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Monday, September 14, 2009

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-9

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-9 -पंकज अवधिया


पीपल, पलाश और माहुल की पत्तियो से तैयार पत्तल गर्म-गर्म खिचडी परोसी जाये और फिर मुनगे (सहजन) की सब्जी के साथ उसे खाया जाये। खिचडी को कुछ समय तक इस पत्तल मे रखा रहने दिया जाये ताकि पत्तियो से उसकी अभिक्रिया हो सके। ऐसा महिने मे कम से कम दो बार तो अवश्य किया जाना चाहिये। अपनी वाणी को सुमधुर रखने की कामना करने वालो को देश के पारम्परिक चिकित्सक यह सलाह देते है। आप सोच रहे होंगे कि रेडियो वाले ब्लाग मे यह पारम्परिक चिकित्सा का पाठ कैसे शुरु हो गया? आप सही सोच रहे है। चलिये, मै इसका खुलासा कर ही देता हूँ। जब मैने इस ब्लाग की सदस्यता ली थी तो माननीय युनुस खान जी ने यह उम्मीद जतायी थी कि मै आवाज की गुणवत्ता सुधारने के लिये उपयोगी जडी-बूटियो के विषय मे लेख लिखूंगा ताकि रेडियो उद्घोषको को लाभ हो सके। “मेरे आस-पास बोलते रेडियो” की लम्बी लेखमाला मे मै रेडियो के विभिन्न पहलुओ पर लिखता रहा पर इस विषय मे नही लिख पाया। अब इस कमी को दूर करने का प्रयास कर रहा हूँ।

पीपल के पके फल जिसे पिकरी भी कहा जाता है, खाने मे स्वादिष्ट होते है। नाना प्रकार के पक्षी फलन के समय पीपल मे डेरा जमाये रहते है। यह फल मनुष्यो के लिये भी बहुत उपयोगी है। इसका मौसम भर सेवन आवाज को साफ रखता है। यह पेट साफ भी करता है। इसी तरह पीपल के एक रिश्तेदार गूलर जिसे डूमर भी कहा जाता है, के फलो को देशी अंजीर का दर्जा प्राप्त है। चाहे मुम्बई हो या रायपुर यह आसानी से मिल जाता है। बाजार मे नही बल्कि आस-पास बाग-बागीचो मे। इन फलो को बच्चे बडे चाव से खाते है। यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है। गले के लिये इसकी विशेष महत्ता है। गूलर के पके हुये फलो के सेवन का मौका कभी भी नही चूकना चाहिये।

पारम्परिक चिकित्सक बच जिसे वचा भी कहते है, का टुकडा मुँह मे रखकर चूसने की सलाह देते है। बच आसानी से पंसारी की दुकान मे मिल जाती है। आजकल बडी कम्पनियाँ भी इसका विपणन कर रही है। ग्रामीण अंचलो मे बच्चो की तुतलाहट दूर करने के लिये आज भी इसका प्रयोग किया जाता है। यदि आपके पास बागीचा है तो आप इसे स्थायी तौर पर घर मे लगा ले। यह वनस्पति कम देखभाल के आसानी से उगती है। किसानी भाषा मे इसीलिये इसे “आलसियो की फसल” कहा जाता है। एक बार लगाया तो फिर ज्यादा देखभाल की जरुरत नही। आज के प्रदूषण भरे माहौल मे बच के पौधे वातावरण को साफ रखने मे अहम भूमिका निभाते है। बच के टुकडे को जब तक अच्छा लगे मुँह मे रखे फिर फेक थे। ज्यादा देर तक मुँह मे रखने से उबकाई आ सकती है।

गले की नियमित देखभाल के लिये गुनगुने पानी से गरारे करना लाभप्रद है, यह हम सभी जानते है। पर गरारे करने के बाद गले को गरम कपडे से लपेटकर रखना जरुरी है ताकि ठंडी हवा न लगे। ये उपाय कम लोग ही करते है। फिर गरारे के लिये अधिक गर्म पानी का उपयोग न करे। गरारे करने के कम से कम पन्द्रह मिनट बाद तक मौन रखे। इससे इसका असर बढ जायेगा। पानी के साथ फिटकरी ,हल्दी, शहद आदि मिलाकर भी गरारे किये जा सकते है पर सबसे उपयुक्त यही है कि नमक पानी के गरारे किये जाये। किसी भी तरह के संक्रमण चाहे वह स्वाइन फ्लू का ही संक्रमण क्यो न हो, से बचने के लिये सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है नमक पानी से गरारे और जल नेती का प्रयोग। जलनेती बहुत आसान है। पास के योग केन्द्र मे जाकर आप इसके विषय मे विस्तार से जान सकते है। जलनेती आपके गले के लिये विशेष लाभकारी है।

आवाज की दुनिया से जुडे लोग अदरक से विशेष मित्रता रखते है पर बहुत कम लोग जानते है कि अदरक का सेवन सम्भलकर किया जाना चाहिये। प्राचीन भारतीय ग्रंथ नाना प्रकार के त्वचा रोगो मे अदरक का प्रयोग न करने की सलाह देते है। साथ ही अदरक को साल भर भी नही लिया जाना चाहिये। देश के पारम्परिक चिकित्सक कहते है कि लम्बे समय तक चाय मे अदरक का प्रयोग लाभ के स्थान पर नुकसान कर सकता है। दवा को दवा की तरह ही लिया जाना चाहिये।

पारम्परिक चिकित्सक पोखरा (कमलगट्टा) और सिंघाडा को गले के लिये अति उपयोगी मानते है। उनका कहना है कि मौसम विशेष मे उपलब्ध होने वाले इन उपहारो के उपयोग का अवसर नही चूकना चाहिये।

गले के लिये अनगिनत घरेलू नुस्खे है। इस लेख मे मैने उन प्रभावी उपायो की चर्चा की जिसके बारे मे कम ही जानकारी है। आशा ही युनुस जी और उनके साथियो के लिये यह जानकारी उपयोगी सिद्ध होगी।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Monday, August 3, 2009

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-8

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-8 - पंकज अवधिया

इस बार पता ही नही चला कि कब समय निकल गया और मेरे रेडियो का मसाला खत्म हो गया। इस बार न कोई पीछे पडा कि फलाँ-फलाँ आफर है न ही किसी तरह का फोन आया। बस एक दिन अचानक ही रेडियो ने मौन धारण कर लिया। तीन दिन बिन रेडियो कट गये। चौथे दिन मन नही माना और बंगलुरु फोन लगाया। पता लगा कि अभी उनके बात करने का समय नही हुआ है। शहर की उस दुकान का रुख किया जहाँ से इस रेडियो का पहले-पहल कनेक्शन लिया था। दुकान वाले ने कहा कि मन्दी का दौर है और रेडियो की दुकान बन्द पड रही है। शहर से बहुत कम लोगो ने रिचार्ज करवाया है। आप सोच लो, क्या रेडियो के लिये साल का 2000 खर्चना ठीक है? मै वापस आ गया।

दो दिन और कटे जैसे-तैसे। रेडियो का नशा तो नशा ही था। अगले ही दिन दुकान जाकर एक नही दो साल के पैसे दे दिये। कुछ कूट अंक प्राप्त किये और देखते ही देखते रेडियो फिर बोलने लगा। चारो ओर नाना प्रकार के रेडियो है। कोई अति सन्यमित भाषा मे बोल रहा है तो कोई सिरदर्द करने वाली रफ्तार मे। इस बीच मैने अपने पैसे वाले पुराने रेडियो को ही चुना। आज जब मै यह लेख लिख रहा हूँ तो इसका अप कंट्री चैनल अपने पूरे शबाब पर है।

इस बार इच्छा थी कि माता-पिता के कमरे मे भी यह रेडियो लगवा दूँ पर उन्होने साफ इंकार कर दिया। विविध भारती का उनका मोह छूटता नही दिखता। घर मे जब भी रसोई घर का रुख करो या पिताजी के अध्ययन कक्ष का, विविध भारती सुनने को मिल जाता है। मै भी मजाकिये लहजे मे माँ से पूछ लेता हूँ, सुबह आप इस मंजन से दाँत साफ करते है या नही?

मैने इस लेखमाला मे पहले लिखा है कि मेरे भोजन करने के समय रसोई मे सखी-सहेली कार्यक्रम आता रहता है। एक बार टमाटर से त्वचा की देखभाल के विषय मे कुछ बताया जा रहा था। यह उपाय मै सालो से सुन रहा था पर इस बार इसे सुनने पर मुझे अच्छा नही लगा। हाल ही मे टमाटर के खेतो से लौटा था। वहाँ कृषि रसायनो का इतना मनमाना प्रयोग हो रहा था कि दिल दहल गया। ये टमाटर जहर के पिटारे थे। इन्हे खाया ही नही जा सकता था पर कुछ ही देर बाद उन्हे बाजार पहुँचाया गया और फिर वहाँ वह हाथो-हाथ बिक गया। बेचारा खरीददार क्या जाने इन जहरीले पिटारो के बारे मे? मै सोच रहा था कि रेडियो कार्यक्रम सुनकर यदि कोई इसे त्वचा मे लगा ले तो पता नही उस पर क्या गुजरेगी? पर खरीददारो की तरह रेडियो वाले भी सच कहाँ जानते है? जानते होते तो ऐसा करने को नही कहते या बताते कि जैविक विधियो से तैयार टमाटर का प्रयोग ही बहने करे।

कल सुबह कुछ जल्दी ही उठ गया। विविध भारती चल रहा था। तभी किसी उद्घोषक ने कहा कि आप मनचाहे गीत की फरमाइश ई-मेल से भी भेज सकते है, पता है मनचाहे गीत एट जीमेल डाट काम। पिताजी अचानक ही पूछ पडे कि ये जीमेल क्या है? क्या यह सरकारी सेवा है? मैने कहा, नही, यह सरकारी सेवा नही है। पिताजी ने झट से पूछा कि फिर इन्होने विविध भारती वालो को पैसे दिये होंगे तभी तो उनका नाम लिया जा रहा है। मै शांत रहा। पिताजी का प्रश्न गलत नही था। मै भी उम्मीद कर रहा था कि विविध भारती की अपनी वेबसाइट तो होगी ही। कितना अच्छा होता कि ई-मेल मनचाहे गीत एट विविधभारती डाट काम या आर्ग होता। इसी बहाने लोग विविधभारती की साइट पर जाते और रेडियो जाकी के विषय मे जान पाते। बहुत से निजी रेडियो वालो के पास अपनी साइटे है जहाँ श्रोता मँडराते रहते है। मुझे विविध भारती की अपनी कोई अधिकारिक वेबसाइट नही मिली। हाँ, एक वेब पेज मिला पर पुराने ढंग का।

मै इस उधेडबुन मे लगा रहा कि इस बारे मे रेडियोनामा मे कुछ लिखूँ या नही। फिर सोचा अपने ही मन की बात साफ बता सकते है इसलिये प्रयास करने मे क्या हर्ज है?

उम्मीद है कि मै इस लेखमाला को जारी रख सकूँगा।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Saturday, March 8, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-3

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-3

- पंकज अवधिया

जिन दिनो मै पढाई कर रहा था उन दिनो गजलो का दौर अपने चरम पर था। पंकज उधास से लेकर जगजीत सिह जैसे गायको के कैसेट सुने जाते थे। ये गजले मुझे बहुत अच्छी लगती थी पर शराब और शबाब पर आधारित होने के कारण इन्हे घर मे सुने तो सुने कैसे? बडे भाई काँलेज पहुँचने वाले थे सो वे सुन सकते थे। इसी बहाने मै भी सुन लेता था। फिर जब मै सुनने लायक (?) हुआ तो यह दौर ही खत्म हो गया। कैसेट मिलने बन्द हो गये। रेडियो पर भी कम ही गजले आती थी। एक दशक बाद जब घर पर वर्ल्ड स्पेस रेडियो लगाया तो पता चला कि गजलो के लिये चौबीस घंटो का एक अलग चैनल ही है। रेडियो फलक से रुबरू हुआ और यह मेरा पसन्दीदा चैनल बन गया। इस चैंनल मे भारतीय गायको के अलावा पाकिस्तानी गायको को सुनने मिलता है। कव्वालियाँ भी सुनी जा सकती है। जो उदघोषक इसमे बोलते है उनकी उर्दू बडी ही उम्दा होती है। जाहिर है बहुत से शब्द समझ से परे होते है पर जिस अन्दाज से उन्हे प्रस्तुत किया जाता है वह मन को प्रसन्न कर देता है। लाइव रिकार्डिंग का एक बडा संग्रह है इनके पास। तलत अजीज को महफिलो मे सुनना एक अलग ही अनुभव है। आबिदा परवीन के सूफीयाना गीतो की बात निराली है।


इस चैनल मे एक बात बडी अजीब लगती है और वह है एक ही उदघोषक नाम बदल-बदल कर अलग-अलग आवाजो मे कार्यक्रम पेश करते है। जब मै लगातार आठ घंटो तक इसे सुनता हूँ तो इस नाटकीयता से ऊब जाता हूँ। क्या इतने बडे देश मे प्रस्तुतकर्ताओ की कमी है? उम्मीद करता हूँ कि इन उदघोषको के अलग-अलग रूपो को अलग-अलग तनख्वाह भी मिलती होगी। मेरे एक मित्र ने कहा कि हो सकता है उदघोषक अलग-अलग हो पर किसी एक से प्रभावित हो इसलिये सब उसी के जैसे बोलते हो। यह सम्भव है पर यदि ऐसा ही है तो भी दर्शको पर इसका अच्छा असर नही पड रहा है। वर्ल्ड स्पेस के सभी चैनल मे कमोबेश यही स्थिति लगती है। चैनल स्पीन मे जो उदघोषक रवि बन कर आता है वही फरिश्ता मे प्रेमचन्द बन जाता है। फिर वही गन्धर्व नामक चैनल पर भी आ जाता है। यदि यह कोई नया प्रयोग है तो भी ठीक नही जान पडता है।


इतने सारे रेडियो के आने से अब बीबीसी सुनना एकदम बन्द सा हो गया है। वर्ल्ड स्पेस के एक चैनल मे बीबीसी अंग्रेजी सुना जा सकता है पर महिने भर मे कभी ही इसका मौका आता है। बीबीसी हिन्दी सुनने से जो ज्ञानवर्धन होता है उसकी बात ही कुछ और है। अब लगता है कि इसके लिये अलग से समय निकालना होगा।


मै अपने हेल्थ क्लब के मैनेजर से जब पूछता हूँ कि कौन सा चैनल ज्यादा सुनाते हो लोगो को तो वह सिर पकडकर कहता है कि दिन भर एफ एम सुनते (और सुनाते) रहने के लिये हौसला चाहिये। गाडी चलाते समय सुनना अलग बात है और एक ही तरह के तेज संगीत को दिन भर सुनना अलग बात है। हेल्थ क्लब मे रेडियो मिर्ची बजता था पर अब कुछ लोग घर से सीडी ले आते है और उसे ही बजवाते है। स्थानीय एफ.एम. चैनल के एक ही तरह के विज्ञापनो से लोग अब ऊब रहे है। अभी जो तीन एम.एम. चैनल रायपुर मे आ रहे है उसमे से लोग कम विज्ञापन वाले चैनलो को सुनना पसन्द कर रहे है।


मै ऐसे चैनल की खोज मे हूँ जो दिन भर विज्ञान की बात बताये जैसे कि टीवी पर कई चैनल है। रेडियो पर यूजीसी के कार्यक्रमो को सुनने का सुझाव न दे। उन्हे सुनते ही क़क्षा का माहौल तैयार हो जाता है और रोंगटे खडे हो जाते है। बातो-बातो मे जो ज्ञान बाँटे क्या ऐसा कोई चैनल निकट भविष्य मे आयेगा भारत मे?


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

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Saturday, March 1, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

- पंकज अवधिया

दिसम्बर 2007 मे मेरी मुलाकात पास्तापुर के उत्साही कार्यकर्ताओ से हुयी जिनकी संस्था डेक्कन डेव्हलपमेंट सोसायटी को हाल ही मे कम्युनिटी रेडियो का लाइसेंस मिला है। मुझसे नरसम्मा नामक महिला सदस्या से मिलने कहा गया। इस संस्था मे कई नरसम्मा है। मेरी उलझन देखकर मुझसे ‘रेडियो नरसम्मा’ से मिलने कहा गया। मेरी ‘रेडियो नरसम्मा’ से लम्बी बात हुयी दुभाषिये की मदद से। उनका रेडियो दस कि.मी. के दायरे मे ग्रामीणो के बीच चलने वाला है। इसके लिये भारत सरकार ने विशेष अनुमति दी है। उस समय रेडियो नरसम्मा सहित बहुत से सदस्य इसकी ट्रेनिग ले रहे थे। मैने पूछा कि क्या आपके रेडियो मे फिल्मी गाने बजेंगे। तो उन्होने कहा कि नही यह ग्रामीणो के लिये है और इसमे उन्ही के लिये आवश्यक जानकारी होगी।

ऐसी ही बात मुझे उस समय बतायी गयी जब मै आकाशवाणी के चौपाल कार्यक्रम के बतौर विशेषज्ञ जाता था। किसानो को लोकगीत सुनाये जाते है पर बीडी जलाइ ले जैसे गीत नही सुनाये जाते है। क्यो नही सुनाये जाते है? क्या ये गाने गाँवो मे नही बजते? क्या किसान इसे सुनना पसन्द नही करते? यह बडी अजीब सी मानसिकता लगती है हमारे रेडियो चैनलो की। किसान भी इंसान है और यदि आप उन्हे जानकारी के साथ पसन्दीदा गीत सुनायेंगे तो वे और अधिक मन लगाकर आपके कार्यक्रम को सुनेगे। अब तो यह और जरुरी हो गया है क्योकि बहुत सारे निजी चैनल आ गये है। ऐसे मे चौपाल जैसे कार्यक्रमो को सुधारने की जरुरत है। हमारे मित्र कहते है कि आँख बन्द कर भी आप दूर से ऐसे कार्यक्रमो के प्रस्तुतकर्ताओ की आवाज सुन ले तो आपका मन टी.वी. बन्द करने का हो जायेगा। एक ही तरह के प्रस्तुतिकरण से हटकर अब विविधता लाने की जरुरत है।

मेरे वर्ल्ड स्पेस रेडियो की तुलना पिताजी पहले जमाने के लायसेंसी रेडियो से करते है। पहले साल मे 15 रुपये बतौर रेडियो से लाइसेंस के लिये देने पडते थे। बाद मे सात रुपये लिये जाने लगे। पहले रेडियो के प्रसारण को साफ सुनने के लिये एरीयल ठीक करना पडता था। आज भी वैसा ही सब कुछ है। मुझे छत पर जाकर एंटीना घुमाना पडता है और नीचे पिताजी वर्ल्ड स्पेस रेडियो के पास खडे होकर बताते है कि प्रसारण ठीक आ रहा है या नही। सेटेलाइट के इस युग मे ऐसे प्रसारण को देख वे दंग़ रह जाते है।

वर्ल्ड स्पेस के चैनल 178 ‘हाप’ को मै ज्यादा सुनता हूँ। इसमे साठ और सत्तर के दशक के अंग्रेजी गाने सुनाये जाते है। इन्हे सुनने पर दुख भी होता है। इन गीतो को सुनने पर बहुत से हिन्दी गाने याद आ जाते है और यह भ्रम टूट जाता है धुनो की चोरी इस जमाने मे ही हो रही है। बहुत पुराने अंग्रेजी गीतो को सुनकर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराने हिदी गाने की धुने भी कैसे बिना किसी झिझक पश्चिम से ले ली गयी।

रायपुर शहर मे आटो रिक्शा की सवारी ही अच्छी है भीड-भाड के कारण। पहले आटो वालो की बातचीत से शहर का हाल पता लग जाता था। अब तो वे अपने मे मगन रहते है। कोई रेडियो मिर्ची सुनता है तो कोई रंगीला। वे तेज आवाज मे इसे बजाते है और बडे ही उत्साहित नजर आते है। तारीफ मे कहते है कि कहाँ जाम लगा है यह भी रेडियो वाले बताते है। मुफ्त की इस सेवा को वे दिन भर सुनना चाहते है। उनका बस चले तो वे रात को भी न सोये। केवल रेडियो सुनते रहे। मुझे लगता है दिनभर चटपटी बाते करने वाले ये चैनल बीच-बीच मे ज्ञान की बाते भी कर दे तो यह एक बडी समाज सेवा हो जायेगी। लोग अपने माता-पिता की बात भले न सुने पर रेडियो की बात भला कैसे टालेंगे।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


Tuesday, February 26, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो- डॉ पंकज अवधिया की अतिथी पोस्ट

जब पिछले वर्ष मई मे मैने मधुमेह पर पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर आधारित रपट लिखना शुरु किया तो मुझे 14-16 घंटे कम्प्यूटर पर बैठना पडा। तब से आज तक यह कार्य जारी है और लगता है कि 2010 तक चलता रहेगा। अकेले काम करना होता है इसलिये कभी-कभी बडी बोरियत होती है। इस समय मेरा वर्ल्ड स्पेस रेडियो सुनना बहुत काम आ रहा है। इतने सारे चैनल है पर मै अंग्रेजी गानो का शौकीन हूँ विशेषकर कंट्री गानो का। ये गाने मुझे और कही सुनने नही मिलते। आजकल पैसे देकर कौन रेडियो सुनता है? पिताजी के कमरे मे लगातार विविध भारती बजता रहता है और माताजी भी जब भी समय मिलता है यही सुनती है। शहर मे निजी एफ एम चैनलो की बाढ आ गयी है पर वे इतना जल्दी बोलते है कि सुनने के लिये सब काम छोडना पडता है। शाम को जब मै पास के हेल्थ क्लब मे जाता हूँ तो वहाँ जिम मे निजी चैनल विशेषकर रेडियो मिर्ची बजता है। युवा बडे मजे से गाते हुये व्यायाम करते रहते है।

तरह-तरह के चैनलो ने तो मानो क्रांति ही ला दी है। रायपुर मे पहचान के कई युवा इन निजी चैनलो मे काम करते है। उनपर काम का बडा दबाव रहता है पर फिर भी रेडियो पर उन्हे सुनने से ऐसा नही लगता। पिताजी मेरे वर्ल्ड स्पेस प्रेम पर अचरज करते है। एक साल रेडियो सुनने के लिये 1800 को वे फिजूलखर्ची मानते है। मै कहता हूँ कि इसमे विज्ञापन नही आते तो वे कहते है विविध भारती मे भी तो कम विज्ञापन आते है। जब मै हिंन्दी गाने सुनता हूँ तो वे अपने रेडियो की आवाज बढा देते है ताकि मै जान सकूँ कि मुफ्त मे भी ऐसे गाने सुने जा सकते है।

दोपहर को जब मै खाने की मेज पर पहुँचता हूँ तो माताजी का सखी सहेली कार्यक्रम चलता रहता है। लोग फोन करते रहते है और उन्हे गाने सुनाये जाते है। बीच मे खाने से पहले चाय के लिये किचन चला गया तो माँ कहती है देखो ये तुम्हारे व्लाग वाले युनुस खान बोल रहे है। युनुस जी को माताजी बडे दिनो से सुन रही है। एक बार तो उन्होने शनिवार के कार्यक्रम मे प्लास्टिक खाने वाले क़ीडे की खोज के बारे मे बताया बडे ही रोचक ढंग से। माताजी ने सब को रेडियो के पास बुला लिया। माता-पिता की खुशी का ठिकाना नही रहा। आखिर युनुस खान उनके अपने बच्चे की वैज्ञानिक उपलब्धियो के विषय मे बता रहे थे। मै तब युनुस जी के ब्लाग को नही जानता था। मुझे भी अचरज हुआ कि मेरी इस खोज को कैसे इन्होने इतने रोचक ढंग से प्रस्तुत किया।

बतौर बाल कलाकार मैने आकाशवाणी रायपुर मे काम किया। बच्चो के साप्ताहिक कार्यक्रम किसलय मे कम्पीयर रहा। मिर्जा मसूद और कमल शर्मा जी के साथ काम किया। कल्पना य़ादव और लाल राम कुमार सिंग जी के सानिध्य मे सीखा। पता नही अब कमल शर्मा जी को ये याद भी है या नही। ये सभी नाटक पिताजी ने टेप करके रखे है।

लीजिये अभी वर्ल्ड स्पेस के उर्दू चैनल मे मिर्जा गालिब के खत पढे जा रहे है। मै यह कार्यक्रम इसलिये सुनता हूँ क्योकि उस समय के हालात पता चल जाते है और गजले भी सुनने को मिल जाती है। पर उदघोषक कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिये मिर्जा गालिब की आवाज मे ही खत पढते है। इस ढंग से हमारे परिवार को इतनी एलर्जी हो गयी है कि अब यह कार्यक्रम मुश्किल से सुन पाते है। मैने उन्हे लिखा है पर अभी तक तो उस बेरुखी आवाज का कहर जारी है।

पंकज अवधिया
http://www.pankajoudhia.com

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