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Monday, September 14, 2009

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-9

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-9 -पंकज अवधिया


पीपल, पलाश और माहुल की पत्तियो से तैयार पत्तल गर्म-गर्म खिचडी परोसी जाये और फिर मुनगे (सहजन) की सब्जी के साथ उसे खाया जाये। खिचडी को कुछ समय तक इस पत्तल मे रखा रहने दिया जाये ताकि पत्तियो से उसकी अभिक्रिया हो सके। ऐसा महिने मे कम से कम दो बार तो अवश्य किया जाना चाहिये। अपनी वाणी को सुमधुर रखने की कामना करने वालो को देश के पारम्परिक चिकित्सक यह सलाह देते है। आप सोच रहे होंगे कि रेडियो वाले ब्लाग मे यह पारम्परिक चिकित्सा का पाठ कैसे शुरु हो गया? आप सही सोच रहे है। चलिये, मै इसका खुलासा कर ही देता हूँ। जब मैने इस ब्लाग की सदस्यता ली थी तो माननीय युनुस खान जी ने यह उम्मीद जतायी थी कि मै आवाज की गुणवत्ता सुधारने के लिये उपयोगी जडी-बूटियो के विषय मे लेख लिखूंगा ताकि रेडियो उद्घोषको को लाभ हो सके। “मेरे आस-पास बोलते रेडियो” की लम्बी लेखमाला मे मै रेडियो के विभिन्न पहलुओ पर लिखता रहा पर इस विषय मे नही लिख पाया। अब इस कमी को दूर करने का प्रयास कर रहा हूँ।

पीपल के पके फल जिसे पिकरी भी कहा जाता है, खाने मे स्वादिष्ट होते है। नाना प्रकार के पक्षी फलन के समय पीपल मे डेरा जमाये रहते है। यह फल मनुष्यो के लिये भी बहुत उपयोगी है। इसका मौसम भर सेवन आवाज को साफ रखता है। यह पेट साफ भी करता है। इसी तरह पीपल के एक रिश्तेदार गूलर जिसे डूमर भी कहा जाता है, के फलो को देशी अंजीर का दर्जा प्राप्त है। चाहे मुम्बई हो या रायपुर यह आसानी से मिल जाता है। बाजार मे नही बल्कि आस-पास बाग-बागीचो मे। इन फलो को बच्चे बडे चाव से खाते है। यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है। गले के लिये इसकी विशेष महत्ता है। गूलर के पके हुये फलो के सेवन का मौका कभी भी नही चूकना चाहिये।

पारम्परिक चिकित्सक बच जिसे वचा भी कहते है, का टुकडा मुँह मे रखकर चूसने की सलाह देते है। बच आसानी से पंसारी की दुकान मे मिल जाती है। आजकल बडी कम्पनियाँ भी इसका विपणन कर रही है। ग्रामीण अंचलो मे बच्चो की तुतलाहट दूर करने के लिये आज भी इसका प्रयोग किया जाता है। यदि आपके पास बागीचा है तो आप इसे स्थायी तौर पर घर मे लगा ले। यह वनस्पति कम देखभाल के आसानी से उगती है। किसानी भाषा मे इसीलिये इसे “आलसियो की फसल” कहा जाता है। एक बार लगाया तो फिर ज्यादा देखभाल की जरुरत नही। आज के प्रदूषण भरे माहौल मे बच के पौधे वातावरण को साफ रखने मे अहम भूमिका निभाते है। बच के टुकडे को जब तक अच्छा लगे मुँह मे रखे फिर फेक थे। ज्यादा देर तक मुँह मे रखने से उबकाई आ सकती है।

गले की नियमित देखभाल के लिये गुनगुने पानी से गरारे करना लाभप्रद है, यह हम सभी जानते है। पर गरारे करने के बाद गले को गरम कपडे से लपेटकर रखना जरुरी है ताकि ठंडी हवा न लगे। ये उपाय कम लोग ही करते है। फिर गरारे के लिये अधिक गर्म पानी का उपयोग न करे। गरारे करने के कम से कम पन्द्रह मिनट बाद तक मौन रखे। इससे इसका असर बढ जायेगा। पानी के साथ फिटकरी ,हल्दी, शहद आदि मिलाकर भी गरारे किये जा सकते है पर सबसे उपयुक्त यही है कि नमक पानी के गरारे किये जाये। किसी भी तरह के संक्रमण चाहे वह स्वाइन फ्लू का ही संक्रमण क्यो न हो, से बचने के लिये सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है नमक पानी से गरारे और जल नेती का प्रयोग। जलनेती बहुत आसान है। पास के योग केन्द्र मे जाकर आप इसके विषय मे विस्तार से जान सकते है। जलनेती आपके गले के लिये विशेष लाभकारी है।

आवाज की दुनिया से जुडे लोग अदरक से विशेष मित्रता रखते है पर बहुत कम लोग जानते है कि अदरक का सेवन सम्भलकर किया जाना चाहिये। प्राचीन भारतीय ग्रंथ नाना प्रकार के त्वचा रोगो मे अदरक का प्रयोग न करने की सलाह देते है। साथ ही अदरक को साल भर भी नही लिया जाना चाहिये। देश के पारम्परिक चिकित्सक कहते है कि लम्बे समय तक चाय मे अदरक का प्रयोग लाभ के स्थान पर नुकसान कर सकता है। दवा को दवा की तरह ही लिया जाना चाहिये।

पारम्परिक चिकित्सक पोखरा (कमलगट्टा) और सिंघाडा को गले के लिये अति उपयोगी मानते है। उनका कहना है कि मौसम विशेष मे उपलब्ध होने वाले इन उपहारो के उपयोग का अवसर नही चूकना चाहिये।

गले के लिये अनगिनत घरेलू नुस्खे है। इस लेख मे मैने उन प्रभावी उपायो की चर्चा की जिसके बारे मे कम ही जानकारी है। आशा ही युनुस जी और उनके साथियो के लिये यह जानकारी उपयोगी सिद्ध होगी।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Monday, August 3, 2009

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-8

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-8 - पंकज अवधिया

इस बार पता ही नही चला कि कब समय निकल गया और मेरे रेडियो का मसाला खत्म हो गया। इस बार न कोई पीछे पडा कि फलाँ-फलाँ आफर है न ही किसी तरह का फोन आया। बस एक दिन अचानक ही रेडियो ने मौन धारण कर लिया। तीन दिन बिन रेडियो कट गये। चौथे दिन मन नही माना और बंगलुरु फोन लगाया। पता लगा कि अभी उनके बात करने का समय नही हुआ है। शहर की उस दुकान का रुख किया जहाँ से इस रेडियो का पहले-पहल कनेक्शन लिया था। दुकान वाले ने कहा कि मन्दी का दौर है और रेडियो की दुकान बन्द पड रही है। शहर से बहुत कम लोगो ने रिचार्ज करवाया है। आप सोच लो, क्या रेडियो के लिये साल का 2000 खर्चना ठीक है? मै वापस आ गया।

दो दिन और कटे जैसे-तैसे। रेडियो का नशा तो नशा ही था। अगले ही दिन दुकान जाकर एक नही दो साल के पैसे दे दिये। कुछ कूट अंक प्राप्त किये और देखते ही देखते रेडियो फिर बोलने लगा। चारो ओर नाना प्रकार के रेडियो है। कोई अति सन्यमित भाषा मे बोल रहा है तो कोई सिरदर्द करने वाली रफ्तार मे। इस बीच मैने अपने पैसे वाले पुराने रेडियो को ही चुना। आज जब मै यह लेख लिख रहा हूँ तो इसका अप कंट्री चैनल अपने पूरे शबाब पर है।

इस बार इच्छा थी कि माता-पिता के कमरे मे भी यह रेडियो लगवा दूँ पर उन्होने साफ इंकार कर दिया। विविध भारती का उनका मोह छूटता नही दिखता। घर मे जब भी रसोई घर का रुख करो या पिताजी के अध्ययन कक्ष का, विविध भारती सुनने को मिल जाता है। मै भी मजाकिये लहजे मे माँ से पूछ लेता हूँ, सुबह आप इस मंजन से दाँत साफ करते है या नही?

मैने इस लेखमाला मे पहले लिखा है कि मेरे भोजन करने के समय रसोई मे सखी-सहेली कार्यक्रम आता रहता है। एक बार टमाटर से त्वचा की देखभाल के विषय मे कुछ बताया जा रहा था। यह उपाय मै सालो से सुन रहा था पर इस बार इसे सुनने पर मुझे अच्छा नही लगा। हाल ही मे टमाटर के खेतो से लौटा था। वहाँ कृषि रसायनो का इतना मनमाना प्रयोग हो रहा था कि दिल दहल गया। ये टमाटर जहर के पिटारे थे। इन्हे खाया ही नही जा सकता था पर कुछ ही देर बाद उन्हे बाजार पहुँचाया गया और फिर वहाँ वह हाथो-हाथ बिक गया। बेचारा खरीददार क्या जाने इन जहरीले पिटारो के बारे मे? मै सोच रहा था कि रेडियो कार्यक्रम सुनकर यदि कोई इसे त्वचा मे लगा ले तो पता नही उस पर क्या गुजरेगी? पर खरीददारो की तरह रेडियो वाले भी सच कहाँ जानते है? जानते होते तो ऐसा करने को नही कहते या बताते कि जैविक विधियो से तैयार टमाटर का प्रयोग ही बहने करे।

कल सुबह कुछ जल्दी ही उठ गया। विविध भारती चल रहा था। तभी किसी उद्घोषक ने कहा कि आप मनचाहे गीत की फरमाइश ई-मेल से भी भेज सकते है, पता है मनचाहे गीत एट जीमेल डाट काम। पिताजी अचानक ही पूछ पडे कि ये जीमेल क्या है? क्या यह सरकारी सेवा है? मैने कहा, नही, यह सरकारी सेवा नही है। पिताजी ने झट से पूछा कि फिर इन्होने विविध भारती वालो को पैसे दिये होंगे तभी तो उनका नाम लिया जा रहा है। मै शांत रहा। पिताजी का प्रश्न गलत नही था। मै भी उम्मीद कर रहा था कि विविध भारती की अपनी वेबसाइट तो होगी ही। कितना अच्छा होता कि ई-मेल मनचाहे गीत एट विविधभारती डाट काम या आर्ग होता। इसी बहाने लोग विविधभारती की साइट पर जाते और रेडियो जाकी के विषय मे जान पाते। बहुत से निजी रेडियो वालो के पास अपनी साइटे है जहाँ श्रोता मँडराते रहते है। मुझे विविध भारती की अपनी कोई अधिकारिक वेबसाइट नही मिली। हाँ, एक वेब पेज मिला पर पुराने ढंग का।

मै इस उधेडबुन मे लगा रहा कि इस बारे मे रेडियोनामा मे कुछ लिखूँ या नही। फिर सोचा अपने ही मन की बात साफ बता सकते है इसलिये प्रयास करने मे क्या हर्ज है?

उम्मीद है कि मै इस लेखमाला को जारी रख सकूँगा।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Saturday, April 12, 2008

छेनी, हथौड़ा, कांच, प्‍लाय‍वुड, पेन्‍ट, ग्रेनाइट और रेडियो

कल तरंग पर बता चुका हूं कि घर पर नवीनीकरण का काम जारी है । और नए नए अनुभव हो रहे हैं । ऐसा ही एक अनुभव आज रेडियोनामा पर । ऐसा इसलिए कि अपने घर के नवीनीकरण के चक्‍कर में हमारी रेडियो की दुनिया का ही नवीनीकरण हो गया है ।

रेडियोनामा पर अकसर ये विमर्श होता रहता है कि रेडियो की दुनिया किस तरह से हमारे घरों और दुकानों में अपने पैर फिर से पसार रही है । एक ज़माने में स्‍थाई रेडियो हुआ करते थे और वो हमारे घरों में या दुकानों में विराजमान रहा करते थे । उन्‍हें सुनने के 20061203लिए हम सबको आसपास विराजमान रहना पड़ता था । ये वाल्‍व वाले रेडियो का ज़माना था । फिर ट्रांजिस्‍टर आए तो क्रांति हो गयी और रेडियो का आकार छोटा हो गया । लगभग दो तीन दशक तक ट्रांजिस्‍टरों पर भारत में लोगों ने लोकप्रिय रेडियो चैनलों का आनंद लिया । जिनमें उर्दू सर्विस, र‍ेडियो सीलोन और विविध भारती के अलावा स्‍थानीय चैनल शामिल हैं । लेकिन रेडियो की दुनिया को तब टैक्‍नॉलॉजी ने आमूलचूल रूप से बदल दिया जब रेडियो मोबाइल हो गया और मोबाइल रेडियो हो गये । आइये मोबाइल और स्थिर रेडियो की उस दुनिया से आपका परिचय कराएं जो पिछले उन्‍नीस बीस दिनों से हमने अलग अलग रूपों में देखी । 

घर में रसोई की टायलिंग का काम शुरू हुआ तो कडिया महोदय आए । आंध्रप्रदेश के मेहबूबनगर जिले के निवासी भीमन्‍ना और वामन्‍ना । और हां उनके साथ थे रामप्रसाद और कृष्‍णा । इन चार लोगों में बॉस थे भीमन्‍ना । जो अपनी शादी पर लिये गये क़र्ज़ को चुकाने के मकसद से एक मुकादम के साथ मुंबई आए और इसी इलाक़े के हो लिए जहां इन दिनों हमारा फ्लैट है । इन महोदय को रेडियो सख्‍त नापसंद । 'साला शोर हो तो काम ठीक नहीं होता है' । भीमन्‍ना का ओरीजनल डायलॉग । वामन्‍ना और कृष्‍णा रेडियो के शैदाई । गाना आए तो काम हो । कैसी विरोधाभासी टोली । जब जब भीमन्‍ना सामान लेने बाहर जाता, तब तब हमारा ट्रांजिस्‍टर मज़दूरों के क़ब्‍जे़ में आ जाता । और कभी मनचाहे गीत तो कभी सदाबहार नगमे तो कभी सखी सहेली सुनते हुए महाशय टायलिंग और ग्रेनाइट का काम करते जाते । साथ में अपनी महा-बेसुरी आवाज़ में गुनगुनाते । और जब रहा नहीं जाता तो दिल का हाल हमें सुनाते---लंबी चटाई के रूप में ( मुहावरा है चटाई बिछाना: यानी दिमाग़ चाटना ) सेठ ये फिल्‍‍म मैं खम्‍मम में देका ता, अस्‍सी पैसा में । आंध्र ही होने की वजह से वहीदा और तब्‍बू इनकी फेवरेट । और जब 'कांटों से खींच के ये आंचल' बजे तो वामन्‍ना झूम उठें । घर-निर्माण की दुनिया में धूल, ईंट, गारे, ड्रिलर, कटर, ग्राइंडर, छेनी, हथौड़ा, टाइलें, व्‍हाइट सीमेंट, ग्रेनाइट, फावड़ा, छेनी के बीच खिड़की पर रखा धूल खाता ट्रांजिस्‍टर । रेडियो की दुनिया का ये कोना भी तो देखिए ज़रा ।  

फिर प्‍लंबर महोदय तशरीफ लाए । जिन्‍हें घर की पाइप फिटिंग पर थोड़ा-सा चमत्‍कार दिखाना था । आते ही कडि़या की टोली को कहा- ऐ तुम लोग बाजू हटो समझा क्‍या, अपुन को ये दीवाल के काम करने का है । नाम प्रमोद, गांव महाराष्‍ट्र के pmr505tx कोंकण तट का कोई सुदूर इलाक़ा । काम- प्‍लंबिंग और पेन्टिंग । और शौक़-सोनी एरिकसन के अपने वॉकमैन फोन पर FM रेडियो सुनना । प्रमोद के लिए रेडियो सुनने का मतलब था नए गाने सुनना । वो भी झूमझाम प्राइवेट स्‍टेशनों पर । वामन्‍ना और प्रमोद की जंग । उसे विविध भारती सुनना है इसे एफ़. एम. स्‍टेशन सुनना है । मुसीबत में हम हैं क्‍योंकि हमें इन लोगों को जल्‍दी से काम करवा के घर से बाहर करना है । वामन्‍ना का तर्क- अरे तुम अपना हेडफोन लगाके सुनो ना, हम अपने ट्रांजिस्‍टर को किदर कान में लगाएगा । प्रमोद का पलटवार--तुम लोग क्‍या बकवास सुनते हो, अरे गाना इसको कहते हैं--पता है राखी सावंत का गाना है, क्रेजी फोर, क्रेजी फोर, अंग्रेजी आती है क्‍या । देखता है तू क्‍या । दोनों की बहसबाज़ी हमारा बीच बचाव । रेडियो की दुनिया में एक विस्‍फोटक नज़ारा । आप कल्‍पना करें कि प्‍लंबर का सोनी एरिकसन वॉकमैन फोन किसी टाइल के ढेर के ऊपर टिका रखा है और वो तन्‍मयता से काम कर रहा है । मोबाइल अपने मेमने जैसे गले से पूरी ताकत से चीख रहा है ।

इसके बाद एंट्री कारपेन्‍टर महोदय की । बढ़ई या सुतार आप जो कह लें । नाम सम्‍भाजी सुतार । उम्र तकरीबन पैंतालीस । मुकाम जिला कोल्‍हापुर का एक छोटा सा गांव । बीस साल पहले थोड़े से पैसों के साथ मुंबई आए और आज कामयाब हैं । अपना घर है और जबर्दस्‍त व्‍यस्‍तताएं । हमारे अनुरोध पर वो हमारे घर के फर्नीचर के लिए इसलिए राज़ी हुए क्‍योंकि हम 'विविध भारती वाले'  हैं और उन्‍होंने जिंदगी भर विविध भारती सुना है । उनका कहना है कि उनके जीवन में टी वी से रेडियो ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण रहा है । रेडियो पर उन्‍होंने मराठी के प्राइमरी चैनल सुने हैं जिन पर 'मी डोलकर दर्यांचा राज़ा' जैसे गीत आते हैं या फिर विविध भारती । ममता की आवाज़ उन्‍हें विशेष रूप से पसंद । हम तो घर पर हैं । ममता के प्रसारणों को सुनते ही वो सीधे घर पर अपनी 'औरत' ( पत्‍नी को वो औरत कहते हैं) को फोन करके बताते हैं, रेडियो लगा और सुन, मालूम है मैं इन्‍हीं के घर पर काम कर रहा हूं यानी कि ममता जी के । उनके बोलने में मालूम है और यानी कि ज़रूर आएगाraghavstation203 चाहे जितनी बार आए । पुराने गानों के शैदाई । वामन्‍ना और भीमन्‍ना से उनकी खूब जमी । उनकी टोली के जाने के बाद हमारा रेडियो संभाजी सुतार के कब्‍जे में आ गया । एक दिन हेमंत कुमार का गीत बजा सदाबहार नग्मे में । ' आ गुपचुप गुपचुप प्‍यार करें ' संभाजी काम छोड़कर हमारी टेबल पर आ गये । कहने लगे- मालूम है, ये गाने सुनकर मुझे गांव याद आता है, झाड़ के नीचे खटिया डालकर दोपहर को लेटने का और रेडियो सुनने का  यानी कि विविध भारती । ये गाने सुनकर मुझे दरिया का किनारा याद आता है ।  गांव की नदी के किनारे बैठकर हम रेडियो सुनते थे । संभाजी एक अप्रैल के बाद अधिक प्रसन्‍न हैं, क्‍योंकि विविध भारती पर 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम आजकल जल्‍दी लग रहा है ( आ रहा है ) उनका कहना है--मालूम है सुबह साढ़े छह बजे से जब पुराने गाने आते हैं ना आजकल यानी कि भूले बिसरे गीत तो मालूम है, बहुत अच्‍छा लगता है यानी कि मन शांत हो जाता है । कीलों, प्‍लाई, सन-माइका, विनियर, फेवीकॉल, स्‍क्रू के बीच में ठोकम-पीट करता एक बढ़ई । रेडियो की दुनिया का मुसाफिर । बीस सालों से मुंबई में रहकर रेडियो सुनता है, काम करता है । उसका कहना है कि एक बार वो संगीतकार राम-लक्ष्‍मण के घर फर्नीचर बना चुके हैं । और इच्‍छा है कि किसी तरह लता जी के घर फर्नीचर बनाने का मौका मिलेमालूम है वो महाराष्‍ट्र का गौरव हैं यानी कि भारत देश का गौरव ।

कारपेन्‍टर के साथ हम कांच की ख़रीददारी के लिए एक शोरूम में गए । संयोग कहिए या रेडियो का फैलाव । बंदे की दुकान में काउंटर पर रेडियो, छोटा सा एफ एम रेडियो, मद्धम आवाज़ में बज रहा है । ग्रूविंग करवानी है कांच में । निर्देश मिलता है आप कारपेन्‍टर को लेकर फैक्‍ट्री में जाइये । वहां कारीगर कर देगा । हम बोरीवली पश्चिम के इलाके एकसर की पतली गली में एक दरवाज़े पर खड़े हैं । दरवाज़ा खुलता है तो सफेद कणों से सराबोर एक लड़का जिसक नाम जाफर है, दरवाज़ा खोलता है, उसका पोर पोर सफेद कणों से सराबोर है, जैसे आटा चक्‍की पर तैनात आदमी का होता है । भीतर जाते हैं तो कमरे की हर संभव चीज़ पर आईने के बुरादे की परत है । बंद खिड़की पर एक एफ एम रेडियो किट है, जो ऑटो वाले लगाते हैं । साथ में दो स्‍पीकर । कमरा है दस बाय दस का । कांच की घिसाई, ग्रूविंग और कटिंग की एक कठिन दुनिया । अठारह उन्‍नीस साल की उम्र वाले तीन लड़के । बड़े बड़े बक्‍कल वाले बेल्‍ट लगाए, जीन्‍सधारी । सिर पर अमरीकी झंडे वाला स्‍कार्फ बांधकर बालों की हिफ़ाज़त करते । एकदम सजीले नौजवान । अक्षय कुमार के प्रशंसक । रेडियो पर गाना बज रहा है--'तेरी आंखें भूल भुलैंयां' और जाफर थिरक थिरक कर हमारे ख़रीदे कांच का तिया-पांचा कर रहा है । काम की रफ्तार कम है थिरकने की ज्‍यादा । कांच के बारीक बुरादे और शोर भरी बंद दुनिया में एक खचाड़ा एफ एम रेडियो, जिस पर प्रीतम की बनाई झकाझक धुन और दिन भर कांच काटना या घिसना । क्‍या आपने रेडियो की इस दुनिया को कभी देखा है ।

इसी समय हमारी इमारत की पेन्टिंग चल रही है । रस्सियों के सहारे लटक कर नौजवान सर्कस के ट्रैपीज़ के करतबों की तरह इस काम को अंजाम दे रहे हैं । ताज्‍जुब इस बात का है कि

.... बंद खिड़की पर एक एफ एम रेडियो किट है, जो ऑटो वाले लगाते हैं । साथ में दो स्‍पीकर । कमरा है दस बाय दस का । कांच की घिसाई, ग्रूविंग और कटिंग की एक कठिन दुनिया ।

युवा पीढ़ी के इन मजदूरों के मोबाइल फोन पर सातवें मंजिल के छज्‍जे से लटकते हुए भी रेडियो बजता है । दु:साहसी रेडियो श्रोता हैं ये । ऊंची इमारतों से झांकने से ही कई लोगों की सांसें थमने लगती हैं । यहां ऊंचाई पर लटक कर रेडियो सुनते हुए काम किया जा रहा है ।

घर के नवीनीकरण के बहाने हमें रेडियो की एक ऐसी अंधेरी दुनिया में झांकने को मिला, जहां मेहनतक़श मज़दूर और कारीगर हैं और उनका साथी है संगीत । देश के अलग अलग हिस्‍सों से मुंबई में आए ये लोग रेडियो की स्‍वरलहरियों के साथ अपनी छेनी, हथौड़े, ग्राइंडर और ब्रश वगैरह की जुगलबंदी करते हैं । कितना आसान है रेडियो स्‍टेशन के वातानुकूलित स्‍टूडियो में बैठकर अपनी बात कह देना । अब जब दोबारा दफ्तर जाऊंगा तो माइक के सामने आते हुए इन तमाम लोगों के चेहरे याद आयेंगे और मैं इनके लिए भी अपने प्रोग्राम करूंगा । इस समय घर पर प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस का काम चल रहा है और बसंत और पवन किसी रेडियो चैनल पर सुन रहे हैं--मोहे मोहे तू रंग दे बसंती ।

Tuesday, April 8, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-7

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-7

- पंकज अवधिया


श्रीलंका मे सुनामी के बाद पहले पहल पहुँचने वाले विदेशी पत्रकारो मे एक मेरे मित्र भी थे जिन्होने कोलम्बो के होटल मे डेरा डाला था। इस सितारा होटल ने विपत्ति मे सबके लिये दरवाजा खोल दिया था और आलम यह था कि सभी ओर प्रभावित ही नजर आते थे। पत्रकार मित्र श्री शुभ्रांशु चौधरी किसी विदेशी रेडियो की ओर से गये थे। उन्होने अपने अनुभव मुझे बताये। उनका कहना था कि सुनामी की पूर्व चेतावनी देने मे स्थानीय रेडियो स्टेशन अहम भूमिका निभा सकते थे। पर ऐसा नही हुआ। बाद मे बचाव कार्यो के दौरान भी रेडियो की कमी उन्हे महसूस होती रही। प्रभावितो को महामारी से बचने के सरल उपायो से लेकर तरह-तरह की अफवाहो पर भी लगाम रेडियो द्वारा कसी जा सकती थी।


उडीसा मे आये सुपर साइक्लोन की चर्चा पिछले वर्ष मै नियमगिरि जाते हुये ट्रेन मे सहयात्रियो से कर रहा था। चक्रवात का वर्णन करते समय उनकी आँखो मे खौफ को स्पष्ट देखा जा सकता था। सब कुछ तबाह हो गया। जब मैने पूछा कि क्या रेडियो ऐसे मे काम आता तो उन्होने कहा कि टेलीफोन सुविधा ठप्प होने के कारण वे बाहरी दुनिया से रेडियो के माध्यम से सम्पर्क मे रहे। पहले मौसम की खराबी से सुनने मे दिक्कत हुयी पर बाद मे यह समस्या भी दूर हो गयी। बीबीसी के माध्यम से उन्होने जाना कि क्या हो रहा है उनके आस-पास।


दुनिया भर मे बहुत से ऐसे वाक्ये हुये है जिसमे ऐन तूफान के समय रेडियो ने ढाढस बन्धाने से लेकर राहत मुहैया करवाने मे अहम भूमिका निभायी है। अब जब रेडियो फिर से जन-जन तक क्रांति के रूप मे पहुँच रहा है तो यह उम्मीद जगती है कि प्राकृतिक आपदाओ मे ये विशिष्ट भूमिका निभायेंगे। यदि मै गलत नही हूँ तो अभी भी दुनिया मे आपदाओ पर केन्द्रित कोई रेडियो नही है जो चौबीसो घंटे सिर्फ इसी विषय पर चर्चा करे और विशेषज्ञो के माध्यम से दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने मे राहत के लिये तरस रहे प्रभावितो को उनकी भाषा मे मदद दे सके। आज ऐसे रेडियो की जरुरत है। भले ही यह आम लोगो के दान से शुरु हो पर इसे अस्तित्व मे आना ही होगा।


वैज्ञानिक होने के नाते कई तरह के विचार मन मे आते है। आज हम किसी भी भाषा मे लिखे गूगल मे माध्यम से उसे दूसरी भाषाओ मे पल भर मे रुपांतरित किया जा सकता है। क्या ऐसा भी कोई दिन आयेगा जब श्री युनुस खान हिन्दी मे बोलेंगे और पूरा देश मन चाही भाषा मे उन्हे सुन सकेगा? यदि ऐसा हुआ तो एक केन्द्रीय आपदा दल दिल्ली मे बैठकर पूरे देश के प्रभावितो को सीधे ही मदद कर पायेगा। मुझे उम्मीद है कि देश के योजनाकार इस दिशा मे भी सोच रहे होंगे।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Thursday, March 20, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-6


- पंकज अवधिया


बचपन मे जब अंग्रेजी गाने सुनने का शौक जागा तो कैसेटो का सहारा लेना पडा। सीडी तो उस समय मिलती नही थी। कैसेट बहुत महंगे होते थे और एक अच्छे गाने के लिये पूरा कैसेट लेना पडता था। शांत गाने वाले कैसेट नही मिलते थे। अंग्रेजी गाने मतलब तेज शोर वाले गाने। उस समय बोनी एम का हल्ला था। इस ग्रुप के सारे कैसेट मेरे पास थे। उस समय रेडियो पर अंग्रेजी गाने सुन पाना सम्भव नही जान पडता था। रेडियो को आजमाया पर ऐसा कोई चैनल नही मिलता था जो मन पसन्द गाने सुनाता। बरसो बाद वर्ल्ड स्पेस से यह मुराद पूरी हुयी। इसमे एक चैंनल है अमूरे जिसमे चौबीसो घंटे अंग्रेजी प्रेम गीत सुनाये जाते है। मन प्रसन्न हो जाता है। मेरी तो काम करने की क्षमता बढ गयी है। कई बार अच्छे गानो के चक्कर मे नीन्द की कुर्बानी देनी पडती है। अभी भी इस लेख को लिखते समय अमूरे चैनल ही बज रहा है। सम्भवत: यह चैनल विदेश से आता है। अब सब कुछ मन पसन्द मिलने के बाद लगता है कि कोई भारतीय इसके कार्यक्रमो को प्रस्तुत करे तो इन गानो मे चार चाँद लग जाये।


लगातार रेडियो सुनने के कारण कई तरह के सुझाव भी मन मे आते है। पर यह मजबूरी है कि इन सुझावो और शिकायतो को कैसे सही हाथो तक पहुँचाया जाये? यह कटु सत्य है कि रेडियो चैनल अपनी तारीफ सुनना चाहते है और यही कारण है कि तारीफ वाले पत्र ही उनके कार्यक्रम मे प्रस्तुत किये जाते है। कई बार निन्दा वाले पत्र भी प्रस्तुत किये जाते है पर चतुराई से। सुनने वाले सब समझते है। मै जब रेडियो से जुडा था तो पत्र को छाँटते समय हमे प्रशंसा वाले पत्र को ही चुनने के लिये कहा जाता था। इसी बीच मौका पाकर हम अपने रिश्तेदारो और पडोसियो को खुश करने उनके नाम भी डाल देते थे पर निन्दा वाल्रे पत्रो को अलग कर दिया जाता था। निन्दा बुरी लगती है पर सकारात्मक नजरीये से देखे तो निन्दा और निन्दक से काफी कुछ सीखा जा सकता है। कृषि की शिक्षा के दौरान हमारे एक प्रोफेसर ने हमे सीखाया कि निन्दक की बात सुनो और अपनी गल्ती सुधारो। साथ ही किसी न किसी बहाने से उसे अपने से जोडे रखो क्योकि वही सही राह दिखायेगा। मुझे नही लगता कि कोई ऐसा भारतीय रेडियो चैंनल है जो सीधे ही सुनने वालो की बात प्रसारित करता है। निन्दक फोरम के वजूद की अपेक्षा करना दूर की बात है। पर वर्तमान व्यवस्था मे निन्दको के लिये भी जगह होनी चाहिये।


मेरी लेखमाला को पढकर अब हमारे परिवार को रेडियो परिवार का दर्जा मिल गया है। अब आपको दो और सदस्यो के विषय मे बताना चाहूंगा। मेरे बडे भाई उमेश अवधिया आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले युववाणी मे प्रस्तोता रहे। वही उनकी मुलाकात अपनी जीवन संगिनी से हुयी जो कि साथी कम्पीयर थी। आज इंजीनियर भाई साहब भिलाई इस्पात संयंत्र मे ऊँचे पद पर है और कर्ण और ब्रम्हराक्षस का शिष्य़ जैसे नाटको की एकल प्रस्तुति देते है। देश भर मे उनके शो होते रह्ते है और सम्मानो से नवाजा जाता है। भाभी जी जिनका नाम अंजली अवधिया है, भौतिकी की प्राध्यापिका है और अभी पी.एच,डी. कर रही है। पास्तापुर मे कम्युनिटी रेडियो की बात मैने अभी आई.आई.टी. खडगपुर मे एक साल की शिक्षा ले रहे उमेश भाई को बतायी तो वे खुश हुये कि अब स्वप्न साकार हो रहा है। वे बचपन ही से अपना खुद का रेडियो चैनल आरम्भ करना चाहते थे। उस समय यह सम्भव नही लगता था पर अब तो यह सब कुछ आसान लगने लगा है। यदि यह चैनल शुरु हुआ तो मै कृषि और जडी-बूटियो का विभाग सम्भाल लूंगा। गुलमोहर के औषधीय उपयोग बताऊँगा और फिर गाना बजाऊँगा


गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता---

ये हर्बल गाने पूरे देश मे पसन्द किये जायेंगे- ऐसा मुझे लगता है।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Monday, March 17, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-5

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-5


- पंकज अवधिया


यूँ तो बचपन ही से आकाशवाणी, रायपुर से प्रसारित किसलय कार्यक्रम को मै ध्यान से सुनता था पर यह नही जानता था कि कभी बतौर बाल कलाकार इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करने का अवसर भी मिलेगा। मेरे एक मित्र विनोद के कहने पर मैने फार्म भरा और पहुँच गया आडिशन देने। कोई अनुभव नही था। कोई हालिया संस्मरण सुनाने को कहा गया। कुछ दिनो पहले दीवाली मनायी थी अपने गाँव मे सो पारम्परिक दीवाली के विषय मे बताया। परीक्षक खुश दिखे। अचानक जबान फिसली और मै को कह गया। तुरंत परीक्षक ने उसे दोहराने की जिद की। मैने उस शब्द को नही दोहराया। दूसरा शब्द कहा। फिर तो परीक्षक ने ठान लिया कि वे वही शब्द सुनकर ही रहेंगे। आधे घंटे बात होती रही पर मैने उस शब्द का प्रयोग ही नही किया सारे यत्नो के बावजूद। हँसते हुये मेरा चयन कर लिया गया। बाद मे परीक्षक माननीय लाल राम कुमार सिंग जो कि छत्तीसगढ के जाने-माने उदघोषक और कलाकार है, ने चतुराई की तारीफ की और सीखाया कि कैसे उच्चारण सुधारा जाये। यह सबक बहुत काम आया।


आज जब मै विज्ञान सम्मेलनो मे दुनिया भर के वैज्ञानिको के सामने व्याख्यान देता हूँ तो बडे गौर से सुना जाता है और उच्चारण की तारीफ की जाती है। यदि आप साफ बोलते है तो एक अलग तरह का आत्म-विश्वास आपमे आ जाता है। आज भी मूल भारतीय रेडियो अपने इसी गुण के कारण पहचाना जाता है। आज का जमाना निजी चैनलो का है जहाँ शायद ही इस पर कोई ध्यान दिया जाता है। मुझे लगता है कि प्रतिस्पर्धा की भावना को छोडकर युवाओ को आकाशवाणी मे कार्य कर रहे वरिष्ठो से सीखना चाहिये। मुझे मालूम है वरिष्ठ आगे आकर उन्हे नया रास्ता दिखायेंगे। उच्चारण के मामले मे बीबीसी हिन्दी और नये रेडियो मे वर्ल्ड स्पेस का कोई जवाब नही है। मै यहाँ हिन्दी और उर्दू चैनल की बात कर रहा हूँ।


किसलय मे शामिल होने के बाद मेरी आवाज की कीमत बढ गयी थी। ज्यादा नही पर फिर भी पन्द्रह रुपये का चेक मिलता था हर कार्यक्रम के बाद। मुझसे कहा गया कि किसी अनजाने से कुछ नही खाना। कोई दुश्मन आवाज खराब करने के लिये कुछ भी खिला सकता है। बचपन मे मै सर्दी से परेशान रहता था। ज्यादा कुछ पता नही था इसलिये गरम पानी से गरारे कर लेता था और पैदल जाते समय विक्स ले लेता था। यह सब लम्बे समय तक चला फिर जब हिम्मत करके इनके बिना कार्यक्रम प्रस्तुत किया तो वो ज्यादा प्रभावकारी रहा। सारा मामला आत्मविश्वास मे कमी का था। बाद मे जब मैने ड्रम बजाना आरम्भ किया तो शो से पहले थोडा से पीने और इसी तरह नाटक के शो से पहले दर्द नाशक के साथ पुदीन हरा खाने कहा गया। बचपन का सबक इन दोनो से बचाता रहा। आज जब जडी-बूटी पर लिखता हूँ तो बहुत सारे रेडियो जाकी के सन्देश आते है कि आवाज सुधारने वाली वनस्पति बताये। आज बडे खजाने की जानकारी है मेरे पास। मुलैठी से लेकर बच तक। काश यह जानकारी पहले भी होती।


मेरी इस लेखमाला से सबसे अधिक लाभ यह हुआ कि इसे पढकर माताजी ने इच्छा जतायी है कि वे भी अपने अनुभव लिखना चाहती है। वे आकाशवाणी मे नाट्य कलाकार है और एक सफल लेखक है। पर इंटरनेट और कम्प्यूटर से कोसो दूर है। पहले सोचा कि मै ही उनका अनुभव पोस्ट कर दूंगा पर युनुस जी के उत्साहवर्धन के बाद मैने उनका ब्लाग बनाया है स्नेह बिखेरती जिन्दगी और वे जल्दी ही रेडियोनामा मे रेडियो से जुडे अपने अनुभव लिखेंगी। उम्मीद है कि पिताजी को भी इससे जोड पाऊंगा क्योकि उनको रेडियो के असली जमाने के बारे मे जानकारी है। उनके पास आज भी तरह-तरह के नये-पुराने रेडियो है। उन्हे पढना सचमुच सभी के लिये रोचक रहेगा।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Thursday, March 13, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-4

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-4


- पंकज अवधिया


कुछ वर्षो पहले जब मै रायगढ के मुडागाँव पहुँचा तो देवनाथ को अकेले पाया। बडा ही उदास सा कोने मे बैठा था। घर के लोग काम पर गये थे। देवनाथ की उम्र 18 से ऊपर है पर देखने से लगता है कि बच्चा है। उसके गाँव का पानी उसके लिये अभिशाप बन गया। पानी मे फ्लोराइड की बहुत अधिक मात्रा है। यही कारण है कि गाँव का एक बडा हिस्सा शारीरिक और मानसिक विकृति से जूझ रहा है। देवनाथ के शरीर मे चौबीसो घंटे तेज दर्द होता रहता है। जब घर वाले कुछ कमाते है तो दर्द मिटाने वाले इंजेक्शन का जुगाड होता है। मै अपनी रपट के लिये देवनाथ की तस्वीरे उतारने लगा। मन था कि कुछ मदद करुँ उसकी पर समझ मे नही आया। उससे पूछा कि पूरा दिन कैसे कटता है तो उसने बताया पहले रेडियो था पर वह खराब हो गया है। आनन-फानन मे उसके लिये रेडियो की व्यवस्था की गयी। उसके चेहरे मे खुशी छा गयी। मानो सारा दर्द काफूर हो गया। ऐसा जादू चलता है रेडियो का भारत मे।


बचपन मे पार्टी देकर जन्म दिवस मनाने के बाद ऐसा लगा कि जन्मदिन के दिन कुछ भलाई वाला काम करना चाहिये। चूँकि जुलाई के जन्मदिन पडता है इसलिये मई-जून मे छुट्टियो मे नगर के ब्लाइंड स्कूल मे चला जाया करता था। दो महिने बच्चो के साथ गुजारने के बाद फिर जन्मदिन के दिन बच्चो के साथ खुशियाँ मना लेता था। जब भी मै बच्चो जोकि उम्र मे मुझसे थोडे ही छोटे होते थे, के पास जाया करता तो उन्हे रेडियो से चिपका हुआ पाता था। वे बडे गौर से रेडियो सुनते थे और उदघोषको की कमाल की नकल उतारते थे। स्कूल मे टी.वी. भी था पर रेडियो की ओर झुकाव ज्यादा था। वे देख नही पाते थे इसलिये मै पूरे समय देखना शब्द न निकले मुँह से इस प्रयास मे रहता था पर वे बेझिझक कहते थे कि अभी रेडियो सुन रहे है और अब टी.वी. देखना है। उनसे बात करने पर वे अक्सर कहते थे कि उनके जैसा जीवन जी रहे लोग क्यो नही उनके दर्द की बाते रेडियो मे करते है? वे मुझसे पूछते थे कि क्या कभी मैने ब्लाइंड उदघोषक को व्लाइंड बच्चो की बाते करते सुना है? मै निरुत्तर हो जाता था। यदि मै गलत नही हूँ तो ऐसा कार्यक्रम अभी भी नही आता है।


पिछले कुछ दशको से मेरी नजर ग्रामीण हाटो पर है और इनके बदलते स्वरूप पर मै लगातार लिखता रहा हूँ। जब से छत्तीसग़ढ मे एफ.एम. चैनलो की बाढ आयी है तब से हाटो मे रेडियो की दुकान विशेष आकर्षण का केन्द्र बन गयी है। सभी के लिये रेडियो है। सी.डी. का क्रेज कुछ घट सा गया है। सुबह-सुबह काम की तलाश मे जब ग्रामीण साइकिल मे सैकडो की संख्या मे शहर आते है तो रेडियो सुनते (या कहे सुनाते) आते है। यह सब बडा ही रोचक दृश्य उपस्थित करता है।



तो बच्चो रेडियो कितने प्रकार के होते है? आधुनिक गुरुजी अब यह प्रश्न कर सकते है। दो प्रकार के। एक घर मे सुनने वाला और दूसरा सब जगह सुना जाने वाला। आप भी चौक गये ना। जी, मेरा वर्ल्ड स्पेस रेडियो केवल घर मे चलता है। उसे लटकाकर मै जडी-बूटी खोजने जंगल जाने की सोचूँ तो यह सम्भव नही है। कम से कम अभी तो सम्भव नही है। वैसे यह उम्मीद की जा सकती है जल्दी ही कार रेडियो मे भी वर्ल्ड स्पेस के चैनलो को सुना जा सकेगा।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

Saturday, March 8, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-3

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-3

- पंकज अवधिया

जिन दिनो मै पढाई कर रहा था उन दिनो गजलो का दौर अपने चरम पर था। पंकज उधास से लेकर जगजीत सिह जैसे गायको के कैसेट सुने जाते थे। ये गजले मुझे बहुत अच्छी लगती थी पर शराब और शबाब पर आधारित होने के कारण इन्हे घर मे सुने तो सुने कैसे? बडे भाई काँलेज पहुँचने वाले थे सो वे सुन सकते थे। इसी बहाने मै भी सुन लेता था। फिर जब मै सुनने लायक (?) हुआ तो यह दौर ही खत्म हो गया। कैसेट मिलने बन्द हो गये। रेडियो पर भी कम ही गजले आती थी। एक दशक बाद जब घर पर वर्ल्ड स्पेस रेडियो लगाया तो पता चला कि गजलो के लिये चौबीस घंटो का एक अलग चैनल ही है। रेडियो फलक से रुबरू हुआ और यह मेरा पसन्दीदा चैनल बन गया। इस चैंनल मे भारतीय गायको के अलावा पाकिस्तानी गायको को सुनने मिलता है। कव्वालियाँ भी सुनी जा सकती है। जो उदघोषक इसमे बोलते है उनकी उर्दू बडी ही उम्दा होती है। जाहिर है बहुत से शब्द समझ से परे होते है पर जिस अन्दाज से उन्हे प्रस्तुत किया जाता है वह मन को प्रसन्न कर देता है। लाइव रिकार्डिंग का एक बडा संग्रह है इनके पास। तलत अजीज को महफिलो मे सुनना एक अलग ही अनुभव है। आबिदा परवीन के सूफीयाना गीतो की बात निराली है।


इस चैनल मे एक बात बडी अजीब लगती है और वह है एक ही उदघोषक नाम बदल-बदल कर अलग-अलग आवाजो मे कार्यक्रम पेश करते है। जब मै लगातार आठ घंटो तक इसे सुनता हूँ तो इस नाटकीयता से ऊब जाता हूँ। क्या इतने बडे देश मे प्रस्तुतकर्ताओ की कमी है? उम्मीद करता हूँ कि इन उदघोषको के अलग-अलग रूपो को अलग-अलग तनख्वाह भी मिलती होगी। मेरे एक मित्र ने कहा कि हो सकता है उदघोषक अलग-अलग हो पर किसी एक से प्रभावित हो इसलिये सब उसी के जैसे बोलते हो। यह सम्भव है पर यदि ऐसा ही है तो भी दर्शको पर इसका अच्छा असर नही पड रहा है। वर्ल्ड स्पेस के सभी चैनल मे कमोबेश यही स्थिति लगती है। चैनल स्पीन मे जो उदघोषक रवि बन कर आता है वही फरिश्ता मे प्रेमचन्द बन जाता है। फिर वही गन्धर्व नामक चैनल पर भी आ जाता है। यदि यह कोई नया प्रयोग है तो भी ठीक नही जान पडता है।


इतने सारे रेडियो के आने से अब बीबीसी सुनना एकदम बन्द सा हो गया है। वर्ल्ड स्पेस के एक चैनल मे बीबीसी अंग्रेजी सुना जा सकता है पर महिने भर मे कभी ही इसका मौका आता है। बीबीसी हिन्दी सुनने से जो ज्ञानवर्धन होता है उसकी बात ही कुछ और है। अब लगता है कि इसके लिये अलग से समय निकालना होगा।


मै अपने हेल्थ क्लब के मैनेजर से जब पूछता हूँ कि कौन सा चैनल ज्यादा सुनाते हो लोगो को तो वह सिर पकडकर कहता है कि दिन भर एफ एम सुनते (और सुनाते) रहने के लिये हौसला चाहिये। गाडी चलाते समय सुनना अलग बात है और एक ही तरह के तेज संगीत को दिन भर सुनना अलग बात है। हेल्थ क्लब मे रेडियो मिर्ची बजता था पर अब कुछ लोग घर से सीडी ले आते है और उसे ही बजवाते है। स्थानीय एफ.एम. चैनल के एक ही तरह के विज्ञापनो से लोग अब ऊब रहे है। अभी जो तीन एम.एम. चैनल रायपुर मे आ रहे है उसमे से लोग कम विज्ञापन वाले चैनलो को सुनना पसन्द कर रहे है।


मै ऐसे चैनल की खोज मे हूँ जो दिन भर विज्ञान की बात बताये जैसे कि टीवी पर कई चैनल है। रेडियो पर यूजीसी के कार्यक्रमो को सुनने का सुझाव न दे। उन्हे सुनते ही क़क्षा का माहौल तैयार हो जाता है और रोंगटे खडे हो जाते है। बातो-बातो मे जो ज्ञान बाँटे क्या ऐसा कोई चैनल निकट भविष्य मे आयेगा भारत मे?


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

सम्बन्धित लेख

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-1

Saturday, March 1, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

- पंकज अवधिया

दिसम्बर 2007 मे मेरी मुलाकात पास्तापुर के उत्साही कार्यकर्ताओ से हुयी जिनकी संस्था डेक्कन डेव्हलपमेंट सोसायटी को हाल ही मे कम्युनिटी रेडियो का लाइसेंस मिला है। मुझसे नरसम्मा नामक महिला सदस्या से मिलने कहा गया। इस संस्था मे कई नरसम्मा है। मेरी उलझन देखकर मुझसे रेडियो नरसम्मा से मिलने कहा गया। मेरी रेडियो नरसम्मा से लम्बी बात हुयी दुभाषिये की मदद से। उनका रेडियो दस कि.मी. के दायरे मे ग्रामीणो के बीच चलने वाला है। इसके लिये भारत सरकार ने विशेष अनुमति दी है। उस समय रेडियो नरसम्मा सहित बहुत से सदस्य इसकी ट्रेनिग ले रहे थे। मैने पूछा कि क्या आपके रेडियो मे फिल्मी गाने बजेंगे। तो उन्होने कहा कि नही यह ग्रामीणो के लिये है और इसमे उन्ही के लिये आवश्यक जानकारी होगी।

ऐसी ही बात मुझे उस समय बतायी गयी जब मै आकाशवाणी के चौपाल कार्यक्रम के बतौर विशेषज्ञ जाता था। किसानो को लोकगीत सुनाये जाते है पर बीडी जलाइ ले जैसे गीत नही सुनाये जाते है। क्यो नही सुनाये जाते है? क्या ये गाने गाँवो मे नही बजते? क्या किसान इसे सुनना पसन्द नही करते? यह बडी अजीब सी मानसिकता लगती है हमारे रेडियो चैनलो की। किसान भी इंसान है और यदि आप उन्हे जानकारी के साथ पसन्दीदा गीत सुनायेंगे तो वे और अधिक मन लगाकर आपके कार्यक्रम को सुनेगे। अब तो यह और जरुरी हो गया है क्योकि बहुत सारे निजी चैनल आ गये है। ऐसे मे चौपाल जैसे कार्यक्रमो को सुधारने की जरुरत है। हमारे मित्र कहते है कि आँख बन्द कर भी आप दूर से ऐसे कार्यक्रमो के प्रस्तुतकर्ताओ की आवाज सुन ले तो आपका मन टी.वी. बन्द करने का हो जायेगा। एक ही तरह के प्रस्तुतिकरण से हटकर अब विविधता लाने की जरुरत है।

मेरे वर्ल्ड स्पेस रेडियो की तुलना पिताजी पहले जमाने के लायसेंसी रेडियो से करते है। पहले साल मे 15 रुपये बतौर रेडियो से लाइसेंस के लिये देने पडते थे। बाद मे सात रुपये लिये जाने लगे। पहले रेडियो के प्रसारण को साफ सुनने के लिये एरीयल ठीक करना पडता था। आज भी वैसा ही सब कुछ है। मुझे छत पर जाकर एंटीना घुमाना पडता है और नीचे पिताजी वर्ल्ड स्पेस रेडियो के पास खडे होकर बताते है कि प्रसारण ठीक आ रहा है या नही। सेटेलाइट के इस युग मे ऐसे प्रसारण को देख वे दंग़ रह जाते है।

वर्ल्ड स्पेस के चैनल 178 हाप को मै ज्यादा सुनता हूँ। इसमे साठ और सत्तर के दशक के अंग्रेजी गाने सुनाये जाते है। इन्हे सुनने पर दुख भी होता है। इन गीतो को सुनने पर बहुत से हिन्दी गाने याद आ जाते है और यह भ्रम टूट जाता है धुनो की चोरी इस जमाने मे ही हो रही है। बहुत पुराने अंग्रेजी गीतो को सुनकर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराने हिदी गाने की धुने भी कैसे बिना किसी झिझक पश्चिम से ले ली गयी।

रायपुर शहर मे आटो रिक्शा की सवारी ही अच्छी है भीड-भाड के कारण। पहले आटो वालो की बातचीत से शहर का हाल पता लग जाता था। अब तो वे अपने मे मगन रहते है। कोई रेडियो मिर्ची सुनता है तो कोई रंगीला। वे तेज आवाज मे इसे बजाते है और बडे ही उत्साहित नजर आते है। तारीफ मे कहते है कि कहाँ जाम लगा है यह भी रेडियो वाले बताते है। मुफ्त की इस सेवा को वे दिन भर सुनना चाहते है। उनका बस चले तो वे रात को भी न सोये। केवल रेडियो सुनते रहे। मुझे लगता है दिनभर चटपटी बाते करने वाले ये चैनल बीच-बीच मे ज्ञान की बाते भी कर दे तो यह एक बडी समाज सेवा हो जायेगी। लोग अपने माता-पिता की बात भले न सुने पर रेडियो की बात भला कैसे टालेंगे।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


Tuesday, February 26, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो- डॉ पंकज अवधिया की अतिथी पोस्ट

जब पिछले वर्ष मई मे मैने मधुमेह पर पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर आधारित रपट लिखना शुरु किया तो मुझे 14-16 घंटे कम्प्यूटर पर बैठना पडा। तब से आज तक यह कार्य जारी है और लगता है कि 2010 तक चलता रहेगा। अकेले काम करना होता है इसलिये कभी-कभी बडी बोरियत होती है। इस समय मेरा वर्ल्ड स्पेस रेडियो सुनना बहुत काम आ रहा है। इतने सारे चैनल है पर मै अंग्रेजी गानो का शौकीन हूँ विशेषकर कंट्री गानो का। ये गाने मुझे और कही सुनने नही मिलते। आजकल पैसे देकर कौन रेडियो सुनता है? पिताजी के कमरे मे लगातार विविध भारती बजता रहता है और माताजी भी जब भी समय मिलता है यही सुनती है। शहर मे निजी एफ एम चैनलो की बाढ आ गयी है पर वे इतना जल्दी बोलते है कि सुनने के लिये सब काम छोडना पडता है। शाम को जब मै पास के हेल्थ क्लब मे जाता हूँ तो वहाँ जिम मे निजी चैनल विशेषकर रेडियो मिर्ची बजता है। युवा बडे मजे से गाते हुये व्यायाम करते रहते है।

तरह-तरह के चैनलो ने तो मानो क्रांति ही ला दी है। रायपुर मे पहचान के कई युवा इन निजी चैनलो मे काम करते है। उनपर काम का बडा दबाव रहता है पर फिर भी रेडियो पर उन्हे सुनने से ऐसा नही लगता। पिताजी मेरे वर्ल्ड स्पेस प्रेम पर अचरज करते है। एक साल रेडियो सुनने के लिये 1800 को वे फिजूलखर्ची मानते है। मै कहता हूँ कि इसमे विज्ञापन नही आते तो वे कहते है विविध भारती मे भी तो कम विज्ञापन आते है। जब मै हिंन्दी गाने सुनता हूँ तो वे अपने रेडियो की आवाज बढा देते है ताकि मै जान सकूँ कि मुफ्त मे भी ऐसे गाने सुने जा सकते है।

दोपहर को जब मै खाने की मेज पर पहुँचता हूँ तो माताजी का सखी सहेली कार्यक्रम चलता रहता है। लोग फोन करते रहते है और उन्हे गाने सुनाये जाते है। बीच मे खाने से पहले चाय के लिये किचन चला गया तो माँ कहती है देखो ये तुम्हारे व्लाग वाले युनुस खान बोल रहे है। युनुस जी को माताजी बडे दिनो से सुन रही है। एक बार तो उन्होने शनिवार के कार्यक्रम मे प्लास्टिक खाने वाले क़ीडे की खोज के बारे मे बताया बडे ही रोचक ढंग से। माताजी ने सब को रेडियो के पास बुला लिया। माता-पिता की खुशी का ठिकाना नही रहा। आखिर युनुस खान उनके अपने बच्चे की वैज्ञानिक उपलब्धियो के विषय मे बता रहे थे। मै तब युनुस जी के ब्लाग को नही जानता था। मुझे भी अचरज हुआ कि मेरी इस खोज को कैसे इन्होने इतने रोचक ढंग से प्रस्तुत किया।

बतौर बाल कलाकार मैने आकाशवाणी रायपुर मे काम किया। बच्चो के साप्ताहिक कार्यक्रम किसलय मे कम्पीयर रहा। मिर्जा मसूद और कमल शर्मा जी के साथ काम किया। कल्पना य़ादव और लाल राम कुमार सिंग जी के सानिध्य मे सीखा। पता नही अब कमल शर्मा जी को ये याद भी है या नही। ये सभी नाटक पिताजी ने टेप करके रखे है।

लीजिये अभी वर्ल्ड स्पेस के उर्दू चैनल मे मिर्जा गालिब के खत पढे जा रहे है। मै यह कार्यक्रम इसलिये सुनता हूँ क्योकि उस समय के हालात पता चल जाते है और गजले भी सुनने को मिल जाती है। पर उदघोषक कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिये मिर्जा गालिब की आवाज मे ही खत पढते है। इस ढंग से हमारे परिवार को इतनी एलर्जी हो गयी है कि अब यह कार्यक्रम मुश्किल से सुन पाते है। मैने उन्हे लिखा है पर अभी तक तो उस बेरुखी आवाज का कहर जारी है।

पंकज अवधिया
http://www.pankajoudhia.com

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