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Wednesday, August 3, 2016

बारिश के बहाने, पत्ता पत्ता बूटा बूटा - सोलहवीं कड़ी

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बरसात में सारी धरती बाग़बानी में लग जाती है तब मेरे जैसे शौकिया बागबानों को फ़ुरसत ही फ़ुरसत रहती है। पौधों को पानी देने वाला सारा समय बच जाता है। बारिश की फुहारों से नहाई-धोई पत्तियाँ मुझे भी पुलक-सिहरन से भर देती हैं। बारिश ज़रा देर को थमती है तो मैं बाहर निकल कर अपने पेड़-पौधों को देख आती हूँ। ज़मीन में लोट चुके पौधों को बाँस की खपच्चियों का और इधर-उधर फैल रही बेलों को रस्सी के झूले का सहारा दे आती हूँ। किसी गमले में ढेरों पानी जमा हो रहा हो तो उसे अंदर उठा लाती हूँ। लेकिन उसके बाद क्या करूँ? कैसे काटूँ बोझिल और उदासी भरी शामें, सबकी सब शामें -



ऐसी ही एक भीगी शाम को चुन-चुन कर कुछ नए पुराने नग़मे सुन रही थी कि तभी मेरे हाथ लगा यह अनमोल उपहार - यूनुस ख़ान के स्वर में - प्रकृति के अनुपम चितेरे सुमित्रानंदन पन्त जी की कविता "पर्वत प्रदेश में पावस" 


 

जैसे भूखे व्यक्ति को थोड़ा-सा खाने को मिल जाये तो उसकी भूख और तेज़ हो जाती है, कुछ वैसा ही मेरे साथ भी हुआ। मैं एक के बाद एक कविता पुस्तकें निकालती गयी और पढ़ती गयी। जैसे ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि नरेश मेहता की कविता - "वर्षा भीगा शहर"
साँझ का झुटपुट 
खड़े चुपचाप भीगे गाछ -
राख रंग के दही जैसा मेघ का परिवार 
-अब बरसकर हो गया चुपचाप -
हरी दूबों भरा उस मैदान का विस्तार, 
क्लर्क लड़की के रिबन सी 
क्षीण काया सड़क 
भीगी, मौन -
चढ़ गयी है सामने की टेकरी पर 
देखने सतपुड़ा वन का निर्जनी सूर्यास्त !! 

भीगती शाम का एक और चित्र  मिला पंडित नरेन्द्र शर्मा की पुस्तक में -
वह बरसाती शाम रँगीली, खेतों की सोंधी धरती 
ऊँची-ऊँची घास लहरती, बंजर में गायें चरती। 
बूँदा-बाँदी से दुखियाती खड़े रोंगटे नीला रंग 
पूँछ उठा भर रहीं चौकड़ी सुते छरहरे चंचल अंग। 
एक हुए होंगे जल-जंगल, पर मैं उनसे कितनी दूर 
डोल रहे होंगे पट-बिजना जलता जैसे चूर कपूर। 
मोड़ भरे पीले फूलों से खिल बकावली मेंड़ों पर 
बैठी होगी, जामुन, अंबिया लदीं रौस के पेड़ों पर। 
कौंध रही बिजली रह-रहकर चुँधिया जाती हैं आँखें 
मन मारे मन-पंछी बैठा है समेट भीगी पाँखें। 

मुझे याद आया 1960 का वो ज़माना, जब मेरे नानाजी गोरखपुर में पोस्टेड थे। बँगले के आगे एक बड़ा सा लॉन था और उसके एक सिरे पर जामुन का पेड़ था। उस पेड़ पर बरसात के दिनों में ख़ूब जामुन लगते। जानने वाले कहते थे यह जामुन नहीं "फरेंदा" है। इसके जामुन बहुत मीठे और रसीले होते हैं। शायद इसीलिये बंगले बनते समय वह पेड़ कटने से बच गया था।
मैं उस समय कोई पाँच-छह साल की थी। बेहद नटखट और निडर। घर के अंदर कोई पेड़ हो और मैं उस पर चढ़ूँ नहीं? बंगले के पीछे, जहाँ गायें बँधती थीं, एक इमली का पेड़ था। कच्ची-पक्की इमली पेड़ से टूटकर टिन के शेड पर गिरतीं तो आवाज़ होती - टप्प टप्प। और बस मैं व्याकुल होकर दौड़ पड़ती। लेकिन गायों की देख-भाल करने वाला फुरसत चाचा बहुत भारी चुगलखोर था। मुझे इमली के आस-पास भी फटकते देखता तो फ़ौरन नानी से शिकायत कर देता। और मेरा इमली खाने का सपना - सपना ही रह जाता।
एक दिन मौक़ा मिल गया। वो कहीं गया हुआ था। इमली टपकी और मैं लपकी। मैदान साफ था। मैंने पहले गाय की नाँद पर पैर जमाये और फिर शेड के कोने से लटक गयी। इसके बाद शेड पर कैसे चढ़ूँ, यह हिसाब बैठा ही रही थी कि फुरसत महाराज लौट आये। उन्होंने जो मुझे अधर में लटकते देखा तो बुरी तरह चिल्लाने लगे। देखते-देखते माली-ड्राइवर-चौकीदार-चपरासियों की पूरी फ़ौज जमा हो गयी। घबड़ाहट में मेरे हाथ शेड से फिसले और मैं धड़ाम से गिरी ज़मीन पर। चोट ज़्यादा नहीं लगी, थोड़े से घुटने भर छिले। लेकिन मैंने डाँट के डर से बहुत घायल होने का सफल अभिनय कर डाला। नतीजा यह हुआ कि डाँट तो ज़्यादा नहीं पड़ी लेकिन अगले ही दिन मज़दूरों की गैंग बुलवा कर अहाते के सभी पेड़ों की छँटाई करवा दी गयी। पेड़ इतनी दूर तक बे-शाख़ कर दिये गये कि - "मैं बालक बँहियन को छोटो" किसी बिधि उन पर चढ़ न सकूँ।
तब मैंने एक दूसरा खेल ईजाद किया। ड्राइवर बंसराज को मामा बनाया और उनसे माँग की कि वे साहब को क्लब ले जाने से पहले मुझे और मेरे साथियों को कार की छत पर बैठाकर लॉन का चक्कर लगवायें। बंसराज को लगा इस खेल में कोई ख़तरा नहीं है और इसमें शामिल होने पर उन्हें डाँट नहीं पड़ेगी, सो वे इस "इनोसेंट पासटाइम" के लिए राज़ी हो गये। हमारे पास उन दिनों मर्करी फोर्ड गाड़ी थी, हाथी जैसी विशालकाय। हर शाम जब नानाजी दफ्तर से लौटकर चाय पीते, उतनी देर मैं और मेरे साथी - अनु और अनिल गाड़ी की छत पर बैठकर लॉन की सैर करते। बंसराज गाडी इतनी धीमी चलाते कि हमें हाथी की सवारी जैसा आनंद आता।
एक दिन की बात है, अनिल नहीं आया था, सिर्फ मैं और अनु शाही सैर पर निकले थे। गाड़ी ख़रामा-ख़रामा चलती हुई जामुन के नीचे से निकली। मैं कैरियर के बीच पैर फँसाकर खड़ी हो गयी। कोशिश में थी कि उचककर जामुन तोडूँगी। तभी देखा एक टहनी पर पत्तों का तिकोना दोना सा कुछ लटक रहा है। मैंने अनु को भी दिखाया। वो भी खड़ा हो गया। जैसे ही गाड़ी उसके नीचे से निकली, हमने लपक कर उसे तोड़ लिया।
तोड़ते ही जैसे हमारे हाथ-पैरों में आग-सी लग गयी क्योंकि वह पत्तों का दोना नहीं, लाल चींटों का छत्ता था। हमने उसे तोड़ा तो हज़ारों चींटे निकल कर हमारी बाँहों और टाँगों से चिमट गये। उससे भी दुखद बात यह रही कि हम दोनों दर्द से चिल्लाते रहे और बंसराज मामा समझते रहे कि आज बच्चों को बहुत मज़ा आ रहा है। लॉन में निराई-गुड़ाई कर रहे माली को लगा कि कुछ गड़बड़ है। उसने गाड़ी रुकवायी और हमें उतारा। तब तक हमारे अंदर इतने चींटों के डंक घुस चुके थे कि हम दोनों कई दिनों तक बुख़ार में पड़े रहे। लेकिन इस घटना से न तो मेरे खिलंदड़ेपन पर कोई असर पड़ा और न सीधे पेड़ से तोड़कर फल खाने का मेरा शौक़ कम हुआ।
दिल्ली में ऐसे मौके बहुत कम मिलते हैं कि आप डाल से तोड़कर अमरूद या शरीफ़ा या शहतूत खा सकें। लेकिन यहाँ भी मैंने पेड़ से अभी-अभी तोड़े जामुन खाये हैं। शायद किसी कड़ी में मैंने आपको बताया था कि जब नयी दिल्ली बसायी जा रही थी तभी यह भी तय किया गया था कि किस सड़क पर कौन से पेड़ लगाये जायेंगे। इसी योजना का नतीजा है कि तुग़लक़ रोड पर दोनों ओर बड़े-बड़े जामुन के पेड़ हैं। जामुन फलने के मौसम में इन पेड़ों की नीलामी की जाती है। ठेका लेने वालों का पूरा परिवार इन पेड़ों के नीचे आकर बस जाता है। जैसे-जैसे फल पकते जाते हैं परिवार का कोई सदस्य पेड़ पर चढ़कर डाल हिलाता है और बाक़ी लोग नीले प्लास्टिक की चादर फैलाये फलों को लोकते रहते हैं। सुबह की ड्यूटी पर आकाशवाणी जाते हुए मैंने गाड़ी किनारे रोक, ठीक उस नीली चादर से उठाकर जामुन खाये हैं। भले ही ये जामुन गोरखपुर के फरेंदा जितने मीठे न रहे हों लेकिन उनके साथ लाल चींटों के डंक भी शामिल नहीं थे। 

Monday, July 25, 2016

मेंहदी वाली सावन रुत आय गयी ...............पत्ता पत्ता बूटा बूटा - पंद्रहवीं कड़ी


सावन के महीने में मेंहदी की झाड़ियाँ फूल उठती हैं। उनके पास से गुज़रो तो भीनी-भीनी सुगंध मानो पुकार कर कहती है -
मेंहदी वाली सावन रुत आय गयी, जिया बिलमाय गयी ना। 

उस मादक गंध से बहू-बेटियों की हथेलियाँ मेंहदी रचाने को मचलने लगती हैं। कोई-कोई तो सीधे पतिदेव से माँग कर बैठती है कि मुझे मेंहदी रचानी है, लाकर दीजिये। पति अगर बहाने बनाकर टालना चाहे तो जगह भी बताती हैं और तरीका भी।

बनारस के एक पुराने रईस थे राजा मोतीचंद। उन्होंने शहर से कुछ दूर झील के किनारे अपना एक महलनुमा बँगला बनवाया था, जिसे "मोती झील" के नाम से जाना जाता था। बनारस के रईसों में इस तरह शहर से कुछ दूरी पर बगीचे और बँगले बनवाने की परंपरा रही है। इन बँगलों में आम तौर पर सिर्फ़ माली और चौकीदार रहते थे, जो समय-समय पर बगीचे के फल-फूल कोठी तक पहुंचा दिया करते थे। लेकिन बरसात के मौसम में सेठ जी पूरे परिवार या फिर यार-दोस्तों के साथ "बहरी अलंग" का मज़ा लेने के लिए खुद बगीचे में जाते थे। परिवार साथ हुआ तो झूला, मेंहदी और पकवानों का आनंद लिया जाता। दोस्त साथ होते तो भाँग-बूटी छनती, दाल-बाटी-चूरमा बनता और साज़-संगीत की महफ़िल जुटती। ऐसे ज़्यादातर बगीचे सारनाथ के आस-पास हैं लेकिन मोती झील शहर से उतनी दूर नहीं थी इसलिए फ़रमाइश हुई  -
पिया मेंहदी लिया द मोती झील से, जाके साइकिल से ना। 







मेंहदी रचाने का शौक़ नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को भी होता है। हमें भी बड़ा शौक़ था। जब कभी घर में तीज की तैयारियाँ चल रही होतीं और माँ-मासियों-मामियों के लिये सिल-बट्टे पर मेंहदी पीसी जा रही होती तो हम भी अपनी नन्हीं हथेली फैला कर फ़रमाइश करते रहते - हमें भी, हमें भी लगाना। और जब उँगलियों के छोर पर मेंहदी लग जाती तो हथेली के बीच में चाँद बनाने की माँग करते। फिर सारे घर में ये गीत गाते घूमते -

गोरे-गोरे हाथों में मेंहदी रचाके, नैनों में कजरा डालके 
चलो दुल्हनिया पिया से मिलने छोटा-सा घूँघट निकालके।


  

पता नहीं ये फ़िल्म देखी थी या नहीं, लेकिन इतना याद है कि इस गाने का ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड इतना बजाया था कि वह कभी तो एक झटके से किसी और लाइन पर पहुँच जाता और कभी एक ही जगह रिड़कता रहता  - मोती की लड़ियाँ उछाल के- छाल के- छालके - - - 
कुछ बड़े हुए और अपनी पसंद का रेडियो स्टेशन सुनने की छूट मिली तब मेंहदी का एक गीत बड़ा मोहक लगता था -

मेंहदी लगी मेरे हाथ रे 
पी मतवारे आयेंगे द्वारे लेके संग बारात रे।   








इन्हीं दिनों बनारस में गुजरातियों की काफी बड़ी संख्या को देखते हुए नोवेल्टी टॉकीज़ में रविवार की सुबह एक गुजराती फ़िल्म प्रदर्शित की गयी। हॉल के मालिक स्वयं गुजराती थे और उन्होंने ज़ोरदार पब्लिसिटी के ज़रिये सभी गुजरातियों को अपनी भाषा-संस्कृति का वास्ता देकर कहा था कि फिल्म ज़रूर देखें और उनके इस प्रयास को सफल बनायें। लिहाज़ा मेरे नाना जी भी उनके प्रयास की सफलता में योगदान देने गये और इस तरह हमने मेंहदी का एक और गीत सीखा -


मेंदी ते वावी मालवे ने एनो रंग गयो गुजरात रे 
मेंदी रंग लाग्यो। 





मेंहदी के रंग चाहे गुजरात के हों या पंजाब के, बहुत सारी ख़ुशी-उमंग-उछाह के साथ कहीं दिल के किसी कोने में एक टीस भी दे जाते हैं। आज जो लड़की घर में किलकारियाँ भरती घूम रही है, उसे कल घर छोड़कर जाना है यह याद आते ही मेंहदी के गीत ग़मज़दा हो उठते हैं -
मेंदी नी मेंदी, मेंदी नी मेंदी 
आज रलके लावण आइयां नी पैणां ते परजाइयाँ। 



हिंदी फिल्मों में यों तो मेंहदी के ढेरों गीत हैं। इतने कि अगर गिनाने बैठूँ तो सुबह से शाम हो जाये और गीत पूरे न हों। अपनी पसंद की बात करूँ तो मुझे एक वो गीत पसंद है जिसमें मुमताज़ जितेन्द्र से कह रही हैं - तू बन जाये मेंहदी का बूटा, गोरे-गोरे हाथ लूँ मैं रंग सजना - और दूसरा वो जिसमें शाहरुख़ ख़ान काजोल को आश्वस्त कर रहे हैं कि मेंहदी लगा के रखना, डोली सजाके रखना क्योंकि आख़िरकार दिलवाले ही दुल्हनिया ले जायेंगे। इनके अलावा मेंहदी का एक और बड़ा मीठा-सा, प्यारा-सा गीत है -

मेंहदी है रचने वाली हाथों में गहरी लाली 
कहें सखियाँ अब कलियाँ हाथों में खिलने वाली हैं 
तेरे मन को जीवन को नयी खुशियां मिलने वाली हैं।


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Monday, July 18, 2016

चंपा तुझमें तीन गुण :पत्‍ता पत्‍ता बूटा बूटा चौदहवींं कड़ी


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आजकल पत्र-पत्रिकाओं में, सोशल मीडिया में और आपसी बातचीत में सबसे अहम मुद्दा है -बरसात। बारिश हो रही है तो ख़ुशी में झूमते गीत और नहीं हो रही तो "अल्लाह मेघ दे" सरीखे गीत गाये-बजाये जा रहे हैं। रेडियो पर तो वर्षा गीतों की धूम मची हुई है। कुछ नया सुनाने की चाहत में उद्घोषक-उद्घोषिकायें जाने कहाँ कहाँ से भूले-बिसरे गीत ढूँढ कर ला रहे हैं। कुछ चिर-परिचित गीत भी बरसात के मौसम में सुने जाने पर बिलकुल नये-नये से लगते हैं, जैसे पहली बार सुन रहे हों। जैसे 1953 में बिमल रॉय की फ़िल्म दो बीघा ज़मीन के लिये सलिल चौधरी का संगीतबद्ध किया यह गीत -
हरियाला सावन ढोल बजाता आया,
धिन तक-तक मन के मोर नचाता आया,
मिटटी में जान जगाता आया।
धरती पहनेगी हरी चुनरिया,
बनके दुल्हनिया,
एक अगन बुझी,एक अगन लगी,
मन मगन हुआ एक लगन लगी। 



 

 या फिर शांताराम जी की प्रयोगात्मक फ़िल्म दो आँखें बारह हाथ के लिये भरत व्यास का लिखा और वसंत देसाई के स्वरों से सजा यह अद्भुत गीत -
हो उमड़ घुमड़कर आयी रे घटा,
कारे-कारे बदरा की छायी-छायी रे घटा
 सन सनन पवन का लगा रे तीर,
बादल को चीर निकला जो नीर, निकला जो नीर
 झर-झर झर-झर झर धार झरे हो
धरती जल से माँग भरे।
हो उमड़-घुमड़कर ---------
नन्हीं नन्हीं बूँदनियों की खनन-खनन खन खंजरी बजाती आयी
बजाती आयी देखो भाई बरखा दुल्हनिया, बरखा दुल्हनिया।


 

बरखा दुल्हनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उसके आते ही सारी धरती हरी चुनरी ओढ़कर उसके स्वागत के लिये तैयार हो जाती है। घर के बड़े-बूढ़ों सरीखे पेड़ सर हिला-हिलाकर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हैं। घर की बेटियों सरीखी लतायें फूली नहीं समातीं। छोटे बच्चों सरीखे पौधे यहाँ-वहाँ, हर कहीं झूमते फिरते हैं। सावन के दूल्हे की शान देखते ही बनती है। और ख़ुद बरखा दुल्हनिया हरी चुनरिया साजे, कलियों के कंगन खनकाती, रंग-बिरंगी झोली भरकर लोगों के भण्डार भरने निकल पड़ती है। बरखा के आने पर तरणि तनूजा तट के तमाल और कदम्ब वनों के पुलक उठने की बात हम पिछली कड़ियों में कर चुके हैं। आज एक और वृक्ष की बात करते हैं जो बरखा की नन्हीं-नन्हीं बूँदों की खंजरी से झूम उठता है - चंपा का वृक्ष। आम तौर पर आज हम जिसे चंपा समझते हैं और अपने बगीचों-पार्कों में बड़े शौक़ से लगाते हैं, वो असली चंपा नहीं है, चंपा का एक वर्णसंकर और आयातित संस्करण है। इसका सही नाम फ्रांजीपनी है और यह मूल रूप से मध्य और दक्षिण अमेरिका की प्रजाति है। ​




भारतीय चंपा इससे भिन्न है। इसका उल्लेख संस्कृत, पाली और तमिल साहित्य में मिलता है। अपने प्राकृतिक परिवेश में इसके पेड़ बहुत ऊँचाई तक जाते हैं। पत्तों की आकृति कुछ-कुछ मौलसिरी जैसी होती है और इसके फूल बहुत सुगंधित होते हैं।

भारत में भी अलग-अलग जगहों पर इसके अलग-अलग प्रकार देखने को मिलते हैं, जैसे काठ चंपा, कटहरी चंपा और नाग चंपा। कहते हैं कि चंपा के फूल पर भँवरे नहीं आते। बचपन में एक कहावत सुनी थी -

चंपा तुझमें तीन गुण, रूप रंग अरु बास 
केवल अवगुण एक है, भँवर न आवै पास।
 कई बार कोशिश की लेकिन इस कहावत की सच्चाई को अब तक सच या झूठ साबित नहीं कर पायी हूँ। अव्वल तो शहरों में भँवरे ही नज़र नहीं आते और कभी कोई भूला-भटका आ जाये तो इधर-उधर मँडराकर लौट जाता है। पता नहीं चंपा से उसकी गुफ्तगू होती है या नहीं।  बहरहाल पाती की जाली पर सोयी चंपा की कली का यह गीत मुझे बहुत प्यारा लगता है। आप भी सुनिये -
  

Sunday, July 10, 2016

कवन गुन निमिया में -पत्‍ता पत्‍ता बूटा बूटा तेरहवीं कड़ी


पिछली कड़ी में हम राधा प्यारी और कृष्ण मुरारी को झूला झूलते छोड़ आये थे न? इस बार झूला कदम्ब की डाल पर नहीं, नीम की डाल पर पड़ा है और झूल रही हैं माँ जगदम्बा। 

निमिया के डाली मैया डालेली असनवा के झूमि झूमि ना 

मैया झुलेली झुलनवा के झूमि झूमि ना। 


कुछ तो कारण होगा कि माँ ने दुनिया भर के मीठे फल देने वाले वृक्षों को छोड़कर कड़वी नीम को चुना। इस आशय का एक गीत भी है कि आपने आम, महुआ, जामुन जैसे सारे पेड़ों को तो बिसरा दिया फिर नीम में ऐसा कौन सा गुण पाया कि उस पर झूला डलवा लिया? गेंदा, गुलाब, बेला, चमेली जैसे सुन्दर सुगन्धित फूलों को बिसरा दिया और अड़हुल की माला पसंद की? हाथी, घोडा, रथ, बिसरा दिये और शेर की सवारी पसंद की? 

अमवा महुइया के जमुनिया तू सब बिसराय देहलु 

कवन गुन, ए मैया कवन गुन निमिया में पइलु के झुलवा लगाय लेहलु। 



गीत केवल प्रश्न उठाता है, जवाब नहीं देता लेकिन सवाल माकूल है और उसका जवाब मिलना चाहिए। मुझे लगता है कि इसका जवाब इस भावना में निहित है कि वे जगन्माता हैं, जगद्धात्री हैं। वे, और सिर्फ़ वे ही जानती हैं कि संतान के लिए अच्छा क्या है और बुरा क्या है। क्या उसके हित में है और क्या अहित में। हमें बचपन में सिखाया गया था कि किसी मनचाही वस्तु को पाने की ज़िद मत करो। भगवान पर छोड़ दो। वही बेहतर जानते हैं कि हमारे लिये क्या उचित होगा। जगदम्बा बेहतर जानती थीं कि कड़वेपन को छोड़कर नीम हर तरह से हितकारी है, इसीलिए उन्होंने झूला झूलने के लिए नीम को चुना। उनके संपर्क के कारण नीम सबके लिए पवित्र हो उठा।


ज़्यादा दिन नहीं हुए जब रेलयात्रा करते हुए गांवों के घर-आँगन में नीम का पेड़ ज़रूर दिख जाता था। अवध क्षेत्र के मेरे एक मित्र बता रहे थे कि उनके गाँव में एक नीम के पेड़ को काली माई के थान के रूप में मान्यता मिली हुई थी। गाँव के लोगों ने नदी किनारे से मिटटी लाकर वहाँ चबूतरा बना दिया था। न तो वहाँ कोई मूर्ति थी और न कोई पुजारी। फिर भी गाँव की औरतें बड़ी श्रद्धा से काली माई को जल चढातीं और परिवार के कुशल-क्षेम की मनौती माँगतीं। हारी-बीमारी दुःख-तकलीफ़ काली माई को सुनातीं और निश्चिन्त हो जातीं।  ​

हर किसी की फ़रियाद सुनने और कष्ट दूर करने वाले एक देवता जगन्नाथ पुरी में विराजते हैं। और उनका भी नीम से सीधा सम्बन्ध है। भगवान जगन्नाथ, दाऊ बलभद्र और देवी सुभद्रा के विग्रह नीम की लकड़ी से ही बनाये जाते हैं। पूरे विधि-विधान के साथ उन पेड़ों की पहचान की जाती है, जिनसे नए कलेवर तैयार किये जाते हैं। 


सदियों से इसके लिए बड़े स्पष्ट निर्देश हैं, बहुत सी शर्तें हैं। जब उन सभी शर्तों को पूरा करने वाले पेड़ मिल जाते हैं तब उन्हें धूम-धाम से मंदिर के परिसर में लाया जाता है और प्रतिमाओं के निर्माण का काम शुरू होता है।


मेरी जानकारी में मंदिर की मूर्तियों को बदले जाने की परंपरा और कहीं नहीं है। और हो भी कैसे? और सभी देवी-देवता मानवेतर हैं। मनुष्य के गुण-दोषों से परे। अपने-अपने मंदिरों में सादर प्रतिष्ठित। कभी सुना है आपने कि ऐसे भारी-भरकम देवता बरसात में भाई-बहन को साथ लेकर सैर-सपाटे पर जाते हों, पकवान खाकर बीमार पड़ते हों और फिर कई दिनों तक सिर्फ खिचड़ी खाकर गुज़ारा करते हों? नहीं न? जगन्नाथ यह सब लीला करते हैं। और तो और, जब वापस लौटकर आते हैं और पत्नी गुस्से में दरवाज़ा नहीं खोलती तो रात भर अपराधी की तरह बाहर खड़े रहते हैं। तभी तो ऐसे प्यारे भगवान को लोग सर-आँखों पर बिठाते हैं, उनके रथ खींचकर अपने को धन्य समझते हैं।

मेरे बचपन में वासन्ती नवरात्र के दिनों में नीम के कोमल लाल पत्ते, मिश्री के साथ प्रसाद रूप में दिए जाते थे। मैं बहुत झगड़ा करती कि सवेरे-सवेरे कड़वी चीज़ क्यों खिलाते हो। पर बड़े होने पर जाना कि बदलते मौसम के साथ आने वाली बीमारियों से बचाने के लिए यह रक्षा-कवच का काम करता है। फोड़े-फुंसी पर नीम का तेल लगाने से चामत्कारिक असर होता है। खसरा या चेचक होने पर मरीज़ के कमरे में नीम की पत्तियाँ लगा दी जाती हैं ताकि इन्फेक्शन न फैले। नीम की दतुवन करने वालों को कभी पायरिया नहीं होता। हमारे बनारस में सब्ज़ी वाले नीम के फूल बेचा करते थे जो दाल-चावल के साथ तलकर खाये जाते थे। पता नहीं डॉमिनो-मैकडोनल के युग में अब यह रिवाज बाकी रहा है या नहीं। 

 मेरी एक मित्र इन दिनों कच्छ में रहती है। पिछले दिनों उसने फेसबुक पर नीम के पेड़ के कुछ चित्र शेयर किये।



​​
 इस नीम पर बया के ढेरों घोंसले हैं, लेकिन उन डालियों पर हैं जो तालाब के ऊपर तक फैली हुई हैं और जंगली जानवरों की पहुँच से दूर हैं।  एक तो बया का घोंसला अपने आप में एक बड़ा अजूबा है कि बिना हाथ-पैर का एक छोटा सा पक्षी, सिर्फ अपनी चोंच के सहारे पत्तों से कैसे बारीक तार निकालकर कैसी अद्भुत रचना कर डालता है! उस पर उनकी आत्म-रक्षा की समझ - कि उन्होंने घोंसले ऐसी जगह बनाए हैं जहाँ कोई शत्रु आसानी से न पहुँच सके।
और एक हम हैं, इस पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान और शक्तिमान प्राणी - जो अपने हाथों अपनी भावी पीढ़ियों का विनाश करने पर तुले हुए हैं। ज़रा नहीं सोचते कि अगर हमारे यही रंग-ढंग रहे तो न नीम होगा, न उस पर रहने वाली बया। 

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Monday, July 4, 2016

झूला पड़ा कदम्ब की डारी - पत्‍ता पत्‍ता बूटा बूटा बारहवीं कड़ी






बचपन से जिन गीतों को सुन-सुन कर हम बड़े हुए वो गीत हमारी अंतरात्मा में कुछ ऐसे समा गए हैं जैसे दूध में शक्कर, जैसे फूल में ख़ुशबू या मौसम के मुताबिक़ बात करें तो जैसे बादल में बिजली। मैंने पहले भी किसी कड़ी में लिखा था कि मेरी नानी अपने बाल-गोपाल से सारी बातचीत गीतों में करती थीं। सुबह सवेरे "जागिये बृजराज कुँवर पंछी बन बोले" गाते हुए उन्हें जगाती थीं, "यमुना जल माँ केसर घोली स्नान कराऊँ श्यामडा" गाकर नहलाती थीं और "प्रातहि उठ मेरे लाड़ लडैतेहि माखन मिसरी भावे" कहकर भोग लगाती थीं। ठाकुर जी को नहलाने का पानी मौसम के अनुसार ठंडा-गर्म रखती थीं। सर्दियों में पानी कहीं ज़्यादा गर्म न हो, इसलिए अपनी कोहनी डालकर देखती थीं।
सर्दियाँ शुरू होते ही हमारे हाथों में ऊन-सलाई पकड़ा देती थीं कि मेरे ठाकुर जी का कम्बल बड़ा झीना हो गया है, नया बुनकर दो। हम उनकी और उनके ठाकुर जी की तानाशाही से बड़े त्रस्त रहते।
उन दिनों आज कल की तरह पूरे साल मटर-गोभी नहीं मिलती थी। अक्टूबर में कभी कोई सब्ज़ी वाला बड़े-बड़े पत्तों के बीच झलकती नन्हीं सी गोभी दिखाकर हमें ललचाता, तो हम नानी से गोभी खरीदने की ज़िद कर बैठते। लेकिन हमेशा इंकार ही सुनना पड़ता। मौसम का कोई भी नया फल या सब्ज़ी अन्नकूट से पहले घर में नहीं आती थी। अन्नकूट के दिन छप्पन भोग बनते और उसके बाद ही प्रसाद मिलता। 
बदलते मौसम के साथ नानी के गीत भी बदलते थे। ख़ास तौर पर वसंत और वर्षा के मौसम में तो एक से एक प्यारे गीतों का पिटारा खुल जाता। सावन के आगमन का गीत था -


सखि आवत अँधेरी घटा कारी-कारी ना।

राधा झूलें कृष्ण झुलावें बारी-बारी ना।

दादुर मोर पपीहा बोले डारी-डारी ना।

 
​​

फिर कदम्ब की डारी पर झूला पड़ जाता -

झूला पड़ा कदम की डारी झूलें कृष्ण मुरारी ना।



यू ट्यूब पर आपको सुनवाने के लिए यह गीत ढूँढ रही थी तो राधा रानी के झूलने का गीत मिल गया जिसमें राधा झूल रही हैं और कृष्ण उन्हें झोटा दे रहे हैं -

कदम पे झूल रही राधे जू
, साँवरिया दै रह्यो झोटा रे।




 

राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग में कदम्ब का बड़ा महत्त्व है। यही कदम्ब साक्षी बना था उस पल का जब राधा ने घड़ी भर के लिए मुड़कर कृष्ण को देखा था। विद्यापति कहते हैं -

तट तरंगिनि
, कदम कानन, निकट जमुना घाट।

उलटि हिरइत उलटि परली, चरन चीरल काँट।।


यमुना के घाट पर
, कदम्ब के वन में उलट कर उसे क्या देखा कि जैसे मैं स्वयं ही उलट गयी। चरण में काँटा चुभ गया और मन घायल हो गया।
लेकिन कामदेव ने अकेले राधा को ही निशाना बनाया हो, ऐसा नहीं है। सखियाँ कहती हैं - तुम्हीं नहीं हो, कान्ह भी तुम्हारे लिए पागल हैं। तुम्हारे गुणों पर लुब्ध हो गए हैं। कहीं और जा रहे हैं, पर आँखें इधर ही लगी हैं। ऐसे लुभाए नयनों को हटा भी कैसे सकते हैं। तुम दोनों जैसे एक ही डाल पर खिले हुए दो फूल हो। कवि विद्यापति कहते हैं कि प्यार ने एक ही तीर से दोनों को मार दिया है।

ये सखि ये सखि न बोलहु आन
, तुअ गुन लुबुधलनि अब कान।

अनतहु जाइत इतिहि निहार,लुबुधल नयन हटाये के पार।

से अति नागर तों तसु तूल, याक बल गाँथ दुई जनि फूल।

भन विद्यापति कवि कंठहार, यक सर मन्मथ दुई जीव मार। 


इन कवियों की बात मानें तो यमुना तट ताल, पियाल, तमाल और कदम्ब के घने वनों से भरा हुआ था। पाण्डवों के इंद्रप्रस्थ से कृष्ण के वृंदावन तक इन्ही वनों की हरियाली छायी हुई थी। सभी इन्हें जानते-पहचानते थे। तब स्कूली बच्चों को इनके फोटो और डिस्क्रिप्शन ढूंढ़कर लाने का हॉलिडे होमवर्क नहीं देना पड़ता था। मेरी बात अलग थी क्योंकि मेरे स्कूल में कदम्ब के कई पेड़ थे और मैंने बचपन से उन्हें फलते-फूलते देखा था।
लगभग पच्चीस वर्ष पहले की बात है। दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र से सुबह संस्कृत का साप्ताहिक कार्यक्रम प्रसारित होता था। मेरा भी उसमें थोड़ा-सा योगदान रहता था। हमने मेघदूत पर आधारित कुछ कड़ियाँ प्रसारित करने की सोची। श्लोकों के सस्वर पाठ की रिकॉर्डिंग हो गयी। उन पर विज़ुअल डालने के लिए बादल-बरसात, खेत-खलिहान, फूल-पत्ते, सारस-बगुले के स्टॉक-शॉट्स मिल गये, लेकिन कदम्ब नहीं मिला। और मुझे ज़िद्द चढ़ गयी कि बिना कदम्ब के मेघदूत प्रसारित नहीं होगा। प्रोड्यूसर दुर्गावती सिंह समझाती रहीं कि सरकारी तंत्र में ऐसे ही काम करना पड़ता है। नहीं मिलता कदम्ब तो जाने दो, किसी और पेड़ को डिफ्यूज़ करके काम चला लेंगे।  मैंने उनसे एक दिन की छुट्टी माँगी और अपनी मारुति लेकर कदम्ब की तलाश में निकल पड़ी। न जाने कितने नर्सरी, लाइब्रेरी और पार्क छान मारे। शाम हो चली थी जब कुछ खाने के लिए बंगाली मार्किट के नाथू स्वीट्स में पहुँची। वहाँ मुझे अपना बचपन का साथी कबीर मिल गया। लेडी श्री राम कॉलेज में मेरी माँ हिंदी और उसकी माँ उर्दू पढ़ाती थीं। कॉलेज कम्पाउंड में हमारे घर भी पास-पास थे। अम्मा के रिटायर होने पर हम कालकाजी चले गए थे मगर वे लोग अब भी वहीँ रहते थे। गप-शप के बीच जब मैंने उसे बताया कि मैं सुबह से कदम्ब का पेड़ तलाश कर रही हूँ तो उसने कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। लेकिन मेरे सर पर तो कदम्ब का भूत कुछ इस तरह सवार था कि मैं उसे मेघदूत के श्लोक पर श्लोक सुनाने लगी। 
नीपं दृष्ट्वा हरित-कपिशम् केसरैरर्द्धरूढैः 

नीप यानी कदम्ब के पेड़ के हरे-पीले फूल, जिनके केसर कुछ-कुछ उठे हुए थे। और

त्वत्सम्पर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः

मेघ के संपर्क से कदम्ब के पूरे खिले हुए फूल ऐसे लग रहे थे जैसे पुलक उठे हों, जैसे रोमांचित हो रहे हों।
बेचारा कबीर सब सुनने को मजबूर था।
लेकिन विवरण सुनकर उसने पूछा - अच्छा दीदी, पीला लड्डू जैसा फूल होता है क्या? 
मैंने कहा - हाँ।
बोला - थोड़े बड़े और हलके हरे रंग के पत्ते?
मैंने कहा - हाँ भाई हाँ।
कहने लगा - आप भूल गयीं? कॉलेज ऑडिटोरियम के पीछे, जहाँ हम लोग खेला करते थे, ऐसे दो पेड़ हैं।

मुझे सचमुच याद नहीं था इसलिए मैंने घर लौटने से पहले वहाँ जाकर उन पेड़ों को देखा। ठीक कदम्ब के ही पेड़ थे और उन पर हरित और कपिश दोनों रंगों के फूल भी थे। अगले दिन मैंने कैमरा टीम को ले जाकर कदम्ब के फूल की वीडियो रिकॉर्डिंग की। इस मेहनत के बदले मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला लेकिन मन कदम्ब के फूलों सा ही पुलकित हो उठा। 

और अब चलते-चलते बादल घिरे दिन के प्रथम कदम्ब का गीत सुनिये जिसे लिखा और स्वरबद्ध किया गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने और गाया है हेमंत दा ने-


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