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Saturday, March 1, 2008

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

मेरे आस-पास बोलते रेडियो-2

- पंकज अवधिया

दिसम्बर 2007 मे मेरी मुलाकात पास्तापुर के उत्साही कार्यकर्ताओ से हुयी जिनकी संस्था डेक्कन डेव्हलपमेंट सोसायटी को हाल ही मे कम्युनिटी रेडियो का लाइसेंस मिला है। मुझसे नरसम्मा नामक महिला सदस्या से मिलने कहा गया। इस संस्था मे कई नरसम्मा है। मेरी उलझन देखकर मुझसे रेडियो नरसम्मा से मिलने कहा गया। मेरी रेडियो नरसम्मा से लम्बी बात हुयी दुभाषिये की मदद से। उनका रेडियो दस कि.मी. के दायरे मे ग्रामीणो के बीच चलने वाला है। इसके लिये भारत सरकार ने विशेष अनुमति दी है। उस समय रेडियो नरसम्मा सहित बहुत से सदस्य इसकी ट्रेनिग ले रहे थे। मैने पूछा कि क्या आपके रेडियो मे फिल्मी गाने बजेंगे। तो उन्होने कहा कि नही यह ग्रामीणो के लिये है और इसमे उन्ही के लिये आवश्यक जानकारी होगी।

ऐसी ही बात मुझे उस समय बतायी गयी जब मै आकाशवाणी के चौपाल कार्यक्रम के बतौर विशेषज्ञ जाता था। किसानो को लोकगीत सुनाये जाते है पर बीडी जलाइ ले जैसे गीत नही सुनाये जाते है। क्यो नही सुनाये जाते है? क्या ये गाने गाँवो मे नही बजते? क्या किसान इसे सुनना पसन्द नही करते? यह बडी अजीब सी मानसिकता लगती है हमारे रेडियो चैनलो की। किसान भी इंसान है और यदि आप उन्हे जानकारी के साथ पसन्दीदा गीत सुनायेंगे तो वे और अधिक मन लगाकर आपके कार्यक्रम को सुनेगे। अब तो यह और जरुरी हो गया है क्योकि बहुत सारे निजी चैनल आ गये है। ऐसे मे चौपाल जैसे कार्यक्रमो को सुधारने की जरुरत है। हमारे मित्र कहते है कि आँख बन्द कर भी आप दूर से ऐसे कार्यक्रमो के प्रस्तुतकर्ताओ की आवाज सुन ले तो आपका मन टी.वी. बन्द करने का हो जायेगा। एक ही तरह के प्रस्तुतिकरण से हटकर अब विविधता लाने की जरुरत है।

मेरे वर्ल्ड स्पेस रेडियो की तुलना पिताजी पहले जमाने के लायसेंसी रेडियो से करते है। पहले साल मे 15 रुपये बतौर रेडियो से लाइसेंस के लिये देने पडते थे। बाद मे सात रुपये लिये जाने लगे। पहले रेडियो के प्रसारण को साफ सुनने के लिये एरीयल ठीक करना पडता था। आज भी वैसा ही सब कुछ है। मुझे छत पर जाकर एंटीना घुमाना पडता है और नीचे पिताजी वर्ल्ड स्पेस रेडियो के पास खडे होकर बताते है कि प्रसारण ठीक आ रहा है या नही। सेटेलाइट के इस युग मे ऐसे प्रसारण को देख वे दंग़ रह जाते है।

वर्ल्ड स्पेस के चैनल 178 हाप को मै ज्यादा सुनता हूँ। इसमे साठ और सत्तर के दशक के अंग्रेजी गाने सुनाये जाते है। इन्हे सुनने पर दुख भी होता है। इन गीतो को सुनने पर बहुत से हिन्दी गाने याद आ जाते है और यह भ्रम टूट जाता है धुनो की चोरी इस जमाने मे ही हो रही है। बहुत पुराने अंग्रेजी गीतो को सुनकर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराने हिदी गाने की धुने भी कैसे बिना किसी झिझक पश्चिम से ले ली गयी।

रायपुर शहर मे आटो रिक्शा की सवारी ही अच्छी है भीड-भाड के कारण। पहले आटो वालो की बातचीत से शहर का हाल पता लग जाता था। अब तो वे अपने मे मगन रहते है। कोई रेडियो मिर्ची सुनता है तो कोई रंगीला। वे तेज आवाज मे इसे बजाते है और बडे ही उत्साहित नजर आते है। तारीफ मे कहते है कि कहाँ जाम लगा है यह भी रेडियो वाले बताते है। मुफ्त की इस सेवा को वे दिन भर सुनना चाहते है। उनका बस चले तो वे रात को भी न सोये। केवल रेडियो सुनते रहे। मुझे लगता है दिनभर चटपटी बाते करने वाले ये चैनल बीच-बीच मे ज्ञान की बाते भी कर दे तो यह एक बडी समाज सेवा हो जायेगी। लोग अपने माता-पिता की बात भले न सुने पर रेडियो की बात भला कैसे टालेंगे।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)


2 comments:

yunus said...

पंकज भाई सामुदायिक रेडियो के मामले में भारत बहुत पीछे है...यहां तक कि अफ़्रीक़ा के कई देशों में ऐसे सामुदायिक रेडियो हैं जहां कोई भी ग्रामीण जाकर अपने मन की बात कर सकता है । गाना गा सकता है । रेसिपी सुना सकता है । मतलब ये कि शालीनता के दायरे में जो चाहे वो प्रस्‍तुति कर सकता है ।
चौपाल के बारे में आपने सही कहा, लोकभाषा में हुई इसकी अलग अलग केंद्रों की इसकी प्रस्‍तुतियां बेहद लोकप्रिय हुई हैं ।
ऑटो में रेडियो तो मुंबई में भी सुनने में मिलता है । कभी भूले भटके ऑटो में बैठें तो पहले उसे रेडियो बंद करने को कहते हैं ताकि उससे बतियाने का मज़ा लिया जा सके ।
आपकी इस श्रृंखला में रेडियो के नए आयाम सामने आ रहे हैं । जारी रखिए ।

anitakumar said...

पंकज जी वर्ड स्पेस तोह हम भी सुनते हैं पर खालिस हिन्दी गाने, आप के पिता जी की बातें भी खूब मजेदार हैं।

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