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Wednesday, March 14, 2012

'मैं बसंती हवा हूं': वसंत पर शुभ्रा शर्मा का रेडियो-फीचर

 

जानी-मानी न्‍यूज़-रीडर शुभ्रा शर्मा की साहित्यिक प्रस्‍तुतियां हम रेडियोनामा पर आपको पहले भी सुनवाते रहे हैं। हाल ही में उन्‍होंने वसंत पर एक ख़ास फीचर तैयार किया। और अब  वे उसे रेडियोनामा के साथ साझा कर रही हैं। इस फीचर में वसंत पर तमाम महत्‍वपूर्ण कविताओं का समावेश है। साथ में पढ़ने के आनंद के लिए इसका आलेख भी दिया जा रहा है। ऑडियो चाहें तो यहां सुनें, चाहें तो डाउनलोड करके सुनें। लिंक नीचे दी गयी है।





कई बरस पहले पं० विद्यानिवास मिश्र का एक ललित निबंध पढ़ा था - " वसंत आ गया, पर कोई उत्कंठा नहीं". हम तब विद्यार्थी थे और वसंत के आगमन के समय हमारी सबसे बड़ी उत्कंठा यही होती थी कि परीक्षा 4 में अच्छे नंबरों से पास हो जाएँ. युवा ह्रदय की क्या आशा, अपेक्षा, उत्कंठा होती है, यह जानने-बूझने का न तो हमारे पास समय था और न माहौल.१४ फरवरी को मनाया जाने वाला आयातित पर्व - सेंट वैलेंटाइन्स डे - अभी भविष्य के गर्भ में निहित था. इसलिए युवाओं को वसंत के आने की खबर वैलेंटाइन्स डे के विशेष ऑफर्स से नहीं, गमलों में लगे गेंदे-गुलाब से, खेतों में लहलहाती सरसों से, बौराये आमों से और अगर शहरों-कस्बों के छोर पर रहते हों तो टेसू के फूलों से मिलती थी.

कवियों के लिए तो वसंत ऋतु अक्षय प्रेरणा का स्रोत रही है. संस्कृत साहित्य में वसंत को कामदेव का प्रिय सखा कहा गया है. वही कामदेव जब गन्ने के धनुष पर, भंवरों की पांत की डोरी बाँध, रंग-बिरंगे फूलों के बाण चढ़ाये निकलता है, तब आम लोगों की तो बिसात ही क्या, देवाधिदेव महादेव भी उसके प्रभाव से बच नहीं पाते. कालिदास ने अपने महाकाव्य कुमारसंभवम में इस प्रसंग का विषद वर्णन किया है.

हिंदी साहित्य में भी वसंत से जुडी इतनी कवितायेँ हैं कि उन सबकी चर्चा संभव नहीं. हम केवल इतना ही प्रयास कर सकते हैं कि उनमें से कुछ की बानगी आपको दिखाएँ. रीतिकालीन कवियों से शुरुआत करें तो सबसे पहले याद आते हैं पद्माकर.

कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है

कहे पद्माकर परागन में पौनहू में पानन में पीक में पलासन पगंत है

द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में देखो दीप-दीपन में दीपत दिगंत है

बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरयो बसंत है

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महानगर के कंक्रीट के जंगल में रहने वाली हमारी नई पीढ़ी ने भले ही बनन में, बागन में,बगरे बसंत की शोभा न देखी हो, लेकिन गाँव-देहात से आकर शहर में बसने वाले ज़रूर आज भी बौरे आमों की मादक गंध को याद करते हैं. बच्चन जी जिन दिनों कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में थे और वहां वसंत आने की चर्चा हो रही थी, तब उन्होंने लिखा था -


बौरे आमों पर बौराए भंवर न आये..... कैसे कह दूं मधु ऋतु आई ?

माना अब आकाश खुला-सा और धुला-सा, फैला-फैला नीला-नीला

बर्फ जली-सी पीली-पीली दूब हरी फिर जिस पर खिलता फूल फबीला

तरु की निरावरण डालों पर मूँगा-पन्ना और दखिन्हटे का झकझोरा

बौरे आमों पर बौराये भँवर न आये .... कैसे कह दूँ मधु ऋतु आयी?

और फिर उसके बरक्स अपने देश के वसंत को याद करते हैं कि -

डार-पात सब पीत पुष्पमय जो कर लेता, अमलतास को कौन छिपाये

सेमल और पलाशों ने सिन्दूर पताके नहीं गगन में क्यूँ फहराये

छोड़ नगर की सँकरी गलियाँ, घर-दर, बाहर आया हूँ पर

फूली सरसों से मीलों लम्बे खेत नहीं दीखते पियराये ....कैसे समझूँ मधु ऋतु आयी?

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बौराए आमों के अलावा वसंत का दूसरा अग्रदूत है पलाश या टेसू. सेनापति कहते हैं -

लाल लाल टेसू फूल रहे हैं रसाल संग स्याम रंग भेंटि मानो मसि में मिलाये हैं

सेनापति माधव महीना  में पलास तरु देखि देखि भाव कविता के मन आये हैं

आधे अनसुलगि सुलगि रहे आधे मानो बिरहि दहन काम कोयला परचाये हैं.

कैसी सुन्दर उपमा है! विरह से जल रहे प्रेमियों को और अधिक तड़पाने के लिए मानो कामदेव ने कोयले दहका दिए हैं. लेकिन अगर प्रिय साथ हो तो यही वसंत कितना मधुर, कितना सुखद हो उठता है.

चंचल पग दीप शिखा से धर गृह मग वन में आया वसंत

सुलगा फागुन का सूनापन सौन्दर्य शिखाओं में अनंत

सौरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर-उर में मधुर दाह

आया वसंत भर पृथ्वी पर स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह.

कलि के पलकों में मिलन स्वप्न अलि के अंतर में प्रणय गान

लेकर आया प्रेमी वसंत आकुल जड़-चेतन स्नेह-प्राण. . .

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इस कविता का प्रारंभ पन्त जी ने 'चंचल' शब्द से यूँ ही नहीं कर दिया था - इसका एक विशेष प्रयोजन है. यह जो वसंत ऋतु है, यह मन में चंचलता और नटखट छेड़-छाड़ जगाती  है. तभी तो होली भी इसी ऋतु में खेली जाती है.

आयौ जुरि उत तें समूह हुरिहारन कौ, खेलन कों होरी वृषभान की किसोरी सों ।

कहै रतनाकर त्यों इत ब्रजनारी सबै, सुनि-सुनि गारी गुनि ठठकि ठगोरी सों ॥

आँचर की ओट-ओटि चोट पिचकारिन की, धाइ धँसी धूँधर मचाइ मंजु रोरी सों ।

ग्वाल-बाल भागे उत, भभरि उताल इत, आपै लाल गहरि गहाइ गयौ गोरी सौं ॥

फिर एक बार पद्माकर की, या यूँ कहें कि कान्हा को फिर से आने का आमंत्रण देने वाली उनकी गोरी की याद आती है -

फाग की भीर अभीरन तें गहि स्यामहि लै गई भीतर गोरी

भाई करी मन की पद्माकर ऊपरि नाँय अबीर की झोरी

छीन पितम्बर कम्मर तें सु बिदा दइ मींडि कपोलन रोरी

नैन नचाय, कह्यो मुसकाय, लला फिर आइयो खेलन होरी.

यही नटखटपन बसंती बयार को भी सूझा है. केदारनाथ अग्रवाल लिखते हैं -

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ!

जहाँ से चली मैं, जहाँ को गई मैं शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन,

हरे खेत, पोखर, झुलाती चली मैं, झुमाती चली मैं,

हवा हूँ, हवा, मै बसंती हवा हूँ।

चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया,गिरी धम्म से फिर,

चढ़ी आम ऊपर उसे भी झकोरा, किया कान में 'कू',

उतर कर भगी मैं हरे खेत पहुँची वहाँ गेहुँओं में लहर खूब मारी,

पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही मैं।

खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी, मुझे खूब सूझी!

हिलाया-झुलाया, गिरी पर न कलसी! इसी हार को पा,

हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों, मज़ा आ गया तब,

न सुध-बुध रही कुछ, बसन्ती नवेली भरे गात में थी!

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ!

मुझे देखते ही अरहरी लजाई, मनाया-बनाया, न मानी, न मानी,

उसे भी न छोड़ा पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला,

हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ हँसे लहलहाते हरे खेत सारे,

हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी, बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी!

हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ।

वसंत ऋतु के इस नटखट मलय समीर का स्पर्श पाकर प्रकृति कैसी नव वधू सी सज उठी है. अज्ञेय जी के शब्दों में -

मलयज का झोंका बुला गया

खेलते से स्पर्श से रोम रोम को कंपा गया

जागो-जागो, जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो .

पीपल की सूखी खाल स्निग्ध हो चली

सिरिस ने रेशम से वेणी बाँध ली

नीम के भी बौर में मिठास देख हँस उठी है कचनार की कली

टेसुओं की आरती सजा के बन गयी वधू वनस्थली

स्नेह भरे बादलों से व्योम छा गया

जागो-जागो, जागो सखि़ वसन्त आ गया जागो .

एक चित्र निराला जी ने भी प्रस्तुत किया था -

केशर की कलि की पिचकारी पात-पात की गात सँवारी

राग-पराग-कपोल किये हैं, लाल-गुलाल अमोल लिये हैं, तरु-तरु केतन खोल दिये हैं

आरती जोत-उदोत उतारी, गंध-पवन की धूप धंवारी .

गाये खग-कुल-कंठ गीत शत, संग मृदंग तरंग-तीर-हत, भजन-मनोरंजन-रत अविरत

राग-राग को फलित किया री, विकल-अंग कल गगन विहारी.

लेकिन सच पूछिए तो आज के आपाधापी भरे जीवन में समय कहाँ है कि हम खिड़की खोलें, बसंती बयार को भीतर आने दें, फूलों के रंगों से आँखों को तृप्त होने दें. शिवमंगल सिंह सुमन के शब्दों में बस यही कह सकते हैं कि -

अवकाश कभी था इनकी कलियाँ चुन-चुन कर होली की चोली रसमय करने का

सारे पहाड़ की जलन घोल अनजानी डगरों में बगरी पिचकारी भरने का।

अब ऐसी दौड़ा-धूपी में खिलना बेमतलब है,

इस तरह खुले वीरानों में मिलना बेमतलब है।

अब चाहूँ भी तो क्या रुककर रस में मिल सकता हूँ?

चलती गाड़ी से बिखरे- अंगारे गिन सकता हूँ।

अब तो काफी हाऊस में रस की वर्षा होती है

प्यालों के प्रतिबिंबों में पुलक अमर्षा होती है।

टेबिल-टेबिल पर टेसू के दल पर दल खिलते हैं

दिन भर के खोए क्षण क्षण भर डालों पर मिलते हैं।

पत्ते अब भी झरते पर कलियाँ धुआँ हो गई हैं

अंगारों की ग्रंथियाँ हवा में हवा हो गई हैं।


यहां से डाउनलोड करके सुनें

3 comments:

annapurna said...

मैं अपने पुराने यूनिवर्सिटी के दिनों में पहुँच गई, साहित्य की कक्षाएं, व्याख्यान और पुस्तकों में खो जाना, पंक्तियाँ चुन-चुन कर नोट्स बनाना... अब धीरे-धीरे साहित्यिक हिन्दी से मैं दूर होती जा रही हूँ, ऐसे में ये मेरे लिए वाकई वासंती हवा का झोंका हैं...

डॉ. अजीत कुमार said...

शुभ्रा जी, आज की इस तपती गर्म दुपहरी में जब मन अंतस तक व्याकुल हो रहा है, आपकी इस रचना को पढ़ रहा हूँ और सुन रहा हूँ आपकी मधुर आवाज़ में बसंत के इस आख्यान को.. दिल को एक सुकून सा मिल रहा है, मन की व्याकुलता को बसंती बयार अपने साथ कहीं उड़ा ले जा रही है..

डॉ. अजीत कुमार said...

आज जब तपती दुपहरी में बसंत आ ही गया है तो मेरा भी एक आख्यान है इसी विषय पर - http://ajitdiary.blogspot.in/2008/02/blog-post_29.html

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