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Sunday, January 7, 2018

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग- 52 ( महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला )




आकाशवाणी, बीकानेर राजनीति का अखाड़ा बना हुआ था. ए ओ का ट्रान्सफर हो चुका था. किसी स्टेशन पर ए ओ के न होने पर एडमिन और अकाउंट्स सेक्शन का इंचार्ज डी डी ओ होता है जिसे हैड ऑफ द ऑफिस नामित करता है. डी डी ओ या तो किसी प्रोग्राम ऑफिसर को बनाया जाता है या फिर असिस्टेंट इंजीनियर या उससे ऊपर के किसी इंजीनियरिंग अधिकारी को जिन्हें आम तौर पर एडमिनिस्ट्रेशन का कोई ज्ञान नहीं होता. ऐसे में डी डी ओ मात्र रबर की स्टाम्प बनकर रह जाता है. उसके पास जो भी फ़ाइल अकाउंटेंट के पास से आती है, बस उसे उस पर दस्तखत करने होते हैं. इंजीनियरिंग सेक्शन के लोग तो फिर भी क्योंकि गणित के लोग होते हैं, संख्याओं से नहीं घबराते और अकाउंट्स का काम थोड़ा बहोत सीख भी लेते हैं लेकिन ज़्यादातर प्रोग्राम के लोग संख्याओं से बहोत घबराते हैं और बस फ़ाइल आते ही उस पर आँख मूंदकर दस्तखत करके उसे आगे खिसका देते हैं. ऐसे में अगर अकाउंट्स के लोग ज़रा ज़्यादा तेज़ यानी शरारती हों तो अकाउंटेंट को बहोत चौकन्ना हो जाना पड़ता है क्योंकि अगर अकाउंट्स सेक्शन के किसी चालू कर्मचारी ने जानबूझकर कोई गड़बड़ कर दी और अकाउंटेंट ने ध्यान नहीं दिया तो उसके बाद जो उसके ऊपर बैठा हुआ है, वो तो रबर स्टाम्प ही है. उसने दस्तखत कर दिए तो वो गलती जो अकाउंट्स सेक्शन के एक कर्मचारी ने शरारतन सबको लपेटने के लिए की थी, वो गलती आगे तक चलती ही जायेगी.
शशिकांत पांडे बहोत होशियार अकाउंटेंट माना जाता था. वैसे देखा जाए तो वो समझदार और जानकार अकाउंटेंट ही नहीं,  ए ओ, इन्स्पेक्टर ऑफ एकाउंट्स, डी डी ए, डायरेक्टर हर पोस्ट पर एक बहोत होशियार अफसर माना जाता रहा, यहाँ तक कि अब रिटायर होने के बरसों बाद भी उस इंसान को नौकरी से जुड़े कानून क़ायदे जुबानी रटे पड़े हैं और आकाशवाणी और दीगर डिपार्टमेंट्स के लोग आज भी उससे पेचीदा मामलों  में सलाह मशविरा करके ही आगे क़दम बढाते हैं, लेकिन अभी मैं बात कर रहा था उस वक़्त की जब वो आकाशवाणी में अकाउंटेंट था. ए ओ के ट्रान्सफर के बाद भी उसके चमचे अक्सर ऐसी कारस्तानियाँ करने की कोशिश करते थे, जिससे ऊपर के लोग फँस सकें. ऐसे में एक अकाउंटेंट के तौर पर शशिकांत पांडे बहोत चौकन्ना रहता था. अगर अकाउंटेंट चौकन्ना ना रहे तो ये लोग क्या क्या कर जाते हैं, इसकी एक मिसाल मैं आपको सुनाता हूँ. सन 1999 में जब मैं विविध भारती में आया ही था, उस वक़्त कोई ए ओ नहीं था और प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव भी तादाद में काफी कम थे. मेरे उस वक़्त के डायरेक्टर खुद प्रोग्राम, एडमिन और एकाउंट्स हर मामले में बस जीरो से कुछ ही ज़्यादा थे, सोचते थे कि असिस्टेंट डायरेक्टर के पास तो काम ही क्या होता है ?काम प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव करते हैं और ज़िम्मेदारी सारी डायरेक्टर की होती है. असिस्टेंट डायरेक्टर की पोस्ट तो सरकार ने फालतू बना रखी है, बस दिन भर इधर उधर घूमने के लिए. कुछ ऐसा ही  सोचकर उन्होंने डी डी ओ की ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी. नीचे के लोग भी जो मुझे अभी तक ठीक से जानने नहीं लगे थे, रिलैक्स हो गए कि चलो डी डी ओ का काम किसी प्रोग्राम वाले के पास आ गया है तो वो कम से कम हमारे काम में टांग तो नहीं अड़ायेगा. प्रोग्राम वाले को ना तो कानून कायदों की समझ होती है और ना हिसाब किताब की. जो भी फ़ाइल जायेगी, वो बिना किसी सवाल जवाब के साइन होकर ही लौटेगी. उन्हें नहीं पता था कि मैं इंजीनियर तो नहीं हूँ लेकिन संख्याओं से मेरी गहरी दोस्ती रही है क्योंकि मैं इंजीनियरिंग कॉलेज छोड़कर आया हुआ हूँ और साथ ही एल एल बी की भी थोड़ी ही सही कुछ पढाई तो की हुई ही है.
एक दिन एक फ़ाइल मेरे पास आई. जिसमें डायरेक्टरेट का एक आर्डर लगा हुआ था कि अमुक अमुक रिटायर्ड एनाउंसर्स की बेसिक तनख्वाह में शुरू से कुछ पचास-साठ रुपये जोड़कर उसका एरियर उन्हें दिया जाना है. इसके बाद पूरी कैलकुलेशन की हुई थी, एक महीने में 60 रुपये की बढ़ोतरी तो एक साल में 60x12=720 और 58 साल में 58x 720=41760. ये तो बेसिक तनख्वाह में हुई बढ़ोतरी है . अब इसके ऊपर जब जब जितना जितना डी ए था, उसे कैलकुलेट करके जोड़ा गया थाऔर हरेक को कुछ दो-ढाई लाख एरियर दिए जाने का प्रस्ताव था. फ़ाइल को देखकर मैंने अकाउंटेंट समेत उन सब लोगों को  अपने कमरे में बुला भेजा, जिन्होंने ये कैलकुलेशन्स की थीं और जिनके हाथों से ये फ़ाइल निकली थी. मैंने अकाउंटेंट को पूछा, “आपने ये सारे कैलकुलेशन्स जांच लिए हैं ?”
“यस सर, भला कैलकुलेशन जांचे बिना आपके पास कैसे भिजवाती ? यही तो मेरा काम है सर.”
मैंने अपनी गर्दन उस एल डी सी की तरफ घुमाई और पूछा, “आपने किये हैं ये कैलकुलेशन ?”
एल डी सी कोइ नया रिक्रूट हुआ लड़का था. वो घबराया हुआ कांपती सी आवाज़ में बोला, “जी स....र........ हाँ, मैंने ही किये हैं.”
“एक ही बार किये या फिर से उनकी जांच की ?”
“जी सर....... तीन तीन बार जांच की है सर.”
अब मैंने यू डी सी की तरफ देखा. वो झट से बोला, “सर.... आप तो बिंदास साइन कर दीजिये. मैंने अच्छी तरह देख लिया है सारा हिसाब किताब.”
मैंने कहा, “ अच्छा ? आपने ठीक से देख लिया है ना ?”
उसने मुंह बनाते हुए कहा, “ सर १५ बरस हो गए हैं यही सब करते करते. अब इसमें ठीक से देखने की क्या बात है? ऐसी छोटी मोटी कैलकुलेशन्स तो मैं जुबानी कर सकता हूँ.”
मैंने अकाउंटेंट से पूछा, “मैडम कर दूं ना साइन ?”
वो ज़रा इतराती हुई और तंजिया मुस्कराहट फेंकते हुए बोली, “ नहीं सर..... अगर आपको विश्वास न हो तो आप जांच कर देख लीजिये.”
वो जुबां से तो कह रही थीं , “जांच लीजिये अगर आपको विशवास न हो तो” लेकिन उनके दिल से निकलने वाली आवाज़ भी मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी, “ अरे क्यों खाली पीली में रुआब मार रहे हो? आपको भला क्या समझ आयेंगी ये कैलकुलेशन्स ? चुपचाप साइन कर दो ना, क्यों पका रहे हो हमें?”
मैं भी ज़रा सा मुस्कुराया और बोला, “मैडम मुझे एक बात समझ नहीं आयी. “
“क्या सर.......? क्या बात नहीं समझ आयी ? हम लोग इसी लिए तो बैठे हैं कि अफसर लोगों को कोई बात समझ न आये तो उन्हें समझा सकें.”
“ओह सो नाइस ऑफ यू. सही कहा आपने. आप लोग तो बहोत ज्ञानी होते हैं जी, जो हम अफ़सरों को समझ नहीं आता वो आप लोग ही तो समझाते हैं .”
उसे लगाकि शायद वो कुछ ज़्यादा बोल गयी. वो कुछ हकलाते हुए बोलने लगी, “जी मेरा मतलब..........”
मैंने  हाथ ऊपर उठाते हुए उसे आगे बोलने से रोका और कहा, “ये जो 58 से आपने गुणा की है ये बात मेरे समझ नहीं आयी. आपने 58 से गुणा क्यों की है ?”
उस अकाउंटेंट ने इस तरह ठहाका लगाया, मानो मैंने कोई बहोत बड़ी बेवकूफी की बात कर दी हो. फिर बोली, “ अरे सर रिटायरमेंट की उम्र 60 साल तो अभी कुछ ही साल पहले हुई है. उससे पहले तो अट्ठावन साल ही थी ना रिटायरमेंट की उम्र. सर ये एनाउंसर 58 साल की ही उम्र में रिटायर हो गए थे.”
और उसने एक विजयी मुस्कान अपने साथ आये एल डी सी यू डी सी की तरफ फेंकी कि देखा, कैसा बेवकूफ साबित किया है इस अफसर को?
मैंने कहा, “ओह ये बात है ?”
“जी सर.”
“ये कैलकुलेशन तो सही है, आपकी ये बात भी सही है कि उस ज़माने में रिटायरमेंट की उम्र 58 साल हुआ करती थी लेकिन एक बात बताइये . आपने इन्हें पूरे 58 साल का एरियर दिया है तो क्या ये साहब पैदा होते ही एनाउंसर लग गए थे ? ज़रा रिकॉर्ड चेक कर लीजिये , कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये पैदा हुए उससे दो चार महीने पहले ही आकाशवाणी ने इन्हें रिक्रूट कर लिया हो.”
अब एकदम उन मैडम का चेहरा सफ़ेद हो गया. उन्होंने यू डी सी की तरफ देखा, यू डी सी ने एल डी सी की तरफ. मैंने थोड़ा सा आवाज़ को ऊंचा करते हुए कहा, “क्या है ये सब ? क्या आप लोग समझते हैं कि आप जो कुछ लिख कर लायेंगे, उस पर आपका अफसर साइन कर देगा ? क्या आप सारे अफसरों को बेवकूफ समझते हैं ? अभी अगर मैं भी इस पर साइन कर देता, आप इन लोगों को इतना इतना रुपया दे देते तो क्या होता ?कर्मचारी की जेब में एक बार गया हुआ रुपया वापस निकलवाना क्या इतना आसान होता है? बल्कि अगर मैं कहूं कि आप लोग इन अनाउंसर लोगों से मिले हुए हैं और कमीशन लेकर इन्हें ज़्यादा पैसा दिलवाना चाहते हैं तो........?”
सबकी गर्दनें नीचे झुक गईं. मैंने कहा, “जाइए इसे ठीक करके लाइए. हरेक के रिकॉर्ड से देखिये कि किसने किस सन से किस सन तक नौकरी की, उन बरसों में आये पे कमीशन्स के बाद इन्हें कहाँ कहाँ फिक्स किया जाएगा और कब कब किस रेट से डी ए दिया जाएगा. जो डी ए दिया गया उसे उसमे से घटाकर बाकी ड्यूज़ का हिसाब लगाकर लाइए. ये सारी कैलकुलेशन करके लाइए फ़ाइल पर, मैं चैक करूंगा, उसके बाद साइन करूंगा.” सब लोग अपना सा मुंह लेकर उठे और जाने लगे. जब वो मेरे कमरे के दरवाज़े तक पहुंचे तो मैंने उन्हें रोकते हुए कहा, “ सुनिए मैडम..... आप लोगों को कैलकुलेशन्स में कोई दिक्क़त हो तो मेरे पास आकर मुझसे पूछ लीजिएगा. गणित मेरा फेवरेट सब्जेक्ट रहा है और मैं इंजीनियरिंग कॉलेज छोड़ा हुआ इंसान हूँ.”
सब लोग जी  सर, जी सर बोलकर चले गए. खैर ये तो बहोत बाद की बात है. मैं तो बात कर रहा था सन 79-80 की जब मेरा सादुल स्कूल का दोस्त शशिकांत पांडे अकाउंटेंट बनकर बीकानेर आ गया था. पूरे दफ्तर में हर लेवल पर साजिशों के जाल बुने जा रहे थे और जाल बुनने वाले कुछ अकाउंट्स के कुछ एडमिन के लोग और कुछ एक आध अनाउंसर थे, मगर थे सब के सब मेरे ही शहर बीकानेर के और ज़्यादातर साजिशें भी उनके ही खिलाफ बुनी जा रही थीं जो किसी भी रूप में मेरा साथ दे रहे थे. कमर भाई खुलकर मेरे साथ थे, शशिकांत पांडे मेरे साथ था, इंजीनियर श्री चंद्रेश गोयल, श्री एस एन छाबला और श्री जे सी गुप्ता मेरे साथ थे, बाकी लोगों में ज़्यादातर अपने आप को गैर जानिबदार यानी न्यूट्रल साबित करने की कोशिश करते थे और कुछ खुलकर मेरे खिलाफ खड़े हुए थे. मुझे कई बार लगता कि मैं और मेरी पत्नी हर ओर से दुश्मनों से घिरे हुए खड़े थे. इसी बीच ग़ज़ल, गीत भजन की एक कॉन्सर्ट हुई . डायरेक्टर वैष्णव साहब को खूब सिखाने पढ़ाने की कोशिश की गयी कि फलां अनाउंसर सबसे सीनियर और सबसे काबिल हैं. उनका नाम तो पूरे राजस्थान में दूर दूर तक मशहूर है. कॉन्सर्ट में अनाउंसमेंट्स की ज़िम्मेदारी तो उन्हें ही सौंपी जानी चाहिए. वैष्णव साहब ने सबकी बातें सुनींऔर कहा, मैं सोचूंगा और फैसला करूंगा कि अनाउंसमेंट किससे करवाए जाएँ. बातों ही बातों में वो लोग इशारतन उन्हें धमकी देने से भी नहीं चूके कि अगर इन अनाउंसर साहब से अनाउंसमेंट नहीं करवाए गए तो वैष्णव साहब के खिलाफ अखबारों में काफी कुछ छप सकता है. वैष्णव साहब मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले, “आप लोग मेरे खिलाफ कुछ छपने वपने की बिलकुल फिक्र ना करें. मेरी सेहत पर इन सब बातों का कोई असर नहीं पड़ता है.” लटके हुए मुंह लेकर वो लोग डायरेक्टर साहब के कमरे से बाहर आ गए. उन्हें अंदाजा हो गया कि उनकी फ़रियाद नहीं सुनी गयी है. और यही हुआ भी. जब कॉन्सर्ट का ऑफिस ऑर्डर निकला तो उसमे कॉन्सर्ट के अनाउंसमेंट्स की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी गयी थी. पूरे ऑफिस में जैसे हर तरफ साँपों की फुफकारें सुनाई देने लगीं. लग रहा था कि ये लोग मुझे कच्चा चबा जायेंगे. मेरे खैरख्वाह लोगों ने मुझे सावधान किया कि मैं रात की ड्यूटी के बाद स्कूटर से घर जाना बंद कर दूं. एक टेक्नीशियन हुआ करते थे श्री राम लाल. उन्होंने मुझे साफ़ कहा, “महेंदर जी, रात को आप हम लोगों के साथ कार में ही घर लौटा करो.”
मैंने पूछा, “क्यों राम लाल जी ?
“देखो साब ज़्यादा तो मुझे पता नहीं है लेकिन उड़ती उड़ती एक बात कानों में पड़ी है इसलिए सावचेत कर रहा हूँ.”
“क्या पड़ी है कानों में आपके ?”
“यही कि किसी दिन आप पर रात को हमला कर दिया जाए. भाई की सौगन, उस दिन से मुझे बहोत चिन्ता हो गयी है.”
मैंने उन्हें ढाढस देते हुए कहा, “ आप कहोगे तो मैं आपकी बात नहीं टालूंगा, लेकिन एक बात बताइये आप. क्या बिना मृत्यु योग हुए कोई किसी की जान ले सकता है क्या?”
“नहीं.......”
“और जिसकी मृत्यु का योग हो उसे कोई टाल सकता है क्या?”
“नहीं, ये भी नहीं हो सकता.”
“जब ये भी नहीं हो सकता वो भी नहीं हो सकता, तो फिर डरना किस बात का है? अगर मेरी मौत विधाता ने इस तरह ही लिख दी है तो इस तरह ही सही. मौत तो मौत ही है न, चाहे किसी भी तरह आये, उसका नतीजा तो आख़िरकार इस दुनिया से कूच करना ही है.”
“ठीक है भाई साब जैसा आप ठीक समझो..... लेकिन मैं पूछता हूँ क्या बिगड़ जाएगा अगर कुछ दिन आप रात में हम लोगों के साथ स्टाफ-कार से घर चले चलें. सर्दी का मौसम है. रात साढ़े ग्यारह तक सड़कें बिलकुल वीरान हो जाती हैं......कोई अगर सड़क पर चिल्लाए भी तो किसी को सुनाई नहीं देता क्योंकि तब तक सब लोग दरवाज़े बंद करके रजाइयां ओढ़कर सो जाते हैं.”
“हाँ आप सही कह रहे हैं राम लाल जी, लेकिन इस तरह किसी से डरकर कब तक जिया जा सकता है?”
“ नहीं, मान लिया कि आप बहादर हैं किसी से नहीं डरते लेकिन मेरी बात मानने में हर्जा क्या है?”
“लोग कहेंगे, डर गया मैं.... हर तरफ इस तरह की बातें होंगी, वो सुनकर आपको अच्छा लगेगा?”
“ठीक है, तो आप अपनी बात पर अड़े रहो. अब मेरी आख़िरी बात सुन लो. हमारे घर तो आस पास ही हैं. रात की ड्यूटी में मैं भी आपके साथ स्कूटर पर ही चलूँगा.”
 दरअसल राम लाल जी का घर हमारे घर के पास ही था. वो नौकरी के साथ साथ लोगों को ब्याज पर पैसे देने का काम भी किया करते थे. वो खुद तो टेक्नीशियन थे. मामूली तनख्वाहें हुआ करती थीं उन दिनों हम सबकी. इतना रुपया कहाँ से लाते कि ब्याज़ पर दे सकें. वो अक्सर( बाई )मेरी बड़ी बहन से कम ब्याज़ पर रुपया उधार लेकर जाया करते थे और कुछ ज़्यादा  ब्याज़ पर आगे रुपया उधार दे दिया करते थे. इस वजह से उनका  मेरे घर काफी आना जाना था और वो अपने आप को मेरा खैरख्वाह मानते थे. अपने काफी मोटे शरीर को सर्दी के मौसम में मेरे स्कूटर पर लादकर ले जाना उनके लिए कितना तकलीफदेह हो सकता था, मैं समझ रहा था. आखिरकार मुझे हार माननी पड़ी और सर्दी के मौसम में मैं स्कूटर की बजाय स्टाफ कार से घर जाने लगा. हालांकि बीकानेर की कड़ाकेदार  तेज़ ठण्ड में स्कूटर की बजाय कार से घर लौटना बहोत आरामदेह था, लेकिन इसमें कुछ तकलीफें भी थीं. सबसे पहली तकलीफ तो ये कि मुझे दिन में चार बजे तो स्कूटर से आना होता था, फिर रात में स्कूटर ऑफिस में ही छोड़कर कार से लौटता और अगले दिन मेरी या मेरी पत्नी की सुबह दस बजे की ड्यूटी होती तो ऑफिस जाना एक मसला बन जाता. घर में पिताजी का स्कूटर भी रहता था. अब अगर दस बजे मैं उनका स्कूटर ले जाता तो दिन में दोनों स्कूटर वहीं इकट्ठे हो जाते. उन्हें घर कब लेकर आता ? दूसरा ये कि रात में स्टाफ के लोगों को उनके घर छोड़ते छोड़ते अक्सर रात के बारह बज जाते. तीसरी सबसे बड़ी दिक्क़त ये थी कि एक स्कूटर अक्सर ऑफिस में खड़ा रहता था तो जिन लोगों का मुझपर कोई बस नहीं चल रहा था वो आते जाते जब भी मौक़ा मिलता स्कूटर के पहिये में कील चुभोकर उसे पंक्चर कर अपने दिल की भड़ास निकाल लेते थे. कुछ दिन तो मैं चुपचाप स्कूटर के पंक्चर निकलवाता रहा लेकिन जब उसके ट्यूब छलनी हो गए तो मैंने राम लाल जी को कहा, “भई सा अब बहोत हो गया. मेरे स्कूटर के दोनों पहियों और स्टेपनी के ट्यूब छलनी छलनी हो गए हैं. अब मैं इसे ऑफिस में लावारिस नहीं छोड़ सकता. मैं टायर ट्यूब सब बदलवा रहा हूँ, सर्दी भी कुछ कम हो गयी है,अब मैं  स्कूटर से ही आऊँगा जाऊंगा, जो होगा सो देखा जाएगा.”
राम लाल जी बेचारे क्या बोलते ?उन्होंने एक लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा, “ठीक है महेंदर भाई साब जो आपको ठीक लगे करो.”
और मैंने फिर से अपने स्कूटर से ही आना जाना शुरू कर दिया. इसी बीच कमर भाई ने एक मुशायरा और एक कवि सम्मेलन की रूपरेखा तैयार की. मैं भी उनके साथ लग गया पूरे देश से अच्छे अच्छे कवियों और शोरा हज़रात के नाम ढूँढने में. उन दिनों पूरे शहर में दो ही हॉल हुआ करते थे. एक टाउन हॉल और दूसरा एस पी मेडिकल कॉलेज का हॉल. टाउन हॉल हमारे प्रोग्राम के लिए बहोत छोटा था क्योंकि बहोत भीड़ उमड़ा करती थी रेडियो के स्टेज प्रोग्राम्स में. हम अपनी सारी कॉन्सर्ट्स मेडिकल कॉलेज के हॉल में ही किया करते थे. कवि सम्मेलन और मुशायरा भी वहीं किये गए. हालांकि ये दोनों ही प्रोग्राम ऐसे थे जिन्हें कंडक्ट करने की ज़िम्मेदारी रवायती तौर पर उनमे हिस्सा लेने वालों को ही निभानी थी, लेकिन कमर भाई ने भी मुझे स्टेज पर किसी न किसी रूप में लाकर मेरे दुश्मनों के सीने पर मूंग दलने  की क़सम खा ली थी. उन्होंने वैष्णव साहब से कहा, “सर, पहले महेन स्टेज पर आकर हॉल में मौजूद लोगो का स्वागत करेगा. आपको बुलाएगा, आप दो मिनट बोलेंगे. उसके बाद महेन उस कवि या शायर को माइक सौंप देगा जिसे उस प्रोग्राम को कंडक्ट करना है.”
वैष्णव साहब ने कहा, “बिलकुल ठीक है.”
बिलकुल इसी तरह किया गया. दोनों ही प्रोग्राम बहोत कामयाब रहे. अगले दिन से मैंने और कमर भाई ने लगकर इनकी एडिटिंग की. एडिटेड प्रोग्राम में फिर से जहां जहाँ ज़रूरत पड़ी क़मर भाई ने मेरी आवाज़ को ही इस्तेमाल किया. ये कुछ लोगों के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने की तरह था.
 मुझे भी लगने लगा कि अब मेरे खिलाफ कुछ न कुछ होकर रहेगा. मुझे खतरे की बू आने लगी थी कि तभी दिल्ली से आये एक ऑर्डर ने मुझे, मेरी पत्नी और क़मर भाई को परेशान कर दिया. अब तक जिन वैष्णव साहब की समझ और निडरता के बल पर हम अपने दुश्मनों को हर क़दम पर मात दे रहे थे, उन वैष्णव साहब का तबादला हो गया था और उनकी जगह जो डायरेक्टर आने वाले थे उनका नाम सुनकर मैंने मेरी पत्नी ने और खरे साहब ने अपना सर पीट लिया क्योंकि इन डायरेक्टर साहब को पूरे स्टाफ में से हम तीन लोग ही जानते थे.
 कुछ ही दिनों के बाद नए डायरेक्टर साहब ने आकर ज्वाइन कर लिया. वैष्णव साहब को हमने बीकानेर से बहोत भारी मन से विदा किया. उस दिन के बाद वैष्णव साहब के कभी भी दर्शन नहीं हुए लेकिन इत्तेफाक देखिये, उनकी एक बेटी हिना ने कुछ बरस बाद अनाउंसर की पोस्ट पर आकाशवाणी, अहमदाबाद में ज्वाइन किया और जिन दिनों मैं विविध भारती में आया, मेरी एक पुरानी सहयोगी दीपशिखा दुर्गापाल की पोस्टिंग अहमदाबाद हो गयी. हिना और दीपशिखा की जब आपस में मुलाक़ात हुई तो बात चलते चलते हम लोगों का कहीं ज़िक्र आ गया. दीपशिखा ने हिना को बताया कि उनके हमारे परिवार से बहुत अच्छे ताल्लुकात हैं और हिना ने दीपशिखा को बताया कि उन लोगों के भी हमारे साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं. बस फिर क्या था ? दीपशिखा ने मेरे नंबर हिना को दिए और एक सुबह मेरे फोन की घंटी बजी. नंबर देख कर पहचान नहीं पाया कि किसका फोन है. मैंने हेलो कहा तो उधर से जो हेलो आया वो बहुत पहचाना हुआ सा लगा. मैंने असमंजस से भरे स्वर में कहा, “जी, कौन साहब बोल रहे हैं?” उधर से हल्की सी हंसी के साथ आवाज़ उभरी, “मोदी जी, मैं पी एम वैष्णव.”
और मैं जैसे अपनी कुर्सी पर से उछल पड़ा. मैंने अपनी आवाज़ पर काबू पाते हुए कहा, “सर आप ? कहाँ से बोल रहे हैं ? कैसे हैं ? आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला ?”
वैष्णव साहब हँसते हुए बोले, “सब कुछ बताता हूँ एक एक करके.”
“जी सर.”
“मैं अहमदाबाद में रहता हूँ, बिलकुल ठीक हूँ. पिछले काफी वक़्त से आपका पत्रावली प्रोग्राम सुनता रहा हूँ तो ये तो मुझे पता चल गया था कि आप विविध भारती मुम्बई पहोंच गए हैं. मेरी बेटी हिना आकाशवाणी, अहमदाबाद में अनाउंसर है. मैंने उससे कहा कि वो पता लगाए आपके नम्बर्स का. कल उसने आकर बताया कि उसके साथ की एक ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव दीपशिखा दुर्गापाल आपको अच्छी तरह जानती हैं और उनके पास आपका नंबर भी है. वो आज आपका नंबर दीपशिखा से लेकर आयी है. ये तो है मेरी कहानी और अब आप बताइये कैसे हैं ? शीला जी कैसी हैं? बच्चे कैसे हैं?”
मैंने उन्हें अपने 1980 से लेकर 1999 तक की ज़िदगी की कहानी मुख़्तसर तौर पर सुना दी. वो बहोत खुश हुए. तब से उनसे मेरे ताल्लुकात बने हुए हैं. इस बीच एक बार फोन खराब होने की वजह से मैंने उनके नंबर खो दिए थे लेकिन फिर दीपशिखा की मदद ली,जोकि इन दिनों एन एच के जापान में हिन्दी प्रसारण विशेषज्ञ हैं. मुझे वैष्णव साहब के नंबर फिर से हासिल हो गए. अभी पिछले हफ्ते ही उनसे बात हुई. वो भी बहोत खुश हुए और मुझे भी उनसे बात करके बहोत अच्छा लगा. ये जानकर और भी अच्छा लगा कि 84 साल की उम्र में भी वो एक बहोत ही अहम् और संजीदा काम में जुटे हुए हैं. वो इन दिनों पोंडिचेरी के महर्षि अरविन्द आश्रम की ‘ माँ’( द मदर) के 17 वोल्यूम्स के  संग्रह का गुजराती में अनुवाद कर रहे हैं. इन 17 में से 9 में माँ के फ्रेंच में दिए गए प्रवचन संग्रहीत हैं और शेष आठ में प्रार्थनाएं, लेख, पत्र आदि विभिन्न प्रकार की सामग्री है.
आइये अब फिर चलते हैं 1980 के उस साल में जब वैष्णव साहब बीकानेर से तबादला होकर चले गए और उनकी जगह एक बंगाली बाबू डायरेक्टर बन कर आये. स्टाफ में हम तीन लोग थे, जो उन्हें अच्छी तरह जानते थे. हम दोनों और प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव श्री एस बी खरे . खरे साहब जब ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव थे तब ये बंगाली बाबू प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव थे. जैसे ही उनके बीकानेर ट्रान्सफर की खबर हम लोगों ने सुनी, खरे साहब मुझसे बोले, “लेव भैया, अब तो लुटिया डूब के ही रहेगी इस स्टेशन की. जानत रहे कि नाहीं बंगाली बाबू का?”
मैं क्या जवाब देता? बस इतना ही कहा, “ जानते हैं खरे साहब, अच्छी तरह से जानते हैं. तीन चार महीने काम किया है उनके साथ जोधपुर में और किसी इंसान को समझने के लिए इतना वक़्त काफी होता है, मेरे ख़याल से.”
वो सर पे हाथ मारते हुए बोले, “लो कर लो बात...... भैये तुम तीन ठो महीने काम किये हो इनके साथ. अरे बबुआ हम तो तीन साल झेले हैं इन साहिब को.”
क्या किया जा सकता था ? मन कर रहा था कि यहाँ से कहीं और निकल पड़ें ट्रान्सफर करवा कर लेकिन बेटा अभी बहोत छोटा था. बीकानेर में बाई उसे हमारी गैर हाजिरी में संभाल लेती थीं. कहीं और जाने का मतलब होता, उसे हमें ही संभालना होता. इस बीच बिटिया मनीषा भी इस धरती पर अवतरित हो चुकी थीं, जिसे मेरे भाई साहब और भाभी जी ने अपने पास अजमेर में रख लिया था, जहां भाई साहब एम  एस कर रहे थे. इधर अगर वहाँ से ट्रान्सफर लेते तो पिताजी को भी बीकानेर में अकेले छोड़ना पड़ता. आखिरकार हमने तय किया, ठीक है एक अफसर ऐसा आ गया है तो बाकी लोगों की तरह उसे भी झेलेंगे, लेकिन अभी ट्रान्सफर लेने के हालात नहीं हैं.
दरअसल ये बंगाली बाबू हिन्दी बहोत कम जानते थे और किसी बात को चार छः बार समझाए बिना उन्हें कुछ भी समझ नहीं आता था. किस्मत अच्छी थी और जैसे सिनेमा के टिकट की लाइन में जो भी खड़ा होगा उसे बिना कोई काबलियत दिखाए भी जब उसका नंबर आयेगा, टिकट मिल ही जाएगा, वैसे ही उन साहब को भी लाइन में लगे लगे कुछ सरकारी नियमों की बदौलत अपने से आगे खड़े लोगों से भी पहले प्रमोशन मिलते गए और वो डायरेक्टर की कुर्सी पर आकर बिराजमान हो गए. हम लोग जब 1976 में  जोधपुर में थे तब ये असिस्टेंट डायरेक्टर की पोस्ट पर कहीं  से ट्रान्सफर होकर आये थे. वो ज़माना श्रीमती इंदिरा गांधी का ज़माना था. देश में इमरजेंसी लगी हुई थी. हर दफ्तर में जैसे अफ़सरों की, अहलकारों की डर के मारे जान निकल रही थी. शायद आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हो रहा था कि लोग. दस बजे के दफ्तर के टाइम में पौने दस बजे दफ्तर पहुँचने लगे थे.
हर तरफ एक अजीब तरह का खौफ पसरा हुआ था. हर इंसान एक दूसरे को इमरजेंसी का नाम लेकर डराने की कोशिश करता था. हज़ारों लोगों को इमरजेंसी के नाम पर जेलों में डाल दिया गया था और हज़ारों लोग रातोंरात गिरफ्तारी से बचने के लिए न जाने कहाँ जाकर छुप गए थे. इन अंडर ग्राउंड होने वाले लोगों में मेरे मामाजी भी शामिल थे क्योंकि वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काफी सक्रिय कार्यकर्ता थे. इधर मेरा भांजा सुभाष और एक भतीजा महेश हालांकि स्कूल में पढ़ रहे थे मगर फिर भी श्रीमती गांधी की इमरजेंसी ने उनके नौजवान खून को बेतहाशा गरम कर दिया था और वो कूद पड़े थे, आर एस एस के उस आन्दोलन में जो एमरजेंसी के खिलाफ पूरे देश में शुरू हो चुका था. सुभाष और महेश खुफिया तौर पर एक अखबार निकालते थे और अपनी टीम के साथ सुबह तीन बजे उठकर लोगों के घरों में डालकर आते थे. दोनों ही पढाई में बहोत होशियार थे लेकिन अपने लक्ष्य के लिए शहीद होने का जज्बा लिए पढाई लिखाई सब छोड़ छाड़कर श्रीमती गांधी के खिलाफ इस आन्दोलन में कूद पड़े थे. हालांकि इसका नतीजा ये हुआ कि सुभाष जो हायर सैकेंडरी में था और जिसे अगले साल इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना था, महज़ 60 % मार्क्स ला पाया और उसका एडमिशन इंजीनियरिंग में नहीं हो पाया लेकिन उस वक़्त इन नौजवानों को एक ही टारगेट नज़र आ रहा था, श्रीमती गांधी के खौफनाक निजाम को चुनौती देना.
ऐसे वक़्त में बंगाली बाबू भी डरे सहमे आकर आकाशवाणी, जोधपुर के असिस्टेंट डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठ गए थे क्योंकि उस वक़्त यही कानून बन गया था कि जहां ट्रान्सफर हो जाए, नौकरी बचानी है तो चुपचाप वहीं चले जाओ वरना नौकरी के लाले पड़ सकते हैं. बेचारे बंगाली बाबू को राजस्थानी छोड़कर हिन्दी भी नहीं आती थी, लेकिन नौकरी करनी थी, इसलिए राजस्थान में चले आये थे. एक रोज़ दिन में स्टूडियो बिल्डिंग में ही किसी दुसरे अफसर के कमरे में बैठे थे . स्पीकर पर आकाशवाणी जोधपुर से प्रसारित हो रहे प्रोग्राम्स चल रहे थे. कालूराम प्रजापति एक बहोत मशहूर नाम था उस ज़माने में राजस्थानी लोकसंगीत का. उनके लोकगीतों का टेप शुरू हुआ. एक गीत बज गया. दूसरा गीत जैसे ही शुरू हुआ और बंगाली बाबू उस कमरे से ही चीखते हुए निकले......” बौन्द कोरो बाबा बौन्द कोरो ये गाना.........”
सब लोग हक्के बक्के रह गए कि क्या हो गया है इनको ? लोगों ने पूछा, “साब क्या हुआ है आखिर ?”
वो फिर चिल्लाए, “होमने बोला ना के बौन्द कोरो ये गाना........ तुम लोक हमारा नौकरी ले लेगा.”
किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है लेकिन सबसे बडा अफसर हुकुम दे रहा है तो मानना तो पडेगा ही. अनाउंसर ने गीत को फेड आउट किया और फिलर चलाकर अगला गीत क्यू करके उसे प्रसारित करना शुरू किया. अब बंगाली बाबू को थोड़ा चैन आया. लोगों ने पूछा, “सर आखिर हुआ क्या था? आपने इस गीत को फेड आउट क्यों करवाया?”
उखड़ती  साँसों के बीच उन्होंने कहा, “ओरे बाबा, इस गीत में तो वो गा रहा था –‘इंदिरा इंदिरा’. हमारी नौकरी ले लेगा रे आप लोग इंदिरा इंदिरा गाना बजा कर.”
अब सब लोगों को समझ आया. कालूराम प्रजापति का एक बहुत मशहूर गीत था, “ऊंदरा ऊंदरी की हुई लड़ाई..........” राजस्थानी में ऊंदरा मतलब चूहा और ऊंदरी मतलब चुहिया. यानी बहुत ही मसखरेपन से भरपूर गीत था जिसका अर्थ था, चूहे और चुहिया में झगड़ा हो गया. सबने उन्हें उसका मतलब समझाया कि सर इसका मतलब ये है. उनकी समझ में फिर भी लोगों की बात नहीं आयी. वो कहने लगे, “नोहीं नोहीं हमको तो इंदिरा इंदिरा ही सुनाई आ रहा था.”
ड्यूटीरूम में ये बातचीत चल ही रही थी कि वहाँ के फोन की घंटी बजी. ड्यूटी पर तैनात अफसर ने फोन उठाया. दूसरी तरफ कालूराम प्रजापति थे. पूछ रहे थे कि मेरा दूसरा गीत आप लोगों ने कैसे काट लिया? अब ड्यूटी ऑफिसर बेचारा क्या जवाब देता ? वो जी.... जी ....करता रह गया और कालू राम जी ने नाराज़ होकर फोन काट दिया. अगले ही दिन कालूराम प्रजापति दफ्तर आये और नारायण सिंह जी और देवड़ा जी के पास जा पहुंचे जो उनके वाकिफ थे. देवड़ा जी  किसानों के प्रोग्राम के प्रोड्यूसर थे और नारायण सिंह जी कम्पीयर. कालू राम प्रजापति बहोत नाराज़ थे और डायरेक्टरेट के नाम एक लंबा चौड़ा शिकायती ख़त लिखकर लाये थे जिसमे ये लिखा था कि बिना किसी माकूल वजह के मेरा गीत काट दिया गया. देवड़ा साब कालू राम प्रजापति को बंगाली बाबू के कमरे में लाये और उन्हें बताया कि ये इस बात की शिकायत डायरेक्टरेट से कर रहे हैं कि इनका गीत बिना किसी वजह के काट दिया गया. अब तो बंगाली बाबू थर-थर थर-थर कांपने लगे. उन्होंने कालूराम प्रजापति से माफी माँगी. देवड़ा जी और नारायण सिंह जी ने कालूराम जी को समझाया बुझाया तब जाकर उनका गुस्सा शांत हुआ, वो उस शिकायती ख़त को फाड़कर फेंकने को तैयार हुए और बंगाली बाबू की मुसीबत ख़त्म हुई. उस दिन पूरे स्टाफ में उनकी इज्ज़त दो कौड़ी की हो गयी. उसके बाद जब तक वो जोधपुर में  रहे....... स्टाफ के लोगों ने उन्हें कभी इज्ज़त नहीं दी. वही बंगाली बाबू अब डायरेक्टर होकर आकाशवाणी बीकानेर का बंटाधार करने तशरीफ़ ला रहे थे. हम लोग समझ गए कि आकाशवाणी बीकानेर और हमारे बुरे दिन शुरू होने ही वाले हैं.

  

Monday, January 1, 2018

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग- 51( महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला )



            आकाशवाणी, बीकानेर में लगभग तीन बरस  हो गए थे. इन तीन बरसों में बहुत कुछ सीखने को मिला था. श्री महेंद्र भट्ट, श्री डी एस रेड्डी, श्री दयाल पंवार ने सुर की समझ दी, रहमान खां जी ने बेतालों को पकड़ने के गुर बताये, श्री मुंशी खां  और श्री जस करण गोस्वामी ने मींड की बारीकियां समझाई तो क़मर भाई ने रेडियो रिपोर्ट बनाना, न्यूज़ रील तैयार करना, कवि गोष्ठियों, शेरी नशिस्तों, स्टेज पर होने वाले कवि सम्मेलनों और मुशायरों की एडिटिंग जैसे स्पोकन वर्ड के बहोत ही अहम कामों को मुझे पूरा जी लगा कर सिखाया, जो कि रेडियो में बहोत ही कम होता है. अक्सर जो लोग काम जानते हैं, उनकी कोशिश रह
ती है कि उनके कलीग उन कामों के लिए उनके डिपेंडेंट बने रहें, खुद ना सीख सकें. उन्होंने एक कलीग की बजाय एक दोस्त की तरह सब कुछ सिखाया या सीखने में मदद की. हालांकि कुछ मामलों में हमारे बीच मतभेद भी हो जाया करते थे, लेकिन वो मतभेद, मतभेद ही रहते थे, कभी मनभेद नहीं बने और मतभेद चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों उन्हें बैठकर सुलझाया जा सकता है. मुझसे उम्र में 7-8 साल बड़े हैं कमर भाई और मैंने हमेशा उन्हें बड़े भाई की इज्ज़त दी तो उन्होंने भी कभी छोटे भाई सा प्यार देने में कोई कंजूसी नहीं की. हाँ कभी कभी इसी बड़प्पन में कुछ उपदेश देने का शौक़ उभर आता था तो उन उपदेशों को तो सुनना ही होता था. वो अक्सर कहा करते थे, “देखो महेन, आकाशवाणी में जितने लोग तुम्हारे साथ काम करते हैं वो सब तुम्हारे कलीग हैं, उनमे दोस्त तलाश करने की कोशिश कभी मत करना. जब जब भी तुम आकाशवाणी के कलीग्स में दोस्त तलाश करने की कोशिश करोगे, मान कर चलो कि 100 में से 90 बार तुम्हें ठोकर ही खाने को मिलेगी. वो ग़लत नहीं कहते थे. यही हुआ भी. 37 साल की अपनी नौकरी में रेडियो से बाहर के तो अनगिनत लोग दोस्त बने और उन्होंने अपनी दोस्ती निभाई भी मगर रेडियो में इतने बरसों में बीस नाम भी ऐसे नहीं होंगे, जिन्हें मैं दोस्त का दर्जा दे सकूं. तो इस तरह बीकानेर में रेडियो की नौकरी चल रही थी, मैं काम भी सीख रहा था, मगर अफ़सोस इस बात का होता था कि जितना ही मैं काम सीखता जा रहा था और जितना ही अपने अफ़सरों का विश्वास जीतता जा रहा था, मेरे दुश्मनों की तादाद उतनी ही बढ़ती जा रही थी.
 मेरे डायरेक्टर  श्री पी एम वैष्णव हम दोनों के काम से पूरे मुतमईन थे. जब जब हम पर लोकल लोगों के गुट के अलग अलग रूप में हमले होते थे, वैष्णव साहब हमारा उत्साह बढाते थे और कहते थे, “ अपना काम ईमानदारी से करते जाइए, जो लोग बकवास करते हैं उन्हें बकवास करने दीजिये. ऑफिशियली आप लोगों का तब तक कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता जब तक कि मैं यहाँ हूँ.”
 वो ये सब इतने आत्मविश्वास के साथ कहते थे कि हमें बहुत ताज्जुब होता था कि जिस्मानी तौर पर इतने नाज़ुक से इंसान में भी इतना आत्म विश्वास हो सकता है. वैष्णव साहब मूल रूप से गुजरात के रहने वाले थे. कई बार मुझे अपने कमरे में सिर्फ हम लोगों के हाल चाल जानने के लिए भी बुला लिया करते थे. ऐसे में कई बार वो ये भी भूल जाते थे कि वो राजस्थान में बैठे हैं और मैं गुजराती नहीं हूँ. कई बार मुझे बुलाकर कमरे में बिठाते और भावातिरेक में  गुजराती में कई कई मिनट तक बोलते चले जाते थे. मैं उनके मुंह के सामने देखता रहता. भाव तो बिना भाषा के भी संप्रेषित हो ही जाते हैं, हालांकि मैं गुजराती नहीं था लेकिन गुजराती भाषा राजस्थानी से इतनी अलग भी नहीं है कि मुझे उनकी बात ज़रा भी पल्ले ना पड़े. फिर जैसे ही उन्हें ध्यान आता कि वो गुजराती में बहोत कुछ कह गए हैं तो सॉरी बोलते और हिन्दी में उस बात का तर्जुमा करने लगते जो उन्होंने कही थी. मैं उन्हें कहता, “सर मैं आपकी बात समझ गया हूँ.” और सच में मैं उनकी बात समझने लगा था.  
                        बेटा वैभव बडा हो रहा था. अब उसे स्कूल में भर्ती करवाना था. विचार किया जाने लगा कि किस स्कूल में दाखिल करवाया जाए. उस वक़्त का सबसे अच्छा स्कूल विद्या निकेतन बहुत दूर गंगा शहर में था. उनकी बस लेने और छोड़ने आती थी लेकिन मेरे पिताजी इस बात के लिए तैयार नहीं हुए कि उनके इतने नन्हें से पोते को इतनी दूर पढने के लिए भेजा जाय. इसी बीच मेरी छोटी मौसी जी की बेटी लिछम बाई के दोनों बेटे मोहन और शंकर यानी मेरे भांजे हमारे घर आये. मुझे नहीं पता कि मोहन शंकर के शुरुआती जीवन की कहानी जो मैंने 18 वें एपिसोड लिखी थी, आपने पढी है या नहीं, उन लोगों के लिए, जिन्होंने उसे किसी वजह से नहीं पढ़ा, मुख़्तसर तौर पर मैं उसे दोहरा देता हूँ. मेरे बड़े मौसा जी एस डी एम थे. मौसा जी मौसी जी अंग्रेजों के बीच उठने बैठे वाले, क्लब कल्चर के शौकीन. अनाप शनाप दौलत थी उनके पास. किलोग्राम्स में सोना, खूब ज़मीन जायदाद. लेकिन उनके कोई औलाद नहीं थी. मेरी मौसी जी ने अपने अंगूठा छाप देवर कान जी की शादी अपनी भांजी यानी मेरी छोटी मौसी जी की बेटी लिछम बाई से करवा दी. उनके तीन औलादें पैदा हुईं.मोहिनी,  मोहन और शंकर. बस कान जी और लिछम बाई ने उस घर को दो वारिस देकर अपनी ड्यूटी पूरी कर दी थी. अब उनकी परवरिश मेरी मौसी जी की देख रेख में नौकर चाकर किया करते थे. खूब धन दौलत थी, इसलिए उन बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी की जाती थी, उस ज़माने में पैडल से चलने वाली कारें और चमचमाती तीन पहियों की साइकिलें मैंने सबसे पहले उनके पास ही देखी थीं. अपने पिताजी के चूनावढ़ वाले दफ्तर के बाद अगर चूड़ी बाजा यानी ग्रामोफोन मैंने किसी घर में देखा था तो वो मेरी बड़ी मौसी जी का घर ही था. यानी मोहन शंकर को हर वो चीज़ मयस्सर थी जिसकी वो ख्वाहिश करते थे. एक बार रायसिंहनगर में मोहन बाबू थाली में चांदी के कलदार लेकर एक एक कर नाले में फेंक रहे थे. जब मौसी जी ने उन्हें टोका तो पूरी थाली नाले में फेंक कर जोर से चिल्लाते हुए दौड़ पड़े थे, “ओ बाबो सा मा सा मारै ओ...........”(ओ बाबो सा, माँ सा ममार रही हैं ओ )
            और मेरे मौसा जी दौड़ते हुए आये, मौसी जी से बोले, “क्या बात हो गयी भई, हमारे बेटे को क्यों रुला रहे हैं आप ?”
            मौसी जी ने जवाब दिया, “कूड़ बोल रियो है. म्हैं नईं मार्यो इने पण देखो नी चांदी रा कलदार नाळै में बगावै है.”(झूठ बोल रहा है ये मैंने नहीं मरा इसे लेकिन देखिये, चादी के कलदार फेंक रहा है ये नाले में )
            मौसा जी ने बड़े नर्म लहजे में मोहन से पूछा, “क्यों बेटा, आप नाले में रुपये क्यों फेंक रहे थे  ?”
            मोहन का जवाब था, “नईं बा सा म्हैं तो गिणती सीख रियो हौ.”(नहीं बा सा मैं तो गिनती सीख रहा था.)
            अब हमारे मौसा जी ठहाका लगा कर हंस पड़े और मौसी जी से बोले, “भाई आप भी कमाल करती हैं. बच्चा गिनती सीख रहा है और वैसे खेल खेल में अगर सौ पचास रुपये फेंक भी दे तो क्या फर्क पड़ता है. लाओ भाई लाओ कोई थाली में और रुपये लाकर दो हमारे बेटे को.”
            दो नौकर दौड़ते हुए गए और फिर से एक थाली में कलदार भर कर ले आये और मोहन फिर से उन चांदी के रुपयों को नाले में फेंकते हुए गिनने लगा, एक....दो....... तीन..........
            वही मोहन शंकर हमारे घर आये थे. उन्होंने मेरा स्वर्गीय मौसा जी के नाम से एक स्कूल खोला था, श्री गंगाधर मेमोरियल सेंट्रल एकेडमी. वो लोग चाह रहे थे कि वैभव का दाखिला हम उनके स्कूल में करवा दें. हमारे पास भी मना करने की कोई माकूल वजह तो थी नहीं. उन दोनों भाइयों ने हर तरह से वैभव की पढाई और सुरक्षा की गारंटी ली तो मेरे पिताजी भी वैभव को उनके स्कूल में भेजने को तैयार हो गए. वैभव श्री गंगाधर मेमोरियल सेंट्रल एकेडमी में जाने लगा.
             मोहन और शंकर भी कमोबेश मेरी ही उम्र के थे. रायसिंहनगर में मोहन को कलदार नाले में फेंकते हुए ताज्जुब से देखने वाले एक बेहद मामूली इंसान को, यानी मुझे जब ज़िदगी ने इतने रंग दिखा दिए थे तो भला वक़्त क्या उस मोहन को माफ़ कर सकता था जो अपने बाबो सा के धन के घमंड में नियति से ज़रा भी भयभीत नहीं हुआ. जब मौसी जी ने उसे ज़रा सा डांटा, तो पहले से दुगुने रुपये लेकर फेंकने लगा और मौसी जी और नियति दोनों का मुंह चिढाने लगा. नियति भी मुस्कुरा पड़ी थी उस रोज़........ और उसने तय कर लिया था कि उसके इस बर्ताव का वो गिन गिनकर बदला लेगी.
             जब मोहन शंकर की बात चल ही पड़ी है तो आइये आज मैं आपको अपने उन दो प्यारे भानजों की कहानी सुनाता हूँ. वैसे तो मोहन शंकर से बड़ी उनकी बहन मोहिनी थी, लेकिन उस ज़माने में लड़कियों से सिवाय इसके कोई उम्मीद नहीं की जाती थी कि जहां भी उसकी शादी माँ बाप कर दें उस घर में जाकर वो अपने पति और घर को संभाल ले और अपने माँ बाप की गोद में दो तीन नाती नातिनें लाकर उन्हें नाना नानी बनने का सुख दे दे. मोहिनी की उम्र भी जब १५ साल की हुई तो मौसा जी और मौसी जी ने मेघ राज जी के बेटे  मोहन लाल जी  नाम के एक लड़के को मोहिनी के लिए पसंद कर लिया और मोहिनी की शादी बड़ी धूमधाम से हो गयी. मुझे अच्छी तरह याद है कि पूरी जाति में उस शादी कीखूब चर्चा हुई. दहेज में उन्होंने जी भर कर सोना चांदी, बर्तन कपड़े और घर की ज़रुरत का हर सामान दिया . हालांकि दूल्हा बीकानेर का ही था इसलिए बरात के कहीं बाहर से आने का कोई सवाल ही नहीं था, लेकिन लोकल होते हुए भी लगातार कई दिन तक लम्बी चौड़ी बरात आकर रोज़ शाम को दावतें उडाती रही और रोजाना खाने के मेन्यू में अनगिनत मिठाइयां और पकवान बनाए जाते रहे, खाए जाते रहे, खिलाये जाते रहे. यहाँ तक कि शादी के बाद वो मिठाइयां हमने भी कई दिन तक खाईं.
मौसा जी और मौसी जी के पास धन दौलत की कमी ना तो तब रही जब मौसा जी  एस डी एम की कुर्सी पर थे और न धन दौलत की कमी तब रही जब वो रिटायर हो गए. हाँ, फर्क बस इतना पडा था कि एक तो नौकरों की वो फ़ौज नौकरी के साथ ही रुखसत हो गयी थी, जो तनख्वाह तो सरकारी खाते से पाती थी लेकिन दिन रात पूरे कुनबे की खिदमत में लगी रहती थी. उनकी जगह एक दो नौकर रख लिए गए थे और लिछम बाई के जिम्मे घर के काफी काम आने लगे थे. इसके अलावा अब मौसा जी मौसी जी का क्लब जाना करीब करीब छूट गया था क्योंकि देश आज़ाद हुए काफी बरस हो गए थे और तमाम अँगरेज़ देश से विदा हो चुके थे. अब ज़्यादातर शाम में  मौसा जी और मौसी जी अपने महल जैसे घर के बरामदे में ऊंची ऊंची कुर्सियों पर बैठकर सिगरेट के कश के साथ व्हिस्की की चुस्कियां लेते थे और ड्राई फ्रूट चबाते रहते थे. मोहन शंकर के अलग अलग कमरे थे. मौसा जी मौसी जी यही सोचते थे कि दोनों भाई अपने अपने कमरे में बैठे पढाई कर रहे होंगे.
            शंकर पढाई में बहोत होशियार था. हर साल अपनी क्लास में अव्वल आता था जबकि मोहन का दिल पढाई में ज़्यादा नहीं लगता था. हालांकि तिजोरी में ढेरों सोना रखा था लेकिन राजस्थानी की एक कहावत है, “खान्वतां खान्वतां तो कूवा ई खुट जावै”. यानी अगर धन को सिर्फ खर्च ही खर्च किया जाता रहे तो कुआं भरकर धन हो तब भी वो कभी न कभी तो ख़त्म होगा ही. ख़ास तौर पर जब कमाई बिलकुल बंद हो जाए और खर्च पहले के जैसे ही बने रहें. खर्च वैसे ही चल रहे थे. बच्चों की पढाई पर जी भरकर खर्च हो रहा था. घर में गाय भी रखी हुई थी मौसी जी ने, जिसका दूध पूरे परिवार के काम आता था. कान जी के अपने खर्चे थे जो उनके किले में हफ्ते में एक बार जाकर वहाँ की घड़ियों में चाबी भरने की कमाई से तो पूरे होने वाले नहीं थे. लिछम बाई  को भी दिन भर घर में काम करते वक़्त किरचा सुपारी की ज़रुरत पड़ती थी और मौसा जी मौसी जी के ड्रिंक्स और सिगरेट के अपने खर्च थे. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि कमाई तो बंद हो चुकी थी, बस हर तरफ खर्च ही खर्च थे. कहाँ तो हर त्यौहार को सेठों के घर से बड़ी बड़ी डालियाँ आती थीं और कहाँ अब बराए नाम कुछ रुपये पेंशन के तौर पर आते थे. फिर भी अभी लक्ष्मी ने उनके घर में अपना आसन जमा रखा था.
            मौसा जी और मौसी जी की ज़िंदगी इसी तरह चैन से कट रही थी कि इसी बीच उनके एक पड़ोसी व्यास जी का एक बेटा बीकानेर आया जो इथियोपिया में रहता था. उन दिनों कैसेट रिकॉर्डर बस ईजाद हुए ही थे.  हमारे देश में तो कैसेट  रिकॉर्डर बनने नहीं लगे थे, हाँ कोई बाहर से आता और उसके पास पैसा होता तो ये खिलौना ज़रूर लेकर आता. व्यास जी और मौसा जी की बहुत गहरी दोस्ती थी. इस नाते व्यास जी की सारी औलादें मौसा जी को शंकर मोहन की तरह बाबो सा ही पुकारती थीं. व्यास जी का बेटा जब कैसेट रिकॉर्डर लेकर आया तो मौसा जी के पास आकर उन्हें रिकॉर्डर दिखाया और बोला, “ बाबो सा आप भी इस पर कुछ रिकॉर्ड करो. “
            उन्होंने हंसकर कहा, “क्या है ये ?”
            “बाबो सा ये रिकॉर्डर है. आप जो भी बोलेंगे इसमें रिकॉर्ड हो जाएगा. फिर उसे चूड़ी की तरह बजाकर सुन सकेंगे.”
            मौसा जी हंसकर बोले, “अरे बेटा, मेरी आवाज़ को तो ये मशीन अपने में भर लेगी कोई बात नहीं लेकिन कहीं मेरी आवाज़ के साथ साथ मेरी सांस को भी इसने अपने में भर लिया तो ?”
            वो भी हँसते हुए बोला, “ अरे नहीं बाबो सा, लीजिये देखिये, मैं इसमें अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करके दिखाता हूँ पहले, फिर आप करना.”
            ऐसा कहकर उस लड़के ने राम चरितमानस की दो तीन चौपाइयां गाईं. कैसेट को रिवाइंड करके उसे बजाया तो चौपाइयां कमरे में गूंजने लगीं. अब वो लड़का बोला, “क्यों बाबो सा, अब तो आप भी रिकॉर्ड करेंगे ना कुछ ?”
            “ क्या रिकॉर्ड करना चाहते हो तुम मेरी आवाज़ में ?”
            “आप तो गीता के श्लोक बहोत शानदार बोलते हैं, वही बोलिए. वो रिकॉर्ड करके मैं अपने साथ इथियोपिया लेकर जाऊंगा. म्लेच्छों का देश है बाबो सा, कम से कम रोज़ आपकी आवाज़ में गीता के कुछ श्लोक मेरे कानों में पड़ेंगे तो मेरा पूरा दिन अच्छा गुज़रेगा.”
            “ठीक है बेटा, लो शुरू करो तुम रिकॉर्डिंग. अब कोई भी बोलना मत बीच में, जब तक कि मेरी रिकॉर्डिंग पूरी ना हो जाए.”
वो अपने ड्राइंग रूम के तख़्त पर बैठे हुए थे. एक गाव तकिये पर रिकॉर्डर रखा गया और दूसरे का सहारा लेकर वो बैठ गए. मौसी जी और व्यास जी का बेटा पास में बैठे हुए थे. उन्होंने दोनों आँखें बंद करके गीता का सस्वर पाठ शुरू किया. करीब बीस मिनट तक वो पाठ चलता रहा. एक अध्याय ख़त्म हुआ तो मौसी जी और उस लड़के ने सोचा, अब अगला अध्याय शुरू करेंगे. लेकिन ये क्या....... ? मौसा जी एक दम चुप...... सबने कुछ लम्हे इंतज़ार किया, लेकिन मौसा जी आँखें बंद किये वैसे ही चुप. मौसी जी को लगा कि शायद नींद आ गयी श्लोक बोलते बोलते. उन्होंने हाथ से रिकॉर्डर रोकने का इशारा किया तो लड़के ने रिकॉर्डर रोक दिया. मौसी जी बोलीं, “कांईं हुयो सा...... चुप कियां हूयग्या ? नीन आयगी कांईं ?”(क्या हुआ साब चुप कैसे हो गए? नींद आ गई क्या? )
लेकिन मौसा जी ने कोई जवाब नहीं दिया. अब मौसी जी ने हाथ लगाया तो उनकी गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी. फ़ौरन पड़ोस के एक डॉक्टर ने आकर नब्ज़ के हाथ लगाया और कहा, “माँ सा... बाबो सा तो स्वर्ग सिधार गए.”
सब हक्के बक्के रह गए. मौसी जी चिल्लाने लगीं कि उस मशीन में ही कुछ ऐसा था कि उसने मौसा जी की जान ले ली. वो रोते रोते कहती जा रही थीं कि मौसा जी ने कहा भी था, कहीं ऐसा ना हो कि मेरी आवाज़ के साथ साथ मेरी सांस भी ले ले ये मशीन. मशीन का तो बेचारी का क्या कुसूर था. इतनी ही उम्र लिखवा कर लाये थे मौसा जी. अगर इस तरह टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्ड करने से जान जाने लगती तो हम रेडियो वालों का क्या होता ? लेकिन मेरी मौसी जी के दिमाग़ में ये वहम बुरी तरह से घर कर गया कि उस रिकॉर्डर की वजह से ही मौसा जी की जान गयी. ये वहम जब तक वो ज़िंदा रहीं उनके दिमाग़ से नहीं निकला. जब मेरी रेडियो में नौकरी लगी तब वो ज़िंदा थीं. मुझे उन्होंने ये नौकरी करने से बहोत रोका. मैंने उन्हें बहोत समझाया कि रिकॉर्डर में ऐसा कुछ नहीं होता जिससे जान को ख़तरा हो, मगर उन्हें मेरी बात बिलकुल नहीं जंची. उनका बस चलता तो वो मुझे रेडियो में कभी नौकरी नहीं करने देतीं.
मौसा जी जा चुके थे. मौसी जी अपने कमरे में अकेली बैठीं या तो भागवत पढ़ती रहतीं या फिर सिगरेट फूंकती रहतीं. शंकर पढाई में आगे बढ़ता जा रहा था और मोहन फेल हो हो कर पिछडता जा रहा था. मौसी जी जान गयी थीं कि पढाई लिखाई मोहन के बस की बात नहीं. उन्होंने सोचा, अब पढ़ नहीं सकता तो नहीं सकता क्या किया जाए. कोई बिज़नेस करवा दिया जाएगा. क्यों न इसकी शादी करवा दी जाए तो कम से कम पोता खिलाने का सुख तो मिल जाए. उन्होंने बिरादरी में लडकियां देखनी शुरू कीं. गोकुल जी नाम के एक क्लर्क थे डूंगर कॉलेज में. उनकी लड़की मौसी जी को पसंद आई. मोहन तो किसी तरह गिरते पड़ते हायर सैकेंडरी कर पाया था मगर ये लड़की ग्रेजुएट थी. गोकुल जी ने कहा कि उन्हें कोई एतराज़ नहीं है हायर सैकेंडरी पास मोहन के साथ अपनी ग्रेजुएट लड़की की शादी कर देने में. मोहन की शादी हो गयी.
नियति तो तय करके बैठी थी कि मोहन ने जिस तरह उसका मुंह चिढाया है, वो उसकी  ज़िंदगी को इतनी आसान तो नहीं रहने देगी. कुछ ही दिन बाद मोहन और मोहन की पत्नी के बीच मनमुटाव होने लगा. इधर उस लड़की की लिछम बाई से भी नहीं बनी. मौसी जी तीनों को समझाने की भरपूर कोशिश करती रहीं लेकिन कोई  भी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था. झगड़ा दिनोदिन बढ़ता गया और एक दिन वो लड़की घर छोड़कर अपने माँ बाप के घर लौट गयी. मौसी जी ने बहोत कोशिशें कीं लेकिन उस लड़की ने कभी वापस इस घर का रुख नहीं किया. इधर घर की बहू घर छोड़कर गयी उधर ससुर जी यानी कानजी भी दुनिया छोड़कर चल दिए. वो चाहे कुछ भी कमाते नहीं थे, मौसी जी की तिजोरी पर एक बोझ ही थे, लेकिन घर में एक बुजर्ग मर्द की हैसियत तो थी उनकी.
            मोहन ने कई बार कोशिश की कि कोई बिजनेस ऐसा जमा ले कि कम से कम दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ हो सके. उसकी हर कोशिश के साथ मौसी जी की तिजोरी में से कुछ सोना कम हो जाता था. मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. तिजोरी में सोना कम होता जा रहा था. महल जैसा घर बिना वक़्त वक़्त पर मरम्मत के टूटकर बिखरने लगा था. पास ही बने कुछ कमरे जो मौसा जी के ज़माने में अच्छे पैसों में किराए पर उठते थे, अब खंडहर होने लगे थे इसलिए कोई अच्छा किराया देने  वाला भला उन्हें किराए पर क्यों लेता. अब तो कोई  गरीब इंसान ही उन्हें किराए पर लेता था जो नाम भर का ही किराया दे पाता था. यानी हर तरफ से लक्ष्मी इस परिवार को छोड़कर जाने को उतावली हो रही थी.
            इधर शंकर ने बहोत अच्छे नम्बरों के साथ फीजिक्स में एम एस सी तो कर ली थी मगर इस पढाई के दौरान पहले शराब और फिर काम्पोज़, मैन्ड्रेक्स जैसी ड्रग्स की लत पाल ली. वो बहोत ज़हीन और काबिल  इंसान था, मगर उसकी काबलियत को सही रास्ता नहीं मिला. वो ट्यूशन भी पढाता था लेकिन उसका सारा पैसा नशे की भेंट चढ़ जाता था.
            इसी दौरान दोनों भाइयों ने तय किया कि मिलकर कोई ऐसा काम शुरू किया जाए जिसमे शंकर की पढाई लिखाई काम आ जाए और मोहन मैनेजमेंट का काम संभाल ले. बहोत सोचने के बाद दोनों ने तय किया कि बाबो सा के नाम पर एक स्कूल खोला जाए. एक बहोत बड़ी बिल्डिंग किराये पर ली गयी. कई टेम्पो और बसें खरीदी गईं और काफी दिन चले इंटरव्यूज़ की बिना पर स्टाफ का सलैक्शन किया गया. कई बाबू, कई टीचर्स, कई चपरासी,कई ड्राइवर, कई आयाएं और भी न जाने कौन कौन स्टाफ में आ गए.. शंकर ने प्रिंसिपल की कुर्सी संभाली और मोहन ने डायरेक्टर की . इस स्कूल को शुरू करने के लिए फिर मौसी जी की तिजोरी के सोने का एक बडा हिस्सा कुर्बान हो गया. अब बस लक्ष्मी के अवशेष ही बचे थे इस घर में.
            इसी स्कूल में हमारे बेटे वैभव को दाखिला देने का प्रस्ताव लेकर दोनों भाई मोहन और शंकर हमारे घर आये थे. इस तरह वो श्री गंगाधर मेमोरियल सेंट्रल एकेडमी हमारे बेटे का पहला स्कूल बना. शुरू शुरू में जिस तरह से मोहन और शंकर ने पब्लिसिटी पर पैसा खर्च किया, काफी माँ बाप ने अपने बच्चों के दाखिले इस स्कूल में करवा दिए लेकिन जैसे जैसे वक़्त गुज़रता गया, शंकर बाबू की कुछ दबी हुई इच्छाएं बहोत बेताबी के साथ सर उठाने लगीं. एक जगह बन ही गयी थी, जिसमे स्कूल तो दिन में ही चलता था. नौकर चाकर हर तरह की सहूलियत के साथ साथ फ़ीस के रूप में अच्छे खासे रुपये भी हाथ में आने लगे थे दोनों भाइयों के. अब जिन कमरों में दिन में विद्या दान होता था , सरस्वती की आराधना होती थी, उन्हीं कमरों में शाम में शराब की महफ़िलें जमने लगीं. जहां गुड़ के गोदाम बन जाते हैं, मधुमक्खियाँ भी पहोंच ही जाती हैं. कुछ फिल्म वालों ने जब देखा कि मोहन शंकर के पास  हर तरह की सहूलियत मौजूद है, वो वहाँ आकर इकट्ठे होने लगे और फिल्म बनाने के लिए दोनों भाइयों को उकसाने लगे. अगर ईमानदारी से देखा जाए तो शंकर में एक कलाकार मौजूद था. वो लिखता भी अच्छा खासा था, लेकिन उन फिल्म वालों को तो बस शंकर मोहन और उनके पास मौजूद सहूलियतों को इस्तेमाल करना था. आये दिन मीटिंग के नाम पर जमने वाली महफ़िलों में अनाप शनाप पैसा खर्च होने लगा था. फिल्म की उन मीटिंग्स में कई बार मैं भी शरीक हुआ लेकिन जब मैंने देखा कि यहाँ काम कम हो रहा था और बातें ज़्यादा, तो मैंने उनकी मीटिंग्स से किनारा कर लिया. दोनों भाई शायद ये भूल गए थे कि मौसी जी की ज़िंदगी की आख़िरी बची हुई पूंजी का बहोत बडा हिस्सा इस स्कूल में लगा था. बच्चों की फ़ीस आती थी तो स्टाफ की तनख्वाहें भी इसी फ़ीस में से दी जानी थी. फिर आये दिन कभी किसी बस की मरम्मत करवानी होती थी तो कभी किसी टेम्पो के टायर ट्यूब बदलवाने होते थे. हर तरफ पैसे की मांग. कहाँ से आये पैसा ? पैसा तो फ़िल्मी मीटिंगों में धुंआ धुंआ होकर उड़ता चला जा रहा था. जो लोग इन दोनों भाइयों को घेरे हुए अपनी जेबें भर रहे थे, इन्हें समझा रहे थे कि कोई भी काम नया शुरू करते हैं तो कुछ वक़्त तो उसमे रुपये डालते ही जाना होता है. जब वो काम जम जाता है तब फिर वही बिज़नेस पैसा कमाकर देने लगता है. दोनों भाई इस मामले में अनाड़ी.
हर महीने दोनों भाई जा पहुँचते मौसी जी के पास पैसों की मांग लेकर और मौसी जी बेचारी क्या करतीं ? जो कुछ बचा खुचा सोना था, थोड़ा थोड़ा करके वो सारा  दोनों भाइयों के सुपुर्द कर दिया. एक दिन मैं भी उनके पास बैठा हुआ था. शंकर ने आकर कहा, “माँ सा, कुछ रुपये चाहिए, बस खराब हो गयी है. बीस हज़ार का खर्चा है उसमें.”
            मौसी जी ने दुखी होते हुए कहा, “ बेटा ये स्कूल कमाई के लिए खोली है या खर्च करने के लिए ? कितना पैसा लगा चुके हो तुम लोग कभी हिसाब लगाया है तुम लोगों ने ?”
            “माँ सा नया काम है जमने में थोड़ा वक़्त भी लगेगा और कुछ पैसा भी. एक बार जमने के बाद ही तो स्कूल पैसा देने लगेगी.”
मौसी जी ने अपने गले से एक बहोत मोटी सी सोने की चेन निकाल कर शंकर के हाथ में रख दी और लम्बी सांस छोड़ते हुए बोलीं, “ लो बेटा....... ये मेरे पास सोने की आख़िरी चीज़ बची है....... अब तिजोरी खाली है बिलकुल. जमाओ अपना स्कूल इससे और तब भी ना जमे तो फिर बेटा बंद कर दो स्कूल, अब न मेरे पास पैसा है, न कोई सोना.” मैंने देखा..... उनकी आँखों में एक सूनापन उतर आया था. वो सोने की ज़ंजीर जो उन्होंने शंकर के हाथ में दी थी, उसका अक्स आज भी मेरी आँखों में वैसे का वैसा मौजूद है. बहोत मोटी और लम्बी सी उस ज़न्जीर में कम से कम चार सौ ग्राम सोना था.
बस..... वो सोना ख़त्म हुआ, लक्ष्मी ने घर को अलविदा कहा, उसके बाद मौसी जी भी ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहीं. उन्हें कैंसर रोग ने आ घेरा और उन्होंने इलाज करवाने से साफ़ इनकार कर दिया. कुछ  ही महीनों के बाद वो इस असार संसार को छोड़कर चल दीं और साथ ही मोहन शंकर के स्कूल ने भी दम तोड़ दिया.
कानजी का एक छोटा सा मकान हुआ करता था गढ़ के सामने. शंकर ने अपना बोरिया बिस्तर उठाया और उस घर में आ गया. लिछम बाई कभी मोहन के साथ मौसा जी वाले घर में रहतीं तो कभी शंकर के पास आ जातीं. मेरे छोटे मामा जी के एक साले की बेटी के तीन औलादें थीं लेकिन उसे उसके पति ने छोड़ दिया था. मामाजी ने सोचा कि अगर अपने साले की लड़की की शादी मोहन के साथ करवा दी जाए तो दोनों का घर बस जाएगा. चार लोगों की मौजूदगी में दोनों की शादी हो गयी. अकेले मोहन को अपना गुज़ारा चलाने में बड़ी दिक्कतें आ रही थीं, ऊपर से एक अदद बीवी और उसकी तीन औलादों को कैसे पाले , उसकी समझ नहीं आ रहा था. उसके पड़ोस में ही एक परिवार रहता था जिनका एक पेट्रोल पम्प था. पैसे की कोई कमी नहीं थी. उस परिवार की बरसों से मौसाजी के उस महलनुमा घर पर निगाह थी. वो लोग आये दिन मोहन को उधार के नाम पर पैसे देने लगे और मोहन भी क्या करता ? लिछम बाई भी बीमार रहने लगी थीं. उनकी दवा दारू, अपने परिवार के खर्चे आखिर कहाँ से लाता वो पैसे ?
शंकर जब से अकेला रहने लगा था, तरह तरह की ड्रग्स को आजमाने लगा. इस बीच उसने कई नौकरियाँ कीं लेकिन वो कहीं नहीं टिक पाया. मैं जिन दिनों इलाहाबाद में पोस्टेड था, एक बार बीकानेर आया तो कोर्ट से लौटते हुए देखा कि शंकर खड़ा है. मैं उसके पास रुक गया. वो मुझे अपने कमरे में लेकर गया. एकदम अस्तव्यस्त था पूरा कमरा. चारों तरफ गंदे कपड़े , किताबें कॉपियां और इंजेक्शन की शीशियाँ बिखरी हुई पड़ी थीं. मैंने कहा, “शंकर, यार ये क्या हाल बना रखा है तुमने ?”
नशे में डूबी हुई उसकी आवाज़ आज भी मुझे याद है. वो बोला, “कुछ नहीं मामा जी, ये साली दारू और गोलियां आजकल कुछ असर ही नहीं करते. आजकल मैं नशे के इंजेक्शन लगाता हूँ.”
“अरे शंकर क्या कर रहे हो ये तुम ? क्यों अपने शरीर को खराब कर रहे हो तुम ? जानते हो, ये नशा तुम्हें अन्दर से खोखला कर रहा है.”
“बस कुछ दिन और मामा जी, सिर्फ कुछ दिन और......”
“फिर क्या होगा ? क्या कुछ दिन बाद छोड़ दोगे ये नशा करना ?”
“छोडूंगा नहीं छोड़ना पडेगा मुझे.”
“क्या मतलब ?”
वो एक ज़ोरदार ठहाका लगाते हुए बोला, “मामा जी मैं शादी कर रहा हूँ. जब बीवी आ जायेगी तो ये उसकी ज़िम्मेदारी होगी कि वो मुझे नशा छुडवाये.”
“किसके साथ कर रहे हो शादी और कब कर रहे हो शादी ?”
“लगता है आपको नाना जी(मेरे पिताजी) ने कुछ नहीं बताया. कोटा की लड़की है एक. मैं और नाना जी जाकर मिल आये हैं उससे. मैंने अपने नशे वशे के बारे में कुछ नहीं छुपाया उससे. फिर भी वो मुझसे शादी करने को तैयार है.”
“बहोत अच्छी बात है शंकर , अगर वो तुम्हारे साथ शादी करने को तैयार है तो ज़रूर शादी कर लो और भगवान् करे वो तुम्हारा नशा भी छुडवा दे, लेकिन एक बात याद रखना....... नशा छोड़ने का फैसला भी खुद नशा करनेवाले को ही लेना पड़ता है और उस फैसले पर अडिग भी खुद उसे ही रहना होता है. कोई दूसरा उसे नशा छोड़ने में मदद तो कर सकता है लेकिन नशा छुडवा नहीं सकता.....खैर तुम शादी करो... ज़रूर करो... आल द बैस्ट.”
मैं वहाँ से चला आया था. फिर सुना उसकी शादी हो गयी. कोटा से ब्याह कर जिस लड़की को वो लाया था, उसने बहोत कोशिश की उसका नशा छुडवाने की. शंकर जो भी कमाता था, नशे पर खर्च कर देता था, ऐसे में घर का खर्च कैसे चले ? शंकर की बीवी ने एक स्कूल में नौकरी कर ली. दो-तीन साल तक वो बेचारी इस कोशिश में लगी रही कि किसी तरह से शंकर नशा छोड़ दे. शंकर भी शायद नशा छोड़ना चाह रहा था लेकिन नशा उसके जिस्म और जेहन में इस गहराई तक बैठ चुका था कि छोड़ छोड़ कर वो वापस नशे के जाल में आ फंसता था. कोई औलाद हो नहीं पा रही थी, वरना शंकर की बीवी का मानना था कि कोई  बच्चा घर में आ जाए तो शायद शंकर की ये लत छूट जाए. दोनों ने तय किया कि एक बच्चा गोद ले लिया जाए. एक छोटी सी बच्ची गोद ली गयी. शंकर की बीवी स्कूल चली जाती थी, इसके बाद शंकर के सामने कोई चारा नहीं बचता था सिवा इसके कि वो बच्ची को संभाले. उन दिनों नशे के लिए वो मॉर्फिन के इंजेक्शन अपने कूल्हों पर लगाया करता था. रोज़ एक ही जगह पर इंजेक्शन लेने से वहाँ घाव होने लगे थे. उसके सामने सवाल ये खड़ा होने लगा कि वो अपने नशे की देखभाल करे या बच्ची की. कभी बच्ची का प्यार जीत जाता था तो कभी नशे की लत.
वक़्त इसी तरह गुज़र रहा था. शंकर तमाम कोशिशों के बावजूद नशा करना नहीं छोड़ पा रहा था. उसके कूल्हों पर के घाव दिनोदिन बिगड़ रहे थे. आखिर तंग आकर उसकी बीवी ने आख़िरी हथियार आजमाने की तैयारी कर ली. उसने शंकर से कहा, “आपके कूल्हों के घाव गंभीर होते जा रहे हैं.अब भी आप नशा करना नहीं छोड़ेंगे तो ज्यादा दिन ज़िंदा नहीं रह सकेंगे. मुझे विधवा बनकर इस घर में नहीं रहना है. आप तय कर लीजिये, आपको नशे की ज़रुरत है या मेरी ? अगर अब भी आप नशा नहीं छोड़ते तो मैं आपको तलाक़ दे दूंगी.”
शंकर बहोत रोया..... बहोत गिड़गिड़ाया मगर उस लड़की ने भी एक फैसला ले लिया था. उसे लगा कि उसका ये हथियार काम करेगा. शंकर उससे बहोत प्यार करने लगा था, इसलिए वो नशा छोड़ देगा मगर उसे तलाक़ नहीं लेने देगा. एक दो दिन शायद शंकर ने बिना नशे के काटे, फिर छुपकर इंजेक्शन लगाने लगा. आखिर उसकी बीवी उसे घसीटती हुई कोर्ट ले गयी और तलाक़ की अर्जी दाखिल कर  दी. कोर्ट ने दोनों को छः महीने अलग अलग रहने की हिदायत दी और गोद ली हुई बच्ची को माँ के सुपुर्द कर दिया. तीनों लोग कोर्ट से लौट आये.
अब सवाल ये था कि शंकर की बीवी के न कोई आगे था, ना कोई पीछे. आखिर छः महीने का वो वक़्त कहाँ रहकर काटे. शंकर की बीवी ने उससे कहा, “छः महीने बाद कोर्ट में हम यही कहेंगे कि हम लोग अलग रह रहे थे. अभी अगर आपको कोई एतराज़ न हो तो मैं आपके साथ ही रहूँगी.”
शंकर अपने जिस्म और जेहन में भर गए नशे के उस ज़हर के हाथों मजबूर था,  वो कुछ नहीं बोला, बस बीवी से लिपट कर रो पडा.
दोनों ने कुछ दिन इसी तरह गुज़ारे......... कोर्ट की नज़र में वो दोनों तलाक़ के मुहाने पर खड़े पति पत्नी थे जिन्हें छः महीने बाद कोर्ट में जाकर बस इतना सा कहना था कि पिछले छः महीने से वो लोग अलग रह रहे हैं और कोर्ट उन्हें एक दूसरे की क़ैद से आज़ाद कर देगा. वो दोनों ही साफ़ साफ़ समझ नहीं पा रहे थे कि वो एक दूसरे से अलग होना चाहते भी हैं या नहीं ?
वो साथ रहना चाहते थे या नहीं, न उन्हें पता था, ना किसी और को लेकिन नियति को पता था, साफ़ पता था कि क्या होने वाला है ? रोज़ की तरह रात में बीवी ने शंकर के कूल्हों के घाव स्पिरिट से साफ़ किये, पट्टी बांधी, उसे खाना खिलाया, खुद ने खाया, सुबह चार बजे का अलार्म लगा कर सो गयी ताकि सुबह उठकर पति और बच्ची के लिए खाना बना कर रख सके, अपना टिफिन साथ ले सके और बच्ची को तैयार करके स्कूल भेज सके. बच्ची को स्कूल के लिए रवाना करने के साथ ही वो भी पब्लिक पार्क के सामने से उस जीप में सवार हो जाया करती थी, जो उसे पास के उस गाँव में छोडती थी, जहां के प्राइमरी स्कूल में उसकी पोस्टिंग थी.
सुबह उठी, जल्दी जल्दी सारे काम निबटाये. खाना पति के सिरहाने के पास रख कर उसकी चादर ठीक करने लगी तो शरीर कुछ गरम लगा. उसने कहा, “क्या बात है, बुखार हो गया है क्या आपको ?”
शंकर कराहते हुए बोला, “हाँ, कूल्हों में बहोत दर्द हो रहा है, शायद घाव में इन्फेक्शन हो गया है. उसी की वजह से बुखार चढ़ गया है.”
“मैं रुक जाऊं? आप कहो तो छुट्टी लेलूं.........!!!”
“नहीं, जाओ तुम........”
“नहीं, मैं रुक जाती हूँ आज.”
शंकर फीकी सी हंसी हंसकर बोला, “अरे बावली..... कल रात मेरे घाव नहीं देखे तुमने ? मैं नशे के बिना रह नहीं सकता और नशे के ये इंजेक्शन जब तक लूंगा, मेरी हालत इसी तरह रहेगी. जाओ तुम जाओ अपने काम पर, तुम्हें मेरी क़सम. मैं बुखार की दवा ले लूंगा.”
वो बेचारी क़सम की मारी निकल पड़ी घर से. बच्ची को स्कूल छोड़कर जा पहुँची पब्लिक पार्क के गेट पर. जीप में बैठे सभी लोगों को देर हो रही थी. सभी उस पर चिल्ला पड़े. ख़ास तौर से वो ड्राइवर जो रोज़ उसे लेकर जाया करता था, कहने लगा, “मैडम आप तो एक कार ले लीजिये. मान लिया कि आपके पति बीमार हैं लेकिन इस तरह रोज़ सबको लेट करवाने से काम नहीं चलेगा. मैं तो आज आपको छोड़कर ही जाने वाला था, ये तो सुमन बहन जी ने बहोत रिक्वेस्ट करके मुझे रोक लिया.”
वो बिना कुछ बोले जीप पर सवार हो गयी.
काश..... उस ड्राइवर ने उस दिन उस बदनसीब लेडी पर इतनी दया नहीं की होती और वो बिना उसका इंतज़ार किये, उसे छोड़कर निकल गया होता.
दो घंटे बाद ही वो बदनसीब घर लौट आई.......एक बेजान जिस्म के रूप में. बीकानेर से निकलते ही जीप की एक ट्रक से टक्कर हुई और सब की सब सवारियां और ड्राइवर मौके पर ही कुचले गए. वो बदनसीब लड़की, जिससे मैं कभी मिल नहीं पाया था,शंकर, मेरे पिताजी और दीगर लोगों के मुंह से टुकड़ों टुकड़ों में सुनी उसकी कहानी को मैंने आपके सामने रखा है, अक्सर मुझे याद आती है. आप जानते है, जिस इंसान की आपने शक्ल नहीं देखी होती, उसे याद करना भी एक अलग तरह की तकलीफ होती है क्योंकि कोई शक्ल आपकी आँखों के सामने नहीं आती और आपका दिल तड़पता है उसकी शक्ल देखने को और जो इंसान अब है ही नहीं, उसकी शक्ल भला अब आप कैसे देख सकते हैं ?
वो बदनसीब लड़की विधवा होकर नहीं मरना चाहती थी, भगवान ने उसकी सुन ली, वो सधवा ही चली गयी, लेकिन यकीनन जब उसके प्राण निकल रहे होंगे, वो अपने पति की सेहत के बारे में ही सोच रही होगी. कुछ महीनों बाद जब मैं बीकानेर आया तो शंकर ने ये पूरी दासतां मुझे सुनाई और कहा, “ मामा जी, उस लड़की ने मुझे टूट कर चाहा, जो कुछ भी किया, अच्छा या बुरा, सब कुछ मेरे लिए ही किया, लेकिन मैं उसके लिए कुछ नहीं कर पाया. ये देखिये...... मैंने एक फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है उसी को सेंटर में रखकर. देखिएगा, अगर कोई  प्रोडूसर नज़र में आये तो बताइयेगा.
कुछ ही महीनो बाद खबर मिली कि नशे की ओवरडोज़ की वजह से एक दिन शंकर भी उसी दुनिया में जा बसा जहां उसे इतना प्यार करने वाली बीवी जा बसी थी.
मैं तब तक मुम्बई आकर विविध भारती में बिजी हो चुका था. बहोत लम्बे अरसे तक बीकानेर नहीं जा पाया. जब एक बार बीकानेर गया और भाई साहब भाभी जी से बातें कर रहा था, तो घंटी बजी. मैंने कहा, “इस भरी दुपहरी में कौन आ गया ?”
भाभी जी ने मेरी बात पर ध्यान न देते हुए कहा, “ महेंद्र जी, जूस पियेंगे ?”
मैं कुछ बोलता इससे पहले ही वो उठीं और बाहर की तरफ चल पडीं. मैं भी उनके पीछे पीछे बाहर आया. देखा एक आदमी जूस का ठेला लिए खड़ा है. गेट खोला तो उसने अन्दर आकर मेरे पैर छुए. मैं हक्का बक्का रह गया क्योंकि गर्मी के कारण उस जूस वाले ने अपने पूरे चेहरे को गमछे से ढँक रखा था. मैंने आशीर्वाद तो दे दिया, मगर अभी भी मैं पशोपेश में था कि इस ठेले वाले ने मेरे पैर क्यों छुए? तभी उसने अपना गमछा हटाया. मुझे जैसे किसी ने चार सौ चालीस वोल्ट का झटका लगा दिया था. ये जूस के ठेलेवाला और कोई नहीं वही मोहन था, जिसे मैंने बचपन में नाले में बड़ी शान के साथ सैकड़ों चांदी के कलदार गिराते हुए देखा था.



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