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Monday, May 2, 2016

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये- पत्ता-पत्ता बूटा बूटा- चौथी कड़ी


याद है दोस्तो! स्कूल में हिंदी पढ़ते समय जब अलंकार पढ़ाये जाते थे? अनुप्रास, श्लेष, यमक, उपमा, उत्प्रेक्षा ? न सिर्फ इनकी परिभाषायें, बल्कि सबके उदाहरण भी याद करने पड़ते थे। आज जब पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा की नयी कड़ी लिखने बैठी तब उन्हीं दिनों का याद किया यह पद बार-बार कानों में मंजीरे सा बजने लगा
"तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये"।



तरणि- तनुजा यानी सूर्य की पुत्री यमुना। पुराणों में यमुना को सूर्य की पुत्री बताया गया है और यम को उनका भाई। दीवाली के बाद जो भाई-दूज आती है, उसे यम-द्वितीया भी कहते हैं। मिथिलांचल में भाई को टीका करते समय कहा जाता है - यमुना न्योतेछि यम के, हम न्योतेछि भाई के।

तो उसी सूर्य की पुत्री और यम की बहन यमुना के तट पर बहुत सारे ऊँचे घने तमाल के वृक्ष छाये हुए हैं मानो झुक-झुक कर जल का स्पर्श करने की चेष्टा कर रहे हों, या उस जल के दर्पण में अपनी शोभा निहार रहे हों, या यमुना के जल को अत्यन्त पावन जानकर उसे प्रणाम कर रहे हों।

तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये।
किधौं मुकुर में लखत उझकि सब निज-निज सोभा कै प्रणवत जल जानि परम पावन फल लोभा।। 
वृंदावन के कृष्‍ण-बलराम मंदिन के प्रांगण में तमाल वृक्ष



भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के इन शब्दों में कुछ ऐसा आकर्षण था कि यमुना तट आँखों में तरंगित होने लगा। ऊँचे -ऊँचे तमाल वृक्षों के बीच से वो पगडण्डी भी दिखाई देने लगी जिस पर दिन भर के गोचारण से क्लांत गोपाल कृष्ण बस आने ही वाले हैं। बल्कि उनकी बाँसुरी की टेर तो सुनाई भी दे रही है। हरे-हरे बाँस की बाँसुरी, जिससे राधा ही नहीं सभी गोपियाँ डाह करती हैं --

मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माल गरे पहिरौंगी
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी।
भावतो तोहि कहा रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।

सखी राधा से कहती है - तुम चाहती हो कि मैं कृष्ण का स्वाँग भरूँ तो मैं तुम्हारा कहना मानकर पूरा भेष धरूँगी - सिर पर मोरपंख, गले में गुंजा माला, कटि में पीताम्बर पहन लूँगी। हाथ में लाठी लिए गायों के साथ-साथ फिरूँगी। बस एक ही काम मुझसे नहीं होगा - ये मुरलीधर श्रीकृष्ण के होठों से लगी मुरली मैं अपने होठों पर नहीं रखूँगी। 

राधा-कृष्ण के दिव्य अलौकिक प्रेम का आधार है यह यमुना-तट। यह वंशी-वट, जहाँ शरद ऋतु के पूर्ण चन्द्र की चाँदनी में महारास का आयोजन हुआ था। यह कदम्ब, जिस पर झूला पड़ा था और राधा प्यारी और कृष्ण मुरारी बारी-बारी झूले थे। और यह तमाल, जो उनकी लीला-कथा का प्रथम साक्षी बना था। जयदेव ने गीत गोविन्द के पहले ही श्लोक में लिखा है कि बादलों के उमड़ने-घुमड़ने से आकाश और सघन तमालों से भूमि पहले ही श्यामल हो रही थी कि रात घिर आयी। अब नन्द जी को चिंता है कि ऐसे निविड़ निशीथ में कहीं बालक डरकर घर न भूल जाये इसलिए वे राधा से कहते हैं कि इसे घर पहुँचा दो।

मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमैर्  
नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिदं राधे गृहं प्रापय।।

लेकिन यह श्यामलता तो तमाल का एक गुण हुआ।  दूसरा गुण है वसंत में उसके फूलों की मादक गंध। जयदेव कहते हैं -  ऐसा लगता है जैसे इसने कस्तूरी की गंध को जबरन अपने वश में कर लिया है।

मृगमद-सौरभ-रभस-वशंवद-नवदल-माल-तमाले

यही गुण उसे कृष्ण के और पास ले जाता है, उनसे गहरा नाता जोड़ देता है। दोनों एक जैसे श्याम वर्ण के और जबरन किसी का चित्त मोह लेने वाले।

तभी तो कृष्ण के अनन्य उपासक चैतन्य महाप्रभु को श्यामल तमाल में घनश्याम की प्रतीति होती है और वे तमाल तले समाधिस्थ हो जाते हैं, कुछ वैसे ही जैसे कोसों दूर से जगन्नाथ मंदिर की ध्वजा देखकर हो गये थे। ​

 
लेकिन विडम्बना देखिये हम तमाल को भूल गये हैं। तरणि तनूजा तट के तमाल तरु आपको दिखाने के लिये जब मैंने गूगल महाराज और विकिपीडिया महारानी का सहारा लिया तो उन्होंने मुझे निहायत उलझे और घुमावदार रास्तों पर भटका दिया। कुछ-एक अंग्रेज़ी और वनस्पति-विज्ञानी नाम बताये। तमाल को कभी जंगली बादाम तो कभी तेज-पत्ता बताया। एक रास्ता तमाल के फल के रस से मोटापा कम करने की ओर भी ले जा रहा था, शुक्र है कि मैंने उस पर आगे बढ़ने से पहले स्वास्थ्य सम्बन्धी चेतावनी पढ़ ली।

तमाल वृक्ष के चित्र ढूँढ़ने में भी सफलता हासिल नहीं हो सकी। उन चित्रों में आम, कटहल, जामुन और तेज-पत्ता तो मिला तमाल नहीं मिला। कम से कम ऐसा कोई चित्र नहीं मिला जिसे आपके सामने रखकर कह सकती - ये लीजिये, यह है तमाल। जितना समय इस भूलभुलैया में भटकते हुए गँवाया, अगर उतनी देर पैदल चलती तो शर्तिया वृंदावन पहुँच जाती और तब शायद खुद ही तमाल का चित्र खींच लाती। आगरा के उस बँगले तक भी पहुँच सकती थी जहाँ वर्षों पूर्व पं०विद्यानिवास मिश्र जी रहते थे और जहाँ किसी ने उन्हें तमाल से परिचित कराया था।

"तमाल के झरोखे से" शीर्षक लेख में वे कहते हैं -
याद नहीं किसने इसे पहचनवाया, क्योंकि इसे पहचानते ही लगा कि जाने कब से इसे पहचानता हूँ। काली कालिंदी को इसी ने अपनी घनी काली छाया से और काला भँवर बना दिया।  इसी ने गोरी राधा के उज्ज्वलनील प्यार की छाँह और सघन, और आर्द्र कर दी। इसको मैं हर वसंत में झरते और झीने-झीने फूलों से भरते देखता हूँ। हर वर्षा में इसे सघन पत्र-जाल का छत्र बना देखता हूँ। इसकी छाँह में जो रसवर्षा होती है वह बाहर की रसवर्षा से कहीं अधिक ज़ोरदार होती है। यह तमाल दोनों रसवर्षाओं से भीग-भीगकर सिहरता रहता है। इसकी छाया में कितना अंधकार सिमटता है। उस अंधकार में वृषभानु की दमकती दुलारी राधा श्यामा हो जाती है और श्याम घनश्याम हो जाते हैं। श्यामा-श्याम की रसकेलि  से भीगी वन भूमि श्यामा हो जाती है। 

तभी निर्गुण ब्रह्म के उपासक उसे ढूँढ-ढूँढ़कर थक जाते हैं और वह कहीं नहीं मिलता। श्रुति-स्मृति भी नेति नेति कहकर कन्नी काट लेती हैं। लेकिन सगुण उपासक को वह यमुना तट पर सहज ही मिल जाता है, यहीं वृंदावन में, तमाल तले, माधवी कुंज में मानिनी राधा की मनुहार करते हुए --

ब्रह्म मैं ढूँढ्यो पुरानन मानन बेद रिचा सुनि चौगुने चायन
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितहुँ वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन
ढूँढत ढूँढत बौरि भई रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देख्यो दुर्यो वह कुंज कुटीर में बैठि पलोटतु राधिका पायन।
_____________________________________________________________________________________________
गूगल से निराश होकर सोचा फूल-पत्तियों के प्रेमी गुरुदेव की शरण में जाऊँ। लेकिन उनके जो गीत मुझे याद हैं, वहाँ भी तमाल नदारद था। तब अपने संबंधी और बांग्ला लेखक अमर मुदी से पूछा। उन्होंने शब्दकोश के हवाले से बताया -

তমাল একপ্রকার সপুষ্পক উদ্ভিদ। এটি বনগাব, মহেশকাণ্ড ইত্যাদি নামেও পরিচিত। এর ইংরেজি নাম Mottled Ebony; এছাড়া বিভিন্ন ভাষায় একে Jagala Ganti Mara, Kari, Quarrelsome Tree, Vakkana, Nila Viruksha, Kare Mara, Kari Maram, Bistendu, Bombay ebony, बिसतॆंदु, Bistendu, Kala dhao, Kendu, Dakanan, Lohari, kakaulimera, kakavulimidi, kakiulimera, makha ইত্যাদি নামে ডাকা হয়।[১][২] তমাল গাছের বৈজ্ঞানিক নামDiospyros montana বা Diospyros cordifolia; যা 'Ebenaceae' পরিবারভুক্ত। এটি দক্ষিণ ও দক্ষিণ-পূর্ব এশিয়া, চীন, ক্রান্তীয় অস্ট্রেলিয়া ইত্যাদি অঞ্চলে জন্মে।

जयदेव के अनुपम गायक पंडित रघुनाथ पाणिग्रही से यह अष्टपदी सुनिये। कविता और कण्ठस्वर में से कौन किससे बढ़कर है, कहना कठिन है न?






इस श्रृंखला की पुरानी कडियां आप यहां पढ़ सकते हैं।

9 comments:

sanjay patel said...

कितना सुन्दर
कितना अनुपम
कितना मोहक
कितना विरल

Shubhra Sharma said...

Amar Mudi says : Shubhra ji,

Chomotkar hoeche! I now recall the Tamal tree and I can visualise it. But, I could not get a picture. I can only say that Tamal tree has been pushed back behind Ashwath, Bat and even Palash, Kadamba. 'Kavye upekshita'.
Great piece of writing!

neeraj said...

Thanks for such a wonderful description...:-)

radiosakhi said...

हर बार आप मेरे मन की कोई नई बात कह देती हैं जो जानकारी से लबालब भरी होती है .....तमाम फूलों , पौधों और पक्षियों के नाम हमारे बीच से विलुप्त हो रहे हैं ....आपके इस ललित लेखनी के ज़रिये हम भी स्मृतियों के उपवन में पहुँच जाते हैं जहाँ तमाल जैसे तमाम पेड़ों की सघन छाँव होती है । आपके इस ललित लिखे को जादू तक भी पहुंचाती हूँ ....खुद पढ़ कर सुनाती हूँ और अर्थ भी बताती हूँ ताकि आने वाली पीढ़ी में कुदरत के प्रति आकर्षण और प्यार बना रहे ....। इस कड़ी में गीत गोविन्दम् का ज़िक्र ख़ास मन भाया ....। ....खूब भालो.....बधाई जिज्जी !!

radiosakhi said...

हर बार आप मेरे मन की कोई नई बात कह देती हैं जो जानकारी से लबालब भरी होती है .....तमाम फूलों , पौधों और पक्षियों के नाम हमारे बीच से विलुप्त हो रहे हैं ....आपके इस ललित लेखनी के ज़रिये हम भी स्मृतियों के उपवन में पहुँच जाते हैं जहाँ तमाल जैसे तमाम पेड़ों की सघन छाँव होती है । आपके इस ललित लिखे को जादू तक भी पहुंचाती हूँ ....खुद पढ़ कर सुनाती हूँ और अर्थ भी बताती हूँ ताकि आने वाली पीढ़ी में कुदरत के प्रति आकर्षण और प्यार बना रहे ....। इस कड़ी में गीत गोविन्दम् का ज़िक्र ख़ास मन भाया ....। ....खूब भालो.....बधाई जिज्जी !!

shalini said...

पंडित रघुनाथ जी का स्वर वाकई बेहद सुंदर है। कानो मे शहद सा। बहुत धन्यवाद।

shalini said...

पंडित रघुनाथ जी का स्वर वाकई बेहद सुंदर है। कानो मे शहद सा। बहुत धन्यवाद।

Aparna Mudi said...

Bohot maza aaya padhke

L.K Pande said...

अभी अभी अर्ची ने तुम्हारा आलेख पढ़ कर सुनाया तो रोम रोम आनंद और गर्व से खिल उठा .. इतना अद्भुत तो केवल हमारी मनुआ ही लिख सकती है !

स्मृतियों में धुंधला गया तमाल वृक्ष फिर से हहरा गया .. वृंदावनद के कृष्ण-बलराम मंदिर के प्रांगण का वो दुर्लभ चित्र देख कर लगा कि तुमने तो मुझे तीर्थ ही करा दिया !

माँ सरस्वती का वरद हस्त है तुम पर ... क्या लिखती हो ! ... अपने नाना जी, पापा (भिक्खू जी) और माँ (शकुन्तला जी) की ज्ञान संपदा तो तुम्हें विरसे में मिली ही है, पर स्वयं तुम्हारी अपनी मेघा, अपना अध्ययन भी कुछ कम नहीं ... ऐसा मथ-मथ के सोचती हो, लिखती हो - तभी तो ऐसा नवनीत उभर के आता है !

तुम्हारी शैली में ऐसा लालित्य, ऐसा प्रवाह है कि बरबस शिवानी याद आ गयीं ... लेकिन जहाँ उनमें लोक गीत सा रस है, वहीं तुममें विशुद्ध शास्त्रीय संगीत सी अनुभूति !

बस यूँ ही लिखती रहो .. अपने ज्ञान की वर्षा करती रहो ... बहुत बहुत स्नेहाशीष !
- लक्ष्मी कान्त पांडे

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