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Monday, July 25, 2016

मेंहदी वाली सावन रुत आय गयी ...............पत्ता पत्ता बूटा बूटा - पंद्रहवीं कड़ी


सावन के महीने में मेंहदी की झाड़ियाँ फूल उठती हैं। उनके पास से गुज़रो तो भीनी-भीनी सुगंध मानो पुकार कर कहती है -
मेंहदी वाली सावन रुत आय गयी, जिया बिलमाय गयी ना। 

उस मादक गंध से बहू-बेटियों की हथेलियाँ मेंहदी रचाने को मचलने लगती हैं। कोई-कोई तो सीधे पतिदेव से माँग कर बैठती है कि मुझे मेंहदी रचानी है, लाकर दीजिये। पति अगर बहाने बनाकर टालना चाहे तो जगह भी बताती हैं और तरीका भी।

बनारस के एक पुराने रईस थे राजा मोतीचंद। उन्होंने शहर से कुछ दूर झील के किनारे अपना एक महलनुमा बँगला बनवाया था, जिसे "मोती झील" के नाम से जाना जाता था। बनारस के रईसों में इस तरह शहर से कुछ दूरी पर बगीचे और बँगले बनवाने की परंपरा रही है। इन बँगलों में आम तौर पर सिर्फ़ माली और चौकीदार रहते थे, जो समय-समय पर बगीचे के फल-फूल कोठी तक पहुंचा दिया करते थे। लेकिन बरसात के मौसम में सेठ जी पूरे परिवार या फिर यार-दोस्तों के साथ "बहरी अलंग" का मज़ा लेने के लिए खुद बगीचे में जाते थे। परिवार साथ हुआ तो झूला, मेंहदी और पकवानों का आनंद लिया जाता। दोस्त साथ होते तो भाँग-बूटी छनती, दाल-बाटी-चूरमा बनता और साज़-संगीत की महफ़िल जुटती। ऐसे ज़्यादातर बगीचे सारनाथ के आस-पास हैं लेकिन मोती झील शहर से उतनी दूर नहीं थी इसलिए फ़रमाइश हुई  -
पिया मेंहदी लिया द मोती झील से, जाके साइकिल से ना। 







मेंहदी रचाने का शौक़ नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को भी होता है। हमें भी बड़ा शौक़ था। जब कभी घर में तीज की तैयारियाँ चल रही होतीं और माँ-मासियों-मामियों के लिये सिल-बट्टे पर मेंहदी पीसी जा रही होती तो हम भी अपनी नन्हीं हथेली फैला कर फ़रमाइश करते रहते - हमें भी, हमें भी लगाना। और जब उँगलियों के छोर पर मेंहदी लग जाती तो हथेली के बीच में चाँद बनाने की माँग करते। फिर सारे घर में ये गीत गाते घूमते -

गोरे-गोरे हाथों में मेंहदी रचाके, नैनों में कजरा डालके 
चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा-सा घूँघट निकालके।


  

पता नहीं ये फ़िल्म देखी थी या नहीं, लेकिन इतना याद है कि इस गाने का ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड इतना बजाया था कि वह कभी तो एक झटके से किसी और लाइन पर पहुँच जाता और कभी एक ही जगह रिड़कता रहता  - मोती की लड़ियाँ उछाल के- छाल के- छालके - - - 
कुछ बड़े हुए और अपनी पसंद का रेडियो स्टेशन सुनने की छूट मिली तब मेंहदी का एक गीत बड़ा मोहक लगता था -

मेंहदी लगी मेरे हाथ रे 
पी मतवारे आयेंगे द्वारे लेके संग बारात रे।   








इन्हीं दिनों बनारस में गुजरातियों की काफी बड़ी संख्या को देखते हुए नोवेल्टी टॉकीज़ में रविवार की सुबह एक गुजराती फ़िल्म प्रदर्शित की गयी। हॉल के मालिक स्वयं गुजराती थे और उन्होंने ज़ोरदार पब्लिसिटी के ज़रिये सभी गुजरातियों को अपनी भाषा-संस्कृति का वास्ता देकर कहा था कि फिल्म ज़रूर देखें और उनके इस प्रयास को सफल बनायें। लिहाज़ा मेरे नाना जी भी उनके प्रयास की सफलता में योगदान देने गये और इस तरह हमने मेंहदी का एक और गीत सीखा -


मेंदी ते वावी मालवे ने एनो रंग गयो गुजरात रे 
मेंदी रंग लाग्यो। 





मेंहदी के रंग चाहे गुजरात के हों या पंजाब के, बहुत सारी ख़ुशी-उमंग-उछाह के साथ कहीं दिल के किसी कोने में एक टीस भी दे जाते हैं। आज जो लड़की घर में किलकारियाँ भरती घूम रही है, उसे कल घर छोड़कर जाना है यह याद आते ही मेंहदी के गीत ग़मज़दा हो उठते हैं -
मेंदी नी मेंदी, मेंदी नी मेंदी 
आज रलके लावण आइयां नी पैणां ते परजाइयाँ। 



हिंदी फिल्मों में यों तो मेंहदी के ढेरों गीत हैं। इतने कि अगर गिनाने बैठूँ तो सुबह से शाम हो जाये और गीत पूरे न हों। अपनी पसंद की बात करूँ तो मुझे एक वो गीत पसंद है जिसमें मुमताज़ जितेन्द्र से कह रही हैं - तू बन जाये मेंहदी का बूटा, गोरे-गोरे हाथ लूँ मैं रंग सजना - और दूसरा वो जिसमें शाहरुख़ ख़ान काजोल को आश्वस्त कर रहे हैं कि मेंहदी लगा के रखना, डोली सजाके रखना क्योंकि आख़िरकार दिलवाले ही दुल्हनिया ले जायेंगे। इनके अलावा मेंहदी का एक और बड़ा मीठा-सा, प्यारा-सा गीत है -

मेंहदी है रचने वाली हाथों में गहरी लाली 
कहें सखियाँ अब कलियाँ हाथों में खिलने वाली हैं 
तेरे मन को जीवन को नयी खुशियां मिलने वाली हैं।


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