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Saturday, May 22, 2010

आकाशवाणी इन्दौर आज हो गया है पूरे पचपन बरस का



मालवा की सांस्कृतिक राजधानी इन्दौर का रेडियो स्टेशन मालवा हाउस के नाम से जाना जाता है. 22 मई 1955 को शुरू हुए यहाँ के आकाशवाणी केन्द्र ने रेडियो नाटकों,सुगम संगीत रचनाओं और जनपदीय कार्यक्रमों के ज़रिये देश भर में अपनी एक ख़ास पहचान बनाई है. हाँ यह भी सच है कि अस्सी के दशक तक इस केन्द्र की जो धाक थी वह अब बीते कल की बात हो चुकी है. मालवा हाउस अब नाम का रेडियो स्टेशन रह गया है जो विविध भारती एफ़.एम.के ट्रांसमिशन और अपने आंचलिक केन्द्र से समाचारों,वार्ताओं और खेती-किसानी के औपचारिक कार्यकमों का रस्मी केन्द्र बन गया है. इसी केन्द्र से कभी रचनात्मकता की सुरभि पूरे देश में फ़ैलती रही है.

कोई भी संस्थान उसके दरो-दीवार या तकनीक से समृध्द नहीं होता. उसे सवाँरते हैं कुछ लोग और उनकी कल्पनाशीलता,रचनात्मकता और समर्पण.जयदयाल बवेजा,केशव पाण्डे,नन्दलाल चावला और पी.के शिंगलू जैसे केन्द्र निदेशकों और स्वतंत्रकुमार ओझा,भाईलाल बारोट,नित्यानंद मैठाणी,विश्वदीपक त्रिपाठी (बीबीसी)भारतरत्न भार्गव(बीबीसी) निम्मी माथुर(अब मिश्रा-विविध भारती,मुम्बई) वीरेन मुंशी(बीबीसी) रमेश नाडकर्णी, सुनीलकुमार (आर.डी.बर्मन के अरेंजर,जिन्होंने बाद में रफ़ी साहब से वह प्रसिध्द ग़ैर फ़िल्मी रचना गवाई;रह न सकेगी प्रीत कुँवारी मेरी सारी रात) लेखा मेहरोत्रा(मुम्बई दूरदर्शन और वॉइस ऑफ़ अमेरिका) अमीक़ हनफ़ी,राकेश जोशी,प्रभु जोशी,इंदु आनंद,रणजीत सतीश,बी.एन.बोस,नरेन्द्र पण्डित कुछ ऐसे सशक्त नाम हैं जिन्होंने अपने ख़ून को पसीना कर इस केन्द्र की धजा को ऊँचा फ़हराया.

ब्रज शर्मा,ओम शिवपुरी,सुधा शिवपुरी, नरहरि पटेल,राजीव वर्मा,सुमन धर्माधिकारी,विजय डिंडोरकर,तपन मुखर्जी,अशोक अवस्थी,जैसे अतिथि कला्कारों ने अपनी प्रतिभा और आवाज़ के जादू के माध्यम से इस केन्द्र के नाटकों को देशव्यापी पहचान दिलवाई.प्रभु जोशी और राकेश जोशी ने मिल कर न जाने कितनी बार आकाशवाणी इन्दौर के स्टुडियोज़ में रचे प्रायोगिक नाट्य प्रस्तुतियों/रूपकों के लिये राष्ट्रीय सम्मान अर्जित किये.चेखव,मोपासा,कर्तारसिंह दुग्गल,रेवतीसरन शर्मा,चिरंजीत,एम.पी.लेले की रचनाओं पर एकाग्र नाटकों ने मालवा हाउस को देश भर में लोकप्रियता दी. ,शरद जोशी,इलाचंद्र जोशी,रमानाथ अवस्थी, देवराज दिनेश, डॉ.शिवमंगल सिंह सुमन,कविवर दिनकर, महादेवी वर्मा, रामनारायण उपाध्याय , बालकवि बैरागी,गिरिवरसिंह भँवर,दिनकर सोनवलकर,देवव्रत जोशी जैसे साहित्यिक हस्ताक्षरों की दुर्लभ रेकॉर्डिंग्स मालवा हाउस से बज कर पूरी मालवा-निमाड़ जनपद को आनंदित करती रही है.राजेन्द्र माथुर,राहुल बारपुते द्वारा लिये गये कई साक्षात्कार मालवा हाउस की अमानत हैं.

शास्त्रीय संगीत रचनाओं के संग्रह के मामले में भी यह मालवा हाउस का सौभाग्य रहा उस्ताद अमीर ख़ाँ और पण्डित कुमार गंधर्व की कर्मभूमि मालवा होने से समय समय पर इस केन्द्र को बहुत दुर्लभ रचनाओं के संचयन का अवसर मिला. अमीर ख़ाँ साहब तो पहले-पहल इन्दौर केन्द्र पर आकर अपना गायन आने को राज़ी ही नहीं हुए थे क्योंकि उन्हें पहले स्वर-परीक्षण का आग्रह भेजा गया. ख़ाँ साहब ने कहा हमारा ऑडिशन कौन लेगा ? उनकी बात वाजिब भी थी. कालांतर में उन्हें समझाया गया कि यह तो मात्र एक औपचारिकता है. बेग़म अख़्तर,उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ,उस्ताद बिसमिल्ला ख़ान,उस्ताद रज्जब अली ख़ाँ, पं.भीमसेन जोशी,पं.मल्लिकार्जुन मंसूर मुबारक बेग़म,निर्मला अरूण (सिने अभिनेता गोविंदा की माँ)गिरिजा देवी,परवीन सुल्ताना, उस्ताद अहमदजान थिरकवा,उस्ताद जहाँगीर ख़ाँ,पण्डित रविशंकर,संगीतकार नौशाद,शोभा गुर्टू,संगीतकार जयदेव,प्रभा अत्रे,शंकर-शंभू, जैसे संगीतज्ञों की प्रस्तुतियों और साक्षात्कारों की कई रेकॉर्डिंग्स ने रेडियो-प्रेमी श्रोताओं के कानों को मालामाल किया है.गोस्वामी गोकुलोत्सवजी महाराज,अहमद हुसैन-मो.हुसैन,रोशन भारती,सुमना रॉय,बेला सावर,सुशील दोशी,डॉ.राहत इन्दौरी जैसे कई नामों को उनका नाम और काम मुक़म्मिल करने में आकाशवाणी इन्दौर सदा सहाय रहा है.

इस अंचल की बोलियों मालवी और निमाड़ी के प्रसार और भोले-भाले किसान भाई बहनों तक उन्हीं के अंदाज़ में प्रसारण को पहुँचाने का काम भी मालवा हाउस ने किया. नंदा-भेराजी और कान्हा जी की आवाज़ में खेती-ग्रहस्थी और ग्रामसभा कार्यक्रमों को लाखों ग्रामवासियों तक पहुँचाया. कृष्णकांत दुबे (नंदाजी) और सीताराम वर्मा(भेराजी) तो मालवा-निमाड़ के महानायक थे.

ज़माना तेज़ी से बदला है और एफ़.एम.रेडियो चैनल्स के उदभव ने आकाशवाणी केन्द्रों के लिये नई चुनौती पेश की है. अब आकाशवाणी या मालवा हाउस की रचनात्मकता या प्रसारण विस्तार या उसके सूचना तंत्र में श्रोताओं की रूचि घटती जा रही है. टी.वी.ड्राइंगरूम का स्थायी सदस्य हो गया है. रही सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी है.
फ़िर भी अपने स्वर्णिम अतीत से जगमगाते मालवा हाउस के बारे में बतियाना और जुगाली करना हमेशा से सुख देता रहा है. दु:ख इस बात का है कि वर्तमान में मालवा हाउस में काम कर रहे लोगों में भावनाओं का वैसा ज्वार नहीं जिससे किसी भी रेडियो स्टेशन की गुणवत्ता निखरती और सँवरती है.नाटक का निर्माण बंद है,शास्त्रीय संगीत की रेकॉर्डिंग ख़ारिज और सुगम संगीत का निष्कासन.यदि कोई नया कार्यक्रम बनाना चाहता है तो उसे कहा जा रहा है आप ख़ुद बाज़ार जाकर प्रायोजक ढूँढिये . अब मालवा हाउस में काम करने वालों के लिये यह केन्द्र महज़ एक नौकरी हो गया है.उसके परिसर से आत्मीयता के तक़ाज़े गुम हैं और किसी काम को बेहतर अंजाम देने का जज़्बा ग़ायब. पूरा स्टेशन एनाउंसर्स के हवाले है जो रेकॉर्डिंग भी करते हैं,उदघोषणाएं भी और डबिंग भी. कॉंट्रेक्ट पर उदघोषकों के पास न उच्चारण का सलीक़ा है न भाषा का प्रवाह. टेक्नीशियंस के हवाले मालवा हाउस से वह कार्य-संस्कृति विदा हो चुकी है जिसके लिये उसकी ख्याति थी. पचपन का मालवा हाउस आई.सी.यू. में है...भगवान उसे फ़िर भी लम्बी उम्र दे.

(यही लेख प्रमुख हिन्दी दैनिक नईदुनिया ने आज ही प्रकाशित किया है. मालवा हाउस का चित्र नईदुनिया से ही साभार)

Sunday, July 5, 2009

युनूस जी की डाँट, HAM रेडियो, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड

मैं तो कहूँगा कि युनूस जी ने डाँट लगाई है! अब भले ही वे इंकार कर दें, लेकिन उन्होंने कहा है कि दो पोस्ट लिख कर आगे कुछ लिखो ही ना, ये अच्छी बात नहीं है। डाँट सुनकर मुझे भी याद आया कि ज्ञानदत्त जी के ब्लॉग पर आई सतीश सक्सेना जी की आग्रहनुमा टिप्पणी के बहाने हमने एक पोस्ट लिख कर बताया था कि कि शौकिया रेडियो ऑपरेटर को HAM क्यों कहते हैं। उसकी अगली कड़ी में जिज्ञासा शांत करने की कोशिश की गयी थी कि सोनिया गांधी, अमिताभ बच्चन जैसे शौकिया रेडियो ऑपरेटर (HAM) आख़िर करते क्या हैं!? अगली पोस्ट का संकेत देते हुये हमने कुछ और रोचक जानकारियां तथा भारत सहित, दुनिया के कुछ चर्चित व्यक्तियों की HAM पहचान (कहें तो आईडी) देने की बात की थी जिससे आप उनसे बतिया सकें! बस इसी बात को लेकर डाँट पड़ गई कि अगली कड़ी कहाँ है?


लापरवाही का यह हाल है कि पिछले दिनों मीडिया द्वारा अनदेखा किया गया लिम्का बुक का रिकॉर्ड भी हमें अगली किसी पोस्ट के लिए प्रेरित नहीं कर सका था। रिकॉर्ड यह था कि पहली बार एक 22 वर्षीया शौकिया रेडियो ऑपरेटर भारतीय युवती ने 12 सद्स्यों वाले अंतर्राष्ट्ररीय अभियान में हिस्सा लिया। वह इस समूह की इकलौती महिला सदस्य थीं। बात यहीं खतम नहीं हो जाती। रिकॉर्ड यह भी है कि International Dxpedition TI9KK, Costa Rica अभियान में यह पहली भारतीय नागरिक थीं। इस अनोखे रिकॉर्ड धारी, हैदराबाद निवासी युवती के अभियानों, रिकॉर्डों आदि की जानकारी यहाँ देखी जा सकती है। सुश्री एस यामिनी स्कूलों, इंजीनियरिंग कालेजों, आईआईटी के छात्रों को प्रशिक्षण देती हैं। शौकिया रेडियो पर सेमिनार का आयोजन भी करती हैं।


अब क्या किया जाये? सोचते हुये पोस्ट लिखने बैठा तो वह तमाम प्रश्न सामने आ गये जो जिज्ञासुयों ने लिख भेजे थे ईमेल में। पहला प्रश्न तो यही था कि एक शौकिया रेडियो ऑपरेटर बनने के लिए क्या करना पड़ता है? इसका जवाब कुछ इस तरह है कि यह दुनिया के उन गिने-चुने शौक में से एक है जिसके लिए सरकारी लाइसेंस की आवश्यकता पड़ती है। शौकिया रेडियो रखने व संचालित करने के लिये 12 वर्ष से अधिक की उम्र का कोई भी नागरिक मुख्यत: तीन विषयों I) Morse Code (Transmission & Reception) ii) Communication Procedure iii) Basic Electronics की परीक्षा में सफल होने के बाद लाइसेंस प्राप्त कर सकता है, जिसे भारत सरकार के सूचना मंत्रालय के अंतर्गत दूरसंचार विभाग के वायरलेस मॉनिटरिंग स्टेशन का प्रमुख अधिकारी जारी करता है। परीक्षा में शामिल होने के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं है। दो माह तक प्रतिदिन दो घंटे का प्रशिक्षण लेकर परीक्षा में शामिल हुया जा सकता है। स्वयं तैयारी कर के भी परीक्षा में शामिल हो सकते हैं। लगभग प्रतिमाह होने वाली परीक्षा की फीस विभिन्न लाईसेंस के अनुसार 10 से 25 रूपये है। आवेदन पत्र यहाँ से डाउनलोड किया जा सकता है।

Call Sign, एक शौकिया रेडियो ऑपरेटर की पहचान होता है। जिसके पहले अक्षर संबंधित देश को प्रदर्शित करते है और इसे International Telecommunications Union द्वारा जारी किया जाता है। हालांकि किसी खास घटनाक्रम के चलते किसी विशेष अक्षर का भी प्रयोग होता है ताकि उससे जुड़े रेडियो स्टेशनों की पहचान तुरंत हो सके। इन सब विशेषाधिकारों के कारण इन हैम को कुछ कार्य निषिद्ध भी हैं, जैसे कि: 1. वे अपने रेडियो का उपयोग कर धन नहीं कमायेंगे। (आखिर यह एक शौक है) 2. वे अपने रेडियो का उपयोग जनता के लिये किसी प्रसारण हेतु नहीं कर सकते। यह मात्र एक ऑपरेटर को दूसरे ऑपरेटर से वार्तालाप के लिए है। संगीत य अन्य कार्यों के लिए नहीं। कुछ अधिक जानकारी इस सरकारी वेबसाईट पर मिल सकेगी।

कुछेक जानकारीपरक वेबसाईट्स हैं:
  • हैम रेडियो पर एक भारतीय व्यवसायिक वेबसाईट http://www.hamradioindia.org/
  • आईआईटी कानपुर के सहयोग से सरकारी वेबसाईट http://www.vigyanprasar.gov.in/ham/hamnew.asp
  • हैम रेडियो पर केरल की वेबसाईट http://www.naturemagics.com/ham-radio/ham-radio.shtm
  • शौकिया रेडियो ऑपरेटरों के लिए एक भारतीय वेबसाईट http://www.indiahams.com/
  • भारतीय हैम रेडियो ऑपरेटरों के लिए वेबसाईट http://www.hamradioindia.com/
  • हैम रेडियो इंडिया की वेबसाईट http://www.hamradioindia.net/
  • अमैच्योर रेडियो सोसायटी ऑफ इंडिया की वेबसाईट http://www.arsi.info/
  • भारतीय शौकिया रेडियो ऑपरेटर पर विकिपीडिया पृष्ठ http://en.wikipedia.org/wiki/Amateur_radio_in_India
  • विकिपीडिया पर शौकिया रेडियो संबंधित पत्रिकायों की सूची http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_amateur_radio_magazines
भारत कुछ चर्चित व्यक्तियों के call sign नीचे दिये जा रहे हैं , जिनसे सीधी बात की जा सकती है
  • सोनिया गांधी VU2SON
  • प्रियंका गांधी VU2PGY
  • अमिताभ बच्चन VU2AMY
  • दयानिधि मारन VU2DMK
  • कमल हसन VU2HAS
  • कुमार बंगारप्पा VU3KMV

दुनिया के प्रभावशाली कुछ व्यक्तियों की सूची यहाँ , यहाँ तथा यहाँ देखें

यह विधा इतनी मह्त्वपूर्ण व उपयोगी है कि देश की प्रतिष्ठित लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी, मसूरी में हैम रेडियो के लिए अलग क्लब बना हुया है। जिसमें इसकी बारीकियों के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

एक बात याद की जाये तो भारत के प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय राजीव गांधी, अपने मारे जाने के चंद घंटो पहले भी 'ऑन एयर' थे तथा उनकी आखिरी 'कॉल' विशाखापत्तन्नम से थी। 1994 में राजीव गांधी फाऊँडेशन के सहयोग से नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अमैच्योर रेडियो ने राजीव गांधी फाँऊडेशन अमैच्योर रेडियो क्लब की स्थापना की थी जिसे राजीव गांधी का Call Sign, VU2RG दे दिया गया।

इस पोस्ट के लिखे जाते हुये मैंने भारत के लगभग हर छोटे-बड़े शहर में शौकिया रेडियो ऑपरेटर की तलाश की तो पाया कि लगभग हर शहर में कोई ना कोई मौज़ूद है, जो अपने रेडियो से दुनिया भर में नये मित्र बनाता जा रहा है, बतिया रहा है और घोर विपत्ति के समय अपने इस शौक की बदौलत, बचाव कार्यों में सहायता भी दे रहा है। जैसे भिलाई में VU2TLY, मेरठ में VU3KSG, रांची में VU2GBQ, धनबाद में VU2VLX, कानपुर में VU3WIX, बोकारो में VU3BTP, रोहतक में VU2BSB, नासिक में VU3PAQ, उज्जैन में VU3AAL, कोटा में VU2DPK, जयपुर में VU2EMZ , भोपाल में VU2HCZ , आगरा में VU2BX , ठाणे में VU2ATV, नागपुर में VU2SJA, विशाखापतनम में VU3RJY

क्या पता, अगली बार जब तलाशा जाये तो आपके शहर से आपका call sign व नाम दिखे ! लेकिन अब उम्मीद है कि युनूस जी मुस्कुरा रहे होंगे।






Wednesday, January 7, 2009

अमिताभ बच्चन, प्रियंका गाँधी जैसे शौकिया रेडियो ऑपरेटर (HAM) आख़िर करते क्या हैं!?

रेडियोनामा से जुड़ते हुए जब युनुस जी से मैंने आशंका जाहिर की थी कि नियमित नहीं रह पाऊँगा, किसी विषय विशेष पर लिखते हुए! तो उन्होंने सहजता पूर्वक जवाब दिया कि अपने समय और सुविधा के मुताबिक लिखिएगा। हैम रेडियो पर पहली पोस्ट 'शौकिया रेडियो ऑपरेटर को HAM क्यों कहा जाता है?' के बाद आजकल करते-करते अगली कड़ी के लिए समय बीतता जा रहा था। एक दिन हिम्मत कर ही ली आपको बताने की कि शौकिया रेडियो ऑपरेटर (HAM) की सूची में सोनिया गांधी, अमिताभ बच्चन, प्रियंका गांधी, कमल हसन, दयानिधि मारन, कुमार बंगारप्पा सहित दुनिया भर के नोबल पुरस्कार विजेता, अविष्कारक, अन्तरिक्ष यात्री, राजकुमार, तानाशाह, राजनीतिज्ञ, फिल्मी सितारे, वैज्ञानिक, धार्मिक गुरु, खिलाड़ी, इतिहासकार, सत्ता प्रमुख आदि शामिल हैं। जिनसे आप सीधा संपर्क रख सकते हैं! जैसा कि नाम से ही विदित है 'शौकिया'। तो शौक की कोई कीमत नहीं होती। उस पर खर्च किए गए धन के सामने कोई तर्क काम नहीं आता। अपने शौक का औचित्य सिद्ध करने वाले बहुतेरे मिल जायेंगे। इससे अधिक जानकारी तो शास्त्री जी से ही मिल पाएगी।

शौकिया रेडियो सचमुच एक शौक है, कहा जाए तो यह एक वैज्ञानिक शौक है, लेकिन एक आपात स्थिति या प्राकृतिक आपदा की परिस्थितियों में इस शौक की उपयोगिता नज़र आती है। जैसे आप पत्र-मित्र बनाते हैं, आजकल इन्टरनेट पर नेट मित्र से बतियाते, चैट करते हैं। वैसे ही अपना ख़ुद का दो-तरफा रेडियो बनाकर, उपयोग कर, पूरे विश्व में जाने-माने या अनजाने व्यक्तियों से संपर्क करने की उत्तेजना, आनंद से दो-चार हो सकते हैं, रेडियो मित्र बना सकते हैं। Indian Wireless Telegraph Rules 1978 के मुताबिक शौकिया रेडियो सेवा मतलब, a service of self training communication and technical investigations carried on by amateurs, that is, persons duly authorised under these rules interested in radio techniques solely with a personal aim and without pecuniary interest.

यह, रेडियो ऑपरेटरों के बीच आपसी संचार द्वारा, स्वयं सीखी जाने वाली एवं तकनीकी जांच प्रक्रिया है। मोबाईल फोन जैसे यंत्र की रेडियो तरंगों के उपयोग से, एक हैम रेडियो ऑपरेटर, विभिन्न संचार उपकरणों और प्रणालियों के सहारे, विभिन्न प्रयोग कर, गहन इलेक्ट्रॉनिक्स विज्ञान सीख सकता है और साथ-साथ दुनिया भर में लोगों को इसके बलबूते सामान्य परिस्थितियों के अलावा आपातकालीन चिकित्सा, यातायात, बाढ़, चक्रवात, तूफान, भूकंप या किसी अन्य आपदा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आपातकालीन संचार नेटवर्क स्थापित कर, महान सेवा प्रदान कर सकता है। पूरे विश्व में लाखों व्यक्ति, इस विधा का अनुसरण करते हैं, ब्लॉग की भाषा में बोले तो follower हैं।

जब मौजूदा सार्वजनिक या सरकारी संचार प्रणालियां असफल हो जायें तो यह एमेच्योर रेडियो स्टेशन 'दूसरी लाइन' के रूप में संचार व्यवस्था का काम करते है। जीवन के सभी क्षेत्रों से, तकनीशियनों से लेकर इंजीनियरों, शिक्षकों से लेकर वैज्ञानिक, छात्र से लेकर सेवानिवृत्त तक शौकिया रेडियो ऑपरेटर हैं। अन्य शौकों की तरह, उनमें से कई के लिए तो इस शौक का आकर्षण यह भी है कि स्वयं अपने हाथों से इसके उपकरण बनाना, चाहे वह छोटा सा एंटीना ही क्यों न हो या फिर ट्रांसमीटर बनाने जैसा जटिल कार्य या अपने ट्रांसमीटर, रेडियो और एक कंप्यूटर के बीच एक संबंध interface स्थापित करना।

शौकिया रेडियो का एक बेहतरीन प्रदर्शन, 1960 में भारत में तत्कालीन पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग की हड़ताल के दौरान देखने को मिला था, जब शौकिया ऑपरेटरों ने जनता को बहुमूल्य सार्वजनिक सेवा गतिविधियों के साथ महत्वपूर्ण संदेश भेजने का प्रबंध किया था। सितम्बर 1979 में, मोरवी (गुजरात) में मच्छु बांध टूटने पर अचानक आयी बाढ़ के समय, पश्चिमी भारत के एक दर्जन से अधिक शौकिया रेडियो ऑपरेटरों ने राहत एजेंसियों, सरकारी अधिकारियों और आपदा के शिकार लोगों के लिए, राजकोट, बड़ौदा, अहमदाबाद और मुंबई आदि शहरों में आपातकालीन रेडियो स्टेशनों को सक्रिय कर सहायता प्रदान की थी। HAMs द्वारा इसी प्रकार की सेवायें, सौराष्ट्र में आये विनाशकारी तूफान, बंगाल की खाड़ी के ऊपर खराब मौसम की संभावना के चलते आंध्र प्रदेश में कई बार आये तूफान के दौरान भी प्रदान की गयी थीं।

जरा याद कीजिये लातूर (महाराष्ट्र) में आये भूकम्प, उत्तरकाशी के भूकम्प की, जहाँ हैम रेडियो ऑपरेटरों ने, प्रभावित लोगों के लिए व्यवस्था, दवाइयां, भोजन और कपड़ों के लिए समन्वय और राहत कार्यों के आयोजन के लिए आवश्यक संचार नेटवर्क प्रदान किया। हाल ही में उड़ीसा के विनाशकारी चक्रवात की आपदा के दौरान जब सभी संचार ध्वस्त हो गई थीं तो इसकी महत्ता एक बार पुन: साबित हुयी थी। उड़ीसा के मुख्य मंत्री निवास पर एक हैम रेडियो स्टेशन ने लगभग एक महीने तक देश की राजधानी के साथ संपर्क बनाए रखा। एशियाड जैसे बड़े खेल समारोह, हिमालय कार रैली आदि के दौरान शौकिया रेडियो स्टेशनों द्वारा अधिकारियों की सहायता हेतु इसे अक्सर याद किया किया जाता है। 2004 में आयी सुनामी के वक्त तो यह इकलौता संचार माध्यम था। माना जाये तो, यह विशेष तकनीकी खेल या शौक बहुत हद तक दूसरे गैर-सरकारी लोक सेवा संगठन (जैसे रेडक्रॉस) के समतुल्य एक राष्ट्रीय परिसंपत्ति है।

थोड़ा पीछे लौटें तो भारत के प्रधानमंत्री रहे राजीव गांधी ने शौकिया रेडियो ऑपरेटर का लाइसेंस 1974 में प्राप्त किया था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने वायरलेस उपकरणों पर आयात शुल्क घटाकर इस विधा को आगे बढ़ाने में मदद की थी, जिसके चलते आज भारत में शौकिया रेडियो ऑपरेटर की तादाद लगभग 18,000 पहुँच चुकी है। वे अपने व्यस्त कार्यक्रमों के बीच भी इस शौक को पूरा करते थे और एक सक्रिय शौकिया रेडियो ऑपरेटर माने जाते थे। यहाँ तक कि अपने मारे जाने के चंद घंटो पहले भी वे 'ऑन एयर' थे तथा उनकी आखिरी 'कॉल' विशाखापत्तन्नम से थी।

यह पोस्ट कुछ ज़्यादा ही बड़ी हो रही है। पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा था कि शौकिया रेडियो ऑपरेटर को HAM क्यों कहते हैं? अगली पोस्ट में आप पायेंगे कुछ और रोचक जानकारियां तथा भारत सहित, दुनिया के कुछ चर्चित व्यक्तियों की HAM पहचान (कहें तो आईडी) जिससे आप उनसे बतिया सकें!

Monday, August 4, 2008

वरिष्ठ प्रसारणकर्ता राजीव सक्सैना का असामयिक निधन

बड़े दु:ख के साथ सूचित करने में आता है कि दो दिन पूर्व जाने-माने प्रसारणकर्ता श्री राजीव सक्सैना का नई दिल्ली में निधन हो गया. निधन के कारणों की तफ़सील की प्रतीक्षा है. आज हमारे रेडियोनामा बिरादर यूनुस भाई इस ख़बर से ख़ासे व्यथित नज़र आए और आग्रह किया कि प्रसारण परिदृष्य से जुड़े हमारे लोकप्रिय ब्लॉग पर ये ख़बर जारी होनी चाहिये. सबसे पहले तो राजीव सक्सैना को पूरे रेडियोनामा परिवार की भावभीनी श्रध्दांजली.


राजीव सक्सैना पिछले तीन दशकों से रेडियो प्रसारण से जुड़े थे. दिल्ली के आकाशवाणी केन्द्र के युववाणी कार्यक्रम से शुरूआत करने वाले राजीव भाई
क्रिकेट कमेंट्रेटर के रूप में ख़ासी पहचान रखते थे. गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के आखों देखा हाल सुनाने वाले कमेंट्रेटर पैनल में राजीव भाई का नाम शुमार था . हाँ एक ख़ास बात यह कि जब हिन्दी कमेंट्री के इंतज़ामात के लिये आकाशवाणी के अर्थाभाव होना शुरू हुआ तो राजीव सक्सैना ने अपने कौशल का इस्तेमाल करते हुए बाक़ायदा स्पाँसरशिप्स लाना शुरू की और नई आवाज़ों को मौक़ा देना प्रारंभ किया.उन्होने मैचों के अंतराल में उन्होंने लोकप्रिय फ़ोन इन कार्यक्रमों भी शुरू किये और उसकी रोचकता में इज़ाफ़ा करने के लिये राजीव भाई ने कई पूर्व क्रिकेटर्स को जोड़ा.

संयोग देखिये हमारे रेडियोनामा बिरादर इरफ़ान ने हाल ही में राजीव सक्सैना पर एक पोस्ट अपने ब्लाग टूटी हुई बिखरी हुई पर लिखी थी . यदि इरफ़ान भाई इजाज़त देंगे तो बतौर ख़िराजे अक़ीदत उसी पोस्ट को शीघ्र ही रेडियोनामा पर लिया जाएगा.

फ़िलहाल बस इतना ही.हम सब राजीव सक्सैना जैसे क़ाबिल ब्रॉडकास्टर के आकस्मिक निधन पर स्तब्ध हैं . फ़िर एक बार दिवंगत के प्रति हमारी श्रध्दाजंलि .

Friday, April 25, 2008

रेडियो पर बजने वाले गीत/संगीत का शुल्क ?

बचपन में सुना था कि आकाशवाणी पर बजने वाले हर गीत / संगीत का हिसाब रखा जाता है । उस गीत / संगीत से जुड़े़ कलाकारों को आकाशवाणी कुछ शुल्क अदा करती है । रेडियो से जुड़े साथी बताये कि क्या ऐसा होता है / था ?

प्रति गीत / धुन यह शुल्क यदि है तो कितना है तथा गायक , संगीतकार और गीतकार में इसका विभाजन भी होता है / था , क्या ?

Friday, September 28, 2007

मेरे महबूब न जा....आधी रात न जा..

मेरे महबूब न जा...आधी रात न जा...होने वाली है सहर...थोड़ी देर और ठहर....आज भी जब इस गीत को सुनता हूं तो बरसों पुरानी यादों में खो जाता हूं। विविध भारती का एक कार्यक्रम बेला के फूल...रात 11 से 11.30 बजे आने वाला यह कार्यक्रम शायद ही कोई दिन था, जब मैं नहीं सुनता था। जिसका अब साथ नहीं है। राजस्‍थान जहां मैं पला और बढ़ा हर मौसम में रात में घर की छत पर रेडियो लेकर जाता और छायागीत एवं बेला के फूल जरुर सुनता। बेला के फूल कार्यक्रम का आखिरी गीत बरसों पहले लगभग यही होता था....मेरे महबूब न जा...आधी रात न जा...। वाकई उस समय मन करता की यह महूबब कहीं ना जाए...इतना बढि़या कार्यक्रम और अब यह तो जाने की बात करने लगे। इस गाने की धुन के साथ ही समझ में आ जाता था कि विविध भारती की आखिर सभा समाप्‍त होने को है और अपने सोने की सभा शुरू होने वाली है।


गाना समाप्‍त और आवाज आती विविध भारती की यह अंतिम सभा अब समाप्‍त होती है। सुबह फिर आप से मुलाकात होगी। स्‍कूल, कॉलेज और यून‍िविर्सिटी के दिनों में बेला के फूल कार्यक्रम के बाद सोने का वक्‍त हो जाता लेकिन अब महानगरों में मची भागमभाग कोई वक्‍त तय नहीं करती। बेला के फूल कार्यक्रम में सुने गए कई गाने आज भी मुझे याद आते हैं। लेकिन मैंने जिक्र केवल एक गाने का किया है यह बताने के लिए कि यह महबूब अब ना जाने कहां चला गया।


रेडियो के बेहद पुराने श्रोता पीयूष मेहता के साथ इंटरनेट पर चैट करते समय मैंने उन्‍हें भी कार्यक्रम के बारे में पूछा तो उन्‍होंने बताया कि बेला के फूल विविध भारती की केंद्रीय सेवा में अब नहीं है , पर यह सिर्फ़ मुंबई, पुणे और नागपुर के स्‍थानीय विज्ञापन सेवा वाले विविध भारती केंद्रों से 11 से 11.30 रात्रि में आ रहा है और ये भी तीनों केंद्र अलग अलग है पर अब सूरत में मुंबई सीबीएस हर समय पकड़ में नहीं आता इसलिए अगर हाल ही में कुछ परिवर्तन उन केंद्रों पर हुआ होगा तो पता नहीं है। लेकिन आज रात इस कार्यक्रम के बारे में रेडियो सुनकर जरुर बताऊंगा। आप भी जोडि़ए जानकारी बेला के फूल कार्यक्रम पर.........।

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