुस गए. थोड़ी देर बाद लंच हो गया. पूरा दफ्तर लंच के डिब्बे खोल खोलकर खाने पर टूट पडा. माहौल में हर तरफ तरह तरह की खुशबुएँ तैरने लगीं. मैं डायरेक्टर साहब के कमरे के बाहर ही खडा रहा. भूख मुझे भी लगी थी लेकिन मुझे लग रहा था, कहीं ऐसा न हो कि मेरा बुलावा आ जाए और मैं यहाँ न मिलूँ. बालिन्द्रन भी अपने कमरे के दरवाज़े को उढका कर लंच करने लगे. डायरेक्टर साहब के कमरे पर लगी लाल बत्ती अभी भी जल रही थी. मैं सोच रहा था कि जब डायरेक्टर साहब का पी ए जो कि एक मामूली कर्मचारी होता है, इतना भाव खा रहा है तो फिर ये डायरेक्टर साहब तो पता नहीं कैसे पेश आयेंगे. एक बार तो मन हुआ, चलो यार यहाँ से निकल चलो. इन तिलों में तेल नहीं है. और कई जगह अप्लाई किया हुआ है, कई जगह सलैक्शन भी हुआ पडा है, कहीं और नौकरी करेंगे. रेडियो में अपना दाना पानी नहीं है. लेकिन फिर के बी शर्मा जी, डॉक्टर दोषी और चाचा जी की बात याद आई कि डायरेक्टर साहब बहोत अच्छे इंसान हैं. मेरे पाँव आगे बढ़ते बढ़ते रुक गए. मन किया, इन्हें भी देख ही लिया जाय आज.
थोड़ी देर में बालिन्द्रन अपने कमरे से निकलकर बिना मेरी ओर देखे फिर डायरेक्टर साहब के कमरे में घुस गए. अब मेरा खून थोड़ा गरम होने लगा था. मैंने सोचा, ऐसा क्या ज़रूरी है कि रेडियो की ही नौकरी की जाए? लेकिन नहीं...... नौकरी न मिले तो न मिले यहाँ मैं हर हालत में डायरेक्टर साहब से तो मिलकर ही जाऊंगा. जैसे जैसे वक़्त गुज़रता जा रहा था मेरा खून और गरम होता जा रहा था. मुझे डायरेक्टर साहब के कमरे के बाहर खड़े चार घंटे से ज्यादा गुज़र चुके थे. बालिन्द्रन अभी उनके कमरे में घुस रहे थे और कभी बाहर आ रहे थे. आखिर मेरे सब्र का पैमाना छलक उठा. बालिन्द्रन एक फ़ाइल लेकर डायरेक्टर साहब के कमरे से निकले और दरवाज़े पर ही फ़ाइल खोलकर कुछ देखने लगे. मैं उनके करीब गया और बोला, “ मुझे चार घंटे से ज़्यादा हो गए हैं इंतज़ार करते करते. अब आप मुझे डायरेक्टर साहब से मिलने दीजिये.”

वो झुंझलाकर बोले, “आपको दिखाई नहीं दे रहा लाल बत्ती जल रही है, इसका मतलब बहोत बिजी हैं वो. मैं आपको नहीं मिलवा सकता उनसे. आपके इंटरव्यू की तारीख़ नहीं बदल सकती. जाइए आप को दोनों में से कौन सा इम्तहान देना है ये आप तय कीजिये और दूसरा छोड़ दीजिये.”
इतना सुनना था कि मैं चिल्लाया, “ये मेरा हक है कि मैं दोनों इम्तहान दूं, आप कौन होते हैं ये फैसला करने वाले कि मैं एक इम्तहान दूं या दो?”

और गुस्से में मेरा हाथ उठा और मैंने बालिन्द्रन को एक ज़ोरदार धक्का दिया. दुबला पतला सा इंसान, मेरे धक्के को सहन नहीं कर पाया और इधर वो धडाम से नीचे गिरा और उधर मैंने भड़ाम से डायरेक्टर साहब के कमरे का दरवाज़ा खोला और अन्दर जा घुसा. मुझे लगा इस भड़ाम की आवाज़ से जो भी डायरेक्टर साहब होंगे, उछलकर खड़े हो जायेंगे और मुझे कहेंगे, “निकलो मेरे कमरे से और आइन्दा कभी आकाशवाणी की तरफ रुख करने की भी हिम्मत मत करना.” फिर मन में सोचा, होने दो, आज ये भी होने दो, नौकरी ये नहीं तो कोई और सही. पूरी दुनिया रेडियो की नौकरी से ही तो पेट नहीं भरती.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. दरवाज़ा मेरे पीछे बंद हो गया और मैंने सामने की तरफ देखा, काले मोटे फ्रेम का चश्मा पहने एक गोरे चिट्टे सज्जन फ़ाइल खोले मेज़ के उस तरफ एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठे हैं. उछलकर खड़े होना तो दूर की बात है, वो चौंके भी नहीं. हल्की सी मुस्कराहट उनके चेहरे पर आई और उनकी भारी गंभीर आवाज़ फिजा में गूँज उठी, “क्या हुआ यंगमैन.....इतने गुस्से में क्यों हो?”

कहाँ तो मैं गुस्से से भरा हुआ धड़धड़ाता हुआ अन्दर घुसा था, लेकिन उस शख्सियत को देख कर, उनकी आवाज़ सुनकर मेरी सिट्टी पिट्टी एकदम गुम हो गयी थे. मैं खुद सुन रहा था, मेरे मुंह से सिर्फ इतना सा निकला, “जी सर........ वो........वो......वो..........”
उन्होंने हल्की हंसी के साथ सामने रखी कुर्सियों की तरफ इशारा करते हुए कहा, “बैठो” और  कॉलबैल  बटन दबाया. मैं पसीने से तरबतर कुर्सी पर बैठा. अन्दर के दरवाज़े से एक चपरासी घुसा. उन्होंने पाने लाने का इशारा किया. चपरासी ने फ़ौरन पानी का ग्लास लाकर मेरे सामने रख दिया. गटागट मैं पूरा पानी पी गया.
जैसे ही मैंने ग्लास खाली करके टेबल पर रखा, वो साहब बोले, “हाँ....... अब बताओ क्या बात हुई? क्यों इतना नाराज़ हो रहे थे मेरे पी ए पर?”

मैंने अपने आप पर काबू करते हुए उन्हें बताया कि किस तरह मैं चार पांच घंटे से मैं उनसे मिलने के इंतज़ार में खड़ा था और उनके पी ए महोदय मुझे उनसे मिलने नहीं दे रहे थे. जब उन्होंने ये कहा कि मेरे इंटरव्यू की तारीख़ नहीं बदल सकती. मैं दोनों में से कोई एक इम्तहान दूं तो मुझे गुस्सा आ गया. मैंने बालिन्द्रन को मारा नहीं लेकिन जोर से धक्का ज़रूर दे दिया जिससे वो गिर पड़े.

वो मुस्कुराते हुए मेरी बात सुनते रहे. उनकी उस मुस्कराहट को मैं कभी नहीं भूल सकता. बिल्कुल ऐसी ही मुस्कराहट मैंने उनके चेहरे पर १९८३ में उस वक़्त देखी थी जब मैं यू पी एस सी से सलैक्ट होकर प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव बन चुका था, मुझे सिर्फ तंग करने की नीयत से उस वक़्त के डी जी ने यह कहते हुए  मुम्बई पोस्ट कर दिया था कि वो मुझे राजस्थान से चौबीस घंटे की दूरी पर रखना चाहते हैं क्योंकि मेरी वजह से राजस्थान में पॅालिटिक्स बढ़ जाती है.  वो महानिदेशालय में डी डी जी की कुर्सी पर बैठे थे और मैं उनके सामने बैठा उन्हें बता रहा था कि डी जी साहब ने मुझे मुम्बई पोस्ट करने की क्या वजह बताई. वो इसी तरह मुस्कुराकर बोले थे, “तू साला बदमाश भी तो बहोत है.” खैर ये बहोत बाद की बात है. अभी तो मैं उनके पी ए को धक्का मारकर उनके कमरे में घुसा था और उनके सामने घबराया हुआ सा बैठा था. उन्होंने फिर घंटी बजाई, अन्दर से वो फ़ाइल मंगवाई जिसमे हम लोगों के इंटरव्यू के कॉल लैटर्स की कॉपीज़ थीं. मुझसे कॉल लैटर लिया. दोनों में अपने हाथ से तारीख़ बदली अपने दस्तखत किये और इंटरव्यू लैटर मेरे हाथ में रखते हुए बोले, “अब तो खुश ?” मैं उन्हें बहोत बहोत धन्यवाद देते हुए कमरे से बाहर आ गया. मुझे लगा, चाहे इंटरव्यू की तारीख़ बदल दी हो, लेकिन मन में खुन्नस तो पाल ही ली होगी इन साहब ने. चलो बेटा अब नौकरी तो कोई और ही ढूंढो.

Saturday, August 6, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग-३८ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)






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१९७५ का साल पूरे मुल्क में कई ऐसी तब्दीलियाँ लेकर आया, जिन्होंने एक मायने में इतिहास का रुख ही बदल दिया. बांग्ला देश के बनने के साथ ही मिसेज़ इंदिरा गाधी मुल्क में ही नहीं, पूरी दुनिया में एक कद्दावर लीडर के तौर पर उभर रही थीं. रायबरेली में उनसे चुनाव हार चुके समाजवादी लीडर राज नारायण ने मिसेज़ गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनाव जीतने के लिए, सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल और कई दीगर गलत तरीकों का सहारा लेने का इलज़ाम लगाते हुए, एक केस दायर कर दिया.  कभी कट्टर कॉंग्रेसी रह चुके, जय प्रकाश नारायण ने बिहार में १९७४ में मिसेज़ गांधी को उखाड़ फेंकने की गरज से, एक बहुत बड़े आंदोलन की शुरुआत कर दी. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने मिसेज़ गांधी पर लगे बड़े बड़े करप्शन के इल्जामात को तो खारिज कर दिया, मगर बहुत छोटे, मसलन उनकी इलेक्शन मीटिंग्स के दौरान बिजली का इंतजाम बिजली महकमे के मुफ्त में करने जैसे इल्जामों को लेकर, उनके इलेक्शन  को गैरकानूनी करार दे दिया और अपने फैसले में ये हिदायत दे दी कि वो आने वाले छः साल तक कोई चुनाव न लड़ें. राज नारायण, मोरारजी देसाई जैसे बड़े बड़े नेताओं ने पूरे देश में मिसेज़ गांधी के खिलाफ एक ज़बरदस्त तूफ़ान खडा कर दिया.

जस्टिस सिन्हा ने कांग्रेस पार्टी को २० दिन का वक्त दिया, ताकि वो मिसेज़ गांधी की जगह किसी और को अपना लीडर चुन सके और उसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा सकें, मगर कांग्रेस मिसेज़ गांधी की जगह किसी भी नाम पर एकराय नहीं हो पाई. २३ जून १९७५ को मिसेज़ गांधी ने अदालत से स्टे की अपील की, जिसे २४ जून १९७५ को जस्टिस अय्यर की अदालत ने कुछ शर्तों के साथ मंज़ूर कर लिया. २५ जून को जय प्रकाश नारायण ने मिसेज़ गांधी पर इस्तीफा देने के लिए दबाव डालने के लिए, एक ज़बरदस्त आंदोलन शुरू करने का ऐलान कर दिया. उस वक्त राष्ट्रपति थे, श्री फखरुद्दीन अली अहमद, जिन्हें संविधान की धारा ३५२ के तहत किसी भी बाहरी या अंदरूनी खतरे की हालत में इमरजेंसी लागू करने का अधिकार था. २६ जून की सुबह इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, पूरे मुल्क में एमरजेंसी लागू कर दी गयी. उसी सुबह खुद मिसेज़ गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो पर मुल्क के अवाम को खिताब करते हुए इसका ऐलान किया . सारी जेलें बड़े बड़े लीडर्स से भर गईं. यहाँ तक कि स्टूडेंट लीडर्स को भी नहीं बख्शा गया.इन स्टूडेंट लीडर्स में आज के फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली और इंडिया टी वी के मालिक रजत शर्मा भी शामिल थे. कुछ लोग जिन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका, वो रातोंरात अंडर ग्राउंड हो गए. उन अंडर ग्राउंड होने वालों में मेरे छोटे मामा जी भी शामिल थे. पूरे १९ महीने तक वो अंडर ग्राउंड रहे.
एमरजेंसी लागू करना सही था या गलत, ये एक बहस का मुद्दा हो सकता है. ये भी एक बहस का मुद्दा हो सकता है कि मिसेज़ गांधी ने एमरजेंसी का इस्तेमाल अपनी कुर्सी को बचाने के लिए किया या दरअसल हालात ऐसे बन गए थे कि ऐसा करना पड़ा, लेकिन बिला शक ये कहा जा सकता है कि एमरजेंसी लागू होते ही कम अज़ कम एक बार तो मुल्क की पूरी तस्वीर बदल गयी. जिन दफ्तरों में १२ बजे से पहले कोई अफसर कोई अहलकार नज़र नहीं आता था, अब हर इंसान १० बजे दफ्तर पहुँचने की कोशिश करने लगा था. दफ्तरों में काम की स्पीड बढ़ गयी थी. कोई ज़रा सी भी गडबड करने की सोचता, तो उसे एमरजेंसी की वजह से १०० बार सोचना पड़ता था.
इसी दौरान सुना कि आकाशवाणी, बीकानेर में स्टाफ की तादाद बढ़ रही है और उसका दर्जा भी बढ़ रहा है. अब तक कुछ प्रोग्राम दिल्ली और जयपुर से रिले किये जाते थे, कुछ प्रोग्राम के जयपुर से आने वाले टेप्स बजाये जाते थे. यानी सिर्फ फ़िल्मी गानों के प्रोग्राम ही यहाँ से ओरिजिनेट होते थे. सुनने में आया कि अब कुछ प्रोग्राम यहीं तैयार किये जायेंगे. मेरे मोहल्ले के पड़ोस के मोहल्ले में श्री लक्ष्मी चंद शर्मा रहते थे, जो कि मेरे साथ ही ड्रामा के ऑडिशन में पास हुए थे और आकाशवाणी, बीकानेर में क्लर्क थे. ये सारी ख़बरें मुझे उनसे ही मिलती रहती थीं. एक दिन उन्होंने बताया कि जल्दी ही एक प्रोग्राम युववाणी, हफ्ते में दो दिन बीकानेर से शुरू होने वाला है. मैं एक दिन आकाशवाणी के दफ्तर जा पहुंचा. उस दफ्तर में काम करने वाले कई लोगों से तो मैं पहले से ही वाकिफ था.
आकाशवाणी जाकर देखा तो वहाँ कई नई नई शक्लें नज़र आईं. मुझे कहा गया कि युववाणी के लिए मुझे श्री महेंद्र भट्ट, प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव से मिलना चाहिए. मैं जा पहुंचा उनके कमरे में. सांवला सा चेहरा, उस पर पतली तराशी हुई मूंछें और  बड़ी बड़ी आँखें, मैंने नमस्कार किया तो एक भारी सी आवाज़ कमरे में गूज उठी  “नमस्कार, आइये......बैठिये.”
मैं सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया.
वो फिर बोले “क्या नाम है आपका?”
मैंने कहा “जी... महेंद्र..... महेंद्र मोदी.”
“बहुत खूब...... तो नाम एक ही है हम दोनों का......”
मैं बस मुस्कुरा दिया क्योंकि कमरे में घुसने से पहले कमरे के बाहर लगी हुई उनके नाम की तख्ती मैंने देख ली थी.
वो फिर बोले “मेरा नाम महेंद्र भट्ट है, मैं जयपुर का रहने वाला हूँ. वैसे वायलिन का कलाकार हूँ, अभी यू पी एस सी से प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव बनकर आया हूँ. आपके शहर में मेरी पहली पोस्टिंग हुई है.”
मैंने कहा “सर आपका हमारे शहर में बहुत बहुत स्वागत है.”
इस बार, वो हल्का सा मुस्कुराए.
फिर दस सैकंड चुप रहने के बाद बोले, “हाँ तो महेंद्र... बोलिए क्या चाहते हैं आप मुझसे?
मैंने कहा “जी सर.... सबसे पहली बात तो ये है कि मैंने कुछ साल पहले यहाँ से ड्रामा का ऑडिशन पास किया था, लेकिन अब तक मुझे किसी ड्रामा में हिस्सा लेने का मौक़ा नहीं मिला है. कई बार जब यहाँ के लोगों से पूछा तो यही जवाब मिला कि अभी ड्रामा शुरू नहीं हुआ है यहाँ से.....तो....... आप ड्रामा कब शुरू कर रहे हैं? दूसरी बात ये कि मैंने सुना है, आपने यहाँ से युववाणी शुरू किया है तो..... मुझे उसमे भी हिस्सा लेना है.”
वो बोले “हाँ हाँ ज़रूर. आप एक काम कीजिये. बुधवार को शाम साढ़े पांच बजे युववाणी में एक प्रोग्राम होगा, ‘नवतरंग’. उसे सुनिए. उसी तरह की एक स्क्रिप्ट लिखकर लाइए और मुझे दिखाइए. फिर आगे की कार्यवाही की जायेगी. जहां तक ड्रामा का सवाल है, यहाँ के लिए काफी स्टाफ मंज़ूर हो चुका है जिसमे कई प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव भी हैं, म्यूज़िक कम्पोज़र भी हैं और म्यूज़िक के और कई कलाकार भी. तो जब स्टाफ आ जाएगा तो ड्रामा भी शुरू होगा, फीचर भी शुरू होंगे और इनके अलावा और भी कई तरह के प्रोग्राम शुरू किये जायेंगे.”
मैंने कहा “जी बहुत अच्छा. तो.... मैं जल्दी ही स्क्रिप्ट लिखकर फिर हाज़िर होता हूँ.”
वो बोले “अच्छी बात है महेंद्र.”
मैं घर आ गया. बुधवार को मैंने नवतरंग सुना. मैं पेश करने वाले के नाम से समझ गया कि ये प्रोग्राम आकाशवाणी, बीकानेर के अनाउंसर श्री चंचल हर्ष के बेटे ने पेश किया था. आकाशवाणी, बीकानेर से इस प्रोग्राम की बस शुरुआत ही थी. ज़ाहिर है, अभी शहर के लोग नहीं जानते थे कि इस तरह का कोई प्रोग्राम है, जिसे वो भी पेश कर सकते हैं, तो स्टाफ के बच्चों को ही सबसे पहले मौक़ा मिलना था.
मैं दो रोज बाद ही स्क्रिप्ट लिखकर आकाशवाणी के दफ्तर जा पहुंचा. स्क्रिप्ट महेंद्र भट्ट जी को दिखाई. उन्होंने उसे बड़े गौर से पढ़ा और बोले, “शाबाश. बहुत अच्छी लिखी है स्क्रिप्ट तो..... लीजिए आपकी स्क्रिप्ट अप्रूव्ड हो गयी.”
मैंने कहा “जी बहुत बहुत शुक्रिया.... रिकॉडिंग के लिए कब आना है मुझे?”
वो हँसे “अरे भाई हमारे यहां अभी रिकॉर्डिंग का कोई माकूल इंतजाम नहीं है. आपको उसी रोज आकर लाइव ही पेश करना होगा ये प्रोग्राम. थोड़ी प्रैक्टिस करके तीन बजे तक यहाँ आ जाना.”
मैंने कहा “जी बहुत अच्छा.”
मैं वहाँ से लौट आया. पहला प्रोग्राम वो भी लाइव..... थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन फिर मैंने याद किया अपने ऑडिशन वाले दिन को...... माइक के सामने बोलने में मुझे बहुत मज़ा आया था.... मैंने उन लम्हों को भरपूर जिया था. मैंने ये सोचकर अपने दिल को दिलासा दिया कि जब उस दिन माइक के सामने बोलना मुझे इतना अच्छा लगा था, तो अब घबराने की क्या ज़रूरत है भला?
वक्त तो अपनी रफ़्तार से गुजर ही जाता है. मैं तय दिन तीन बजने में पांच मिनट कम थे, तब आकाशवाणी के दफ्तर पहुँच गया. भट्ट साहब के कमरे में गया, तो वो किसी से फोन पर बात कर रहे थे. मैंने कमरे में घुसकर नमस्कार किया. उन्होंने बैठने का इशारा किया. मैं बैठ गया. वो फोन पर बोले “हाँ तुलसियानी जी आज के नवतरंग के लिए ये आ गए हैं. आपके पास भेज रहा हूँ, ज़रा प्रैक्टिस करवा देना यार और ज़रा संभाल लेना.”
उन्होंने फोन रखा और मुझे कहा “जाइए, आप कार जा रही है ट्रांसमीटर. उसमे बैठ जाइए. वहाँ ड्यूटी ऑफिसर तुलसियानी जी मिलेंगे. वो आपको प्रैक्टिस करवा देंगे. ऑल द बैस्ट.”
मैंने उन्हें शुक्रिया कहा और बाहर आकर कार में बैठ गया. कुछ और स्टाफ़ को लेकर वो एम्बेसेडर कार चल पडी.
पन्द्रह मिनट में हम लोग ट्रांसमीटर पहुँच गए.
दरअसल स्टाफ़ तो बढ़ने लगा था आकाशवाणी, बीकानेर पर लेकिन टेक्नीकल सहूलतें अब तक बढ़ी नहीं थीं. दफ्तर एक किराए के मकान में शहर में था. ट्रांसमीटर बिल्डिंग वहाँ से छः किलोमीटर दूर सागर रोड़ पर बनी हुई थी. एक हॉल था, जिसमे दस किलोवाट का एक बड़ा सा ट्रांसमीटर लगा हुआ था. उससे बिलकुल लगा हुआ एक स्टूडियो था. दोनों के बीच एक शीशा लगा हुआ था. उस शीशे के एक तरफ स्टूडियो में अनाउंसर बैठता था और दूसरी तरफ कंट्रोल रूम कम ट्रांसमीटर हॉल में इंजीनियर्स. ज़रूरत पड़ने पर वो लोग इशारों से बात कर लिया करते थे. एक इंटरकॉम जैसी बाबा आदम के ज़माने की कोई चीज़ भी मौजूद थी वहाँ, जो कभी कभी ही काम करती थी. अनाउंसर को तीन तरफ से घेरे हुए एक टेबल थी, जिसमे एक तरफ दो टेप डैक लगे हुए थे, जिनपर टेप बजाये जाते थे, एक तरफ दो बड़े बड़े टर्न टेबल थे, जिन्हें हम बोल चाल की ज़ुबान में रिकॉर्ड प्लेयर कहते हैं, और एक तरफ एक बड़ी सी मशीन लगी रहती थी, जिसे कंसोल कहा जाता था. उस कंसोल पर बहुत सारे स्विच, कीज़, बटन और गोल घुमाने वाले बड़े बटन लगे रहते थे, जिन्हें फेडर कहा जाता था. बस यही स्टूडियो था कुल मिलाकर, जिसमे दो माइक लगाने का इंतजाम था. इसके अलावा तीन चार कमरे और थे. एक में ड्यूटीरूम बना हुआ था और एक में लायब्रेरी.
कार से उतरकर मैं ड्यूटीरूम में पहुंचा. एक साहब एक टेबल के दूसरी तरफ बैठे थे. टेबल पर एक रेडियो रखा हुआ था और कुछ टेप्स और रिकॉर्ड्स रखे हुए थे. मैंने उन्हें नमस्कार किया. उन्होंने मुझसे बैठने को कहा. श्री यशपाल सिंह राठौर शाम के ट्रांसमिशन के अनाउंसर थे. उनके साथ मिलकर उन्होंने टेप्स वगैरह चैक किये, उन्हें स्टूडियो में भेजकर अपनी कुर्सी पर बैठे और बोले “चलिए, अब आपके प्रोग्राम की तैयारी कर लेते हैं.”
मैंने कहा “जी..... बताएं, मुझे क्या और कैसे करना है?”
“आप जिस अंदाज़ में प्रोग्राम पेश करना चाहते हैं, थोड़ा सा पढने की कोशिश कीजिये. फिर मैं आपको बताता हूँ कि इसे कैसे पढ़ना चाहिए.”
“जी बहुत अच्छा.”
और मैंने स्क्रिप्ट को पढ़ना शुरू किया. मैं एक पैराग्राफ पढकर रुक गया और उनके सामने देखने लगा कि ये मुझे कुछ बताएँगे. वो मुंह खोले मेरी तरफ देखते जा रहे थे. मेरे रुकते ही वो बोले “और पढ़िए.” मैं और एक पैरा पढ़ गया. फिर उनके चेहरे की तरफ देखा. उन्होंने आगे पढ़ने का इशारा किया...... मैं पढता चला गया. पूरी स्क्रिप्ट खत्म हो गयी.
अब वो बोले “आप सच सच बताइये..... क्या आप स्टाफ़ में नहीं हैं?”
अब चौंकने की बारी मेरी थी. मैंने कहा “जी......? क्या मतलब ? मैं समझा नहीं.”
इस पर वो बोले “कहाँ के रहने वाले हैं आप?”
“जी बीकानेर का ही हूँ.”
“आप जिस तरह से पढ़ रहे हैं, मुझे लग रहा है कि आप आलरेडी अनाउंसर हैं.”
मैंने कहा “जी नहीं मैं अनाउंसर तो नहीं हूँ लेकिन हाँ ड्रामा का अप्रूव्ड आर्टिस्ट ज़रूर हूँ.”
वो मुस्कुराकर बोले “आप तो एक मंजे हुए अनाउंसर की तरह बोल रहे हैं. मैं क्या तैयारी करवाऊं आपको? आप तो स्टूडियो में जाइए और इत्मीनान से प्रोग्राम पेश कीजिये.”
तभी राठौर जी स्टूडियो से बाहर आये और मुझे अंदर ले जाकर बिठा दिया. ऑडिशन के बाद एक बार फिर माइक्रोफोन मेरे सामने था. मैंने उस प्रोग्राम को भी खूब इन्जॉय किया. कब प्रोग्राम खत्म हुआ, मुझे पता ही नहीं चला. एक बार फिर मैंने महसूस किया कि माइक्रोफोन के सामने बोलकर जो सुख मुझे मिलता है, वैसा सुख मुझे और किसी भी काम में नहीं मिलता.
सभी ने प्रोग्राम की बहुत तारीफ़ की. मुझे १५ रुपये का एक चैक भी मिला. यूं तो अपनी क्लिनिक और ट्यूशंस से मैं अच्छी खासी कमाई करता था मगर माइक्रोफोन पर बोलने की ये मेरी पहली कमाई थी.
ये वो वक्त था, जब हर घर में और हर दुकान पर रेडियो पूरे दिन बजा करता था. उन दिनों दो तरह के रेडियो स्टेशन हुआ करते थे. मीडियम वेव के और शॉर्ट वेव के. राजस्थान के सभी रेडियो स्टेशन मीडियम वेव के ही थे. हम इसे यूं समझ सकते हैं. लम्बाई के हिसाब से हम तरंगों को तीन भागों में बाँट सकते हैं. लौंग  वेव, मीडियम वेव और शॉर्ट वेव. तरंग की लम्बाई जितनी ज़्यादा होती है वो उतनी ही भारी होती है और जितनी भारी होती है, आसमान में उतनी ही कम ऊंचाई तक जा सकती है. तरंग जितनी कम ऊंचाई तक जायेगी, उतनी ही कम दूरी तय करेगी. इसका मतलब ये हुआ कि लॉन्ग वेव बहुत कम दूरी तय करती हैं, मीडियम वेव उससे कुछ ज़्यादा दूरी तय करती हैं और शॉर्ट वेव की तरंगे सबसे ज़्यादा दूरी तय करती हैं. तरंग की लम्बाई के साथ साथ ट्रांसमीटर की पावर की भी बहुत अहमियत होती है. ट्रांसमीटर का पावर जितना ज़्यादा होगा, तरंगें उतनी ही ज़्यादा दूरी तक जायेंगी. इन तीन तरह के ट्रांसमीटर्स में से ऑल इंडिया रेडियो दो तरह के ट्रांसमीटर इस्तेमाल किया करता था, मीडियम और शॉर्ट वेव. दोनों में अपनी अपनी कुछ अच्छाइयां होती थीं और अपनी अपनी खामियां. दिन के वक्त सूरज की गर्मी से, ज़मीन से कुछ ऊंचाई पर एक ऐसी लेयर बनती है, जिसे मीडियम वेव की तरंगे पार नहीं कर सकतीं. नतीजतन वो बहुत कम दायरे में ही सुनी जा सकती हैं. वही तरंगे रात के समय काफी दूर तक पहुँच जाती हैं. इसी लिये दिन में मीडियम वेव पर अगर हम रेडियो की सुई घुमाएँ तो सिर्फ अपने शहर का स्टेशन ही लगेगा, जबकि रात में अगर मीडियम वेव पर सुई को घुमाना शुरू करें, तो हर थोड़ी दूर में कोई न कोई स्टेशन लग जाएगा और हमें काफी दूर दूर के स्टेशन भी सुनने को मिल जायेंगे. शॉर्ट वेव की तरंगे चूंकि बहुत छोटी होती हैं , बहुत ऊंचाई तक जाती हैं और इसलिए बहुत दूर दूर तक सुनी जा सकती हैं, लेकिन कोई भी रेडियो तरंग जितनी ऊपर जायेगी, उतना ही शोर उसमें शामिल हो जाएगा. इसी लिए जब हम शॉर्ट वेव पर रेडियो की सुई घुमाते हैं, तो तरह तरह का शोर सुनाई देता है और उसके बीच बीच में कोई स्टेशन. वैसे एफ़ एम के आने के बाद ये सब अब पुराने ज़माने की बातें हो गयी हैं, लेकिन मैं जिस ज़माने की बात कर रहा हूँ उस वक्त तो मीडियम और शॉर्ट वेव पर ही रेडियो सुना जा सकता था. ज़ाहिर है बीकानेर का रेडियो स्टेशन भी मीडियम वेव पर ही चलता था और चूंकि पूरे चौबीसों घंटे नहीं चलता था, जब भी चलता था, चाहे उस पर कुछ भी प्रोग्राम आ रहा हो हर घर , हर दुकान पर बस वो चलता रहता था. इसी वजह से मेरा प्रोग्राम भी बहुत लोगों ने सुना और उसकी तारीफ़ भी की.
ऑडिशन ने जिस तरह मुझमे एक एतमाद पैदा किया था कि मैं भी कुछ ऐसा कर सकता हूँ, जो बाकी सब लोग नहीं कर सकते, इस प्रोग्राम ने उस एतमाद को थोड़ा और बढ़ा दिया.
इस प्रोग्राम को हुए कुछ ही रोज गुज़रे होंगे कि एक रोज लक्ष्मी चंद जी ने घर आकर बताया कि मुझे भट्ट साहब ने याद किया है. जब भी टाइम मिले, मैं जाकर उनसे मिल लूं. मैं अगले ही रोज आकाशवाणी के दफ्तर पहुँच गया. भट्ट साहब से मिला, तो उन्होंने बहुत अपनाइयत से कहा “महेंद्र..... मैंने एक संगीत रूपक प्लान किया है. जानते हो ना कि संगीत रूपक क्या होता है?”
मैं ठहरा रेडियो का हर प्रोग्राम सुनने वाला. मैंने कहा “जी हाँ बिलकुल जानता हूँ.”
“ये संगीत रूपक जन्माष्टमी पर है. मैं सोचता हूँ कि इसमें नैरेशन तुम करो. बोलो....करोगे?” आज वो मुझे आप की जगह तुम कहकर बुला रहे थे, जिसमे मुझे एक अजीब से ख़ुलूस की महक आ रही थी.
अंधा क्या चाहे, दो आँखें. मैंने फ़ौरन से पेश्तर कहा “जी हाँ ज़रूर करूँगा, आप कहेंगे तो क्यों नहीं करूँगा?”
“वैसे एक बात पहले ही बता दूं. हमारे यहाँ स्टाफ में चार अनाउंसर हैं. इसके बावजूद मैं नैरेशन के लिए तुम्हारी आवाज़ को इस्तेमाल करूँगा, तो वो सब के सब मुझसे तो खैर नाराज़ होंगे ही, लेकिन तुमसे भी नाराज़ हो जायेंगे. तुम्हें कोई  दिक्कत तो नहीं है उसमें? तुम डर तो नहीं जाओगे उन लोगों की नाराजगी से?”
“नहीं सर...... आप बेफिक्र रहें, उनकी नाराजगी का मेरी सेहत पर कोई असर नहीं होगा. आप तो जितना काम मुझसे करवा सकते हैं करवाइए.”
उन्होंने दराज़ में से एक स्क्रिप्ट निकाली और मेरे सामने रख दी. अच्छी खासी तहरीर थी. बीच बीच में कई गाने थे. मैंने पूछा “ये गाने रिकॉर्ड हो गए क्या सर?” उन्होंने जवाब दिया “नहीं, अब रिकॉर्ड होंगे. तुम क्यों पूछ रहे हो? क्या गाना भी चाहते हो?”
मैंने हंसकर कहा “नहीं सर, गाना वाना मुझे नहीं आता और टूटा फूटा आता भी था, तो वो छोड़ दिया मैंने. मैं तो इस पूरे प्रोग्राम की रिकॉर्डिंग के दौरान आपके साथ रहना चाहता हूँ.”
वो बोले “हाँ हाँ क्यों नहीं. वैसे भी जानते हो हमारे पास अलग से कोई स्टूडियो तो है नहीं. वही ट्रांसमिशन स्टूडियो है, जिसमे बैठकर तुमने प्रोग्राम पेश किया था. वो स्टूडियो भी पूरे दिन हम अपने पास नहीं रख सकते क्योंकि वहीँ से ट्रांसमिशन होना है. हम लोग कुछ दिन तक पूरे दिन वहीं रहेंगे और जब जब स्टूडियो खाली होगा रिकॉर्डिंग करेंगे.”
अब तक मदन मोहन के असिस्टेंट रहे श्री डी एस रेड्डी म्यूजिक कम्पोज़र की पोस्ट पर ज्वाइन कर चुके थे. उनके साथ ही पंडित शिव राम के असिस्टेंट रहे ढोलक प्लेयर श्री दयाल पंवार, सितारिस्ट श्री मुंशी खान तानपूरा प्लेयर श्री इकरामुद्दीन, सारंगी प्लेयर श्री रजब अली, तबला प्लेयर श्री रहमान खां            और तानपूरा प्लेयर श्री नज़र मोहम्मद भी ज्वाइन कर चुके थे. महेंद्र भट्ट जी खुद बहुत अच्छे वायलिन प्लेयर थे. बाहर से क्लेरिओनेट के लिए श्री खुर्शीद को शामिल किया गया और गाने के लिए श्री बदरूद्दीन, श्री उमेश मेंदीरत्ता, श्री लक्ष्मी नारायण सोनी, श्री अनवर, सुश्री सरिता गोस्वामी और श्रीमती मधु भट्ट को बुक किया गया. इनके अलावा एक सितार प्लेयर श्री जसकरण गोस्वामी को भी बाहर से बुक किया गया, जिनके बारे में सब लोग चर्चा कर रहे थे कि उनका यू पी एस सी से प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए सलेक्शन हो चुका है. कागज़ी कार्यवाहियां चल रही हैं और जल्दी ही वो महारानी स्कूल की अपनी नौकरी छोड़कर आकाशवाणी ज्वाइन कर लेंगे.
रिहर्सल के लिए एक दिन तय किया गया और आकाशवाणी बीकानेर के इतिहास में पहली बार, एक साथ इतने आर्टिस्ट्स, आकाशवाणी के दफ्तर में इकट्ठे हुए. कई गाडियां बुक की गयी थीं. मेरे जैसे कुछ लोग अपने अपने स्कूटर या मोटर साइकिल पर थे. पूरा क़ाफ़िला ट्रांसमीटर बिल्डिंग पहुंचा. भट्ट साहब ने सबको बताया कि इस स्टूडियो में हालांकि इस तरह की रिकॉर्डिंग के लिए माकूल इंतजामात नहीं हैं, फिर भी हम कोशिश कर रहे हैं कि कुछ नया किया जा सके. श्री एस एन छाबला और श्री एम् पी श्रीवास्तव आकाशवाणी के दो बहुत ही काबिल इंजीनियर थे. उन्होंने किसी तरह जुगाड करके स्टूडियो में चार माइक्रोफोन लगाए. सबसे बड़ी दिक्क़त ये आ रही थी कि ढोलक, तबला, क्लेरेओनेट जैसे साज़ों की आवाज़ तो बहुत बुलंद होती है, जबकि सितार, वायलिन की आवाज़ बहुत धीमी. सही बात तो ये है कि ऐसे साज़ों को अलग से एक-एक माइक चाहिए, मगर ये तो मुमकिन ही नहीं था. कुल जमा चार माइक थे. अगर उनमे से दो माइक दो सितारों को और एक वायलिन को दे दिया जाय, तो बाकी लोग क्या करेंगे. आखिरकार एक माइक पर सारे सिंगर्स को रखा गया और बाकी तीन माइक्रोफोन को इस तरह रखा गया कि सितार उनके बिलकुल सामने रहें और बुलंद आवाज़ वाले साज़ अपनी आवाज़ की बुलंदी के हिसाब से माइक से दूर रहें. यानी साजों के प्लेसमेंट से उन्हें बैलेंस किया गया.
कई कोशिशों के बाद साज़ों का सही प्लेसमैंट हो पाया. तभी पता लगा कि ट्रांसमिशन का समय हो रहा है. स्टूडियो खाली करना पडेगा. सब लोग अपने अपने बैठने की जगह की मार्किंग करके बाहर आ गए.
अगले दिन फिर हम सब लोग रिहर्सल के लिए पहुंचे. मेरी रिहर्सल तो अभी नहीं होनी थी, फिर भी क्योंकि मैं देखना चाहता था कि इस तरह की रिकॉर्डिंग कैसे की जाती है, इसलिए सब के साथ ही स्टूडियो पहुँच गया. तीन चार मेल सिंगर थे और तीन चार फीमेल. यानी कलाकारों को अपने गाने पर भी ध्यान देना था, साथ ही इस बात का ख़याल भी रखना था कि कब उन्हें दूसरे आर्टिस्ट्स के लिए माइक छोड़कर पीछे हट जाना है और कब आगे बढ़कर खुद माइक्रोफोन पर आ जाना है. दूसरे लफ़्ज़ों में हम ये भी कह सकते हैं कि उन्हें गाना भी गाना था और रिले रेस का खेल भी खेलना था. इन हालात में फीचर प्रोड्यूस करने का न तो ऊपर से कोई हुकुम था और ना ही लिस्नर्स की तरफ से कोई दबाव, लेकिन कुछ नया कर गुजरने का एक जूनून था भट्ट साहब में और सारे कलाकार जैसे भी हो सके, भट्ट साहब के इस जज्बे में उनके साथ थे. करीब ४० बरस मैं रेडियो से जुड़ा हुआ रहा. न जाने कितने प्रोग्राम ऑफिसर्स के साथ काम किया, मगर ऐसा जुनून बिरले लोगों में ही देखने को मिला. सलाम है उनके जुनून को, सलाम है उनके जज़्बे को.
हम लोग कई दिन तक लगातार रिकॉर्डिंग के लिए जाते रहे. आख़िरी दिन मैंने सोचा कि इतने आर्टिस्ट्स इकट्ठे होने का मौक़ा कब कब आता है, क्यों ना कुछ खाने पीने का सामान लेजाकर इसे एक पिकनिक की शकल दी जाए, मैं कुछ मिठाई और कचोरियाँ पैक करवाकर ले गया. रिकॉर्डिंग के बीच में भूख तो सबको ही लग गयी थी. तब मैंने वो मिठाई और कचोरियाँ निकाली. सब लोगों के चेहरे खिल गए. सबने मज़े लेकर मिठाई और कचोरियाँ खाईं मगर सितार प्लेयर जसकरण जी ने उन कचोरियों को कुछ ज़्यादा ही लुत्फ़ लेकर खाया और मुझसे कहा “भायला कचोरियाँ बोहत शानदार है. अै हमेसां याद रै’सी.”(दोस्त, कचोरियाँ बहुत शानदार हैं, ये ज़िंदगी भर याद रहेंगी.) और सच कहा था उन्होंने. वो उन कचोरियों को कभी नहीं भूले. जसकरण जी ने बाद में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव की पोस्ट पर ज्वाइन किया. बीकानेर में हम लोग साथ पोस्टेड रहे. जोधपुर में उनसे कई बार मुलाक़ात हुई. वो ए एस डी हो गए उसके बाद भी कई बार मिलना हुआ. रिटायर होने के बाद उनसे उदयपुर में मुलाक़ात हुई जब उनके साहबजादे की पोस्टिंग मीरा गर्ल्स कॉलेज में हुई. मैं ये सब इसलिए बता रहा हूँ कि १९७५ से लेकर १९९७ तक उनसे कितनी ही मुलाकातें हुईं और जितनी भी बार मैं उनसे मिला, एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि वो ये कहना भूले हों “भायला तूं बीं फीचर री रिकॉर्डिंग में लायो जिकी कचोरियाँ बहुत शानदार ही. बियांरो स्वाद हाल म्हारे मुंह में है.”(दोस्त उस फीचर के दौरान तुम जो कचोरियाँ लाये थे, वो बहोत शानदार थीं.उनका स्वाद अभी तक मेरे मुंह में है.). अब तो न जसकरण जी रहे, न महेंद्र भट्ट जी, न मुंशी खां जी, न दयाल पंवार जी, न खुर्शीद जी, न रेड्डी जी और न ही मेरा यार बदरू रहा, एक अरसा गुज़र गया इन सबको ये दुनिया छोड़े हुए, मगर अब भी उस रिकॉर्डिंग की अलग अलग तस्वीरें मेरे जेहन में ज्यों की त्यों महफूज़ हैं.
एमरजेंसी स्टूडियो की उन महदूद सहूलियतों में आखिरकार किसी तरह उस म्यूज़िकल फीचर के गाने रिकॉर्ड हुए.
इसके बाद बारी आई मेरे नैरेशंस की. भट्ट साहब ने खुद सामने बैठकर मुझे रिकॉर्ड किया और रिकॉर्डिंग पूरी होने पर मेरी पीठ ठोकी. आस पास कहीं कुछ जल रहा है, इसका अहसास रिहर्सल के पहले ही दिन से मुझे होने लगा था. भट्ट साहब ने सही कहा था कि चार चार अनाउन्सर्स के स्टाफ में होने के बावजूद नैरेशंस मुझसे करवाने से स्टाफ के कई लोग उनसे नाराज़ हो जायेंगे और मेरे दुश्मन बन जायेंगे. शायद कैक्टस का ये पहला काँटा था, जिसकी चुभन मैंने महसूस की थी.

    

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