रेडियोनामा में आज से विविध भारती के मशहूर ब्रॉडकास्टर लोकेंद्र शर्मा अपनी एंट्री ले रहे हैं।
वैसे तो आप उन्हें जानते ही हैं। पर ये रहा उनका परिचय बक़ौल खुद।
1964 में विविध भारती दिल्ली में उद्घोषक बन कर माइक्रोफोन पर बोलने लगे, तो लेखन छपने की जगह प्रसारण की तरफ मुड़ गया और पाठकों की जगह श्रोताओं से दिल लगा बैठे. चालीस से कुछ ज्यादा बरसों तक प्रसारण के विभिन्न पापड़ बेलने के बाद, विविध भारती के कार्यक्रम अधिकारी पद से रिटायर हुए.
वैसे तो आप उन्हें जानते ही हैं। पर ये रहा उनका परिचय बक़ौल खुद।
लोकेन्द्र शर्मा : एक परिचय
1943. दुनिया का दूसरा विश्व युद्ध जवानी पर था. बंदूकें और तोपें गरज
रही थीं. चारों तरफ मार-काट मची थी.
लेकिन इसी बरस 25 अक्टूबर के दिन ख़ास कुछ नहीं
हुआ, सो मौका देख कर लोकेन्द्र शर्मा पैदा हो गए.
अवतरित होने के लिए राजधानी दिल्ली की धरती और एक ब्राह्मण वंश चुना. लेकिन
भाग्य नहीं चुन पाए, सो ज्यों ज्यों उम्र बढ़ी, परिवार की सम्पन्नता घटती गई. लड़ाई के दिनों में
पैदा हुए थे, शायद इसीलिए सारी ज़िन्दगी लड़ाई का मैदान बनी रही.
बचपन राजस्थान के एक कस्बे (आज एक शहर) भीलवाड़ा की गलियों और मुसीबतों
में गुज़रा. अभावों के कारण पढाई टुकड़ों-टुकड़ों में हुई. सोच की पूँजी केवल
संस्कारों से मिली.
स्कूल के दिनों में पहले तस्वीरें बनाने के लिए ब्रश पकड़ा, लेकिन रंग
महंगे थे, सो कलम उठाली. सोचा कवितायें लिखते हैं, लेकिन दस पांच तुकबंदियों के
बाद, काग़ज़ पर कहानियां उतरने लगीं.
1964 में विविध भारती दिल्ली में उद्घोषक बन कर माइक्रोफोन पर बोलने लगे, तो लेखन छपने की जगह प्रसारण की तरफ मुड़ गया और पाठकों की जगह श्रोताओं से दिल लगा बैठे. चालीस से कुछ ज्यादा बरसों तक प्रसारण के विभिन्न पापड़ बेलने के बाद, विविध भारती के कार्यक्रम अधिकारी पद से रिटायर हुए.
अमेरिका, इंग्लॅण्ड, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, फ़्रांस, बेल्जियम, नेपाल
और बैंकॉक आदि के दर्शन कर चुके लोकेन्द्र शर्मा आजकल मुंबई में डेरा जमाये हैं.
उन्हें जानने वाले दावा करते हैं कि वे, बोलने में मुंहफट, संस्कारों से दार्शनिक,
दिल से बेचारे, शरीर से आलसी और नसीब के मारे हैं. लोकेन्द्र शर्मा का अपना प्राईवेट
विचार है कि इस देश में अवतार लेकर वे ग़लती कर बैठे. सोचते हैं, यदि पुनर्जन्म की गारंटी मिल जाए, तो अगला प्रोग्राम तय कर
लें.
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बकलम खुद के बाद अब लोकेंद्र शर्मा की कहानी 'तमाम रात'।
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बकलम खुद के बाद अब लोकेंद्र शर्मा की कहानी 'तमाम रात'।
तमाम रात
किर्रर्रर्र....
टन्न न न न
सन्नाटे में छोटी आवाज़ें भी कितनी बड़ी-बड़ी लगती
हैं. कमरे की हर चीज को रात के कालेपन ने निगल रखा था, फिर भी अविनाश की गर्दन
दीवार-घड़ी की ओर उठ गई. एक बजा है.
घड़ी की टिक-टिक अविनाश को बहुत तीखी लगी. उसने खिड़की की ओर ताका, जिसका
एक पल्ला सींखचों से चिपका था और दूसरा हवा में झूल रहा था. बाहर घूमती हुई रात अविनाश को इतनी
काली लगी, मानो उसकी परतें चाकू से छीली जा सकती हैं. उसने चाहा कि उसकी आंखें खिड़की
से बाहर कूद जाएं और अंधेरे को टटोलें.
ज़रूर कलफ़ लगी साड़ी या चुन्नी की सरसराहट इस सामने के दरवाज़े से लगकर सो रही होगी. इतनी बड़ी बात कह कर कोई रह
जो नहीं सकता. अविनाश को दो
बड़ी-बड़ी पलकों में थिरकते आंसू नज़र आए. लगा, उसे सिसकी सुनाई दी है. कौन ? बेला
? हां,
और कौन होगा. लेकिन अविनाश को अब तक इस बात का ध्यान क्यों
नहीं आया कि बेला बाहर बर्फ़ीले अंधेरे
में दरवाज़े से लग
कर सो रही है और वह टेबल पर पांव पसारे बैठा है ?
अविनाश की पसलियों में दर्द का कड़वापन तैर गया. कुर्सी
के पायों ने फर्श पर रगड़ खा कर सन्नाटे को चीरा. अविनाश उठ खड़ा
हुआ था. तेज़ी से उसके डगों ने दरवाज़े तक की
दूरी तय की. चिटकनी खिसकी और दरवाज़ा खुलते ही बाहर खड़ी ढेर-सी सर्द हवा भीतर घुस आई.
अविनाश की नज़रों
ने बरामदे के हर कोने को छू-छू कर देख लिया. कहीं कोई नहीं. बरामदा सूना पड़ा था. उसकी
उड़ती हुई-सी नज़रें आसमान को छू कर लौट आईं. एक भी तारा नहीं. बादल छाए हैं. सांझ
के समय बूंदें भी गिरी थीं. तभी जाड़ा बढ़ गया है. अविनाश ने हाथ
पैंट की जेबों में सरका दिए. अंगुलियां माचिस से टकराईं. उसे लगा जैसे सिगरेट पिए काफी
देर हो गई है. होठों को सिगरेट का स्पर्श अच्छा लगा. खर्र... जलती तीली को हाथ की कुप्पी
में कैद कर उसने सिगरेट की तरफ बढ़ाया.
हाऊ हाऊ हाऊ ....
गली के नुक्कड़ पर कुत्ता भौंक उठा. अविनाश ने तीली
हवा में हिला कर बुझाई और नीचे फेंक दी. आज दोपहर के बाद से अब तक कितनी सिगरेट पी
गया वह. उसे कोई रोक ही नहीं रहा है. रोकने वालों से सब संबंध टूट गए आज.
अविनाश को लगा उसके भीतर कहीं भाप उठ रही है, जो अभी आंखों
के रास्ते पानी बन कर टपकेगी. उसने एक गहरा कश खींचा. सिगरेट का अग्र भाग तेजी से चमका
और उस पर राख की परत चढ़ गई. अंधेरे में धुएं का कालापन डूब गया है. पर फेफड़ा में
कुछ उतरता हुआ लगता जरूर है. अविनाश ने एक हाथ सीने पर बांध लिया और दूसरे में सिगरेट
घुमाता रहा.
बेला क्या कर रही होगी इस वक्त ? एक
ठंडी हवा का झोंका आकर अविनाश को सिहरा गया. सिगरेट की आंख फिर से जल कर बुझी.
नींद तो बेला को भी न आई होगी. पिछवाड़े की सड़क से एक ट्रक घड़घड़ाता हुआ गुज़र गया.
अविनाश ने सिगरेट
फेंक दी. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. आज नींद न आने से आंखें भी नहीं जल रहीं.
बेजान क़दमों से वह वापस कमरे में आ गया.
कमरे में उमस है या एकदम भीतर आने पर ऐसा लग रहा
है ?
हाथों ने दीवार को टटोल कर बत्ती जलाई. चौंधियाता
उजाला कमरे में भर गया. एकाएक अविनाश की आंखों में जैसे यह उजाला चुभने लगा. क्यों जला
दी उसने बत्ती ? हाथ फिर से बटन पर पहुंचा. न चाह कर भी नज़रें
टेबल की ओर बढ़ीं.
चिट्ठी उसी तरह पड़ी है—खुली हुई. कई दफ़ा पढ़ चुका
है वह. अब नहीं पढ़ेगा. ग़लती से नज़रें पत्र से न अटक जाएं – इसीलिए तो वह इतनी देर
से अंधेरे में बैठा था. पर अब उजाला क्यों कर लिया ? अविनाश को लगा,
वह चिट्ठी को फिर से पढ़ना चाहता है.
हारे हुए आदमी की तरह वह कुर्सी में धसक गया. उसने
पत्र उठा कर पढ़ना चाहा, पर एक पंक्ति के बाद सारा पत्र पानी में डूब गया सा लगा. बहुत
रोकते हुए भी अविनाश की पलकें
लरज गईं और उसने पत्र मेज़ पर छोड़
दिया. फिर उसने
अपना सिर टेबल पर टिका दिया. इतना कमजोर है वह ? सारा पत्र भीतर की भाप से गीला हो गया.
वह अब भी रो रहा था. उसे लगा, उसकी नसों में भी आंसू रेंग रहे हैं. और आज नसों की तमाम
धाराएं कट-कट कर आंखों में आ मिली हैं.
किर्रर्रर्रर्र.....
दीवार-घड़ी दो बजाने की तैयारी में लग गई. फिर---
टन्न न न न... टन्न न न न. दो बज गए.
तब भी दो ही बजे थे, जब बेला आई थी. वही हल्की आसमानी
साड़ी पहने—जिसे पहली दफ़ा उस के बदन से लिपटी देख अविनाश ने कहा
था—“तुम यही साड़ी पहना करो. अच्छी लगती हो.”
सामने आकर बैठ गई वह, जैसे खड़ी रहने की उसमें हिम्मत
ही न थी. अविनाश ने कुछ
लिखते-लिखते सिर उठाकर एक मुस्कराती ‘हैलो’ उसकी ओर उछाली थी, जिसके उत्तर में बेला ने भीगी
पलकें उसकी ओर उठा दी थीं.
अविनाश गंभीर
हो गया था—“क्या बात है ?”
और बेला ने जो बताया था, उसे सुनकर अविनाश को लगा था कि वह महल, जो उसने अपनी कल्पना में खड़ा
कर लिया था, अचानक ही हहरा कर गिर पड़ा है और वह स्वयं मलबे के नीचे दफ़न हो गया है.
बेला ने कहा था—“यह सब मुमकिन नहीं.” और
कह कर वह मेज पर सिर पटक-पटक रोने लगी थी. यह सब यानी वह सब, जिसकी वजह से अविनाश को अपने
जीने का अहसास हुआ है. और वह सब, अब नहीं चल सकता. क्योंकि बेला के माता-पिता को वह
मंजूर नहीं. और हिन्दुस्तान में चूंकि सांस लेने तक के लिए माता-पिता की आज्ञा जरूरी
है, इसलिए जो बात उन्हें मंजूर नहीं वह कभी नहीं हो सकती.
देर तक रो लेने के बाद जब बेला कुछ स्वस्थचित्त
हुई, तब एक गुड़ी-मुड़ी हुआ कागज़ अविनाश की ओर
सरका, वह उठ खड़ी हुई थी. फिर उसने मोटी पलकों को जल्दी-जल्दी झपका कर कुछ आंसू आंखों
ही आंखों में निगले और दरवाजे की ओर बढ़ गई. अविनाश ने चाहा था, एक बार उसे रोके. कुछ कहे. कह न पाए,
तो कम-से-कम जाने से पहले एक बार उसे जी भर कर देखे. लेकिन बेला चली गई थी. और मेज
पर ज़हरीले सांप की तरह एक कागज़, अविनाश को डसने
की इंतजार में बैठा रहा. अविनाश जानता था, इस चिट्ठी में विष के बड़े-बड़े दांत
हैं, फिर भी उसने इसे छुआ था. बेला ने लिखा था कि अविनाश उसे भूलने की कोशिश करे, क्योंकि उसके माता-पिता
यह सब बर्दाश्त न कर सकेंगे. पढ़ कर अविनाश को लगा
था जैसे कोई उससे चिता पर लेट जाने को कह रहा है. और तब ज़िंदगी में पहली बार अविनाश ने अपने हाथ आकाश की ओर उठा दिए. हे भगवान, इस देश
में प्यार करना इतना बड़ा गुनाह क्यों है ?
दूर कहीं पहरुए ने फिर लाठी ठकठकाई. घड़ी की टिक-टिक
उजाले में भी साफ़ सुनाई
देती है. अविनाश ने एक हाथ से अपनी आंखें पोंछते हुए दूसरे से बत्ती
की आंखें मूंद दी. कमरे को फिर से घुप्प अंधेरा लीलने लगा. लगा अंधेरे के सख्त पंजे
अविनाश को जकड़ रहे हैं. जैसे वहां उसका दम घुटने लगा.
इस कमरे में उसकी सिसकियां डोल रही है. बेला की याद बैठी है. मेज पर कुंडली मारे सांप-जैसा
पत्र पड़ा है. भड़ाक से दरवाजा उघाड़ अविनाश बाहर
निकल आया.
बरामदा अब भी सूना था. कौन कह रहा था अभी अविनाश से कि भीतर बेला आएगी ? अविनाश के दिमाग़ में एक ख्याल चील की तरफ झपट्टा मार कर
उड़ गया कि बेला आराम से सो रही है. तभी एक दूसरा ख्याल ऊंचे से मंडराता हुआ आकर दिमाग़
पर बैठ गया कि उसे नींद आ ही नहीं सकती.
एक और सिगरेट सुलगा कर अविनाश तेजी से गली पार करने लगा. मोड़ पर बैठा कुत्ता
भौंक उठा. इसके साथ ही पहरुए की पुकार सुनाई दी. दूर कहीं ढेर से कुत्ते एक साथ भौंकने लगे. अविनाश के क़दम अंधेरे को काटते हुए जाने-पहचाने रास्ते
पर बढ़ते रहे. गली पार करते ही चौड़ी सड़क आ गई. सड़क अपने दोनों ओर ऊंची इमारतों की
बांहें फैलाए पड़ी थी. इक्के-दुक्के पेड़ भी अंधेरे में सहमे खड़े थे. हवा का एक झोंका
सड़क पर पत्तों को बुहारता हुआ-सा गुज़र गया. स्टेशन पर खड़ी रेल का इंजन भोथरी
आवाज़ में घोंय-घोंय कर उठा. कोतवाली में तीन का घंटा बजा.
आज अविनाश को तनिक
भी नींद नहीं आ रही. आ रही है केवल बेला की याद. जिसे याद करने का अब उसे कोई हक़ नहीं.
वह भी क्या अविनाश को याद कर रही होगी ? कौन
जाने. क्यों न करेगी ? कौन जाने. अविनाश के दिमाग़ में चीलों का युद्ध छिड़ गया. बेला सो
रही होगी—नहीं-नहीं, जाग रही होगी. चिल्ल ल्ल ल्ल ल्ल.... चील चील. चीलों की चोंचें
जैसे एकाएक ही उसके दिमाग में
धंस गेन और मांस के लोथड़े खींच-खींच
कर फेंकने लगीं.
अविनाश चलते-चलते हांफ गया. वह चीलों को अपना दिमाग़ नहीं
नोचने देगा. वह पता लगा कर छोड़ेगा कि बेला जाग रही है या सो रही है. पर कैसे ?
चौराहा आ गया. सामने बैंक की ऊंची इमारत. बगल में
डाकखाना.
लाल लैटर-बॉक्स अंधेरे में एकदम काला दीखा. बजरी
की एक चौड़ी पगडंडी करवट लेकर डाकखाने की तरफ़ मुड़ गई थी. किचर-किचर--- अविनाश बजरी पर होता हुआ डाकखाने की तरफ़ बढ़ा. डाकखाने
के बरामदे में पब्लिक बूथ है. वहां से अविनाश उसके
घर फोन करेगा. बेला जाग रही होगी, तो फोन वही उठाएगी.
उसने लकड़ी के केबिन का दरवाजा खींचा. भड़भड़ा कर
वह खुल गया, जैसे किसी ने गहरी नींद से उठा दिया हो. भीतर घुस कर अविनाश ने अपने को बंद कर लिया. भीतर घुप्प अंधेरा था.
इतनी चुप्पी थी कि अविनाश को अपनी सांसों तक की आवाज़ साफ़ सुनाई
दी. भीतर गर्माहट भी थी. पल भर को उसे यह तपिश अच्छी लगी. पर अंधेरे में नंबर कैये
डायल करे ? अंदाज़ से हाथ बढ़ा कर उसने रिसीवर क्रेडिल से उठा,
कान पर चिपकाया. किट्रट्रट्रट्र. एक अजीब-सी आवाज़ बूथ में हौले-हौले घूमने लगी. एकबार अविनाश ने मन-ही-मन बेला का फोन नंबर याद किया. फिर अंदाज़
से डायल घुमाया. क्या कर रही होगी बेला ? क्रिंग....क्रिंग... नंबर मिल गया था. दूसरे सिरे
पर घंटी बज रही थी. अविनाश ने रिसीवर कान से हटा कर नीचे लटका दिया.
अगर बेला ने फोन नहीं उठाया
तो ? अविनाश के मन
में एक अजीब-सा डर समा गया. दूसरे सिरे पर किसी ने फ़ोन उठा लिया था. एक घुटा-सा ‘हैलो-हैलो’ का
स्वर बूथ में दौड़ रहा था. अविनाश ने फ़ोन को कान पर लगाए बिना ही क्रेडिल पर पटक दिया.
फिर ज़ोर से धक्का मारकर उसने किवाड़ खोला और बाहर आ गया. हवा तीर की तरह उसके कपड़ों
को चीरती हुई सीने पर उग आए पसीने के कतरों से टकराई. कौन था फ़ोन के दूसरी ओर ?
शायद बेला ही थी. शायद कोई और था !
हवा तेज हो गई. अविनाश के बाल चेहरे पर बिखर आए. सर्दी की वजह से बदन थोड़ा
झुर-झुराया. उसने क़दम तेज कर लिए. आधा फर्लांग ही तो चलना है, फिर बेला का घर आ जाएगा.
मेन रोड पर ही है. बेला जगी हुई होगी, तो मकान के किसी-न-किसी हिस्से से रोशनी जरूर
फूट रही होगी. वह देखते ही पहचान लेगा.
लेकिन मकान अपनी सब आंखें बंद किए अंधेरे में डूबा
खड़ा था. अविनाश ने बेचैनी से मकान के कई चक्कर लगाए. कहीं भी रोशनी
नहीं. बुझा हुआ-सा वह सड़क के उस पार चला गया. आकाश बूंद-बूंद टपकने लगा. पर अविनाश की इच्छा लौटने की न हुई. देर तक वह मकान को देखता
रहा. यहीं कहीं है बेला. इसी मकान के किसी कमरे में. बूंदें तेज हो गईं. अविनाश एक पेड़ के नीचे सरक गया. हवा और तीखी हो गई. पर
अविनाश को लौट जाना न सूझा. वह एक पत्थर पर बैठ गया. सिर
को उसने पेड़ के तने से टिका लिया.
अंधेरा.... अंधेरा. बाहर-भीतर सब ओर अंधेरा. यह
रात जैसे अपने हर कालेपन के साथ अविनाश की ज़िंदगी
पर छाने लगी. वह अब जी नहीं सकता. कम-से-कम होशोहवास संभाल कर तो कभी भी नहीं. बेला
बड़े घराने की लड़की है. उसने पीछा छुड़ाना चाहा होगा. सो यह नाटक खेला. वरना क्या
इस वक़्त वो आराम
से बिस्तर में सोई होती ? अविनाश को लगा,
आज तक उसने ज़िंदगी नहीं, एक अभिशाप जिया है. कितना अभागा है वह ! किसी
ने भी उसे प्यार नहीं किया. पलकें चीर कर ढेर से आंसू उसकी आंखों के बाहर से ढलकने
लगे.
रात मरने लगी. पूरब से पश्चिम तक का आकाश उजल रहा
था. एक घड़घड़ाता हुआ ट्रक सामने से दौड़ कर गुज़र गया. सड़क पर फैले पत्तों ने भी उछलकर कुछ दूर उसके पीछे दौड़ाने का प्रयास
किया मगर कुछ क़दम बाद धीरे-धीरे नीचे बैठ गए. बैल-गाड़ियों
की चरमराहट सड़क के एक छोर से उगी और दूसरे पर डूब गई. अविनाश उसी तरह पलकें मूंदे, पेड़ के तने पर सिर टिकाए
बैठा था. अब उसे किसी से मोह नहीं, कोई प्रेम नहीं. सब फरेब है.
टन्न......टन्न. दूर कहीं मंदिर में घंटे गूंजे.
धीरे-धीरे ये घंटे समीप आते गए. फिर एकाएक ही तेज होकर धीमे हो गए. झांय से फायर ब्रिगेड
की गाड़ी गुज़र गई थी. ओह, तो कहीं
आग लग गई है. आग ? लगा, अविनाश को भीतर
से कोई घोट रहा है. किसी ने उसके दिल का गला पकड़ लिया है. ओह ... घुटन..... नहीं....
नहीं......
हांफते हुए उसने पलकें और भी ज़ोर से मींच लीं.
इतना कमजोर क्यों है वह ? बेला के प्रति उसमें तीखी घृणा क्यों नहीं उपज
रही ? उस पर जमा विश्वास दम क्यों नहीं तोड़ रहा ? बेला
झूठी है. बेला बेवफ़ा है. बेला लडकी है. लड़की ? लड़की यानी अबला, मज़बूर. जरूर कोई बात
होगी, वरना बेला बेवफ़ा नही. वह लड़की है. लड़की मज़बूर होती है. अविनाश को उस पर विश्वास करना चाहिए. लेकिन नहीं. क्यों
नहीं ? नहीं. क्यों नहीं ? चिल्ल्ल्ल्ल.....
चील चील. फिर से चील का युद्ध--- घबरा कर अविनाश ने पलकें
उघाड़ दी.
सामने बेला का मकान. मकान दूधिया धुंध में डूबा खड़ा था. सफेद दीवारों पर धीरे-धीरे
उजाला चढ़ रहा था. बरामदे की मुंडेर पर आसमानी साड़ी फहरा रही थी. अविनाश चौंका. उठा. थोड़ा आगे जाकर देखा. तो क्या बेला
मुंडेर पर सिर रखे सोई थी ? बेशक़ तमाम रात वह बरामदे में बैठी थी. यह आसमानी पल्लू
उस का नहीं तो और
किसका है.
अविनाश ने अधिक नहीं देखा.
वह तुरंत लौट पड़ा. शक का ज़हर उतारने के लिए इतना काफ़ी था. अधिक छानबीन कर के अब वह भीतर उग आए विश्वास के
पौधे को कुचलना नहीं चाहता था.
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लोकेन्द्र शर्मा,
44 – सारंगा टावर, तीसरी गली, लोखंडवाला, अँधेरी
(पश्चिम) मुंबई – 400053
फ़ोन : 9930305055. 022 26331122.