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Saturday, July 9, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग-३४ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला)

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बी ए फाइनल बहुत जल्दी गुजरा, क्योंकि जब इंसान के पास करने को बहुत कुछ हो और वक्त की कमी, तो वक्त भी अपनी रफ़्तार बढ़ा लेता है. कॉलेज का वक्त हरि ओम ग्रुप के दोस्तों के साथ कट जाता था. ट्यूशंस पढ़ानी मैंने कम कर दी थी. अब सिर्फ घर के सामने रहने वाले रिश्तेदार लालचंद जी के बेटे घनश्याम को ट्यूशन पढ़ा रहा था. खेलने का टाइम बहुत मुश्किल से कभी कभी निकाल पाता था और नाटक वही कर पाता था, जिनकी रिहर्सल मेरे शाम के क्लिनिक के टाइम के बाद की जा सके. भाई साहब नौरंगदेसर में अपनी प्रैक्टिस में काफी बिजी हो गए थे, इसलिए बीकानेर की क्लिनिक मुझे ही संभालनी पड रही थी. यानि असिस्ट करने की बजाय, अब मैं पूरी तरह से प्रैक्टिस करने लगा था. लोग आकर मुझे डॉक्टर साहब पुकारते थे, तो हालांकि मुझे बहुत अजीब नहीं लगता था, क्योंकि जब से भाई साहब का मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हुआ था, तभी से मोहल्ले के लोगों ने भाई साहब के साथ साथ, शायद कन्फ्यूज होकर मुझे भी डॉक्टर साहब पुकारना शुरू कर दिया था, फिर भी मैं सोचने लगता कि ये मैं कर क्या रहा हूँ? कभी हारमोनियम, बैंजो, बांसुरी बजाकर संगीतकार बनने लगता हूँ, कभी इंजीनियरिंग में एडमिशन लेने लगता हूँ, फिर बायो लेकर डॉक्टर बनने का फैसला कर लेता हूँ, फिर वो छोड़ छाडकर आर्ट्स लेकर स्टेज पर नौटंकी करने लगता हूँ, कभी खेती बाडी में अपने आपको पूरी तरह खपाकर किसान बन जाता हूँ और अब बिना किसी डिग्री के क्लिनिक चलाने लगा हूँ. हालांकि उस ज़माने में ये कोई अनहोनी बात नहीं थी. मेरी ही तरह के पच्चीसों लोग बीकानेर जैसे छोटे शहरों में क्लिनिक जमाये बैठे थे और पूरी सोसायटी में उन्हें बहुत इज्ज़त भी मिलती थी. औरों की बात क्यों करूं, भाई साहब के मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने से पहले तक हमारे खुद के फैमिली डॉक्टर हुआ करते थे, डॉक्टर लक्ष्मी नारायण पारीक, जो डॉक्टर शिव के नाम से मशहूर थे. उनके पास कोई डॉक्टरी की डिग्री नहीं थी. सीधे सादे ग्रेजुएट थे वो लेकिन वो पारीकों के मोहल्ले में एक अच्छी खासी क्लिनिक चलाया करते थे और पूरे शहर में एक अच्छे डॉक्टर के रूप में उनका नाम था. डॉक्टर पारीक के दो बच्चे आगे जाकर डॉक्टर बने. एक उनकी बेटी अनुसूइया पारीक, जो मेरे भाई साहब के साथ पढ़ती थी और दूसरे उनके छोटे बेटे विपिन पारीक, जो कभी मेरे क्लासफेलो रहे और  अब मुम्बई में अपना हॉस्पिटल चलाते हैं.
आज की पीढ़ी तो इस चीज़ से वाकिफ नहीं होगी, लेकिन मेरी उम्र के लोगों को याद होगा कि उस ज़माने में जबकि मेडिकल कॉलेज गिनती के हुआ करते थे, एक इम्तहान हुआ करता था, आर एम् पी. जो लोग कुछ बरस किसी एम् बी बी एस डॉक्टर के पास रहकर काम सीख लेते थे, वो इस इम्तहान में बैठ सकते थे. इसे पास करने पर उन्हें आर एम् पी, यानि रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर का सर्टिफिकेट मिल जाता था. वो अपनी क्लिनिक खोलकर बैठ सकते थे और प्रैक्टिस कर सकते थे.
मेरी मेडिकल प्रैक्टिस की वजह से अच्छा खासा रुपया तो जेब में आ ही रहा था, मरीजों को अपनी दवा से ठीक होते देखता था, तो दिल को बड़ा सुख मिलता था, एक अजीब तरह का सुकून मिलता था. भाई साहब के एक दो साथी तब तक वहीं बीकानेर में थे, इसलिए अगर कोई बात समझ में नहीं आती थी तो उन लोगों से सलाह ले लिया करता था और अगर बात इसके भी आगे की होती, तो मरीज़ को उनके पास ही भिजवा देता था. इधर मेरे घर से थोड़ी ही दूर डॉक्टर हेम चंद्र सक्सेना कुछ ही वक्त पहले कहीं बाहर से एम डी करके आये थे और बहुत अच्छे डॉक्टर होने के साथ साथ बहुत अच्छे इंसान भी थे. उनके परिवार के साथ हमारे परिवार के बहुत पुराने ताल्लुकात थे. अगर कभी मेरी डॉक्टरी में कोई ऐसा मसला खडा हो जाता कि मुझे फ़ौरन मदद की ज़रूरत होती, तो मैं उनके सामने जा खडा होता था और वो मेरे मामले को बहुत खूबसूरती से संभाल लेते. इसी तरह मेरी प्रैक्टिस दिनोदिन जमती चली जा रही थी. कुछ इत्तेफाक ही समझिए कि मेरे हाथ से कुछ ऐसे मरीज़ ठीक हो गए कि थोड़े ही दिनों में आस पास के मोहल्लों के लोग भी मुझे एक डॉक्टर के तौर पर जानने लगे . भाई साहब जब कभी बीकानेर आते, अपने दोस्तों के साथ घर के अंदर बैठे होते और मैं क्लिनिक में मरीज़ देख रहा होता, तो वो सब मिलकर खूब हंसा करते थे कि वाह, तीन तीन चार चार डॉक्टर घर के अंदर बैठे हुए हैं और एक नीम हकीम इलाज कर रहा है.
एक बार तो हद ही हो गयी. पास के मोहल्ले के एक साहब और उनकी बीवी मेरी क्लिनिक में आये. मैंने उनसे पूछा “जी कहिये......”
मरीज़ के साथ आई उनकी बीवी ने कहा “डॉक्टर साहब...... पिछले छः महीने से इनके पेट में दर्द रह रहा है, सब जगह दिखा दिया लेकिन पेटदर्द ठीक नहीं हो रहा है.... मेरी मासी जी ने कहा कि एक बार आपको दिखा दूं.”
मैंने पूछा “अभी किसका इलाज चल रहा है?”
उन्होंने जिन डॉक्टर साहब का नाम लिया, उस नाम को सुनकर मैं सन्न रह गया. वो बहुत अच्छे फिजीशियन थे. मुझे ये मुनासिब नहीं लगा कि मैं उस केस में हाथ डालूँ, जिसे इतने बड़े डॉक्टर देख रहे हैं.
मैंने उस लेडी को कहा “बाई अच्छी तरह लगकर उन डॉक्टर साहब का ही इलाज करवाओ. वो बहुत बड़े डॉक्टर हैं...... जल्दी ही ठीक हो जायेंगे ये......मैं उनके इलाज के ऊपर अपना इलाज नहीं दे सकता.”
वो मुझसे बहुत मिन्नतें करती रहीं कि मैं उनके पति का इलाज करूं....लेकिन मैं भला ऐसी हिमाकत कैसे कर सकता था?
जाने नहीं क्या था मेरे भाग्य में कि १५-२० दिन बाद वो मोहतरमा अपने शौहर को लेकर फिर मेरे पास आ पहुंचीं और आँखों में आंसूं भरकर बोलीं “आप एक बार इन्हें कुछ दिन दवा देकर तो देखिये....... शायद आपकी दवा लग जाए. अगर इनकी बीमारी ठीक नहीं हुई, तब भी मैं आपको कोई उलाहना नहीं दूंगी..... और आप जिन डॉक्टर साहब के पास जाने को कहेंगे, मैं इन्हें उनके पास ले जाऊंगी.”
मैंने बहुत घबराते घबराते, बहुत ही साधारण सी कुछ दवाएं इस उम्मीद से दे दी कि इनसे कुछ फायदा नहीं होगा, तो नुक्सान भी नहीं होगा. हारकर ये वापस उन्हीं डॉक्टर के पास चले जायेंगे या फिर मैं इन लोगों को डॉक्टर सक्सेना साहब के पास भेज दूंगा. लेकिन मेरी किस्मत, तीन दिन बाद उन मोहतरमा ने आकर मुझे बताया कि उनके शौहर अब पहले से बहुत बेहतर हैं और चाहते हैं कि मैं ही आगे उनका इलाज करूं. मैंने वही गोलियाँ जो तीन दिन के लिए दी थीं, १५ दिन के लिए और दे दी. मरीज़ की हालत और बेहतर हो गयी और वो काम पर जाने लगे. अब खुद मरीज़ मेरे पास दवा लेने आने लगे और ये एक रूटीन बन गया कि हर १५ दिन में एक बार वो मुझसे दवा लेकर जाते थे. मैंने कई बार मरीज़ और उनकी बीवी को समझाया “आप लोग किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाकर चैक अप करवा लें, इस तरह ये दवाएं आप कब तक लेंगे आखिर?”
लेकिन मेरी कोई बात उनके समझ में कभी नहीं आई. उनका कहना था “जी हमें तो आपकी दवा लागू बैठ गयी है, हमें कहीं किसी के पास नहीं जाना. जब आपकी दवा से ये ठीक हैं तो हम फिर किसी और डॉक्टर के पास जाकर नए सिरे से इलाज क्यों शुरू करें ?”
उन्हें मेरी बात समझ नहीं आयी, तो नहीं ही आयी. यहाँ तक कि इस वाकये के करीब तीन साल बाद जब मैं अपनी क्लिनिक को हमेशा के लिए बंदकर आकाशवाणी, जोधपुर में अनाउंसर की पोस्ट पर ज्वाइन करने के लिए बीकानेर छोड़ने लगा, तो वो मियाँ बीवी बहुत दुखी हो गए कि उनका इलाज अब कौन करेगा? और अच्छी खासी डॉक्टरी छोड़कर, मैं रेडियो पर बोलने की ये नौकरी करने क्यों जा रहा हूं?
बी ए का इम्तहान हम हरि ओम ग्रुप के सभी दोस्तों ने पास कर लिया था. अब फिर से मैं एक ऐसे मरहले पर खडा था, जहां फैसला करना था कि आगे क्या किया जाए? आस पास के लोगों की सलाह थी कि अच्छी भली क्लिनिक चल रही है, आर एम पी कर ली जाए और डॉक्टरी को ही अपना पेशा बनाया जाए. मुझे ये काम करना अच्छा तो लगता था, लेकिन मैं जानता था कि चाहे मैं आर एम पी जैसी कोई डिग्री ले भी लूं, तो कहलाऊंगा तो नीम हकीम ही. जब तक पढाई चल रही है...... या जब तक कोई ढंग की लाइन नहीं मिलती, ये फर्जी डॉक्टरी ठीक है, लेकिन इसे मैं अपना करियर नहीं बना सकता था. इधर दो साल पहले ही मुझे ऑल इंडिया रेडियो में अनाउंसर की पोस्ट ऑफर की जा चुकी थी, इसलिए मुझे पूरा यकीन था कि और कुछ भी नहीं कर पाऊंगा, तो अनाउंसर की पोस्ट तो मुझे कभी भी मिल ही जायेगी, इसलिए लगा, बेहतर है कि कुछ और रास्ते तलाश किये जाएँ......
हरि ओम ग्रुप के आठों लोग एक साथ बैठे. सतीश खत्री, महावीर शर्मा, हरि  कृष्ण मुंजाल और अशोक बंसल ने तय किया एल एल बी करने का, मैंने और हिम्मत सिंह ने इक्नोमिक्स में एम् ए करने का फैसला किया, मोहन प्रकाश ने एम् ए हिस्ट्री में एडमिशन लिया और गणेश भठेजा ने नौकरी करने का फैसला किया.

एम् ए इक्नोमिक्स. फिर से एक नई शुरुआत. हिम्मत सिंह के साथ क्लास में पहुंचकर देखा कि कई शक्लें अजनबी थीं और कई शक्लें जानी पहचानी. ५-६ लडकियां एक तरफ बैठी हुई थीं और ३० के आस पास लड़के दूसरी तरफ. कुछ शक्लें पहचानी हुई इसलिए थीं कि एम् ए इक्नोमिक्स में एडमिशन लेने वालों में से एक चौथाई से ज़्यादा स्टूडेंट्स वो थे, जिन्होंने बी एस सी किया था, लेकिन किसी वजह से एम् एस सी में एडमिशन नहीं ले पाए थे. इनमें से ज़्यादातर लोग वही थे, जो फर्स्ट ईयर में मेरे साथ पढ़ चुके थे. नरेन्द्र भार्गव, राजेन्द्र पांडे जैसे कुछ लोग थे, जिनसे मैं पहले से वाकिफ था और दिनेश मिश्रा जैसे कुछ लोग थे, जिनसे पहली ही मुलाका़त में लगा कि ये दोस्ती दूर तक चलेगी और ऊपर वाले का करम है कि ये दोस्तियां आज भी बरकरार हैं.  
इसी दिनेश मिश्रा के साथ मेरी, हिम्मत सिंह की और मुंजाल साहब की दोस्ती इस क़दर पक्की हुई कि दिनेश का घर हमारा दूसरा घर बन गया और उसके सभी भाई बहन हमारे सगे से ज़्यादा अज़ीज़ भाई बहन. दिनेश की मम्मी जी को हम लोग मौसी जी बुलाते थे और आज भी बुलाते हैं, उसके पिताजी को हम लोग भी पिताजी ही बुलाते थे. मधु दीदी, पुष्पा, रज्जू और मंजू से हमें भी वैसा ही प्यार मिलता था, जैसा कि दिनेश को मिलता था. यहाँ तक कि दिनेश के पड़ोस में रहने वाले पांडे साहब, शर्मा जी, पन्त जी, टंडन साहब, राजपुरोहित जी, सभी लोग जैसे हमारे ही पड़ोसी बन गए. दिनेश और पांडे जी के घर की दीवार एक ही थी. पांडे जी की दो बेटियाँ उषा और अमिता का आज भी मुझे भाई साहब भाई साहब कहते मुंह सूखता है. दरअसल मैं जिस मोहल्ले में रहता था, उसमे सिवाय तीन चार घरों के बाकी सभी घर शेखों यानि हलालखोरों के थे, जिनसे हमारे ताल्लुकात अच्छे भले थे, मगर एक थाली में बैठकर खाने के या साथ खेलने के सम्बन्ध नहीं थे. हमारे परिवार और शेखों के परिवारों के बीच पीढ़ियों से मधुर सम्बन्ध होते हुए भी एक दूरी चली आई थी जो अब तक वैसे ही मौजूद थी. इसलिए पड़ोस क्या होता है और पड़ोसियों से सम्बन्ध कैसे हो सकते हैं, इस बात को मैंने दिनेश के साथ रहकर ही जाना.
हम लोगों ने एम् ए में एडमिशन लिया ही था कि दिनेश ने बताया कि उसकी दीदी की शादी होने वाली है. दरअसल दिनेश के पिताजी श्री राम चंद्र मिश्रा जी  रेलवे में काम करते थे और लखनऊ से तबादले पर बीकानेर आये थे. लखनऊ जैसे सरसब्ज़ इलाके से बीकानेर आना पूरे परिवार को बहुत खला, लेकिन क्या किया जा सकता था. ऐसे में जब हम लोग उनके घर जाया करते थे, तो पूरे परिवार का थोड़ा वक्त कट जाया करता था. जब मधु दीदी की शादी तय हुई तो एक तरफ हम सारे दोस्त शादी की तैयारियों में लग गए, दूसरी तरफ उनके मोहल्ले के सभी लोग इस तरह से काम में उनका हाथ बंटाने लगे मानो उनके खुद के घर में ही शादी होने वाली हो. तय वक्त पर उत्तर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों से दिनेश के रिश्तेदार आने लगे. दिनेश के दद्दू हमारे भी दद्दू बन गए, दिनेश के दादू हमारे भी दादू बन गए और दिनेश के दद्दा हमारे भी दद्दा. कुल मिलाकर ये हुआ कि हम तीनों दोस्त दिनेश के घर परिवार में इस तरह घुल मिल गए, जैसे उनके ही घर के फरद हों.
बरात जोधपुर से आने वाली थी. जोधपुर और बीकानेर दोनों मारवाड के ही हिस्से हैं और दोनों की तहजीब बिलकुल एक जैसी, जबकि दिनेश के जो रिश्तेदार उत्तर प्रदेश से आये हुए थे..... उनका रहन सहन... उनके तौर तरीके, सब बिलकुल अलग. अब तो खैर सभी जगह शादियों में खाना एक जगह पर रख दिया जाता है और बुफे के नाम पर जिसे जो खाना है वो खाए, लेकिन उस ज़माने में उत्तर प्रदेश में ये रिवाज था कि शादी के मौके पर सभी को खाना खिलाया जाता था और सबसे आखिर में दो दो-चार चार पीस मिठाई के सजाकर परोसे जाते थे, जबकि बीकानेर और जोधपुर में खाने की शुरुआत ही मिठाई से होती थी. लोग जब जी भर कर मिठाई खा लेते थे, या यों कहें कि घराती जब बारातियों को ठूंस ठूंसकर मिठाई खिला देते थे, उसके बाद सब्जी पूरी उन्हें परोसी जाती थी और बाकी खाना शुरू होता था.
जब बरात आई और दिनेश के रिश्तेदारों ने ढेर की ढेर मिठाइयां देखी और जब उन्हें बताया गया कि बीकानेर में खाना खिलाने के नाम पर पहले ठूंस ठूंस कर मिठाइयां ही खिलाई जाती हैं, तो उनके मुंह खुले के खुले रह गए. सभी लोग आपस में बातें करने लगे कि राम चंद्र मिश्र जी तो लुट जायेंगे यहाँ. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, बड़ी ही धूमधाम से मधु दीदी की शादी हुई और उस शादी की बदौलत हम तीनों दोस्त दिनेश के परिवार और पड़ोसियों के और करीब आ गए.   
जब हम छोटे होते हैं तो हमारे पास छुपाने के लिए कुछ नहीं होता लेकिन जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं हम बहुत सी बातों को दुनिया से छुपाने लगते हैं. जब अपनी बात किसी को सुनाने बैठें, तो हो सकता है हम निडर होने की कोशिश करें और अपनी खातिर कुछ न छुपाएँ, लेकिन हमारी बातों का असर सिर्फ हमारे ऊपर ही हो ये ज़रूरी नहीं. हमारी बातों का असर दूसरों की ज़िंदगी पर भी हो सकता है और बहुत गहराई तक हो सकता है, इसलिए ये मुनासिब नहीं लगता कि हम किसी की ज़िंदगी के उन पन्नों को सबके सामने खोलकर रख दें, जो उन्होंने दुनिया से अब तक छुपाये रखे हों. लिहाज़ा मैं माज़रत के साथ यहाँ ये कहना चाहूँगा कि अब से आगे जो कुछ मैं लिखूंगा, वो अब तक की तरह अपनी ज़िंदगी के वाकये ही लिखूंगा, मगर कुछ कैरेक्टर्स के नाम बदल कर लिखूंगा.
एम ए इक्नोमिक्स की क्लासेज़ लगने लगी थी. गुरु लोग वही पुराने थे. डॉक्टर एल एन गुप्ता सर , पुरोहित सर, गेवर चंद सर और वही हमारे अज़ीज़ पालीवाल सर. हमें पता था कि वो पालीवाल सर बी ए की खुन्नस अब एम ए में निकालने की पूरी कोशिश करेंगे. अब हरि ओम ग्रुप भी बिखर चुका था. कुल मिलाकर मैं और हिम्मत सिंह दो ही एम् ए इक्नोमिक्स में साथ बचे थे, लेकिन दिनेश मिश्रा, नरेन्द्र भार्गव और राजेन्द्र पांडे भी साइंस से ही आये थे इसलिए स्टेटिस्टिक्स से घबरानेवाले नहीं थे. जब वो भी हमारे साथ आकर मिल गए तो हम थोड़ा बेफिक्र हो गए और क्लास में सबको कह दिया कि जिसे भी स्टेटिस्टिक्स में कोई दिक्कत आये, वो हमसे मदद ले सकता है. पालीवाल साहब को लग गया कि इस बार भी उनकी दुकानदारी ठप्प होनेवाली है.
वैसे तो हमारी क्लास में ७-८ लडकियां एडमिशन ले चुकी थीं, लेकिन दो के अलावा कभी गाहे बगाहे ही हम लोगों की किसी से बात होती थी. ये दो लडकियां थीं मंजीत और सुनीता. दोनों के पिता रेलवे में काम करते थे. दोनों ही शुरू शुरू में स्टेटिस्टिक्स से घबरा कर ही हम लोगों के पास आईं, बाद में हमारे ग्रुप में शामिल हो गईं. ये दोनों लडकियां अक्सर मेरे घर आया करती थीं. सुनीता के तो घर और कॉलेज के बीच में मेरा घर पड़ता था, इसलिए वो अक्सर मेरे घर आती थी. गहरे सांवले रंग की वो लंबी सी लड़की नुस्वानियत से थोड़ी दूर लगती थी. उसके चाल ढाल, पहनावे से वो आम हिन्दू घर की लड़की नहीं लगती थी. वो मेरे घर आने लगी तो मेरी माँ से उसकी कुछ ऐसी दोस्ती हुई कि मेरे घर रहने या न रहने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था. अक्सर जब मैं घर आता या अपनी क्लिनिक संभाल रहा होता, वो मेरी माँ के पास बैठी रहती. मुझे वो लड़की नफ्सियाती तौर पर आम लड़कियों से अलग लगती थी. एक दिन बातों बातों में उसने मुझे और मेरी माँ को अपने घर के लोगों के बारे में बताया कि एक उसकी बड़ी बहन है, जो दरअसल उसकी सगी बहन नहीं है, उसके पापा के किसी दोस्त की बेटी है और दो छोटे भाई हैं, लेकिन उन भाइयों में से एक पिछले कई दिन से लापता है. मैंने और माँ ने दोनों ने पूछा “अरे..... लापता है का क्या मतलब? कहाँ गया? क्या आप लोगों ने उसका पता किया? क्या पुलिस को इत्तेला दी?” लेकिन उसके पास इन सवालों के कोई जवाब नहीं थे या पता नहीं, वो इनके जवाब देना नहीं चाहती थी. उसने सिर्फ इतना बताया कि उसकी बड़ी बहन को उसके पापा कहीं से लेकर आये थे. हम लोगों ने उसकी बातें सुन ली थीं और उनपर यकीन भी कर लिया था. जैसे जैसे दिन गुजर रहे थे, वो मेरी माँ के करीब से करीबतर होती जा रही थी, हालांकि बातें उसकी ज़्यादातर बिना सर पैर की ही हुआ करती थीं.  एक दिन मेरी माँ ने मुझे कहा “महेंदर, ये लड़की कहती है कि इसकी बहन किसी और की औलाद है, लेकिन मुझे तो लगता है कि इसकी माँ इसकी खुद की नहीं है बल्कि सौतेली है. बहुत दुःख देती है इस बेचारी पगली को.”
मैंने कहा “हमें तो जो वो बताती है वही पता चल सकता है ना, अब उनके घर के अंदर की बातें हमें कैसे पता चलेंगी और हमें मतलब भी क्या है उन बातों से?
“सही कह रहे हो, लेकिन लगता है, कहीं न कहीं ये हमसे कुछ छुपा रही है. मैं कई बार ज़बरदस्ती करके इसे दो गस्से खिला देती हूँ, जब ये पगली हँसते हँसते बताती है कि इसकी माँ ने इसके लिए खाना ही नहीं बनाया.”
वक्त इसी तरह गुज़रता रहा. हम लोगों ने मान लिया था कि उसकी बड़ी बहन उसके पापा के किसी दोस्त की बेटी है, जिसे वो पाल रहे हैं लेकिन सवाल ये था कि अगर ये सच है तो उसकी माँ उसके साथ सौतेला बर्ताव क्यों करती है? एक दिन मैं कहीं बाहर गया हुआ था...... बहुत देर बाद लौटा तो माँ ने बताया “आज वो पगली आई थी.”
मैं समझ गया कि वो सुनीता की बात कर रही थीं. वो आजकल सुनीता को पगली के नाम से ही बुलाने लगी थीं. मेरे लिए ये कोई नई बात नहीं थी. अक्सर वो मेरी माँ के पास काफी काफी देर तक बैठी रहती थी इसलिए मैंने उनकी बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. माँ फिर बोलीं “जानते हो, मैं सही सोच रही थी, ये उसकी अपनी माँ नहीं है, सौतेली माँ है.”
मैंने कहा “क्या मतलब? मैं समझा नहीं.”
“इसके पापा रेलवे में काम करते हैं ये तो तुम्हें पता ही है.”
“जी”
“उनका तबादला एक बार लखनऊ हो गया था, जहां वो अकेले ही गए. हर महीने दो महीने में एक बार बीकानेर आते थे. वहाँ रहने के दौरान वो एक बार सख्त बीमार हो गए. कोई देखभाल करनेवाला तो वहाँ था नहीं, डिपार्टमेंट ने हॉस्पिटल में दाखिल करवाकर उनसे निजात पा ली. ऐसे में हॉस्पिटल की एक क्रिश्चियन नर्स ने उन्हें इस क़दर सम्भाला कि ठीक होने के बाद उन्होंने उस नर्स से शादी कर ली, लेकिन इस बीच बीकानेर आये तब भी उन्होंने अपनी बीवी से ये बात छुपाये रखी. इधर इसकी दीदी पैदा हुई और कुछ ही वक्त बाद ये भी इस दुनिया में आ गयी. इस बेचारी की किस्मत खराब थी कि जब ये पैदा हुई, तो ये तो बच गयी लेकिन इसकी माँ पीलिये से चल बसी. इसके पापा ने अपना तबादला वापस बीकानेर करवाया और इस नन्हीं सी लड़की को लेकर लौट आये. लौटकर इसे अपनी बीवी की गोद में डाला, तो हालांकि उसने वादा किया कि वो इसे माँ का प्यार देगी, लेकिन वादा तो कई बार इंसान जोश जोश में कर बैठता है, उसे निभाना इतना आसान नहीं होता. सबको यही बताया गया कि सुनीता की बड़ी बहन उसके पापा के दोस्त की बेटी है जिसे वो पाल रहे हैं और ये इन दोनों की खुद की औलाद है.”
मेरी माँ अब सुनीता का बहुत ख़याल रखने लगी थीं. एक दिन वो आई हुई थी और घर के बाहर की चौकी पर खड़ी हुई मेरी माँ से बातें कर रही थी कि अचानक न जाने उसे क्या नज़र आया, घबराकर माँ को हाथ पकड़कर घर के अंदर ले आयी, दरवाजा बंद कर लिया और बुदबुदाई “वो यहाँ भी...... आ गया.......यहाँ भी ..... आ गया.”
माँ ने कहा “क्या हुआ बेटा......क्या हुआ?”
वो इतना घबरा गयी थी कि उससे जवाब देते नहीं बन रहा था. मैं उस वक्त ऊपर अपने कमरे में था. माँ ने मुझे आवाज़ लगाई. मैं नीचे आया. मैंने पूछा “क्या बात है? क्या हुआ?”
इसपर सुनीता रोने लगी. मैंने पूछा “आखिर बात क्या है? कुछ तो बताओ.”
वो रोते रोते बोली “महेंद्र.... मैं कहाँ तक अपनी ज़िंदगी की कहानियां सुना कर आप लोगों को दुखी करूं?”
“कोई बात नहीं तुम बताओ कि बात क्या है?”
तब उसने कहा “मैंने एक दिन बताया था ना कि मेरा एक भाई लापता है. बहुत होशियार था, मेरा भाई. दसवीं में ७५% से ज़्यादा नंबर लेकर आया था. लेकिन ग्यारहवीं में आने के बाद पता नहीं अचानक उसे क्या हुआ कि वो बहुत बहुत देर तक घर से गायब रहने लगा और पढ़ाई करते हुए भी नज़र नहीं आता था. इस बीच दसवीं के बाद छुट्टियों में उसने एक ऑफिस में पापा के बहुत मना करने के बावजूद वर्क चार्ज की टेम्परेरी नौकरी कर ली थी. जब स्कूल खुल गए और वो बहुत बहुत दिन तक गायब रहने लगा, स्कूल से उसकी शिकायतें आने लगीं तो   पापा ने उससे बहुत पूछा कि आखिर बात क्या है, वो कहाँ जाता है? स्कूल से गायब क्यों रहता है? लेकिन उससे कुछ भी पूछो तो वो कोई जवाब नहीं देता था.”
“फिर.....?”
“एक दिन मैंने सुना कि कोई घर के बाहर से उसे आवाज़ दे रहा है..... मैं बाहर निकल कर आई तब तक वो आवाज़ देने वाला और मेरा भाई, दोनों ही जा चुके थे. दो तीन बार फिर ऐसा हुआ. जैसे ही वो जो भी आदमी था, आवाज़ लगाता था, मेरा भाई चाहे उस वक्त कुछ भी कर रहा हो, फ़ौरन घबराकर उस आवाज़ के पीछे निकल जाता था. एक दिन मैंने छुपकर देखा कि आवाज़ लगाने वाला एक बूढा सा आदमी था.”
“तुमने अपने पापा को बताया?”
“नहीं.... पापा को हार्ट की बीमारी लग चुकी थी और उन दिनों वो बहुत बीमार रहने लगे थे. कुछ दिन इसी तरह चलता रहा. मेरा भाई पहले कई कई दिन गायब रहने लगा और उसके बाद आखिरकार एक दिन घर से लापता हो गया. हम सब अब भी उसका इंतज़ार कर रहे हैं. हर आहट पर हमारा दिल धड़क उठता है कि शायद वो आ गया लेकिन....... हर बार दरवाज़े पर कोई और ही मिलता है, वो नहीं, जिसका हम इतनी बेताबी से इंतज़ार कर रहे हैं.”
उस दिन तो बात यहीं खत्म हो गयी मगर कुछ ही दिन बाद जब सुनीता मेरे घर से रवाना हो रही थी, वो दरवाज़े तक ही पहुँची थी कि सामने सड़क पर से गुजरते एक अधेड़ से इंसान को देखकर उसने दरवाजा झट से आधा उढका दिया और घबराकर, इशारे से मुझे बताया कि यही है वो आदमी, जिसकी वजह से उसका भाई गायब हुआ है. मैंने गौर से देखा. मैं एकदम चौंक गया......अरे........ ये तो वही आदमी है.......!!!!!!!!
मुझे ५-६ साल पहले की वो घटना याद आ गयी, जब मैं १०वीं का इम्तहान देकर फ्री हुआ था. बाज़ार से अपनी साइकिल पर रतन बिहारी जी के बाग़ के पास से गुजर रहा था, तो देखा, कोई नेता जी भाषण दे रहे थे. हालांकि राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन क्योंकि इम्तहान खत्म ही हुए थे और अपने आप को बिलकुल खाली महसूस करना चाहता था, मैं बाग़ के बाहर साइकिल की टेक लगा कर भाषण सुनने लगा. तभी एक अधेड़ उम्र का इंसान आकर मेरे पास खडा हो गया और मुझसे बात करने लगा. मुझे कुछ अजीब सा भी लगा लेकिन छोटे शहरों में बिना जान पहचान के, किसी अजनबी को पास खड़े देखकर थोड़ा बतिया लेना कोई ऐसी घटना भी नहीं थी जिस पर मैं ज़्यादा ध्यान देता. उसे जब पता चला कि मैंने १० वीं का इम्तहान दिया है, तो वो मुझसे बोला कि अगर मैं चाहूँ तो छुट्टियों में मुझे वो पी डब्ल्यू डी में नौकरी दिलवा सकता है.
वहाँ शोर काफी था तो वो मुझसे बोला “चलो हम पब्लिक पार्क में बैठकर बात करते हैं, यहाँ बहुत शोर है.”
हम लोग पब्लिक पार्क में एक बैंच पर बैठ गए. वो मुझे बताने लगा कि वो पी डब्ल्यू डी में अफसर है और वो चाहे तो मुझे छुट्टियों में दो महीने के लिए क्लर्क की नौकरी दिलवा सकता है. मुझे वहाँ कुछ काम नहीं करना होगा. बस जाकर हाजिरी भर लगानी होगी, बाकी वो सब संभाल लेगा. इस तरह अगर मैं वो टेम्परेरी नौकरी करता हूँ, तो बिना कुछ खास किये मैं दो महीनों में ढाई सौ रुपये कमा सकता हूँ. हालांकि उस ज़माने में ढाई सौ रुपये अच्छी खासी रकम हुआ करती थी, लेकिन  मुझे ये सब करने की न तो ज़रूरत थी और न क्लर्क का काम करने में मेरा कोई इंटरेस्ट था. वो आदमी बात करते करते मुझे छूने की कोशिश करने लगा. इंसान के लम्स यानी स्पर्श से उसकी नीयत का काफी कुछ अंदाजा हो जाता है. हालांकि मैं उस वक्त बहुत छोटा था, इन मामलों को बहुत अच्छी तरह से नहीं समझता था, लेकिन उसकी हरकतें मुझे कुछ अजीब सी लगीं, उसका छूना   नागवार गुजरा. मैंने बैंच से उठकर उसके कसकर एक लात जमाई और अपनी साइकिल उठाकर वहाँ से चल दिया. वो पीछे से मुझे आवाजें देता रहा , देता रहा, मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा.
दो चार दिन में मैं उस सारे वाकये को भूल भी गया, लेकिन अब जब सुनीता ने उसकी शक्ल दिखाई और अपने भाई के घर से लापता होने की कहानी सुनाई, तो मुझे समझ आया कि मैं किस तरह एक खतरनाक इंसान की खतरनाक चाल से बाल बाल बच गया था.


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