आदरणिय पाठक गण,
रेडियोनामा के हमारे युनूसजी के रेडियोवाणी द्वारा परिचीत और ब्लोगींग की दुनियामें मेरे 'पिता' (यह प्रयोग एक रूपसे जानेमाने रेडियो प्रसारक श्री मनोहर महाजनजी की 'नकल' है, जिन्होंनें श्री हरमंदिरजी 'हमराझ'के हिन्दी फिल्मी गीतकोष के के वोल्यूमके रिलीझ कार्यक्रममें श्री गोपाल शर्माजी के लिये 'दादा', उनके पहेले आये पर गोपल शर्माजी के बाद रेडियो सिलोन गये स्व. शिवकूमार 'सरोज' के लिये 'पिता' और उनके बाद रेडियो श्रीलंका गये श्री रिपूसूदन कूमार ऐलावादीजी के लिये 'पुत्र' के रूपमें रेडियो प्रसारण की दुनिया के सम्बन्धमें परिचय दिया था, जो रेकोर्डिंग मूझे मेरे सुरत निवासी मित्र श्री हरीशभाई रघुवंशीजी के यहाँ देख़नेको काफ़ी समय पहेले देख़नेको मिली थी ।) श्री सागरभाई नहार जो एक लम्बी अवधी के ब्लोग और चेट परिचय के बाद आज मेरे घर आये थे , तो मैंनें सोचा की उनके शौख़ या उनके विचार सब तो ब्लोग पठको के लिये जाने पहचाने है । मैं सुरज को रोशनी क्या दिख़ाऊँ ! पर आप सबने उनके ब्लोगमें या रेडियोनामा पर युनूसजी की पोस्टमें उनको तसवीरमें सिर्फ़ देख़ा है , तो उनको बोलते हुए भी सुनाऊँ , जो सुन्दर भाषा बोलते है सुन्दर आवाझमें । तो सिर्फ़ थोडी सेकंड्स की छोटी अनौपचारिक बातचीत यहाँ प्रस्तूत की है ।
पियुष महेता ।
सुरत-395001.
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Monday, November 30, 2009
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