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Friday, June 22, 2012

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन- 10 : महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला

मशहूर रेडियो शख्सियत महेंद्र मोदी के संस्‍मरणों की श्रृंखला की दसवीं कड़ी।



संगीत की दुनिया से बेइज्ज़त होकर निकल पड़ा था अपने जीवन का कोई और मकसद ढूँढने के लिए मैं. सिविल इंजीनियरिंग करके ईंट पत्थरों में अपने कलाकार को मैं कतई दफ़न नहीं करना चाहता था. अब सवाल ये था कि मैं आखिर करूँ क्या? सबने सलाह दी कि मैं कॉलेज में जीव विज्ञान लेकर डॉक्टर बनने की कोशिश करूँ. भाई साहब डॉक्टर बन ही रहे थे, उनकी सारी किताबें कॉपियां काम आ जायेंगी तो खर्च भी कम लगेगा. इधर पिताजी रिटायर होने वाले थे इसलिए ये भी एक बहुत ही अहम प्रश्न था. मैंने जीव विज्ञान की पढाई शुरू कर दी और साथ ही ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू कर दिया. हालांकि मित्तल साहब की भाषा में कोतल घोड़ा रहा मगर फिर भी हकीकत ये थी कि गणित या किसी और विषय में मैं बहुत बुरा नहीं था. मैंने १०वीं क्लास के कुछ छात्रों को गणित, अंग्रेज़ी और साइंस पढ़ाना शुरू कर दिया.

मेरे तीन छात्र ऐसे थे जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता और खास तौर पर एक छात्र सत्य प्रकाश तो ऐसा था कि मैंने उसपर कई झलकियां भी लिखीं जो आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित हुईं. एक शाम ताऊ जी ने मुझे बुलाया. मैं उनके पास पहुंचा तो देखा एक बुज़ुर्ग वहाँ बैठे हुए थे. मैंने उनपर नज़र दौड़ाई तो देखा,बिना ब्लीच किये लट्ठे का कुर्ता, धोती, बंद गले का कोट और सर पर थोड़ी मैली सी टोपी. पहली ही नज़र में लगा वो किसी प्राइमरी स्कूल के अध्यापक होंगे. मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया. उन्होंने खड़े होकर मेरे नमस्कार का जवाब दिया. ताऊ जी ने परिचय करवाया “महेन्द्र, ये पारीक जी हैं, पाबू पाठशाला के हैडमास्टर. इनका बेटा १०वीं में है. ये चाहते हैं कि तुम इनके बेटे को पढ़ा दो.” मैंने पूछा “किस किस विषय में उसे मेरी मदद की ज़रूरत है?” इस बार पारीक जी ने मुंह खोला “दरअसल वो एक बार दसवीं में फ़ेल हो चुका है, ये उसका दसवीं में दूसरा साल है.” मैंने कहा “ओह, किस किस विषय में फ़ेल हुआ है?” वो थोड़े संकोच के साथ बोले... “जी ....सारे विषयों में.” मैं उम्मीद कर रहा था कि वो साइंस, अंग्रेज़ी या गणित या इन तीनों विषयों का नाम लेंगे मगर वो तो कह रहे थे कि वो सभी विषयों में फ़ेल हुआ है. मैं लगभग चिल्ला पड़ा. “क्या? सारे विषयों में फ़ेल हुआ है और आप चाहते हैं कि मैं उसे पढाऊँ? क्या क्या पढाऊंगा मैं उसे? आप तो स्वयं अध्यापक हैं, आप ही क्यों नहीं पढ़ाते उसे?” वो रुआंसे से होकर बोले “हम मास्टरों की यही प्रॉब्लम है, हम दुनिया भर के बच्चों को पढ़ाते हैं मगर खुद अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते. सुना है आप बहुत अच्छा पढ़ाते हैं अगर मेरा बेटा दसवीं पास कर ले तो एस टी सी करवाकर कहीं मास्टर लगवा दूंगा.” पारीक जी अपनी कल्पना की आँखों से अपने बेटे को अध्यापक बना हुआ देख रहे थे....... उन्हें क्या पता था कि उनके सुपुत्र सत्य प्रकाश के ललाट पर विधाता ने क्या लिखा है? और सच पूछिए तो मुझे ही कहाँ पता था कि जिस सत्य प्रकाश को पढ़ाने में मैं इतना हिचकिचा रहा हूँ वो आगे जाकर किस रूप में मेरे सामने आकर खड़ा होने वाला है? खैर , मैंने पारीक जी से कहा “आप कल सुबह सत्य प्रकाश को मेरे पास लेकर आइये और साथ में उसकी दसवीं की मार्कशीट भी.” पारीक जी गदगद होकर बोले “मेरा लड़का पढ़ने में कमज़ोर ज़रूर है मगर शरारती नहीं है, बहुत सीधा है. आपसे निवेदन है..... आप उसे पढ़ाने से इनकार मत करना, आपने पढ़ा दिया तो मुझे पता है, उसकी ज़िंदगी बन जायेगी और ये बाप आपको जीवन भर दुआएं देगा.”

दूसरे दिन सुबह पारीक जी अपने बेटे को लेकर मेरे घर आये. सत्य प्रकाश ने आज्ञाकारी शिष्य की तरह मेरे पाँव छुए. मैंने उससे कहा “अपनी मार्कशीट दिखाओ”. उसने शरमाते शरमाते मार्कशीट मेरे सामने रख दी. मार्कशीट देखकर मेरा सर चकरा गया. किसी भी विषय में पास होने के आसपास मार्क्स होना तो बहुत दूर की बात थी, किसी भी विषय में दो अंको में भी मार्क्स नहीं थी. किसी विषय में दो किसी में चार किसी में पांच, बस इसी तरह के मार्क्स थे सत्य प्रकाश जी के. मैंने पारीक जी को कमरे से बाहर लाकर फिर से एक बार उनके सामने अपनी प्रार्थना रखी “मास्टर जी... प्लीज़ मुझे माफ कर दीजिए, मैं आपके बेटे को नहीं पढ़ा पाऊंगा.” मगर पारीक जी तय ही करके आये थे कि उस बालक को मेरे गले डाल कर ही जायेंगे और मैं मना करता रह गया और वो सत्य प्रकाश को वहीं छोड़कर चले गए.

और दूसरे दिन से सत्य प्रकाश मुझसे पढ़ने आने लगा. कहने को मैं सत्य प्रकाश को पढाता था मगर हकीकत ये है कि मुझे ही उस से हर रोज नई नई ज्ञान की बातें सीखने को मिलती थी जैसे दुनिया गोल है ये एक अंधविश्वास है. एक दिन मैं उन्हें हिन्दी पढ़ा रहा था. अंधविश्वास की बात चल रही थी , उसने अंधविश्वास की परिभाषा बताई कि जिसपर अंधा भी विश्वास कर सके, उसे अंधविश्वास कहते हैं. मैंने कहा शाबाश, ज़रा उदाहरण दो, तो वो बोला... ये एक अंधविश्वास है कि दुनिया गोल है.......२० वीं सदी  में एक छात्र कह रहा था कि दुनिया का गोल होना एक अंधविश्वास है.

मैं रोज ही सत्य प्रकाश से कुछ न कुछ नया सीखता था.इसीलिये मैंने उसे शिष्य की बजाय अपना गुरु मान लिया था..... मैं सत्य प्रकाश को मास्टर जी पुकारने लगा था.

सत्य प्रकाश की एक बहुत बड़ी खासियत थी. उसे जब भी कुछ समझाया जाता, वो अपनी गर्दन हाँ में हिला देता था और उस से अगर पूछा जाता कि समझ में आया? तो उसका जवाब हमेशा हाँ में ही हुआ करता था, चाहे वो गणित का मुश्किल से मुश्किल सवाल हो, अंग्रेज़ी का जटिल से जटिल वाक्य हो या फिर साइंस का कोई लंबा चौड़ा फार्मूला. शुरू शुरू में जब वो हर बार मेरे ये पूछने पर कि क्या समझ में आ गया, वो जवाब देता था “हाँ”, तो मुझे लगता था दिमाग़ तो ठीक ही लगता है लड़के का, फिर इतने खराब नम्बर क्यों आये इसके? मगर एक दो दिन बाद मैंने जो कुछ पढ़ाया था उसमें से कुछ पूछा तो चुप. मैंने कहा सत्य प्रकाश ये कल ही तो तुम्हें पढ़ाया है और तुमने कहा था तुम्हें समझ में आ गया. चुपचाप उसने गर्दन नीची कर ली. मैंने धीरज का दामन नहीं छोड़ा और प्यार से कहा “देखो सत्य प्रकाश, अगर तुम्हें कुछ समझ न आये तो उसी वक्त पूछ लो, मैं तुम्हें दो बार, तीन बार, चार बार जितनी बार कहोगे समझाऊँगा. इसमें मुझे कोई दिक्क़त नहीं है, लेकिन जब मैं तुमसे वापस कुछ पूछूं तो तुम्हें चुप नहीं रहना है. तुम्हें जो कुछ पूछा जाए, उसका जवाब तो तुम्हें देना ही पड़ेगा......चाहे सही दो चाहे गलत. गलत होगा तो मैं ठीक करवा दूंगा लेकिन अगर इस तरह तुम चुप रहोगे तो मुझे गुस्सा आ जाएगा.....और मेरा हाथ उठ जाएगा.” सत्य प्रकाश ने शर्माते हुए हाँ में गर्दन हिलाई तो मुझे लगा, ये समस्या हल हो गयी. मैं नहीं जानता था कि ऐसा कहकर मैंने अपने लिए ज्ञान के नए द्वार खोल लिए हैं. इसके बाद जो जो नया ज्ञान मुझे मिलेगा वो अद्भुत होगा. १९९३-९४ में जब मैं उदयपुर में था तो हमारे केंद्र निदेशक थे स्वर्गीय श्री रतन सिंह हरयानवी. बहुत मिलनसार, सज्जन और बुद्धिमान अफसर थे वो. उन दिनों मेरे साथ मेरा पुराना मित्र कुलविंदर सिंह कंग भी मेरे कहने पर उदयपुर ट्रांसफर करवाकर आ गया था, हालांकि उदयपुर में उसका और उसके परिवार का मन नहीं लगा और थोड़े ही दिनों बाद वो वहाँ से ट्रांसफर करवा कर दिल्ली चला गया.

हरयाणवी साहब मेरे रेडियो नाटक के प्रति लगाव से तो वाकिफ थे ही, मैंने उन्हें बताया कि कुलविंदर की हास्य लेखन पर बहुत अच्छी पकड़ है. इस पर वो बोले एक हास्य व्यंग्य का कार्यक्रम शुरू करते हैं जिसे आप दोनों मिलकर लिखो और प्रोड्यूस करो. हमने कहा “जी”. नाम तय किया गया “डंके की चोट पर”. आलेख तैयार करने की जिम्मेदारी कुलविंदर निभाता था और मैं श्रीमती इंदु सोमानी के साथ मुख्य पात्र के रूप में अभिनय भी करता था और इसे प्रोड्यूस भी करता था. इसके अलावा कभी कभी स्टाफ से इतर कलाकारों को भी कुछ विशेष रोल्स के लिए अनुबंधित किया जता था. कभी कभी जब कुलविंदर छुट्टी पर होता तो पर “डंके की चोट पर” लिखने की जिम्मेदारी भी मेरे ही सर आ जाती थी. ऐसे में मेरे काम आता था मेरे छात्र उर्फ मास्टर जी श्री सत्य प्रकाश जी द्वारा दिया गया अमूल्य ज्ञान और मैं उनका पुण्य स्मरण कर डंके की चोट के एकाध एपिसोड लिख डालता था. मैंने इसके लिए एक स्टॉक कैरेक्टर गढ़ा “मेनका”. मेनका का चरित्र बड़ी खूबसूरती से निभाती थीं, दीपशिखा दुर्गापाल, जो इस समय आकाशवाणी, अहमदाबाद में पोस्टेड हैं. हालांकि दीपशिखा अच्छी भली बुद्धिमान लड़की हैं मगर डंके की चोट रिकॉर्ड करते वक्त सत्य प्रकाश की आत्मा उनमें कुछ इस तरह उतर आती थी कि वो साक्षात सत्य प्रकाश का स्त्री संस्करण नज़र आने लगती थीं.जैसा कि मैंने पहले एक एपिसोड में लिखा कि इस मेनका में मैंने दो चरित्रों को मिलाया था. सत्य प्रकाश के अलावा जो एक और महान आत्मा थी वो थी मेरे सोहन बाबो जी के सुपुत्र पूनम भाई जी की. बहुत ही सीधे सादे इंसान थे पूनम भाई जी. दुबले पतले छरहरे बदन के पूनम भाई जी खाने के बड़े शौकीन थे. खाने बैठते थे तो उन्हें खाते देखकर अच्छे अच्छों को पसीना आ जाता था. उनके दुबले पतले शरीर को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वो इतना खा सकते होंगे. माँ बाप की इकलौती लाडली संतान थे वो. सोहन बाबो जी पुलिस में हैड कॉन्स्टेबल थे.....पढाई लिखाई में पूनम भाई जी एकदम ज़ीरो थे मगर उनपर पढाई लिखाई का कोई दबाव नहीं था.....सोहन बाबो जी कहते थे, एक ही तो औलाद है मेरी. पढ़ेगा तो ठीक है नहीं पढ़ेगा तो भी कोई बात नहीं. सब पढ़े लिखे होंगे तो अनपढों की अलग दुनिया बसेगी क्या? बस पूनम भाई साहब मस्त..... दिन भर गली में बच्चों के साथ खेलना और जो खाने का मन हो, फरमाइश कर देना. सोहन बाबो जी जब भी रात को घर लौटते थे तो रोज अपने सपूत के लिए कुछ न कुछ मिठाई ज़रूर लेकर आते थे. कई बार पूनम भाई जी को इंतज़ार करते करते नींद आ जाती थी.


पूनम भाई जी को नींद से जगाया जाता.बाबो जी उन्हें प्यार से आवाज़ देते “पूनमिया उठ, रसमलाई खा ले या चमचम खा ले या फिर दाल का सीरा खा ले” और उसी वक्त उन्हें मिठाई खिलाई जाती. कभी कभार अगर उनका पेट खूब भरा हुआ होता या फिर बहुत ज़ोर से नींद लग रही होती तो वो कह देते “ऊं ऊं ऊं....कुल्हड़ में डाल कर रख दो कल सुबह खा लूंगा.” जब पूनम भाई जी ९-१० बरस के हुए तो सोहन बाबो जी का मन हुआ बेटे की शादी करने का. एक ६-७ बरस की लड़की उनके लिए तलाश की गयी और शादी का मुहूर्त निकाला गया. शादी का मुहूर्त देर रात का निकला. ९-१० बरस के पूनम भाई जी सजधज कर घोड़ी पर सवार हुए और खुश खुश लड़की वालों के घर बारात लेकर पहुँच गए. खुश क्यों न होते..... शादी जो हो रही थी. सबने बताया कि तुम्हारी एक सुन्दर सी दुल्हन आयेगी और सबसे बड़ी बात ये कि इन दिनों उन्हें खाने को जी भर मिठाइयां मिल रही थीं. बारात तो समय से पहुँच गयी मगर फेरे तो देर रात होने वाले थे. तब तक पूनम भाई जी को नींद आ गयी. सारी बाकी की रस्में चलती रहीं और पूनम भाई जी सो गए. जब फेरों का वक्त हुआ तो सोहन बाबो जी ने आवाज़ लगाई “पूनमिया, उठ..... फेरा खा ले (शादी के फेरे ले ले)” हमारे पूनम भाई जी की तो रोज की आदत थी देर रात अपने पिताजी की ऐसी आवाज़ सुनने की, कभी ये खा ले, कभी वो खा ले, उन्होंने समझा फेरा भी कोई मिठाई ही होगी, तो आँखें बंद किये किये बोले “कुल्हड़ में डाल कर रख दो, कल सुबह खा लूँगा.” पूरी बारात ठठा कर हंस पड़ी और गाहे बा गाहे ये वाकया लतीफे की तरह बरसों सुना और सुनाया जाता रहा.

तो साहब मैंने सत्य प्रकाश को पढ़ाना शुरू कर दिया था. टाइम का बहुत पक्का था वो, हमेशा बिल्कुल सही टाइम पर आता था. मेरा पढ़ना लिखना माळिए(छत पर बने कमरे) में होता था.... ठीक टाइम पर मेरी माँ की आवाज़ आती... “महेंदर.... सत्य प्रकाश” मैं कहता “ऊपर भेज दीजिए” और बालों में पाव भर तेल डालकर सँवारे गए पट्टे(राजस्थानी में एक खास तरह से बनाए गए बाल को पट्टे कहा जाता है), झकाझक सफ़ेद पतलून और इन किया हुआ वैसा ही झकाझक क़मीज़......और पांवों में साफ़ सुथरे जुराब. मैंने सत्य प्रकाश के पिताजी का जो रूप देखा था, उस से बहुत अलग..... मुझे लगा, ज़रूर सत्य प्रकाश की माता जी शऊर वाली महिला होंगी. आते ही नियम से अपना बस्ता टेबल पर रखकर नीचे झुककर दोनों हाथों से पैर छूता था, हाथों को माथे पर लगाता था और खड़ा हो जाता था, मैं उसे बैठने को कहता तो मेरे बैठने का इंतज़ार करता और जब मैं बैठ जाता तब कुर्सी पर बड़ी ही तमीज़ से बैठ जाता था.

यहाँ तक के सारे काम बहुत नियमित रूप से होते थे....... बस उसके बाद जो कुछ होता था, वो मुझे हर रोज ये सोचने पर मजबूर करता कि मैं आखिर इस भले मानुष को क्यों परेशान कर रहा हूँ? एक रोज अंग्रेज़ी पढ़ा रहा था. मैंने पूरा पाठ पढ़ा दिया और सत्य प्रकाश से पूछा “समझ में आया, जो मैंने पढ़ाया?” उसने अपनी स्टाइल में हाँ में गर्दन हिला दी. मैंने कहा “सत्य प्रकाश, सही बताओ, समझ आया?” उसने फिर अपनी गर्दन हाँ में हिला दी. मैंने कहा “अच्छा पहला वाक्य क्या है ,पढ़ो ज़रा.”  उसने पढ़ा “एयरोप्लेन इज़ फ़्लाइंग ओवर द हिल”. मैंने कहा “शाबाश”, अब ज़रा इसका हिन्दी में अनुवाद करो. उसने गौर से उस वाक्य को दो तीन बार पढ़ा. मैं उसकी फुसफुसाहट सुन रहा था. मैंने कहा “हाँ हाँ शाबाश .....कोशिश करो”. अब सत्य प्रकाश जी के श्रीमुख से जो कुछ निकला उसे सुनकर कम से कम मेरे दो – तीन जन्म तो अवश्य ही धन्य हो गए होंगे. सत्य प्रकाश ने इस अंग्रेज़ी वाक्य का अनुवाद किया था “हवाई जहाज़ हिल रहा है”. मैंने उसे अभयदान दे रखा था इसलिए कुछ भी नहीं कह सकता था....मैंने लंबी सांस ली और कहा “शाबाश बेटा”.

ये तो थी अंग्रेज़ी की कहानी. अब सुनिए गणित की दास्ताँ, मैंने सत्य प्रकाश को सारे पहाड़े रटवाये, जोड़, बाकी, गुणा, भाग, वो सारी चीज़ें सिखाईं जोकि तीसरी चौथी क्लास में सिखाई जाती हैं मगर एक बात मैं उसे बिल्कुल नहीं समझा पाया कि हज़ार से बड़ी भी कोई संख्या होती है. उसके सामने आप चाहे कोई भी संख्या रख दीजिए वो हज़ार से आगे जाता ही नहीं था. जैसे २३५६८० को सत्य प्रकाश पढ़ेगा तेईस हज़ार पांच हज़ार छः सौ अस्सी या फिर दो हज़ार पैंतीस हज़ार छः सौ अस्सी. मैं उसे समझा समझाकर हार गया मगर लाख और करोड़ का अस्तित्व सत्य प्रकाश ने कभी स्वीकार नहीं किया.

यही हाल उसका साइंस में था. वैसे तो वो कभी भी अपनी ओर से कुछ भी पूछता नहीं था मगर एक दिन वो बहुत अच्छे मूड में था.... बोला “सर एक बात पूछूं?” मैंने कहा “हाँ हाँ ज़रूर.” तो वो बोला “पानी को पानी कहने से काम चल सकता है तो उसे साइंस में H2Oकहने की क्या ज़रूरत है?” मैंने कहा “हाँ बेटा बड़ी ही बेवकूफियां होती हैं साइंस में.”

सत्य प्रकाश के पिताजी बीच बीच में अपने बेटे की पढ़ाई का हाल चाल लेने आते रहते थे. मैं उनसे कहता, ज़रूरी नहीं है कि हर बच्चा पढ़ लिख कर बड़ा आदमी ही बने, सीधा सच्चा बच्चा है आपका, आप कोशिश कीजिये कि अच्छा इंसान बन जाए ये. रही रोजी रोटी की बात, तो हाथ का कोई हुनर इसे सिखा दीजिए, अपना और अपने परिवार का पेट भर लेगा. मास्टर जी हर बार बड़ी ही दयनीय मुद्रा में हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगते “नहीं सर आपके सर कोई इलज़ाम नहीं दूंगा अगर ये फिर फ़ेल हो जाता है तो, मगर आप इसे पढ़ाते रहिये, मुझे पूरा भरोसा है, ये पास हो जाएगा. बस ये दसवीं पास हो जाए किसी तरह तो एस टी सी करवा दूंगा, मेरा बुढ़ापा सुधर जाएगा.” मैं फिर निरुत्तर हो जाता.

मैं वैसे मूल रूप से बच्चों को अंग्रेज़ी, साइंस और गणित ही पढ़ाया करता था मगर, सत्य प्रकाश के पिताजी ने मुझसे वादा ले लिया कि मैं उसे हिन्दी और सामाजिक ज्ञान भी पढ़ा दूंगा. एक दिन मैंने उसे मीरा बाई के बारे में बताया और सामाजिक ज्ञान में इतिहास का एक पाठ पढ़ाया जिसमें मुग़लों के बारे में संक्षेप में बताया गया था. मैंने  सब कुछ पढ़ाकर पूछा “समझ में आ गया?” उसने बड़ी सी हाँ में सर हिला दिया. मैंने कुछ होमवर्क दिया और वो पैर छूकर घर चला गया. अगले दिन जब वो फिर मेरे पास आया, मैंने होमवर्क की कॉपी देखी तो मैं हैरान रह गया. उसमें एक सवाल था, अकबर का पूरा नाम क्या था?” उसने इसका जवाब लिखा था “जलालुद्दीन गिरधर अकबर”. मैंने पूछा “ये क्या लिखा है? अकबर का पूरा नाम जलालुद्दीन गिरधर अकबर था? वो बोला “जी हाँ और मीराबाई उनकी पत्नी थीं, तभी तो मीरा बाई ने भजन लिखा –मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई.” मुझे लगा... कितना कष्ट पा रही होगी मीराबाई की आत्मा?

खैर साहब.... इसी तरह पढ़ाते पढ़ाते और उसके ज्ञान से अपने आपको कृतार्थ करते करते साल गुज़र गया..... इम्तेहान आ गए. जब इम्तेहान शुरू होने में बस दो दिन बचे थे कि नीचे से मेरी माँ की आवाज़ आई “महेंदर....सत्य प्रकाश......” मैंने कहा “ऊपर भेज दीजिए”. थोड़ी देर में सत्य प्रकाश ऊपर आया, आकर बाकायदा पाँव छुए और खड़ा हो गया, मैंने कहा “हाँ बोलो सत्य प्रकाश.... क्या कुछ पूछना चाहते हो?” उसने हाँ में गर्दन हिलाई.हैं मैं बहुत खुश हुआ कि चलो आज तो कुछ पूछने आया है क्योंकि वरना वो ज्ञान देता ही था, पूछता कुछ भी नहीं था.  मैंने कहा “बैठो”. वो बैठ गया. एक कॉपी और पैन निकालकर मेरे हाथ में पकड़ा दिए. मैंने कहा “हाँ बोलो क्या पूछना है?” वो बोला “परसों से इम्तेहान चालू होने वाले है, मुझे अंग्रेज़ी में अपना रोल नंबर लिखना सिखा दीजिए” मैंने अपना सर पीट लिया मगर क्या करता... बैठकर उसे अंग्रेज़ी में उसका रोल नंबर लिखना ही नहीं सिखाया उसका अभ्यास भी करवाया.

मुझे पूरा विश्वास था कि सत्य प्रकाश दसवीं में फिर फ़ेल होगा.... वो किसी हालत में पास नहीं हो सकता. समय गुज़रा. एक दिन पता लगा कि दसवीं का रिज़ल्ट आ गया है. मुझे कोई उत्सुकता नहीं थी क्योंकि मुझे पता था वो पास नहीं होगा....इसलिए मैंने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. तीन चार दिन बाद ही सत्य प्रकाश के पिताजी बड़े खुश खुश उछलते हुए मेरे घर आये और उस बुज़ुर्ग आदमी ने झुक कर मेरे पाँव छू लिए... मैं कहता रह गया “अरे अरे ... क्या कर रहे हैं मास्टर जी आप? क्यों पाप चढ़ा रहे हैं मुझपर?” वो आँखों में पानी भरते हुए बोले... “आपने तो कमाल कर दिया सर?” मैंने कहा “क्या हुआ मास्टर जी?आखिर बात क्या है?” उन्होंने सत्य प्रकाश की मार्कशीट निकाली और बहुत खुश होकर बोले “ देखिये, कहाँ तो पिछले साल उसके सारे पेपर्स में दो-दो चार-चार नंबर आये थे और इस बार सिर्फ तीन विषयों में दो-दो चार-चार अंको से फ़ेल हुआ है. अगर आप इस साल उसे और पढ़ा दें तो मुझे पूरा विश्वास है, इस बार वो ज़रूर निकल जाएगा. मैं हक्का बक्का..... एकदम सन्न... समझ नहीं आ रहा था क्या जवाब दूं? एक पिता की आशाओं पर पानी फेरने का पछतावा भी हो रहा था मगर मैं महसूस कर रहा था कि अगर मैंने इस बार भी सत्य प्रकाश को पढाया तो मेरी खुद की पढ़ाई बिल्कुल चौपट हो जायेगी. मैंने शर्मिन्दा होते हुए सत्य प्रकाश के पिताजी से कहा “ क्षमाप्रार्थी हूँ मास्टर जी अब मैं आपके पुत्र को नहीं पढ़ा पाऊंगा, इस से मेरी पढ़ाई चौपट हो जायेगी.” उनका चेहरा एकदम उतर गया. उदास स्वर में वो बोले “नहीं नहीं.... अगर मेरे बेटे से आपके भविष्य को ख़तरा है तो मैं उसे आपके आस पास भी नहीं आने दूंगा. ईश्वर आपको खूब तरक्की दे. मेरे बेटे के भाग्य में जो लिखा है, उसे वो भोगना ही होगा.” मैंने कहा “आप मुझे अन्यथा न लें, मैं नियमित रूप से तो उसे नहीं पढ़ा पाऊंगा मगर हाँ उस से कह दीजिए कभी कुछ पूछना चाहे तो मेरे घर के दरवाज़े उसके लिए हमेशा खुले रहेंगे.” मास्टर जी धीमे धीमे क़दम उठाते हुए चले गए.

मैंने सोचा मेरे जीवन का सत्य प्रकाश का ये चैप्टर यहीं समाप्त हो गया... मगर मैं गलत था. समय के गर्भ में बड़े बड़े चमत्कार छुपे रहते हैं जिसे इंसान कभी नहीं समझ सकता. वक्त गुज़रता रहा. एम ए किया, पत्रकारिता में पी जी डिप्लोमा किया और आकाशवाणी में आ गया. उन दिनों आकाशवाणी के प्रसारण निष्पादक की नौकरी पर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर घूम रहा था. १९८२ की बात है मेरी और मेरी पत्नी की पोस्टिंग उन दिनों सूरतगढ़ आकाशवाणी पर थी. मैं मेरी पत्नी और मेरा बेटा... हम तीनों बीकानेर में राजस्थान रोडवेज़ के बस अड्डे पर बैठे हुए बस का इन्तज़ार का रहे थे कि एक बिल्कुल ब्रांड न्यू जीप हमारे पास आकर रुकी. मैं कुछ समझ पाऊँ उस से पहले ही ड्राइवर के पास की सीट से उतारकर एक नौजवान ने पहले मेरे पैर छुए और उसके बाद मेरी पत्नी के. मैंने चेहरे की तरफ देखा.....और चौंक गया  “अरे....? ये तो सत्य प्रकाश है?”  उसने शायद मेरे मन की आवाज़ सुन ली, बोला “जी सर मैं सत्य प्रकाश ही हूँ. आप यहाँ कैसे बैठे हैं?” मैंने उसे आशीर्वाद दिया और कहा “मेरी पोस्टिंग इन दिनों सूरतगढ़ है. वहीं जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहे हैं हम लोग.” वो बोला चलिए मैं आपको जीप से ड्रॉप करके आऊँगा.” मैंने बहुत मना किया मगर वो नहीं माना. बोला “सर आज जो कुछ भी हूँ आपके आशीर्वाद से ही हूँ, मेरे होते हुए आप यहाँ बैठे हुए बस का इंतज़ार करते रहें और मैं जीप में बैठ कर चला जाऊं, ये कैसे हो सकता है?” आखिर मुझे उसकी बात माननी पड़ी. वो हमें सूरतगढ़ ड्रॉप करके आया. १७० किलोमीटर के रास्ते में खूब बातें हुईं. बातचीत हुई तो पता चला कि उसकी शादी जिस लड़की से हुई वो अपने माँ बाप की इकलौती लड़की थी और उनके पास १५-२० ट्रक और १५-२० बसें थीं. सारा काम अब सत्य प्रकाश ही संभाल रहा था. सत्य प्रकाश के पिताजी रिटायर हो चुके थे और सत्य प्रकाश एक आज्ञाकारी पुत्र के रूप में उनकी जी भरकर सेवा कर रहा था. उसने बताया “सर ये सच है कि मैं दसवीं तो पास नहीं कर सका मगर आपने ही मुझे इस योग्य बनाया कि मैं इतने बड़े बिजनेस को संभाल रहा हूँ. और सर एक बात बताऊँ? वो लाख और करोड़ की संख्याएँ किताब में लिखी हुई देख कर मुझे कभी समझ में नहीं आती थीं, अब जब अपने हाथों से गिनने लगा तो सब समझ में आ गईं.” मुझे उस दिन बहुत अफ़सोस हुआ..... मैं अगर एक साल और उसे पढ़ा देता तो शायद वो दसवीं पास कर लेता और उसके मन में ये टीस नहीं रहती कि वो दसवीं पास नहीं कर सका.

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3 comments:

anitakumar said...

सत्यप्रकाश की कहानी एक सांस में पढ़ गयी। सत्यप्रकाश का जवाब एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पर बिसरा हुआ रूल याद दिला गया कि हर कोई abstract concepts नहीं समझ सकता उनके लिए उन्हें concrete form में कन्वर्ट करना पड़ता है।

"डाक-साब" said...

बरबस प्रेमचन्द के "बड़े भाई साहब" की याद आ गयी ।
सम्मोहक कथा-शैली में आपके रोचक संस्मरणों की श्रॄंखला की एक और नायाब कड़ी !
साधुवाद और धन्यवाद !!

nakhat detha said...

salute sir hum radiohi sunte hai

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