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Saturday, July 16, 2011

मेरी ज़िन्दगी का नमक - रेडियो : दूसरी कड़ी

आकाशवाणी इन्दौर के वरिष्ठ प्रसारणकर्ता नरहरि पटेल की यादें-2

मित्रों, पिछले शनिवार को आकाशवाणी इन्दौर के वरिष्ठ प्रसारणकर्ता और कवि नरहरि पटेल ने मालवा हाउस में अपनी आधी सदी पुरानी यादों को सहेजा। आज उसी का दूसरा भाग रेडियोनामा पर पेश करते हुए प्रसन्नता है। इस ब्लॉग के माध्यम से प्रयास रहा है कि प्रसारण विधा से जुड़ी उन तमाम शख़्सियतों के अनुभवों का दस्तावेज़ीकरण हो सके जिन्होंने किसी भी रूप में रेडियो को समृध्द किया है. गुज़ारिश यह भी है कि यदि हम उन तक नहीं पहुँच पा रहे हों और आप रेडियोनामा के पाठक के रूप में ऐसे किसी व्यक्तित्व से परिचित हैं तो हमें ईमेल द्वारा उनका संपर्क(फ़ोन/मोबाइल/ईमेल) भेजने की कृपा करें; हम आभारी होंगे। तो लीजिये मुलाहिज़ा फ़रमाइये नरहरिजी की आत्मीय रेडियो यात्रा की दूसरी और अंतिम कड़ी....

आकाशवाणी इन्दौर ने मुझे पूरे मध्यप्रदेश में एक सुपरिचित आवाज़ के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसकी वजह थे ऐसे प्रस्तोता जो मेरी अकिंचन क़ाबिलियत को सम्मान देते थे और अतिथि कलाकार के रूप में काम करने की स्वतंत्रता और मौक़ा मुहैया करवाते थे। हाँ यह भी बता दूँ कि आज भगवान की कृपा से मेरे पास ज़िन्दगी को आराम से जीने का सारा साज़ो-सामान है लेकिन पचास से सत्तर के दशक के उस मध्यमवर्गीय परिवेश के मुझ जैसे एक व्यक्ति को आकाशवाणी के इन प्रसारण अनुबंधों से काफ़ी आर्थिक बल भी मिला. यदि यह स्वीकारोक्ति नहीं करूंगा तो शायद वह नमक हलाली कहलाएगी।

मैं रेडियो की वाचिक परम्परा का प्रमुख स्वर बना उसके लिए डॉ. श्याम परमार, नंदलाल चावला, श्री नगरकर (सिने तारिका लीला चिटनीस के भाई) एन.पी. लैले, के.के.नैयर, अमीक़ हनफ़ी, जयदयाल बवेजा, पी.के.शिंगलू, केशव पाण्डे, महेन्द्र जोशी,ब्रज शर्मा (वॉइस ऑफ़ अमेरिका) दीनानाथ, स्वतंत्र कुमार ओझा, भारतरत्न भार्गव(बीबीसी) सत्येन शरत, विश्व दीपक त्रिपाठी - वीरेन्द्र मुंशी (दोनो बीबीसी हिन्दी सेवा) प्रभु जोशी, लक्ष्मेन्द्र चोपड़ा और राकेश जोशी जैसे प्रतिभासंपन्न प्रसारणकर्ताओं और प्रशासकों को श्रेय देना होगा जो प्रतिभा-पहचान के धनी रहे मेरी आवाज़ और क़लम का सही इस्तेमाल करते रहे।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे मालवा हाउस की आत्मीय यादें झकझोर देतीं हैं। बच्चों के गीत, किसानों के कार्यक्रम, युववाणी, रेडियो नाटक, रेडियो रूपक के साथ ही आकाशवाणी की उन प्रस्तुतियों की भी याद आती है जो श्रोताओं-दर्शकों की उपस्थिति में सभागारों और खेत-खलिहानों में होती आई हैं।

आकाशवाणी का वह सुनहरा दौर इसलिये भी याद आता है क्योंकि उस व़क़्त की कार्य संस्कृति कुछ ऐसी थी जो आकाशवाणी का पूरा स्टाफ़ बाहर से आने वाले कलाकार को भरपूर सम्मान देता था और उसकी कला का प्रशंसक होता था। मेरे कई नाटकों की रिहर्सल्स रात को ग्यारह-बारह बजे तक चलती रही है और उसके बाद देर रात को मैं अपनी सायकल से आठ-दस मील दूर बसे अपने घर पहुँचता था लेकिन तब भी थकान का नामोनिशान नहीं होता था क्योंकि मालवा हाउस में जाना और किसी प्रसारण का हिस्सा बनना मुझे गर्व से भर देता था.। हिन्दी रेडियो नाटकों ने मुझे अपार लोकप्रियता दी.नमक का दरोग़ा ईदगाह,,(प्रेमचंद) स्वप्न वासवदत्ता(महाकवि भास) नये हाथ(विनोद रस्तोगी) थैक्यू मिस्टर ग्लॉड(अनिल बर्वे)ऑलिवर ट्विस्ट(चार्ल्स डिकेंस) बिराज बहू(शरदचंद्र चटोपाध्याय)दो ध्रुव(वी.एस.खाण्डेकर) हूर का बेटा-बेनहुर (ल्यू वॉलेस), ख़ामोश अदालत जारी है(विजय तेंडुलकर) कुछ एक ऐसे नाटक हैं जो मेरी ज़िंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे और इनके बहाने मेरी आवाज़ को एक मुक़म्मिल पहचान मिली।

आज भी एक वरिष्ठ प्रसारणकर्ता, सलाहकार समिति के सदस्य या कभी ऑडिशन कमेटी के मेम्बर के रूप में मालवा हाउस जाना-आना होता है लेकिन अब मालवा हाउस में न तो पुराने ज़िंदादिल प्रसारणकर्मी हैं और न ही उन जैसा काम करने का ज़ज़्बा। रेडियो ने मुझे अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम दिया,माइक्रोफ़ोन पर साँस का इस्तेमाल सिखाया,मेरी ज़िन्दगी को एक ऐसा नमक दिया जिसका स्वाद मुझे मानसिक रूप से बहुत स्वस्थ बनाता रहा है। मालवा हाउस के परिसर में आज भी कई बूढ़े दरख़्त हैं जो मुझसे अपने मौन के ज़रिये बतियाते हुए पूछते हैं क्यों भाई कैसे हो ? और मुझे इन पेड़ों के पत्तों से एक बार फिर डॉ. श्याम परमार की उस आवाज़ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जैसे वह पूछ रहे हों "अरे भाई आप जैसे लोगों को ही तो ढूँढ रहा हूँ मैं'। आते रहना मालवा हाउस में।

चित्रों में
  1. नरहरि पटेल
  2. जाने माने नाट्य निर्देशक दीनानाथ के साथ हैं नरहरि पटेल
  3. शरद बाबू के नाटक परिणिता की रेकॉर्डिंग का दृश्य। एकदम बाँई ओर हैं नरहरि पटेल.बीच में स्वतंत्रकुमार ओझा और वीरेन मुंशी.
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Saturday, July 9, 2011

मेरी ज़िंदगी का नमक... रेडियो

आकाशवाणी इन्दौर के वरिष्ठ प्रसारणकर्ता नरहरि पटेल की यादें

रेडियोनामा के बदले स्वरूप को जारी रखते हुए कोशिश है कि रेडियो से जुड़े लोगों की उस पूरी जमात से संवाद बने जो किसी न किसी रूप में प्रसारण-विधा से जुड़े रहे हैं, चाहे वे एनाउंसर्स हों,प्रोड्यूसर,समाचार वाचक, कमेंट्रेटर्स, अभियंता, गायक, संगीतकार या वे तमाम लोग जो अतिथि कलाकार के रूप में आकाशवाणी केन्द्रों में आते रहे और महत्वपूर्ण प्रसारणों का हिस्सा बने रहे।

इसी सिलसिले में आज रेडियोनामा पर नमूदार हो रहे हैं आकाशवाणी इन्दौर के सुपरिचित स्वर नरहरि पटेल। नरहरिजी की शख़्सियत अपने में बहुतेरी विधाओं को समेटे हुए है जिसमें कवि, रंगकर्मी, रेडियो प्रसारणकर्ता, लेखक और मालवा का लोक संस्कृतिकर्म शामिल है। नरहरिजी इप्टा से जुड़े रहे हैं और आकाशवाणी इन्दौर जिसे मालवा हाउस के रूप में भी जाना जाता है उसकी स्थापना के समय से उनका आत्मीय राब्ता रहा है। आइये आज रेडियोनामा रूबरू होते हैं नरहरि पटेल की रेडियो यादों के साथ...


आज जब रेडियोनामा के ज़रिये आपसे रूबरू हूँ तो ज़िंदगी के वे तमाम ख़ूबसूरत पल याद आ जाते हैं जो मैंने आकाशवाणी इन्दौर में यानि मालवा हाउस की दीवारों के बीच गुज़ारे हैं। हर पल शब्द और स्वर से गूँजते मालवा हाउस के दरो-दीवार मध्यप्रदेश में प्रसारण की पुरातन परम्परा के दस्तावेज़ हैं। आज जब उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है जैसे एक बार फिर मैं मालवा हाउस के स्टुडियो के माइक्रोफ़ोन के सामने आ खड़ा हुआ हूँ।

म.प्र.की सांस्कृतिक और व्यावसायिक राजधानी इन्दौर में आकाशवाणी का केन्द्र शुरू हुआ २२ मई १९५५ के दिन। पहले यह परिसर ग्वालियर हाउस कहलाता था लेकिन इसमें
आकाशवाणी इन्दौर की शुरूआत होते ही इसे नाम दिया गया मालवा हाउस। वही मालवा हाउस जिसे इलाचंद्र जोशी,कर्तारसिंह दुग्गल,प्रभागचंद्र शर्मा,शरद जोशी,रमेश बक्षी,वीरेन्द्र मिश्र,उस्ताद अमीर ख़ाँ,पं.कुमार गंधर्व, उस्ताद रज्जब अली ख़ाँ जैसे कलावंतों के सुकर्म,विचार और चिंतन का स्पर्श मिला।

आकाशवाणी में प्रवेश की कहानी बड़ी रोचक है। मैं उन दिनों इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ रहा था। वही संस्थान जिसमें विख्यात पार्श्व गायक किशोर कुमार, आकाशवाणी के पूर्व निदेशक अमृतराव शिंदे "अमन' और जाने-माने पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक भी पढ़े। रतलाम ज़िले की छोटी सी रियासत सैलाना से मैट्रिक पास करने के बाद मैं इन्दौर चला आया। घर में कविता,संगीत, साहित्य और रंगकर्म का ख़ासा माहौल था और मैं विद्यार्थी के रूप में अपने स्कूल के नाटकों और संगीत प्रस्तुतियों में हमेशा अगुआ रहता॥ यहाँ भी जिस मोहल्ले में आकर रुका वहाँ जानेमाने संगीतकारों के कुनबों की रिहाइश थी जिसमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय हैं उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब।

बहरहाल,एक दिन शाम को मैं इन्दौर के एक भोजनालय में पहुँचा। आधा खाना खा चुका तब ही पास की टेबल पर भोजन करने वाले दो शख़्स कला साहित्य विषय पर बतिया रहे थे। उन्हें सुनने के लिए मैंने अपने भोजन की ऱफ़्तार धीमी कर दी। जैसे ही उन्होंने भोजन ख़त्म किया मै भी हाथ धोने के लिए खड़ा हुआ और उनमें से एक से परिचय पूछ बैठा ? सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी उस शख़्स ने कहा मुझे श्याम परमार कहते हैं। यहॉं आकाशवाणी केन्द्र शुरू करने आया हुआ हूँ। उन्होंने मेरे बारे में जानकारी लेना शुरू की और जैसे ही मैंने उन्हें बताया कि मैं क्रिश्‍चियन कॉलेज में पढ़ रहा हूँ और नाटक, कविता तथा लोक संगीत में रूचि रखता हूँ तो श्यामजी गदगद हो गए और यक़ीन मानिये बिना हाथ धोए उन्होंने मुझे बाहों में भरकर कहा अरे भाई आप जैसे लोगों को ही तो ढूँढ रहा हूँ मैं। कल ही मालवा हाउस आ जाओ। इस वाक़ये से मैं यह बताना चाहता हूँ ये थी आकाशवाणी की पुरातन कार्य-संस्कृति जिसमें काम करने वाले लोग अपने संस्थान के काम को अपना काम समझते थे।

दूसरे दिन मैं हरे-भरे वृक्ष कुंजों से भरे परिसर वाले मालवा हाउस में था। स्टूडियो बन रहा था। श्याम परमार एक छोटे से कमरे में बैठे थे। वे मुझे उन दिनों निर्माणाधीन स्टुडियो में लेकर गये और हाथ में दे दी एक छोटी सी स्क्रिप्ट.बमुश्किल चार या पॉंच डायलॉग्स मैंने पढ़े होंगे और स्टूडियो में श्यामजी की आवाज़ गूँजी, उन्होंने कहा बस ! हो गया। वे मुझे अपनी टेबल तक ले गए और अपनी एक पुरानी कॉपी में से एक पन्ना फाड़कर मुझे कहा कि इस काग़ज़ पर स्वर परीक्षण के लिए एक चार पंक्ति का आवेदन लिख दीजिये क्योंकि तब तक मालवा हाउस में विधिवत कॉन्ट्रेक्ट फ़ॉर्म भी छपकर नहीं आये थे। कुछ दिनों बाद मुझे आकाशवाणी इन्दौर से पहला अनुबंध पत्र मिला। आधे घंटे का एक नाटक था जिसका पारिश्रमिक मुझे मिला पन्द्रह रुपये। सच कहूँ आज भी वे पन्द्रह रुपये बहुत अनमोल ख़ज़ाने की तरह याद आते हैं। बाद में मुझे मराठी की जानी-मानी अभिनेत्री सुमन धर्माधिकारी के साथ एक घंटे के लाइव प्रसारण का मौक़ा मिला। ये नाटक उज्जैन के राजा भृतहरि और उनकी रानी पिंगला पर एकाग्र था। तब मालवा हाउस तक रेकॉर्डिंग की मशीने नहीं पहुँची थीं सो सुमन ताई और हमने इस नाटक को लाइव किया। मालवा हाउस से ही ओम शिवपुरी, सुधा शर्मा(बाद में शिवपुरी) राजीव वर्मा, नंदलाल शर्मा, अशोक अवस्थी जैसे कई उन कलाकारों की आवाज़ रेकॉर्ड हुई जो बाद में फ़िल्म और टीवी के सुपरिचित चेहरे बने। मेरा सौभाग्य की कहीं न कहीं मैं इन कलाकारों के साथ काम कर पाया।
जारी...
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