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Tuesday, August 2, 2016

कैक्टस के मोह में बिंधा एक मन भाग-३७ (महेंद्र मोदी के संस्मरणों पर आधारित श्रृंखला )





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१९७४ के जून जुलाई तक एम ए का रिज़ल्ट आ गया था. मैं ५४% मार्क्स के साथ पास हो गया था. अब दौर शुरू हुआ बेकारी का. ये दौर मेरे लिए बहुत बुरा नहीं था, क्योंकि मेरी क्लिनिक मेरे साथ थी, मेरी ट्यूशंस मेरे साथ थी जिनसे मुझे अच्छी खासी कमाई हो रही थी. बल्कि मेरे लिए ये एक ऐसा ब्रेक था, जिसमे मैं इत्मीनान से स्टेज कर सकता था और साथ ही अपने मुस्तकबिल को लेकर तसल्ली से सोच सकता था कि मुझे इस ज़िंदगी में क्या करना है. माँ, पिताजी और भाई साहब की तरफ से भी जल्दी बारोजगार होने का कोई दबाव मुझ पर नहीं था, इसलिए वक्त अच्छा गुजर रहा था. बीच बीच में कुछ  बड़े कॉम्पिटीशन भी दिए, लेकिन बात कुछ बनी नहीं. इसी दौरान मेरा सलेक्शन बिजली बोर्ड में यू डी सी की पोस्ट के लिए हुआ. मैंने एच सी सक्सेना साहब जैसे लोगों के साथ रहकर ड्रामा सीखने को अपना मकसद बनाकर, जयपुर जाने का फैसला किया, जयपुर गया भी, मगर वहाँ के एस ई के खराब बर्ताव की वजह से, फ़ाइल उनके चेहरे पर फ़ेंक कर आ गया. ये वाक़या मैं तफसील से ३३वें एपिसोड में लिख चुका हूँ. इसके बाद श्री गंगानगर में दिए एक इम्तहान की बदौलत, बैंक ऑफ इंडिया में बतौर एक क्लर्क के मेरा सलेक्शन हुआ. आस पास के हर इंसान ने राय दी कि मुझे ज्वाइन कर लेना चाहिए. बैंक की नौकरी मिलती कहाँ है? मैं जब इंटरव्यू देने श्री गंगानगर गया तो रामभंवरी बाई और आसकरण बहनोई जी के घर रुका. बहनोई जी खुद बैंक से रिटायर हुए थे. उनकी भी राय यही थी कि मुझे बैंक ज्वाइन कर लेना चाहिए. मगर मैंने सोचा, क्लर्की चाहे बैंक की हो या बिजली बोर्ड की, क्लर्की तो क्लर्की ही होती है, फिर जब साइंस छोड़कर आर्ट्स में आया था, तो गुरुदेव दलीप सिंह जी ने जो लफ्ज़ कहे थे वो, रह रहकर दिमाग में गर्दिश किया करते थे. उन्होंने कहा था, “मतलब मौज करनी है तुम्हें.... पढाई लिखाई नहीं करनी. ठीक है, जैसा तुम ठीक समझो...... वैसे महेंद्र,एक बात सुन लो, जंग में पीठ दिखाकर जाने वाले लोग मुझे बिलकुल पसंद नहीं हैं. खैर, जाओ आर्ट्स में जाओ........ वहाँ जाकर कुछ नाम करोगे तो अच्छा लगेगा, वरना अगर किसी बैंक में क्लर्की ही करनी है, तो बी ए करने की भी क्या ज़रूरत है? दसवीं पास को भी मिल जाती है क्लर्की तो.” साथ ही मुझे अपने वो लफ्ज़ भी याद आते थे, जो मैंने उनके पाँव छूकर कहे थे “ गुरुदेव, आपसे वादा करता हूँ कि कुछ भी करूँगा, लेकिन बैंक में क्लर्की नहीं करूँगा. आपका आशीर्वाद रहा तो कुछ अलग करूँगा और एक दिन मैं आऊँगा ज़रूर आपके पास, आपको प्रणाम करने.” मैंने बैंक ऑफ इंडिया की उस नौकरी को भी ज्वाइन नहीं किया और कुछ दिन और आज़ाद रहकर कहीं और किस्मत आजमाने का फैसला किया. हाँ इस बीच मैंने तय किया कि क्यों न एक-आध डिग्री और ले ली जाए. साइंस मैथ्स पढ़ चुका था, साइंस बायो पढ़ चुका था और आर्ट्स भी पढ़ चुका था. मैंने सोचा कॉमर्स छूट रही है, क्यों न एम कॉम कर लिया जाए. किताबें इकठ्ठा की गईं और कॉमर्स को समझने की कोशिश करने लगा.
मेरी एम कॉम की पढाई भी ठीकठाक चल रही थी, क्लिनिक भी चल रही थी, ट्यूशंस भी चल रही थीं, नाटक भी चल रहे थे थोड़ा बहुत खेलने भी चला जाता था. मेरे साथ साथ भाभी जी का एम ए भी हो चुका था और भाई साहब को बीकानेर और नौरंगदेसर के बीच दौड भाग कुछ भारी पड़ने लगी थी, भाई साहब भाभी जी को लेकर पूरी तरह नौरंगदेसर शिफ्ट हो गए. जहां घर में पांच फर्द थे, अब घर में सिर्फ हम तीन लोग बच गए. मैं, पिताजी और माँ. जिस आँगन में नई नई ब्याहता भाभी जी की पायल की रुनझुन हर वक्त गूंजा करती थी, वो आँगन अब सूना हो गया था. इस सूनेपन ने मुझपर और पिताजी पर तो ज़्यादा असर नहीं डाला, मगर मेरी माँ जैसे टूट गईं. भाई साहब से उन्हें बहुत लगाव था. अब उनका इस तरह शिफ्ट होना उन्हें अंदर कहीं बहुत खल गया था. उन्होंने भाई साहब के शिफ्ट होने का फैसला सुना और वो एकदम खामोश हो गईं. कोई आता जाता, उनसे बात करने की कोशिश करता, तब भी उनकी खामोशी नहीं टूटती थी. अब उनकी तबियत कुछ ज़्यादा ही खराब रहने लगी. हालांकि नौरंगदेसर बीकानेर से महज़ २५ किलोमीटर दूर था और भाई साहब, भाभी जी अक्सर माँ से मिलने बीकानेर आ जाया करते थे, लेकिन फिर भी माँ दिनोदिन कमज़ोर होने लगीं.
मैंने अब तक के अपने एपिसोड्स में अपने पिताजी, अपने ताऊजी, अपने भाई साहब, सबके बारे में काफी लिखा है लेकिन अपनी माँ के बारे में कुछ ज़्यादा नहीं लिख पाया हूँ. इसका अर्थ ये बिलकुल नहीं है कि ऐसा कुछ था ही नहीं, जो कि मैं लिखता........!!!
दरअसल मेरी माँ पढ़ी लिखी तो कुछ खास नहीं थीं, क्योंकि उस ज़माने में लड़कियों को पढाने का रिवाज ही नहीं था. जैसा कि मैंने पहले लिखा है कि मेरी बड़ी और छोटी मौसी, दोनों न के बराबर पढ़ी हुई थीं, लेकिन मेरी माँ उनके मुकाबले पढ़ी-लिखी कहलाती थीं, क्योंकि हिन्दी की किताबें वो बड़े आराम से पढ़ लेती थीं और उन्हें शौक़ भी था, अच्छा साहित्य पढ़ने का. उसूलों की बहुत पक्की और बहुत ही किफायतशारी से घर चलाने वाली एक कुशल गृहिणी. मुझे अच्छी तरह याद है, मैं काफी छोटा था. पिताजी घर खर्च के लिए उन्हें सौ रुपये दिया करते थे और वो महीने के आखिर में उन सौ रुपयों में से भी दस-पन्द्रह रुपये बचा लिया करती थीं. कई बार बड़ी बड़ी मुसीबतें आईं, कई बार पिताजी ऊटपटांग जगह ट्रान्सफर हो जाने की वजह से बिना तनख्वाह की लंबी लंबी छुट्टी पर घर बैठे रहे, तब माँ के बचाए इन रुपयों से ही घर का खर्च चला.
न जाने क्यों उस ज़माने में हर माँ अपनी बेटियों को ये सिखाना नहीं भूलती थीं कि पूरे परिवार को अच्छा खिलाओ-पिलाओ. जो बच जाए, वो रूखा सूखा खुद खाओ. उनकी परवरिश भी उनकी माँ ने कुछ इसी अंदाज़ से की थी. चाहे हम लोगों को घर लौटने में कितनी भी देर हो जाती थी, हम सब खा लेते, उसके बाद ही वो खाना खाया करती थीं और उनका खाना भी बहुत साधारण सा हुआ करता था. कोई भी अच्छी चीज़ घर में आती थी, तो वो खुद कभी नहीं खाती थीं, उनकी कोशिश रहती कि हर अच्छी चीज़ पिताजी को और हमें खिलाई जाए. नतीजा ये हुआ कि शुरू से ही उनका जिस्म कमज़ोर रहा. मेरे और भाई साहब के बड़े होने के बाद हम जिद कर करके उन्हें अच्छी खुराक देने की कोशिश करते, लेकिन तब तक उनका हाज़मा इतना कमज़ोर हो गया था कि वो उन चीज़ों को हज़म नहीं कर पाती थीं. कुछ साल से उनके जिस्म पर ज़रा सी भी चोट लग जाती या कोई छोटा सा झटका भी लग जाता, तो वहाँ खून का एक चकत्ता सा बन जाता था. डॉक्टर लोग बताते थे, उनकी नसें इतनी कमज़ोर हो गयी हैं कि ज़रा सा झटका लगने पर भी नसें फट जाती हैं और चमड़ी के नीचे खून जमा हो जाता है.
एक और बात उस ज़माने की बेटियों को सिखाई जाती थी. मैंने अपनी माँ, अपनी ताई जी, अपनी छोटी मौसी जी सबमें ये बात देखी. अपने आपको अपने शौहर के मिज़ाज के मुताबिक कुछ इस तरह ढाल लो कि आपका अलग से कोई वजूद ही न रहे, आपकी अलग से कोई शख्सियत ही ना रहे. मेरी माँ भी एक मज़बूत शख्सियत की औरत थीं. मुझे याद है कि १९५६-५७ में जब हम लोग चूनावढ़ में रहते थे, पिताजी को कई बार सरकारी दौरे पर जाना पड़ता था और घर में हज़ारों रुपयों की सरकारी रकम रखी हुई होती थी, तो माँ बिलकुल बिना डरे एक पिस्तौल लेकर रात रात भर जागकर हमारी और उस रकम की हिफाज़त करती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी शख्सियत को पिताजी की शख्सियत के मुताबिक इस तरह बना लिया कि वो खुद अपना वजूद ही भूल गयीं. उनके लिए पिताजी का हर हर्फ़ ही हर्फ़े आखिर था.
१९७४ के ३१ दिसंबर की रात बारह बजे पूरी दुनिया ने रंग बिरंगी आतिशबाज़ी के साथ १९७५ का खैरमकदम किया......हमने सोचा, ये नया साल शायद हमारे लिए भी खुशियों की कोई सौगात लेकर आया होगा, लेकिन अफ़सोस...... १९७५ का ये साल हमारे परिवार के लिए अपने दामन में छुपाकर लाया था, एक ऐसा ज़बर्दस्त शॉक जिससे हम लोग कभी नहीं उबर पाए.
फरवरी का आख़िरी हफ्ता चल रहा था. मैं माँ के पास ही बैठा पढाई कर रहा था,  क्योंकि अगले ही महीने यानि मार्च में मेरे एम कॉम के इम्तहान होने वाले थे कि माँ मुझसे बोली “ महेंदर, दो मिनट के लिए तुम्हारी पढ़ाई खराब कर रही हूँ...”
मैंने कहा “ कोई बात नहीं आप बोलो ना क्या बात है?”
“ज़रा पंचांग देखकर बताओगे कि आज तिथि कौन सी है?”
मैंने कहा “ये तो अखबार से ही पता चल जाएगा. लेकिन आप क्यों पूछ रही हैं?”
वो बोलीं “अष्टमी को मेरी सासू जी यानि तुम्हारी दादी जी की बरसी है. मैं चाहती हूँ कि इस बार उस दिन किसी गरीब औरत को हम लोग खूब अच्छा खाना खिलाएं और साथ में कपडे भी दान करें.”
मैंने कहा “आप ऐसा चाहती हैं तो ज़रूर ऐसा ही होगा, आप बिलकुल फ़िक्र न करें, लेकिन अभी तो काफी दिन है अष्टमी में. आप कहेंगी तो कल परसों मैं कुछ अच्छी साडियां लाकर आपको दिखा दूंगा, आपको जो साड़ी पसंद आये वही आप अपने हाथ से उस गरीब औरत को दे देना.”
वो बोलीं “ठीक है.”
अगले दिन भाई साहब और भाभी जी नौरंगदेसर से आये हुए थे. माँ ने भाई साहब को आवाज़ दी “राजा ओ राजा”
भाई साहब बाहर से भागे हुए आये. माँ ने बताया कि अचानक उनके सर में बहुत जोर से दर्द उठा है. भाई साहब ने उन्हें सरदर्द की दवा तो दे दी, लेकिन उनके ज़ेहन में उनकी नसें फटने की बात को लेकर हमेशा एक डर सा बना रहता था, इसलिए उन्होंने कमरे का दरवाजा पूरा खोलकर कहा “उधर सामने देखिये तो...... क्या सब ठीक दिखाई दे रहा है?”
उन्होंने धीरे से अपना सर उठाया और बोलीं “हाँ दिखाई तो..... ठीक ..... ही दे रहा है...... लेकिन सुनो राजा..... मुझे सब कुछ ....... थोड़ा लाल लाल सा दिखाई दे रहा है.”
मुझे भाई साहब के चेहरे पर घबराहट साफ़ नज़र आई. मैं भी इतने साल से प्रैक्टिस कर रहा था. मुझे भी समझ आ गया कि वो क्या सोच रहे हैं? उन्होंने माँ को कहा “आप आँखें बंद करके सोने की कोशिश करो.”
मुझे बोले “तुम यहीं इनके पास बैठो, मैं डॉक्टर सक्सेना के पास जाकर आ रहा हूँ.” और वो बाहर की तरफ भागे.
मैं माँ के पास बैठकर उनका सर दबाने लगा. दस ही मिनट में भाई साहब और डॉक्टर एच सी सक्सेना दौड़े हुए आये. डॉक्टर सक्सेना ने माँ की कुछ और जांच की और भाई साहब से कहा “राजेन्द्र इन्हें जल्दी से हॉस्पिटल में एडमिट करवाओ.”
फ़ौरन एम्बुलेंस बुलाकर उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया और वहाँ एडमिट कर लिया गया. हमारे पीछे पीछे ही डॉक्टर एच सी सक्सेना भी हॉस्पिटल आ गए थे और थोड़ी ही देर में डॉक्टर सक्सेना, डॉक्टर मिश्रा, डॉक्टर के कुमार डॉक्टर के डी गुप्ता, जितने भी बड़े बड़े सीनियर फिजीशियन थे, सभी इकट्ठे हो गए और उनके इलाज के बारे में सलाह मशविरा करने लगे.
जैसा कि भाई साहब को डर था, माँ के दिमाग की कोई नस फट गयी थी. मेडिकल साइंस उस ज़माने में आज के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई थी. दिमाग की सर्जरी करने की बात छोटे मोटे हॉस्पिटल में सोची भी नहीं जा सकती थी और बीकानेर के सभी डॉक्टर्स की राय थी कि दिल्ली या जयपुर तक का सफर करने की ताक़त माँ के जिस्म में नहीं थी. सिर्फ एक ही इलाज था. एक दवा को हाथ या पैर की नस के ज़रिये दिमाग तक पहुंचाया जाए. वो दवा दिमाग में जम चुके खून को धीरे धीरे वहाँ से हटा सकती थी. बीकानेर के बाज़ार या हॉस्पिटल में वो दवा भी नहीं मिल रही थी, लेकिन सारे बड़े बड़े डॉक्टर माँ का इलाज कर रहे थे इसलिए मेडिकल स्टोर वालों ने बाहर से वो दवा मंगाकर हॉस्पिटल को फराहम करवाई. उनके सर में हर वक्त बहुत शदीद दर्द रह रहा था, इस क़दर कि उन्हें नींद के इंजेक्शन देकर सुलाये रखना पड रहा था. बीच बीच में वो नींद से जागती थीं. शदीद सरदर्द के बावजूद अपने चारों तरफ नज़र दौडाती थीं. मैं, पिताजी और बाई..... हम लोग तो उनके पास से हटते ही नहीं थे. भाई साहब कभी डॉक्टरों के चक्कर लगाते, कभी उनके पास आकर बैठते. भाभी जी घर पर रहकर सारे इन्तेज़ामात देख रही थीं कि कब किसके लिए खाना घर पर बनना है, किसके लिए खाना हॉस्पिटल जाना है और माँ के लिए क्या क्या हॉस्पिटल जाना है.........बीच बीच में जब भी मौक़ा मिलता वो माँ को देखने हॉस्पिटल की ओर दौड भी लगातीं. जब भी माँ की नींद टूटती, वो हमें दिलासा देतीं, इशारे से बतातीं “मैं ठीक हूँ, फ़िक्र मत करो आप लोग.” लेकिन जब भी उनकी नींद टूटती वो एक ही सवाल करतीं “अष्टमी कब है?”
एक दिन मैं और पिताजी उनके पास बैठे हुए थे. बाई नहाने धोने गयी हुई थीं. उनकी नींद टूटी. पिताजी ने पूछा “जी कैसा है?”
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा “ ठीक ही है. अष्टमी कब है?”
पिताजी ने कहा “तुम अपनी तबियत की फ़िक्र करो, अष्टमी वष्टमी को भूल जाओ.”
वो हलके से मुस्कुराईं. शायद हॉस्पीटल में एडमिट होने के बाद पहली बार मुस्कुराई होंगी. फिर बोलीं “नहीं जी, मैं अष्टमी को नहीं भूल सकती. अगर मुझे नींद आयी हुई रहे उस दिन, तो आप लोग याद रखना. आपकी माँ सा की बरसी है उस दिन. किसी गरीब औरत को अच्छा खाना खिलाना और अच्छे कपडे दान देना.”
पिताजी ने उनसे छुपाकर अपनी आँखें पोंछी और बोले “क्यों चिंता करती हो तुम? जैसा तुम चाहती हो वैसा ही होगा. महेंदर ने एक बहुत अच्छी साड़ी लाकर घर पर रख दी है. चाहो तो कल तुम्हें यहाँ लाकर दिखा दें.”
उन्होंने गर्दन को ज़रा सा हिलाते हुए कहा “ नहीं, मुझे क्या देखना है?.....ले आया है महेंदर तो अच्छी ही होगी ”
उनके सर का दर्द फिर तेज होने लगा था. नर्स ने आकर उन्हें फिर से नींद का इंजेक्शन लगाया और कहा “माता जी, सोने की कोशिश करो अब आप.”
उन्होंने बच्चे की तरह नर्स की बात मानते हुए आँखें मूँद ली.
दिन जाने कैसे गुज़र रहे थे. बाई रात में उनके पास रहती थीं और भाई साहब खुद डॉक्टर थे, इसलिए ड्यूटी डॉक्टर के पास सोने की सहूलियत उन्हें मिल जाती थी. मैं बाहर बरामदे में लेटता था. पिताजी को हम लोग रात में घर भेज दिया करते थे.
एक बात का ज़िक्र मैंने शुरू के एपिसोड्स में किया था कि पिताजी माँ दुर्गा के ज़बर्दस्त भक्त थे. दोनों वक्त घंटों पूजा किया करते थे. साल में दो बार जो नवरात्रि आती है, वो उन दोनों नवरात्रियों में पूरे नौ दिन व्रत किया करते थे.
इन दिनों जब माँ हॉस्पिटल में थीं, हम हालांकि पिताजी को इसलिए घर छोड़कर आते थे कि उनकी भी काफी उम्र हो गयी है, उन्हें आराम करना चाहिए, लेकिन वो घर पहुंचकर नहा धोकर रात रात भर देवी की पूजा किया करते थे और सुबह जब हम उन्हें हॉस्पिटल लेकर आते थे, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून और इत्मीनान रहता था. वो कहते थे “तुम लोग फ़िक्र मत करो, तुम्हारी माँ जल्दी ही ठीक हो जायेगी. मुझे कल रात को ही दुर्गा का दृष्टांत हुआ है. उन्होंने कहा कि फ़िक्र करने की कोई बात नहीं है. वो ठीक हो जायेगीं.”
उनकी बातों से दिल को थोड़ा सुकून सा मिलता था, लेकिन जब किसी टेस्ट की रिपोर्ट आती तो पता लगता, माँ की हालत और बिगड रही है. मैं और भाई साहब सबसे ज़्यादा परेशान होते क्योंकि पिताजी को अपनी दुर्गा माँ पर पूरा भरोसा था और बाई को दुर्गा माँ पर भी भरोसा था और पिताजी की बातों पर भी.
इसी बीच डॉक्टर्स ने बताया कि माँ के खून में प्लेटलेट्स तेज़ी से कम हो रही हैं. उन्हें खून चढ़ाना होगा. मैंने, भाई साहब ने और मेरे छोटे मामाजी ने एक एक यूनिट खून दिया. जैसे ही वो खून उनके जिस्म में पहुंचा, हमें लगा कि एकदम से उनकी हालत बेहतर होने लगी है. उनका सरदर्द भी कम हो गया और वो बहुत देर तक बिना नींद के इंजेक्शन के रहकर अच्छी तरह बातें भी करने लगीं. हमें लगा कि अब वो बीमारी से उबर रही हैं लेकिन दो तीन दिन के बाद उनकी हालत फिर गिरने लगी.   
बीकानेर में उन दिनों सिवाय सरकारी हस्पताल के कोई और हस्पताल भी नहीं था, जहां हम किसी बेहतर डॉक्टर के पास जा सकें. शहर के तमाम बड़े डॉक्टर सरकारी हस्पताल में ही थे और वो सभी मिलकर माँ का इलाज कर ही रहे थे. उनकी हालत एक दिन थोड़ी बेहतर होती तो दूसरे दिन बिगड जाती. हम लोगों ने कह्सूस किया था कि खून चढाने के बाद एक बार उनकी हालत सुधरी थी और आस पास खून देने लायक बहुत लोग थे, इसलिए डॉक्टर्स से बात की गयी कि क्यों न उन्हें दो तीन यूनिट खून चढ़ा दिया जाए. लेकिन डॉक्टर्स ने बताया कि  दिमाग में जो खून जम गया था, उसकी वजह से दिमाग में सूजन आने लगी है, अब खून चढ़ाना मुमकिन नहीं है. उनकी हालत धीरे धीरे गिरने लगी. अब उनकी नींद बहुत कम टूटने लगी थी. नींद टूटती थी तब भी वो उतने होश में नहीं रहती थीं, जितनी कि पहले रहती थीं फिर भी हर बार नींद टूटने पर एक सवाल करना वो कभी नहीं भूलती थीं “अष्टमी कब है?”
हम लोग रोज सोचते थे कि ये कुछ और बात करें, लेकिन वो सिवाय इस सवाल के कोई बात ही नहीं करती थीं.
एक दिन मैंने बताया “चार दिन में है अष्टमी..... और कपडे लाकर रखे हुए हैं.”
फिर अगले दिन वही सवाल.........
फिर अगले दिन और टूटे टूटे स्वर में वही सवाल......
अगले दिन दोपहर बाद उनकी नींद टूटी. मैं उनके पलंग पर ही बैठा हुआ था. भाई साहब, बाई पास में खड़े हुए थे और पिताजी कुर्सी पर बैठे हुए थे. उन्होंने चारों तरफ एक निगाह डाली और पिताजी की तरफ देखते हुए होठों ही होठों में बोलीं.... अष्टमी...... और आँखें ऊपर की ओर घुमाई, मानो पूछ रही हों... “कब है?”
पिताजी ने जवाब दिया “कल है अष्टमी.”
उन्होंने होठों ही होठों में जैसे कहा “तब ठीक है.”
उस शाम वो काफी देर जागती रहीं. डॉक्टर्स आये. डॉक्टर सक्सेना का हमारे घर में काफी आना जाना था, उस शाम आये तो बोले “कैसी हैं माता जी?”
माँ ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए अपनी अंगुली आसमान की तरफ कर दी. मानो कह रही हैं, ईश्वर सब ठीक करेगा. डॉक्टर सक्सेना बोले “आज तो काफी ठीक लग रही हैं आप.”
माँ ने धीरे धीरे डॉक्टर सक्सेना को हाथ जोड़ दिए. डॉक्टर सक्सेना ने माँ के जोड़े हुए हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा “ये क्या कर रही हैं माताजी, मैं तो राजेन्द्र की तरह आपका बेटा हूँ.”
माँ की बहुत धीमी सी आवाज़ सुनाई दी “डॉक्टर तो भगवान का रूप होते हैं ना?”
डॉक्टर लोग जांच करके चले गए.
थोड़ी देर में उन्हें बाई ने मुसम्मी का रस दिया और नर्स ने आकर इंजेक्शन दिए और वो सो गईं. उस रात वो बहुत गहरी नींद सोईं. मैं बाहर बरामदे में सो रहा था. भाई साहब ड्यूटी रूम में और बाई हमेशा की तरह उनके पास कुर्सी लगाकर बैठी थीं.
सुबह हुई. हर आम दिन जैसी ही सुबह थी वो. माँ अभी तक सो रही थीं. बाई और भाई साहब नहाने धोने घर चले गए थे. सुभाष पिताजी को लेकर आया, थोड़ी देर वहाँ रुका और चला गया. अब कमरे में हम तीन लोग थे. मैं माँ और पिताजी...... बिलकुल उसी तरह जैसे भाई साहब, भाभी जी के नौरंगदेसर शिफ्ट होने के बाद घर में हम तीन लोग बच गए थे. बस फर्क यही था कि घर में माँ बिस्तर पर लेटे लेटे भी सबको बताती रहती थीं कि किसको क्या कैसे करना है और यहाँ वो बिलकुल बेहोश लेटी हुई थीं. पिताजी अपनी दुर्गा माँ को याद कर रहे थे और मैं मुसलसल माँ के चेहरे पर आने वाले तास्सुरात को निहारे चला जा रहा था. तभी वो थोड़ा सा हिलीं. उनके चेहरे पर एक दर्द सा उभरा. मुझे लगा, उन्हें कुछ तकलीफ हो रही है. सामने ही दो नर्सें नज़र आईं. मैंने आवाज़ दी..... “सिस्टर ...........” सिस्टर भागी हुई आई. तभी देखा, माँ की आँखें खुली हुई हैं. उन्होंने पिताजी की ओर गर्दन घुमाने की कोशिश की लेकिन शायद उनके जिस्म में इतनी ताकत नहीं बची थी, उन्होंने वापस आँखें बंद कर लीं. पिताजी आखें बंद किये हुए थे. मैंने उन्हें आवाज़ लगाई तो वो हडबडाकर पलंग के पास आ गए. तभी फिर माँ की आँखें खुलीं..... उन्होंने पिताजी की तरफ देखा...फिर जैसे उन्हें किसी बात की जल्दी हो, पिताजी पर से हटकर फ़ौरन उनकी निगाहें मेरी तरफ आ गईं ..... उनका हाथ उठा, उन्होंने मेरे सर पर अपना हाथ रखा....... मैंने उनके हाथ पर  को अपने हाथ से पकड़ लिया. कोई दस सेकंड तक उनका हाथ मेरे सर पर और मेरा हाथ उनके हाथ पर रहा.... अचानक जैसे उनका हाथ ढीला पड गया और आँखें बंद हो गईं. मैं और पिताजी दोनों घबरा गए. नर्स ने नब्ज़ देखी और कहा “ हंस उड़ गया साहब.”
अब पता लगा कि वो उस अष्टमी के बारे में क्यों बार बार पूछ रही थीं. उन्हें भी अष्टमी को ही जाना था.
मैं इन सब बातों में बहुत यकीन नहीं रखता, लेकिन आप सोचिये कि १९६५ में जिस अष्टमी को मेरी दादी जी इस दुनिया से गईं, उसके ठीक दस साल बाद यानि १९७५ में उसी अष्टमी को मेरी माँ गईं. यही नहीं, ये ५ का डिजिट हमारे परिवार के लिए अकाल है, ये मुझे मेरे भाई साहब ने उस वक्त कहा था, जब २०१५ शुरू हुआ था. मैं २९ जनवरी २०१५ को इलाहाबाद में अपनी एक पुरानी दोस्त देविका की बेटी प्रिया की शादी में जाकर मुम्बई लौटा था कि भाई साहब का फोन आया, तबियत खराब है. प्रोस्टेट की कुछ दिक्कत लग रही है.मैंने उनसे कहा “मैं कल सुबह की फ्लाइट से जयपुर पहुँच रहा हूँ, आप भी संजीव जी के साथ जयपुर आ जाइए.” मैं अगले ही दिन सुबह जयपुर पहुँच गया. थोड़ी देर बाद वो भी संजीव जी के साथ ट्रेन से आ गए. उनके पहुँचते ही उन्हें अपेक्स हॉस्पिटल में भर्ती करवाया. अपेक्स हॉस्पिटल के मालिक डॉक्टर एस बी झंवर मेरे और भाई साहब दोनों के दोस्त हैं. चार पांच दिन तक सारे टेस्ट्स हुए. उसके बाद उनके बेटे डॉक्टर शैलेश ने बताया कि कोई खास बात नहीं है. सारे चेक अप हो गए हैं, आप इन्हें ले जा सकते हैं, तो मैंने भाई साहब से पूछा, आप इतना परेशान क्यों हो गए तो वो बोले “देख महेंदर......हो सकता है कि अभी मैं ठीक हूँ लेकिन ज़रा इतिहास की तरफ निगाह डाल. १९६५ में हमारी दादीजी गईं, १९७५ में माँ गईं, १९९५ में पिताजी गए. अब आ गया है २०१५, यानि तू मान या ना मान....... अब मेरी बारी है और वो बिलकुल सही निकले.
माँ के जाने के बाद पूरा परिवार मानो बिखर गया. हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि माँ के बिना जिया कैसे जाएगा? पिताजी बिलकुल बदल गए थे. जो पिताजी रात और दिन माँ दुर्गा की पूजा किया करते थे, उन्होंने पूजा पाठ सबको तिलांजलि दे दी. अब उनकी ज़िंदगी में न कोई पूजा थी और न कोई व्रत-उपवास. तब से लेकर अपनी अंतिम सांस तक उन्होंने कभी भगवान का नाम भी नहीं लिया. उनके इस अमल का मेरे ज़ेहन पर ये असर हुआ कि उनके साथ ही मैं भी नास्तिकता की ओर बढ़ने लगा. मैंने भी पूजा पाठ छोड़ दिए. मैंने भी व्रत उपवास बंद कर दिए. यहाँ तक कि मैंने किसी मंदिर की ओर मुंह करना भी बंद कर दिया.
हालांकि मेरे जिगरी दोस्त डॉक्टर मंगत बादल अक्सर कहते हैं “भाई साहब आप चाहे अपने आप को कितना भी नास्तिक कहें, दरअसल आप नास्तिक नहीं हैं. मेरा मानना तो ये है कि आप भगवान से रूठे हुए हैं.” हो सकता है उनकी बात सही हो, लेकिन मैं अपने आप को नास्तिक ही मानता हूँ और शायद अंतिम सांस तक किसी ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं कर पाऊंगा.

2 comments:

Manisha Modi said...

Aap ki likhi har baat se aapko jaan ne ka mauka milta hai...aapke aur kareeb aa jaati hun

Manisha Modi said...

Aap ki likhi har baat se aapko jaan ne ka mauka milta hai...aapke aur kareeb aa jaati hun

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आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद।

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