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Wednesday, August 3, 2016

बारिश के बहाने, पत्ता पत्ता बूटा बूटा - सोलहवीं कड़ी

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बरसात में सारी धरती बाग़बानी में लग जाती है तब मेरे जैसे शौकिया बागबानों को फ़ुरसत ही फ़ुरसत रहती है। पौधों को पानी देने वाला सारा समय बच जाता है। बारिश की फुहारों से नहाई-धोई पत्तियाँ मुझे भी पुलक-सिहरन से भर देती हैं। बारिश ज़रा देर को थमती है तो मैं बाहर निकल कर अपने पेड़-पौधों को देख आती हूँ। ज़मीन में लोट चुके पौधों को बाँस की खपच्चियों का और इधर-उधर फैल रही बेलों को रस्सी के झूले का सहारा दे आती हूँ। किसी गमले में ढेरों पानी जमा हो रहा हो तो उसे अंदर उठा लाती हूँ। लेकिन उसके बाद क्या करूँ? कैसे काटूँ बोझिल और उदासी भरी शामें, सबकी सब शामें -



ऐसी ही एक भीगी शाम को चुन-चुन कर कुछ नए पुराने नग़मे सुन रही थी कि तभी मेरे हाथ लगा यह अनमोल उपहार - यूनुस ख़ान के स्वर में - प्रकृति के अनुपम चितेरे सुमित्रानंदन पन्त जी की कविता "पर्वत प्रदेश में पावस" 


 

जैसे भूखे व्यक्ति को थोड़ा-सा खाने को मिल जाये तो उसकी भूख और तेज़ हो जाती है, कुछ वैसा ही मेरे साथ भी हुआ। मैं एक के बाद एक कविता पुस्तकें निकालती गयी और पढ़ती गयी। जैसे ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि नरेश मेहता की कविता - "वर्षा भीगा शहर"
साँझ का झुटपुट 
खड़े चुपचाप भीगे गाछ -
राख रंग के दही जैसा मेघ का परिवार 
-अब बरसकर हो गया चुपचाप -
हरी दूबों भरा उस मैदान का विस्तार, 
क्लर्क लड़की के रिबन सी 
क्षीण काया सड़क 
भीगी, मौन -
चढ़ गयी है सामने की टेकरी पर 
देखने सतपुड़ा वन का निर्जनी सूर्यास्त !! 

भीगती शाम का एक और चित्र  मिला पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुस्तक में -
वह बरसाती शाम रँगीली, खेतों की सोंधी धरती 
ऊँची-ऊँची घास लहरती, बंजर में गायें चरती। 
बूँदा-बाँदी से दुखियाती खड़े रोंगटे नीला रंग 
पूँछ उठा भर रहीं चौकड़ी सुते छरहरे चंचल अंग। 
एक हुए होंगे जल-जंगल, पर मैं उनसे कितनी दूर 
डोल रहे होंगे पट-बिजना जलता जैसे चूर कपूर। 
मोड़ भरे पीले फूलों से खिल बकावली मेंड़ों पर 
बैठी होगी, जामुन, अंबिया लदीं रौस के पेड़ों पर। 
कौंध रही बिजली रह-रहकर चुँधिया जाती हैं आँखें 
मन मारे मन-पंछी बैठा है समेट भीगी पाँखें। 

मुझे याद आया 1960 का वो ज़माना, जब मेरे नानाजी गोरखपुर में पोस्टेड थे। बँगले के आगे एक बड़ा सा लॉन था और उसके एक सिरे पर जामुन का पेड़ था। उस पेड़ पर बरसात के दिनों में ख़ूब जामुन लगते। जानने वाले कहते थे यह जामुन नहीं "फरेंदा" है। इसके जामुन बहुत मीठे और रसीले होते हैं। शायद इसीलिये बंगले बनते समय वह पेड़ कटने से बच गया था।
मैं उस समय कोई पाँच-छह साल की थी। बेहद नटखट और निडर। घर के अंदर कोई पेड़ हो और मैं उस पर चढ़ूँ नहीं? बंगले के पीछे, जहाँ गायें बँधती थीं, एक इमली का पेड़ था। कच्ची-पक्की इमली पेड़ से टूटकर टिन के शेड पर गिरतीं तो आवाज़ होती - टप्प टप्प। और बस मैं व्याकुल होकर दौड़ पड़ती। लेकिन गायों की देख-भाल करने वाला फुरसत चाचा बहुत भारी चुगलखोर था। मुझे इमली के आस-पास भी फटकते देखता तो फ़ौरन नानी से शिकायत कर देता। और मेरा इमली खाने का सपना - सपना ही रह जाता।
एक दिन मौक़ा मिल गया। वो कहीं गया हुआ था। इमली टपकी और मैं लपकी। मैदान साफ था। मैंने पहले गाय की नाँद पर पैर जमाये और फिर शेड के कोने से लटक गयी। इसके बाद शेड पर कैसे चढ़ूँ, यह हिसाब बैठा ही रही थी कि फुरसत महाराज लौट आये। उन्होंने जो मुझे अधर में लटकते देखा तो बुरी तरह चिल्लाने लगे। देखते-देखते माली-ड्राइवर-चौकीदार-चपरासियों की पूरी फ़ौज जमा हो गयी। घबड़ाहट में मेरे हाथ शेड से फिसले और मैं धड़ाम से गिरी ज़मीन पर। चोट ज़्यादा नहीं लगी, थोड़े से घुटने भर छिले। लेकिन मैंने डाँट के डर से बहुत घायल होने का सफल अभिनय कर डाला। नतीजा यह हुआ कि डाँट तो ज़्यादा नहीं पड़ी लेकिन अगले ही दिन मज़दूरों की गैंग बुलवा कर अहाते के सभी पेड़ों की छँटाई करवा दी गयी। पेड़ इतनी दूर तक बे-शाख़ कर दिये गये कि - "मैं बालक बँहियन को छोटो" किसी बिधि उन पर चढ़ न सकूँ।
तब मैंने एक दूसरा खेल ईजाद किया। ड्राइवर बंसराज को मामा बनाया और उनसे माँग की कि वे साहब को क्लब ले जाने से पहले मुझे और मेरे साथियों को कार की छत पर बैठाकर लॉन का चक्कर लगवायें। बंसराज को लगा इस खेल में कोई ख़तरा नहीं है और इसमें शामिल होने पर उन्हें डाँट नहीं पड़ेगी, सो वे इस "इनोसेंट पासटाइम" के लिए राज़ी हो गये। हमारे पास उन दिनों मर्करी फोर्ड गाड़ी थी, हाथी जैसी विशालकाय। हर शाम जब नानाजी दफ्तर से लौटकर चाय पीते, उतनी देर मैं और मेरे साथी - अनु और अनिल गाड़ी की छत पर बैठकर लॉन की सैर करते। बंसराज गाडी इतनी धीमी चलाते कि हमें हाथी की सवारी जैसा आनंद आता।
एक दिन की बात है, अनिल नहीं आया था, सिर्फ मैं और अनु शाही सैर पर निकले थे। गाड़ी ख़रामा-ख़रामा चलती हुई जामुन के नीचे से निकली। मैं कैरियर के बीच पैर फँसाकर खड़ी हो गयी। कोशिश में थी कि उचककर जामुन तोडूँगी। तभी देखा एक टहनी पर पत्तों का तिकोना दोना सा कुछ लटक रहा है। मैंने अनु को भी दिखाया। वो भी खड़ा हो गया। जैसे ही गाड़ी उसके नीचे से निकली, हमने लपक कर उसे तोड़ लिया।
तोड़ते ही जैसे हमारे हाथ-पैरों में आग-सी लग गयी क्योंकि वह पत्तों का दोना नहीं, लाल चींटों का छत्ता था। हमने उसे तोड़ा तो हज़ारों चींटे निकल कर हमारी बाँहों और टाँगों से चिमट गये। उससे भी दुखद बात यह रही कि हम दोनों दर्द से चिल्लाते रहे और बंसराज मामा समझते रहे कि आज बच्चों को बहुत मज़ा आ रहा है। लॉन में निराई-गुड़ाई कर रहे माली को लगा कि कुछ गड़बड़ है। उसने गाड़ी रुकवायी और हमें उतारा। तब तक हमारे अंदर इतने चींटों के डंक घुस चुके थे कि हम दोनों कई दिनों तक बुख़ार में पड़े रहे। लेकिन इस घटना से न तो मेरे खिलंदड़ेपन पर कोई असर पड़ा और न सीधे पेड़ से तोड़कर फल खाने का मेरा शौक़ कम हुआ।
दिल्ली में ऐसे मौके बहुत कम मिलते हैं कि आप डाल से तोड़कर अमरूद या शरीफ़ा या शहतूत खा सकें। लेकिन यहाँ भी मैंने पेड़ से अभी-अभी तोड़े जामुन खाये हैं। शायद किसी कड़ी में मैंने आपको बताया था कि जब नयी दिल्ली बसायी जा रही थी तभी यह भी तय किया गया था कि किस सड़क पर कौन से पेड़ लगाये जायेंगे। इसी योजना का नतीजा है कि तुग़लक़ रोड पर दोनों ओर बड़े-बड़े जामुन के पेड़ हैं। जामुन फलने के मौसम में इन पेड़ों की नीलामी की जाती है। ठेका लेने वालों का पूरा परिवार इन पेड़ों के नीचे आकर बस जाता है। जैसे-जैसे फल पकते जाते हैं परिवार का कोई सदस्य पेड़ पर चढ़कर डाल हिलाता है और बाक़ी लोग नीले प्लास्टिक की चादर फैलाये फलों को लोकते रहते हैं। सुबह की ड्यूटी पर आकाशवाणी जाते हुए मैंने गाड़ी किनारे रोक, ठीक उस नीली चादर से उठाकर जामुन खाये हैं। भले ही ये जामुन गोरखपुर के फरेंदा जितने मीठे न रहे हों लेकिन उनके साथ लाल चींटों के डंक भी शामिल नहीं थे। 

1 comment:

महेंद्र मोदी said...

बहुत सुन्दर शुभ्रा जी बहुत आकर्षक....... आपके बचपन की यादों ने मुझे भी अपने बचपन में पहुंचा दिया. फर्क इतना सा है की मैं ठहरा रेगिस्तान का रहने वाला, सिवा नीम की निम्बोलियों के हमारे लिए कोइ फल नहीं होता था जिन्हें हम आपकी तरह तोड़कर खा सकें.

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