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Saturday, August 6, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग-३८ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)






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१९७५ का साल पूरे मुल्क में कई ऐसी तब्दीलियाँ लेकर आया, जिन्होंने एक मायने में इतिहास का रुख ही बदल दिया. बांग्ला देश के बनने के साथ ही मिसेज़ इंदिरा गाधी मुल्क में ही नहीं, पूरी दुनिया में एक कद्दावर लीडर के तौर पर उभर रही थीं. रायबरेली में उनसे चुनाव हार चुके समाजवादी लीडर राज नारायण ने मिसेज़ गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनाव जीतने के लिए, सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल और कई दीगर गलत तरीकों का सहारा लेने का इलज़ाम लगाते हुए, एक केस दायर कर दिया.  कभी कट्टर कॉंग्रेसी रह चुके, जय प्रकाश नारायण ने बिहार में १९७४ में मिसेज़ गांधी को उखाड़ फेंकने की गरज से, एक बहुत बड़े आंदोलन की शुरुआत कर दी. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने मिसेज़ गांधी पर लगे बड़े बड़े करप्शन के इल्जामात को तो खारिज कर दिया, मगर बहुत छोटे, मसलन उनकी इलेक्शन मीटिंग्स के दौरान बिजली का इंतजाम बिजली महकमे के मुफ्त में करने जैसे इल्जामों को लेकर, उनके इलेक्शन  को गैरकानूनी करार दे दिया और अपने फैसले में ये हिदायत दे दी कि वो आने वाले छः साल तक कोई चुनाव न लड़ें. राज नारायण, मोरारजी देसाई जैसे बड़े बड़े नेताओं ने पूरे देश में मिसेज़ गांधी के खिलाफ एक ज़बरदस्त तूफ़ान खडा कर दिया.

जस्टिस सिन्हा ने कांग्रेस पार्टी को २० दिन का वक्त दिया, ताकि वो मिसेज़ गांधी की जगह किसी और को अपना लीडर चुन सके और उसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा सकें, मगर कांग्रेस मिसेज़ गांधी की जगह किसी भी नाम पर एकराय नहीं हो पाई. २३ जून १९७५ को मिसेज़ गांधी ने अदालत से स्टे की अपील की, जिसे २४ जून १९७५ को जस्टिस अय्यर की अदालत ने कुछ शर्तों के साथ मंज़ूर कर लिया. २५ जून को जय प्रकाश नारायण ने मिसेज़ गांधी पर इस्तीफा देने के लिए दबाव डालने के लिए, एक ज़बरदस्त आंदोलन शुरू करने का ऐलान कर दिया. उस वक्त राष्ट्रपति थे, श्री फखरुद्दीन अली अहमद, जिन्हें संविधान की धारा ३५२ के तहत किसी भी बाहरी या अंदरूनी खतरे की हालत में इमरजेंसी लागू करने का अधिकार था. २६ जून की सुबह इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, पूरे मुल्क में एमरजेंसी लागू कर दी गयी. उसी सुबह खुद मिसेज़ गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो पर मुल्क के अवाम को खिताब करते हुए इसका ऐलान किया . सारी जेलें बड़े बड़े लीडर्स से भर गईं. यहाँ तक कि स्टूडेंट लीडर्स को भी नहीं बख्शा गया.इन स्टूडेंट लीडर्स में आज के फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली और इंडिया टी वी के मालिक रजत शर्मा भी शामिल थे. कुछ लोग जिन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका, वो रातोंरात अंडर ग्राउंड हो गए. उन अंडर ग्राउंड होने वालों में मेरे छोटे मामा जी भी शामिल थे. पूरे १९ महीने तक वो अंडर ग्राउंड रहे.
एमरजेंसी लागू करना सही था या गलत, ये एक बहस का मुद्दा हो सकता है. ये भी एक बहस का मुद्दा हो सकता है कि मिसेज़ गांधी ने एमरजेंसी का इस्तेमाल अपनी कुर्सी को बचाने के लिए किया या दरअसल हालात ऐसे बन गए थे कि ऐसा करना पड़ा, लेकिन बिला शक ये कहा जा सकता है कि एमरजेंसी लागू होते ही कम अज़ कम एक बार तो मुल्क की पूरी तस्वीर बदल गयी. जिन दफ्तरों में १२ बजे से पहले कोई अफसर कोई अहलकार नज़र नहीं आता था, अब हर इंसान १० बजे दफ्तर पहुँचने की कोशिश करने लगा था. दफ्तरों में काम की स्पीड बढ़ गयी थी. कोई ज़रा सी भी गडबड करने की सोचता, तो उसे एमरजेंसी की वजह से १०० बार सोचना पड़ता था.
इसी दौरान सुना कि आकाशवाणी, बीकानेर में स्टाफ की तादाद बढ़ रही है और उसका दर्जा भी बढ़ रहा है. अब तक कुछ प्रोग्राम दिल्ली और जयपुर से रिले किये जाते थे, कुछ प्रोग्राम के जयपुर से आने वाले टेप्स बजाये जाते थे. यानी सिर्फ फ़िल्मी गानों के प्रोग्राम ही यहाँ से ओरिजिनेट होते थे. सुनने में आया कि अब कुछ प्रोग्राम यहीं तैयार किये जायेंगे. मेरे मोहल्ले के पड़ोस के मोहल्ले में श्री लक्ष्मी चंद शर्मा रहते थे, जो कि मेरे साथ ही ड्रामा के ऑडिशन में पास हुए थे और आकाशवाणी, बीकानेर में क्लर्क थे. ये सारी ख़बरें मुझे उनसे ही मिलती रहती थीं. एक दिन उन्होंने बताया कि जल्दी ही एक प्रोग्राम युववाणी, हफ्ते में दो दिन बीकानेर से शुरू होने वाला है. मैं एक दिन आकाशवाणी के दफ्तर जा पहुंचा. उस दफ्तर में काम करने वाले कई लोगों से तो मैं पहले से ही वाकिफ था.
आकाशवाणी जाकर देखा तो वहाँ कई नई नई शक्लें नज़र आईं. मुझे कहा गया कि युववाणी के लिए मुझे श्री महेंद्र भट्ट, प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव से मिलना चाहिए. मैं जा पहुंचा उनके कमरे में. सांवला सा चेहरा, उस पर पतली तराशी हुई मूंछें और  बड़ी बड़ी आँखें, मैंने नमस्कार किया तो एक भारी सी आवाज़ कमरे में गूज उठी  “नमस्कार, आइये......बैठिये.”
मैं सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया.
वो फिर बोले “क्या नाम है आपका?”
मैंने कहा “जी... महेंद्र..... महेंद्र मोदी.”
“बहुत खूब...... तो नाम एक ही है हम दोनों का......”
मैं बस मुस्कुरा दिया क्योंकि कमरे में घुसने से पहले कमरे के बाहर लगी हुई उनके नाम की तख्ती मैंने देख ली थी.
वो फिर बोले “मेरा नाम महेंद्र भट्ट है, मैं जयपुर का रहने वाला हूँ. वैसे वायलिन का कलाकार हूँ, अभी यू पी एस सी से प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव बनकर आया हूँ. आपके शहर में मेरी पहली पोस्टिंग हुई है.”
मैंने कहा “सर आपका हमारे शहर में बहुत बहुत स्वागत है.”
इस बार, वो हल्का सा मुस्कुराए.
फिर दस सैकंड चुप रहने के बाद बोले, “हाँ तो महेंद्र... बोलिए क्या चाहते हैं आप मुझसे?
मैंने कहा “जी सर.... सबसे पहली बात तो ये है कि मैंने कुछ साल पहले यहाँ से ड्रामा का ऑडिशन पास किया था, लेकिन अब तक मुझे किसी ड्रामा में हिस्सा लेने का मौक़ा नहीं मिला है. कई बार जब यहाँ के लोगों से पूछा तो यही जवाब मिला कि अभी ड्रामा शुरू नहीं हुआ है यहाँ से.....तो....... आप ड्रामा कब शुरू कर रहे हैं? दूसरी बात ये कि मैंने सुना है, आपने यहाँ से युववाणी शुरू किया है तो..... मुझे उसमे भी हिस्सा लेना है.”
वो बोले “हाँ हाँ ज़रूर. आप एक काम कीजिये. बुधवार को शाम साढ़े पांच बजे युववाणी में एक प्रोग्राम होगा, ‘नवतरंग’. उसे सुनिए. उसी तरह की एक स्क्रिप्ट लिखकर लाइए और मुझे दिखाइए. फिर आगे की कार्यवाही की जायेगी. जहां तक ड्रामा का सवाल है, यहाँ के लिए काफी स्टाफ मंज़ूर हो चुका है जिसमे कई प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव भी हैं, म्यूज़िक कम्पोज़र भी हैं और म्यूज़िक के और कई कलाकार भी. तो जब स्टाफ आ जाएगा तो ड्रामा भी शुरू होगा, फीचर भी शुरू होंगे और इनके अलावा और भी कई तरह के प्रोग्राम शुरू किये जायेंगे.”
मैंने कहा “जी बहुत अच्छा. तो.... मैं जल्दी ही स्क्रिप्ट लिखकर फिर हाज़िर होता हूँ.”
वो बोले “अच्छी बात है महेंद्र.”
मैं घर आ गया. बुधवार को मैंने नवतरंग सुना. मैं पेश करने वाले के नाम से समझ गया कि ये प्रोग्राम आकाशवाणी, बीकानेर के अनाउंसर श्री चंचल हर्ष के बेटे ने पेश किया था. आकाशवाणी, बीकानेर से इस प्रोग्राम की बस शुरुआत ही थी. ज़ाहिर है, अभी शहर के लोग नहीं जानते थे कि इस तरह का कोई प्रोग्राम है, जिसे वो भी पेश कर सकते हैं, तो स्टाफ के बच्चों को ही सबसे पहले मौक़ा मिलना था.
मैं दो रोज बाद ही स्क्रिप्ट लिखकर आकाशवाणी के दफ्तर जा पहुंचा. स्क्रिप्ट महेंद्र भट्ट जी को दिखाई. उन्होंने उसे बड़े गौर से पढ़ा और बोले, “शाबाश. बहुत अच्छी लिखी है स्क्रिप्ट तो..... लीजिए आपकी स्क्रिप्ट अप्रूव्ड हो गयी.”
मैंने कहा “जी बहुत बहुत शुक्रिया.... रिकॉडिंग के लिए कब आना है मुझे?”
वो हँसे “अरे भाई हमारे यहां अभी रिकॉर्डिंग का कोई माकूल इंतजाम नहीं है. आपको उसी रोज आकर लाइव ही पेश करना होगा ये प्रोग्राम. थोड़ी प्रैक्टिस करके तीन बजे तक यहाँ आ जाना.”
मैंने कहा “जी बहुत अच्छा.”
मैं वहाँ से लौट आया. पहला प्रोग्राम वो भी लाइव..... थोड़ी घबराहट हुई, लेकिन फिर मैंने याद किया अपने ऑडिशन वाले दिन को...... माइक के सामने बोलने में मुझे बहुत मज़ा आया था.... मैंने उन लम्हों को भरपूर जिया था. मैंने ये सोचकर अपने दिल को दिलासा दिया कि जब उस दिन माइक के सामने बोलना मुझे इतना अच्छा लगा था, तो अब घबराने की क्या ज़रूरत है भला?
वक्त तो अपनी रफ़्तार से गुजर ही जाता है. मैं तय दिन तीन बजने में पांच मिनट कम थे, तब आकाशवाणी के दफ्तर पहुँच गया. भट्ट साहब के कमरे में गया, तो वो किसी से फोन पर बात कर रहे थे. मैंने कमरे में घुसकर नमस्कार किया. उन्होंने बैठने का इशारा किया. मैं बैठ गया. वो फोन पर बोले “हाँ तुलसियानी जी आज के नवतरंग के लिए ये आ गए हैं. आपके पास भेज रहा हूँ, ज़रा प्रैक्टिस करवा देना यार और ज़रा संभाल लेना.”
उन्होंने फोन रखा और मुझे कहा “जाइए, आप कार जा रही है ट्रांसमीटर. उसमे बैठ जाइए. वहाँ ड्यूटी ऑफिसर तुलसियानी जी मिलेंगे. वो आपको प्रैक्टिस करवा देंगे. ऑल द बैस्ट.”
मैंने उन्हें शुक्रिया कहा और बाहर आकर कार में बैठ गया. कुछ और स्टाफ़ को लेकर वो एम्बेसेडर कार चल पडी.
पन्द्रह मिनट में हम लोग ट्रांसमीटर पहुँच गए.
दरअसल स्टाफ़ तो बढ़ने लगा था आकाशवाणी, बीकानेर पर लेकिन टेक्नीकल सहूलतें अब तक बढ़ी नहीं थीं. दफ्तर एक किराए के मकान में शहर में था. ट्रांसमीटर बिल्डिंग वहाँ से छः किलोमीटर दूर सागर रोड़ पर बनी हुई थी. एक हॉल था, जिसमे दस किलोवाट का एक बड़ा सा ट्रांसमीटर लगा हुआ था. उससे बिलकुल लगा हुआ एक स्टूडियो था. दोनों के बीच एक शीशा लगा हुआ था. उस शीशे के एक तरफ स्टूडियो में अनाउंसर बैठता था और दूसरी तरफ कंट्रोल रूम कम ट्रांसमीटर हॉल में इंजीनियर्स. ज़रूरत पड़ने पर वो लोग इशारों से बात कर लिया करते थे. एक इंटरकॉम जैसी बाबा आदम के ज़माने की कोई चीज़ भी मौजूद थी वहाँ, जो कभी कभी ही काम करती थी. अनाउंसर को तीन तरफ से घेरे हुए एक टेबल थी, जिसमे एक तरफ दो टेप डैक लगे हुए थे, जिनपर टेप बजाये जाते थे, एक तरफ दो बड़े बड़े टर्न टेबल थे, जिन्हें हम बोल चाल की ज़ुबान में रिकॉर्ड प्लेयर कहते हैं, और एक तरफ एक बड़ी सी मशीन लगी रहती थी, जिसे कंसोल कहा जाता था. उस कंसोल पर बहुत सारे स्विच, कीज़, बटन और गोल घुमाने वाले बड़े बटन लगे रहते थे, जिन्हें फेडर कहा जाता था. बस यही स्टूडियो था कुल मिलाकर, जिसमे दो माइक लगाने का इंतजाम था. इसके अलावा तीन चार कमरे और थे. एक में ड्यूटीरूम बना हुआ था और एक में लायब्रेरी.
कार से उतरकर मैं ड्यूटीरूम में पहुंचा. एक साहब एक टेबल के दूसरी तरफ बैठे थे. टेबल पर एक रेडियो रखा हुआ था और कुछ टेप्स और रिकॉर्ड्स रखे हुए थे. मैंने उन्हें नमस्कार किया. उन्होंने मुझसे बैठने को कहा. श्री यशपाल सिंह राठौर शाम के ट्रांसमिशन के अनाउंसर थे. उनके साथ मिलकर उन्होंने टेप्स वगैरह चैक किये, उन्हें स्टूडियो में भेजकर अपनी कुर्सी पर बैठे और बोले “चलिए, अब आपके प्रोग्राम की तैयारी कर लेते हैं.”
मैंने कहा “जी..... बताएं, मुझे क्या और कैसे करना है?”
“आप जिस अंदाज़ में प्रोग्राम पेश करना चाहते हैं, थोड़ा सा पढने की कोशिश कीजिये. फिर मैं आपको बताता हूँ कि इसे कैसे पढ़ना चाहिए.”
“जी बहुत अच्छा.”
और मैंने स्क्रिप्ट को पढ़ना शुरू किया. मैं एक पैराग्राफ पढकर रुक गया और उनके सामने देखने लगा कि ये मुझे कुछ बताएँगे. वो मुंह खोले मेरी तरफ देखते जा रहे थे. मेरे रुकते ही वो बोले “और पढ़िए.” मैं और एक पैरा पढ़ गया. फिर उनके चेहरे की तरफ देखा. उन्होंने आगे पढ़ने का इशारा किया...... मैं पढता चला गया. पूरी स्क्रिप्ट खत्म हो गयी.
अब वो बोले “आप सच सच बताइये..... क्या आप स्टाफ़ में नहीं हैं?”
अब चौंकने की बारी मेरी थी. मैंने कहा “जी......? क्या मतलब ? मैं समझा नहीं.”
इस पर वो बोले “कहाँ के रहने वाले हैं आप?”
“जी बीकानेर का ही हूँ.”
“आप जिस तरह से पढ़ रहे हैं, मुझे लग रहा है कि आप आलरेडी अनाउंसर हैं.”
मैंने कहा “जी नहीं मैं अनाउंसर तो नहीं हूँ लेकिन हाँ ड्रामा का अप्रूव्ड आर्टिस्ट ज़रूर हूँ.”
वो मुस्कुराकर बोले “आप तो एक मंजे हुए अनाउंसर की तरह बोल रहे हैं. मैं क्या तैयारी करवाऊं आपको? आप तो स्टूडियो में जाइए और इत्मीनान से प्रोग्राम पेश कीजिये.”
तभी राठौर जी स्टूडियो से बाहर आये और मुझे अंदर ले जाकर बिठा दिया. ऑडिशन के बाद एक बार फिर माइक्रोफोन मेरे सामने था. मैंने उस प्रोग्राम को भी खूब इन्जॉय किया. कब प्रोग्राम खत्म हुआ, मुझे पता ही नहीं चला. एक बार फिर मैंने महसूस किया कि माइक्रोफोन के सामने बोलकर जो सुख मुझे मिलता है, वैसा सुख मुझे और किसी भी काम में नहीं मिलता.
सभी ने प्रोग्राम की बहुत तारीफ़ की. मुझे १५ रुपये का एक चैक भी मिला. यूं तो अपनी क्लिनिक और ट्यूशंस से मैं अच्छी खासी कमाई करता था मगर माइक्रोफोन पर बोलने की ये मेरी पहली कमाई थी.
ये वो वक्त था, जब हर घर में और हर दुकान पर रेडियो पूरे दिन बजा करता था. उन दिनों दो तरह के रेडियो स्टेशन हुआ करते थे. मीडियम वेव के और शॉर्ट वेव के. राजस्थान के सभी रेडियो स्टेशन मीडियम वेव के ही थे. हम इसे यूं समझ सकते हैं. लम्बाई के हिसाब से हम तरंगों को तीन भागों में बाँट सकते हैं. लौंग  वेव, मीडियम वेव और शॉर्ट वेव. तरंग की लम्बाई जितनी ज़्यादा होती है वो उतनी ही भारी होती है और जितनी भारी होती है, आसमान में उतनी ही कम ऊंचाई तक जा सकती है. तरंग जितनी कम ऊंचाई तक जायेगी, उतनी ही कम दूरी तय करेगी. इसका मतलब ये हुआ कि लॉन्ग वेव बहुत कम दूरी तय करती हैं, मीडियम वेव उससे कुछ ज़्यादा दूरी तय करती हैं और शॉर्ट वेव की तरंगे सबसे ज़्यादा दूरी तय करती हैं. तरंग की लम्बाई के साथ साथ ट्रांसमीटर की पावर की भी बहुत अहमियत होती है. ट्रांसमीटर का पावर जितना ज़्यादा होगा, तरंगें उतनी ही ज़्यादा दूरी तक जायेंगी. इन तीन तरह के ट्रांसमीटर्स में से ऑल इंडिया रेडियो दो तरह के ट्रांसमीटर इस्तेमाल किया करता था, मीडियम और शॉर्ट वेव. दोनों में अपनी अपनी कुछ अच्छाइयां होती थीं और अपनी अपनी खामियां. दिन के वक्त सूरज की गर्मी से, ज़मीन से कुछ ऊंचाई पर एक ऐसी लेयर बनती है, जिसे मीडियम वेव की तरंगे पार नहीं कर सकतीं. नतीजतन वो बहुत कम दायरे में ही सुनी जा सकती हैं. वही तरंगे रात के समय काफी दूर तक पहुँच जाती हैं. इसी लिये दिन में मीडियम वेव पर अगर हम रेडियो की सुई घुमाएँ तो सिर्फ अपने शहर का स्टेशन ही लगेगा, जबकि रात में अगर मीडियम वेव पर सुई को घुमाना शुरू करें, तो हर थोड़ी दूर में कोई न कोई स्टेशन लग जाएगा और हमें काफी दूर दूर के स्टेशन भी सुनने को मिल जायेंगे. शॉर्ट वेव की तरंगे चूंकि बहुत छोटी होती हैं , बहुत ऊंचाई तक जाती हैं और इसलिए बहुत दूर दूर तक सुनी जा सकती हैं, लेकिन कोई भी रेडियो तरंग जितनी ऊपर जायेगी, उतना ही शोर उसमें शामिल हो जाएगा. इसी लिए जब हम शॉर्ट वेव पर रेडियो की सुई घुमाते हैं, तो तरह तरह का शोर सुनाई देता है और उसके बीच बीच में कोई स्टेशन. वैसे एफ़ एम के आने के बाद ये सब अब पुराने ज़माने की बातें हो गयी हैं, लेकिन मैं जिस ज़माने की बात कर रहा हूँ उस वक्त तो मीडियम और शॉर्ट वेव पर ही रेडियो सुना जा सकता था. ज़ाहिर है बीकानेर का रेडियो स्टेशन भी मीडियम वेव पर ही चलता था और चूंकि पूरे चौबीसों घंटे नहीं चलता था, जब भी चलता था, चाहे उस पर कुछ भी प्रोग्राम आ रहा हो हर घर , हर दुकान पर बस वो चलता रहता था. इसी वजह से मेरा प्रोग्राम भी बहुत लोगों ने सुना और उसकी तारीफ़ भी की.
ऑडिशन ने जिस तरह मुझमे एक एतमाद पैदा किया था कि मैं भी कुछ ऐसा कर सकता हूँ, जो बाकी सब लोग नहीं कर सकते, इस प्रोग्राम ने उस एतमाद को थोड़ा और बढ़ा दिया.
इस प्रोग्राम को हुए कुछ ही रोज गुज़रे होंगे कि एक रोज लक्ष्मी चंद जी ने घर आकर बताया कि मुझे भट्ट साहब ने याद किया है. जब भी टाइम मिले, मैं जाकर उनसे मिल लूं. मैं अगले ही रोज आकाशवाणी के दफ्तर पहुँच गया. भट्ट साहब से मिला, तो उन्होंने बहुत अपनाइयत से कहा “महेंद्र..... मैंने एक संगीत रूपक प्लान किया है. जानते हो ना कि संगीत रूपक क्या होता है?”
मैं ठहरा रेडियो का हर प्रोग्राम सुनने वाला. मैंने कहा “जी हाँ बिलकुल जानता हूँ.”
“ये संगीत रूपक जन्माष्टमी पर है. मैं सोचता हूँ कि इसमें नैरेशन तुम करो. बोलो....करोगे?” आज वो मुझे आप की जगह तुम कहकर बुला रहे थे, जिसमे मुझे एक अजीब से ख़ुलूस की महक आ रही थी.
अंधा क्या चाहे, दो आँखें. मैंने फ़ौरन से पेश्तर कहा “जी हाँ ज़रूर करूँगा, आप कहेंगे तो क्यों नहीं करूँगा?”
“वैसे एक बात पहले ही बता दूं. हमारे यहाँ स्टाफ में चार अनाउंसर हैं. इसके बावजूद मैं नैरेशन के लिए तुम्हारी आवाज़ को इस्तेमाल करूँगा, तो वो सब के सब मुझसे तो खैर नाराज़ होंगे ही, लेकिन तुमसे भी नाराज़ हो जायेंगे. तुम्हें कोई  दिक्कत तो नहीं है उसमें? तुम डर तो नहीं जाओगे उन लोगों की नाराजगी से?”
“नहीं सर...... आप बेफिक्र रहें, उनकी नाराजगी का मेरी सेहत पर कोई असर नहीं होगा. आप तो जितना काम मुझसे करवा सकते हैं करवाइए.”
उन्होंने दराज़ में से एक स्क्रिप्ट निकाली और मेरे सामने रख दी. अच्छी खासी तहरीर थी. बीच बीच में कई गाने थे. मैंने पूछा “ये गाने रिकॉर्ड हो गए क्या सर?” उन्होंने जवाब दिया “नहीं, अब रिकॉर्ड होंगे. तुम क्यों पूछ रहे हो? क्या गाना भी चाहते हो?”
मैंने हंसकर कहा “नहीं सर, गाना वाना मुझे नहीं आता और टूटा फूटा आता भी था, तो वो छोड़ दिया मैंने. मैं तो इस पूरे प्रोग्राम की रिकॉर्डिंग के दौरान आपके साथ रहना चाहता हूँ.”
वो बोले “हाँ हाँ क्यों नहीं. वैसे भी जानते हो हमारे पास अलग से कोई स्टूडियो तो है नहीं. वही ट्रांसमिशन स्टूडियो है, जिसमे बैठकर तुमने प्रोग्राम पेश किया था. वो स्टूडियो भी पूरे दिन हम अपने पास नहीं रख सकते क्योंकि वहीँ से ट्रांसमिशन होना है. हम लोग कुछ दिन तक पूरे दिन वहीं रहेंगे और जब जब स्टूडियो खाली होगा रिकॉर्डिंग करेंगे.”
अब तक मदन मोहन के असिस्टेंट रहे श्री डी एस रेड्डी म्यूजिक कम्पोज़र की पोस्ट पर ज्वाइन कर चुके थे. उनके साथ ही पंडित शिव राम के असिस्टेंट रहे ढोलक प्लेयर श्री दयाल पंवार, सितारिस्ट श्री मुंशी खान तानपूरा प्लेयर श्री इकरामुद्दीन, सारंगी प्लेयर श्री रजब अली, तबला प्लेयर श्री रहमान खां            और तानपूरा प्लेयर श्री नज़र मोहम्मद भी ज्वाइन कर चुके थे. महेंद्र भट्ट जी खुद बहुत अच्छे वायलिन प्लेयर थे. बाहर से क्लेरिओनेट के लिए श्री खुर्शीद को शामिल किया गया और गाने के लिए श्री बदरूद्दीन, श्री उमेश मेंदीरत्ता, श्री लक्ष्मी नारायण सोनी, श्री अनवर, सुश्री सरिता गोस्वामी और श्रीमती मधु भट्ट को बुक किया गया. इनके अलावा एक सितार प्लेयर श्री जसकरण गोस्वामी को भी बाहर से बुक किया गया, जिनके बारे में सब लोग चर्चा कर रहे थे कि उनका यू पी एस सी से प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए सलेक्शन हो चुका है. कागज़ी कार्यवाहियां चल रही हैं और जल्दी ही वो महारानी स्कूल की अपनी नौकरी छोड़कर आकाशवाणी ज्वाइन कर लेंगे.
रिहर्सल के लिए एक दिन तय किया गया और आकाशवाणी बीकानेर के इतिहास में पहली बार, एक साथ इतने आर्टिस्ट्स, आकाशवाणी के दफ्तर में इकट्ठे हुए. कई गाडियां बुक की गयी थीं. मेरे जैसे कुछ लोग अपने अपने स्कूटर या मोटर साइकिल पर थे. पूरा क़ाफ़िला ट्रांसमीटर बिल्डिंग पहुंचा. भट्ट साहब ने सबको बताया कि इस स्टूडियो में हालांकि इस तरह की रिकॉर्डिंग के लिए माकूल इंतजामात नहीं हैं, फिर भी हम कोशिश कर रहे हैं कि कुछ नया किया जा सके. श्री एस एन छाबला और श्री एम् पी श्रीवास्तव आकाशवाणी के दो बहुत ही काबिल इंजीनियर थे. उन्होंने किसी तरह जुगाड करके स्टूडियो में चार माइक्रोफोन लगाए. सबसे बड़ी दिक्क़त ये आ रही थी कि ढोलक, तबला, क्लेरेओनेट जैसे साज़ों की आवाज़ तो बहुत बुलंद होती है, जबकि सितार, वायलिन की आवाज़ बहुत धीमी. सही बात तो ये है कि ऐसे साज़ों को अलग से एक-एक माइक चाहिए, मगर ये तो मुमकिन ही नहीं था. कुल जमा चार माइक थे. अगर उनमे से दो माइक दो सितारों को और एक वायलिन को दे दिया जाय, तो बाकी लोग क्या करेंगे. आखिरकार एक माइक पर सारे सिंगर्स को रखा गया और बाकी तीन माइक्रोफोन को इस तरह रखा गया कि सितार उनके बिलकुल सामने रहें और बुलंद आवाज़ वाले साज़ अपनी आवाज़ की बुलंदी के हिसाब से माइक से दूर रहें. यानी साजों के प्लेसमेंट से उन्हें बैलेंस किया गया.
कई कोशिशों के बाद साज़ों का सही प्लेसमैंट हो पाया. तभी पता लगा कि ट्रांसमिशन का समय हो रहा है. स्टूडियो खाली करना पडेगा. सब लोग अपने अपने बैठने की जगह की मार्किंग करके बाहर आ गए.
अगले दिन फिर हम सब लोग रिहर्सल के लिए पहुंचे. मेरी रिहर्सल तो अभी नहीं होनी थी, फिर भी क्योंकि मैं देखना चाहता था कि इस तरह की रिकॉर्डिंग कैसे की जाती है, इसलिए सब के साथ ही स्टूडियो पहुँच गया. तीन चार मेल सिंगर थे और तीन चार फीमेल. यानी कलाकारों को अपने गाने पर भी ध्यान देना था, साथ ही इस बात का ख़याल भी रखना था कि कब उन्हें दूसरे आर्टिस्ट्स के लिए माइक छोड़कर पीछे हट जाना है और कब आगे बढ़कर खुद माइक्रोफोन पर आ जाना है. दूसरे लफ़्ज़ों में हम ये भी कह सकते हैं कि उन्हें गाना भी गाना था और रिले रेस का खेल भी खेलना था. इन हालात में फीचर प्रोड्यूस करने का न तो ऊपर से कोई हुकुम था और ना ही लिस्नर्स की तरफ से कोई दबाव, लेकिन कुछ नया कर गुजरने का एक जूनून था भट्ट साहब में और सारे कलाकार जैसे भी हो सके, भट्ट साहब के इस जज्बे में उनके साथ थे. करीब ४० बरस मैं रेडियो से जुड़ा हुआ रहा. न जाने कितने प्रोग्राम ऑफिसर्स के साथ काम किया, मगर ऐसा जुनून बिरले लोगों में ही देखने को मिला. सलाम है उनके जुनून को, सलाम है उनके जज़्बे को.
हम लोग कई दिन तक लगातार रिकॉर्डिंग के लिए जाते रहे. आख़िरी दिन मैंने सोचा कि इतने आर्टिस्ट्स इकट्ठे होने का मौक़ा कब कब आता है, क्यों ना कुछ खाने पीने का सामान लेजाकर इसे एक पिकनिक की शकल दी जाए, मैं कुछ मिठाई और कचोरियाँ पैक करवाकर ले गया. रिकॉर्डिंग के बीच में भूख तो सबको ही लग गयी थी. तब मैंने वो मिठाई और कचोरियाँ निकाली. सब लोगों के चेहरे खिल गए. सबने मज़े लेकर मिठाई और कचोरियाँ खाईं मगर सितार प्लेयर जसकरण जी ने उन कचोरियों को कुछ ज़्यादा ही लुत्फ़ लेकर खाया और मुझसे कहा “भायला कचोरियाँ बोहत शानदार है. अै हमेसां याद रै’सी.”(दोस्त, कचोरियाँ बहुत शानदार हैं, ये ज़िंदगी भर याद रहेंगी.) और सच कहा था उन्होंने. वो उन कचोरियों को कभी नहीं भूले. जसकरण जी ने बाद में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव की पोस्ट पर ज्वाइन किया. बीकानेर में हम लोग साथ पोस्टेड रहे. जोधपुर में उनसे कई बार मुलाक़ात हुई. वो ए एस डी हो गए उसके बाद भी कई बार मिलना हुआ. रिटायर होने के बाद उनसे उदयपुर में मुलाक़ात हुई जब उनके साहबजादे की पोस्टिंग मीरा गर्ल्स कॉलेज में हुई. मैं ये सब इसलिए बता रहा हूँ कि १९७५ से लेकर १९९७ तक उनसे कितनी ही मुलाकातें हुईं और जितनी भी बार मैं उनसे मिला, एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि वो ये कहना भूले हों “भायला तूं बीं फीचर री रिकॉर्डिंग में लायो जिकी कचोरियाँ बहुत शानदार ही. बियांरो स्वाद हाल म्हारे मुंह में है.”(दोस्त उस फीचर के दौरान तुम जो कचोरियाँ लाये थे, वो बहोत शानदार थीं.उनका स्वाद अभी तक मेरे मुंह में है.). अब तो न जसकरण जी रहे, न महेंद्र भट्ट जी, न मुंशी खां जी, न दयाल पंवार जी, न खुर्शीद जी, न रेड्डी जी और न ही मेरा यार बदरू रहा, एक अरसा गुज़र गया इन सबको ये दुनिया छोड़े हुए, मगर अब भी उस रिकॉर्डिंग की अलग अलग तस्वीरें मेरे जेहन में ज्यों की त्यों महफूज़ हैं.
एमरजेंसी स्टूडियो की उन महदूद सहूलियतों में आखिरकार किसी तरह उस म्यूज़िकल फीचर के गाने रिकॉर्ड हुए.
इसके बाद बारी आई मेरे नैरेशंस की. भट्ट साहब ने खुद सामने बैठकर मुझे रिकॉर्ड किया और रिकॉर्डिंग पूरी होने पर मेरी पीठ ठोकी. आस पास कहीं कुछ जल रहा है, इसका अहसास रिहर्सल के पहले ही दिन से मुझे होने लगा था. भट्ट साहब ने सही कहा था कि चार चार अनाउन्सर्स के स्टाफ में होने के बावजूद नैरेशंस मुझसे करवाने से स्टाफ के कई लोग उनसे नाराज़ हो जायेंगे और मेरे दुश्मन बन जायेंगे. शायद कैक्टस का ये पहला काँटा था, जिसकी चुभन मैंने महसूस की थी.

    

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